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लॉकडाउन 21 00:10:57 लॉकडाउन 21 Video Duration : 00:10:57 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (13 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज का दिन जो है मैं कुछ विशेष करने के लिए जा रहा हूं और एक प्रेजेंटेशन है, स्लाइड शो है ताकि मैं आपको दिखा सकूं कि भारतवर्ष में जो कुछ थोड़ी-बहुत हमारी आर्गेनाईजेशन्स हैं — प्रेमसागर फाउंडेशन है; द प्रेम रावत फाउंडेशन है; राज विद्या केंद्र है और यूथ पीस फाउंडेशन है। तो वो — ये जो आर्गेनाईजेशन्स हैं यह क्या-क्या कर रही हैं इस कोरोना वायरस के समय हिंदुस्तान में!

एक तो बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जो आर्गेनाईजेशन्स हैं — यूथ पीस फाउंडेशन है; प्रेमसागर फाउंडेशन है; आर वी के है; टी पी आर एफ है यह लोगों की मदद कर रही हैं। हम उनमें से नहीं हैं जो एक जगह बैठ करके सिर्फ भाषण दें। हम चाहते हैं कि सबका ही भला हो। यह तो स्पष्ट बात है कि —

बिन भोजन भजन न होय गोपाला।

ये लो अपनी कंठी माला।।

यह तो बात स्पष्ट है और इस समय एक मानवता के नाते हम लोगों के लिए जो भी कर पायें वह थोड़ा है। तो एक प्रेजेंटेशन है और वह प्रेजेंटेशन मैं पढूंगा, आप देखेंगे तो "कोरोना वायरस (कोविड-19) — राज विद्या केंद्र राहत अभियान" — इसमें प्रेमसागर फाउंडेशन भी है; द प्रेम रावत फाउंडेशन भी है; राज विद्या केंद्र तो है ही और यूथ पीस फाउंडेशन भी है। तो यहां आप देख सकते हैं कि "कोविड-19 — राहत अभियान भोजन सामग्री" जो लोगों में बांटी जा रही है —

राज विद्या केंद्र दिल्ली, जिला मजिस्ट्रेट साकेत दिल्ली को राहत कार्य के लिए — 1000 किलो आटा, 900 किलो चावल, 150 किलो दाल तथा 150 किलो हरी सब्जियां दी गयीं — (राज विद्या केंद्र दिल्ली, जिला मजिस्ट्रेट साकेत दिल्ली को भोजन सामग्री देते हुए) — आप देख सकते हैं इस फोटो में।

राज विद्या केंद्र दिल्ली, 500 पैकेट भोजन सामग्री पुलिस प्रशासन नॉर्थ वेस्ट दिल्ली को दी गई इसमें — 2500 किलो आटा, 500 किलो दाल, साथ में नमक, सरसों का तेल, हल्दी पाउडर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 1500 पैकेट की भोजन सामग्री प्रशासन को सहयोग देने के लिए तैयार हैं — (पुलिस प्रशासन नॉर्थ वेस्ट दिल्ली को भोजन सामग्री सौंपते हुए)

35 लोगों के लिए आइसोलेशन में सरकार के सहयोग के लिए आवास तैयार रखा गया है (अगर जरूरत पड़े तो) ।

पुलिस प्रशासन की मदद से रांची के बंटोली गांव में 111 लोगों को 555 किलो चावल, 111 किलो दाल, 111 किलो आलू, साथ में नमक और साबुन दिया गया है। (111 आलू नहीं होंगे 111 किलो होंगे, 111 गिन-गिनकर कौन आलू देगा)

राज विद्या केंद्र रांची आपस के 5 गांव में 68 लोगों के बीच 330 किलो चावल बांटा गया। राज विद्या केंद्र रांची, पुलिस प्रशासन रांची को लोगों की मदद के लिए भोजन सामग्री दी गई।

प्रेमसागर फाउंडेशन रांची 100 लोगों के आइसोलेशन में सरकार के सहयोग के लिए आवास तैयार रखा गया है — यह आवास है अगर जरूरत पड़े आइसोलेशन के लिए ताकि लोग आनंद से रह सकें, प्रेम से रह सकें और आइसोलेशन का जो समय है वह पूरा हो सके उनके लिए।

यह राज विद्या केंद्र जयपुर की बात है — 24 परिवारों को 120 किलो आटा, 24 किलो चावल, 24 किलो दाल, साथ में नमक, बेसन, हरी सब्जी, मसाला और सरसों तेल दिया गया। (कम से कम खाना बनाकर खा सकते हैं लोग)

राज विद्या केंद्र जयपुर, पंवालिया गांव के सरपंच को भोजन सामग्री और हरी सब्जियां दी गई बांटने के लिए लोगों के बीच में।

राज विद्या केंद्र गोवा, पुलिस प्रशासन के अनुरोध पर जरूरतमंद लोगों के लिए गोवा में — 175 किलो आटा, 115 किलो दाल और 67 किलो चावल, साथ में नमक, तेल और हल्दी दी गई।

राज विद्या केंद्र कोलकाता स्थानीय प्रशासन के माध्यम से 300 पैकेट भोजन सामग्री — जिसमें 600 किलो आलू (किलो आलू, 111 किलो आलू, 111 आलू नहीं ), 750 किलो चावल, 150 किलो दाल, साबुन और बिस्कुट बांटा गया (साबुन साफ रहने के लिए, बिस्कुट खाने के लिए) ।

राज विद्या केंद्र कोलकाता, ग्राम पंचायत संकराली हावड़ा की मदद से 150 परिवारों को भोजन सामग्री दी गई — अब जो बेचारे गरीब लोग हैं उनके लिए और कोई राहत नहीं है अब उनको जो थोड़ा-बहुत भी मिल जाता है उससे वह अपना काम चला सकते हैं — पुलिस प्रशासन की मदद से लोगों को भोजन सामग्री दी गई।

राज विद्या केंद्र सिक्किम में प्रशासन की मदद से 28 वृद्ध लोगों को सहायता दी गई।

राज विद्या केंद्र मुरादाबाद लोगों की मदद के लिए 100 पैकेट भोजन सामग्री — जिसमें 500 किलो आटा, 200 किलो चावल, 100 किलो दाल, साथ में सरसों का तेल, हल्दी और साबुन दिया गया। (क्या मुरादाबाद में बिस्कुट नहीं भेजे?) — राज विद्या केंद्र मुरादाबाद पुलिस प्रशासन की मदद से लोगों को भोजन सामग्री दी गयी (तो यहां दे जा रही है।)

राज विद्या केंद्र देहरादून (यह हमारा शहर है) — 110 लोगों को 400 किलो आटा, 200 किलो चावल, 100 किलो दाल, साथ में आलू, तेल, प्याज और मसाला पैकेट भी दिया गया। (उनको भी बिस्कुट नहीं मिले! कुछ करना पड़ेगा।) — राज विद्या केंद्र देहरादून 110 लोगों को भोजन सामग्री देते हुए — ध्यान दें आप आसमान कितना साफ है फोटो में और आप देख सकते हैं इन फोटो में सारे नियमों का पालन किया जा रहा है, अधिकतर जितना हो सके।

राज विद्या केंद्र बोकारो झारखंड, बोकारो झारखंड — स्थानीय प्रशासन की मदद से 35 परिवारों को आटा, चावल, दाल, आलू, सब्जियां, नमक, मसाले, बिस्कुट ( बिस्कुट — इनको बिस्कुट मिल गए) और साबुन दिया गया — ये पैकेट बनाए हुए हैं, पैकेट देख सकते हैं आप।

हंस योग साधना केंद्र झुमरी तलैया में प्रधानमंत्री राहत कोष में 10 लाख रूपए की सहयोग राशि दी गई। मुख्यमंत्री राहत कोष में 5 लाख रूपए की सहयोग राशि दी गई। एस एन फ्लैगस फाउंडेशन मिर्जापुर, जिला अधिकारी डी एम मिर्जापुर को 1 लाख रूपए की सहयोग राशि दी गई। (यह देख लीजिये आप — एस एन फ्लैगस फाउंडेशन का साइन)

1500 किलो चावल पटेहरा गांव में प्रशासन की मदद से लोगों को दिया गया।

बहुत सारे वॉलिंटियर्स लगे हुए हैं लोगों की मदद करने में। यह तो बहुत अच्छी बात है और इस समय में भी लोगों की मदद की जाए यह तो बहुत ही सराहनीय बात है। एस एन फ्लैगस फाउंडेशन मिर्जापुर, लोगों की मदद के लिए पुलिस प्रशासन मिर्जापुर को भोजन सामग्री दी गई। एस एन फ्लैगस फाउंडेशन मिर्जापुर, लोगों की मदद के लिए जिला प्रशासन मिर्जापुर को भोजन सामग्री दी गई। एस एन फ्लैगस फाउंडेशन मिर्जापुर 30 लोगों के आइसोलेशन में सरकार के सहयोग के लिए आवास तैयार रखा गया है।

यह हेल्प-लाइन है — अगर किसी को हेल्प की जरूरत है तो — 91+91-7533003637 या फिर rvkender@rvk.in वहां पर आपलोग संपर्क कर सकते हैं।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 20 00:14:21 लॉकडाउन 20 Video Duration : 00:14:21 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (12 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज के दिन मेरे को यही आशा है कि आप सब कुशल-मंगल होंगे और सबसे बड़ी बात यह है कि जैसे भी आप हैं, जिस भी परिस्थिति में आप हैं इस कोरोना वायरस के समय में आप आनंद में हैं, आप मंगलमय हैं। क्योंकि यह चीज सभी लोगों को चाहे कोई भी हो, चाहे अमीर हो, चाहे गरीब हो, सभी लोगों को उपलब्ध है। यह उसकी कृपा है, उस बनाने वाले की कृपा है कि चाहे कैसा भी माहौल हो, चाहे कोई भी चीज हो रही हो, चाहे कैसा भी कुछ हो रहा हो, कैसा भी दुख हो, कैसा भी प्रकृति की तरफ से कुछ भी हो रहा हो, अगर मनुष्य चाहे अपने जीवन के अंदर तो उन परिस्थितियों में भी आनंदमंगल रूप से अपने जीवन को बिता सकता है।

