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लॉकडाउन 9 00:16:51 लॉकडाउन 9 Video Duration : 00:16:51 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (1 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज के दिन जो मैं कहना चाहता हूं वह यही है कि वैसे तो काफी दिन निकल गए हैं और लॉकडाउन के लिए तो अभी थोड़े दिन और बाकी हैं। और मेरे को तो यही आशा है कि सभी लोग जो हैं जो यह समय बिताने की कोशिश कर रहे हैं सबका समय अच्छी तरीके से बीत रहा है। कुछ समझ रहे है, यही नहीं है कि परिस्थिति पर गुस्सा हो गए और सब काम ठीक हो जाएगा। गुस्सा होने से कुछ नहीं होगा यह समझने की बात है।

एक किस्म से अगर देखा जाए तो जो कुछ भी अब यहां हो रहा है आपके जीवन में, लॉकडाउन में, कहीं जा नहीं सकते, तो यह जीवन का भी एक ऐसा ही दृश्य है, क्योंकि आपको इन परिस्थितियों में सीखना पड़ेगा कि आप अपने साथ कैसे रहें। आप और लोगों के साथ कैसे रहेंगे यह तो आपको अच्छी तरीके से मालूम है। जब दोस्त होते हैं तो दोस्तों के पास चले गए गपशप मारी, इसकी बात की, उसकी बात की, यह बात की, वह बात की, घर आ गए। कोई अपने बच्चों के साथ है तो, बच्चों से ये बात की, वो बात की। फिर वह सब अपने कमरे में गए और आप अपने कमरे में गए। इन परिस्थिति में आपको अपने साथ कैसे रहना है यह सीखना पड़ेगा। क्या आप और चीजों में व्यस्त हो करके अपने आप को खो देते हैं ? लोग अधिकतर यही करते हैं।

देखिये तीन प्रकार के लोग हैं। एक, वह जो किसी चीज का ख्याल नहीं करते हैं । एक, वह जो सारे समाज का ख्याल करते हैं लोग क्या कहेंगे, ऐसा करना है, ऐसा करना है, ऐसा करना है। और एक इस प्रकार के लोग जिनको कि इस सारे समाज से कुछ लेना-देना नहीं है, सन्यासी! और कबीरदास जी भी बात करते हैं इनकी कि —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

इसमें तीनों प्रकार के आ गए। जो सबकुछ — जो समाज कहता है, समाज के अनुकूल करते हैं और कुछ लोग हैं जो कहते हैं "नहीं मेरे को समाज से कुछ मतलब नहीं है।" जैसे ब्रह्मानंद जी का भी एक भजन है कि —

मुझे है काम ईश्वर से जगत रूठे तो रूठन दे

जगत से कुछ काम नहीं है, कुछ मतलब नहीं है। और एक, वह जो कुछ कहा जाता है उसका उल्टा, उसके विपरीत करते हैं। इसमें यति में — दानव आ गए, यह सब कुछ आ गए। मतलब, जिनका जंगल रूल (rule) है, वह उस तरीके से काम करते हैं। आप कोई भी हों आपको इस संसार के अंदर भी रहना है, परन्तु सबसे बड़ी बात है कि आप अपने साथ अगर नहीं रह सकते हैं, तो आपने कुछ जाना नहीं, आपने कुछ सीखा नहीं, आपने कुछ समझा नहीं। और यही बात है अपने आपको जानने की, अपने आपको समझने की, क्योंकि जब मनुष्य को कहा जाता है कि "तुम धीरज रखो", तो जो धीरज रखने वाले हैं ठीक है उनके लिए अच्छी बात है "धीरज रखो", परन्तु कई लोग ऐसे हैं जिनको यह मालूम नहीं है कि धीरज कैसे रखा जाए!

देखो! हम बड़ी आसानी — बड़ी आसान बात है कि हम हर एक चीज को कंट्रोल करना चाहते हैं ताकि वही हो जो हम चाहते हैं और जो हम नहीं चाहते हैं वह न हो। और सोक्रेटीज़ का भी एक quote है कि — "हम तब खुश नहीं होते हैं, जब जो हम चाहते हैं वह न हो और वह यह भी कहते हैं कि हम तब भी खुश नहीं होते हैं, जब जो हम चाहते हैं वह होता है तब भी हम खुश नहीं होते हैं।" क्योंकि वह वैसा नहीं रहता है वह बदल जाता है समय के साथ, तो हम चाहते हैं कि हम खुश हों, हम चाहते हैं कि कोई चीज बदले ना और प्रकृति की — प्रकृति का कानून यह है कि हर एक चीज बदलेगी तुम्हारा चेहरा बदलेगा, तुम्हारा शरीर बदलेगा, तुम क्या खाते हो यह बदलेगा, तुम किस चीज को पसंद करते हो यह बदलेगा, तुम्हारा परिवार बदलेगा। जब बच्चे छोटे-छोटे होते हैं सबको अच्छा लगता है, पर फिर धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जब बड़े होते हैं और बड़े होकर फिर कोई अपनी तरफ चाहता है, कोई इधर जाता है, कोई किधर जाता है। यह भी सब बदलेगा। इसको तुम काबू इस पर कर नहीं सकते हो, इसको तुम अपनी जेब में नहीं रख सकते हो, ये सारी चीजें बदलने वाली हैं।

अब जो बदलाव आया है, यह बदलाव यह है, बड़ी साधारण सी बात है कि — तुम और लोगों से दूर रहो, और लोगों से दूर रहो ताकि अगर किसी को वह कोरोना वायरस की बीमारी है तो वह तुमको ना लगे। इससे साफ बात क्या हो सकती है, इससे साधारण बात क्या हो सकती! परन्तु यह इतनी साधारण बात नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि लोग जब लॉकअप में हैं तब क्या करें, करने के लिए क्या है। कोई कुछ करने की कोशिश कर रहा है, कोई कुछ करने की कोशिश कर रहा है, बोर्डम आने लगती है। ये सारी बातें होने लगती हैं। पर बात दरअसल में वही है न, काबू में सारी चीजें हों, जैसे आप चाहते हैं वैसे ही सारी चीजें हों। आप जो नहीं चाहते हैं वह ना हो। किसी चीज को चाहने से वह चीज आपके चाहत के अनुकूल हो यह तो किसी चीज को नहीं मालूम। चिड़िया है, चिड़िया उड़ती है। अब चिड़िया को अगर कोई चाहता है कि "नहीं, तू वही रहे।" वह तो नहीं रहेगी उसको — वह जो करना चाहती है, वह करना चाहती है, क्या वह आपकी इच्छा के अनुकूल होगा ? आपको नहीं मालूम हो या ना हो।

कोई किसान है वह बीज बोता है, वह चाहता है कि "यह बीज जल्दी-जल्दी उगे।" वह उगेंगे, तब उगेंगे जब वो जैसा चाहते हैं। जब ऋतु आएगी तब फल होगा। यही तो है न बात कि —

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, जब ॠतु तब फल होय।

उसके बाद नहीं, उसके पहले नहीं 'जब ऋतु तब फल होय।' और इस समय इस बात की बहुत ज्यादा कीमत है, इंपोर्टेंस (importance) है कि आप अपने जीवन में इस बात को सीखें कि सब्र क्या होता है! सब्र करने में भी जो आनंद ले लेता है उसके लिए सबकुछ है, जो सब्र में आनंद नहीं ले सकता उसके लिए कुछ नहीं है। किसी भी परिस्थिति में जो उस परिस्थिति में से आनंद ले सकता है —

देखिये! शांति की बात करते हैं, तो अगर कोई यह कहे कि "भाई तुम जेल चले जाओ, जेल में तुमको शांति मिलेगी" तो लोग कहेंगे यह तो संभव नहीं है आप गलत कह रहे हैं। परन्तु एक व्यक्ति था साउथ अफ्रीका में तो वह पीस एजुकेशन प्रोग्राम कर रहा था। जब मेरे को सुन रहा था वह — तो मैं जब बात करता हूं उनलोगों से तो मैं उनके स्वांस की बात करता हूँ कि तुम्हारे अंदर स्वांस आ रहा है, जा रहा है। तो वह एक दिन, उसने सोचा कि मैं जाऊंगा अपने कमरे में, जब जाऊँगा अपने लॉकअप में, जब जाऊँगा, तो मैं जानना चाहता हूँ कि यह स्वांस क्या है! तो वह लेट गया — तो वह किसी को बता रहा था कि वह लेट गया और वह अपने स्वांस के ऊपर उसका ध्यान गया — अंदर आ रहा है, जा रहा है, अंदर आ रहा है, जा रहा है। उसका ध्यान स्वांस के ऊपर गया। तो वह कहता है कि वैसे तो उसके कमरे में — और कमरा ही क्या, क्या कमरा है, उसमें सलाखें लगी हुईं थी। जेल थी वह। मेरे को ऐसा भी नहीं लगता कि उसका जो बैड था, पलंग था वह कोई अच्छा पलंग था या सॉफ्ट था या कम्फर्टेबल (comfortable) था, आरामदायक था। नहीं! जेल में तो यह सारी चीजें उपलब्ध नहीं होती हैं, परन्तु वह वहां लेटा हुआ और अपने स्वांस के ऊपर उसका ध्यान गया। और जब स्वांस के ऊपर उसका ध्यान गया, तो वह कहता है कि मेरे को शांति का अनुभव होने लगा और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे मैं उस शांति के अनुभव को करता चला गया और इतनी शांति हुई, इतनी शांति हुई, इतनी शांति का अनुभव किया कि मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि मेरे अंदर इतनी शांति होगी। यह कैसे संभव हुआ ? यह जेल में संभव हुआ ? जेल में एक व्यक्ति शांति का एहसास कर रहा है यह कैसे कैसे संभव है ?

मेरा कहने का मतलब यही है कि कोई भी परिस्थिति हो उस परिस्थिति में से आप उस मूल चीज को ले सकते हैं। कोई भी चीज हो, कोई भी बात हो रही हो। वह स्वांस जबतक आपके अंदर आ रहा है, जा रहा है तब तक उस शांति का अनुभव आप कर सकते हैं। अब शांति का मतलब क्या है ? कई लोगों के लिए तो शांति का मतलब है कि बाहर अगर ज्यादा आवाज है, तो वह आवाज खत्म हो गई तो अब शांत हो गया। वह शांति नहीं है, वह शांति नहीं है, वह आवाज कम हो गई। यह है वो, आवाज कम हो गई। कहीं जाते हैं जंगल है वहां पर झिंगुर चें-चें कर रहे हैं तो लोगों को लगता कि बड़ी शांति है। नहीं! वह झींगुर की आवाज है। तो शांति क्या है ? शांति वह चीज है जो आपका हृदय आपको बताएगा कि हां यह शांति है। जब शांति का अहसास होगा तब। असली शांति वह है, वह परिभाषा में नहीं पड़ती। जैसे मीठा क्या है! उसकी कोई परिभाषा नहीं है। जब मीठा आप खाते हैं, आपको जब वह एहसास होता है आप कहते हैं "हां! यह मीठा है।"

अब यह बात नहीं है कि — एक बार मैं एक उदाहरण देता हूँ — एक बार मुंबई में मेरे को किसी आदमी ने बुलाया अपने घर में खाने के लिए। तो मेरे को यह लगा कि खाना बड़ा अच्छा बनेगा, तो मैंने नाश्ता भी ज्यादा नहीं किया। दोपहर में खाना था, दोपहर में हम गए। भूख खूब लगी हुई थी, खूब भूख लगी हुई थी। और यह मैं चाहता था कि खाना — मेरे को यह एहसास हुआ कि खाना अच्छा बनेगा। तो मैं गया। जब खाना आया तो सच में बहुत सुंदर और तरह-तरह के पकवान बने हुए और सबकुछ बहुत बढ़िया बना हुआ। मैं बहुत छोटा था उस समय। तो मेरे को लगा यह तो बहुत बढ़िया हो गया। जैसे ही मैंने पहला खाना थोड़ा सा लिया और अपने मुंह में रखा, मीठा! तो मेरे को लगा कि यह कैसे संभव है ? मैंने दाल थी, वह मुँह में डाली, वह भी मीठी। सब्जी बनी हुई थी, वह भी मुंह में डाली, वह भी मीठी। सारी चीजें देख करके — मतलब मन में तो यह धारणा थी कि सबकुछ नमकीन होगा। क्योंकि उससे पहले मैंने ऐसा मीठा खाना कभी खाया नहीं था कि सब चीजों में मिठास। ऐसा कभी खाया नहीं था। जो भी घर में मिलता था खाना, वह सब नमकीन होता था।

तो जब वह मीठा उसका एहसास हुआ तो यह बात नहीं है कि "नहीं यह मीठा हो नहीं सकता।" मैं जिस चीज का एहसास कर रहा हूं वह गलत है, नहीं! मीठा, मीठा है। नमकीन, नमकीन है। उसमें यह बात नहीं है कि मेरी जो धारणा है वह अलग है और यह इसका स्वाद अलग है। कोई भी धारणा हो, कोई भी — यह बनाई हुई है कि "भाई! यह नमकीन खाना है, यह मीठा खाना है।" पर अगर उसमें नमक पड़ा हुआ तो वह नमकीन होगा और चीनी पड़ी हुई है तो वह मीठा होगा। और जब वह मुंह में जाएगा तो मुँह थोड़ी यह कहेगा कि "भाई! नहीं तुम तो सोच रहे थे कि नमकीन है तो मैं इसको नमकीन बना देता हूं।" मुँह या जो जुबान है, वह जो चखने की उसमें गुंजाईश है, ताकत है वह खाने को मीठा या नमकीन नहीं बनाती है वह तो सिर्फ बताती है कि यह मीठा है या नमकीन है। जो चखने से पता लगता है कि यह मीठा है या नमकीन है।

