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लॉकडाउन 15 00:23:54 लॉकडाउन 15 Video Duration : 00:23:54 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (7 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

मैं एक चीज आपको सुनाता हूं —

हृदया भीतर आरसी, मुख देखा नही जाय।

मुख तो तबहि देखहि, जब दिल की दुविधा जाय॥

कबीरदास जी कहते हैं कि हम सभी प्राणियों के हृदय में एक आईना है और वह आईना, उसमें हम अपना फेस देख सकते हैं, अपना चेहरा देख सकते हैं, अपने आपको देख सकते हैं इसका मतलब यही है। परंतु उस पर धुंध लगी हुई है, मैल लगा हुआ है और जबतक दिल साफ नहीं होगा तबतक वह आईना ठीक ढंग से आपका जो — आपकी जो छवि है उसको दिखा नहीं पाएगा। तो यह मैला कैसे हो जाता है, क्यों हो जाता है ?

लोगों का यह भी प्रश्न है। देखिये! कोई भी चीज है अगर उसको छोड़ दिया जाए, उस पर कोई अमल नहीं किया जाए, उस पर कोई कोशिश नहीं की जाए, उसको साफ नहीं रखा जाए, तो धीरे-धीरे-धीरे वह मैला होने लगेगा। मनुष्य के साथ भी यही बात है। जो असली चीज है वह क्यों है यहां, वह क्या कर सकता है, क्या पाने की उसकी इच्छा है। अगर वह इन सब चीजों को भूलने लगे कि वह यहां क्यों आया है ? वह जो परमानंद का आनंद है उसको लेने के लिए यहां आया है — अगर वह ये सारी चीजें भूलने लगे तो धीरे-धीरे करके और कोई चीज आ जाती है। और वह क्या आती है — वही धुंध, वही मैल लगने लगता है!

कई बार मैं सुनाता हूँ कि जब हम कपड़े साफ करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि हम सफाई कहीं से लाते हैं, सफाई कहीं से नहीं लाते सफाई तो उस कपड़े में है पर वह सफाई दिखाई नहीं दे रही है और इसलिए नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि उस पर मैल लगा हुआ है। अगर आप उस कपड़े को साफ करना चाहते हैं तो सफाई लाने की जरूरत नहीं है। मैल को निकालने की जरूरत है मैल को अगर आप निकाल देंगे तो कपड़ा अपने आप साफ हो जाएगा।

ठीक इसी प्रकार मनुष्य के अंदर भी जो मैल है, वह मैल जो दुविधा होती है; जो प्रश्न उठते हैं; जो शंकाएं होती हैं; यह वह मैल है। जब वह जान नहीं पाता है, पहचान नहीं पाता है कि मैं क्या हूं और मेरे अंदर क्या है तो उसको वह दिखाई नहीं देता है साफ तरीके से कि असली चीज क्या है! अगर वह असली चीज को जानना चाहता है, अपनी असलियत को समझना चाहता है, तो यह जो भ्रम का मैल है इसको निकालने की जरूरत है। परन्तु दुनिया भर के लोग सफाई को ढूंढ रहे हैं जो, उनको जब मालूम पड़ता है कि यह मन का मैल है इसको निकालने की जरूरत है तो वह सफाई को ढूंढने लगते हैं कि हम सफाई को — सफाई हमारे पास आ जाए तो फिर यह अपने आप चला जाएगा। नहीं! यह मैल को निकालने की जरूरत है और जब मैल को निकालेंगे तो सफाई अपने आप है।

तो भ्रम जो होता है मनुष्य को, वह क्यों होता है ? क्योंकि जो चीज वह जानता है, जो चीज स्पष्ट है उसके लिए वह अस्पष्ट हो जाती है जब भ्रम आता है। जब मनुष्य भ्रमित होता है कि मैं क्यों हूं यहां ? काहे के लिए हूं ? क्योंकि जब दुःख उसके ऊपर पड़ते हैं तब वह सोचता है कि यह क्या हो रहा है, मैं इससे कैसे निकलूं ? मैं इससे कैसे स्वतंत्र होऊं ? क्या होगा मेरे साथ ? जब मनुष्य को आज की कदर कम हो जाती है और कल की कदर ज्यादा हो जाती है तो अपने आप मनुष्य भ्रमित होता है क्योंकि आज में तो वह सही है। आज में तो जो हो रहा है वह उसके साथ हो रहा है पर वह जब कहने लगता है अपने से कि कल क्या होगा; जब वह कहने लगता है अपने से कि कल क्या होगा तब उसका दिमाग जो है चक्कर खाने लगता है। कल क्या होगा ? यह भी हो सकता है, यह भी हो सकता है, यह भी हो सकता है —

