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लॉकडाउन 27 00:17:57 लॉकडाउन 27 Video Duration : 00:17:57 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (19 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

अब तो काफी समय भी बीत चुका है और बहुत सारे प्रश्न भी आए हैं और काफी प्रश्नों के उत्तर भी हमने दिए हैं। और सबसे बड़ी बात है कि जब लॉकडाउन चालू हुआ जब हम यहां वापस आए तो हमने यही सोचा कि भाई! अच्छा रहेगा कि सब लोगों के सामने अपनी बात रखें और क्योंकि कई लोग हैं जो, जिनको डर लगा कि यह क्या हो रहा है! क्योंकि यह हर दिन तो होता नहीं है, हर रोज तो होता नहीं है। तो हमने समझाया कि भाई! डरने की जरूरत नहीं है, डरने की की बात नहीं है सबसे बड़ी बात है कि हिम्मत से काम लेना है और जहां तक हमारी समझ है, जो कुछ भी हो रहा है अब लोग तो इसी के पीछे पड़े हुए हैं कि यह क्या हो रहा है, वह क्या हो रहा है, कब छूटेंगे, कब यह होगा, कब वह होगा और अखबार में तरह-तरह के खबर भी छपती रहती हैं, आती रहती हैं।

पर अगर थोड़ा-सा ध्यान दिया जाए और यह जो कुछ भी हो रहा है इससे 2 मिनट, 3 मिनट के लिए मनुष्य की तरफ अगर हम अपना ध्यान दें तो कोई परिवर्तन नहीं है। अभी भी स्वांस तुम्हारे अंदर आ रहा है, स्वांस तुम्हारे अंदर जा रहा है, तुम जीवित हो। समय, समय है! तुम, तुम हो! तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है। सबसे बड़ी कृपा यह है और इससे बड़ी खुशखबरी इस संसार में और कोई नहीं है, “तुम जीवित हो।” तुम्हारे लिए यह सबसे बड़ी खुशखबरी है। अब यह बात तो सही है कि हम इसको खुशखबरी की तरह नहीं लेते हैं। क्योंकि जैसे अंग्रेजी में कहते हैं “ओल्ड न्यूज़ — पुरानी खबर!” तो यह तो पुरानी खबर है कि “हम जीवित हैं।” परन्तु यह पुरानी खबर नहीं है। जो हर नया दिन आता है, जिसमें तुम अपने को जीवित पाते हो। वह सबसे ताजा खबर है, पुरानी खबर नहीं, सबसे ताजा खबर है और सबसे जरूरी खबर है। सबसे जरूरी खबर है। सब खबरों से श्रेष्ठ खबर यह है कि तुम जीवित हो और अपना ध्यान उस चीज पर दो जिससे कि तुम्हारे हृदय में आनंद आए, उस तरफ ध्यान दो अपने जीवन के अंदर जिससे कि तुम्हारे हृदय में खुशी आए, तुम्हारी जिंदगी में खुशी आए।

कई लोग हैं और कहां-कहां उनका ध्यान नहीं जाता है। कोई किसी चीज का ध्यान करता है, कोई किसी चीज का ध्यान करता है। अब यहां तक भी बात हो जाती है कि लोगों की जिंदगी के अंदर इतनी परेशानियां हैं कि वह परेशानियों का ध्यान करते हैं और जो परेशानियों का ध्यान करेगा तो और परेशानी आएगी। अगर वह परमानंद का ध्यान करेगा तो उसकी जिंदगी के अंदर परमानंद आएगा और जो — अब जैसे कई बार, जब बच्चे थे तो अगर बस में सफर कर रहे हैं, कार में सफर कर रहे हैं, तो बच्चे यह देखने लगते हैं कि कौन-कौन-सी कार सफेद है। तो जब वह सफेद कार को ही खोज रहे हैं तो उनको सफेद कार ही मिलेंगी। क्योंकि वह काली कार मिले तो उसको नहीं गिनेंगे। लाल कार हो उसको नहीं गिनेंगे, नीली कार हो उसको नहीं गिनेंगे। पर जो सफेद है उसको गिन रहे हैं। वहां भी सफेद है, वहां भी सफेद है, वहां भी सफेद है, वहां भी सफेद है।

तो मेरे कहने का मतलब है कि जिस चीज में तुम्हारा ध्यान जा रहा है — और लोग हैं जो प्रश्नों में भी लिखते हैं, "जी! हम इस चीज से परेशान हैं, हम इस चीज से परेशान हैं, हम इस चीज से परेशान हैं।" पर, यह तो अच्छी बात है कि तुम्हारा स्वांस तुमसे नहीं कह रहा है कि "मैं तुमसे परेशान हूं।" तुम्हारी जिंदगी तुमसे नहीं कह रही है कि मैं तुमसे परेशान हूं, तुम हो मेरी परेशानी का कारण।

सबकुछ होते हुए, जो सुंदर-सुंदर चीजें हैं अपनी जिंदगी के अंदर इनको तो गिनते नहीं हो। इनके ऊपर कभी ध्यान जाता नहीं है। परिवार में भी मां हैं, बाप हैं, यह तो खुशी की बात है कि तुम्हारे मां हैं, बाप हैं उस पर तो ध्यान जाता नहीं है। यह जाता है कि वह क्या कह रहे हैं। अरे! कह रहें हैं तो कह रहे हैं, एक कान से सुनो और दूसरे कान से निकाल दो। सारी जिंदगी भर तुम यह करते हो। तो अपने परिवार के साथ भी यह कर सकते हो। एक कान से सुना — जो बुरा तुमको लगता है एक कान से सुना दूसरे कान से बुरा निकाल दिया। भाई हैं, बहन हैं यह नहीं कि हम खुश हैं कि भाई हैं, बहन हैं। वह यह करते हैं, वह यह करते हैं, वह यह करते हैं, वह यह करते हैं। अगर यही सब करते रहे आप अपनी जिंदगी में, नुक्स देखते रहे — भगवान कहते हैं गीता में अर्जुन से कि "मैं तेरे को ज्ञान देता हूं, मैं तेरे को वह दिव्य नेत्र देता हूं जिससे कि तू वह, मेरे असली रूप को देख पाएगा और समझाते हुए उसको कहते हैं कि मैं तेरे को यह ज्ञान जो दे रहा हूं वह इसलिए दे रहा हूं कि तू औरों के अवगुणों को नहीं देखता। इसलिए दे रहा हूं कि तू औरों के अवगुणों को नहीं देखता।" तो हमको भी तो ध्यान करना चाहिए। क्या हम सिर्फ लोगों के अवगुणों को देखते हैं या उनकी अच्छाईयों को भी देखते हैं ? अच्छाई को अगर देखोगे या देखने की कोशिश करोगे तो तुमको अच्छाई मिलेगी।

अब कोई आदमी घर में बैठा हुआ है वह मक्खी गिनना चाहता है तो मक्खी गिनने के लिए अगर वह निकलेगा या अपने घर में ही बैठा रहे तो मक्खी उसको नजर आयेंगी। क्योंकि ध्यान ही उसका मक्खियों पर है। अब पहले किसी और चीज पर ध्यान है तो मक्खी आई भी तो उस पर ध्यान नहीं गया। परंतु जब ध्यान ही मक्खियों पर है, ध्यान ही मुसीबतों पर है, ध्यान ही परेशानियों में है तो परेशानी, परेशानी नजर आएंगी। फिर जब तुम परेशानियों को देखने लगोगे, जब परेशानियां तुम्हारी नजर में आएंगी तो तुम और परेशान होगे। जब और परेशान होगे तो फिर ध्यान तुम्हारा और परेशानियों पर जाएगा। ध्यान और परेशानियों में जाएगा तो फिर तुम और परेशानियों को देखोगे।

यह ऐसे ही जैसे कुत्ता अपनी पूंछ के पीछे भागता है, भागता रहता है, भागता रहता है, भागता रहता है क्योंकि पूंछ को पकड़ तो सकता नहीं है। देख जरूर सकता है और कुछ पीछे उसके है, जो हिल रही है चीज उसको वह पकड़ना चाहता है और पकड़ तो सकता नहीं है तो फिर भागता रहता है, भागता रहता है, भागता रहता है, भागता रहता है। यही हाल हो जाता है। जब मैं छोटा था तो श्री महाराज जी के पास, हमारे पिताजी के पास एक छोटा-सा कुत्ता था, उसका नाम था ‘टॉमी।’ इतना चिढ़ा हुआ था वह सबसे, मतलब सबको काटता था वह और भौंकता था। अगर उसको एकदम पागल बनाना होता था तो उसके सामने एक आईना रख दो। बस! वह दूसरे कुत्ते को देखता था, (थी तो उसी की अपनी परछाई) वह दूसरे कुत्ते को देखता था तो वाऊं, वाऊं , वाऊं, वाऊं करके उसके पीछे भागता था। और इतना मतलब, घंटो-घंटो वह भौंकता रहता था अपनी ही परछाई पर और अपनी ही परछाई को काटना चाहता था। मनुष्य के साथ — वह तो कुत्ता था, वह तो कुत्ता था, उसको तो हम मान सकते हैं उसके पास इतना बड़ा दिमाग नहीं था जितना हमारे पास है और भाषा भी पता नहीं उसकी कोई कुत्ते वाली भौं, भौं, भौं, भौं — क्या-क्या कह रहे हैं कुत्ते पता नहीं।

भाई! तुम तो मनुष्य हो। तुम्हारे पास तो भगवान ने यह दिमाग दिया है, यह हृदय दिया है तुमको इस काबिल बनाया है कि तुम बोल सको, तुम सोच सको, तुम्हारे पास भाषा है परंतु हम करते क्या हैं ? फिर वही, आचरण वही हैं, जो हम करते हैं इस संसार के अंदर। अपने आप से ही लोगों को डर है। कई लोग हैं जो इस लॉकडाउन में हैं , घर में अकेले हैं उनको डर लगता है। डर क्यों लग रहा है भाई ? यह वही तो घर है, जहां तुम रहना चाहते हो, यह वही तो घर है। तुमने ही तो इसका प्रबंध किया हुआ है। पर अपने आप से ही डर लगता है।

जेलों में जब कैदी लोग कुछ खराब करते हैं तो उनको एक सजा दी जाती है उसे कहते हैं ‘सॉलिटेरी कन्फाइनमेंट’ (Solitary confinement) और सॉलिटेरी कन्फाइनमेंट का मतलब है उसको अकेले-अकेले कोई कमरे में बंद कर देंगे। वह सबसे बुरी सजा मानी जाती है। क्यों ? क्योंकि मनुष्य अपने आप, अपने आपको नहीं समझता है, वह अपने को ही भौंक रहा है, अपनी परछाई को देखकर ही भौंक रहा है। समझ नहीं आ रहा है उसके कि वह क्या है, क्यों यहां है ?

भगवान सबकुछ चला रहा है या वह चला रहा है ? सारी प्रकृति को चलाने वाला एक ही है। परंतु तुम अपनी जिंदगी में क्या करो। स्वांस का आना-जाना उसकी वजह से है, तुम्हारी वजह से नहीं है, उसकी वजह से है। पर इन हाथों से तुम क्या करो यह तुम्हारे पर निर्भर है। इस मुंह से तुम क्या बोलो यह तुम्हारे पर निर्भर है। तुम कड़वा भी बोल सकते हो, मीठा भी बोल सकते हो, दोनों चीजें हैं। जुबान में कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा। कड़वा बोलोगे तो यह नहीं है कि जुबान को कड़वा लगेगा। ना! वह तो मुँह से आवाज़ आएगी और कड़वा है। और मीठा है, मीठा बोलना चाहते हो, अंदर से बोलो। वह बोलो जो सच है। क्या सच है ? जिससे तुम प्यार करते हो उनको कहो कि तुम प्यार करते हो। मां-बाप आजकल बच्चों से प्यार जरूर करते हैं, परंतु वह कभी कहते नहीं हैं कि हम प्यार करते हैं। बस यही बात है "तैनें यह कर दिया, तैनें यह कर दिया!"