यही सबसे बड़ी बात है कि हम को जो और लोग कर रहे हैं, और लोग परेशान हो रहे हैं, कोई कुछ कर रहा — हम पढ़ते हैं न्यूज़ में, समाचार जब आते हैं तो किसी ने कुछ कर दिया, किसी ने कुछ कर दिया, कोई इस चीज का विद्रोह कर रहा है, कोई उस चीज का विद्रोह कर रहा है। क्या मांगा जा रहा है लोगों से — छोटी सी बात है कि अपने घर में रहो ताकि तुम इस बीमारी को फैला न सको। यह नहीं है कि अब से लेकर जबतक तुम मर नहीं जाओगे तबतक तुम आइसोलेट रहोगे, यह कोई नहीं कह रहा है। यही कहा जा रहा है कि कुछ दिन रहो, कुछ दिन सब्र करो। क्या आज के मनुष्य में सब्र करने की कोई क्षमता नहीं रह गयी है ? क्या सुनने की कोई क्षमता नहीं रह गई है ? सारी बातें एकदम पॉलिटिकल हो गई हैं। भाई! आप मनुष्य हैं! सबसे पहले आप मनुष्य हैं और मनुष्य होने के नाते सबसे पहले आपका जो एक फर्ज़ बनता है वह यह बनता है कि आप अपने को भी सुरक्षित रखें और आपके एरिया में, आपके क्षेत्र में जो लोग हैं वह भी सुरक्षित रहें।

यह जानने की बात है, यह पहचानने की बात है, यह इंसानियत की बात है। जब आप हैं जिंदा तो आप अगर किसी की मदद कर सकते हैं कि उन तक यह बीमारी न पहुंचे। आपके घर रहने से आप उनकी यह मदद कर रहे हैं कि यह बीमारी और लोगों तक न पहुंचे। आपको लगेगी अगर यह बीमारी तो आपके घर में जो लोग हैं उनको लग सकती है यह बीमारी। यह समझने की बात है कि मनुष्य होने के नाते आप इस समय किन-किन की मदद कर सकते हैं। मैंने हमेशा ही लोगों से कहा है कि "भाई! शांति तब होगी जब हर एक दिया जलेगा!" मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है कि लोग इस बात पर मेरे पर हंसते थे कि आप एक-एक की बात कर रहे हैं।

आज एक-एक की ही बात की जा रही है। गवर्नमेंट भी एक-एक की ही बात कर रही है कि सभी को रहना चाहिए, क्योंकि एक-दूसरे से अगर लोग मिलेंगे तो कितने ही कितने, कितने-कितने, कितने-कितने, कितने कि उनको — मल्टिप्लाई होंगे तो कितने ही हजारों लोग इस बीमारी से प्रभावित होंगे। और बात यह है कि जब अस्पताल में जगह नहीं है, डॉक्टरों के पास जगह नहीं है, वह मैक्सड आउट हैं तो फिर कैसे आगे चलेगा! परंतु लोग हैं जो इन बातों पर ध्यान नहीं देते हैं और चीजों पर ध्यान देते हैं। अपनी-अपनी बात पर ध्यान देते हैं स्वार्थ यह होता है — असली स्वार्थ यह है कि जब ऐसा समय आए तो लोग सबकी बात नहीं मान रहे हैं, सबकी बात नहीं देख रहे हैं, सबका भला नहीं देख रहे हैं, सिर्फ अपनी बात मानना चाहते हैं इससे बड़ा स्वार्थ और हो नहीं सकता। क्योंकि यह समय है, यह समय है उन चीजों को परखने का कि "क्या तुम में सहनशक्ति है या नहीं ?" या इसी शक्ति के पीछे तुम लगे हुए हो — बांहों कि जो शक्ति है इसी के पीछे लगे हुए हो पर यहां की शक्ति कोई शक्ति नहीं है, यहां की शक्ति कोई शक्ति नहीं है। जब अगर ऐसा होगा तो फिर जो सचमुच में, जिसको खोखला कहते हैं, खोखला — बाहर से तो सबकुछ ठीक लगता है, पर अंदर कुछ है नहीं। वह बात हो जाएगी, वह बात हो जाएगी।

क्योंकि मनुष्य की असली पहचान है कि उसके अंदर की चीज क्या है ? उसके अंदर गुस्सा भरा हुआ है या प्रेम भरा हुआ है। उसके अंदर वह डरा हुआ है या उसके पास हौसला है आगे बढ़ने का। यह चीजें मनुष्य को बनाती हैं। यह चीजें आगे आना जरूरी हैं। यह चीजें बहुत जरूरी हैं कि जबतक इन चीजों से लोगों की पहचान नहीं होगी, जबतक ये चीजें लोगों की जिंदगी में तराजू नहीं बनेंगी, तबतक हमारी सोसाइटी बदल नहीं सकती है।

क्योंकि किसी के पास बड़ी कार है तो हम समझते हैं कि सबकुछ है उसके पास। अगर किसी के नाम के आगे यह लगा हुआ है, किसी के नाम के आगे वह लगा हुआ है, तो उसके पास सबकुछ है। ना! जिसके पास शांति है, जिसके पास वह हौसला है अंदर, जिसके पास वह धीरज है अंदर, उसके पास सबकुछ है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, जब ॠतु तब फल होय।।

अगर कोई पौधा लगाये, बीज बोये और वह उसके पास जाये — बीज के पास थोड़ा पौधा जब आ जाता है बाहर जमीन से, उसको खींचे कि "बड़ा हो जा, बड़ा हो जा, बड़ा हो जा" तो बड़ा होगा ? वह तो निकल आएगा बाहर और जब बाहर निकल आएगा तो वह मर भी जाएगा। तो इसलिए असली चीज वही है कि जो अपने जीवन के अंदर, अंदर का कनेक्शन बना करके भी रहता है। यही नहीं है कि बाहर का कनेक्शन है सारा, बाहर ही सबकुछ है, बाहर ही सबकुछ है, बाहर — जैसे घर में, अब वह घर किस काम का जिस घर में सारी बत्तियां बाहर हैं, सारे बल्ब बाहर लगे हुए हैं और अंदर बिल्कुल अंधेरा है।

अरे! उजाला तो अंदर होना चाहिए, बाहर हो या ना हो। कम से कम अंदर तो उजाला होना चाहिए। इसी प्रकार मनुष्य के अंदर यही बात होनी चाहिए, क्योंकि अगर वह उजाला उसके हृदय में नहीं है, उसकी जिंदगी के अंदर नहीं है, तो उसकी जिंदगी अँधेरी है। यह एक ऐसा समय है कि मेरे ख्याल से, जनवरी 2019 में किसी ने नहीं सोचा होगा कि ऐसा समय आएगा। फरवरी में नहीं सोचा होगा, मार्च में नहीं सोचा होगा, अप्रैल में नहीं सोचा होगा, मई में नहीं सोचा होगा, जून में नहीं सोचा होगा, जुलाई में नहीं सोचा होगा, अगस्त में नहीं सोचा होगा। धीरे-धीरे-धीरे फिर आखिरी में, 2019 आखिरी में यह खबर आने लगी कि चीन में कुछ हो रहा है। और तब भी लोगों ने नहीं सोचा होगा, उनका यही विचार होगा "वहां हो रहा है वो लोग संभाल लेंगें, फिर हमसब ठीक हैं!"

पर यह एक ऐसी बीमारी निकली कि वहां से चली, तो ऐसी चली, ऐसी चली, ऐसी चली कि सारे संसार में फैल गयी। क्यों ? क्योंकि वही — एक जमाना था, 1918 से लेकर 1920 का समय जब एक 'स्पेनिश फ्लू' हुआ था, तो सब जगह नहीं फैला वह, क्योंकि सब जगह लोग जा नहीं रहे थे। कई जगह थे कि लोग जा ही नहीं रहे थे। परन्तु अब तो ऐसा हो गया है कि लोग हवाई जहाज से सफर करते हैं और एक देश से दूसरे देश, दूसरे देश से तीसरे देश, तीसरे देश से चौथे देश, सब जा रहे हैं। एक ऐसा जाल बिछा दिया है कि कहीं से कहीं, कहीं से कहीं, कहीं से कहीं — अब ऑस्ट्रेलिया से फ्लाइटें चलती हैं, लंदन जाती हैं, ऑस्ट्रेलिया से फ्लाइट चलती हैं, दिल्ली रूकती हैं, फिर लंदन जाती हैं, फिर लंदन से चलती हैं, फिर लॉस-एंजेलिस जाती हैं। अब तो ऐसा हो गया है कि लोग सफर करते हैं, करते हैं, करते हैं, ट्रैवल करते हैं, जाते हैं, जगह-जगह जाते हैं।

तो भाई, लोगों ने तो यही समझा है कि वह तो अच्छी बात है और अच्छी बात है भी कि लोग देखते हैं, सारे संसार को देखते हैं कि और जगह क्या-क्या हो रहा है! परन्तु वही कारण है कि सब जगह फैल गया! अब फैल गया तो फैल गया, परन्तु अब क्या करना है ? बात फैलने की नहीं है, अब क्या करना है ? अब किस हौसले से काम लेना है ? किस शक्ति को इस्तेमाल करना है ? ताकि हम इस समय में आनंदपूर्वक रह सकें। इसके लिए यह नहीं, इसके लिए यह इस्तेमाल करने की जरूरत है, यह इस्तेमाल करने की जरूरत है। यह, यह आपको बोर्डम से बचाएगा, बोर नहीं होना पड़ेगा।

अगर इस हृदय के आनंद को आप समझ गए तो आपको बोर्ड (bored) नहीं होना पड़ेगा और बुद्धिमानी से काम लीजिए ताकि आप सुरक्षित रह सकें। हृदय से काम लीजिये, आनंद लीजिये, जीने का आनंद लीजिये; हर स्वांस का आनंद लीजिये। अपने हृदय में उस आभार को प्रकट होने दीजिए कि मेरा जीवन धन्य है क्योंकि मैंने किसी चीज को समझा है अपनी जिंदगी के अंदर। मैंने किसी चीज को जाना है अपनी जिंदगी के अंदर है और जबतक मैं जानूंगा नहीं, जबतक मैं पहचानूंगा नहीं, तबतक मेरे लिए कुछ नहीं है। इसीलिए कहा कि —

ज्ञान बिना नर सोहहिं ऐसे।

लवण बिना भव व्यंजन जैसे।।

खाने में दिखता तो सब ठीक है, क्योंकि नमक दिखाई नहीं देता है खाने में, परन्तु गड़बड़ रहती है।

देखिये अभी एक बात का मेरे को ख्याल आया कि लोग घर में हैं, अब घर में हैं तो बीवी से कभी नहीं बन रही है, कभी बच्चों से नहीं बन रही है, कभी यहां नहीं बन रही है, कभी कोई, किसी से नहीं बन रही है, झगड़ा होता है लोगों का आपस में तो, जब वहां से Persia से लोग आए हिंदुस्तान में पहली बार (तो उधर की तरफ उतरे जो वेस्ट में है) तो जब वह उतरे तो वह राजा के पास गए और राजा से कहा कि "जी हमको जगह दीजिए जहां हम अपना घर बना सकें, मकान बना सकें, अपना बिज़नेस कर सकें!"