सो परत्र दुख पावहि सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।।

देखिये बड़ी साधारण सी बात है। इस परिस्थिति में भी आप देख लीजिये — जो कोरोना वायरस की परिस्थिति है इसमें भी आप देख लीजिये।

क्योंकि गवर्नमेंट कुछ कहे न कहे बात आपकी सुरक्षा की है। आप — बात किसी और चीज की नहीं है, बात पॉलिटिक्स की नहीं है; राजनीति की नहीं है किसी और चीज की नहीं है सबसे बड़ी बात है कि आप सुरक्षित रहें। आप बीमार न हों। छोटी-सी बात है इसका जो रिजल्ट है, इसका जो निष्कर्ष वह तो बहुत बड़ी चीज है। आपको जीवन मिलेगा, आप जी सकते हैं। यह तो, परन्तु इसको करना क्या है ? बड़ी छोटी-सी बात है — परहेज करना है!

किसी और से ना मिलें — यह सोचें अपने मन में कि जो कोई भी है बाहर उसको यह बीमारी है और उससे आपको यह बीमारी लग सकती है। तो सब से दूर रहें। 6 फीट का (अभी बताया है सभी लोगों ने कि) 6 फीट की दूरी बनाकर रखें। अपने हाथ धोएं। यह तो समझ लीजिये कि किसी ने आपको बताया। अब जब इस पर अमल करने की बात है, जब अमल करने की इस पर बात आती है तो लोग कहते हैं — ठीक है! 1 दिन ठीक है; 2 दिन ठीक है; 3 दिन ठीक है; 4 दिन ठीक है; पर जैसे-जैसे यह समय बीतता जा रहा है मन और चंचल होता जा रहा है।

जैसे मैंने पहले कहा कि यह जो आवाज है, जो मन की आवाज है यह आपके कानों के बीच की आवाज़ है। आपके कानों के बीच के अंदर लगी हुई है और कान बंद करने से यह आवाज जाएगी नहीं। जो भी आप कर रहे हैं आपके अंदर यह आवाज है और आपको परेशान कर रही है, परेशान कर रही है, परेशान कर रही है, परेशान कर रही है, आप परेशान होते जा रहे हैं। यह तो उल्टी बात हो गई, यह तो उल्टी बात हो गई। मैं एक बात कहता हूं कि जिस घड़े में, जिस मटके में छेद है नीचे उसमें कितना पानी आ सकता है ? उसमें तुम सारे समुद्र का पानी भी डाल दो तब भी वह मटका भरेगा नहीं जबतक उस मटके में वह छेद है, तो तुम सारे समुद्र का पानी उस मटके में डाल सकते हो तब भी वह मटका नहीं भरेगा।

ठीक इसी प्रकार, जिस मनुष्य के अंदर यह भ्रम है, जिसका मन एकाग्र नहीं है, जो अपने आपको नहीं जानता है उस मनुष्य को आप कोई भी चीज कह दीजिए भले से भले चीज कह दीजिए परंतु उस पर वह अमल नहीं कर पाएगा। मतलब, छोटी-सी बात है, छोटी-सी बात है — आशा देखिए!

दूसरी बात, अब लोग यह भी कह रहे हैं कि "यह क्यों हो गया, ऐसा हो गया कि किसी पर यह ब्लेम लगाना चाहिए, किसी को दोषी ठहराना चाहिए।" बाद में, बाद में अभी नहीं। अभी जो करना है वह यह करना है कि आप सुरक्षित रहें और इसका कोई इलाज — जब वैज्ञानिक लोग, डॉक्टर लोग जब इसका इलाज निकाल लेंगे और आप ठीक हो जायें और सब चीजें ठीक हो जायें और कोई आपको बाहर से आकर के यह बीमारी न दे तब और सारी बातें। पर और तब नहीं होगा, तब नहीं होगा! क्यों इसलिए नहीं होगा क्योंकि फिर लोग लग जायेंगे अपने काम में, लग जाएंगे सारी बातों में। और यह जो कुछ भी आपने सीखा है यह सब लोग भूल जायेंगे। मैं ज्योतिषी हूँ जो आपको यह कह रहा हूँ ? नहीं! किसी ने आकर मेरे कान में यह बात कही ? नहीं!

दो-तीन दिन पहले मैं देख रहा था कि अट्ठारह सौ कुछ में, साल 18 सौ कुछ में एक 'स्पेनिश फ्लू' हुआ था ठीक इसी तरीके का। और वह फ्लू भी सारे संसार भर में फैला और जो कुछ भी उस समय हुआ, वह इस समय भी हो रहा है और लोगों ने उस समय से कोई चीज नहीं सीखी, कोई चीज नहीं समझी। अब फिर वही चीज हो रही है। ऐसे ही लड़ाईयां होती हैं, ऐसे ही सबकुछ होता है।

आप अपने जीवन में इस समय में सबसे बढ़िया मौका है कुछ समझने का, कुछ सीखने का। क्या सीखना है आपको ?