कितने ही मां-बाप होंगे जो पहला शब्द अपने बच्चे को सवेरे-सवेरे गुड मॉर्निंग नहीं बोलते हैं, राम-राम नहीं बोलते हैं, नमस्कार नहीं बोलते हैं, कैसे हो नहीं बोलते हैं, तुमसे प्यार है यह नहीं बोलते हैं। सबसे पहला शब्द क्या है "तुम लेट हो, लेट हो, लेट" — जब उसको यह मंत्र सीखा ही दिया कि "तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो" तो वह सारी जिंदगी भर लेट रहेगा। वह सारी जिंदगी भर लेट रहेगा। तुम चले भी जाओगे, तुम माँ-बाप हो , तुम चले भी जाओगे पर तुम्हारा बच्चा बड़ा होकर के लेट रहेगा। हर एक चीज में लेट। क्यों ? क्योंकि तुमने उसको अच्छी तरीके से समझा दिया है, हर रोज उसको समझा दिया है कि "तू लेट है, तू लेट है, तू लेट है, तू लेट है, तू लेट है।" तैनें यह नहीं किया, तैनें वह नहीं किया, तैनें ऐसा नहीं किया, तैनें वैसा नहीं किया।" यह सब क्यों करते हैं ताकि दुनिया तुम्हारी तरफ देखे और कहे कि जो तुम कर रहे हो, वह ठीक कर रहे हो।

देखो! तुम अगर सवेरे-सवेरे उठ करके अपना स्कूटर या मोटरसाइकिल लो और स्पीड लिमिट से चलाओ और हेलमेट पहनो और सबकुछ ठीक करो और जहां स्टॉपलाइट हो जहां लाल बत्ती हो वहां रुको और जहां हरी बत्ती हो वहां जाओ और हर एक चीज तुम बढ़िया तरीके से करो, बिल्कुल ठीक-ठाक करो जैसे कानून है वैसे ही अपनी मोटरसाइकिल चलाओ। तुम समझते हो कि तुम्हारी पीठ पर कोई हाथ ठोकेगा। नहीं, नहीं! गलत चलाओ तो तुरंत तुम्हारा चालान करने के लिए पहुंच जाएंगे। भाई! यही तो बात है इस संसार के अंदर। जब सब काम तुम ठीक करने की कोशिश करते हो कोई कुछ तुमको नहीं बोलेगा। गड़बड़ करोगे तब बोलेगा। तो सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि तुम अपनी जिंदगी में क्या चाहते हो ? तुम्हारी जिंदगी है। स्वांस का आना-जाना यह तुम पर निर्भर नहीं है। कब तुम पैदा हुए यह तुम पर निर्भर नहीं था। कब तुम जाओगे यह तुम पर निर्भर नहीं है, परंतु यह तुम पर निर्भर है क्या तुम इस, जो तुमको जीवन मिला है इसमें क्या करो! इसीलिए संत-महात्माओं ने पहले से ही कहा है कि —

बड़े भाग्य मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थन गावा।

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा, पाइ न जेंही परलोक संवारा।

समझाया है तुमको कि यह साधना का धाम है और मोक्ष का दरवाजा है। कैसी मोक्ष ? सारे झंझटों से परे — हटना और उठना और वह है असली मोक्ष। जीते जी जो मोक्ष मिले इन सारी चीजों से। जैसे यह एक उदाहरण है जो बहुत-बहुत बार दिया जाता है — जैसे कमल का फूल गंदे पानी में भी रहकर गंदे पानी से ऊपर रहता है वह स्वयं गंदा नहीं होता है, चाहे गंदे पानी में जरूर वह है, परंतु अगर कमल का फूल, उसको देखो तो वह तो इतना सुंदर है कि ऐसा नहीं लगता कि इस पानी में उसका जन्म हुआ है। पर हुआ है, हुआ है परन्तु फिर भी उससे ऊपर रहता है।

जो कुछ भी समस्याएं हैं, आएंगी समस्या तो आएंगी, परंतु अगर आपके पास ज्ञान रूपी छाता है तो आपको भीगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बारिश को आप नहीं रोक सकते। लोग यही सबसे बड़ी गलती करते हैं वह बारिश को रोकना चाहते हैं। हमारे पास आते हैं हमसे कहते हैं कि "जी! हम बारिश को कैसे रोक सकते हैं ?" बारिश को तुम नहीं रोक सकते सिर्फ क्या कर सकते हो तुम — अगर तुम्हारे पास छाता है तो उसको खोलो और तुम भीगने से बच सकते हो! बस! भीगने से बच सकते हो!

थोड़ा-सा ध्यान दो, अपनी तरफ ध्यान दो, अपने जीवन की तरफ ध्यान दो, ध्यान दो तुम क्या कर रहे हो, ध्यान दो किस तरीके से तुम — जिनसे तुम प्यार करते हो उनको किस तरीके से ट्रीट करते हो, उनको किस तरीके से, उनके साथ कैसा सलूक करते हो। प्यार का सलूक करो! समय लगेगा। लोग चाहते हैं कि अगर मैं कुछ आज मीठा बोल दूँ तो सभी मेरे लिए मीठा बोलें। नहीं! तुम अगर कुछ मीठा बोल दोगे तो लोग सोचेंगे "क्या हो गया इसको, आज अच्छी बात कर रहा है यह!" उनको भी समय लगेगा यह जानने में कि तुमने अपने जीवन में कोई परिवर्तन किया है। हर एक चीज में समय लगता है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, जब ॠतु तब फल होय।

धीरज तो रखना ही चाहिए। और जो कर सकते हो, अच्छा करो उसकी मिठास तुम्हारे जीवन के अंदर जरूर आएगी।

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार! फिर आगे मिलेंगे!

लॉकडाउन 26 00:16:55 लॉकडाउन 26 Video Duration : 00:16:55 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (18 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

अब यह दूसरा हिस्सा है। यह आया है चंचल, चंदौली उत्तर प्रदेश से — "आप मन और हृदय की बात करते हैं। मन चंचल है परंतु हृदय की बात समझ नहीं आती है। हृदय को कैसे समझें ?"

हृदय को समझने की बात नहीं है, हृदय को एहसास करने की बात है। जैसे जो मिठास का स्वाद है वह एहसास करने की चीज है। वह समझने की चीज नहीं है। अगर आप किसी को समझाने की कोशिश करेंगे कि मिठास क्या होती है तो वह किसी की समझ में नहीं आएगी। परन्तु एहसास करने की कोशिश करेंगे तो बिल्कुल कोई भी उसका एहसास कर सकता है। तो इसी प्रकार हृदय की बात, समझने की बात नहीं है। हृदय की बात आप अपने दिमाग से नहीं समझ पाएंगे, हृदय की बात आपको उसका एहसास करना पड़ेगा और जब आप उसका एहसास करेंगे, जब उसका अनुभव करेंगे तो वह अनुभव करने की बात है तब आपको समझ में आएगा कि हृदय क्या कह रहा है और क्या कहता है।

"क्या सुख और शांति में अंतर है ?" तो संजय कुमार का मुजफ्फरपुर से बिहार से यह प्रश्न है — "क्या सुख और शांति में अंतर है ?"

देखिये! शांति, शांति है और सुख, सुख है। सुख, आपको इस संसार का भी सुख मिल सकता है पर यह जरूरी नहीं है कि जब आप इस संसार का सुख ले रहे हैं तो आपको शांति भी मिलेगी। कई बार तो यह होता है कि आपको इस संसार का सुख तो मिल रहा है, परन्तु शांति नहीं मिल रही है। और कई बार यह होता है तो — "क्या सुख और शांति में अंतर है?" बिलकुल अंतर है। परन्तु जिस आदमी के पास शांति है उसको एक ऐसी, उसको एक ऐसा सुख मिलेगा, वह ऐसा सुखी होगा कि वह संसार नहीं समझ पायेगा कि तू क्यों सुखी है। "तेरे पास यह नहीं है, तेरे पास यह नहीं है, तेरे पास यह नहीं है।"

आज हैप्पीनेस जिसे कहते हैं — “सुखी, हैप्पीनेस, आर यू हैप्पी, तुम हैप्पी हो।” तो बड़े-बड़े आर्गेनाईजेशन्स ने इसकी परिभाषा बनाई है कि सुखी का क्या मतलब होता है ? तुम्हारे पास नौकरी हो, तुम्हारे पास परिवार हो, तुम्हारे पास यह हो, तुम्हारे पास वह हो, परन्तु यह सब चीजें होने के बावजूद भी यह जरूरी नहीं है कि मनुष्य सुखी है। बड़े बड़े लोग हैं, बड़े बड़े लोग हैं और अब एक आदमी को तो मैं जानता हूं मतलब, निजी रूप से नहीं जानता हूं, पर जानता हूं वह — अब मैं नाम नहीं लूंगा ऐसे देश का वह, इतना बड़ा इंचार्ज है और उसके पास बहुत, स्वयं भी उसके पास बहुत पैसा है, पर मैं नाम नहीं ले रहा हूं किसी का और बहुत-बहुत शक्तिशाली देश है और शक्तिशाली देश का वह इतना बड़ा नेता है तो वह भी शक्तिशाली हो गया। परन्तु जब भी उसको मैं देखता हूँ, तो ऐसा लगता है कि एकदम नाखुश है, खुश है ही नहीं। छोटी-छोटी-सी बातों से ऐजिटेटेड (agitated) रहता है, गुस्सा उसको हमेशा आता रहता है। कोई कुछ थोड़ा-सा भी गलत बोल दे तो बड़ा गुस्सा आ जाता है उसको। तो इतना सबकुछ होने के बाद भी उसके पास शांति नहीं है। पैसा है, यह नहीं है कि उसको किसी से उधार लेने की जरूरत है। कहीं भी वह जा सकता है, कुछ भी वह खरीद सकता है। हां, उसके घर में मेरे ख्याल से अच्छे-अच्छे सोफे होंगे, बैठने के लिए बढ़िया-बढ़िया चीजें होंगी, देखने के लिए बढ़िया -बढ़िया चीजें होंगी। वह सारा सुख तो है, परन्तु शांति उसके पास नहीं है। तो सुख और शांति में यह अंतर है। तो जिसके पास शांति है, उसके पास एक बहुत ही अद्भुत सुख है उसके पास और वह सुखी है। परन्तु जो सुखी है, उसके पास यह नहीं है कि उसके पास शांति है। तो यह अंतर है। बड़ा अच्छा सवाल पूछा आपने।

"जिस परमानंद को अपने ही अंदर देखने को आप कहते हैं यह कैसे संभव है समझाने की कृपा करें क्या यह कार्य किसी भी परिस्थिति में संभव है" — अर्चना सिंह, मिर्जापुर उत्तर प्रदेश से यह प्रश्न पूछ रही हैं — "जिस परमानंद को अपने ही अंदर देखने को आप कहते हैं यह कैसे संभव है?" यह इसलिए संभव है क्योंकि आपके अंदर वह है इसलिए संभव है। आपने सुना होगा मैंने पहले भी कहा हुआ है कि —

एक राम दशरथ का बेटा। एक राम घट-घट में बैठा।।

एक राम का जगत पसारा। एक राम जगत से न्यारा।।

जो आपके घट में बैठा है वह आपके अंदर है उसको देखना, देखना कैसे ? इन आँखों से नहीं, उसको देखना है अनुभव की आँखों से। और जब वह अनुभव की आँखों से आप उसको देखेंगे, तो आपको आनंद मिलेगा। यह उसकी प्रकृति है। तो ऐसे यह संभव है। और क्या यह किसी भी परिस्थिति में किया जा सकता है ? थीअरेटिक्ली (theoretically) यह किसी भी परिस्थिति में किया जा सकता है। भगवान कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं लड़ाई के मैदान में कि "तू मेरा सुमिरन भी कर और लड़ाई भी कर!" जब समय आया तो उस चीज को दिखाने के लिए भगवान कहते हैं "तू इन आँखों से नहीं देख सकेगा, मैं तेरे को दिव्य नेत्र देता हूँ।" वह दिव्य नेत्र क्या हैं ? वह अनुभव के जो नेत्र हैं, जो तुम्हारे अंदर हैं, उनसे तुम उस चीज का दर्शन कर पाओगे। तो मेरे को यही आशा है कि आपको आपका उत्तर मिला।

यह निराकार पटेल, रायगढ़ छत्तीसगढ़ से इन्होंने प्रश्न पूछा है "सभी व्यक्ति सफल होने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास करते हैं इसमें कुछ व्यक्ति को सफलता प्राप्त होती है, जैसे दो व्यक्ति कुआं खोदते हैं तो एक में स्वच्छ और एक मीठा पानी प्राप्त होता है और दूसरे वाले के में पानी ही नहीं मिलता है ऐसा क्यों?"

जो हर एक व्यक्ति कुआँ खोदता है, जो हर एक व्यक्ति कुआँ खोदता है उसको अच्छी तरीके से मालूम है कि हो सकता है पानी न निकले या खारा पानी निकले! मुझे कैसे मालूम। जब पानी निकलता है तो उसको चखते हैं। क्यों चखते हैं कि मीठा है या खारा है। यह किसी को नहीं मालूम कि पानी निकलेगा या नहीं निकलेगा। यह रिस्क आप जब कुआं खोदते हैं तो यह रिस्क आप ले रहे हैं। निकले, पानी है तो निकलेगा, पानी नहीं है तो नहीं निकलेगा। और ऐसे भी कुएं हैं जिनमें पानी निकलते हैं फिर सूख जाते हैं। और ऐसे भी कुएं हैं जिनमें पानी नहीं निकलता है और फिर बारिश का पानी उनमें आ जाता है तो थोड़ा-बहुत पानी कुछ महीनों के लिए उनमें बना रहता है।

देखिये! बात सफलता की नहीं है, कई चीजें हैं जिनमें यह रिस्क लेना पड़ता है। नहीं लेंगे रिस्क तो कुछ भी नहीं होगा आगे। अगर कोई यह बोले कि मैं तो कुआं खोदूंगा ही नहीं, क्योंकि हो सकता है कि कुएं में पानी नहीं निकले, तो ना कभी आपके पास कोई कुआं होगा ना कभी पानी निकलेगा। परन्तु यह रिस्क हर एक व्यक्ति लेता है। जब किसान अपनी फसल बोता है, तो वह भी यह रिस्क लेता है कि यह उगेगी या नहीं उगेगी। और उग भी गयी तो अगर बेटाइम पानी पड़ा या ओले पड़े तो यह सारी की सारी फसल बर्बाद हो सकती है। यह रिस्क हम लोग लेते हैं। परंतु रिस्क लेते हुए भी हम रिस्क को समझते नहीं हैं और समझना चाहिए।

अब जैसे कहीं जा रहे हैं आप, बस से जा रहे हैं बस का एक्सीडेंट हो गया और सबको लगता है कि यह तो बड़ी बुरी बात हुई। परन्तु यह रिस्क आप लेते हैं जब आप बस में सफर करते हैं तो यह रिस्क आप लेते हैं तो यह तो सारी बातें इस संसार की ऐसी ही हैं, ऐसा लगता नहीं है कि ऐसी हैं, पर ऐसी हैं और यह तो कहा है संत महात्माओं ने कि "इस स्वांस के ऊपर इसकी कदर समझो क्योंकि ना जाने इस स्वांस का आना होय न होय।" कब, कैसे ?