तो राजा ने कहा, "देखो मैं तुमको एक उदाहरण देता हूं तो उसने एक दूध का गिलास मंगवाया और एक छोटे-से गिलास में और दूध मंगवाया, तो उसने उस छोटे गिलास का दूध जो था वह बड़े गिलास में डाला और जो बड़ा गिलास तो पहले से ही फुल था, भरा हुआ था तो दूध गिरने लगा। तो राजा ने कहा कि यह हालत है हम पहले से ही फूल हैं, हम पहले से ही फूल हैं और अगर तुम इसमें आओगे, यहां आओगे तो ओवरफ्लो होगा। तो हम नहीं चाहते हैं कि ओवरफ्लो हो, तुम जाओ।"

वहां से जो लोग आए थे, तो वहां एक बुद्धिमान आदमी था, बुजुर्ग आदमी था, तो उसने कहा "अच्छा ठीक है! मैं आपको उत्तर देना चाहता हूं। तो राजा को कहा कि, एक गिलास दूध का लाइए तो दूध का गिलास लाया गया। उसने कहा, चीनी लाइये तो उसने चीनी ली और उस गिलास में, उस दूध के गिलास में डाली और चीनी घोल दी। कहा, हम ऐसे हैं, हम चीनी हैं। हम घुलकर — हम ओवरफ्लो कुछ नहीं करेंगे हम घुलकर मिठास डालेंगे। हम घुलकर इसमें, घुलकर मिठास डालेंगे।" तब राजा को समझ में आया और उसने उनको वहां रहने दिया।

आपके घर में जितने भी लोग हैं, क्या वह चीनी नहीं बन सकते कि वह इस माहौल में सबके लिए मिठास लाएं ? यह नहीं है कि ओवरफ्लो सिचुएशन हो बल्कि सबके लिए मिठास लाएं। कड़वापन करने के लिए तो सारी जिंदगी है, परंतु यह समय है कि यह मिठास से, आनंद से बीते और अंदर की शक्ति से बीते और समझ से बीते, हृदय से बीते, आनंद से बीते।

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 19 00:19:19 लॉकडाउन 19 Video Duration : 00:19:19 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (11 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

मेरे को आशा है कि आप सभी लोग कुशल-मंगल होंगे। आपके जीवन के अंदर इन परिस्थितियों में भी आनंद होगा, क्योंकि अगर वह आनंद आपके जीवन में नहीं है तो इस कोरोना वायरस में कोई ऐसी शक्ति नहीं है कि वह आपके उस आनंद को छीन सके। यह आनंद, यह शांति जिसकी मैं चर्चा कर रहा हूं यह कोरोना वायरस से कोई तालुक्कात नहीं रखती है। यह शांति, यह आनंद आप से तालुक्कात रखता है। जबतक आपके जीवन में यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है तबतक यह शांति, यह आनंद जिस आनंद की मैं चर्चा करता हूं वह आपके अंदर है। अब बात इतनी है कि आप उस आनंद को चाहते हैं या नहीं ? क्योंकि जब कोई मनुष्य एक चीज को समझता है कि उसके लिए वह चीज बहुत जरूरी है, तो अपने ध्यान को उस चीज के ऊपर एकाग्र करता है। यह नहीं है कि वह इधर भाग रहा है, उधर भाग रहा है, यह कर रहा है, वह कर रहा है।

एक विद्यार्थी जो पांचवी कक्षा में पढ़ता हो, चौथी कक्षा में पढ़ता हो, हो सकता है कि कई बार उसका ध्यान पढ़ाई पर नहीं जाता है। वह अपने ही खेलने के ऊपर लगा हुआ है, कहीं यह विचार कर रहा है, कहीं यह ध्यान उसका कहीं और है, कहीं और है, कहीं और है। परन्तु जब कोई ऐसी चीज होती है जैसे कि कोई खबर आई उसके पास कि उसके लिए एक बहुत बढ़िया उपहार लाया जा रहा है और वह चंद ही क्षणों में उसके सामने होगा और बहुत ही सुंदर वह उपहार है। उस समय उसका ध्यान इधर-उधर नहीं भागेगा वह उस उपहार के ऊपर एकाग्रित होगा। क्यों होगा ? क्योंकि उसकी आशाएं उस उपहार में हैं, उस उपहार से बंधी हुई हैं। जब उसके सामने — जब कोई भी ऐसा चैलेंज आता है, कोई भी ऐसी चुनौती आती है "यह पढ़ना है; वह पढ़ना है।" हो सकता है कि उसको यह नहीं लगे कि उसके लिए वह जरूरी है, परंतु जब उसको लगे कि कोई चीज ऐसी है जो उसको आनंद देगी, जो उसको मजा देगी, जो उसके लिए मनोरंजन करेगी और वह चीज, वह चाहता भी है तो उसका ध्यान उस चीज पर एकाग्र होगा।

मनुष्य को अगर हम देखें तो अधिकतर मनुष्य सब एक ही जैसे काम करते हैं। यह हम सबको मालूम है — अभी कोरोना वायरस की वजह से, लॉकडाउन की वजह से ट्रैफिक बहुत कम है। पर जब नॉर्मल सबकुछ रहता है, तो एक ही समय सबलोग निकल कर आते हैं। एक ही समय उठकर सबलोगों को काम पर जाना है। एक ही समय सब लोगों को घर वापिस जाना है। एक ही समय लोग खाने के लिए निकलते हैं; एक ही समय लोग रात को अगर कोई इंटरटेनमेंट है, उसके लिए निकलते हैं। हम मनुष्यों में अंतर क्या रह गया ? फ़र्क क्या रह गया ? हम कौन हैं ? हम क्या हैं ? हमारा ध्यान किस ओर जा रहा है ? हमारा ध्यान जा रहा है — और मैं जानता हूं अच्छी तरीके से लोग हमसे कहते हैं कि "जी! हमको दो रोटी कमानी है। हमको दो रोटी कमानी है; पेट भरना है!" कहा है कि —

ये जग अंधा, मैं केहि समझाऊँ,

सब ही भुलाना पेट का धंधा।

मैं केहि समझाऊँ।।

सभी लोग इसी चीज के पीछे लगे हुए हैं कि हमारी भूख कैसे खत्म होगी ? एक तरफ अगर हम देखें तो सचमुच में इतना खाना उगता है, इतना खाना उगता है इस संसार के अंदर कि सब लोग खा नहीं सकते उसको। फेंका जाता है — खाना, भोजन फेंका जाता है। क्योंकि उसको वो लोग बांट नहीं सकते हैं। इतना, इतना, इतना उगाते हैं। फिर भी लोग लगे हुए हैं कि — "मेरे को दो कमाने हैं; मेरे को दो पैसे कमाने हैं; मेरे को दो रोटी चाहिए; मेरे को यह चाहिए; मेरे को वह चाहिए।" क्या इन चीजों का प्रबंध हम सारे ही इस पृथ्वी पर रहते हुए जो मनुष्य हैं, क्या इन चीजों का प्रबंध हम नहीं कर सकते हैं ? हम कर सकते हैं, परंतु जो चक्कर चला रखा है —

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय।।

यही हाल होता है। कोई नहीं बचा। चक्की चल रही है; चल रही है; चल रही है; और इसमें सब पीस रहे हैं। क्यों ? माहौल ही ऐसा बना रखा है, माहौल ही ऐसा बना रखा है। अब देखिये! इतने लोग हैं, इतनी सारी चीजों का आविष्कार हो रखा है। एक समय था कि ऐसे फोन नहीं हुआ करते थे। जब पहली बार हमारे घर में फोन आया तो उसमें तो डायलिंग के लिए भी कुछ नहीं था। सिर्फ फोन था उसको उठाओ तो ऑपरेटर आती थी और ऑपरेटर को बताओ कि कौन-सा नंबर चाहिए या किसी का नाम तो वह अपने आप जोड़ती थी। इतनी टेक्नोलॉजी में, इतना सबकुछ एडवांस हो गया है, इतनी चीजों का अविष्कार हो गया है; ऐसे-ऐसे हवाई जहाज जो आवाज की गति से भी तेज चलते हैं; ऐसी-ऐसी चीजें, जो पानी के नीचे चलती हैं; पानी के ऊपर चलती हैं; ऐसी-ऐसी रेलगाड़ियां जो इतनी तेज चलती हैं कि एक समय था कि कोई सोच भी नहीं सकता कि इतनी तेज रेलगाड़ी चलेगी। ऐसी-ऐसी यंत्र जिनसे कहां से कहां की बात मालूम की जा सकती है; सैटेलाइट सिस्टम, जीपीएस सिस्टम, सैटेलाइट कम्युनिकेशन्स — सारी पृथ्वी में ऐसे-ऐसे, ऐसे-ऐसे, ऐसे-ऐसे अविष्कार हो रखे हैं जिसको हम — जिसकी लिस्ट बनाएं तो बहुत बड़ी लिस्ट होगी।

उसके उपरांत भी जब यह कोरोना वायरस आया, तो लोगों को डर लगा। यह नहीं था कि हमारे पास इतना हमने सबकुछ कर लिया है अब हमको डरने की जरूरत नहीं है। ना, डर रहे हैं लोग और अभी भी डर रहे है। इससे तो लोग बहुत परेशान हो रखे हैं। लोग अपने घर में नहीं रह सकते। घर लिया क्यों ? रहने के लिए। कितने ही दिन हुए होंगे जिस दिन — जब से उठे आप, सवेरे-सवेरे उठे, अपने दफ्तर के लिए तैयार हुए और आपकी यह इच्छा थी कि "आज घर में ही बिताया जाए" और कितने ही बच्चे होते हैं जो यही चाहते हैं कि "आज हम स्कूल ना जाएं, घर में ही बैठकर खेलें !"