ठीक इसी प्रकार शांति भी ऐसे ही है। जब शांति होती है तब मनुष्य कह सकता कि "हां! मेरे को इस शांति का अनुभव है।" और जब नहीं होती है तब मन अशांत रहता है। कहीं इधर भाग रहा है, कभी उधर भाग रहा है। परन्तु सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह तो चक्कर ऐसा हो जाता है कि इतना मन भागता है, इतना मन भागता है, इतना मन भागता है और सारे दिन, सारी रात भागता रहता है कि लोगों को यह नॉर्मल हो गया है, यह नॉर्मल हो गया है। और अब जो स्थिति हुई है आपको अपने साथ रहना है, अकेले में रहना है वह सारी चीजें, जो इधर भागते थे, उधर भागते थे, यह सब खत्म। तो अब क्या करोगे ? अब लगता है कि अब नॉर्मल है, ठीक नहीं है। परन्तु भाई! तुम हो और तुम्हारे में यह ताकत है धीरज से, प्रेम से, प्यार से अपने हृदय के अंदर जो आपके अंदर शांति है उसका अनुभव कीजिए और इस परिस्थिति में भी आनंद लीजिए। आनंद आप इस परिस्थिति में भी ले सकते हैं।

तो सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 8 00:26:55 लॉकडाउन 8 Video Duration : 00:26:55 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (31 मार्च, 2020)

प्रेम रावत जी:

भारतवर्ष के सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

यह मौका है कुछ सुनने का, कुछ समझने का। क्योंकि इन परिस्थितियों में कई लोग हैं जो मेरे को लिख रहे हैं कि "जी! हमको घबराहट होती है, हमको परेशानी होती है जब देखते हैं कितने लोग मर गए, कितने लोग ये हो रहे हैं, कितने लोग वो हो रहे हैं!"

देखिये! लोग तो लोग हैं, पर सबसे बड़ी बात है कि आपकी जिंदगी में क्या हो रहा है ? एक बात होती है कि हमारे जीवन में आशा हो, निराशा नहीं आशा, होप (Hope), वह बहुत बड़ी बात है क्योंकि इस जीवन में यह होप तो होनी ही चाहिए। यह आशा तो होनी ही चाहिए नहीं तो मनुष्य आगे कैसे बढ़ेगा, आगे कैसे चलेगा! परन्तु क्या यह आशा ऐसी चीजों पर निर्धारित हो, जो सही नहीं हैं या असली नहीं हैं सिर्फ कल्पित हैं। यह ऐसी चीजों पर निर्धारित हो, जो सच है और ऐसा सच, छोटा-मोटा सच नहीं, ऐसा सच — जो सच था, है और रहेगा। परिस्थिति की तो इसमें बात ही नहीं आती है। जबतक तुम इस जीवन में हो, जबतक तुम जिंदा हो — वो जो दो दीवाल हैं, जिनकी मैं बात करता हूँ, उनके बीच में हो, तबतक तुम्हारा सच क्या है ?

अब यह परिस्थिति पहले नहीं थी, अब है और आगे भी नहीं रहेगी। बदलना तो है ही इसको, परन्तु तुम्हारा सच क्या है, जिस सच से — जिस सच को जानकर के, जिस सच को महसूस करके तुम्हारे जीवन में आशा बने, आशा आये और ऐसी आशा हो, जो ऐसे सच पर निर्धारित हो, जो कभी बदलता नहीं है। और वह सच तुम्हारे लिए क्या है ?

वह सच तुम्हारे लिए, इस स्वांस का आना-जाना है। जब तक यह स्वांस तुम्हारे अंदर आ रहा है, जा रहा है तुम्हारे पास सब कुछ है। और जो तुम्हारे पास नहीं भी है उसको भी तुम पा सकते हो, जब तक यह स्वांस तुम्हारे अंदर आ रहा है, जा रहा है। यह स्वांस इस जीवन में सबसे बड़ी चीज है, क्योंकि इसके बिना तुम कुछ भी नहीं हो। जब तक यह है — जबतक यह आ रही है, जबतक यह जा रही है, तुम्हारे रिश्ते हैं; तुम्हारे नाते हैं; तुम्हारी सारी दुनिया है; तुम्हारे काम-काज हैं, तुम्हारा घर है; तुम्हारे पास जो कुछ भी, जो कुछ भी है, वह इसलिए है क्योंकि यह स्वांस तुम्हारे अंदर आ रहा है, जा रहा है। और जब यह स्वांस नहीं रहेगा, तब तुम्हारे पास कुछ नहीं रहेगा। वह है असली कुछ नहीं, जबतक यह आ रहा है, जा रहा है तुमको अपने जीवन में यह महसूस करने की जरूरत नहीं है कि मैं दुर्भागी हूं या नहीं!

अब देखिये! मैं कई बार चर्चा करता हूँ महाभारत की, रामायण की। अब अगर रामायण को ही देखा जाए, भगवान राम के जीवन को देखा जाए तो जब वह पैदा हुए तब से और जब विश्वामित्र उनको लेने के लिए आये और वह विश्वामित्र के साथ गए उनको सीखाने के लिए और विश्वामित्र ही उनको ले गए थे सीता के स्वयंवर में। जब शादी हुई, सभी भाइयों की शादी हुई — लक्ष्मण की भी, शत्रुघ्न की भी, भरत की भी, भगवान राम की भी, तो सबकुछ देखकर के — सारे तारे, सितारे, सबकुछ, ग्रहण सबकुछ देखकर के वह समय रखा गया कि जब उनकी शादी होगी। सबसे शुभ समय! परन्तु वह हुआ नहीं, सबके लिए, सबके लिए। भगवान राम चले गए, सीता चली गयी, लक्ष्मण चले गए वनवास — चौदह वर्ष का वनवास। वह भी छोटी-मोटी बात नहीं होती। और इधर लक्ष्मण की भी शादी हो रखी थी और कहते हैं कि उनके साथ तो ऐसा हुआ कि उन्होंने ऐसा वर माँगा — लक्ष्मण ने कहा, "मैं सो नहीं सकता, क्योंकि मेरे को देखभाल करनी है — भगवान राम की, सीता की।" तो अपनी पत्नी से कहा कि, "तू मेरे लिए सो!" और उसने कहा, “ठीक रहेगा कि मैं सोती रहूंगी तो मेरे को तुम्हारी याद नहीं आएगी।”

तो ऐसी-ऐसी चीजें हुईं। क्या भगवान राम को दुःख नहीं हुआ, जब लक्ष्मण को बाण लगा ? बिलकुल दुःख हुआ! तो यह सब दुःख-सुख, उस कहानी में अगर देखा जाए उनके सारी जो — रामायण में जो वर्णन है, उसमें देखा जाए, तो यही कहा जा रहा है कि यह सुख-दुःख तो आते रहते हैं। परन्तु सबसे बड़ी बात है कि तुम अपने जीवन में, जबतक तुम जीवित हो कुछ कर सकते हो, हर एक चीज के बारे में कुछ कर सकते हो, फिर मैं उदाहरण दे रहा हूँ वही रामायण का — तो भगवान राम जंगल में हैं, वनवास में हैं। मरीचि आता है और हिरन के रूप में आता है। सीता ने हिरन को देखा, सुंदर हिरन है।

भगवान राम ने कहा "ठीक है! मैं तेरे लिए इस हिरन को मारकर लाता हूँ।" और अगर, भगवान राम ने कहा कि "अगर यह मरीचि है, यह माया है उसकी, तो कम से कम इसको मार कर उसको तो खत्म कर दूंगा और इसकी खाल जो है, सीता को दूंगा।"

तो वह भी चल दिए, वह चल दिए। इधर आया रावण कि "मेरे को खाना दो!" और कहते हैं कि सीता अच्छा खाना बनाती थी, तो सीता ने जो कुछ था वह उसको दिया और जाने से पहले लक्ष्मण ने — क्योंकि मरीचि ने ऐसी आवाज लगाई कि भगवान राम बोल रहे हैं —"बचाओ, बचाओ, बचाओ!"

तो सीता ने कहा, "तुम जाओ। बचाओ भगवान राम को, क्या हो गया है, देखो क्या हुआ है।"

तो लक्ष्मण ने कहा, "नहीं, मेरे को नहीं जाना है, मैं तो यहीं रहूंगा।"

कहा, "नहीं! तुम जाओ।"

तब उसने रेखा बनायी और कहा, "इसके पार मत जाना, इसके पार मत जाना। इसके पार जाओगे तो यह जंगल है, इसके इधर रहोगे तो तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा।"

तो जब रावण आया भिक्षा मांगी, तो सीता ने उस रेखा के पीछे से ही उनको खाना दिया। तो रावण ने कहा, "यह कैसा दान दे रही है तू, यह जो रेखा है इसके इधर आ।"

तो यह सब हो रहा है किसके साथ ? भगवान राम के साथ, लक्ष्मण के साथ, सीता के साथ और किस परिस्थिति में हो रहा है, जब उनको वनवास मिला हुआ है। तो मतलब एक तो वनवास — एक तो उनका राज्याभिषेक होना था, वह तो हुआ नहीं। उसके बाद उनको वनवास मिला। वनवास में दिक्कतें ही दिक्कतें और दिक्कतों के बीच में यह सब कुछ जाल। जैसे कि यह समझिये कि जो बुरा है वह अभी तक खत्म नहीं हुआ है उनका और बुरा होना है। सीता की चोरी कर ली रावण ने। वह और भी दुःखी हुए, और भी दुःखी हुए। और अभी दुःख का, पूरा जो भी दुःख है वह अभी पूरी तरह से उनको नहीं मिला है, अभी और मिलेगा। कब मिलेगा ? एक तो सीता भी — एक तो उनका राज्याभिषेक होना था, वह गया। दूसरी बात, उनको वनवास मिला। उसके बाद सीता की चोरी हो गयी। एक नहीं उसके बाद और भी हुआ। फिर क्या हुआ ?

लक्ष्मण जिससे कि उनको बहुत प्रेम था, लक्ष्मण से भगवान राम को — उसको बाण लगा लड़ाई में। मतलब, एक के बाद एक, एक के बाद एक, एक के बाद एक, एक के बाद एक। परन्तु देखने की बात यह है कि उन्होंने उन परिस्थितयों में क्या किया ?

उन परिस्थितयों में भी उन्होंने एक फौज तैयार की, एक सेना तैयार की। किसकी सेना, कैसी सेना, कैसी सेना ?

बंदरों की और भालुओं की सेना। बंदरों की और भालुओं की सेना तैयार की। जहां वह पुल नहीं बना सकते थे, वहां पुल बनाया। और पत्थर को तैरा करके, उस पर राम-राम लिख करके उसका पुल बनाया और लंका में, उस द्वीप में प्रवेश किया।

अब लोग इसको हर एक तरीके से लेते हैं। परन्तु कितनी हिम्मत की बात है, कितनी हिम्मत की बात है। और कितनी बार ऋषि-मुनियों ने, जब भगवान राम दुःखी हो जाते थे — जब लड़ाई हो रही है, यह सबकुछ हो रहा है, दुःखी हो जाते थे, रोते थे। तब ऋषि-मुनि उनको समझाते थे कि "नहीं, नहीं, नहीं! आप दुःखी मत होइये, आपको दुःखी होने की जरूरत नहीं है। आप तो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं।" मतलब, भगवान राम अपने को नहीं देख रहे हैं कि "मैं भगवान, मैं विष्णु का अवतार हूँ। वह देख रहे हैं कि मैं भी एक मनुष्य हूँ और जिसको मैं चाहता हूँ, वह, यह रावण उसको चोरी करके ले गया।" अगर यह सारी कहानी को देखा जाए, यह सारे दृष्टान्त को देखा जाए, तो यह तो स्पष्ट है कि कितनी हिम्मत की भगवान राम ने! और उस हिम्मत से क्या हुआ ?

उस हिम्मत से आशा आयी, निराशा नहीं, आशा आयी। और क्या हम इसको सुनकर, इसको पढ़कर, क्या इतना भी नहीं जान सकते हैं कि हम भी अपने जीवन में ऐसे हिम्मत करें। आगे बढ़ने के लिए हिम्मत करें। जो हमारे पास समस्या आती है, वह समस्या इतनी बड़ी नहीं है कि हम यह भूल जायें कि हर एक समस्या का हल, अगर हम हिम्मत करें तो हम निकाल सकते हैं। हम आगे बढ़ सकते हैं। जबतक यह स्वांस हमारे अंदर आ रहा है, जा रहा है हमारे पास वह बल है — अभिमान नहीं बल! और सबसे बड़ी चीज हमको डरने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ी चीज!