सबसे बड़ी बात तो यह है आप तो कुएं की बात कर रहे हैं। मैं दूसरी बात करता हूं कि आपका यह शरीर है, आपको भी नहीं मालूम कब तक यह आपके पास है। कभी है, और आज है, हो सकता है कल न हो। तो इस बात को समझिये कि रिस्क तो हम हमेशा ले रहे हैं हम समझते हैं कि यह हमारे भाग्य का फल है। यह भाग्य का फल नहीं है यह हम रिस्क ले रहे हैं और जबतक यह रिस्क, इस दुनिया के सारे कार्यों में यह रिस्क हैं तब तक यह सारा चक्कर बना रहेगा।

उत्तम नगर, दिल्ली से यह प्रश्न है — "आप शांति के बारे में बात करते हैं, आप प्यास की बात करते हैं मुझे कैसे पता चलेगा कि शांति मिल गई। शांति की प्यास को कैसे समझें ?"

हां! यह तो वही वाली बात हो गई — जब एक राजा के पास एक दूत आया और उसने कहा "महाराज हमारे राजा ने आपके लिए यह आम के फल भेजे हैं उपहार के रूप में।"

राजा ने पूछा — "यह आम क्या होता है हमको मालूम ही नहीं है ?"

उसके राज्य में आम नहीं थे तो राजा ने एक व्यक्ति को अपने दरबार से कहा, "तुम चखो और और चखकर मेरे को बताओ कि आम क्या होता है, कैसे होता है?"

उसने चखा और उसने बताने की कोशिश की कि — "आम ऐसा होता है, ऐसा होता है पर राजा को समझ में नहीं आया।" ऐसे करते-करते-करते-करते जितने भी दरबारी थे राजा के दरबार में सबका नंबर आया, सबने कोशिश की पर किसी को भी, कोई भी इसमें सक्सेसफुल नहीं हुआ, समर्थ नहीं हुआ कि वह राजा को समझा सके कि आम क्या होता है।

उसके बाद एक जो आखिरी वाला था उसने लिया आम को और उसको काट करके एक प्लेट में रखा और राजा के पास ले गया और कहा "यह चखिए महाराज!"

जैसे ही राजा ने चखा तब राजा को मालूम पड़ गया कि आम क्या होता है।

जैसे आपने प्रश्न पूछा है ठीक वही बात है। आप पूछ रहे हैं कि शांति कैसे मालूम पड़ेगी ? क्या-क्या शांति — जब आप शांति का अहसास करेंगे तक आपको मालूम पड़ेगा कि शांति क्या है। उससे पहले एक थ्योरी है, उससे पहले एक थ्योरी है। उससे पहले कोई समझा दे, समझ में आएगी या नहीं आएगी परंतु मुंह में तो स्वाद आएगा नहीं। शांति का अनुभव तो होगा नहीं। कितने ही लोग हैं जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं शांति के बारे में पर लोगों को शांति तो मिलती नहीं है। लोग यह भी करते हैं जब अपना भाषण खत्म किया — "ओम शांति, शांति, शांति, शांति!" किसी को शांति नहीं मिलती। शांति तुम्हारे अंदर है और वह एहसास करने की चीज है जबतक उसका एहसास नहीं करोगे, जबतक उसका अनुभव नहीं करोगे तब तक क्या समझोगे कि शांति क्या है। शांति परिभाषाओं की चीज नहीं है, शांति परिभाषाओं में नहीं फंसी हुई है।

आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पुछै बात

सो गूंगा गुड़ खाये के, कहे कौन मुख स्वाद।

तो वही वाली बात है। कैसे समझाएं स्वाद तो आ रहा है, पर कैसे समझाएं। तो आपको ही इसका स्वाद लेना पड़ेगा।

"मैं एक संयुक्त परिवार में रहता हूं — यह हैं संजय मिश्रा, दिल्ली से — बहुत कोशिश करने के बाद भी मेरे परिवार में शांति नहीं हो पा रही है हर वक्त क्लेश होता है। मैं हिम्मत हार चुका हूं कृपया मार्गदर्शन कीजिए।"

देखिये! जबतक वह परिवार आपका परिवार है आप हौसला मत खोइए। क्लेश जो होता है, फाइटिंग, इनफाइटिंग जिसे कहते हैं अपने आप में नहीं होती है। यही प्रश्न, ऐसा ही एक प्रश्न एक लड़की ने पूछा था मेरे से एक जगह यूनिवर्सिटी में मैं गया था कहीं तो मैंने कहा कि "तुम इसमें कितना हिस्सा लेते हो, तुम्हारा क्या रोल है इसमें।" तो वही वाली बात है कि कुछ-कुछ मतलब, बाहर खड़े होकर के और लोगों को उकसाते हैं कि "हां यह ठीक है, यह ठीक है, यह ठीक है, यह ठीक है, यह ठीक है।"

देखिये! आप भी कुछ कर रहे हैं उस क्लेश के बारे में, उस क्लेश को आगे बढ़ने में आप उस क्लेश की मदद कर रहे हैं। यह जानिए कि आप क्या कर रहे हैं जिससे कि वह क्लेश बढ़ रहा है। आप क्या कर रहे हैं और लोग नहीं, आप क्या कर रहे हैं ? जब आप उस क्लेश को समझेंगे और कुछ ऐसा करेंगे कि वह क्लेश आगे ना बढ़े और लोगों के लिए नहीं, आप अपने लिए जो कर रहे हैं। साइकिल होती है न — बाइसाइकिल उसकी चेन होती है। अगर उसमें से एक चेन का लिंक निकाल दें आप तो वह सारी की सारी चेन किसी काम की नहीं रह जाती। एक लिंक निकालने में, एक लिंक उसका निकाल दें तो फिर वह चेन नहीं रह जाती। फिर उससे साइकिल नहीं चलेगी, चाहे सारी की सारी हों और सिर्फ एक ही नहीं है, साइकिल नहीं चलेगी। ठीक इसी तरीके से यह बात है कि यह जो चेन है इसके एक हिस्से आप भी हैं और अगर आप इसमें से अलग हो जाएं, आप उस क्लेश की मदद न करें तो यह चेन फिर आगे चल नहीं पाएगी।

बहुत कुछ कह सकता हूं इसके बारे में मैं, परंतु यही मैं कहना चाहता हूं अभी तो अगर आपकी समझ में आए मैं क्या कह रहा हूं तो इस बारे में कम से कम थोड़ा सोचिये, थोड़ा विचारिये!

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 25 00:19:01 लॉकडाउन 25 Video Duration : 00:19:01 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (17 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज का दिन है प्रश्नों का उत्तर देने का तो पहला प्रश्न है। साधना — जब कभी भी — उन्होंने पूछा है कि "जब कभी भी मनुष्य के ऊपर आपदा आती है तो मूर्खता भी उतनी ही तेजी से आती है क्या यह मन की वजह से होता है ?"

नहीं! देखिए, जब मनुष्य के ऊपर आफत आती है तो सबसे पहले आफत के कारण उसकी आंखें बंद होती हैं, उसके कान बंद होते हैं, आफत के कारण उसकी आंखें बंद होती हैं, आफत के कारण वह किसी की सुनना नहीं चाहता है, आफत के कारण वह किसी की, कुछ नहीं करना चाहता है और इसी वजह से मूर्खता भी आती है क्योंकि जब आंख ही बंद कर ली तब कहां जा रहे हैं क्या दिखाई देगा ? क्या पता है ? कुछ पता नहीं। तो मुझे यही आशा है कि आपके प्रश्न का उत्तर आपको मिला होगा।

"मैं अपनी जिंदगी से हार चुका हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जहां भी मैं जाता हूं सब मुझे अपने काम के लिए इस्तेमाल करते हैं — प्रमोद।"

देखिए! आप किसी से भी लड़ सकते हैं। आप अपने भाई से लड़ सकते हैं और मैं समझ सकता हूं क्यों। आप अपनी बहन से लड़ सकते हैं, मैं समझ सकता हूं क्यों। आप अपने पिताजी से लड़ सकते हैं, मैं समझ सकता हूं क्यों। आप अपनी माताजी से लड़ सकते हैं, मैं समझ — मैं यह नहीं कह रहा कि लड़ना चाहिए, पर आप लड़ सकते हैं और मैं समझ सकता हूँ क्यों। पर आप अपनी ही जिंदगी से लड़ रहे हैं, यह मैं नहीं समझ सकता। यही तो है आपके पास और क्या है आपके पास ? अगर आपका जीवन ही नहीं रहा तो आपके पास क्या रहेगा, कुछ भी नहीं रहेगा। तो इससे मत हारिये। इससे नहीं लड़ना है। इस जिंदगी में तो जीत ही जीत करनी है, हारना नहीं है। जो लोग आपको इस्तेमाल कर रहे हैं वह आपका फायदा उठा रहे हैं। आप अपने लिए भी तो जीना सीखिए। औरों के लिए नहीं, अपने — जब आप अपने लिए ही जीना नहीं सीखेंगे तो फिर आप औरों के लिए कैसे जी पायेंगे ? जो दिया खुद ही नहीं जला हुआ है वह और दीयों को कैसे जलायेगा ? जो मोमबत्ती खुद ही नहीं जली हुई है, वह और मोमबत्तियों को कैसे जलायेगी ?

लोग कहते हैं कि औरों के लिए जीना चाहिए। पर एक बुझा हुआ दिया औरों के लिए कैसे जीएगा ? कैसे जी सकता है ? जबतक वह खुद ही नहीं प्रकाशित है, जबतक वह खुद ही नहीं जल रहा है तो वह और किसी दीये को कैसे जलाएगा ? मजबूती आप में होनी चाहिए। देखिये! उस मकान का क्या फायदा, जिस मकान की छत इतनी कमजोर है कि आप उसको — आप छत को उठा रहे हैं, तो वह कैसी छत हुई ? कम से कम आपके मकान को इतना तो मजबूत होना चाहिए कि कुछ भी आए, ऊपर से आये, साइड से आए, वह उसको थोड़ा-बहुत तो झेल सके। जब उसी में वह शक्ति नहीं है, तो वह आपका कैसा घर हुआ ? आपकी रक्षा कैसे करेगा ? तो सबसे बड़ी बात है कि आप अपने में, जो करेज़ (courage) होना चाहिए, जो मजबूती होनी चाहिए, वह लाएं। और जब वह होगी, तब लोग आपका फायदा नहीं उठाएंगे।

यह प्रश्न आया है — पुष्पा देवी, पीलीभीत उत्तर प्रदेश से, आप कहते हैं कि "मनुष्य जब परेशान होता है तब वह भगवान की याद करता है पर जब मैं परेशान होती हूँ तो मेरा भगवान पर विश्वास नहीं रह जाता है, ऐसा क्यों ?"

अच्छा! एक बात मैं आपसे कहना चाहता हूं। यह एक, बात तो बिल्कुल स्पष्ट है आपने पहले ही एक अपने मन में, अपनी बुद्धि में, अपने दिमाग में एक चित्र बना रखा है और उस चित्र में यह है कि "भगवान यह करेगा; भगवान आपकी यह करेगा; भगवान आपके लिए यह करेगा; भगवान आपके लिए यह करेगा" और आपको सिर्फ यह कहना है, हे भगवान जी! अब मेरे लिए यह कर दो। हे भगवान जी! अब मेरे लिए यह कर दो। हे भगवान जी! अब मेरे लिए यह कर दो!" आप भगवान की बात कर रहे हैं या नौकर की बात कर रहे हैं। आप कह रहे हैं कि "आपका विश्वास उठ जाता है भगवान से जब आप परेशान होते हैं" — आप नौकर की बात कर रहे हो या भगवान की बात कर रहे हो ? आप, अगर नौकर को आवाज दी जाए — किसी का नाम, किसी का नौकर है प्रकाश, "हे प्रकाश कहां है तू, कहां है, जल्दी आ!" नहीं आ रहा है वह, तो ठीक है आप उससे निराश हो जाइए। परंतु, जिस भगवान की आप बात कर रहे हैं वह आपका नौकर थोड़ी है। वह — आप परेशान हों या ना हों, वह आपको थोड़े ही परेशान कर रहा है।

आप समझते हैं कि भगवान का और कोई काम नहीं है सिर्फ आपको परेशान करने के। परेशान मैं बताऊं आपको कौन कर रहा है, आपको दुनिया परेशान नहीं कर रही है, आपको परेशान अगर कोई कर रहा है तो वह हैं "आप" — आप अपने आपको परेशान कर रहे हैं यह मैं आपसे कह रहा हूं क्योंकि यह मेरा अनुभव है। जब मैं परेशान होता हूं तो बड़ी साधारण-सी चीज है, "उसकी गलती है, उसकी गलती है, उसकी गलती है,उसकी गलती है।” मैं कितने ही, हजारों लोगों को जानता हूँ "यह उसने किया, यह उसने किया, यह उसने ठीक नहीं किया, यह उसने ठीक नहीं किया।" परन्तु यह सचमुच में जब मैं अपनी तरफ देखता हूं तो मेरे को यही एहसास होता है कि दरअसल में, सच्ची में मैं अपने आपको परेशान कर रहा हूं ये लोग परेशान नहीं कर रहे हैं, मैं अपने आपको परेशान कर रहा हूं और मेरे को इस परेशानी से अगर ऊपर उठना है तो मेरे को उठना है। यह नहीं है कि "इसको मेरे को ठीक करना है, इसको मेरे को ठीक करना है, इसको मेरे को ठीक करना!" वह ठीक हों या ना हों परेशान मैं खुद अपने आप को कर रहा हूं।