"भैया और तो छोड़ो बात तुम्हारी यह चाहत ऊपर वाले ने सुन ली और ऐसा प्रबंध कर दिया कि तुमको अपने घर में ही रहना पड़े — एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, तीन दिन नहीं, बहुत सारे दिन।" पर उससे भी तुम्हें खुशी नहीं है, उससे भी तुम खुश नहीं हो, क्योंकि तुम चाहते हो कि अब कुछ और हो। अभी तो लोग होंगे जो यह सोचते होंगे कि "यार! वह दिन आए कि मैं ऑफिस जाऊं, घर से निकलूं।”

देखिए! यह मन जो है आपको घर में भी परेशान कर रहा है और यह ऑफिस में भी परेशान करेगा। यही मन है जो मूवी थिएटर ले जाता है और मूवी थिएटर में भी परेशान करता है। यही मन है जो सब जगह घूमता रहता है, घूमता रहता है, घूमता रहता है और आपको परेशान करता रहता है और आप परेशान होते रहते हैं। यह परेशान करता रहता है — वह बात अलग है यह तो उसकी प्रकृति है। पर आप परेशान होते रहते हैं यह बात अचंभे की है और यह आपकी प्रकृति नहीं है। आपकी प्रकृति परेशान होने की नहीं है, आपकी प्रकृति है आनंद लेने की। तो यह अब क्या हो गया ?

मैं एक समय बोला करता था, एक समय क्या — जो मैंने सुनाया है लोगों को (2019 में भी सुनाया, 2018 में भी सुनाया) कि भाई! एक-एक दिया जब जलेगा तब जाकर के इस संसार के अंदर रोशनी होगी और मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है कि ऐसे लोग हैं जो यह कहते होंगे कि "जी! आपका यह ख्वाब कभी पूरा नहीं होगा सब को जला नहीं सकेंगे। एक-एक को कैसे जलाएंगे, एक की कीमत ही क्या है!"

अब देख लीजिए! इस लॉकडाउन में, इस कन्टैमनैशन (contamination) में एक की क्या वैल्यू होती है! एक आदमी चार-पांच आदमियों को कन्टैमिनेट कर सकता है और वह चार-पांच आदमी एक-एक को कर सकते हैं, एक-एक को कर सकते हैं, पांच-पांच को कर सकते हैं, पांच-पांच उसको कर सकते हैं, कितने ही हजारों-हजारों-हजारों-हजारों-हजारों-लाखों में वह कन्टैमनैशन हो जाता है। यह है ताकत एक-एक की। एक-एक व्यक्ति की! इसीलिए तो आपको लॉकडाउन में डाला हुआ है। ताकि आप औरों को कन्टैमिनेट नहीं करें। और, और आपको कन्टैमिनेट नहीं करें। इसलिए समझिये कि आप जैसे हैं, उसकी बहुत बड़ी कीमत है। अगर आप शांति में नहीं हैं तो उसका प्रभाव इस पृथ्वी के ऊपर इस सारे ही जन-समाज के ऊपर पड़ता है। अगर आप आनंद में नहीं हैं तो इसका प्रभाव सबके ऊपर पड़ता है। चाहे थोड़ा पड़े, चाहे बड़ा पड़े पर प्रभाव पड़ता है।

तो आपकी असली प्रकृति क्या है ? क्या यही है जो आप हर रोज करते हैं ? और अब आप उसको वही — जिससे कि आपको बिल्कुल नफरत है और अब आपको उससे निकाल दिया गया अब उससे आपको प्यार है और घर रहने से आपको नफरत है। यह है मन का चक्कर। उल्टा चला तो सही नहीं, उल्टा चला तो सही नहीं, सीधा चला तो सही नहीं, सीधा उल्टा कैसे भी चले, टेढ़ा चले वह भी सही नहीं। कुछ भी सही नहीं है। इस चक्कर में सब लोग हैं। परन्तु अगर आप अपने आप को समझते हैं; अपने आपको जानते हैं तो आपको पता होगा कि आपकी असली प्रकृति है उस शांति में लीन होने की।

देखिये! एक बुझे हुए दिए को जलते हुए दिए के पास लाइए। तो ठीक है, आप — एक दिया जल रहा है, एक दिया बुझा हुआ है। आप बुझे हुए दिये को जलते हुए दिये के पास लाइए क्या होगा ? जैसे ही वह, जो उसकी बत्ती है जैसे ही वह जलती हुई बत्ती के नजदीक आएगी, जब उसको छूयेगी तो क्या होगा ? जो दीपक जल रहा था वह हिला नहीं। जो बुझा हुआ था वह उसके पास आया — जलते हुए दिए के पास आया होगा क्या ? जो बुझा हुआ दिया है वह भी जलने लगेगा। प्रकाश देने लगेगा। यह कानून कोई छोटा-मोटा कानून नहीं है, यह बहुत-बड़ा, लम्बा-चौड़ा कानून है। और यह प्रकृति का कानून है। यह समझने की बात है। इस बार जो बुझा हुआ दिया है उसको आप रहने दीजिए एक ही जगह। जलते हुए दिये को बुझे हुए दिये के पास लाइए। जैसे ही वह बत्ती, बुझे हुए दिये की बत्ती से जलती हुई बत्ती, जब बुझे हुए दिये की बत्ती से जुड़ेगी तो बुझा हुआ दिया फिर जलने लगेगा। प्रकाश देने लगेगा।

इसका मतलब समझते हैं आप ? यह है आशापूर्ण बात। यह आशा से भरी हुई बात है। अगर ऐसा ना होता, अगर ऐसा ना होता तो हम सबकी जिंदगी निराशा में हमेशा रहती। पर, क्योंकि कानून यह है कि बुझा हुआ दिया जलते हुए दिये को बुझा नहीं देगा बल्कि जलता हुआ दिया बुझे हुए दिये को जला देगा — इस कानून के होने की वजह से हमारे सब — जिंदगी के अंदर अंधेरे रहने की कोई जरूरत नहीं है। हम सबकी जिंदगी के अंदर प्रकाश हो सकता है।

और वह प्रकाश जिस प्रकाश के होने से हम देख लेंगे, हमको पता लग जाएगा की असली चीज क्या है! अंधेरा होने की वजह से दिखाई नहीं देता है और जब उजाला होता है, जब ज्ञान का दीपक जलता है, तब सब दिखाई देता है, तब दिखाई देता है कि "आह! यह क्या है, यह क्या है ?" बड़ी से बड़ी समस्या जो मनुष्य के सामने आती है, बड़ी से बड़ी समस्या जो मनुष्य के सामने आती है, उसको भी हम आसानी से पार कर लेते हैं।

किसी ने प्रश्न पूछा था मेरे से — काफी-काफी दिन हो गए अब तो, "जी! उसका उदाहरण दीजिए हमको कि जो आप कहते हैं कि जब समस्या आती है तो उसके ऊपर चलने की जरूरत नहीं है, उसके ऊपर चढ़ने की जरूरत नहीं है उस समस्या के बगल से निकल सकते हैं तो ऐसा कैसे है?"

बड़ी साधारण-सी बात है, यह तो आप हर रोज करते हैं। अगर एक दिन आप खाना बनाने के लिए अपने रसोईघर में गए और आपका जो सिलिंडर है, वह गैस से खाली था। कोई गैस नहीं है। तो यह तो स्पष्ट है कि आप खाना नहीं बना सकते। तब करेंगे तो करेंगे क्या ? समस्या क्या थी, गैस की ? गैस तो आप अपने शरीर में डाल नहीं सकते। गैस की समस्या नहीं थी। गैस से खाना बनना था। और समस्या यह है, समस्या क्या है ? गैस नहीं है या खाना नहीं बन सकेगा ? आपको भोजन प्राप्त नहीं होगा तो आप भूखे रह जाएंगे। अगर आप समझते हैं कि समस्या सिर्फ यह है कि गैस नहीं है तो बात दूसरी है। अगर समस्या यह है और इस बात को आप समझते हैं कि सबसे बड़ी समस्या है कि अगर यह गैस नहीं है तो मैं भोजन नहीं कर पाऊंगा। अगर आपने यह बात जान ली कि बात है भोजन की, गैस की नहीं। गैस तो कल मिल जाएगी, गैस तो कल ले आएंगे। “बात है आज भोजन की! आज मेरे परिवार को भोजन कैसे मिलेगा ?”

बड़ी आसान बात है क्योंकि वह जो प्रॉब्लम थी — वह थी गैस नहीं है। परन्तु आपने उसको सही तरीके से समझा कि बात गैस की नहीं है, गैस से आपकी समस्या का कोई संबंध नहीं है। संबंध है आपकी भूख से! उस दिन पिज़्जा मंगवा लीजिए। सारी फैमिली को बैठकर सारे परिवार के साथ बैठकर के पिज़्जा खा लीजिए समोसे मंगवा लीजिए कुछ खाना बाहर से मंगवा लीजिए। और अगर वह भी बात आपको ठीक नहीं लगे और आस-पास में कोई नहीं है समोसा बनाने वाला, पिज़्जा बनाने वाला। तो अगर घर में अंगीठी है तो उसी के ऊपर आग लगाकर के चूल्हा डालकर के खाना बना लीजिये।

समस्या क्या थी ? समस्या समझने की बात है सबसे पहले। समस्या क्या है ? कई बार हम अपने जीवन में समझते नहीं हैं। समस्या सचमुच हमारे जीवन में है, जब हमारा हृदय उस शांति से नहीं है भरा हुआ है, तो वह है समस्या। जब हमारा जीवन आनंद से नहीं भरा हुआ है तो वह है समस्या — और सबसे बड़ी समस्या वह है और उसका एक ही हल है। उसका हल है कि हम अपने जीवन में जो हमारे अंदर स्थित शांति है उसका अनुभव करें और उससे अपने हृदय को भरें!