एक, सबसे पहली बात यह मनुष्य शरीर जो आपको मिला है, यह समय जो आपके पास है यह बहुत ही दुर्लभ है। इसका कोई मोल नहीं है। इस बात को जानिये! अपने आपको जानिये! सचेत होकर के अपनी जिंदगी को बिताइये। और अपने हृदय के अंदर, पूरी तरीके से आभार प्रकट करने की कोशिश कीजिये कि आपका हृदय आभार से भरे।

आभार किस चीज के लिए ? जो सबकुछ सुंदर है, जो अच्छा है उसके लिए। उसके लिए आपको जानना पड़ेगा कि अच्छा क्या है, आपके लिए अच्छा क्या है ? मैं बताता हूं आपके लिए अच्छा क्या है। आप तो सोचते हैं आपके लिए अच्छा है कि "आपका धन बढ़े, आपका बिजनेस बढ़े, आपका परिवार बढ़े, आपका घर भरे, आपका यह हो, वह हो।" नहीं, मैं बताता हूँ आपके लिए अच्छा क्या है ? अच्छा है "इस स्वांस का आना-जाना।"

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

यही भगवान कहते हैं कि इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है। यह है आपके लिए अच्छाई — "इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है।" इस कृपा को स्वीकार कीजिये। जबतक आप कृपा को स्वीकार नहीं करेंगे तब तक यह भ्रम जाएगा कैसे-कैसे यह पता लगेगा कि यह साफ हो गया है और आवाज कहां है कानों के बीच में है बाहर नहीं है, बाहर होती तो इयर-प्लग लगा करके या ऊँगली लगा करके या अंगूठा लगा करके उसको बंद कर लेते। परन्तु यह तो कानों के बीच में है। और कानों के बीच में होने की वजह से यह समझ में नहीं आता है कि कहां जाऊं, क्या करूं, सब अन्धेरा ही अँधेरा दिखाई देता है। सब अन्धेरा ही अँधेरा दिखाई देता है।

अब वो एक प्रश्न था जो किसी ने पूछा कि — "जब मैं अपने दोस्तों को देखता हूं उनके पास नई-नई लेटेस्ट गैजेट होते हैं तो मेरे को ईर्ष्या होती है कि उनके पास नहीं है मेरे पास — मेरे पास नहीं है उनके पास है।"

फिर सोच रहा था रात को — तुम्हारे पास एक ऐसा गैजेट है कि तुम उसकी कदर जान सकते हो। उसको तुम बाहर उभार सकते हो अपनी जिंदगी के अंदर। एक ऐसा गैजेट है कि वह हमेशा लैटेस्ट (latest) होता है, हमेशा लैटेस्ट होता है। और कैसा गैजेट है, क्या गैजेट है ? वही तुम्हारे स्वांस का गैजेट है, यह हमेशा नई आती है — पुरानी नहीं, नई आती है और तुम्हारे को जिंदगी लाती है। ऐसा गैजेट उनके पास नहीं है। तुमको ईर्ष्या की जरूरत नहीं है। तुम समझो कि तुम्हारे पास क्या चीज है और जबतक हम समझेंगे नहीं कि हमारे पास क्या चीज है, क्या संभावना है यह जिसको जीवन कहा जाता है यह संभावना है और संभावना क्या है और कैसी है जबतक हम इस बात को जानेंगे नहीं, समझेंगे नहीं, तबतक सबकुछ अधूरा ही रहेगा। जान नहीं पाएंगे, पहचान नहीं पाएंगे कि क्या है ? और जो दुनिया हमको कहेगी हम उसी को स्वीकार करते चले जाएंगे। यही तो चक्कर है।

सवेरे-सवेरे कितने ही लोग हैं जो अखबार पढ़ते हैं या टेलीविज़न चालू करते हैं या रेडियो चालू करते हैं। काहे के लिए, खबर सुनना चाहते हैं। क्या हो रहा है, क्या हो रहा है यह सुनना चाहते हैं। ठीक है सुनिए! पर क्या हो रहा है, हमसे पूछिए। हमसे पूछिए, दरअसल में क्या हो रहा है। हम देते हैं आपको खबर। क्या हो रहा है ? आपका स्वांस चल रहा है। इस सारे संसार को रचने वाले की आप पर कृपा हो रही है, यह हो रहा है। हॉट न्यूज़, हैडलाइन न्यूज़ क्या है कि "आप जीवित हैं!" यह होनी चाहिए हैडलाइन न्यूज़। यह है असली हैडलाइन न्यूज़ — आप जीवित हैं!