लेकिन जब मनुष्य डरने लगता है, तो सारी चीजें उसके लिए बंद होने लगती हैं। फिर वह, जो उजाला है, उसको देख नहीं पाता। जो चीज असली है, उसको समझ नहीं पाता। और उसके लिए सारी चीजें ऐसी हो जाती हैं कि "अब क्या होगा, अब क्या होगा, अब क्या होगा, अब क्या होगा, अब क्या होगा ?" समय तो उसी गति से निकल रहा है। समय की गति नहीं बदलती। पर उसको लगता है कि "अब तो गए, अब तो गए, अब तो गए, अब तो गए, अब तो गए।" और वह ऐसे काम करने लगता है जिससे कि कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। तो अपना समय बर्बाद करने लगता है और जब समय बर्बाद करने लगता है मनुष्य, तो ऐसी चीज है समय कि जब समय बर्बाद होने लगता है, तो कुछ नहीं बचा।

क्योंकि समय को वापिस नहीं बुलाया जा सकता है। वह एक ऐसी चीज है कि अगर वह एक बार बर्बाद हो गयी तो फिर बर्बाद ही रहेगी।

तो समय बर्बाद करने की बात नहीं है, हिम्मत से काम लेने की बात है। कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका हल नहीं निकाला जा सकता। आगे बढ़ने की बात है, समझने की बात है। आशा से अपनी जिंदगी को बिताने की बात है। जो कुछ भी आज आप सीख रहे हैं, इस परिस्थिति के होने से, इसको भूल मत जाना, इसको भूल मत जाना। क्योंकि यह याद रखना कि यह परिस्थिति आयी और कितने ही लोग हैं जो इससे डर गए, इससे डर गए। और जब डर गए तो फिर क्या हुआ ? कुछ नहीं हुआ। मतलब, सतर्क रहना, एक चीज से सतर्क रहना, वह बात अलग है। सतर्क रहने की बात अलग है और डरने की बात अलग है। सतर्क तो रहना चाहिए। अगर आप रोड क्रॉस कर रहे हैं, रोड के दूसरी तरफ जा रहे हैं, तो सतर्क तो रहना चाहिए। पर, जैसे ही डर लगेगा आप रुक जाएंगे। रुक जाएंगे, तो फिर गड़बड़ होगी।

तो अभी इस कोरोना वायरस को लेते हुए सतर्क रहना चाहिए। बिलकुल रहना चाहिए। हाथ धोने चाहिए, अपने हाथों से, अपने आँख, नाक, मुँह को छूना नहीं चाहिए। अब यह बात आसान नहीं है। इसके लिए बहुत कोशिश करनी पड़ती है। क्योंकि आदत है कभी यह कर दिया, कभी वह कर दिया, कभी आँख ऐसी हो गयी। जब खुजली होती है तो, खुजली होती है। परन्तु फिर भी कोशिश करनी है कि छुए ना और हाथ साफ रखें। पर आइसोलेट, आइसोलेट, आइसोलेट, आइसोलेट — एकांत में। दूसरी बात, फिर एकांत में करेंगे क्या ? क्योंकि यह मन है, मन तो भाग रहा है सब जगह। मन को तो ताला लगाया नहीं जा सकता। मन तो भाग रहा है, कभी इधर की सोचता है कभी उधर की सोचता है। ऐसी-ऐसी जगह जाना चाहता है, जहां पहले कोई सोचता नहीं था। पर अब मन है, तो मन भाग रहा है, भाग रहा है, भाग रहा है, भाग रहा है, भाग रहा है।

कई बार हम नहीं कहते हैं मन की बात। कई बार कहते भी हैं, पर कई बार नहीं भी कहते हैं मन की बात। पर यह मन है और यह मन भगाएगा। क्योंकि इसका काम है दुनिया में भगाना। दुनिया भर में! इस मन के लिए, इस मन को हवाईजहाज की जरूरत नहीं है। यह अमेरिका में बैठे-बैठे ही हिंदुस्तान पहुँच सकता है। और हिंदुस्तान से अमेरिका एकदम यूं, एकदम यूं! तो यह मन है, कभी कहीं भाग रहा है, कभी कहीं भाग रहा है। कभी किसी चीज की कोशिश कर रहा है, कभी किसी चीज की कोशिश कर रह है। ये अच्छा होगा, वो अच्छा होगा। और सबसे बड़ी बात कि लोग इस मन के पीछे-पीछे भाग रहे हैं — "कोई यहां जा रहा है, कोई वहां जा रहा है, कोई ये कर रहा है, कोई वो कर रहा है।" और ये पागल बना दे आदमी को।

अब कई बार यह बात होती है, जेलों में जाता हूँ मैं जब तो लोग कहते हैं कि — एक बार एक आदमी ने कहा हमसे कि "आपको क्या मालूम, आप तो जेल में रहते ही नहीं हैं, आपको क्या मालूम कैसा है यहां! यहां तो बहुत ही मुश्किल माहौल है, बहुत बुरा माहौल है।" मैं सोचने लगा कि यह जो माहौल बनाया हुआ है, यह जो माहौल है, यह बुरा क्यों है ? जेलों में यह जो माहौल बुरा होता है, यह बुरा क्यों है ? यह बुरा इसलिए तो हो नहीं सकता कि यह सीमेंट जो लगाई हुई है दीवारों में, उससे हो बुरा माहौल। या जो जाली लगाई हुई है उससे हो बुरा माहौल। या जो खिड़की लगाई हुई है उससे हो बुरा। तो कौन सी चीज है जिससे कि जो माहौल है, बुरा है! ठीक है, हम मानते हैं कि बुरा है, पर क्यों बुरा है ? बुरा है तो क्यों बुरा है ? तो सोचा हमने कि कौन सी चीज है भाई ? हम गए हुए हैं जेलों में हमने देखा है, सच में बहुत ही बुरा माहौल होता है वहां। तो क्यों है ?

अरे! वह सरिये की वजह से नहीं है, खिड़कियों की वजह से नहीं है, दीवार की वजह से नहीं हैं, जो सलाखें लगी हुई हैं उसकी वजह से नहीं है। वह अगर बुरा माहौल वहां है, तो इस वजह से है कि वहां के जो लोग हैं, उनकी वजह से है बुरा वहां। फिर बात लोगों पर आती है, मनुष्यों पर आती है कि जो बुरा माहौल उन्होंने बना रखा है, वह उन्होंने बना रखा है। किसी और चीज ने नहीं बना रखा है। एक बार हम गये, हमने देखा, एक चिड़ियां आयी, बैठी और फिर उड़कर चली गयी। मैंने कहा, यह तो जेल में आयी, जब आयी तब भी स्वतंत्र है, अब चली गयी तब भी स्वतंत्र है। इसके लिए जेल का कोई मायने ही नहीं है। परन्तु मनुष्य के लिए है। क्योंकि वह जब जेल के अंदर पहुंच जाता है, तो वह बाहर भागने की कोशिश करता है। कहाँ जाएगा ?

लोग हैं जो सोच रहे हैं कि “अब हम आइसोलेशन में हैं, हम कहीं जा नहीं सकते।” भाई! चाहे आइसोलेशन में हो, चाहे गाइसोलेशन में हो, चाहे किसी चीज में भी हो, "तुम तो तुम हो!" तुम तो तुम्हीं रहोगे, तुम तो नहीं बदलोगे। तुम तो तुम्हीं रहोगे। चाहे तुम यहाँ जाओ, चाहे वहां जाओ। चाहे ये करो, चाहे वो करो, तुम तो तुम्हीं रहोगे!" तो जब तुम, तुम्हीं रहोगे, तो आज अगर आइसोलेशन में भी तुम बैठे हुए हो, तो तुम तो तुम ही हो। तो तुमको यह खुजली जो यहाँ लग रही है, यह क्यों लग रही है ? क्या जरूरत है उसकी ? कोई जरूरत नहीं है।

तो इसीलिए हम हमेशा यह कहते हैं कि जबतक तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है, इसको समझो, इसकी कदर करो। यह तुम्हारे लिए जीवन ला रहा है, यह तुम्हारे लिए यह समय ला रहा है, जिस समय में तुम फूल सकते हो, फल सकते हो। कोई भी जगह हो, कोई भी जगह हो।

देखो! हमलोग तो जाते हैं , कभी कोई यहां जाता है, कोई वहां जाता है, कोई ये करता है, कोई वो करता है, पर दरअसल में बात यह है भाई, तुम कहीं भी हो, तुम्हारे अंदर वह सारी सृष्टि की रचना करने वाला तुम्हारे अंदर बैठा है। और जबतक वह तुम्हारे अंदर बैठा हुआ है, तुम कहीं भी चले जाओ, कुछ भी कर लो वह तुम्हारे साथ है। तुमको अकेलापन महसूस करने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ी बात। दोस्त कहते हो, हमारे दोस्त नहीं हैं यहां। तुम्हारा एक ऐसा दोस्त है तुम्हारे अंदर कि पूछो मत, पूछो मत। वह ऐसा दोस्त है, ऐसा दोस्त है, ऐसा दोस्त है कि वह सबका दोस्त है। वह जितने प्राणी हैं, जितने कीटाणु हैं, जितने जानवर हैं, जितने मनुष्य हैं, जितने पत्ते हैं, जितने फूल हैं, वह सबका मित्र है। वह तुम्हारे अंदर विराजमान है, जबतक यह स्वांस तुम्हारे अंदर आ रहा है, जा रहा है, वह तुम्हारे अंदर विराजमान है। तुमको अकेलापन क्यों महसूस हो रहा है, क्योंकि उसको नहीं जानते। उसको जानो, उसको समझो।

कई लोग हैं, वही प्रश्न करते हैं कि “अजी! हमने ज्ञान ले लिया, पर हमारा अहंकार अभी नहीं टूटा है।”

देखिये! अगर मेरे सिर में दर्द हो रहा है और मैं एक गोली लूँ, एनासिन (Anacin) की गोली लूँ और उसको खाऊं नहीं, उसको अपनी जेब में डालूं, तो कोई पूछे आपके पास वो एनासिन की गोली, आपने ले ली ?

हां जी! हमने ले ली, अपनी जेब में रख ली। जेब में रखने से आपका सिर दर्द कैसे खत्म होगा ? लोग ज्ञान तो ले लेते हैं, पर उस पर जो अमल करने की बात है, वह नहीं करते। क्या सीखा रहा है — आपका हृदय आपको क्या कह रहा है ? आपका हृदय आपको क्या सीखा रहा है ?

मैं अपने जीवन में आनंद से रहना चाहता हूँ। उसका नाम ही है, सत् चित् आनंद — सत् चित्-चेतना, आनंद। अगर इस चेतना को जो तुम्हारी चेतना है, इसको सत्य के साथ जोड़ो तो क्या मिलेगा, आनंद ही आनंद मिलेगा। कहाँ, कहा है कि उस आनंद के लिए कोई जगह होनी चाहिए या उस आनंद के लिए कोई मंदिर होना चाहिए या उस आनंद के लिए.... ना! वह जो है, जो सत्य है, वह तुम्हारे अंदर है और अभी भी है। जब तुम गुसलखाने जाते हो, तुम्हारे साथ ही जाता है, जब गुसलखाने से निकल कर आते हो तब भी तुम्हारे साथ ही रहता है। जहाँ तुम जाओ, जहाँ, जो कुछ भी तुम करते हो, वह तुम्हारे साथ है।

तो अगर तुमको माहौल जो पसंद नहीं आ रहा है, ऐसा किया हुआ है, तो इसकी वजह और कोई नहीं तुम ही हो। क्योंकि तुम नहीं समझ रहे हो कि तुम्हारे पास क्या खजाना है, तुम नहीं समझ रहे हो कि तुम्हारे पास क्या चीज है! और जब इस चीज को जान जाओगे, जब इस चीज को स्वीकार करने लगोगे, जब इस चीज को महसूस करने लगोगे, वह अपनी जेब से गोली निकाल के जब मुँह में डालोगे, निगलोगे, तब जाकर तुम्हारा सिर का दर्द खत्म होगा। तब जाकर के ये जितने भी चक्कर चलते हैं, जिनसे कि मनुष्य भ्रमित रहता है कि ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों है! तब जाकर के ये सारी चीजें खत्म होंगी और तब जाकर के तुम सचमुच में असली में स्वतंत्र होगे। और उस स्वतंत्रता — जब हृदय को वह स्वतंत्रता महसूस होगी, तब जाकर तुम्हारे जीवन के अंदर आभार प्रकट होगा। तब तुम्हारे जीवन के अंदर आनंद प्रकट होगा। तब तुम्हारे जीवन के अंदर प्रकाश प्रकट होगा। जब प्रकट होगा फिर आभार और बढ़ेगा। अपने आपको जानो! सबसे बड़ी चीज, चेतना से इस जीवन को जियो। और अपने हृदय के अंदर आभार प्रकट होने दो — तीन चीजें और यह सब कर सकते हैं। यह सब कर सकते हैं।

तो जान करके, पहचान करके अपने आपको, अपने जीवन को सफल करो। और आनंद लो, इस समय में भी मैं कह रहा हूँ कि आनंद ले सकते हो। खुश रहो, खुश रहो! देखो तुम्हारे अंदर यह — तुम परेशान भी हो सकते हो और खुश भी हो सकते हो, और मैं कह रहा हूँ खुश रहो! ठीक है, परिस्थिति तुम्हारे अनुकूल नहीं है, जो तुमको पसंद हो, परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि तुम उस परिस्थिति में भी कोई अच्छी चीज नहीं जान सकते हो। अच्छी चीज तब भी जान सकते हो। अच्छी चीज तुम बाहर तब भी निकाल सकते हो। निकालो अपने जीवन के अंदर और इस चीज को पाओ, जो तुम्हारे पास है। अपना जीवन सफल बनाओ और आनंद से रहो।

कल आपसे फिर बात होगी और तबतक के लिए सभी को मेरा नमस्कार!