तो सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 18 00:12:19 लॉकडाउन 18 Video Duration : 00:12:19 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (10 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह,

जिनको कछू न चाहिये, सोई शाहंशाह।

मैंने सोचा कि आज का जो यह कार्यक्रम है इस दोहे से चालू करता हूं। क्योंकि सभी को चिंता लगी हुई है, "क्या होगा; क्या नहीं हो रहा है; यह हो जाएगा; वह हो जाएगा!" परंतु जिसको चिंता नहीं है, जिसको कुछ नहीं चाहिए उसके लिए सबकुछ है, उसके लिए सबकुछ है।

सबसे बड़ी बात यही आती है कि आपके जीवन में यह जो आपको जीवन मिला है, यह जो समय है इसमें आप चाहतों पर लगे हुए हैं और चाहत क्या है आपकी ? सबसे बड़ी चाहत आपकी यह है कि जो औरों की चाहत है — सुनिए, सुनिए इस बात को। सबसे बड़ी चाहत आपकी यह है कि जो औरों की चाहत है आप उसको पूरा करें। जो और लोग आपके जिंदगी के अंदर चाहे वह आपके भाई हों; बहन हों; आपके मित्र हों; आपके माता हों; पिता हों; आपके रिश्तेदार हो; आपके बॉस हों; आपके, कहीं कोई भी हो जो उनकी, जो वो लोग, जो बाहर के लोग हैं और लोग हैं जो तुमसे अपेक्षा करते हैं तुम उस अपेक्षा को पूरा करने में लगे हुए हो। और होता क्या है ? होगा यही कि यही करते-करते, करते-करते, करते-करते, उनको खुश करते हुए सारा समय पूरा हो जाएगा और जब वह समय पूरा हो जाएगा तब कहेंगे कि मैं अपने आपको तो खुश नहीं कर पाया सबको खुश करने की कोशिश की, कोई खुश हुआ नहीं और अब समय सारा निकल गया है खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही मैं यहां से जा रहा हूँ।

मैं चाहता हूं कि “यह ना हो।” सबसे बड़ी बात है कि “यह ना हो, हो तो वह हो, जो हो रहा है, जो होगा!” अभी इस कोरोना वायरस को लेकर सबको यह है कि "क्या होगा, क्या होगा, क्या होगा ?" जब यह कोरोना वायरस का जो सारा सिलसिला है जब यह खत्म हो जाएगा तब सबका ध्यान जाएगा — "क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हुआ!" तो अभी लगा हुआ है कि “क्या होगा?” फिर जाएगा "क्या हो गया, क्या हो गया, क्या हो गया, क्या होगा ?" इन्हीं पर सबका ध्यान जाएगा। तो अभी "क्या होगा" फिर "क्या हो गया!" इसी में सभी लोग रहेंगे और "क्या हो रहा है" — इस पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा।

तो समझने की बात है, समझने की बात है कि कैसे, किस प्रकार हम उस चीज तक पहुंच जायें “जो हो रहा है।” “जो हो रहा है” वही सबकुछ हो रहा है — वहीं आनंद है, वहीं सचमुच का आनंद है “जो हो रहा है।” क्या हो रहा है ? यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है — यह हो रहा है। “क्या हो गया” वहां नहीं, “क्या होगा” वहां भी नहीं, पर “क्या हो रहा है” वहीं सबकुछ है और जबतक हम अपनी जिंदगी में इस बात को नहीं समझ लेंगे कि वह चीज कितनी जरूरी है — “जो हो रहा है” तबतक हमारा ध्यान कहीं और रहेगा।

बात तो ध्यान की है। ध्यान कहां था ? किस चीज को देख रहे थे ? क्या कर रहे थे ? अगर आप जा रहे हैं, बस में जा रहे हैं, कार में जा रहे हैं, कहीं भी जा रहे हैं और बहुत सुंदर-सी चीज है। पर, वह चीज जो है, जो सुंदर चीज है, वह कार के एक तरफ थी और आप कार के दूसरी तरफ देख रहे थे। कार की खिड़कियों से दूसरी तरफ देख रहे थे। जो चीज सुंदर थी, वह एक तरफ थी और जो आप देख रहे थे, वह दूसरी तरफ थी। किसी ने कहा — "तुमने वह देखा कि कितनी सुंदर थी ?" तुमने कहा — "नहीं!"

क्यों ? क्योंकि ध्यान कहीं और था।

ठीक इसी प्रकार ध्यान हमारा कहां चला जाता है ? किस चीज पर ध्यान दे रहे हैं ? उस पर ध्यान दे रहे हैं "जो है" या उस पर ध्यान दे रहे हैं "जो होगा ?" जो होगा वह इसलिए तो होगा, क्योंकि "वह है नहीं।" जो होगा वह इसलिए होगा क्योंकि "है नहीं।" और जो है उसको "हो गया" की क्या जरूरत है — "वह तो है!" और वह जो समय है "जो है" उसमें सबकुछ है। वह अविनाशी उसी में है, जो वह समय है। उसमें नहीं है "जो होगा" या "हो गया।"

तुम्हारी जिंदगी का खेल — कई लोग हैं — प्रश्न आ रहे हैं, प्रश्नों के उत्तर मैं दूंगा। पर, पढ़ रहा था मैं प्रश्नों को, तो यही बात — अब कई लोग हैं जिनको अभी भी डर है। मैंने कितनी बार समझाया, मैं समझाता रहूंगा कि डरने की कोई बात नहीं है। डरो मत! इस समय सतर्क रहने की, सावधान रहने की बात है। हाथ धोओ, हाथ धोओ, लोगों से संपर्क मत करो यह समझो कि सभी को यह बीमारी है। बाहर जो लोग हैं जिनको तुम नहीं जानते, सभी को यह बीमारी है उनसे दूर रहो। 6 फीट दूर रहो, हाथ धोओ, साफ-सुथरे रहो और इतना परहेज करना है ताकि "कोई तुमको यह ना दे या अगर तुमको है तो तुम किसी को मत दो!" इतना ही परहेज करना है। यह तो किया जा सकता है।

यही समझने की बात है कि इस समय सिर्फ यही नहीं हो रहा है एक चीज और भी हो रही है। यह जो कोरोना वायरस है यह तो है, परन्तु एक चीज और भी हो रही है। जो हो रही है वह बहुत सुंदर चीज है और वह है कि — तुम जीवित हो। तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, तुम्हारे अंदर यह स्वांस जा रहा है। तुम इसका आनंद उठा हो। तुम इसका आनंद ले सकते हो।

प्रश्न होता है, प्रश्न उठता है कि "क्या तुम वह कर रहे हो, इसका आनंद ले रहे हो, इस जीवन का — कोरोना वायरस का नहीं, इस जीवन का!"

जो हर रोज मैं दो वीडियो बनाता हूं — एक हिंदी में, एक अंग्रेजी में। तो अंग्रेजी की जो अभी मैंने बनाई है वीडियो, उसमें मैंने दो सवाल पूछे लोगों से। वह मैं आप से भी पूछता हूँ कि — आप अपने आप से, अपने आप से कंफर्टेबल (comfortable) हैं या नहीं, जो आराम की बात होती है कि हां! मैं अपने आप में ठीक हूं। आप अपने आप से कंफर्टेबल हैं या नहीं ? क्योंकि अगर नहीं हैं तो फिर वही वाली बात हो गई कि फिर आप किसके साथ कंफर्टेबल हो पाएंगे ? किसी के साथ नहीं। अगर आप अपने साथ कंफर्टेबल नहीं हैं तो किसी के साथ कंफर्टेबल नहीं हो पाएंगे।

और दूसरा सवाल कि यह जो समय है, यह जो समय है — यह तो खत्म होगा, यह तो पूरा होगा। कोरोना वायरस जो है — यह जो एक हिस्सा है, यह तो खत्म होगा। इसके बाद आप किस तरीके से रहेंगे ? आपने अपने जीवन में क्या सीखा है ? कुछ सीखा ? क्या आप उस सीख को अपने जीवन में आगे बढ़ाएंगे ? कुछ आपने जाना ? यह जो समय है, जो लॉकडाउन का समय है इसमें आप विचार कर रहे हैं तो क्या विचार किया आपने ? क्योंकि यह बात है कि सचमुच में यह दुनिया, एक दूसरी दुनिया बन सकती है जिसमें लोग शांति की बात करें, एक-दूसरे से मिलकर रहें। हर एक व्यक्ति में कितनी शक्ति है — यह इस समय मालूम पड़ रहा है। हर एक व्यक्ति जो लॉकडाउन में है, उसका जो दान है वह कितना जरूरी है — इस समय पता लगता है।

तो समझने की बात है, सोचने की बात है और अपने जीवन को सचमुच में सफल बनाने की बात है। क्योंकि यह जो कुछ भी हो रहा है, यह तो खत्म होगा पर हमको अपना जीवन सफल बनाना है उससे पहले कि यह सारा खेल जो है, यह जीवन का खेल खत्म हो।

सोचिये आप इन प्रश्नों के बारे में। और आगे "क्या होगा", वह नहीं "क्या हो रहा है" — उस पर भी ध्यान देना शुरू कीजिए, क्योंकि आनंद वहां है। क्योंकि सृष्टि को रचाने वाला, रचने वाला वह उस जगह है जो हो रहा है, तुम्हारे अंदर है, अब है। उसको जानो; उसको पहचानो और अपने जीवन को सफल बनाओ!

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 17 00:16:20 लॉकडाउन 17 Video Duration : 00:16:20 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (9 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज मैं एक दोहे से चालू करना चाहता हूं वह दोहा है कि —

कर्म कुहाड़ा अंग वन, काटत बारंबार।

अपने हाथों आप को, काटत है संसार।।

तो कहने का अभिप्राय इस दोहे का यही है कि मनुष्य आज जिस हालत में है वह उसी की बनाई हुई है। अपने आप को ही वह नुकसान पहुंचा रहा है। अब कई लोग हैं जो कहेंगे कि "ऐसा तो नहीं है जी! यह कोरोना वायरस जो आया, यह तो हमने नहीं बनाया। यह तो कहीं और से आया है।" ठीक बात है, पर यह भी विचारने की बात है कि जिस माहौल में रह करके हम परेशान हो रहे हैं, इस कोरोना वायरस की वजह से यह किसने बनाया ? जो गरीब लोग हैं उनके लिए और भी मुश्किल है। यह बड़े-बड़े शहर जो बन गए जिनमें रहने के लिए ठीक ढंग से इंतजाम नहीं है लोगों का, यह किसने बनाया ? तो यह तो मनुष्य ने ही बनाया है। यह तो हम लोगों ने ही बनाया है और यह जब बन गया और इसमें फिर — जब मकान लोगों ने बनाए, मकान लोगों ने खरीदे; मकानों में लोग रहते हैं। परंतु जब यह हो गया कि “नहीं तुमको रहना ही है यहां” तो वही मकान — जो अच्छा मकान है; यह मेरा मकान है; यह सब बढ़िया है; यह ठीक है; वह ठीक है। वही मुश्किल की बात बन गयी।

तो हम लोगों को थोड़ा-सा समझना चाहिए कि "यह हुआ क्यों है!" और सबसे बड़ी बात अगर हम उस तरफ जायें भी ना कि "यह हुआ क्यों है; क्यों हुआ है यह सबकुछ!" फिर भी हमको किस प्रकार रहना है हम क्या करें ऐसी परिस्थितियों में?