इसका यह मतलब नहीं कि मैं उसको छोड़ दूंगा, अगर उन्होंने कोई गलती की है तो मैं उनको कहूंगा कि “तुमने यह गलती की है, यह तुम्हारा ठीक — यह ठीक नहीं किया तुमने।” परन्तु जहां तक बात है भगवान की, कि आपका उनसे विश्वास उठ जाता है यह ठीक बात नहीं है। वही, सबको बनाने वाला ही एक ऐसा है जो विश्वसनीय है और सारा संसार आपको धोखा दे सकता है, परंतु वह जो आपके हृदय में विराजमान है वही है एक जो आपको कभी धोखा नहीं देगा।

"मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता है किसी तरह अगर अपने मन को कंट्रोल कर भी लूं तो 2 या 3 दिन से ज्यादा नहीं कर पाता हूं इसके लिए मैं क्या करूं ?" — देखिये — यह प्रकाश, मेडिकल छात्र हैं नेपाल से, उनका यह प्रश्न है! मन तो आपका लग रहा है पर कहीं और लग रहा है यह बात नहीं है कि आपका मन नहीं लग रहा है, मन तो आपका लग रहा है पर कहीं और लग रहा है और आप चाहते हैं कि वह पढ़ाई में लगे।

देखिये, सबसे बड़ी बात यह है कि जो आप पढ़ रहे हैं इस समय, यह आप अपनी सारी जिंदगी भर नहीं पढ़ते रहेंगे। इसका एक निश्चित समय है उसके बाद आप ग्रेजुएट होंगे, उसके बाद अगर आप डॉक्टर बनना चाहते हैं तो आप डॉक्टर बन जाएंगे। उसके बाद आपको बहुत स्वतंत्रता मिलेगी आप जो भी करना चाहे कर पाएंगे। पहले कुछ साल में तो आपको खूब मेहनत करनी पड़ेगी। तो जो भी यह हो रहा है, यह हमेशा के लिए नहीं हो रहा है। हर एक चीज, हर एक दिन जो आता है वह वापिस कभी नहीं आएगा। अगर आप कुछ सीख जाएं, कुछ समझ जाएं इससे आपका भी भला है, औरों का भी भला है।

सबसे बड़ी बात तो यही है कि मन तो आपका कहीं लग रहा है बस यह बात है कि पढ़ाई में नहीं लग रहा है। वहां से निकालकर आप अपना मन पढ़ाई में भी लगाएं। इसका यह मतलब नहीं है कि जहां अब लग रहा है — अगर आप अपने लिए यह बना लें कि या तो वहां लगे या यहां लगे तो बात बहुत मुश्किल बन जाएगी। नहीं, यहां भी लगाइये, वहां भी लगाइये। जब यहां लगाने का समय हो तो मन को एकाग्र करके यहां लगाइये। जब वहां लगाने का समय हो तो वहां लगाइये। यह तो आपके ऊपर निर्भर है। इसका यह मतलब थोड़े ही है कि अगर आप 2 दिन लगा सकते हैं, 3 दिन लगा सकते हैं तो आप 4 दिन भी लगा सकते हैं, 5 दिन भी लगा सकते हैं, 6 दिन भी लगा सकते हैं, 7 दिन भी लगा सकते हैं, हफ्ता भी लगा सकते हैं, हफ्ता लगा सकते हैं तो महीना भी लगा सकते हैं, महीना लगा सकते हैं तो दूसरा महीना भी लगा सकते हैं, दूसरा महीना लगा सकते हैं तो साल भी लगा सकते हैं, 2 साल भी लगा सकते हैं, 3 साल भी लगा सकते हैं, 4 साल भी लगा सकते हैं। उसके बाद तो आपको ग्रेजुएट हो जाना चाहिए। तो मतलब, मेरा यही कहने का मतलब है कि मन तो आपका कहीं ना कहीं लग रहा है बात यह है कहां लग रहा है! तो मेरे को आशा है कि आपको इसका जवाब मिला होगा।

जय श्री विश्वकर्मा, धनबाद झारखंड, वह लिखती हैं कि — "मेरे मन में बहुत अशांति रहती है, मैं कभी खुश नहीं रह पाती हूं। जिस वजह से मैं अपने परिवार को भी खुश नहीं रख पाती हूं। मैं बहुत डिप्रेशन में हूं कृपया इससे निकलने का रास्ता बताएं।"

देखिये एक तो, डिप्रेशन मेडिकल के कारण हो सकता है। इसके लिए आपको डॉक्टर को दिखाना चाहिए ताकि कम से कम अगर कोई ऐसी चीज है, केमिकल इम्बैलेंस (chemical imbalance) है तो वह, आप उसको देख पाएं। और अगर केमिकल इम्बैलेंस नहीं है और आप, अशांति रहती है आप खुश नहीं रह पाते हैं, आप चीजों में देखते हैं कि क्या-क्या गलत हो रहा है तो यह सारी चीजें यह तो आपके ऊपर निर्भर है आप क्या देखें! हर एक चीज के अंदर अच्छाई भी है, हर एक चीज के अंदर बुराई भी है। अगर आप देखें जो पौधा गुलाब के फूल देता है उसमें गुलाब का फूल भी है ऊपर और कांटे भी हैं उसमें। तो कांटे चाहिए आपको या गुलाब का फूल चाहिए आपको। सुंदरता तो आपको गुलाब के फूल में मिलेगी, कांटों में नहीं मिलेगी। कांटों में दर्द मिलेगा, दुख मिलेगा और गुलाब के फूल में आपको बहुत अच्छी खुशबू मिलेगी, आनंद मिलेगा, कोमलता मिलेगी, बहुत सुंदर रंग मिलेगा, यह सारी चीजें आपको मिलेंगी और हर एक चीज में यह है। यह आपके ऊपर निर्भर है कि आपको क्या चाहिए और अगर यह चाहिए तो बड़ी आसानी से उस तरफ हर दिन थोड़ा-थोड़ा परिश्रम कीजिए कि आप चीजों की अच्छाइयों को देखें, बुराइयों को नहीं। जब कोई चीज किसी भी चीज की बुराइयों को देखने लगे अपने आप से कहिए "रुको-रुको मैं यह नहीं देखना चाहती मैं देखना चाहता हूँ या देखना चाहती हूं जो अच्छाई है इसमें।" तो ऐसे-ऐसे, धीरे-धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा करके आपके जीवन में परिवर्तन जरूर आएगा।

अगला प्रश्न , मेरा प्रश्न है कि "कर्म और कर्तव्य बड़ा है या धर्म बड़ा है ? मेरा मार्गदर्शन करें।"

धर्म आप सीखते हैं, समझते हैं, पर जो भी आप करते हैं वह आपका कर्म है। मैंने अपने जीवन के अंदर किसी भी चीज की कल्पना की, कोई भी ख्याल मेरे मन में आया पर मैंने अगर कुछ उसके बारे में नहीं किया तो वह ख्याल किसी भी काम का नहीं है। एक बार जब मैं कोई चीज कर देता हूं उसको मैं वापिस नहीं ले सकता। ख्याल को मैं वापिस ले सकता हूं पर अगर एक बार मैंने कोई चीज कर दी तो उसको मैं वापिस नहीं ले सकता, कर दी तो कर दी उसमें फिर समय शामिल है। एक बार किसी चीज में समय शामिल हो जाता है तो उसको वापिस नहीं लिया जा सकता। सबसे बड़ा कर्म है। कर्त्तव्य समझने की चीज है कि आपका कर्तव्य क्या है किसी-किसी चीज के भी प्रति। और धर्म आपको बताता है कि कैसे आपको रहना चाहिए, कैसे आपको होना चाहिए, क्या आपको करना चाहिए, परंतु धर्म करवाता नहीं है। कर्म आप करते हैं, कोई भी कर्म आप करते हैं, धर्म नहीं। धर्म समझाता है क्या ठीक है, क्या अच्छा है! कर्तव्य समझाता है कि क्या ठीक है, क्या अच्छा है, परंतु कर्म आप करते हैं।

तो यह सबसे बड़ी चीज है कि बड़ा नहीं, छोटा नहीं सबसे बड़ी बात है कर्म आप करते हैं और उस कर्म को जो आपके समझ है उसको तो आप वापिस ले सकते हैं, परंतु जो कर्म आप करते हैं उसको आप वापिस नहीं ले सकते। यह एक कहानी है न वही वाली कि एक बार अकबर इंतजार कर रहा था बीरबल की। तो बीरबल नहीं आया उनके दरबार में तो अकबर गुस्सा हो गए। बीरबल को बुलाया तो बीरबल आया।

तो बीरबल से कहा कि "क्यों तुम आज लेट हो गए आये नहीं समय पर ?"

बीरबल ने कहा "जी! मेरा पोता आया हुआ है और उसको खुश करने में मैं लगा हुआ था। वह खुश ही नहीं हो रहा था।"

राजा ने कहा, "ऐसी क्या बड़ी बात है छोटा-सा बच्चा ही तो है उसको तो बड़ी आसानी से खुश किया जा सकता है।"

तो कहा कि "हुजूर! यह तो ठीक बात नहीं है। यह सच बात नहीं है — बच्चे को बड़ी आसानी से खुश नहीं किया जा सकता है!"

तो अकबर ने कहा — "बुलाओ अपने पोते को!" तो पोते को बुलाया गया।

तो पोते को पहले ही बीरबल ने कहा था "क्या-क्या माँगना राजा से!"

तो अकबर ने पूछा, "क्या चाहिए तुमको?"

पोते ने कहा , "जी!, मेरे को गन्ना चाहिये।" तो गन्ना मंगवाया।

तो बीरबल की तरफ देखा अकबर ने कि "देख! बड़ी आसान बात है यह, इसको खुश करना कोई बड़ी बात नहीं है।"

बीरबल थोड़ा मुस्कुराया, क्योंकि उसको समझाया हुआ था तो बच्चा फिर रोने लगा।

तो कहा कि "अब क्यों रो रहा है ?"

कहा, "मेरे को पूरा गन्ना नहीं चाहिए, मेरे को छोटे-छोटे टुकड़ों में यह गन्ना चाहिए।"

तो राजा ने कहा "यह तो बड़ी आसान बात है।" सिपाही को बुलाया कि इसको काट दो अपनी तलवार से। तो उसने उसकी गँड़ेरी काट दी।

तो जब गँड़ेरी काट दी तो राजा ने देखा बीरबल की तरफ कि "यह तो बड़ी आसान बात है। क्या मुश्किल बात है इसको खुश करने में।"

तो फिर बच्चा रोने लगा।

कहा, "अब क्या हो गया, अब क्या बात है ?"

तो कहा कि नहीं "मेरे को साबुत, पूरा का पूरा साबुत गन्ना चाहिए अब।"

तो फिर अकबर ने देखा बीरबल की तरफ कि क्या बड़ी बात है। तो उसको बुलाया कहा, "लाओ दूसरा गन्ना लाओ, साबुत गन्ना लाओ!"

तो जब साबुत गन्ना आया तो बच्चा और जोर से रोने लगा।

कहा, "अब क्या हुआ, अब क्या बात है ?"

कहा, "मेरे को वही गन्ना साबुत चाहिए, जो छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा था।

क्योंकि वह फिर साबुत नहीं होगा कभी भी।

तो देखने की बात है कि जो आप करते हैं एक बार जो किया उसमें समय इनवॉल्वड है। जब समय इनवॉल्वड है तो उसको फिर वापिस नहीं लिया जा सकता इसलिए सचेत रहने की बहुत जरूरत है।

तो सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 24 00:16:25 लॉकडाउन 24 Video Duration : 00:16:25 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (16 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार! आशा है आप सब कुशल-मंगल होंगे।

मेरे को मालूम है कि यह जो लॉकडाउन की टाइमलाइन है यह बढ़ाई जा रही है ताकि आप लोगों को और कुछ दिनों के लिए लॉकडाउन में रहना पड़ेगा और मुझे यह भी अच्छी तरीके से विश्वास है कि कई लोग हैं जो इससे खफ़ा हैं। देखिये! खफ़ा होने की बात नहीं है, डरने की बात नहीं है।

बात सिर्फ यह है कि यह जो आपको मौका मिला है और मैं कह रहा हूं कि यह मौका मिला है, यह बार-बार नहीं आता है। यह ऐतिहासिक चीज हो रही है, जो हो रही है। पूरा भारतवर्ष नहीं, पूरा संसार लॉकडाउन में है और हर एक देश में कहीं ना कहीं इसका अफेक्ट, इसकी प्रतिभा देखी जा रही है। इसका असर सब जगह हो रहा है। एयरलाइंस में है, किसानों के लिए है, ट्रांसपोर्टेशन के लिए है, किसी भी चीज को देख लीजिए — दुकानदार हैं उनके लिए है और डॉक्टर लोग जो हैं वह तो बहुत ही मेहनत कर रहे हैं। नर्स लोग जो हैं वह तो बहुत ही मेहनत कर रहे हैं और हर रोज बीमार लोग इससे हर रोज इनकी संख्या बढ़ रही है। परन्तु आप लॉकडाउन में हैं और यह भी खुशी है कि आप सुरक्षित हैं परंतु यह समय, जो ऐतिहासिक समय है क्योंकि यह बार-बार नहीं आता। यह एक समय है कि इस संसार में रहते हुए आप एक काम करें और वह काम कुछ ऐसा हो जिससे कि आपकी जिंदगी के अंदर आनंद और बढ़े। जो अच्छी चीजें हैं वह और हों। आप अपने जीवन के अंदर उस असली सुख और चैन और शांति का अनुभव कर सकें।