लॉकडाउन 7 00:16:53 लॉकडाउन 7 Video Duration : 00:16:53 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (30 मार्च, 2020)

प्रेम रावत जी

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

मैं आज जो आपसे कहना चाहता हूँ, आज के दिन। वैसे मैं लोगों के प्रश्न पढ़ रहा था। प्रश्न मेरे पास हैं, जो आप लोगों ने भेजें हैं। परन्तु मैं अगले शनिवार, इतवार को उनका जवाब दूंगा। तबतक यह प्रोग्राम ऐसे ही चलता रहेगा। जब मैंने वो प्रश्न पढ़े, तो मेरे को एक बात याद आयी, क्योंकि जब मैं विदेश आया था, 14 साल का था मैं तब, 13 साल का था मैं तब, जब मैं आया था विदेश। एक हमारा रूटीन था कि हर रोज जब — पहले तो प्रोग्राम हो गया, फिर उस प्रोग्राम के बाद हर रोज लोगों को हम बताते थे कि हम कहाँ ठहरे हुए हैं और लोग सवेरे-सवेरे आकर के कमरे में, लिविंग रूम में या कहीं भी जहां बड़ा कमरा है, वहां आकर के सब लोग इकट्ठा होते थे और घंटे-दो घंटे के लिए प्रश्न-उत्तर होते थे हर रोज। वह समय, बड़ा अच्छा समय था, मजेदार समय था। लोग प्रश्न पूछते थे और तभी से मेरे को एक बात अच्छी तरीके से मालूम है कि सभी लोग अपने मन में धारणाएं बनाते हैं और उसके हिसाब से चलते हैं।

तो मतलब एक छोटी-सी कहानी यह है कि एक आदमी कहीं जा रहा था। चलते-चलते उसने देखा कि एक कांच का टुकड़ा रोड पर पड़ा हुआ है। वह आदमी अच्छा आदंमी था, दयालु था। उसने सोचा कि यह कांच का जो टुकड़ा है, इस पर अगर किसी का पैर लगेगा तो उसको हानि पहुंचेगी तो, उसने उस कांच के टुकड़े को उठाकर फेंक दिया, अलग फेंक दिया, दूर फेंक दिया। वह चलता रहा। थोड़ी देर के बाद एक ऐसा आदमी आया, जो हीरे का बिज़नेस करता था। उसका व्यापार हीरे बेचने और खरीदने का था। तो चलते-चलते उसकी आँख — जो पहले हीरा फेंका हुआ था उस तरफ गयी। तो वह अपनी किस्मत को क्या कहे ? इतना खुश हुआ वह, इतना खुश हुआ वह, इतना खुश हुआ कि उसने वह — वहां गया और उस हीरे के टुकड़े को उठाया और अपनी किस्मत के बारे में सोचने लगा कि मैं कितना किस्मत वाला हूँ कि मेरे को इतना बड़ा हीरा रोड के किनारे मिला। उसने उस हीरे को अपनी जेब में रखा और बहुत खुश होकर के आगे बढ़ता रहा।

अब देखिये, इस कहानी में क्या है ? एक ने देखा और उसको समझा कि वह कांच का टुकड़ा है और किसी को उससे हानि पहुंचेगी। ठीक है, उसको मालूम नहीं था। उसने उस हीरे को समझा कि वह कांच का टुकड़ा है। परंतु जिसको मालूम है उसके लिए वह कांच का टुकड़ा नहीं था। उसके लिए वह हीरा था।

बात यह है कि अगर एक दृष्टिकोण से देखें तो यह बात है कि वह जो टुकड़ा, कांच का टुकड़ा था, एक के लिए और एक लिए हीरा था। तो जिसने सोचा कि वह कांच का टुकड़ा है, उसने उसको फेंक दिया ताकि किसी को लगे ना। और जिसने उसको हीरा समझा, उसने भी वही किया। उसको वहां रखा नहीं, उसको अपनी जेब में डाल लिया। तो हानि तो किसी को पहुंचेगी नहीं। पर एक की किस्मत खुल गयी और एक ने अपने हाथ में जो आया हुआ हीरा था, उसको भी फेंक दिया। अब यह बात जरूर है कि फेंका अच्छे कारण से, पर फेंक दिया। क्योंकि उसको परख नहीं थी कि वह क्या फेंक रहा है!

लोग धारणाएं बनाते हैं, यह ऐसा है, यह ऐसा है, यह ऐसा है, यह ऐसा है। और उन धारणाओं पर चलते हैं। तो जब मैं पहली बार 1970 में आया था विदेश, तब से मेरे को यह बात याद है कि जितने भी लोग प्रश्न पूछते थे, यह इन धारणाओं के ऊपर आधारित थे, जैसी भी लोगों की धारणाएं थीं। और इन धारणाओं के कारण हम असली चीज क्या है उसको समझ नहीं पाते हैं। क्योंकि इन चीजों की परख होना कि क्या, क्या है — क्रोध क्या है; कामना क्या है और स्पष्टता क्या है; दयालुता क्या है ? इन चीजों की हमको अगर परख नहीं होगी तो हम इन चीजों को अपनी जिंदगी के अंदर, चाहे हम कितनी भी कोशिश करें अपना नहीं पाएंगे। और वही चीजों को अपनाएंगे, जिनके हम गुलाम बने हुए हैं।

जहाँ भी जाते हैं, गुस्सा साथ है। चीजें वैसी नहीं हो रही हैं, जैसी तुमने सोचा था होनी चाहिए। तुम्हारे प्लान के अनुकूल चीजें नहीं हो रही हैं। क्या होता है ? गुस्सा आता है। बच्चा माँ-बाप से प्यार करता है। माँ-बाप चाहते हैं कि वह अच्छा पढ़े-लिखे और आगे चलकर उसकी जो किस्मत है, उसकी जो जिंदगी है वह अच्छी हो। वह कमा सके, खा सके अच्छी तरीके से। यह तो माँ-बाप का दृष्टिकोण है और वह चाहते हैं कि उसका बच्चा खूब मेहनत करे। चाहे खुद मेहनत की, नहीं की — जब वो बच्चे थे, मेहनत की या नहीं की यह किसी को नहीं मालूम, उनको मालूम है। परंतु बच्चा अपना रिपोर्ट कार्ड लाये और रिपोर्ट कार्ड में लिखा है फेल, तो माँ-बाप नाराज होते है, दुःखी होते हैं।

क्या यह संभव है कि हमारे दुःख का कारण ये जो हमारी कल्पनाएं हैं, जो ये हमारी धारणाएं हमने जो बना रखी हैं, ये हैं, यही कारण है। क्योंकि जो कुछ हो रहा है इसको हम समझ नहीं पा रहे हैं। क्या हो रहा है ? जैसे मैंने पहले सुनाया यह दोहा —

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

इस भव सागर से पार करने का यह साधन है। यह नहीं कहा है कि "ये करने का, वो करने का, यहां जाने का, वहां जाने का यह साधन है।" नहीं!

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

मेरी कृपा। अब कृपा के लिए, भगवान की कृपा। सबको चाहिए। मंदिर में जाते हैं, क्यों जाते हैं ? भगवान की कृपा चाहिए, भगवान की कृपा बनी रहे, कृपा बनी रहे, कृपा बनी रहे, कृपा बनी रहे, कृपा बनी रहे और कृपा है और जो है कृपा — जिसको भगवान कह रहे हैं कि यह मेरी कृपा है, उसको कोई समझने के लिए तैयार नहीं है। उलटी भाषा हो गयी। उलटी बात हो गयी कि जो कृपा है, जो स्पष्ट है। जो अंदर तुम्हारे आ रही है और जा रही है —

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

और इसको समझने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसको अपनाने के लिए कोई तैयार नहीं है। बड़े-बड़े प्रश्न पूछते हैं। और यह मेरे को दोहा इसलिए पसंद है। क्योंकि इसमें बड़े साधारण रूप से यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि मेरी कृपा क्या है और यह तुम्हारा जीवन किसलिए है! इस भवसागर से पार होने के लिए है। इन दुःखों से पार होने के लिए है। और हम करते क्या हैं ? हम ऐसी-ऐसी चीजें करते हैं, जिससे कि हम इन दुःखों में फंसे रहते हैं। जो भी हम कर रहे हैं इस संसार के अंदर अगर वो — जो कृपा हम पर बनी हुई है उसको स्वीकार करने की बात है, तो बात अलग है। उसको समझने की बात है, वह बात अलग है। और इस शरीर के लिए कहा है कि —

बड़े भाग मानुष तन पावा।

सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।।

क्यों, क्यों है यह दुर्लभ ? वह इसलिए कि —

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।

यह मोक्ष का दरवाजा है। मोक्ष किस चीज से ? कोई समझता है जन्म-मरण से। मैं कहता हूँ सुख और दुःख जो इस दुनिया के हैं, इन दुःखों से अगर हमको मोक्ष मिल जाये, तो कितना सुन्दर यह जीवन हो जाएगा। तो यही बात समझने की है कि अगर हम उन, जो कल्पित धारणाएं हैं इनको हटाकर के सच्चाई जो है सामने, इसको अगर स्वीकार करें, तो इसमें जो आनंद मिलेगा वह अलग है, वह अलग है। और इस समय में, जो यह कोरोना वायरस की, कोविड-19 की महामारी है, बीमारी है, इस समय में, इन परिस्थितयों में यह और भी गंभीर बात है कि हम उस चीज को समझें कि —

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है।

इस चीज को समझने के लिए हमको यह बात समझनी पड़ेगी कि यह जो हम फोटो बनाकर के हर एक चीज की — "मेरी बीवी कैसी होनी चाहिए, मेरा पति कैसा होना चाहिए; मेरा बच्चा कैसा होना चाहिए; मेरा घर कैसा होना चाहिए; मेरी कार कैसी होनी चाहिए; मेरा गधा कैसा होना चाहिए; मेरी बिल्ली कैसी होनी चाहिए; मेरा कुत्ता कैसा होना चाहिए। हर एक चीज के लिए, हर एक चीज के लिए हमने एक तस्वीर यहाँ अपने दिमाग में खींच रखी है। हमारे दुःखों का कारण ही यह है। मूल में यही है — ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए।

अब लोग कहते हैं, "भगवान मैं हूँ और तू जैसा चाहता है वैसा ही होगा।” और जब कुछ नहीं होता है तब लोग कहते हैं, “अहं! अब क्या करूँ, अब क्या करूँ ?”

यह भगवान के ऊपर ब्लेम (blame) लगाने की, दोष लगाने की बात नहीं है।

सो परत्र दुख पावहीं, सिर धुन धुन पछताय।

कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाय।।

दोष लगाते हैं, हर एक — जब यह नहीं काम कर रही है, वो फोटो जो बनाई हुई है, वो फोटो क्यों नहीं सत्य हो रही है, उसका दोष सबको देते हैं।

कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाय।।

तो उसको हटाकर के अगर हम अपने जीवन में सत्य क्या है उसको देखें, जो आज का सत्य है उसको देखें। जो सत्य हमारे सामने आ रहा है, जा रहा है उसको देखें, इस स्वांस को देखें कि यह इस भवसागर, इन दुःखों से पार होने का यह साधन है। और दुःख कहाँ हैं ? दुःख भी मेरे अंदर है। और सुख कहाँ हैं ? सुख भी मेरे अंदर है। और बाहर परिस्थिति बदले या न बदले, मैं तो बदल सकता हूँ। बाहर परिस्थिति बदले या न बदले, मैं तो बदल सकता हूँ। और इन परिस्थितयों में, इस कोरोना वायरस की परिस्थितयों में, अगर आप यह बात समझने लगें कि आपकी खुशी इन परिस्थितियों के कारण खराब नहीं होनी चाहिए। आपकी जो परिस्थिति है, वह सुख में, आनंद में इन परिस्थितयों में भी होते हुए आप उस चीज का अनुभव कर सकते हैं। वह आपके अंदर है। अगर यह हो गया तो वाह-वाह है। फिर दुःख से डरने की बात नहीं है। किसी भी चीज से डरने की बात नहीं है। हां! सावधान रहने की बात अलग है। सावधान तो रहना चाहिए।

देखिये! हिंदुस्तान में जो कुछ भी हो रहा है, अभी अगर आंकड़ों को देखें, तो बहुत अच्छा हो रहा है। बहुत अच्छा तो तब होता, सबसे बढ़िया तो तब होता कि कुछ भी नहीं हो रहा होता, कोई भी नहीं मरता। परन्तु हिंदुस्तान की जो जनसंख्या है, वह सारे संसार में नंबर -2 है, नंबर दो है । पहली थी चीन की फिर है हिंदुस्तान की। और अमेरिका की जनसंख्या इतनी बड़ी नहीं है जितनी हिंदुस्तान की है, परन्तु अमेरिका में बहुत सारे लोग, केसेज़ (cases) इस कोरोना वायरस के हो रखे हैं। और कितने ही गुना ज्यादा लोग मर रहे हैं, अमेरिका में। यह बात धन की नहीं है, यह बात टेक्नोलॉजी की नहीं है, यह बात इन चीजों की नहीं है। यह बात है कि जो कुछ भी हो रहा है, लोग उसको किस प्रकार ले रहे हैं। क्या सचमुच में लॉकडाउन में हो रहे हैं या नहीं ? लॉकडाउन में होगें, लोगों की मदद हो और लोग समझें इस बात को कि यह जो कुछ भी किया जा रहा है, यह किसी की मन-मर्जी की बात नहीं है। इससे लोगों का ही लाभ होगा। और लोगों का लाभ होना चाहिए।