मैंने पहले ही कहा है कि डरने से तो कुछ होगा नहीं, हिम्मत से काम लेना है। और सबसे बड़ी चीज जो एक फैक्ट (fact) है, जो एक बात है, असलियत है, वह यह है कि “आपको आपके साथ रहना है, आपको आपके साथ रहना है!” प्रश्न सबसे बड़ा — प्रश्न तो मेरे पास बहुत आ रहे हैं, पर सबसे बड़ा प्रश्न मेरा सबसे यह है कि "क्या आप अपने साथ रह सकते हैं?" और किसी के साथ की बात नहीं कर रहा हूं — अपने साथ क्योंकि —

चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोए।

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।।

यह चक्की जो है यहां चल रही है; चल रही है; चल रही है; चल रही है; चल रही है। यह जो कानों के बीच की आवाज़ है, यह बंद ही नहीं हो रही है। तो कोई कुछ सोच रहा है; कोई कुछ सोच रहा है; कोई कुछ सोच रहा है; यह क्या होगा; क्या होगा। लोग ऐजटैटड (agitated) हैं, गुस्सा आ रखा है लोगों को। जहां शांत होना चाहिए क्योंकि जो मनुष्य अपने साथ नहीं रह सकता वह किसी और के साथ क्या रहेगा। जो मनुष्य — जिसको उसकी संगत पसंद नहीं है, खुद की संगत पसंद नहीं है वह और किसी के साथ क्या रहेगा!

और फिर मन है, मन चंचल है और मन कहता है, "नहीं मैं यहां जाना चाहता हूँ, मैं वहां जाना चाहता हूँ।" वह सब जगह, जो तुम जाना भी नहीं चाहते होगे अगर तुमको स्वतंत्रता हो तो! परंतु नहीं है तो फिर विचार आते हैं कि "वहां भी जाना चाहिए; वहां भी जाना चाहिए, वहां भी जाना चाहिए, यह भी करना चाहिए, वह भी करना चाहिए!" यह सारी चीजें इनसे परेशान होने की आपको कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि विचारिये कि जब आप अपनी संगत से ही परेशान हैं तो फिर कैसे काम चलेगा, फिर कैसे काम चलेगा? फिर यह जिंदगी क्या हो गयी ? फिर कैसे आगे बात चलेगी ?

जो औरों की चीज को देख करके कि "उसके साथ यह है, उसके साथ यह है, उसके साथ यह है, और मेरे साथ क्या है, मेरे पास क्या है?" — मैं उसी बात की चर्चा कर रहा हूं कि जो मेरे को एक प्रश्न किसी ने लिखकर दिया कि "मेरे दोस्त जो हैं उनके पास लैटेस्ट गैजेट रहते हैं, नए फोन रहते हैं, यह रहता है, वह रहता है और मेरे पास ये सब चीजें नहीं हैं मेरे को जलन होती है, मेरे को ईर्ष्या होती है!"

पर जो तुम्हारे पास है क्या तुम उसको जानते हो, वह क्या है ? वह है सुख और शांति जो तुम्हारे अंदर है। तुम उसको क्यों नहीं लैटेस्ट गैजेट कहते हो, वह तो बिलकुल ही लैटेस्ट गैजेट है। सबसे बढ़िया चीज है वह। उसको देखो, उसको अपनाओ। और जब उसको अपना सकोगे तो तुममें वह हिम्मत आएगी कि तुम किसी भी चीज का संघर्ष कर सकते हो, किसी भी चीज से और तुमको हार मानने की जरूरत नहीं पड़ेगी अपने जीवन में। क्योंकि जब मनुष्य अपने आपको जानता है तो उसको मालूम है कि मैं कौन हूं और उसमें फिर वह शक्ति आती है जानने से, समझने से कि "हां मेरे अंदर वह चीज विराजमान है, जो सब जगह व्यापक है। जो सब जगह है। वह मेरे अंदर भी है।” फिर उसको इस बात का दुख नहीं होता है कि मेरे को इस संसार से जाना है। जाने-आने का चक्कर तो इस संसार के अंदर हमेशा लगा ही रहता है। बात यह है कि क्या हर दिन जो बीत रहा है उसमें आप कुछ सीख रहे हैं ? उसमें कुछ समझ रहे हैं ? एक कहानी है और मैंने सुनाई है पहले भी।

तो भगवान राम के समय की कहानी है। सभी देवी-देवता भगवान राम के पास आए और कहा — "प्रभु अब समय हो गया है जिस चीज के लिए आप आए थे वह सारी चीजें पूरी हो गई हैं। रावण का वध हो गया है, दानवों का नाश हुआ है और सब कुछ ठीक है इस समय और आप जिस काम के लिए इस पृथ्वी पर आए थे वह काम पूरा हो गया है आपका। अब आइए वापस और बैकुंठ में आइए और सब कुछ ठीक है। जो आपका असली, जो आपका मकान है, घर है उसको आप सम्भालिये, वहां आ जाइये आप।"

तो भगवान राम ने कहा, "ठीक है मैं आने के लिए तैयार हूँ और मैं इससे सहमत हूं। जिस चीज के लिए मैं आया था वह सब हो गया और लव-कुश मेरा सिंहासन संभालेंगे, वह आगे चलाएंगे और मेरा काम हो गया मैं आने के लिए तैयार हूं।"

तो तुम यमराज को बोलो कि वह मेरे को लेने के लिए आ जाये। तो सभी देवी-देवता यमराज के पास गए कि भगवान राम का समय अब पूरा हो गया है उनको लेने के लिए जाओ और वह वापस बैकुंठ जाएंगे।

यमराज ने कहा — "मैं नहीं जा रहा भगवान राम को लेने के लिए और इसलिए नहीं जा रहा कि वहां हनुमान है और वह हनुमान जो हैं वह मेरे को भगवान के नजदीक थोड़े ही आने देंगे, तो मैं नहीं जा रहा।"

सभी देवी-देवता बड़े परेशान हुए कि क्या होगा अब! तो फिर गए भगवान राम के पास और कहा — "भगवान! हमने तो यमराज को कहा कि वह आपको आएं, ले जाएं। पर यमराज ने मना कर दिया कि जबतक हनुमान है, मैं नहीं आऊंगा।"

तो भगवान राम ने कहा — "ठीक है! तुम यमराज को कहो कि मैं हनुमान को ऐसी चीज में लगा दूंगा कि वह व्यस्त रहेगा और वह उनसे लड़ाई नहीं कर पाएगा, उनसे कुछ कह नहीं पाएगा, वह वहां होगा भी नहीं। मैं ऐसी कोई चीज दे दूंगा हनुमान को करने के लिए।

तो भगवान राम ने अपनी अंगूठी ली और उसको एक, जहां वह लेटे हुए थे, बैठे हुए थे वहां एक दरार थी उस दरार के अंदर डाल दिया, क्रैक (crack) के अंदर डाल दिया। और हनुमान को बुलाया कि "हनुमान मेरी अंगूठी जो है इस क्रैक में चली गई है जरा लाना वापिस!"

तो हनुमान ने एक छोटा-सा रूप लिया और उस रिंग के पीछे, उस अंगूठी के पीछे वह चल दिया। अब चलते-चलते, खोजते-खोजते,खोजते-खोजते,खोजते-खोजते वह पाताल लोक में पहुँचा। पाताल लोक में पहुँचा, तो उसने देखा कि वहां सभी जो पाताल के वासी थे वहां हैं और एक बड़े-बड़े कमरे बने हुए हैं। जब हनुमान को देखा पाताल के लोगों ने तो कहा — "आइये, आइये आप! आये हैं आप! कहिये हम आपकी कैसे सेवा कर सकते हैं ?"

कहा — "भाई! मैं भगवान राम की अंगूठी लेने के लिए आया हूं, वह कहीं उस दरार में गिर गई, तो यहां पहुंच गई होगी।"

कहा — “हां,हां! आप उस कमरे में जाइये, पहले वाले कमरे में जाइये और देखिये वहां आपको अंगूठी मिल जायेगी।”

जब वह — हनुमान जी गए और उन्होंने वह खोला, दरवाजा खोला तो देखा एक अंगूठी नहीं, हजारों-हजारों अंगूठियाँ वहां पड़ी हुईं। तो हनुमान ने कहा — 'मेरे को तो एक अंगूठी चाहिए। पर यहां तो हजारों-हजारों अंगूठियाँ और एक-सबके सब वैसे ही हैं। मेरे को तो एक चाहिए, तो वह कौन-सी है ?

तब पाताल वासियों ने कहा — "जी यह तो होता ही रहता है। यह तो हर समय जब भगवान आते हैं तो वह अपनी अंगूठी यहां गिराते हैं और आप अंगूठी को लेने के लिए आते हैं और यही चर्चा होती है कि यह काहे के लिए?"

कहा — "दूसरे जो कमरे हैं वह काहे के लिए हैं ?"

कहा — "वह और अंगूठियों के लिए हैं। यह तो होता ही रहेगा, होता ही रहेगा, होता ही रहेगा, होता ही रहेगा।"

मेरे को यह कहानी पसंद है। परन्तु मैं एक प्रश्न भी पूछता हूं इस कहानी को सुनाने के बाद और प्रश्न मेरा यह है कि "ठीक है यह जो कुछ भी हो रहा है, यह होता रहेगा, होता रहेगा, होता रहेगा, हो या ना हो वह बात अलग है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आपने इससे सीखा क्या ? यह जो हो रहा है इससे आपने सीखा क्या ?"

एक तो वह वाली बात है कि खुद ही मनुष्य मरीज बन गया, "अजी! मेरे से कुछ नहीं होगा। मैं तो यहां बैठा हुआ हूं, यह हो रहा है, यह ठीक नहीं है, वह ठीक नहीं है, ऐसा है, वैसा है।" फिर सीखा क्या ?