अगर आपके लिए यह हैडलाइन न्यूज़ नहीं है तो, आप तो गए। चाहे आपको कुछ भी ना हो! आप तो गए। क्यों गए ? क्योंकि खाली हाथ आप आये थे, खाली हाथ आपको जाना है। कुछ पल्ले नहीं लगेगा।

भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल,

गठरी खोलना भूल गए, इस विधि भये कंगाल

यह भी कबीरदास जी ने कहा है।

दरअसल में गरीब भूखा कोई नहीं है। परन्तु जो गठरी है उसको खोलना भूल गए, क्योंकि जब खोली नहीं तो इसीलिए कंगाल हो रखे हैं। कंगाल होना यह मतलब नहीं है कि कंगाल, कंगाल है। अगर वह अपने आपको कंगाल महसूस करता है तो चाहे कितना से भी कितना धनी आदमी हो, वह कंगाल हो गया। वह महसूस क्या करता है ?

अगर हजारों लोग एक जगह बैठकर खाना खा रहे हैं पर तुम खाना नहीं खा रहे हो और तुमको भूख लगी हुई है तो यह थोड़ी है कि तुम हजारों लोगों के बीच में बैठे हुए हो वह खाना खा रहे हैं, तो तुम्हारी भूख भी खत्म हो जाएगी। ना! जबतक तुम खाना नहीं खाओगे तबतक तुम्हारी भूख कैसे खत्म होगी। तुम अगर नदी के पास चले जाओ नदी में साफ पानी है, नदी में स्वच्छ पानी है, नदी में मीठा पानी है तो क्या तुम्हारी प्यास खत्म हो जाएगी ? जब तक पानी नहीं पियोगे तब तक वह नदी में कितने हजारों-हजारों गैलन पानी बह रहा है, परन्तु तुम्हारी प्यास खत्म नहीं होगी, जबतक तुम उस पानी को पियोगे नहीं। तो बात हो गयी स्वीकार करने की, समझने की, अपनाने की और मैं दूसरी चीज की बात नहीं कर रहा हूं मैं कह रहा हूं कि आप अपने जीवन को अपनाइये। इसमें आपको राहत मिलेगी। इसमें आपको चैन मिलेगा। इसमें आपको सुख मिलेगा। इसी में है वह 'सच्चिदानंद' — सत् चित् और आनंद और जब तक खोजते रहोगे, खोजते रहो। क्या चाहते हो ?

सभी लोग चाहते हैं कि "जी, हम सफाई चाहते हैं, हमको सफाई दे दो, सफाई दे दो, सफाई दे दो, सफाई दे दो, अब मैं कैसे दे दूँ सफाई ? सफाई तो तुम्हारे अंदर है। हां, मैल धोने के लिए साबुन चाहिए —

गुरु धोबी सिस कापडा, साबुन सिरजनहार ।

सुरति सिला पर धोइये, निकसे मैल अपार

इस चीज की जरूरत है। यही कहा है कबीरदास जी ने कि — गुरु तो है धोबी वह धोता है और शिष्य क्या है — कपड़ा है। गुरु धोबी सिस कापडा, साबुन सिरजनहार

— साबुन जो है वह मैल को धोने का साधन है। सुरति सिला पर धोइये — जब उस सुरति को, इस ज्ञान के अंदर लगाएंगे और फिर धोयेंगे, रगड़ेंगे — यह जो स्वांस अंदर आ रहा है, जा रहा है — धोयेंगे — ढ़ंक, ढ़ंक, ढ़ंक, ढ़ंक! देखा होगा आपने, जब धोते हैं। जब वह सुरति चढ़ेगी, तब सारा मैल निकलकर अलग होगा।

तो यह बात समझने की है, सोचने की है और सबसे बड़ी बात घबराने की नहीं है। घबराने से कुछ नहीं होगा, डरने की नहीं है, डरने से कुछ नहीं होगा। अपनी ताकत, जो अंदरूनी अपनी ताकत है आपके पास, अब उसको इस्तेमाल करने की जरूरत है। अभी कितने दिन और लग सकते हैं इसमें। लोग पूछ रहे हैं यह कब खत्म होगा ? कब खत्म होगा ? जब खत्म होगा तब खत्म होगा। यह किसी के लाइसेंस को लेकर तो चलता नहीं है। यह जो वायरस है यह जीती-जागती चीज थोड़े ही है। यह तो जीता-जागता कीटाणु भी नहीं है परंतु यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक बड़े आसानी से पहुंचता है — जब कोई छींकें या थूकें। तो इसलिए कहते हैं मास्क पहनो। ताकि "एक तो तुमको न लगे और तुम किसी को नहीं लगने दो।"