तो लोग समझें और हर एक चीज और बढ़िया हो सकती है, और बढ़िया हो सकती है, और बढ़िया हो सकती है। परंतु यह तो समय ही ऐसा है। सबसे बढ़िया बात होगी कि आप अपने जीवन के अंदर आनंद से, सुख से, चैन से रह करके यह समय बिताएं और इसका पूरा-पूरा, इसका भी पूरा-पूरा लाभ आप अपने जीवन में उठाएं।

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 6 00:25:08 लॉकडाउन 6 Video Duration : 00:25:08 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (29 मार्च, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा हार्दिक नमस्कार! आज के दिन मैं किस विषय पर बात करूँगा और वह विषय वही है कि कई लोग हैं जो अभी भी डरे हुए हैं। देखिये! बात समझने की है। किसी भी दवा का — अब उदाहरण दे रहा हूँ मैं, तभी वह दवा काम आएगी जब उसका सेवन किया जाए। जेब में अगर रखी हुई है दवा तो उससे कुछ नहीं होगा।

हम बहुत कुछ सुनते हैं कि ऐसा करना चाहिए, वैसा करना चाहिए, ये करना चाहिए, वो करना चाहिए। परन्तु अंदर से डर आ जाता है कि हमारा क्या होगा! बात इस समय डरने की नहीं है। बात इस समय है ध्यान से काम करने की। शांति से काम करने की ताकि यह जो समय है इसका हम पूरा-पूरा फायदा उठाते हुए आनंद से, आराम से सुरक्षित रूप में यह समय चला जाये और जो अगला समय आने वाला है, जिसमें यह महामारी की जो बीमारी है इसका कोई हल निकल जाए, तबतक की बात है। बात सिर्फ तबतक की है। तो किस प्रकार, कैसे यह संभव होगा ? यह समझने की जरूरत है।

इसके लिए और लोग बताते हैं, यह करो, वह करो, बाहर से ये करो, आइसोलेशन होना चाहिए, ये होना चाहिए, सब ठीक है। इससे हम सहमत हैं। परन्तु यह आराम से कटे, यह आनंद से कटे, यह कैसे होगा ? इसके लिए आपको अपनी जरूरत है, किसी और की नहीं, अपनी जरूरत है। क्योंकि आपके अंदर अच्छाई भी है और बुराई भी है। आपके अंदर वह चीज भी है जो आपको परेशान करती है और आपके अंदर वह चीज भी है जो आपको आनंद से विभोर कर दे। अब बात यह है कि हमको इसमें से एक चूज़ (choose) करना है। एक पसंद करना है। अब वह कैसे करेंगे ?

देखिये! हर एक चीज धीरे-धीरे होती है। एक कहानी है और मैं सुनाता हूँ आपको। एक बार एक आदमी रोड पर जा रहा था। तो बाजार से निकला तो उसने देखा कि तरह-तरह की दुकानें है। कोई यहां दुकान है; कोई वहां दुकान है। कोई सब्जी बेचता है; कोई मिठाई बेचता है। कोई साड़ियां बेचता है; कोई कुछ बेचता है। तरह-तरह की दुकानें है। ऐसे ही चलता गया, चलता गया, चलता गया और उसको, जब वह एक जगह पहुंचा तो एक दुकान थी और बड़ी अजीब सी दुकान और ऊपर लिखा हुआ — यह जो डिवाइन है, जो दिव्य है, जो अनंत है, यह उसकी दुकान है। जो दिव्य है, उसकी दुकान है। मतलब यहां दिव्य बेचा नहीं जाता है, यह दिव्य जो है, यह उसकी दुकान है। अब उसने ऐसी दुकान कभी पहले देखी नहीं थी, तो वह गया और बाहर जैसे खिड़की बनाते हैं और खिड़की में चीजें लगाते हैं दुकानदार, तो वहां कुछ लगा हुआ नहीं था। उसने अंदर झाकने की कोशिश की, देखने की कोशिश कि कोई है, कुछ नहीं दिखाई दिया उसको। पर दरवाजा था, तो वह दरवाजे से अंदर गया।

अब जैसे ही वह अंदर पंहुचा तो इतनी विशाल अंदर से दुकान कि पूछो मत! और बाहर से तो जितनी बड़ी लगे वो लगे। पर अंदर वह इतनी बड़ी कि पूछो मत। उसको बड़ा अचम्भा हुआ। खैर, थोड़ा आगे चला तो एक व्यक्ति आया कि "मैं आपकी मदद कर सकता हूँ।"

तो उसने कहा — "हां! यह — क्या बेचते हैं आप यहाँ ?”

कहा — "जी यह जो दिव्य है, जो अनंत है, जिसने सारे संसार की रचना की है। यह उसकी दुकान है।” और यहां क्या बेचा जाता है ? यहां बेचा जाता है शांति, यहां बेचा जाता है आनंद, यहां आपको मिलेगा वह असली चीज, जो सत्य आपके अंदर है, यह उसकी दुकान है।

तो उसने कहा — “कोई नमूना है आपके पास ?”

कहा — “हां! आइये, देखिये!”

वह ले गया तो वहां आलमारी बड़ी-बड़ी लगी हुईं हैं, बड़ी-बड़ी, बड़ी-बड़ी। और उनमें बहुत सुंदर जैसी चीजें सजी हुई हैं। अब उसका वर्णन भी करना मुश्किल है। पर रंग-बिरंगे उनके रंग और अति सुन्दर और बड़ी-बड़ी ऐसी चीजें वहां लगी हुई हैं।

तो पूछा उसने कि "यह क्या है ?"

तो कहा कि "यह शांति है, दूसरी तरफ एक चीज कोई और थी उसकी तरफ देखकर उसने कहा, यह आनंद है, यह स्पष्टता है, तो ऐसे करके उसने दिखाया।”

तो उसने कहा, "यह तो बहुत सुन्दर है।"

कहा, "बिलकुल सुंदर है। इनसे सुन्दर मनुष्य के लिए और कोई चीज ही नहीं है।"

तो उसने कहा, "मैं यहां से ये चीजें खरीद सकता हूँ।"

कहा, "बिलकुल!"

तो उसने कहा, "कितनी खरीद सकता हूँ ?"

कहा, "जितनी आपको चाहिए।"

कहा, "कितने की है?"

कहा, "मुफ्त! कोई पैसा नहीं।"

वह सोचने लगा, बाप रे बाप! ये सारी चीजें, ये आनंद, ये शांति, ये सुख, ये स्पष्टता, ये सारी चीजें मैं यहाँ से खरीद सकता हूँ, ले जा सकता हूँ और बिलकुल मुफ्त में और जितनी मेरे को चाहिए उतनी। यह तो बहुत ही बढ़िया बात है।

तो उसने कहा, "मेरा आर्डर ले लो। और मैं चाहता हूँ कि ये जो चीजें हैं, यह मैं अपने बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए, अपनी पत्नी के लिए, अपने मित्रों के लिए, जो मेरे रिश्तेदार हैं उनके लिए, सबके लिए मैं चाहता हूँ, तो आप सबके लिए 20-20, ये जो हैं, सब पैक कर दीजिये।”

उसने कहा, "बिलकुल! मैं अभी आता हूँ।" तो वह व्यक्ति चला गया।

15-20 मिनट के बाद वह आया। और छोटे-छोटे डब्बे उसके पास थे। तो उन डब्बों को उसने उस व्यक्ति को दिया कि "यह जो आपका आर्डर है यह इसमें है।"

उसने कहा, ये तो — ये बाहर तो बड़ी-बड़ी हैं और ये आपने इनको छोटे-छोटे डब्बों में कैसे भर दिया ?

तो उसने कहा, "जी! यह सिर्फ बीज हैं, बीज, उन चीजों के। आपके अंदर जो आनंद है, आपके अंदर जो स्पष्टता है, यह उनके बीज हैं। जाइये और दीजिये इन बीजों को जिसको भी आप देना चाहते हैं। और वो इन बीजों को बोयें। तब जाकर ये सुंदर-सुंदर चीजें उन बीजों से उत्पन्न होंगी।"

यह कहानी बहुत सुन्दर है। मेरे को अच्छी लगती है। क्यों ? क्योंकि इन चीजों के बीज ही मिलेंगे हमको। बस! बीज और यह बीज हमारे अंदर हैं। परन्तु कभी हमने इन बीजों को बोया नहीं, तो कैसे हम फल की कल्पना कर सकते हैं। कैसे हम फल की आशा कर सकते हैं। अगर इन बीजों को कभी हमने बोया ही नहीं। हमनें कभी यह समझा ही नहीं कि इन चीजों को अगर हम अपने जीवन के अंदर चाहते हैं, तो इसको बोना पड़ेगा। और इन परिस्थितयों में ये चीजें और भी जरूरी हो गयी हैं। अब क्या करोगे, अब क्या करोगे ?

मतलब पहले तो यह है कि, "जी! मेरे को बढ़िया फोन चाहिए, मेरे को बढ़िया कार चाहिए, मेरे को बढ़िया मोटरसाइकिल चाहिए, मेरे को बढ़िया ये चाहिए, मेरे को बढ़िया वो चाहिए।" ले आओ बढ़िया सबकुछ, उससे तो यह परिस्थिति बदलेगी नहीं। अगर तुम नया फोन भी ले आये, तो उससे परिस्थिति तो बदलेगी नहीं। तो सारी टेक्नोलॉजी, सारे आविष्कार, जितने भी सबकुछ हो रहा है बाहर कि "अब ये होगा, अब वो होगा, ये होगा, वो होगा!" सारी पॉलिटिक्स, वो कुछ नहीं कर सकती। सारी मूवी इंडस्ट्री, वो कुछ नहीं कर सकती। बड़े-बड़े बलवान लोग, बड़े-बड़े धनवान लोग, वो कुछ नहीं कर सकते — यह तो महामारी है।

हां! आप कुछ कर सकते हैं अपने लिए। क्योंकि आप अपने लिए आनंद ला सकते हैं। और आनंद लाने के लिए, अपने अंदर स्थित ये जो चीजें हैं, इनके बीज बोना बहुत जरूरी हैं। बोओ, इन बीजों को बोओ! ताकि ये बीज उत्पन्न होकर तुमको बढ़िया से बढ़िया फल दे सकें। सुंदर बात यह है कि इस बीज के लिए मौसम की जरूरत नहीं है। इस बीज को बोओ। इसमें बढ़िया से, जो तुम्हारे अंदर आनंद है उसका पानी दो। जो तुम्हारे अंदर जिज्ञासा है उसका पानी दो। तो ये बीज अपने आप बड़े होंगें। फूलेंगे, फलेंगे ताकि यह समय भी तुम्हारा आनंद से बीत जाये। डर से नहीं, आनंद से बीत जाए। और तुम्हारे जीवन के अंदर एक ऐसा परिवर्तन आ जाए, जो सिर्फ इस मुश्किल समय में नहीं, पर जब भी तुम्हारे जीवन के अंदर मुश्किलें आएं, तुम उन बीजों को, उनके फलों को, उनका सेवन कर के अपनी जिंदगी के अंदर वाह-वाह कर सको। सबसे बड़ी बात यह है।

डर से कुछ नहीं होगा, डरने से कुछ नहीं होगा। जहां बात है हिम्मत की, तो हिम्मत से बहुत कुछ होगा। जहां बात है कि स्पष्ट होकर के जो व्यक्ति चलेगा आगे, वह कहीं न कहीं पहुंचेगा। जो डरेगा, कहीं नहीं जाएगा। उसके लिए कुछ नहीं है। तो ये चीजें, इन चीजों का ज्ञान होना, इन चीजों को समझना। क्योंकि हम अपने जीवन के साथ करते क्या हैं ? करते ये हैं कि किसी और की जिम्मेवारी — या तो भगवान की, "हे भगवान! तू ही चला गाड़ी। मेरे को नहीं चलानी।"

यह तो वही वाली बात हो गयी कि तुम चढ़े बस में, कहीं तीर्थ यात्रा पर जा रहे हो, भगवान के दर्शन करने के लिए जा रहे हो, ड्राइवर भी बड़ा भक्त है और ड्राइवर कहता है, "अब भगवान ही गाड़ी चलाएगा मैं तो चलाऊंगा नहीं और स्टीयरिंग व्हील छोड़ दे।" तो क्या होगा ? उसका नतीजा अच्छा नहीं होगा। क्योंकि यह जो मनुष्य शरीर तुमको मिला है, यह तुमको दिया गया है। इस बात को याद रखो, यह तुमको दिया गया है। इसकी जिम्मेवारी तुम्हारी है। और करना क्या है ? करना यह है कि जो आनंद है और मैं एक उदाहरण और देता हूँ, तो हो सकता है इस उदाहरण से आपको समझ में आये मैं क्या कह रहा हूँ —

कोई आपके पास आता है और आपसे कहता है, "आपकी लॉटरी लग गयी।" और लॉटरी क्या है कि एक शॉपिंग मॉल है, जहाँ बहुत सारी दुकानें हैं, हर एक तरह की दुकान है। खाने की दुकानें हैं, कपड़े की दुकानें हैं, चीजों की दुकानें हैं, घड़ियों की दुकानें हैं, ज्वेलरी की दुकानें हैं, साड़ियों की दुकानें हैं, सूटों की दुकानें हैं, टाईयों की दुकानें हैं, जूतों की दुकानें हैं, हर एक चीज की दुकान हैं वहां। और आप उस जगह जा सकते हैं और जो चाहें आप उस शॉपिंग मॉल में ले सकते हैं। परन्तु एक शर्त है, जब आप उस शॉपिंग मॉल से बाहर निकलें, तो आप कोई भी चीज जो उस शॉपिंग मॉल में आपने ली है, उसको अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब क्या करेंगे आप ? और एक निश्चित समय है इस समय में आप जाएं, उस शॉपिंग मॉल में जाएं और जो आपको अच्छा लगे आप ले सकते हैं। परन्तु जब समय पूरा होगा, आपको उस शॉपिंग मॉल से निकलना पड़ेगा और जब शॉपिंग मॉल से आप निकलेंगे, तो आप अपने साथ कोई भी चीज जो आपने ली है, वह अपने साथ ले जा नहीं सकते। तब करेंगे तो क्या करेंगे ?