सीखा यह, सीखने की बात जो असली वह यह है कि जो मनुष्य को अहंकार होता है कि "मैंने यह काबू में कर लिया, मैंने यह काबू में कर लिया, मैंने यह कर लिया, मैंने वह कर लिया; मैंने यह देख लिया; मैंने वह देख लिया — वह कुछ नहीं हुआ है। वह सब व्यर्थ है। वह सब गलत है। क्योंकि असली चीज जो है वह यह है कि "तुम जीवित हो, तुम्हारे अंदर स्वांस आ रहा है, जा रहा है।" यह चीज है असली और कोई चीज नहीं है।

यह कोरोना वायरस भी एक दिन चली जाएगी। एक दिन ऐसा भी आएगा कि तुम भी यहां नहीं रहोगे। एक दिन ऐसा भी आएगा कि यह सारी सृष्टि, यह जो पृथ्वी है यह भी यहां नहीं रहेगी। चंदा भी जाएगा, सूरज भी जाएगा। सितारे भी जाएंगे। सबकुछ जाएगा। कल नहीं, परसों नहीं, अरबों साल की बात कर रहा हूं मैं। परंतु आज का सत्य, तुम्हारा जो सत्य है वह असली सत्य क्या है कि तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है। यह सीखना है कि इसका आदर कैसे किया जाए, इसका सत्कार कैसे किया जाए और अपने जीवन को सफल कैसे बनाया जाए। यह सीखने की बात है। अगर यह सीख लिया, यह जान लिया तो सबकुछ जान लिया। और यह नहीं जाना, तो कुछ नहीं जाना। यह सीख लिया, यह समझ लिया तो सबकुछ सीख लिया। और यह नहीं समझा, यह नहीं सीखा तो कुछ भी नहीं सीखा।

आप कुशल-मंगल रहिये! आनंद से रहिये! अपने साथ रहना सीखिए! चिंता में नहीं, आनंद में, क्योंकि जो मन है यह चिंता की तरफ ले जाता है। हृदय है वह आनंद की तरफ ले जाना चाहता है। आनंद की तरफ जाइये। आनंद से रहिए और सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 16 00:19:14 लॉकडाउन 16 Video Duration : 00:19:14 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (8 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोतागण को मेरा नमस्कार!

काफी कुछ हमने कहा है इन वीडियोज़ के द्वारा। काफी कुछ आपलोगों ने सुना भी होगा। बहुत सारे प्रश्न भी हमारे पास आये। एक बात हम कहना चाहते हैं कि अगर आप प्रश्न भेजते रहें तो अच्छी बात है। वैसे काफी सारे हैं और भी आएं तो अच्छा रहेगा। अपने कमैंट्स (comments) भी, जो कुछ आप कहना चाहते हैं वह भी भेजिए, अपने एक्सप्रेशन्स (expressions) भी भेजिए। अपने भाव भी प्रकट कीजिये अगर आपको यह वीडियोज़ अच्छी लगती हैं तो।

सबसे बड़ी बात यही हो जाती है कि यह जो हमको जीवन मिला है, यह जो हमारा समय है इसका सदुपयोग हम किस प्रकार कर सकें। लोग तो बहुत सारे प्रश्न पूछते हैं "ऐसा क्यों है, वैसा क्यों है, यह क्यों होता है, वह क्यों होता है, ऐसा काहे के लिए होता है!" पर सबसे बढ़िया प्रश्न तो यही है कि “यह जो मेरे को समय मिला है इसका मैं सबसे अच्छा प्रयोग कैसे कर सकूँ। इसका सदुपयोग मैं कैसे कर सकूँ!”

तो उसके लिए संत-महात्माओं ने एक बात बहुत स्पष्ट कही है कि — और यह बात लोग सुनते हैं और काफी मात्रा में सुनते हैं यह बात, पर मेरे ख्याल से लोगों की या तो समझ में नहीं आती है या उसको स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि जो भी तुम्हारे प्रश्न हैं, तुम्हारा मन है, तुम्हारा दिमाग जो है, प्रश्नों को पूछता है, वह प्रश्नों के बारे में सोचता है, वही प्रश्न आते हैं। परन्तु तुम्हारे हृदय में सारे उत्तर ही उत्तर हैं। मन में, दिमाग में प्रश्न ही प्रश्न हैं, हृदय में उत्तर ही उत्तर हैं।

तो जबतक तुम अंदर नहीं जाओगे और उस चीज को महसूस नहीं करोगे जो तुम्हारे अंदर है, यह तुम्हारे प्रश्न खत्म नहीं होंगें। यह चलते रहेंगे, चलते रहेंगे, चलते रहेंगे, चलते रहेंगे। और जब इस परिस्थिति में जब और ज्यादा चीजें नहीं कर रहे हो — कई लोग हैं जो घर में बैठे हुए हैं इसी के बारे में सोच रहे हैं, परेशान हो रहे हैं, खबर देख रहे हैं — कहीं कुछ हुआ, कुछ हुआ, कुछ हुआ, कुछ हुआ। तो इसका तो काम ही है परेशान होना — मन का तो काम ही है परेशान होना। परेशान होना भी और परेशान करना भी। और लोगों को परेशान करता है।

तो आपने कोई ऐसी चीज अगर देख ली जिससे आप परेशान हो रहे हैं और इन परिस्थितयों में तो परेशान होना स्वाभाविक बात है और बड़ी आसान बात है। परन्तु, आपके अंदर एक चीज है कि इन सारी परिस्थितियों के होते हुए भी, वह इन सब चीजों से सम्बन्ध नहीं बनाना चाहती है, इन परेशानियो से सम्बन्ध नहीं बनाना चाहती है। वह परेशान नहीं होना चाहती है — वह है आपका हृदय। वह है असली आप। अब असली, नकली की बात आ जाती है — वही राजा जनक को जो किस्सा है, जो मैंने सुनाया पहले कि सच क्या है ? सच यह जो मैं दुनिया में देख रहा हूँ, यह सच है ? मैं राजा हूँ यह सच है कि मैंने जो सपना देखा वह सच है ? जिसमें मैं लड़ाई हार गया, जिसमें मैं जंगल में जा रहा हूँ और खाने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है, भूख लगी हुई है, भीखा हुआ हूँ मैं, भूखा हूँ — वह सारी चीजें, तो सच क्या है ?

तो जब अष्टावक्र जी को मौका मिला — राजा जनक के बारे में, राजा जनक को सम्बोधित करने का। तो अष्टावक्र ने यही समझाया कि "न यह सच है और न वह सच है।" जो प्रश्नों के उत्तर हम खोज रहे हैं वह किस दुनिया में खोज रहे हैं। या तो इस दुनिया में खोज रहे हैं, परन्तु न यह दुनिया सच है और न जो हमने अपने विचारों से दुनिया बनायी हुई है, न वह सच है। सच क्या है ? जो तुम्हारे अंदर स्थित है — वह सच है। वह तुम्हारा सच है। और जबतक तुम उस सच को जानोगे नहीं, उस सच को पहचानोगे नहीं, तबतक सवाल आते रहेंगे, उठते रहेंगे, उठते रहेंगे, उठते रहेंगे, उठते रहेंगे क्योंकि — एक किस्सा मैं सुनाता हूँ।

एक बार मैं नेपाल गया और बहुत साल हो गए हैं मुझे नेपाल गए हुए, तो काफी साल पहले की बात है मैं नेपाल गया, तो वहां जहां मैं ठहरा हुआ था, तो किसी ने कहा कि "जी एक व्यक्ति हैं और वह आपसे मिलना चाहते हैं।"

मैंने कहा "कोई बात नहीं, पर कौन हैं वह।"

उसने कहा कि, "जी यहां एक वेदांत सोसाइटी है और वह उसके प्रेसिडेंट हैं।”

हमने सोचा "भैया! वेदांत सोसाइटी के प्रेसिडेंट हमसे मिलना चाहते हैं, कहीं ऐसी बात आगे, प्रश्न ऐसा रख दिया, क्योंकि हमने वेदांत जो है वह पढ़े नहीं हैं, तो वेदांत सोसाइटी के प्रेसिडेंट हमसे मिलना चाहते हैं। मैंने कहा, पता नहीं क्या पूछेंगे!"

तो मैंने सोचा "ठीक है, कोई बात नहीं जो भी पूछेंगे मेरे को अपने अंदर से ही उत्तर देना है। और स्पष्ट रूप से जो भी मैं कह पाउंगा, वह मैं कहूंगा। तो मैंने कहा, ठीक है उनको बुला लो!"

तो सवेरे-सवेरे मैं उठा और सोचने लगा कि "हां आज वह आने वाले हैं, उनसे मिलना है, पता नहीं क्या कहेंगे! कैसी यह मीटिंग होगी!" तो सोचता रहा, सोचता रहा, सोचता रहा। फिर तैयार हुआ मैं गया, मीटिंग में गया।

तो वह आये और जैसे ही वह आये तो मैं बैठ गया, वह आये और उन्होंने कहा कि — "मैं तो सिर्फ आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ।"

मैंने कहा — "क्या ?"

कहा — "मैं धन्यवाद देना चाहता हूँ आपको, क्योंकि मैंने सारे वेद पढ़े और मेरे मन में यही प्रश्न था कि "वह असली चीज क्या है, वह असली चीज जो है, जो असली सार है, वह आपने मेरे को बता दिया। बस!"

मेरे लिए — मैंने कहा — ठीक है। फिर थोड़ी बहुत बातचीत की और वह चले गए। मैं सोचता रहा कि "तुम्हारे मन में यह था कि क्या पूछेगा, क्या होगा, कैसे होगा, यह होगा, वह होगा!"