अब यह कहना तो बहुत आसान है। कई लोग हैं जो भाषण देते हैं, भाषण सुनाते हैं और फिर उसके बाद कहते हैं “शांति, शांति, ओम शांति, शांति, शांति,” — शांति-शांति-शांति करने से शांति नहीं होती क्योंकि अगर आप किसी को कह रहे हैं कि “चुप हो जा, चुप हो जा, चुप हो जा, चुप हो जा, चुप हो जा” या आप किसी कमरे में बैठे हैं और आप कह रहे हैं हम सभी को “चुप हो जाना चाहिए, चुप हो जाना चाहिए, चुप हो जाना चाहिए, चुप हो जाना चाहिए” और आप सोचते हैं कि यह दोहराते रहें कि — चुप हो जाना चाहिए, चुप हो जाना चाहिए, चुप हो जाना चाहिए उससे फिर आवाज नहीं आएगी जबतक आप यह बोलते रहेंगे कि चुप हो जाओ सब लोग, चुप हो जाओ सब लोग तब तक कोई चुप नहीं होगा, क्योंकि तुम ही चुप नहीं हो रहे हो।

सबसे बड़ी जानने की बात यही है कि कौन-कौन से बीज आप अपने जिंदगी के अंदर बो रहे हैं, कैसे बीज बो रहे हैं ? ऐसे बीज बो रहे हैं जिनकी फसल जब तैयार होगी तो वह शांतिमय होगी, वह आनंददायक होगी या ऐसे बीज बो रहे हैं जिनसे कि आपकी जिंदगी के अंदर अशांति और बढ़े ? जो कुछ भी आप अब कर रहे हैं इसी का फल आपको मिलेगा। जो कुछ भी हो रहा है इसी का फल आपको मिलेगा। ठीक है परिस्थिति आपके इशारों के, आपकी इच्छाओं के अनुकूल नहीं है परन्तु है, जैसी है वैसी है।

अगर पृथ्वी जो सचमुच में इतनी दुःख में है — सारी प्रकृति, अगर सारी प्रकृति यह कहे कि मुझे कुछ राहत चाहिए, कुछ राहत चाहिए तो वह ऐसा ही कोई माहौल बनाएगी जिससे कि सारे लोग शांति से एक जगह बैठें ताकि सारी प्रकृति को राहत मिल सके। आपको राहत मिल रही है या नहीं पर सारी प्रकृति को राहत मिल रही है। प्रदूषण कितना कम हुआ है, हवा कितनी साफ हुई है यह तो प्राकृतिकली बहुत अच्छी बात है। जब प्रकृति के लिए यह अच्छी बात हो सकती है तो आपके लिए यह अच्छी बात क्यों नहीं हो सकती है ?

बिल्कुल हो सकती है। लोग अभी भी अपनी भावनाओं में रहते हैं, अपनी कल्पनाओं में रहते हैं, कहीं किसी के लिए कुछ है, किसी के लिए कुछ है। तुम ऐसा क्यों नहीं कर रहे हो, तुम ऐसा क्यों नहीं कर रहे हो और यह भी संभव है कि कई जो परिवार में इतने दिन एक साथ कभी रहे नहीं तो कोई कहीं किसी में बिज़ी था, कोई कहीं किसी में बिज़ी था, कोई कहीं बिज़ी था। अब एक जगह रह रहे हैं और हो सकता है कि यह भी बहुत संभव है कि आपस में खूब लड़ाई हो रही है। "कब खत्म होगा, कब खत्म होगा, कब खत्म होगा, जा रहा हूं बाहर — मेरे को यह पसंद नहीं है, मेरे को यह पसंद नहीं है, मेरे को यह पसंद नहीं है" — सारी बातें आगे आ रही हैं। जो बच्चा है वह और कुछ करना ही नहीं चाहता है वह बैठकर अपना वीडियो गेम देखना चाहता है और वीडियो गेम आया कहां से ? आया कहां से ? वीडियो गेम जो बच्चा, आपका बच्चा वीडियो गेम खेल रहा है, जो आपको पसंद नहीं है क्योंकि आप चाहते हैं कि वह अपना गृह-कार्य करे या कुछ पढ़े, कुछ लिखे, कुछ समझे या आपके साथ बैठकर बात करे। वह आपका — जो खिलौना, जो आप लाए उसके लिए, जो वीडियो गेम आप लाये, वह लाया कौन ? वह आप ही तो लाये। आपने ही वह बीज बोया है। बच्चे ने की हठ, आपने कहा ठीक है, मैं इसकी हठ नहीं सुनना चाहता हूं। मैं नहीं सुनना चाहता हूं कि यह हर एक रोज मेरे को टोके। एक चीज को टालने के लिए आपने दूसरी — एक बीमारी को निकालकर आपने दूसरी बीमारी डाल दी। अगर आप यह कहते "नहीं, नहीं!" क्यों ? आप समझते हैं कि सभी लोग यह गेम खेल करके बड़े हुए हैं। अरे! जब हम बड़े हो रहे थे यह ऐसे गेम नहीं थे तब क्या करते ? खुद खेलते थे। दोपहर का जो समय होता था, सब लोग सोये रहते थे तो हम भी जाते थे खेलने के लिए। और क्या-क्या खेल ? सब चीजों का खेल। कौन-सी ऐसी चीज है जिसके साथ नहीं खेल सकते — पानी है उसके साथ खेल सकते हैं, नलका है उसके साथ खेल सकते हैं, जो चीज सामने आए। कुछ और नहीं आ रहा है, क्योंकि उस समय तो टीवी भी नहीं था हिंदुस्तान में। क्या देख रहे हैं ? चीटियों को देख रहे हैं, कहीं बादलों को देख रहे हैं, कहीं फूलों को देख रहे हैं।

बात यह नहीं है, बात यह है कि जो कुछ भी हम अपने परिवार के साथ करना चाहते हैं उन चीजों के बीज हमने किस प्रकार बोये हुए हैं उसी का फल हमको मिलेगा। हम अगर अपने दोस्तों के साथ हैं तो किस प्रकार के बीज हमने उन दोस्तों के साथ बोये। अच्छे बोये हैं उसका फल अच्छा मिलेगा। ख़राब बोये हैं उसका फल खराब मिलेगा। बीजों का तो यह कानून है। और कहावत भी है — “बोये पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय॥” जब कांटों वाली कोई चीज का बीज लगाया है तो फिर तुम आम की अपेक्षा अगर करो तो कैसे होगा ! लोग पूछते हैं ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों है ? पर ऐसा क्यों है ?

एक प्रश्न मेरे पास आया है कि “भगवान को किसने बनाया ?” मैंने भी सोचा! 8 साल का बच्चा पूछ रहा है कि "भगवान को किसने बनाया?" यह सवाल, यह सवाल बहुत बढ़िया सवाल है। और 8 साल के बच्चे की अगर यहां यह — खोपड़ी चल रही है और वह सोच रहा है "भगवान को किसने बनाया?" अब वह तो — अगर वह वीडियो गेम खेल रहा है सवेरे से लेकर शाम तक, तो वह क्या सोचेगा यह बात! परन्तु यही बातें हैं सोचने की — क्या है यह ? मैं किस संसार के अंदर रह रहा हूं ? क्या यह दुनिया है ? ऐसा क्यों है जो है ? जो कुछ भी मैं देख रहा हूं ऐसा क्यों है ? क्यों यह दुनिया ऐसी है ?

अगर इसका सवाल भी कोई पूछे तो लोग तो आजकल यही जवाब देंगे "ऐसी है।" और मैं कहता हूं कि "ऐसी क्यों है ?" "ऐसी क्यों है?" — अगर यह प्रश्न पहले ही मनुष्य पूछता कि यह ऐसी इसलिए है — उत्तर तो यही होगा इसका कि इसलिए है क्योंकि तुमने ऐसी बनाई है। यह तुम्हारी बनाई हुई है। यह भगवान की — यह दुनिया जो है, माया जिसे कहते हैं, जिसके अंदर तुम सवेरे से लेकर शाम तक अपनी नाक को रगड़ते रहते हो, यह भगवान की बनाई हुई नहीं है, यह मनुष्य की बनाई हुई है। भगवान ने मनुष्य को जरूर बनाया — दो हाथ दिये, दो आँखें दीं, कान, नाक, मुंह, खोपड़ी दी सोचने के लिए, दिमाग दिया सोचने के लिए, परंतु हाथों पर हथकड़ी नहीं लगाई। पैरों पर हथकड़ी नहीं लगाई — "जाना है तू जहां जा सकता है, उत्तर जाना है, तेरे को उत्तर जा, दक्षिण जाना है, दक्षिण जा, पूरब जाना है, पूरब जा। जहां जाना चाहता है तू, जिस दिशा में जाना चाहता है जा।" और तेरे अंदर हृदय भी है — मनुष्य के अंदर हृदय भी है, मन भी है, हृदय भी है। और उसके अंदर प्यास भी है; उसके अंदर पानी भी है। उसके अंदर अज्ञान भी है; उसके अंदर ज्ञान भी है। उसके अंदर अंधेरा भी है; उसके अंदर प्रकाश भी है। अब बात सिर्फ इतनी है कि मनुष्य किस चीज को पसंद कर रहा है ? किस चीज को चूज़ कर रहा है, किस चीज को ले रहा है — अंधेरे को या उजाले को ? अज्ञानता को या ज्ञान को ? अगर अज्ञानता को लेगा, तो उसका भी उसको फल मिलेगा। भटकना पड़ेगा उसको। चाहे बाहर वह न भटके अंदर तो भटक रहा है, अंदर तो भटक रहा है।

मैंने देखा है बड़े-बड़े लोग, बड़े-बड़े लोग — उनके नाम के आगे क्या-क्या नहीं लिखा हुआ है। और उनको सम्मान की इतनी जरूरत है कि पूछो मत! किसी ने किसी दूसरे को माला पहना दी, उनको नहीं पहनाई तो उनका अपमान हो गया। गुस्सा हो जाएंगे, एक माला के कारण। अरबपति लोगों को हमने देखा है कुछ गड़बड़ हो गयी, गरम हो गए, अपमान हो गया। एक माला की कीमत क्या है ? क्या-क्या — फूलों की माला, क्या कीमत है उसकी ? जो अरबपति है, जिसके पास अरबों-अरबों-अरबों-अरबों पैसे हैं, पर उसको अगर एक माला नहीं मिली, उसको सम्मानित नहीं किया गया, तो उसका अपमान हो जाता है। ऐसे बीज बोये हैं। क्योंकि वह अपने आपको सम्मानित नहीं कर सकता। जो अपना सम्मान अपने आप नहीं कर सकता दूसरे क्या करेंगे उसका सम्मान। दिखावा है सब दिखावा है। हम आपको सम्मानित करते हैं, हम यह करते हैं, हम वह करते हैं। हमारे साथ हुआ है यह।

एक बार मैं एक जगह आया, इंग्लैंड में थी वह जगह। तो जैसे ही हमारी कार वहां रुकी तो वहां काफी सारे लोग खड़े हुए थे।

उन्होंने कहा , "अरे! कार को हटाओ यहां से, हटाओ, हटाओ, हटाओ, जल्दी हटाओ!”

तो मैं उतर रहा था, मैंने कहा "भाई क्यों? क्यों हटाएं हम अपनी कार को यहां से?"

कहा — "जी! कोई आने वाला है। बहुत वीआईपी आने वाला है।"

मैंने कहा, "ठीक है ! कार को यहां से हटा देते हैं, पर हम उतर तो जाएं कम से कम।" तो हम उतर गए ।

तो उसने फिर देखा मेरी तरफ। मैंने सूट नहीं पहनी हुई थी। मैंने शर्ट पहनी हुई थी, बड़ा कैज़ुअल रूप में था, बड़ा आरामदायक कपड़े पहने हुए थे। मैं — 4 घंटे, 5 घंटे का रास्ता था तो कार से ही आया था।

उन्होंने कहा — "अरे! आप ही का इंतज़ार हो रहा था।"

मैंने कहा, "कोई बात नहीं, कोई बात नहीं!"

फिर कहने लगे मेरे से सॉरी, सॉरी, सॉरी। मैंने कहा, कोई बात नहीं, तुम चिंता मत करो। वह तो मज़ाकिया बात है।

तो जो अपना ही सम्मान नहीं कर सकता और क्या करेंगे! अब उनको क्या — वह क्या देखना चाहते थे ? वह देखना चाहते थे — सूट। वह देखना चाहते थे — टाई।' और टाई मैंने पहनी हुई नहीं थी, तो मैं टाई हूँ, मैं सूट हूँ ? नहीं!

आप अपने जीवन में अपना सम्मान कीजिये। और यह जो समय है यह आपके जीवन का समय है, यह आपके जीवन का समय है और इसका पूरा-पूरा फायदा आप उठाइए।

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

लॉकडाउन 23 00:25:31 लॉकडाउन 23 Video Duration : 00:25:31 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (15 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

आज के दिन मैंने सोचा कि आपको एक कहानी सुनाते हैं और यह एक कहानी है, जो बहुत लोगों ने सुन भी रखी है। अगर आप नए-नए हैं तो यह आपके लिए नई कहानी होगी।

एक समय था, प्राचीन काल का समय और भगवान राम और लक्ष्मण, सीता वनवास पर थे। तो एक दिन भगवान राम ने कहा कि "भाई लक्ष्मण! चलो थोड़ा घूम आते हैं।" तो वह चल दिए और चलते-चलते-चलते-चलते वह एक नदी के पास पहुंचे। उसके तट पर वह चलने लगे। नदी के किनारे बड़ा शीतल वातावरण था — पेड़ थे, चिड़ियाएँ थीं, नदी बह रही थी तो बहुत ही सुंदर सबकुछ था। तो उनको एक आवाज आई और वह आवाज थी किसी के रोने की।

तो कहा — "लक्ष्मण तुमको भी यह आवाज सुनाई दे रही है?"