तो यही बात है कि सबसे सुंदर बात, सबसे अच्छी बात यही है कि हम अपने जीवन में इस बात को समझें, डरे नहीं चाहे कुछ भी समस्या सामने आए। कोई भी समस्या बनकर सामने आए। चाहे यही चीज समस्या बन जाए कि "तुम एक जगह रहो, अपने घर पर रहो, बाहर मत जाओ!" कई लोगों के लिए तो यही समस्या बन गया है। जी नहीं सकते वो! परन्तु जो जानता है कि तुम्हारे अंदर वह है बैठा हुआ, उसके साथ कुछ समय बिता सकते हो तो बिताओ। इससे बढ़िया चीज क्या हो सकती है, इससे बढ़िया चीज कुछ नहीं हो सकती है। परंतु जिसको नहीं मालूम है, उसको नहीं मालूम है। जिसको मालूम है, उसको मालूम है और जिसको मालूम है, उसके लिए आनंद ही आनंद है। कहीं भी आनंद है, कहीं भी चले जाओ।

वही मैं सुनाता हूं लोगों को। एक आदमी था साउथ अफ्रीका में, तो वह मेरा सत्संग सुनता था। उसमें मैं कहता था कि "भाई! तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है।” आपलोगों ने भी सुना होगा कितनी बार मैंने लोगों से कहा है कि "तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है।”

तो एक दिन वह अपने कमरे में गया। अपने बंक (Bunk) पर लेटा हुआ था वह और उसने अपनी आंखें बंद की और वह अपने स्वांस पर ध्यान करने लगा। तो स्वांसपर ध्यान करने लगा। वह जेल में है और यह जेल में हो रहा है और स्वांस पर अपना ध्यान करने लगा और करते-करते-करते वह कहता है कि मेरे अंदर मैं शांति का अनुभव करने लगा और इतनी शांति, इतनी शांति जितना मैं और इसमें मेरा ध्यान गया — “सूरत शिला पर धोइये निकसे मैल अपार”

जैसे-जैसे वह मैल निकलने लगा इतनी शांति का अनुभव किया, इतनी शांति का अनुभव किया कि मैं सोच भी नहीं सकता कि इतनी शांति मेरे अंदर मौजूद थी। यह कैसे संभव हुआ जेल में ? जेल में यह हो रहा है! जेल में — आप तो जेल में नहीं अपने घर में हैं। यह जेल में हो रहा है! और ऐसी-वैसी जेल नहीं थी वह, बहुत-बहुत स्ट्रिक्ट (strict) जेल है तो अपने जीवन को सफल बनाइए, आनंद लीजिए। जैसे भी आप ले सकते हैं आनंद लीजिए। सब्र रखिए! एक दिन यह खत्म होगा, होगा और जबतक हो तबतक आप सब्र रखिये और आनंद लीजिये।

सभी को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 14 00:18:06 लॉकडाउन 14 Video Duration : 00:18:06 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (6 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

जिस चीज के बारे में मैं चर्चा करने जा रहा हूं वह यह है क्योंकि, मैं जब प्रश्न पढ़ रहा था और मैंने काफी सारे प्रश्न पढ़े तो मुझे एहसास हुआ कि लोगों को अभी भी डर है इस कोरोना वायरस को लेकर के। देखिये! आप डर सकते हैं, अगर आप डरना चाहते हैं तो यह आपके ऊपर निर्भर है। परंतु आपको मैं यह बताना चाहता हूं कि डरने से कुछ हासिल नहीं होगा, कुछ भी नहीं होगा। होगा क्या ? आप परेशान होंगे, जब आप परेशान होंगे तो आपका शरीर और कमजोर होगा आपका शरीर अगर कमजोर होगा तो यह वायरस जिससे आप डर रहे हैं यह और आप पर आक्रमण कर सकती है। सबसे बड़ी बात है कि आप अंदर से खुश रहें और अंदर की खुशी कहां से आएगी, कैसे मनुष्य अंदर से खुश रह सकता है इन परिस्थितियों में ?

तो बात यह है कि यह सारी परिस्थिति जो हैं, जो भी परिस्थिति है इस समय, एक तो यह आपके अंदर नहीं है आपसे बाहर है। और दूसरी चीज इसका प्रभाव सबसे ज्यादा — उससे पहले कि आपको यह बीमारी हो या ना हो वह देखा जाए सबसे ज्यादा प्रभाव इस बीमारी का आपके कानों के बीच में पड़ रहा है। मैंने जो अभी नई किताब लिखी है इसमें मैं चर्चा करता हूं और चर्चा यही है कि जो बाहर की आवाज है उसको तो आप बड़ी आसानी से बंद कर सकते हैं, अपने कानों को बंद कर लीजिए और वह आवाज बंद हो जाएगी। पर, जो आवाज कानों के बीच में है उसको कैसे बंद किया जाए ?