और असली में बात थी कि किसी ने उस सार को समझा, जो मेन चीज है उसको समझा। और जब उस मेन चीज को समझ लिया तो उसके बाद कोई प्रश्न नहीं रह जाता है। उसके बाद फिर वह प्रश्न ही प्रश्न बन जाते हैं। क्योंकि यह है एक सीखने का तरीका, यह है एक समझने का तरीका। जैसे एक कमरे के अंदर अगर अँधेरा ही अँधेरा है, तो उस कमरे में क्या है आप उसको नहीं जान पाएंगे। उसको नहीं समझ पाएंगे कि क्या है उस कमरे के अंदर।

परन्तु जैसे ही उस कमरे में उजाला होगा तो प्रकाश जब होगा, उजाला जब होगा तो उजाला किसी चीज को बनाएगा नहीं। उजाला मेज को या कुर्सी को या गिलास रखा हुआ है वहां या पलंग रखा हुआ है वहां। उन चीजों को बनाएगा नहीं, परन्तु अगर वह चीजें वहां हैं, तो आप उनको देख सकेंगे। बस, बस! देखने के बाद आप, अपने आप इसका निर्णय ले सकते हैं कि आप उस कमरे में किस चीज का इस्तेमाल करना चाहते हैं — कुर्सी पर बैठना चाहते हैं या नहीं बैठना चाहते हैं या पलंग पर लेटना चाहते हैं या नहीं लेटना चाहते हैं। परन्तु पलंग है, कुर्सी है; मेज है; पानी है; आपको भूख लगी हैं, फल हैं। यह सारी चीजें वहां मौजूद हैं और अगर आप उन चीजों का सेवन करना चाहते हैं तो आप कर सकते हैं और यह क्यों हो रहा है ? यह इसलिए हो रहा है, क्योंकि अब उस कमरे में प्रकाश है। उजाले से पहले जब प्रकाश नहीं था, बत्ती जलने से पहले जब प्रकाश नहीं था, तब क्या हालत थी ? अगर आपको भूख लगी थी या प्यास लगी थी या आप थके हुए थे, आपको बैठने की जरूरत थी — आपको नहीं मालूम है कि कहां बैठें! आपको नहीं मालूम था कि पानी वहां है या नहीं है। आपको नहीं मालूम था कि वहां भोजन है या नहीं है! और इसके कारण मनुष्य परेशान होता है, क्योंकि उसको मालूम नहीं है।

परन्तु जब उसको मालूम होने लगता है, जब वह जानने लगता है, जब वह पहचानने लगता है, तो अपने आप फिर वह निर्णय ले सकता है कि उसको किस चीज की जरूरत है। अब उसको पूछने की जरूरत नहीं है, अगर उसको प्यास लगती है तो उसको पूछने की जरूरत नहीं है "पानी है या नहीं है!" अब वह देख सकता है कि "पानी है!"

ठीक इसी प्रकार अपने जीवन के अंदर, जब अंदर अँधेरा है, तो मनुष्य के हजारों प्रश्न हैं — क्या है, ये क्या है, वह क्या है, कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, क्या मैं नरक में जाऊँगा, क्या मैं स्वर्ग में जाऊँगा, मेरे साथ क्या होगा — सब — यह सारी चीजें सुनी हुई हैं। जब आप पैदा हुए थे आपको नरक के बारे में कुछ नहीं मालूम था, स्वर्ग के बारे में कुछ नहीं मालूम था — यह सब चीजें आपने सुनी कि "नरक होता है, स्वर्ग होता है, यह होता है, वह होता है" और आपने सोचना शुरू किया कि कहां जाऊँगा मैं ? मैंने कैसे कर्म किये हैं, मैंने कहीं गलती तो नहीं कर दी ? सारी चीजें होने लगती हैं, यह सारे डाउट्स (doubts) जो हैं, यह होने लगते हैं। परन्तु जब वह बत्ती, वह ज्ञान रूपी लाइट बल्ब जलने लगता है, इसलिए कहा है कि —

ज्ञान बिना नर सोहहिं ऐसे।

लवण बिना भव व्यंजन जैसे।।

क्योंकि भव्य व्यंजन लगते तो सब सुंदर हैं, सब ठीक हैं, सब अच्छे हैं, परन्तु खाने पर उनमें कुछ नहीं हैं, खाने में स्वाद नहीं है। ठीक इसी प्रकार, जिस मनुष्य के जीवन के अंदर वह ज्ञान रूपी बत्ती नहीं जल रही है उसका जीवन कुछ इसी प्रकार है कि सबकुछ है उसके पास, परन्तु वह नहीं जानता कि वह कहां है! वह यह नहीं जानता कि आगे क्या हो रहा है! वह यह नहीं जानता कि आज के दिन में क्या हो रहा है, कल की प्लानिंग के बारे में उसको सबकुछ मालूम है, कल की प्लानिंग करने में बड़ा माहिर है, परन्तु आज वह कुछ नहीं जानता। क्योंकि जो सब्र की बात होती है, वह बहुत बड़ी बात होती है।

एक बार एक व्यक्ति था। और उसने काफी धन कमाया, मेहनत की, काफी धन कमाया। उसके दो पुत्र थे, तो जब समय आया उसका तो उसने कहा, देखो मेरे दो पुत्र हैं — अपने बच्चों को बुलाया उसने, बड़े हो गए थे वह सब। उसने कहा, तुम जो दो हो उसमें से मैं एक चुनूंगा, जो मेरा वारिस बनेगा। यह सारा कुछ मैंने जो किया है, वह उसी के पास जाएगा। तो मैं अगले कमरे में जा रहा हूँ और मैं उस कमरे में जब चला जाऊंगा तब तुमको बुलाऊंगा एक-एक करके और तुमसे कुछ प्रश्न पूछूंगा और जो मेरे को अच्छी तरीके से उसका जवाब देगा उसको मैं यह सारी चीजें सौपूंगा।

बहुत कुछ कमाया था उसने। पहले बच्चे को बुलाया, पहले लड़के को बुलाया। कमरा बिलकुल अँधेरा था, उस कमरे में अँधेरा ही अँधेरा था। पहले लड़के से वह पूछता है कि — "तुम क्या-क्या देख सकते हो ?”

तो लड़का बोलता है — "क्या-क्या देख सकते हो, यह कैसा प्रश्न है ? इस कमरे में तो अँधेरा ही अँधेरा है, मैं कुछ नहीं देख सकता। हाँ! इतनी बात है कि मैं आपको सुन जरूर सकता हूँ, परन्तु मैं देख कुछ नहीं सकता हूँ। इस कमरे में कुछ नहीं है। आपके सिवा इस कमरे में कुछ नहीं है।"

दूसरे लड़के को उसने बुलाया — तो उसने कहा, ठीक है — (पहले वाले को, बड़े वाले को) जाओ तुम जैसा भी तुमने जवाब दिया है, अच्छा है! तुम्हारे समझ से सही जवाब तुमने दिया है।

दूसरे को बुलाया, दूसरा आया तो वह जो लड़का आया वह खड़ा हो गया।

तो उसने कहा — "तुम क्या-क्या देख सकते हो ?"

तो उस लड़के ने कहा कि — "उससे पहले कि मैं इस बात का आपको जवाब दूँ कि मैं क्या-क्या देख सकता हूँ। मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। वह सवाल है कि "आपने यह सबकुछ जो कमाया, यह कैसे कमाया ?

तो बाप बड़ा खुश हुआ कि "मेरा जो लड़का है यह जानना चाहता है कि मैंने कैसे कमाया!" तो कहने लगा कि मैंने मेहनत की, मैंने ईमानदारी से कमाया, मैं ईमानदार बना और ईमानदारी से मैंने यह सब इकट्ठा किया। मेहनत से मैंने यह सब इकट्ठा किया, सोच-समझ के मैंने काम किया। जब मेरे को नहीं मालूम था कि क्या करना है, तो मैंने उसकी सलाह और लोगों से ली जो मेरे दोस्त थे, मेरे अच्छे चाहने वाले थे; जो इसमें माहिर थे। उनसे मैंने सलाह ली फिर धीरे-धीरे-धीरे-धीरे करके, सब्र रखकर मैंने ये सारी चीजें इकट्ठा कीं।

तब उसके पिता ने बोला कि "ठीक है तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न मेरे से पूछा, पर मेरे प्रश्न का भी तुम जवाब दो, क्या तुम देख सकते हो कुछ ?"

तो वह बोलता है — "हाँ मैं देख सकता हूँ! आप खड़े हैं यहां, आपके बगल में मेज है, वहां कुर्सी लगी हुई है। यह सबकुछ है।

तो क्यों वह देख सका ? जब पहला वाला आया, उससे जब पहले-पहले प्रश्न किया गया, तो उसने अपनी आँखों को समय नहीं दिया बदलने का। देखिये! जब बाहर धूप लगी हुई है, बाहर से अंदर आते हैं, जहां अँधेरा है तो समय लगता है कि आँखें एडजस्ट (adjust) करें। और फिर आँखें देखने लगती हैं। तो जो पहला वाला था, उसने वह समय नहीं दिया, उसने वह समय नहीं दिया। उसने कहा, मेरे को कुछ नहीं दिखाई दे रहा और वह चला गया।

पर जो दूसरा वाला था वह होशियार था। उसको मालूम था कि मैं तभी देख पाऊंगा अगर मैं इन आँखों को थोड़ा-सा समय दूँ। ताकि यह, जो यह माहौल है इसके अनुकूल बदल सके। तो वह बात उसने पूछ लिया अपने पिताजी से कि "आपने यह सबकुछ इकट्ठा किया!" और वह जो पिता उसको समझा रहा था तबतक उसकी आँखें उस कमरे के अँधेरे से एडजस्ट हो गयीं। जब एडजस्ट हो गयीं, तो उसको सबकुछ दिखाई देने लगा। तो उसका बाप बड़ा खुश हुआ और उसी के नाम सबकुछ उसने कर दिया।

बात धन की नहीं है। बात दौलत की नहीं है। बात यह है कि क्या आप भी वह समय देते हैं ? जब आप बाहर से, इस दुनिया से अंदर की तरफ मुड़ें, तो क्या आप भी वह समय देते हैं कि आप भी एडजस्ट हो सकें, जो अंदर की चीज है उसको जानने के लिए ?

तो कई बार हम यह नहीं होने देते हैं। और लगे रहते हैं — "क्या है, ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए!" सचमुच में यह जो मन है, यह फोटो छापता रहता है, फोटो छापता रहता है — ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए, मेरी बीवी ऐसी होनी चाहिए, मेरा परिवार ऐसा होना चाहिए, मेरे बच्चे ऐसे होने चाहिए; मेरे दोस्त ऐसे होने चाहिए, इन सब चीजों के पीछे लगा रहता है, लगा रहता है, लगा रहता है, लगा रहता है। अगर सचमुच में इस बारे में सोचा जाए तो झगड़े की जड़ यही है — सारे चित्र हैं हमारी जिंदगी के अंदर, जो हमने बना रखे हैं।

तो ध्यान दीजिये और सुरक्षित रहिये; तंदरुस्त रहिये और सबसे ज्यादा, सबसे बड़ी चीज आनंद से रहिये!

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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