मतलब मेरा यह कहने का है, अपने साथ तो कुछ ले जा नहीं सकते, तो फिर फायदा क्या हुआ ? तो कई लोग हैं, वो कहते हैं कि हम काहे के लिए जाएं वहां ? नहीं! जाएं और खूब आनंद लें, जितना आनंद ले सकते हैं उतना आनंद लें और फिर जब समय आये, ठीक है! छोड़कर वापस अपने घर जाएं। इस उदाहरण का तुक क्या हुआ ?

यह जो संसार है, जिस संसार में आप हैं, यह है वो शॉपिंग मॉल। और आपकी लॉटरी लग गयी। और लॉटरी क्या है कि आएं हैं आप इस शॉपिंग मॉल में और आप हर एक चीज का आनंद ले सकते हैं। पर जब जाने का समय होगा, अपने साथ कोई चीज ले जा नहीं सकते। तब आप क्या करेंगे ? यह कानून है। आप तो ऐसे इकट्ठा कर रहे हैं जैसे कि इसको साथ ले जाएंगे। पर ले जा नहीं सकते, तो करेंगे तो क्या करेंगे ?

मतलब, एक ही चीज कर सकते हैं और वह है कि आप अपने जीवन में यहां रहने का पूरा-पूरा फायदा उठाएं। आनंद लें। क्या मेरा जीवन आनंदमय बीत रहा है या नहीं ? यह सवाल भी पूछना बहुत जरूरी है। सबलोग आगे की कमाई की बात करते हैं, परन्तु इस समय की बात कोई नहीं कर रहा है। और इस समय की बात मैं करता हूँ। क्योंकि यह खेल जो है इन दो दीवालों के बीच में, कौन सी दीवालें ? एक दीवाल, जिससे आप आये इस संसार के अंदर और एक दीवाल, जिसके दूसरी तरफ आप जायेंगे तो फिर कहां गए किसी को पता नहीं चलेगा। इन दो दीवालों के बीच में आपके पास जो समय है, इन दो दीवालों के बीच में है सारा खेल। आप दुखी होकर के भी बिता सकते हैं, आप सुखी होकर के भी बिता सकते हैं। इससे समय के ऊपर कोई अंतर नहीं पड़ेगा। इसको आप आनंदमय होकर के भी बिता सकते हैं और आप इसको रो-रो करके भी बिता सकते हैं। समय का कोई इसमें अन्तर नहीं आएगा। परन्तु यह बात जरूर है अगर इसको आप रो-रो करके बिताएंगे तो आपको दुःख होगा और आप इसको अगर आनंद से बिताएंगे, तो आप ही को आनंद होगा, सुख मिलेगा।

मैं चाहता हूँ कि आपके जीवन में सुख हो। मैं चाहता हूँ कि इस परिस्थिति में भी, जो इतनी गंभीर परिस्थिति है ये, इसमें भी आपके जीवन में आनंद होना चाहिए। और आनंद संभव है और आनंद आपके जीवन में होना चाहिए। उससे आप अच्छी तरीके से, साफ-साफ रूप से देख सकेंगे, डरकर नहीं पर आनंद से कि क्या आपको आगे करना है! कैसे आपको सब्र रखनी है! कैसे आपको हिम्मत से काम लेना है! ये चीजें इस समय बहुत जरूरी हैं। अब यह मज़ाक की बात नहीं रह गयी, यह कोई लक्ज़री की बात नहीं है, यह कोई ऑप्शन की बात नहीं है कि "हां, ठीक है भाई! अब बता दो क्या है, नहीं है, ऐसा है, वैसा है।"

हमारे पास — अब लोग तो कहते थे, जब हम कहते थे कि, "तुम्हारे अंदर शांति है, शांति को जानो!"

लोग कहते थे, “अजी! हमारे पास इन चीजों के लिए टाइम नहीं है।”

अब तो है! अब तो टाइम है, अब क्या कर रहे हो, अब कहाँ भाग रहे, किसके पीछे भाग रहे हो, किसके पीछे दौड़ रहे हो ? अब तो यह हाल हो जाएगा कि खुद बैठे-बैठे लोग कहेंगे कि "क्या करूँ मैं ?” परेशान हो जाएंगे, अपने आप से परेशान हो जाएंगे। जब मनुष्य अपने आप से परेशान होने लगेगा, तो फिर और परेशान करने के लिए किसकी जरूरत पड़ेगी ? किसी की भी नहीं! और हमको तो इस बात का एहसास है। हम तो जातें हैं, जगह-जगह जाते हैं, जेलों में जाते है और वहां जिंदगियों को बदलते हैं। वहां तो — वह तो हमेशा ही लॉकडाउन रहता है वहां तो। कहीं जा ही नहीं सकते। वहां हम बदलते हैं लोगों की जिंदगियों को। और कैसे बदलते हैं ? यही कि — "जिस अच्छाई की तुमको जरूरत है, जिस अच्छाई को तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे अंदर है" — ऐसे बदलते हैं।

और यही सन्देश हम चाहते हैं कि आप भी सुनें, क्योंकि आपके जीवन के अंदर भी आनंद होना चाहिए। और अगर वह आनंद होगा, तो आप अच्छी तरीके से, डर से नहीं, डर से तो आँख बंद होती हैं। और जब हिम्मत होती है, तो आँख खुलती हैं। क्या करना है, क्या नहीं करना है! आपको समझना है कि "एक, किसी को यह बीमारी दें ना, अगर आपको लगी हुई है यह बीमारी तो, किसी को दें ना और किसी से लें ना!"

जो आइसोलेशन है, लॉकडाउन है, ये वैज्ञानिकों का, डॉक्टरों का यही कहना है कि, भाई! ऐसा करने से बीमारियां कम फैलेंगी। हाथ धोइये, हाथ धोइये और एक -दूसरे से कम से कम इस समय में 6 फीट का जो डिस्टेंस है, 6 फीट की जो दूरी है, वह बनाकर रखिये।

ये तो हुई — ये चीजें तो आपको उस बीमारी से बचाएंगी, परन्तु एक और बीमारी लग रही है न, वो बोर्डम (Boredom) की बीमारी उससे कौन बचाएगा ? कन्फ्यूश़न (confusion) की बीमारी, भ्रमित होने की बीमारी, उससे कौन बचाएगा ? तो उसके लिए आपको अपनी जरूरत है। आपको अपनी जरूरत है। तो इस बात का ख्याल रखिये, आनंद से रहिये। फिर मैं आपसे बात करूँगा इस वीडियो के द्वारा। तब तक के लिए मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 5 00:17:59 लॉकडाउन 5 Video Duration : 00:17:59 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (28 मार्च, 2020)

प्रेम रावत जी:

हमारे श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार! आज फिर मौका है और आप लोगों के कुछ प्रश्न आये हैं, तो मैं उनका जवाब देने का प्रयास करूंगा।

कोरोना वायरस से जो माहौल हो रहा है और लोग डरे हुए हैं उनके लिए आपका क्या सन्देश है और कैसे हम अपने आपको बचा सकते हैं ? — यह शीला ने कक्षा 11 से भेजा है।

बड़ा अच्छा सवाल है कि सचमुच में लोग डरे हुए हैं। पर मैं दो-तीन बातें कहना चाहता हूँ डर के मामले में। एक तो, डरने से आप क्या सोचते हैं क्या ठीक हो जायेगा ?

देखिये! अगर कोई आपके परिवार में बीमार हो गया और आप वहां बैठ-बैठे कह रहे हैं "यह बीमार हो गया, यह बीमार हो गया, यह बीमार हो गया, यह बीमार हो गया! बाप रे बाप! यह बीमार हो गया!" तो आपके ये बार-बार उच्चारण करने से — यह बीमार हो गया, यह बीमार हो गया, आप समझते हैं वह ठीक हो जाएगा ? नहीं! उसको वैध के पास ले जाइये, उसको डॉक्टर के पास ले जाइये, तब जाकर वह ठीक होगा। ठीक इसी प्रकार से, डरने से कोई चीज सॉल्व नहीं होती है। डरने से कोई चीज बदलती नहीं है। नुकसान जरूर होगा और जब आप डरेंगे, तो यह एक — यह समझिये कि आपके शरीर के ऊपर यह एक टैक्स है। और इससे आपका शरीर और खराब होगा।

यह समय है इस बीमारी से बचने का। तो मैं तीन-चार चीजें कहना चाहता हूँ। डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि बहुत छोटी-छोटी चीजें अगर आप करें, तो आपको यह बीमारी नहीं लगेगी। क्या करना है ?

एक तो, अपने आपको साफ-सुथरा रखिये, अपने हाथ को धोइये। अब देखिये, यह तो हमेशा ही होना चाहिए कि आदमी अपने आपको साफ-सुथरा रखे। परन्तु हमलोग रखते नहीं हैं। दूसरी चीज, अपने मुँह को, नाक को, आँख को, इनको मत छुओ, इनको मत छुओ। और अगर किसी को यह बीमारी है, और मैं लोगों से यही कहता हूँ, "अगर तुमको यह बीमारी है तो किसी को यह बीमारी दो मत और किसी से यह बीमारी लो मत।"

इतना लिहाज़ रखो, आनंद से रहो, हर एक दूसरे व्यक्ति से, कम से कम 6 फीट, 6 फीट का डिस्टेंस (distance) की दूरी में रहो, ताकि उसको है अगर यह बीमारी, तो यह तुम तक न पहुंचें। कोरोना वायरस — जो जुकाम, सर्दी में जुकाम होते हैं, यह वही वायरस है। परन्तु यह पर्टिक्यूलरली (particularly) जो वायरस है, कोरोना वायरस, ये वाली — यह पहले जानवरों में थी, पर मनुष्य में पहले कभी नहीं आयी। और इस बार यह मनुष्यों में पहली बार आयी है। इसलिए लोग बीमार हो रहे हैं, क्योंकि उनकी जो इम्यून (immune system) सिस्टम है, वह काम नहीं कर रहा है इसके लिए। परन्तु जो लोग बीमार भी हो जाते हैं इससे, अगर और कोई कॉम्प्लीकेशन (complication) न हो, तो यह ज्यादा बीमार — मतलब यह नहीं है कि इससे ज्यादा दुःख होगा या इससे ज्यादा दर्द होगा या नहीं! बड़ा लाइट सिम्प्टंस (symptoms) रहते हैं, हल्के सिम्प्टंस रहते हैं और हफ्ते में, पांच दिन में, हफ्ते में, दो हफ्ते में लोग ठीक हो जाते हैं।

तो डरने की कोई बात नहीं है। अगर आप थोड़ा सा लिहाज़ करें और लिहाज़ यह है कि लोगों से 6 फीट की दूरी बनाये रखें कम से कम और अगर आप आइसोलेशन में हैं, अपने घर में हैं, तो एक-दूसरे से मिल-जुलकर रहिये। एक-दूसरे को रिसपेक्ट (respect) दीजिये। एक-दूसरे को स्पेस (space) दीजिये, थोड़ी दूरी दीजिये ताकि सबकुछ ठीक तरीके से हो सके। और सबसे बड़ी बात अगर किसी को यह बीमारी है तो वह आइसोलेट में रहें, आइसोलेशन में रहें। और जिनको नहीं है, वह अपने हाथ साफ रखें, अपने मुँह को नहीं छुयें, अपने नाक को नहीं छुयें, अपनी आँखों को नहीं छुयें। अगर इतना आप यह लिहाज़ रखेंगे और ऐसी जगह नहीं जायेंगे कि जहां कोई छींक रहा है, कोई खांस रहा है और हवा में वह वायरस है, सस्पेंडेड (suspended) तो आपको चिंता करने की कोई बात नहीं है।

तो इन थोड़ी-सी चीजों का ख्याल रखिये जैसे, आप जब रोड क्रॉस करने के लिए जाते हैं, रोड के एक तरफ से दूसरी तरफ जाते हैं, तो आपको कुछ चीजों का ख्याल रखना पड़ता है कि गाड़ी आ रही है या नहीं आ रही है, देखें, देखकर चलें। और अगर आप देखकर नहीं चलेंगे तो कोई मुसीबत आएगी।