कहा — "हां! प्रभु मेरे को भी यह आवाज सुनाई दे रही है।"

तो भगवान राम ने कहा — "चलो देखते हैं कहां से यह आवाज आ रही है।"

तो आगे गए तो देखा कि एक बेचारा लकड़हारा नदी के किनारे बैठा हुआ है। दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ हुआ और खूब जोर-जोर से रो रहा है।

भगवान राम गये कहा कि " भाई! क्या बात है क्यों तुम रो रहे हो ? क्या दुःख है तुम्हें ?”

तो लकड़हारा कह रहा है — "प्रभु! मैं लकड़ी काटता हूं उसी से मेरा पेट पलता है और सबसे बड़ी चीज मेरे लिए है कुल्हाड़ी और मैंने कुल्हाड़ी एक पेड़ के सामने रखी थी संभालकर और मैं मुंह-हाथ धोने के लिए गया नदी में और वह कुल्हाड़ी जो है मेरी नदी में गिर गई। अब मिल ही नहीं रही है।"

तो भगवान को उस पर दया आई। दयालु भगवान राम तो थे ही। जब दया आई तो उन्होंने अपना हाथ पानी में डाला और एक बहुत सुंदर कुल्हाड़ी जो चांदी की बनी हुई थी निकाली और लकड़हारा की तरफ दी कि "भाई! यह तेरी है ?"

ऐसी कुल्हाड़ी उसने अपनी जिंदगी में कभी देखी नहीं थी तो उसने कहा "भगवान बहुत सुंदर कुल्हाड़ी है यह, पर यह मेरी नहीं है।"

भगवान मुस्कुराए उनको लगा कि यह सचमुच में अच्छा आदमी है। मैंने चांदी की कुल्हाड़ी निकाली और उसने मना कर दी। फिर अपना हाथ डाला नदी में और एक सोने की कुल्हाड़ी निकाली और उसमें तरह-तरह के जेवरात बने हुए थे, लगे हुए थे भगवान राम ने कहा कि "यह तुम्हारी है ?"

कहा प्रभु, "यह भी मेरी नहीं है। मेरी तो बड़ी साधारण-सी कुल्हाड़ी है।”

तो भगवान राम ने फिर हाथ डाला और उसकी कुल्हाड़ी निकाली जो बहुत ही पुरानी, उसमें जंग चढ़ा हुआ, लकड़ी जो उसमें लगी हुई और टेढ़ी-मेढ़ी ठीक ढंग से नहीं, देखने में भी अच्छी नहीं थी। कहा — "यह तुम्हारी है ?"

लकड़हारा बड़ा खुश हो गया कहा, "हां! प्रभु यह मेरी है!"

भगवान राम इतने खुश हुए, इतने खुश हुए उससे कि उन्होंने उसको चांदी की कुल्हाड़ी भी दे दी, सोने की कुल्हाड़ी भी दे दी और उसकी जो पुरानी टूटी-फूटी कुल्हाड़ी थी, वह भी उसको सौंप दी।

अब बात यह है कि ऐसी ईमानदारी इस संसार में आसानी से नहीं मिलती है। सभी एक ही चीज में लगे हुए हैं "और बढ़ाओ, और बढ़ाओ।" कोई धनी है उसके पास बेशुमार दौलत क्यों न हो वह दिन-रात इसी मेहनत में लगा रहता है कि "मेरे पास और हो, और हो, और हो!" चाहे छोटा से छोटा हो। कोई ऐसा भी है जिसको सिर्फ एक रुपए से ही उसका काम चल जाएगा जिसके पास सौ हैं उसको सौ और चाहिए, जिसके पास हजार हैं उसको हजार और चाहिए, जिसके पास लाख हैं उसको लाख और चाहिए, जिसके पास करोड़ हैं उसको करोड़ और चाहिए, जिसके पास अरबों हैं उसको अरबों और चाहिए।

यही माया की रीत है और ऐसा बड़ी मुश्किल से मिलता है कि जो ईमानदार आदमी हो, जो सोने की कुल्हाड़ी को भी देखे या चांदी की कुल्हाड़ी को भी देखे और यह कह दे कि “यह मेरी नहीं है।” बहुत मुश्किल से आपको ऐसा व्यक्ति मिलेगा।

समय गुजर गया। कुछ समय के बाद फिर वही बात हुई भगवान राम ने कहा "भाई लक्ष्मण! चलते हैं थोड़ा घूम लेते हैं अच्छा रहेगा।" तो फिर उसी नदी के पास पहुंच गए और वहां पर चलने लगे। बड़ा सुहाना मौसम था। पेड़, चिड़िया और नदी की आवाज — सबकुछ बहुत ही सुहाना था। चलते-चलते उनको फिर किसी के रोने की आवाज सुनाई दी तो रोने की आवाज सुनाई दी तो "कौन है!" तो जब गए आगे तो देखा कि वही लकड़ी काटने वाला लकड़हारा अपना सिर पकड़े हुए रो रहा है।

तो भगवान राम ने कहा, " भाई! अब तेरे को क्या दुःख है ? फिर तेरी कुल्हाड़ी खो गयी क्या ?"

कहा, "नहीं महाराज मेरी कुल्हाड़ी नहीं खोई। हम — मैं अपनी बीवी के साथ आया था यहां जंगल में और हमलोग लकड़ी इकट्ठा कर रहे थे, काट रहे थे। जब दोपहर हुई तो हम इस पेड़ पर चढ़ गये ऊपर जो, और बड़ा सुहाना था, क्योंकि नीचे पानी बह रहा था ऊपर पेड़ था। तो हमने सोचा कि इसी पेड़ पर चढ़ करके और खाना खा लेते हैं दोपहर का और फिर थोड़ा आराम भी कर लेंगे, बड़ा अच्छा रहेगा। तो सबकुछ बड़ा अच्छा चल रहा था। खा रहे थे खाना, आनंद ले रहे थे। इतने में मेरी बीवी फिसल करके नदी में पड़ गयी। और अब बहुत खोजा उसको मैंने वह मिल ही नहीं रही है। तो मैं क्या करूं ? वही एक है जो मेरे लिए खाना बनाती थी, मेरा घर रखती थी, सबकुछ करती थी मेरे लिए। अब वह चली गयी तो मेरी जिंदगी का क्या होगा!"

भगवान राम ने कहा, "ठीक है, अच्छी बात है!" तो उन्होंने अपना हाथ नदी में डाला और एक बहुत ही सुंदर लड़की को बाहर निकाला। अब लड़की इतनी सुंदर कि पूछिए मत। तो कहा, "भाई यह तेरी है ?"

तो उसने देखा उस लड़की की तरफ और तुरंत बोलता है “हां! प्रभु यह मेरी ही है!"

भगवान राम ने कहा, "बदमाश! जब तेरी कुल्हाड़ी की बारी थी, तो तू बड़ा ईमानदार था और अब बीवी की बारी हुई है — तेरी बीवी खो गयी है तो इस लड़की के साथ तू शादी रचाना चाहता है। तू बहुत ही बेईमान आदमी है तेरे को तो दंड मिलना चाहिए।"

कहा, "प्रभु मेरी भी तो सुन लीजिए आप!

कहा, "क्या ?"

कहा कि "जब मेरी कुल्हाड़ी खोयी थी तो आपने पहले चांदी की कुल्हाड़ी निकाली और मैंने कहा, वह मेरी नहीं है फिर आपने सोने की कुल्हाड़ी निकाली मैंने कहा कि वह भी मेरी नहीं है तब आपने मेरी कुल्हाड़ी निकाली और जब आप मेरे से खुश हो गए तो आपने वह तीनों की तीनों कुल्हाड़ी मेरे को दे दी। मैंने सोचा कि आपने यह पहली लड़की निकाली है फिर मैं कह दूंगा कि यह मेरी नहीं है फिर आप दूसरी लड़की निकालोगे वह इससे भी खूबसूरत होगी और मैं कह दूंगा यह भी मेरी नहीं है तब आप मेरी वाली निकालोगे और जब आप मेरी वाली निकालोगे तो मैं कहूंगा, हां यह मेरी है और आप तीनों के तीनों मेरे को सौंप देंगे। अब मेरे से एक तो संभाली नहीं जाती, मैं तीन-तीन कहां से संभालूंगा।" तो यह बात है।

तो सचमुच में सोचने की बात है कि इस माहौल में, जो यह कोरोना वायरस का माहौल है, यह सब माहौल है। यह एक हमारे पास समय है कि हम कुछ सीखें इससे, कुछ संभालें इससे। हमारे अंदर जो यह उद्गार होते हैं कि "और चाहिए, और चाहिए, और चाहिए।" जो यह कंजूसी होती है इसका हम क्या करें ? यह तो मनुष्य को शोभा नहीं देते। जैसे कि जब उसने कंजूसी नहीं दिखाई तो भगवान राम ने उसको और दिया। जब मनुष्य के अंदर (जो अंग्रेजी में जेनरॉसिटी generosity कहते हैं) कि हृदय से वह दे! तो देना किसी को — देखिये! बात पैसे की नहीं है, बात किसी चीज की नहीं है, कोई चीज और भी है जो आप दे सकते हैं। जैसे बाप अपने बेटों को, अपनी बेटियों को प्यार दे सकता है। पति अपनी पत्नी को प्रेम दे सकता है। पत्नी अपने पति को प्रेम दे सकती है — उपहार की बात नहीं कर रहा हूं मैं। यही, यह जो प्रेम है, यह जो समय है, यह सबसे बड़ा उपहार है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को क्या दे सकता है ? हम लोगों ने तो रीत बना ली है हमारे संसार के अंदर कि किसी को कुछ देना है।

सबसे बड़ी चीज देने कि वह है क्या — वह प्रेम, वह असली चीज है जो हम किसी को दे सकते हैं। अब जब लोग हैं इस सिचुएशन (situation) के अंदर, इस परिस्थिति में कि कहीं जा नहीं सकते बाहर, लॉकडाउन है, तो घर में बैठे हैं। अरे! इसका यह मतलब नहीं है कि आप किसी को प्रेम नहीं दे सकते हैं। प्यार नहीं दे सकते हैं। जो रिस्पेक्ट होती है, जो इज्जत होती है वह आप दे सकते हैं। इस संसार के अंदर सबसे बड़ी बुरी आदत हम लोगों की क्या है कि अब हम लोगों ने एक दूसरे को सुनना बंद कर दिया है। परिवार में बाप नहीं सुनता है, बेटा बाप की नहीं सुनता है, बाप बेटा की नहीं सुनता है। पति पत्नी की नहीं सुनता है, पत्नी पति की नहीं सुनती है, पत्नी बेटों की, लड़कियों की नहीं सुनती है। एक-दूसरे में कोई किसी की नहीं सुन रहा है। सुनना बंद कर दिया है। जो मैं सोच रहा हूं बस वही होना चाहिए, वैसा ही होना चाहिए और कुछ नहीं।

पर यह सच्चाई नहीं है! एक मनुष्य होने के नाते, एक परिवार के सदस्य होने के नाते सबसे बड़ा उपहार जो आप दे सकते हैं वह किसी वस्तु का नहीं है वह इन भावनाओं का है, वह इस प्यार का है, वह इस आनंद का है। और जब हम यह भाव देंगें कहा है कि —

तुलसी या संसार में कर लीजिए दो काम देने को टुकड़ा भला लेने को हरि नाम

तो अपने जिंदगी के अंदर अगर हम उस चीज को अपनाएं जो असली में मनुष्य की असली इंसानियत है तो क्या-क्या नहीं बदल सकते हैं हम अब। क्या-क्या हमारे जीवन के अंदर, हमारे इर्द-गिर्द परिस्थितियों में — अब कई प्रश्न हैं जो आते हैं "मैं इस चीज के बारे में क्या करूं मैं परेशान हो जाती हूं" यह — अरे! सिर तो परेशानी में डाला हुआ है। समस्या से आई परेशानी, सिर घुसाया हुआ है परेशानी में, परेशान हो रखें और समस्या क्या इसको कोई नहीं देख रहा है। क्या है समस्या ?