तो यही सबसे बड़ी बात हो जाती है — एक, आपके अंदर क्या-क्या शक्तियां हैं, किन चीजों का आप उपयोग — जिन शक्तियों का आप उपयोग कर सकते हैं, कौन सी शक्तियां हैं आपके पास ? आपके पास सहनशीलता है, आपके पास सब्र है, आपके पास स्पष्टता है, आपके पास जानना है — मानना नहीं जानना, आपके अंदर वह — जो सारे सृष्टि का पालनहारा है वह भी आपके अंदर मौजूद है। तो मतलब, आपके अंदर की जो चीजें हैं उनमें कोई कमी नहीं है और आप किसी, किसी भी परिस्थिति का बुरे से बुरे समय में भी आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

भगवान कृष्ण क्या कहते हैं अर्जुन को, (मैं आपको बताता हूँ) कहते हैं — "अर्जुन तू युद्ध भी कर और मेरा सुमिरन भी कर! मेरे को अंदर याद रख, मेरा सुमिरन भी कर और युद्ध भी कर!"

तो समझने की बात है कि क्या कहा जा रहा है कि — यह जो सारी चीजें हो रही है बाहर इनके बावजूद भी एक चीज तुम्हारे अंदर हो रही है और उसका सुमिरन करना तुम्हारे लिए बहुत जरूरी है कि मैं सबके हृदय में विराजमान हूं। भगवान कह रहे हैं कि “मैं सबके हृदय में विराजमान हूं और जो मेरा सुमिरन करता है, जो मेरा ध्यान करता है।” तो कैसा ध्यान अब यह भी समझने की बात है, क्योंकि हमलोगों ने भगवान की फोटो देखी हैं। चित्रकारों ने अपने मन से जो उनके मन में था कि — "भगवान ऐसे होंगे, भगवान ऐसे होंगे" जो वर्णन उन्होंने सुना, उसके आधार पर उन्होंने चित्र बनाये। भगवान को आंखें भी दीं, भगवान को नाक भी दिया, भगवान को केश भी दिये, भगवान को ये भी दिया, भगवान को सबकुछ..बिलकुल मनुष्य की तरह भगवान को बनाया।

लोग जब भगवान का सुमिरन करते हैं, वह जब तस्वीरों को देखते हैं, मूर्तियों को देखते हैं, आकार को देखते हैं तो वह समझते हैं कि भगवान का आकार है। परंतु वह, जो समय से पहले था, जो है और हमेशा रहेगा; जब मनुष्य नहीं रहेंगे तब भी वह रहेगा; जब मनुष्य नहीं थे तब भी वह था; आज मनुष्य है तब भी वह है। उसका आकार क्या है, उसको आकार की क्या जरूरत है ? हमको आंखों की जरूरत है, हमको नाक की जरूरत है क्योंकि हम स्वांस लेते हैं नाक से, सूंघते हैं नाक से। मुँह — मुँह से बोलते भी हैं, खाना भी खाते हैं। कान की हमको जरूरत है, कान से हम सुनते हैं। पर, जो सब जगह व्यापक है जो सब जगह है, जिसके लिए सुनना न सुनना इसका कोई महत्व नहीं है यह हमारे लिए तो है। तो क्या हम भगवान को अपने रूप में बना रहे हैं या भगवान का असली रूप स्वीकार कर रहे हैं ?

अगर भगवान का हम असली रूप स्वीकार करना चाहते हैं, तो उसका हमको एहसास करना पड़ेगा हमारे अंदर। वह इस तरीके से नहीं है कि हमारे कोई ख्याल हैं, कोई विचार हैं और उन विचारों में वह सृष्टि का पालनहारा जो है, पालनहार जो है, वह हमारे विचारों में; हमारे दृष्टिकोणों में; हमारे चित्रों में — हम जो अपने मन से चित्र बनाते हैं उसमें वह फंसा हुआ है। नहीं! उसको फंसने की क्या जरूरत है। मैं कई बार कहता हूँ कि भगवान — वह भगवान, जो असली भगवान है वही एक है, जो इधर से उधर नहीं जा सकता। क्योंकि वह इधर भी है और उधर भी है, यहां से जायेगा कहां ? वह यहां भी है, यहां भी है — सबसे बड़ी बात है, सबसे बड़ी बात है।

एक बार अकबर और बीरबल की बात आती है, तो एक बार अकबर के दरबार में एक कवि आया। उसने एक कविता लिखी अकबर के बारे में कि "कितना महान वह राजा है सबकुछ है उसके पास!" तो सब ने वाह-वाह की। सबने कहा , "यह तो बिल्कुल सच बात कही इसने, कितनी सुंदर इसने कविता बनाई है।" तो जब उसको लगा कि सब लोगों को यह पसंद है तो उसने फिर एक और कविता बनायी और उसमें और राजा की बड़ाई की। और जब उसने सुना कि लोग ताली बजा रहे हैं, सब बड़े प्रसन्न हो रहे हैं, राजा भी खुश हो रहा है, तो उसने एक और कविता बनायी। ऐसे वह कविता बनाते गया, बनाते गया, बनाते गया, बनाते गया, बनाते गया। अंत में ऐसी उसने कविता बनाई जिसमें उसने कहा कि "आप तो भगवान से भी बड़े हैं, आप तो भगवान से भी बड़े हैं!"