ठीक इसी प्रकार इस वायरस से भी, इस समय में बचने के लिए बहुत ही थोड़ी-सी सावधानी बरतनी है कि हम अपना डिस्टेंस (distance) बनाकर रखें; अपने हाथ साफ करें; नाक, मुँह, आँखों को न छुएं इन हाथों से। और जब हाथ साफ करें तो उसको कम से कम 20 सेकंड के लिए हाथ को धोयें, अच्छी तरीके से, तब जाकर के पानी दें। साबुन जो है, वह एक ऐसी चीज है कि एक तरफ वह फैट को पकड़ता है, जो चर्बी है उसको पकड़ता है, दूसरी तरफ वह पानी को पकड़ता है। तो वह दोनों में एक लिंक बना देता है और यह कोरोना वायरस जो है, यह आर एन ए है, फैट से लिपटा हुआ, चर्बी से लिपटा हुआ, तो जो साबुन है, वह एक तरफ पानी को पकड़ता है और एक तरफ चर्बी को पकड़ता है। जिसमें आर एन ए इसका लिपटा हुआ है और फिर जब आप इसको पानी से धोते हैं, तो वह उस वायरस को धो देता है।

तो वह वायरस आपके हाथ से चली जाती है। बस इतना ही आपको सावधानी बरतनी है। और आनंद लीजिये। इस समय में भी आनंद लीजिये। क्योंकि आनंद आपके अंदर है। यह आपके पास मौका है। चिंता करने का नहीं। कहा है —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास

और जो चितवे नाम बिनु, सोई काल की फांस

चिंता करनी है तो, जो स्वांस आपके अंदर आ रहा है, जा रहा है, यह व्यर्थ न जाये इसकी चिंता कीजिये, आनंद लीजिये। तो मेरे को यही आशा है कि आपको इसका जवाब मिल गया।

जब कोई अपना सारा प्रयास करे, तब भी सफलता न मिले तो कैसे अपने आपको दिलासा दें ? — यह लता जी ने पूछा है। यह रेवाड़ी, हरियाणा से हैं।

देखिये, आपने पहले ही एक फोटो बना रखी है अपने दिमाग में। अगर मैं ऐसा, ऐसा, ऐसा करूँ, तो ये, ये, ये मेरे लिए संभव हो जाएगा। इस फोटो को फाड़ दीजिये, इस फोटो को फाड़ दीजिये। देखिये! जब आप किसी को देखें, कोई फुल्का बना रहा है, रोटी बेली, ऐसे किया (हाथ थपथपाते हुए) और तवे के ऊपर रख दिया। तवे के ऊपर रख तो दिया, पर अगर तवे के नीचे आंच नहीं है, तो क्या होगा ? वह फुल्का, वह रोटी पकेगी नहीं। तो उसको देखा जाता है, उसको ऐसे करके देखते हैं नीचे उसके कि यह तैयार हुई या नहीं ? अगर तैयार नहीं हुई तो आग ज्यादा तेज नहीं है इसका मतलब। तो आप एक लकड़ी का टुकड़ा और डालेंगे या उस लकड़ी को इधर-उधर करेंगे ताकि आग और बढ़े ताकि वह रोटी पक पाए।

आप कह रहे हैं कि मैंने आग हिलाई, मैंने लकड़ी को हिलाया, परन्तु फुल्का अभी भी पक नहीं रहा है। अगर नहीं पक रहा है तो क्या करेंगे आप ? और लकड़ी डालेंगे, मतलब तो लकड़ी का नहीं है, मतलब तो है फुल्का पकने का। जब आप कह रहे हैं कि आपने सारा परिश्रम किया और फिर भी आपको सफलता नहीं मिली। और परिश्रम कीजिये! यह तो आप कर सकते हैं। परिश्रम तो आप कर सकते हैं। यह नहीं है कि उसी तरीके का परिश्रम करें, कोई और चीज है उसकी कोशिश करें। नये नज़रिये से देखिये, अपनी समस्या को नये नज़रिये से देखिये।

कई बार मैं लोगों से कहता हूँ। लोग देखते हैं अपनी समस्या को, इतनी बड़ी समस्या मेरे सामने है, पहाड़ है। अरे! पहाड़ के ऊपर जाने की जरूरत नहीं है, पहाड़ के बगल से भी जा सकते हैं। अब लोग हैं, यही समझते हैं कि पहाड़ के ऊपर से ही जाना है। क्यों जाना है ऊपर से, बगल से भी तो जा सकते हैं ? और वह ज्यादा आसान रहेगा। तो जब कभी कोई समस्या आती है, अपने हौसले को न खोयें। हमेशा याद रखें कि अगर आपका हौसला बना हुआ है, तो आप फिर कोशिश कीजिये, फिर कोशिश कीजिये। जबतक यह स्वांस आपके अंदर है, जबतक यह जीवन आपकी दुनिया में है, जबतक आप जीवित है इस दुनिया में आप हौसला न भूलिये, मेहनत कीजिये।

मेरे को आशा है कि आपको अपने प्रश्न का जवाब मिला होगा।

नया सवाल है — मैं पांच साल से बहुत परेशान हूँ। शारीरिक रूप से परेशानी बढ़ रही है, कम नहीं हो रही है। दवाई भी काम नहीं कर रही है। मेरी दो बेटियां हैं और मैं बहुत गरीब हूँ। कोरोना तो अब एक और संकट लेकर आ गया है, बीमारी के कारण सभी मुझसे नफरत करते हैं।

देखिये! यह बहुत ही शर्मिंदा बात है। एक तो यह कि लोग आपसे नफरत कर रहे हैं। आपकी परिस्थितियों को नहीं समझ रहे हैं। खैर! वो समझें न समझें। आप अपने आपसे नफरत मत कीजिये। वो आपसे नफरत कर रहे हैं, वह बात अलग है। आप अपने से नफरत मत कीजिये। कई बार हम समझते हैं और वही बात आती है कि — "लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे ?!"

लोगों के पास टाइम नहीं है हमारे बारे में सोचने का। एक बार मैं साउथ इंडिया में एक जेल में गया, तो वहां लोगों को मैं सम्बोधित कर रहा था। तो वही बात आयी। एक आदमी उठा, उसने हाथ ऊपर किया कि मैं — थोड़े दिन में मैं छूटने वाला हूँ, जेल से और अपने गांव वापिस जाऊंगा। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे ?

मैंने कहा कि मैं सच बात तेरे को बताऊँ, और वह बात यह है कि कोई तेरे बारे में नहीं सोच रहा है, सब अपने बारे में सोच रहे हैं। लोगों के पास वो समय नहीं है। मैं अगर किसी तरीके से मदद कर सकता हूँ, तो मैं मदद करने के लिए तैयार हूँ। कई डॉक्टर हैं उनकी टीम बनी हुई है, जो हो सकता है कि आपकी मदद करें। आप हरदोई से हैं, उत्तरप्रदेश से हैं। अगर आपका पता है हमारे पास तो या फिर हम — आर वी के से कहीं संपर्क आप कर लें, तो जो कुछ भी हम आपकी मदद कर सकते हैं, हम करेंगे। पर अपने आपसे नफरत मत कीजिये।

देखिये! बुरा समय सबका आता है। अगर आपको बुरे समय की कोई चिंता है, तो भगवान राम के बारे में सोचिये। उनके जीवन में क्या-क्या नहीं हुआ। एक तो बहुत ही बाल-अवस्था में उनको ले गये। ताकि वह राक्षसों को मारें। फिर उनकी शादी हुई, फिर उनका राज्याभिषेक होना था। और जिस दिन उनका राज्याभिषेक होना था, उसी दिन उनको क्या दिया गया ? इनका राज्याभिषेक नहीं होगा और इनको चौदह वर्ष का वनवास दे दो। चौदह वर्ष का वनवास! सीता माता के साथ!

सीता माता को भगवान राम ने कहा, "तेरे को आने की जरूरत नहीं है।"

तो उन्होंने कहा, "क्या कह रहे हैं आप? मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ, कैसे नहीं आउंगी आपके साथ।"

तो वो भी — और लक्ष्मण, लक्ष्मण ने कहा, "मैं आपके बिना तो रह नहीं सकता, तो मैं भी आपके साथ आ रहा हूँ।" तो इन तीनों ने, ये तीन गए।

और एक बार जब युधिष्ठिर — यह बात है तब की, जब ऋषि मार्कण्डेय के आश्रम में युधिष्ठिर थे, तो युधिष्ठिर एक दिन बहुत ही डिप्रेस्ड (depressed) हो रखे थे। जैसे कि मेरे को लगता है आप डिप्रेस्ड हैं।

डिप्रेशन हो गया, तो मार्कण्डेय ने कहा — "क्या बात है युधिष्ठिर ?"

तो कहा — "जी! मैं तो बहुत अभागा हूँ। मेरे को तो इतने साल का वनवास हो गया, ये हो गया, मैंने ये खो दिया, मैंने वो खो दिया।" मार्कण्डेय ने कहा — "तेरे को भगवान राम की बात याद नहीं है।"

कहा— "नहीं! मेरे को नहीं मालूम कौन थे वो!"

कहा — मैं बताता हूँ, कौन थे वो।

"अरे! ये जो तू अपने राज-पाट को हारा है, वह तो तेरी करनी थी। तैंने हारा। तू जुआ खेलने के लिए गया था। परन्तु भगवान राम ने तो कुछ किया भी नहीं था और उनको चौदह वर्ष का वनवास हो गया। चौदह वर्ष का वनवास, मतलब राजा की तरह रह रहे थे वह ?

नहीं! कुटियों में रह रहे थे। क्या पहन रखा था ?

लकड़ी के छिलके के कपड़े पहने हुए थे। और जैसे जंगल में लोग रहते हैं, वैसे वह रह रहे थे। जो कुछ भी खाने-पीने के लिए था, वह जंगल से ही इकट्ठा करते थे।

तो बुरा समय भी आता है, अच्छा समय भी आता है। अच्छे समय में बुरे समय की तैयारी करो और बुरे समय में अच्छे समय की तैयारी का जो फल है, उसको खाओ और बुरे समय को ऐसे बिता दो अपने जीवन में।

तो कुछ भी हम मदद कर सकते हैं, तो हम मदद करने के लिए तैयार हैं।

यह चौथा प्रश्न है, यह आया है रमन पांडेय जी से, कानपुर, उत्तरप्रदेश से।

आप कहते हैं, "दिल की सुनो, दिमाग की नहीं।" कभी-कभी लगता है कि दिल भी सही बोल रहा है और दिमाग भी सही बोल रहा है। ऐसे में हम क्या करें ?

अब यह तो समस्या सभी के साथ है। हम यह नहीं कहते हैं कि दिमाग की मत सुनो। हम यह नहीं कह रहे हैं। हम यह कहते हैं कि — दिल की भी सुनो — भी,भी — मूल शब्द इसमें है, भी। 'दिल की भी सुनो, हृदय की भी सुनो।’

क्योंकि लोग हृदय की बात नहीं सुनते हैं। सिर्फ अपने मन की बात सुनते हैं, अपने दिमाग की बात सुनते हैं। दिमाग, इस दुनिया के लिए है। हृदय, यह तुम्हारे लिए है।

तुम्हारा और उस आनंद का संबंध इस हृदय से है। दुनिया और दुनिया के आनंद का संबंध, तुम्हारे दिमाग से है। तो, यह छोटी-सी बात है। इसमें दुविधा की बात नहीं है। दुनिया के बारे में, दिमाग और सच्चिदानंद के बारे में, हृदय। बस! इसमें दोनों एक ही चीज के लिए कम्पीट (compete) नहीं कर रहे हैं। इसमें अलग-अलग है। और जब ऐसा है तो इसका आनंद लेकर अपने जीवन को सफल करें।

तो अभी कुछ और प्रश्न बाकी हैं और मैं उन प्रश्नों का जवाब भी दूंगा। सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 4 00:17:13 लॉकडाउन 4 Video Duration : 00:17:13 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (27 मार्च, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार! आज के दिन मैं आपको एक भजन पढ़कर सुनाना चाहता हूँ, जो कबीरदास जी का भजन है —

चंदा झलकै यहि घट माहीं, अंधी आँखन सूझे नाहीं ॥

इसी घट में वह चन्द्रमा झलकता है, मतलब प्रकाश का जो स्रोत है वह आपके अंदर है। पर, क्योंकि ये आँखें अंधी हैं आपको दिखाई नहीं दे रहा है।

यहि घट चंदा यहि घट सूर, यहि घट गाजै अनहद तूर, अनहद तूर ॥

इसी घट में चंदा है, इसी घट में सूरज है और इसी घट में बज रहा है वो, बिना बजाये जो बजता है। बजाने वाला कौन है उसको ? कोई गायक नहीं है, कोई म्यूज़िशियन (musician) नहीं है, परंतु वह बज रहा है।

यहि घट बाजै तबल-निशान, बहिरा शब्द सुने नहि कान ॥

क्योंकि कान जो हैं वो बहरे हैं, उनको सुनाई नहीं दे रहा है।

जब लग मेरी मेरी करै, तब लग काज एकौ नहि सरै ॥

जबतक मेरा-मेरी करते रहोगे, तबतक कुछ बनेगा नहीं। कुछ काम नहीं होगा। मेरा-मेरी, यह मेरा है, मेरा है, यह मेरा है, यह मेरा है, मेरे को क्या होगा, मेरे से क्या होगा, मेरे को क्या होगा इस परिस्थिति में! यह जो मेरा-मेरी है, यह सिर्फ चीजों को लेकर ही नहीं है, परन्तु परिस्थितियों को लेकर भी है। और इस परिस्थिति में सब अपने बारे में सोच रहे हैं, सब अपने बारे में सोच रहे हैं कि मेरा क्या होगा, मेरा क्या होगा, मेरा क्या होगा, मेरा क्या होगा! परन्तु कोई, जो सारा समाज है उसके बारे में कोई नहीं सोच रहा है। क्योंकि जबतक यह मेरा-मेरी रहेगी, तो एक भी काम बनेगा नहीं।