बेटा बोलता है, "मैं नहीं पढूंगा! मैं नहीं पढूंगा।" माँ-बाप परेशान होते हैं। उसको पीटते हैं, उसको मारते हैं, उसको गाली-गलौज देते हैं, उसको भला-बुरा कहते हैं। अगर, अगर सचमुच में दो मिनट बैठकर उस बेटे से बात की जाये — क्यों नहीं पढ़ना चाहता है, क्या दिक्कत है, क्या खराबी है। हो सकता है वह यह कहे कि "जो पढ़ाया जा रहा है वह मेरे को समझ में नहीं आ रहा है।" अगर उसके समझ में नहीं आ रहा है तो उसकी गलती थोड़ी है। समझने का कोई वॉल्व थोड़ी होता है, समझने का कोई स्विच थोड़ी होता है। जब नहीं आ रहा है तो नहीं आ रहा है उसकी मदद करनी पड़ेगी, उसके साथ बैठना पड़ेगा, उसको और समझाना पड़ेगा।

जब स्कूलों में भेजते हैं हम, कैसे स्कूलों में भेज जाता है हिन्दुस्तान में ? ऐसे-ऐसे स्कूलों में भेजा जाता है बच्चों को, जहां इतने-इतने विद्यार्थी हैं एक-एक कक्षा के अंदर — अगर किसी का प्रश्न भी है तो उसका उत्तर उनको नहीं मिलेगा। और मास्टर जी हैं उनको क्या है — “भाई सारी क्लास को पूरा करना है।” वह 45 मिनट उनके पास हैं, उसमें सारी क्लास को पूरा करना है, पढ़ाना है। वह पढ़ा रहे हैं इसका यह मतलब नहीं है कि — उनको यह भी देखना है कि किसी के दिमाग में जो पढ़ा रहे हैं वह जा भी रहा है या नहीं! बस बोले जा रहे हैं, बोले जा रहे हैं, 45 मिनट के लिए उनको कहना है, जो उनका करिक्यूलम (curriculum) है उसके हिसाब से उनको पढ़ाना है, पढ़ाया और उनका काम पूरा हुआ।

मेरे को कैसे मालूम ? 'भाई! मैं भी तो जाता था स्कूल में।' सारी यही बात होती थी और जो — रांची के अंदर जो जन-भोजन की योजना है, उसके तहत जो वहां बच्चे आते हैं उनसे मैंने एक दिन बात की इस बारे में। तो यह बात तो समझने की है कि अगर किसी की — हो सकता है कि किसी के जीवन के अंदर किसी प्रकार का कष्ट है इसलिए कोई काम नहीं कर रहा है तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि गुस्सा हो जाने से कोई काम हल हो जाएगा। ईर्ष्या, द्वेष यह जब परिवार के अंदर आता है — यह परिवार के अंदर नहीं आना चाहिए परन्तु जब भी यह परिवार के अंदर आता है यह परिवार को तबाह कर देगा, यह परिवार को तबाह कर देगा। यह नहीं होना चाहिए कभी परिवार में। सभी लोग कहते हैं परिवार को मिलजुल कर रहना चाहिए। परन्तु परिवार मिलजुलकर क्यों नहीं रहता है ? क्योंकि एक को किसी से समस्या है, कोई किसी से समस्या है...

एक बार एक विद्यार्थी ने — एक बार गया था मैं कहीं, तो उसने कहा कि मेरे सारे परिवार में लोग लड़ते हैं, झगड़ते हैं। मैं इस लड़ने-झगड़ने को बंद कैसे करूं ? मैंने कहा कि तुम जब देखते हो कि सब लड़ रहे हैं, झगड़ रहे है, तुम्हारा उस लड़ने और झगड़ने में, तुम्हारे परिवार के लड़ने में और झगड़ने में तुम्हारा योगदान क्या है ? मतलब कि तुम क्या करते हो जब सब लोग लड़ रहे हैं और झगड़ रहे हैं — तुम उसका आनंद लेते हो, उसका मज़ा लेते हो ? यह भी होता है। यह भी होता है। यह सारी चीजें परिवार में नहीं होनी चाहियें। हर एक परिवार का सदस्य एक महत्वपूर्ण सदस्य है और उस महत्वपूर्ण सदस्य को वह दर्ज़ा मिलना चाहिए, उसकी बात सुननी चाहिए, उसकी बात समझनी चाहिए। यह नहीं कि मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं। वही वाली बात होती है बाप परेशान है, काम के कारण परेशान है। उसको यह करना पड़ता है, वह करना पड़ता है इसलिए वह परेशान है। मां परेशान है क्योंकि बाप परेशान है। बच्चे परेशान हैं क्योंकि मां और बाप परेशान हैं। और उनको यह करना है, उनको यह चाहिए, उनको यह चाहिए, उनको यह चाहिए।

अब दुनिया आसान थोड़ी है कोई। दुनिया कहती है “मेरे पास यह है, मेरे पास यह है, मेरे पास यह है, तेरे पास नहीं है।” अरे! किसी के पास कुछ है, किसी के पास कुछ नहीं है का क्या मतलब हुआ ? कुछ मतलब नहीं हुआ। जिसके पास वह नहीं है, जो दूसरे के पास है तो इसका मतलब है कि उसके पास कुछ और है जो उसके पास नहीं है। क्या है उसके पास ? अगर उसके पास फोन नहीं है तो उसके पास परेशान होने की कोई चीज नहीं है। उसके पास भी कुछ है। वह सोच सकता है, वह विचार सकता है, क्योंकि जिसके पास वह फ़ोन है — जो हमेशा आता रहता है, टेक्स्ट करना है, यह करना है, ईमेल है, फ़ोन है, यह है, वह है। वह सोचता थोड़े ही है। सारे दिन उसके पास सोचने के लिए समय नहीं है। जिसके पास वह नहीं है उसके पास सोचने के लिए समय है। उसके पास आनंद लेने के लिए समय है। उसके पास — यह तो वह वाली बात आ जाये कि अगर किसी को भूख लगी हो और कोई जा रहा हो रोड पर और आम का पेड़ मिल जाए और आम के पेड़ पर स्वादिष्ट से स्वादिष्ट आम लगे हुए हैं। आप जानते हैं अच्छी तरीके से एक हाथ से तो आम खाया नहीं जाता। आम के लिए तो दो हाथ चाहिए। उसको मसल-मसलकर अंदर से उसका गूदा निकालकर जब मुंह में डालेंगे तब मजा आता है उसमें। तो जिसके पास फोन है वह उसका मज़ा थोड़ी ही ले सकता है। कैसे, कैसे — एक हाथ से उसको कभी फ़ोन यहां रखना पड़ेगा, कभी यहां करना पड़ेगा, फिर खाने की कोशिश करनी पड़ेगी तो उसके साथ दिक्कत हो जायेगी। पर जिसके पास नहीं है वह अपना ठाट से, दोनों हाथों से उस आम का आनंद ले सकता है, यह होता है। सबके लिए सबकुछ है। बनानेवाले ने सबको सबकुछ दिया है। कोई अपने आप को — किसी को नहीं समझना चाहिए कि वह अभागा है। ना! यह सारे जितने भी बना रखे हैं लैबल कि "तू पढ़ा-लिखा है, मैं अनपढ़ हूं!" ना, इसमें पढ़े-लिखे की बात नहीं है, अनपढ़ की बात नहीं है। पढ़ा-लिखा भी कोई हो इसका मतलब यह थोड़ी है कि वह दाल बना सकता है, रोटी बना सकता है और कोई ऐसा भी हो जो पढ़ा-लिखा ना हो पर वह दाल बना सकता है, रोटी बना सकता है।

यह तो वही वाली बात है — एक बार एक बहुत विद्वान पंडित एक नौका में सफर कर रहे थे। तो उन्होंने जो मांझी था उससे पूछा कि — "भाई! तुम कितने पढ़े-लिखे हो?"

कहा कि "मैं तो पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।"

कहा, “ओह! तुमने तो अपनी सारी जिंदगी बर्बाद कर दिया।"

वह नदी के बीच में — केवट जो है, वह नदी के बीच में नाव को ले जा रहा है। और पंडित जी पूछ रहे हैं "तुमने कहीं भ्रमण किया है, कहीं तीर्थ गए हो ?

कहा, “नहीं जी! मैं तो कहां जा सकता हूँ मैं तो इसी में लगा रहता हूं दिन-रात!”

कहा, "तुमने तो सचमुच में अपनी सारी जिंदगी खराब कर दी।" थोड़ा और आगे गए।

पंडित जी ने कहा — "और कुछ है तेरे पास जो तूने सीखा, जाना ?”

कहा, "जी मेरे को तो सिर्फ यह नौका ही चलानी आती है।"

पंडित जी ने कहा — "तूने तो अपनी सारी जिंदगी खराब कर दी। कुछ नहीं सीखा तूने, कुछ नहीं पढ़ा तूने, तू अनपढ़ है।"

तब वह केवट बोलता है कि "पंडित जी! मैं एक सवाल आपसे पूछ सकता हूं ?”

पंडित जी ने कहा — "क्या ?"

तो केवट ने कहा, "आपको तैरना आता है, आपको तैरना आता है ?"

तो पंडित जी ने कहा "नहीं भाई! हमको तो तैरना नहीं आता है। हमको तैरने की क्या जरूरत है। हमने वेद पढ़े हुए हैं, शास्त्र पढ़े हुए हैं, हमने रामायण का अध्ययन किया हुआ है, गीता का अध्ययन किया हुआ है, सब चीजों का अध्ययन किया हुआ है। हमको तैरना नहीं आता है तो क्या बड़ी बात है!"

कहा, "पंडित जी! तैरना नहीं आता है, यही आपने नहीं सीखा। मेरी तो जिंदगी होगी बर्बाद जब होगी पर, आपकी बर्बाद तो अब हो गई है, क्योंकि इस नौका में हो गया है छेद और यह नौका धीरे-धीरे पानी में डूब रही है और अगर आपको तैरना नहीं आता तो आप आज मरेंगे।"

बात यह नहीं है कि क्या सीखा हुआ है! हर एक व्यक्ति की जिंदगी के अंदर बनाने वाले ने एक उपहार दिया है, सबको एक उपहार दिया है। वह क्या उपहार है — यह नहीं है कि "तुम यह नहीं कह सकते हो कि तेरा उपहार बड़ा है या मेरा उपहार बड़ा है। ना! यह नहीं कर सकते, यह नहीं कह सकते। सबका अपना-अपना है। वह तुम्हारे लिए है। जिसको करने से तुमको आनंद मिल सकता है। तुम्हारा जीवन धन्य हो। तुम समझ पाओ बस! यह उपहार सबको मिला हुआ है क्या उपहार है वह — खोजो उसको जानो।”

कोई कविता लिख सकता है, कोई कविता सुन सकता है। अच्छा! "आप कहेंगे कि कविता सुनने वालों में क्या-क्या-क्या-क्या बड़ी बात है ?"

अजी! एक बात सुनिए आप! अगर कविता सुनने वाले नहीं होते तो कविता सुनाने वाले क्या करते ? किसको कविता सुनाते ? सुनाते हैं यह तो लोग समझते हैं कि एक उपहार है जो सुनते हैं उनको नहीं कहते हैं कि उपहार है। परन्तु कविता सुनने वाले नहीं होते तो कविता सुनाने वाले क्या करते ? कुछ नहीं करते, न कविता लिखते, क्योंकि कोई सुनने वाला था, कोई सुनने वाला है, तभी तो वह उठकर सुनाते हैं उसको कविता। जब कोई है ही नहीं तो क्या सुनाएंगे। तो सबको एक उपहार मिला हुआ है अपने जीवन के अंदर। उस उपहार को जानो और अपने जीवन को सफल बनाओ!

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 22 00:19:16 लॉकडाउन 22 Video Duration : 00:19:16 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (14 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

मेरी यही आशा है कि आप सबलोग कुशल मंगल होंगे, तंदरुस्त होंगे और आनंद में होंगे। क्योंकि जब हम उस आनंद में हैं तो हमारे लिए मंगल ही मंगल है। अमंगल क्या है — जब विपदा सिर पर आती है। अमंगल क्या है — जब हम अपना रास्ता खो जाते हैं। जब हमको वह चीज नहीं दिखाई देती है जो स्पष्ट हमारे सामने है तो हम अपना रास्ता खो बैठें। और जब रास्ता खो जाते हैं और सबसे बड़ी बात रास्ता खोने की यही है कि जब मनुष्य खोने लगता है अपना रास्ता तो उसको मालूम नहीं पड़ता है कि "अब मेरा रास्ता मैं खो रहा हूँ!" अब मैं भटक रहा हूं — यह सबसे बड़ी बात है कि जब मनुष्य भटकने लगता है तो कोई ऐसी चीज नहीं है जो आकर उसको यह बताये कि अब तुम भटक गए हो। जब वह पूरी तरीके से भटक जाता है, तब उसको एहसास जरूर होता है कि "मैं भटक गया हूँ।"

अगर आपके घर से कहीं, जहां आप जा रहे हैं, दुकान पर जा रहे हैं या दुकान से घर पर आ रहे हैं और 10 मिनट का रास्ता है। आपको मालूम है कि 10 मिनट का रास्ता है 10 मिनट के बाद आपका मकान आपको मिल जाएगा और आधे घंटे के बाद भी अगर आप अपने घर पर नहीं पहुंचे हैं तो कुछ ना कुछ तो खराबी है, कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। तो कैसे गड़बड़ मालूम हुई ? जब आप देखते हैं, अपने घड़ी को देखते हैं कि "आधा घंटा हो गया, मैं अभी तक नहीं पहुंचा!" तो मैं खो गया हूँ। सबसे बड़ी बात मेरे कहने का मतलब यही है कि जब हम खो जाते हैं तो कई बार यह नहीं मालूम पड़ता है कि हम कब खोना शुरू हो गए और खो जाते हैं, भटक जाते हैं।

इस पृथ्वी के ऊपर अगर हम भटके तो कम से कम एक बात जरूर है कि पृथ्वी गोल है, तो अगर हम चलते रहे, चलते रहे, चलते रहे, तो वहीं वापिस पहुंच जाएंगे जहां से हम चालू हुए। समुद्र में भी सफर करना पड़ेगा और जगह-जगह जाना पड़ेगा, परन्तु फिर भी वापिस आ जायेंगे। परन्तु इस जीवन में जब भटक जाते हैं तो फिर वापिस कैसे आएं ? जब इस जीवन में हम भटक जाते हैं, सही रास्ते पर नहीं हैं, क्योंकि जब हम पैदा होते हैं तो हमारे सामने यह सारी बड़ी-बड़ी जो मुश्किलें हैं, जो आज हम जिन चीजों को मुश्किलें मानते हैं यह नहीं होतीं। क्या है, जीवन बहुत ही साधारण होता है — भूख लगी रोये, मां ने खाना दे दिया। सब ठीक है। उसके बाद प्यास लगी रोये, मां ने दूध दे दिया। जब संतोष मिल गया तो सो गए, चुप हैं। धीरे-धीरे-धीरे करके हम चलना भी सीखते हैं।