अब जैसे ही उसने यह कहा तो एकदम सन्नाटा छा गया। अब कोई राजा की तरफ देखे, कोई अकबर की तरफ देखे, कोई कहीं देखे, कोई कहीं देखे अब — क्या हमको ताली बजानी चाहिए या नहीं बजानी चाहिए! ताली बजाते हैं तो इसका मतलब है कि सचमुच में हम इससे सहमत हैं कि "अकबर भगवान से भी बड़ा है" और यह तो हो नहीं सकता। क्योंकि हमको मालूम था कि यह कैसे हो सकता है, यह कैसे संभव है। ताली बजा रहे हैं या नहीं बजाएं क्या करें, क्या नहीं करें! उनको हिचकिचाहट हुई।

राजा ने देखा कि कोई ताली नहीं बजा रहा है इसने इतनी बड़ी बात कह दी कि "यह भगवान से भी बड़े हैं और एकदम से सन्नाटा सा फैल गया सारे दरबार में।" तो यह कैसे हो गया ? तो अकबर को सूझी तो उसने बीरबल की तरह देखा कहा "बीरबल! क्या सचमच में मैं भगवान से बड़ा हूं ?"

तो बीरबल ने कहा "बादशाह! मेरे को एक दिन का टाइम दीजिए, दो दिन का टाइम दीजिए मैं सोचकर आपको बताऊंगा।"

अकबर ने कहा — ठीक है! जाओ।

तो दुविधा में पड़ा बीरबल, क्या कहूं ? अब अगर मैं यह कहता हूँ कि "हां आप भगवान से बड़े हैं!" तो यह तो गलत होगा। और अकबर को अच्छी तरीके से मालूम है कि "वह भगवान से बड़ा नहीं है।" तो वह मेरे को कोड़े — मेरे पर कोड़े बरसायेगा या मेरा सिर अलग कर देगा या मेरे को कोई न कोई पनिशमेंट (punishment) देगा। तो मैं क्या करूं, क्या करूं, क्या करूं! सोचता रहा! सोचता रहा! फिर उसको एक ख्याल आया।

दूसरे दिन गया, बड़ा खुश होकर गया अकबर के दरबार में, उसने कहा कि “मेरे को जवाब मिल गया है आपके प्रश्न का बादशाह।”

तो अकबर ने कहा, क्या ? क्या मैं सचमुच में भगवान से बड़ा हूँ ?

कहा — "बड़े-छोटे की बात नहीं है, पर आप एक चीज कर सकते हैं, जो भगवान नहीं कर सकता।" सारे दरबार में एकदम सन्नाटा फैल गया कि, यह तो कुछ न कुछ ऐसा कहेगा कि गड़बड़ होगी।

तो अकबर को भी लगा कि "मैं कुछ ऐसा कर सकता हूँ, जो भगवान नहीं कर सकता है। यह तो बहुत बड़ी बात हो गयी।"

अकबर ने कहा, "बीरबल बताओ, क्या ऐसी बात है, जो मैं कर सकता हूँ, भगवान नहीं कर सकता।"

तब बीरबल ने कहा, "आप किसी को अपने देश से, जहाँ तक आपका राज्य है, अपने राज्य से बाहर निकाल सकते हैं। परन्तु, वह जो सारे संसार का पालनहारा है, वह किसको अपने राजदरबार से कहां बाहर निकल सकता है! जहां तक उसका राज्य है, जहां तक उसकी सृष्टि है, जहां तक उसकी रचना है वही सबकुछ है और वह किसको बाहर निकालेगा ? कहाँ भेजेगा ? कौन सी ऐसी जगह है जहां वह नहीं है, जहां उसका नहीं है!"