जब मेरी ममता मर जाय, तब प्रभु काज सँवारै आय॥

जब यह ममता खत्म हो जाती है, तब उस दया से, प्रभु की कृपा से कार्य सुलझ जाते हैं।

ज्ञान के कारन करम कमाय,

ज्ञान को पाने के लिए लोग कोशिश करते है, कर्म कमाते हैं।

होय ज्ञान तब करम नसाय ॥

जबतक ज्ञान नहीं होगा तबतक कर्म खत्म नहीं होंगें, इनका जो फल है वह खत्म नहीं होगा।

फल कारन फूलै बनराय,

फल कारन — फल के कारण जंगल में, पेड़ों में फूल आता है।

फल लागै पर फूल सुखाय ॥

जब फल लगने लगता है तो जो फूल हैं उसको जाना पड़ता है। इसी प्रकार समझें कि —

मृगा हास कस्तूरी बास,

जैसे मृग के नाभि में कस्तूरी है और वह सारे जंगल में खोजता रहता है।

आप न खोजै खोजै घास ॥

घास को सूंघता है।

तो इसका तुक क्या हुआ और मैंने क्यों ये पढ़कर सुनाया आपको यह भजन ? क्योंकि मैंने जो नई किताब लिखी है, उसमें भी यह भजन मैंने दिया है इसका ट्रांसलेशन अंग्रजी में।

मतलब है कि, इसी घट के अंदर, तुम्हारे अंदर ये सारी सुन्दर-सुन्दर चीजें झलक रहीं हैं। और इसका तुम आनंद उठा सकते हो। बाहर मत खोजो, क्योंकि लोग जब इन परिस्थितियों में दुखी होते हैं, तो इनका यही है कि यह कब खत्म होगा, यह कब खत्म होगा ? कभी भी खत्म हो, हमको तो यही आशा है कि जल्दी ही खत्म होगा। परंतु खत्म कभी भी हो, जब भी हो, आप सुरक्षित रहें यह सबसे बड़ी बात है। और जैसे मैं पहले कह रहा था — "न किसी को ये बीमारी दो; न किसी से ये बीमारी लो!" अगर यह समझ में आ गया तो बहुत अच्छा है।

तो लोगों का मन जो है यह विचलित होता है और यह सोचता है, "अब क्या होगा, अब क्या होगा, अब क्या होगा, मेरे साथ क्या होगा, मेरा क्या होगा, मेरा क्या होगा!" जब तक यह चलता रहेगा, तब तक कोई काम नहीं बनेगा। और जब मनुष्य यह सोचने लगेगा "ठीक है, जो भी परिस्थिति है, इसमें मैं आगे कैसे चलूँ! मेरा उद्धार — इस परिस्थिति में भी मेरा उद्धार हो!"

तो समझने की बात है, देखने की बात है कि क्या उस परमांनद का अनुभव इस परिस्थिति में भी किया जा सकता है या नहीं ? इसका उत्तर स्पष्ट है कि बिलकुल! इस परिस्थिति में भी वह चल रहा है। आपके अंदर वह चांद चमकरहा है, वह सूरज प्रकाश दे रहा है। अगर आप उस बात को स्वीकार कर पाए अपने जिंदगी के अंदर, तो फिर आगे चलने के लिए आपको मजबूर नहीं होना पड़ेगा, दुखी नहीं होना पड़ेगा और आप आनंद से, इस समय में भी आनंद से आप इसको गुजार सकते हैं।

परिवार के साथ अगर आप आइसोलेटेड हैं, तो सभी मिल-जुलकर के इस समय का पूरा-पूरा फायदा उठाएं। कैसे ?

द्वेष से नहीं, क्लेश से नहीं, एक-दूसरे की — "तूने ये कर दिया, तूने ये कर दिया, तूने ये कर दिया, तूने ये कर दिया!" इससे नहीं। एक दूसरे के अंदर जो अच्छाई है उसको बाहर लायें कि तुम्हारे में क्या अच्छाई है, तुम क्या कर सकते हो ? ये नहीं है कि दूसरे की त्रुटियां देखना, दूसरे की मिस्टेक्स (mistakes) को देखना। नहीं! उसकी अच्छाइयों को देखना। यह भी तो समय है और इस समय का पूरा-पूरा फायदा आप उठा सकते हैं।

अपने आपको जानो, यह मैं हमेशा कहता आया हूँ — "अपने आपको जानो, अपने आपको समझो कि आप कौन हैं।" यह मौका है, यह मौका है। जब और चीजें नहीं हो रहीं हैं, तो आप अपने अंदर जाकर के इस चीज का अनुभव कीजिये कि आप कौन हैं । और उससे जो आपको राहत मिलेगी। बात तो राहत की है, अब क्या राहत मिलेगी ? कैसी राहत मिलेगी ? जब आदमी अपने आपको समझने लगता है और वह जानने लगता है कि मेरे अंदर स्थित जो चीज है, वह अनमोल है। मैं एक उदाहरण देता हूँ आपको —

एक डिब्बा है। डिब्बे की क्या कीमत है ? 100 रूपए लगभग! परंतु उस डिब्बे के अंदर एक हीरे की अंगूठी है। और उस हीरे की अंगूठी की कीमत दो करोड़ रूपए है। डिब्बे की कीमत 100 रूपए, हीरे की अंगूठी की कीमत दो करोड़। जबतक वह अंगूठी उस डिब्बे में है, तबतक उस डिब्बे की कीमत क्या है ? आप सोचिये, तबतक उस डिब्बे की कीमत क्या है ? उस डिब्बे की कीमत तबतक वही है, जो उसमें है। जो वह — जबतक वह अंगूठी उस डिब्बे में है, तो उस डिब्बे की कीमत दो करोड़ है। और एक सौ रूपए, जो उसकी कीमत है असली में। क्यों?

क्योंकि अगर किसी को अंगूठी चाहिए और किसको खोजेगा वह ? कहाँ थी ? उस डिब्बे में थी। डिब्बे को खोजो। अंगूठी को नहीं, डिब्बे को खोजो। हरा रंग का डिब्बा है या लाल रंग का डिब्बा है उसको खोजो। और जब वह मिल जायेगा तो वह अंगूठी भी मिल जायेगी। परन्तु जब उसमें से अंगूठी निकल जाती है तब उस डिब्बे की कीमत क्या है ? तब उस डिब्बे की कीमत सिर्फ सौ रूपए है। जबतक आपके अंदर वो स्थित चीज है, जिसके कारण यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है, तबतक आपकी भी कीमत वही है, जितनी कीमत है उस चीज की जो अनमोल है।

तबतक आपकी कीमत भी अनमोल है। पर, जिस दिन वह चीज निकल जायेगी, उस दिन आपकी क्या कीमत रह जाएगी ? यह खाल की खाल; ये हड्डियां की हड्डियां; ये बाल के बाल; ये दांत के दांत; ये खून का खून, ये सब। कोई कीमत नहीं रह जाती है इसकी।

सबसे बड़ी देखने की चीज है, आप जिंदा हैं और जबतक आप जिंदा हैं, तबतक आपकी कीमत वही है, अनमोल! जिसका कोई मोल नहीं। इस बात को समझने के लिए आपको हृदय रूपी दर्पण की जरूरत है। हृदय रूपी मिरर (mirror) की जरूरत है। हृदय रूपी आईने की जरूरत है ताकि आप देख सकें उस आईने में कि आप असलियत में क्या हैं ? संत-महात्माओं ने इसी बात पर ध्यान दिया है। इसीलिए यह कबीरदास जी का भजन —

चंदा झलकै यहि घट माहीं, अंधी आँखन सूझे नाहीं

यहि घट चंदा यहि घट सूर - सूरज

यहि घट गाजै अनहद तूर।।

यही सबकुछ हो रहा है और आपको होश-हवाश नहीं है, आपको यह होश नहीं है कि ये सबकुछ हो रहा है। आप बैठे हैं, अपने कमरे में बैठे हैं या अपने लिविंग रूम में बैठे हैं या अपने बैडरूम में बैठे हैं या कहीं भी बैठे हैं और आपके दिमाग में यह हो रहा है कि "अब क्या होगा या मैं बोर हो गया।" लोग बोर हो जाते हैं! अब अगर किसी के पास टेलीविज़न नहीं है, किसी के पास ये नहीं है, तो चुपचाप बैठे हुए हैं, "कैसे होगा; अब क्या होगा; क्या करेंगे; क्या नहीं करेंगे। बाप रे बाप! उफ्फ! ये तो बहुत हो गया।"

बोर पड़े हुए हैं। बोर्डम, (boredom) बोर्डम आ जाती है और बोर्डम न आये तो ततततततततततत... फ़ोन के ऊपर लगे रहते हैं, टेलीविज़न के ऊपर लगे रहते हैं। कहीं न कहीं, कुछ न कुछ मनोरंजन के लिए, उस मन की ख़ुशी के लिए लगे रहते हैं, जिस मन को आप खुश नहीं कर सकते। वो मन कभी खुश होता नहीं है। उसका तो यह है कि कोई चीज उसको चाहिए वह मिल गयी उसके बाद वह दूसरी चीज चाहेगा। तो लोग बोर हो जाते हैं।

पर संत-महात्मा क्या कह रहे हैं, बोर, बोर —

इस घट झलकै वही चंदा — चंदा भी इसी घट में झलक रहा है, सूरज भी और चांद भी इसी घट में है और इसी घट में बज रहा है अनहद तूर — बिना बजाये जो बज रहा है। इसी घट में है वह ढोल, इसी घट में शब्द सुने नहि कान। इसी घट में सबकुछ हो रहा है। परन्तु आपको हवा ही नहीं है, तो बोर्डम अपने आप होगी। और उसके लिए जिसको यह मालूम है कि यह मेरे अंदर हो रहा है उसको यह भी मालूम है कि मेरे को बोर होने की जरूरत नहीं है। मेरे अंदर तो क्या-क्या नहीं है!

तो यह बात समझें और जैसे मैंने पहले भी कहा, यह हिम्मत से काम लेने का समय है। यह हिम्मत से और सब्र से काम लेने का समय है। सब्र रखिये, क्यों रखिये ? इसलिए रखिये सब्र, क्योंकि यह भी खत्म होगा। एक समय था यह नहीं था, एक समय है जब यह है, एक समय होगा जब यह नहीं होगा। ठीक है, पर सब्र रखिये!

कैसे बीते दिन ? हिम्मत से, हिम्मत से बीते दिन। आनंद से बीते दिन! मैं यह कह रहा हूँ आपसे, मैं आपको सिर्फ यह नहीं कह रहा हूँ कि "भाई! किसी न किसी तरीके से इस दिन को बिता दो। ना! मैं यह कह रहा हूँ आपसे कि ये दिन भी आपका आनंद में बीतना चाहिए, क्योंकि यह आपकी क्षमता है।" चाहे कुछ भी हो, यह तो मैं आपको कह रहा हूँ। आप जेल में नहीं हैं, आप अपने घर में हैं।

जब मैं जेलों में जाता हूँ, लोगों से बात करता हूँ। उनको भी यही मेरे को समझाना पड़ता है कि भाई! एक तो यह बाहर की दुनिया है और एक तुम्हारे अंदर की दुनिया है। तुम अपने अंदर की दुनिया को समझो। बाहर की दुनिया तो तुमने समझ ली और यह भी समझो कि बाहर की दुनिया तुमको वो आनंद, स्थायी आनंद नहीं दे सकती है। जो आनंद है, अगर फिल्म भी देखने को जाओ, जबतक उस फिल्म हॉल में बैठे हो, फिल्म देख रहे हो तबतक आनंद ही आनंद है। हो सकता है कि आधे घंटे के लिए, पंद्रह मिनट के लिए फिल्म देखने के बाद भी तुमको अच्छा लगे। परंतु उसकी भी एक सीमा है, उसके बाद भूलना शुरू कर जाओगे। परन्तु जो अंदर का आनंद है, तुम जहां भी जाओ, कैसे भी रहो, कुछ भी होता रहे, वह आनंद हमेशा बना हुआ है। इसीलिए अपने आपको समझने की कितनी जरूरत है। क्योंकि इतनी बड़ी चीज, इतनी बड़ी बात, मनुष्य इसको खो रहा है।

तो चाहे कोई भी परिस्थिति है, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि यह परिस्थिति अच्छी है, नहीं अच्छी नहीं है। परंतु फिर भी मेरा लक्ष्य क्या है ? क्या मैं इस परिस्थिति में फंसकर दुखी होना चाहता हूँ या इस परिस्थिति में रहते हुए भी मैं सुखी होना चाहता हूं। यही समझने की बात है, यही समझने की बात है! असली चीज क्या है ? मैं असल में क्या चाहता हूँ ? अगर यह बात आपकी समझ में आ गयी कि आप उस चीज को जो आप सचमुच में चाहते हैं, वह अभी भी आपके अंदर है। तो फिर आपका दृष्टिकोण बदल सकता है, इन सारी परिस्थितियों के बारे में।

तो सभी लोगों को मेरा नमस्कार!

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