यह मतलब नहीं है कि जब हमने चलना सीख लिया, तो हमको कोई मंज़िल हमारी पहले से ही हमने अपने मन में ठानी हुई थी और वहां जाएंगे। नहीं! कभी इधर जा रहे हैं, कभी उधर जा रहे हैं। कई बार तो मैंने छोटे-छोटे बच्चों को चलते देखा है, वह जाना कहीं और चाहते हैं और जा कहीं और रहे हैं। क्योंकि यह सारी चीजें हैं उनके सीखने की। और सबसे बड़ी बात कि बच्चा गिरता है, फिर उठता है। यह बात आप जानिये और इसको स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश कीजिए मैं क्या कह रहा हूं कि बच्चा गिरता है और गिरता है, इधर-उधर देखता है कि सब ठीक है, अगर उसकी मां हंस रही है तो फिर सब ठीक है। फिर उठता है, फिर दो-तीन कदम चलता है, फिर गिर जाता है। फिर उठता है, फिर दो-तीन कदम चलता है, फिर गिरता है।

मतलब उस बच्चे को गिरने से कोई शिकवा नहीं है — "गिरा-गिरा" कोई बात नहीं "उठना" उसका मतलब है। गिरा तो यह नहीं है कि "माँ! मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया!" ना! इधर-उधर देखता है सब ठीक है, फिर उठता है, फिर चलने लगता है। यह चीज आप सबने देखी है, जानते हैं कि बच्चों के साथ यह सब होता है। तो इसका मतलब है कि आप भी जब बच्चे थे आपके साथ भी यह हुआ।

अगर मैं इसको एक शक्ति मानकर चलूं कि यह एक शक्ति है कि जो गिरने के बाद भी उठने की प्रेरणा देती है और गिरने में कोई शर्म की बात नहीं है, पर इतनी हिम्मत जरूर है कि बजाए कि बच्चा शर्म से — मतलब अपनी आँख नीचे करे या रोये या कुछ करे, वह उठता है और फिर चलने लगता है। यह जो शक्ति हम सब में थी यह कहां गयी, क्या हुआ इस शक्ति का ? क्योंकि आज जब हम गिरते हैं — और मेरा मतलब गिरना नहीं है जैसे लुढ़क गए जमीन पर उसका मतलब नहीं है, पर जब हम गिरते हैं — मतलब हमने कोई गलत काम कर दिया या कोई काम ठीक नहीं हुआ या किसी ने कुछ बुरा कह दिया हमको, इस प्रकार का गिरना, जिससे हमको दुख हो तो फिर हम दोबारा उठने की कोशिश क्यों नहीं करते हैं ? उसी के पीछे क्यों लग जाते हैं — "अरे! यह हो गया, वह हो गया, अब क्या होगा मेरा, क्या नहीं होगा।” अब बच्चा अगर यह कहने लगे — "मैं गिर गया, अब क्या होगा, अब मैं तो कभी चल ही नहीं सकूंगा, अब मैं कभी जा ही नहीं सकूंगा, मैं स्कूल कैसे जाऊँगा, मैं फुटबॉल कैसे खेलूंगा, मैं क्रिकेट कैसे खेलूंगा, मेरे साथ अब क्या होगा; यह तो अन्याय हो गया मेरे साथ, किसने यह मेरे साथ किया, यह किस कर्मों का फल है!" कर्मों का फल — तुम समझते हो कि जब बच्चा चलने लगता है और गिर जाता है तो वह बैठ करके यह कहता है "अरे मां! मेरी जन्म-पत्री लाओ, मेरे को बताओ मेरे कौन से कर्मों का फल है कि मैं गिर गया!" क्या समझते हैं ?

किसी बड़े स्वामी के पास जा रहा है; किसी पंडित के पास जा रहा है, "मैं तो 10 नारियल चढ़ाऊंगा मेरे को उठने की शक्ति दो!" ना! बच्चा — उसके लिए गिरना भी और उठना भी उतना ही सरल है। उसको उठने में और गिरने में कोई शर्म नहीं है। पर मनुष्य को है। "मैं गिर गया, मेरे साथ यह हो गया, मैं फेल हो गया या मेरे को पास करवा दो मैं 10 नारियल चढ़ाऊंगा।" तुम समझते हो वह जो छोटा बच्चा है वह कहता है "हे प्रभु! आज मेरे को गिराना मत, मैं तुमको 10 नारियल चढ़ाऊंगा।" ना, उसको क्या, उसको प्रभु — प्रभु तो उसका सब जगह है, मतलब उसको अपने भगवान से जो उनका नाता है, रिश्ता है, आनंद का जो रिश्ता है, आनंद का नाता है वह हर एक जीवन के हर एक क्षण में वह आनंद लेना चाहता है, देखना चाहता है, सुनना चाहता है। ऐसी-ऐसी आवाज़ें, उसके लिए सबकुछ नया है। हमारे लिए तो सबकुछ पुराना है — "हां! मैंने सुनी हुई है, यह आवाज सुनी हुई है, वह आवाज सुनी हुई है।" पर जो छोटा बच्चा है उसके लिए "हां! मैंने यह आवाज कभी नहीं सुनी।"

तुम जब बादलों को देखते हो तो क्या कहते हो अपने से ? कुछ नहीं! बादल आये, आये! तुम जानते हो कि हर एक बादल जो आकाश में आता है, उसका रंग-ढंग सबकुछ अलग है। मनुष्य को तो लगता है कि सब एक ही जैसे हैं। पर एक जैसे, कैसे हैं ? सब अलग-अलग हैं। जब बारिश होती है, एक-एक बूंद उस बारिश की अलग-अलग है। जब बर्फ पड़ती है, एक-एक क्षण जो बर्फ पड़ रही है, वह सारी बर्फ — उसका एक-एक हिस्सा अलग-अलग है। वैज्ञानिक लोग कहते हैं कि जब तुम तारों को देखते हो, आकाश में जब तारों को देखते हो तो कितने तारे देख रहे हो ? जितने-जितने भी समुद्र के किनारे, नदियों के किनारे, जितनी भी रेत है, उनका हर एक-एक-एक जो कण है उससे ज्यादा हैं सितारे आकाश में। जब मैंने पहली बार यह बात सुनी, मैं अचंभे में रह गया कि ऐसे कैसे सम्भव हो सकता है! परन्तु इतना विशाल है यह और इतने तारे हैं, इतने तारे हैं, इतने तारे हैं, इतने तारे हैं कि जितने समुद्र के किनारे जो रेत है उसका एक-एक कण भी लें तो उससे भी ज्यादा तारे आकाश में हैं।

यह सब कुछ अचंभे की बात हर समय तुम्हारे सामने हो रही है पर मनुष्य है कि उसके लिए क्या चिंता है — "मेरी भैंस कहां है ?" यह नहीं, मतलब एक तो चिंता यह है कि "मेरा क्या होगा, क्या मैं आज का जो दिन है जो कभी — सोचिये आप, विचारिये! मैं कहने वाला था कि आज का जो दिन है वह कभी वापिस नहीं आएगा। सोचिये आप, विचारिये! कब वापिस आएगा ? कभी नहीं, कभी नहीं, मतलब कभी नहीं, कभी नहीं — सौ साल में नहीं, दो साल में नहीं, दो करोड़ साल में नहीं, दो हजार लाख करोड़ साल में नहीं, दो अरब साल में नहीं, एक हजार, दो हज़ार, पांच हज़ार, दस हज़ार अरब सालों में भी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। कभी नहीं वापिस आएगा।

कितने ही लोग हैं जो अपने घर में बैठे हैं इस कोरोना वायरस की वजह से और बोर हो रहे हैं। तुम तो बोर हो रहे हो पर तुम्हारे सामने से क्या गुजर रहा है ? तुम्हारे सामने से गुजर रहा है यह दिन और यह दिन कभी वापिस आएगा नहीं। एक बार निकल गया तो यह निकल गया यह कभी-कभी, कभी-कभी, कभी-कभी, कभी वापिस नहीं आएगा। यह तुम जानते हो अच्छी तरीके से। इससे कोई अंजान नहीं है इस बात से कोई अंजान नहीं है । फिर भी लोग अपना समय किस तरीके से गुजार रहे हैं, जैसे फिर यह कल दोबारा आएगा।

कितने ही लोग इस कोरोना वायरस से मर गए। जब यह — जब वही लोग नवंबर में थे, तब उनको यह था कि कोरोना वायरस से मरेंगे ? नहीं! दिसंबर में यह सारी बातें चालू हुईं। तो क्या होगा, क्या नहीं होगा इसका सबकुछ होते हुए तुम इसके बारे में बता नहीं सकते। क्यों जी ? 2019 में क्या आपको मालूम था अप्रैल में कि यह होने वाला है ? तब तक तो आप सभी लोग, हम सभी लोग खोए हुए थे कि "टेक्नोलॉजी में यह हो गया, टेक्नोलॉजी में यह हो गया।" सबके पीछे क्या था "5G आएगा, जी! 5G आएगा।" अरे! 5G को मारो गोली, आ गया कोरोना जी। अब क्या करोगे ? सबको घर में बिठा दिया। मतलब कोई यह सोच नहीं सकता था, सोच नहीं सकता था। हमको अच्छी तरीके से याद है हम तो (मेरे ख्याल से नवंबर का समय था) नवंबर का समय था, 2020 की बात थी, इस साल की बात थी कि — "हम वहां जाएंगे, हम वहां जाएंगे, हम वहां जाएंगे, वहां जाएंगे, वहां जाएंगे, वहां जाएंगे, टूर की बात हो रही थी, तो वही वाली बात थी कि "हां! हिंदुस्तान चलें, वहां चलें, वहां चलें, वहां चलें, वहां चलें।"

यह किसी — एक भी व्यक्ति ने उस मीटिंग में यह नहीं कहा कि "जी! सब घर बैठे होंगे और आप भी घर में लॉक्ड होंगे" — किसी ने नहीं कहा। यह सोच भी नहीं सकता था कोई कि ऐसा समय होगा। अजी! हम तो सब जानते हैं, सबको ऐंठ थी अपनी, अहंकार जिसे कहते हैं। "हमने तो यह कर लिया हासिल, हमने यह कर लिया हासिल, हमने यह कर लिया हासिल।" अब कर लो हासिल क्या करना है! इसने अच्छे-अच्छों को बिठा दिया घर में। तो क्या करोगे ? कैसे करोगे ?

तब बात आती है उस हिम्मत की, उस दृष्टिकोण की कि "मैं अपने जीवन में उस चीज को पाऊं। अगर मैं गुम भी हो गया तो बात गुम होने की नहीं है, बात है वापिस रास्ते पर आने की।" उसके लिए कैसी हिम्मत की जरूरत है ? वैसी हिम्मत की जरूरत है कि बिना शर्म के, बिना किसी चीज को सोचे हुए, जैसे बच्चा जब गिरता है तो फिर उठता है और आगे चलता है। अभी वह चल नहीं सकता है, उसको अच्छी तरीके से मालूम है वह ज्यादा चल नहीं सकता है। वह एक-दो कदम लेता है, गिर जाता है। पर फिर उठता है और वह जो उसका उठना है वही एक चीज है जो उसको वह मौका देगी कि फिर वह दो कदम और चल सके। फिर तीन, फिर चार, फिर पांच, फिर छह, फिर सात और ऐसे-ऐसे वह चलता रहे और ऐसे-ऐसे करता रहेगा तो वह कुछ सीखेगा — और चलना सीखेगा।

यह बात है कि हम इसको अपने जीवन में अपनाएं, इस हिम्मत को जो हमारे अंदर है। जब हम बच्चे थे हमारे अंदर थी यह सबके साथ हुआ है — चाहे आप औरत हो, चाहे आप मर्द हो यह सबके साथ हुआ है और यह आपके अंदर अभी हिम्मत है। पर इस हिम्मत को बाहर लाओ और कैसे बाहर लाओगे ? जबतक तुम बात की स्पष्टीकरण नहीं करोगे। क्योंकि तुम दुख में — जो दुख में बात होती है, बात तो अलग है, दुख अलग है, जो बात तुमको दुख देती है वह बात अलग है, दुख अलग है। तुम्हारा सिर है घुसा हुआ दुख में, तुम वह जो बात जो तुमको दुख दे रही है उसको नहीं देख रहे हो और हटाना है उसको जो दुख दे रही है जैसे कोई अगर चीज है जिससे बदबू आ रही है, तो बदबू आ रही है तो अपना नाक बंद कर लिया। परन्तु तुमको अच्छी तरीके से मालूम है कि तुम कब तक अपना नाक बंद करोगे, स्वांस तो तुमको लेना पड़ेगा। तो तुम क्या करते हो ? तुम वही करते हो जो बुद्धिमानी रूप वाली बात है कि जो श्रोत है उस बदबू का उसको उठाकर कहीं फेंक देते हो, अपने से दूर। जब ऐसा करते हो तो बदबू भी उस चीज की उसके साथ चली जाती है। ठीक उसी प्रकार, जो चीज दुख देने वाली है तुम्हारा सिर घुसा हुआ है दुख में, तुमने अपनी नाक बंद कर रखी है जबतक वह चीज जो तुमको दुख दे रही है, जबतक उसको नहीं हटाकर फेंकोगे दुख तुम्हारा कहीं नहीं जाएगा, क्योंकि उसका श्रोत वह चीज है।

तो मुझे आशा है कि जो मैंने आज कहा उससे आपको कुछ समझ में आएगा और आप उसका पूरा-पूरा फायदा ले सकेंगे और आपके जीवन में थोड़ा-सा आनंद और आए। और आपका जीवन मंगलमय बीते।

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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