तो जहां तक कहानी की बात है तो अकबर को यह बात बहुत अच्छी लगी।

जब मैं इस कहानी को याद करता हूँ तो मेरे को यही लगता है कि "हां सचमुच में, कौन सी ऐसी जगह है, कौन सी ऐसी चीज है, जहां वह नहीं है! वह जब मेरे अंदर है तो, मुझे डरने की क्या जरूरत है। इस चीज से, जिससे लोग डर रहे हैं और सबका यही है कि "अब क्या होगा ?" "ठीक होगा! तुम चिंता मत करो।" वैज्ञानिक लोग लगे हुए हैं इसका हल देखने के लिए और जैसे ही इसकी वैक्सीन (vaccine) निकलेगी तो फिर लोग बाहर जा सकते हैं और जो कुछ भी है कर सकते हैं। उनको अगर बीमारी लगी भी तो उस पर उनको कोई असर नहीं होगा। लोग कोशिश कर रहे हैं, दवाइयां ढूंढ रहे हैं इसके लिए। तो सबसे बड़ी बात है कि आप सबकी मदद करें और कैसे कर सकते हैं सबकी मदद — आइसोलेट रहें और खुश रहें। असली खुशी तभी होती है जब आदमी जानता है अपने आपको, जानता है कि मेरे अंदर क्या विराजमान है, मेरे अंदर क्या है —

"इस घट अंदर बाग-बगीचे" — कितनी सुंदर बात कही है कि इस घट के अंदर सुंदर-सुंदर बाग हैं, सुंदर सुंदर बगीचे हैं, सबकुछ हैं, फव्वारे हैं, हीरे हैं, मोती हैं, सबकुछ है। परन्तु सिर्फ इतनी कमी है लोगों में कि वह अपने अन्तर्मुख होकर के इस बात को समझें।

एक, किसी ने एक सवाल यह भी पूछा है कि "मेरे जो दोस्त हैं उन सबके पास नए-नए फोन रहते हैं, नए-नए गैजेट्स रहते हैं, लेटेस्ट टेक्नोलॉजी रहती है और जब मैं अपने मां-बाप से पूछता हूं कि मेरे को भी यह चीज चाहिए मेरे दोस्तों के पास हैं मेरे पास क्यों नहीं हैं तो, मेरे मां-बाप कहते हैं कि तुम पढ़ो-लिखो, कमाओ और फिर तुम यह सारी चीजें खरीद सकते हो तो, प्रश्न यही है कि आप क्या सोचते हैं इसके बारे में ?"

मैं कहता हूं कि आपके माँ-बाप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं, आपके माँ-बाप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। आपको ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए। उनको यह सारी चीजें बिना मेहनत किये जो मिल रही हैं इसका उनको फल भोगना पड़ेगा और इसका फल अच्छा नहीं है इसका फल बिल्कुल अच्छा नहीं है। क्योंकि जो बिना मेहनत के चीज हाथ में लग जाती है उसकी आदमी कभी कदर नहीं कर सकता है, कभी सोच नहीं सकता है उसके बारे में ढंग से। और ऐसे बच्चे जिनको मां-बाप देते रहते हैं, देते रहते हैं, फिर बड़े होकर गड़बड़ काम करते हैं, गड़बड़ काम करते हैं और फिर उनकी आँखें खुलती हैं कि ऐसा मेरे साथ नहीं होना चाहिए।

हमको मालूम है, हम बहुत जेलों में जाते हैं, लोगों से बात करते हैं और यही सारी चीजें होती रहती हैं — जब उनको मिलता रहता है, मेहनत करनी नहीं पड़ती है, कभी सोचना नहीं पड़ता है, कदर नहीं होती है चीजों की तो फिर आगे जाकर उनके साथ गड़बड़ी होती है। अपने माँ-बाप की बात सुनो, वो ठीक कह रहे हैं। जब तुम मेहनत करोगे — वह यह नहीं कह रहे हैं कि तुम्हारे पास ये चीजें नहीं होनी चाहिए, वो यह कह रहे हैं कि तुमको अगर ये चीजें चाहिए तो मेहनत करो और मेहनत करके खरीदो। अपने पैसों से खरीदो। तुम बढ़िया से बढ़िया चीज खरीदोगे, तुमको पसंद भी आएगी, तुमको अपने पर गर्व भी होगा। तुमको अच्छी भी लगेगी वह चीज और ईर्ष्या की बात नहीं। ईर्ष्या नहीं होनी चाहिए किसी पर भी। किसी के पास तुमसे कोई अच्छी चीज है तो तुमको हमेशा अपने हृदय में यही सोचना चाहिए, अपने अंदर यही सोचना चाहिए — "ठीक है! अच्छा है इसके पास है। क्या मेरे पास भी होना चाहिए ?”

क्यों जी! जब तुम किसी का एक्सीडेंट होते हुए देखते हो, कोई पड़ा हुआ है रोड के साइड में, तो तुम कहते हो यह मेरे साथ भी होना चाहिए। तुम जिस चीज को अच्छा समझते हो उसी चीज के पीछे पड़ते हो। तुम जानो तुम्हारे पास क्या है! अगर तुम, अगर जान गए कि यह जो तुम्हारे अंदर स्वांस आ रहा है, जा रहा है यह कितनी कीमती चीज है और तुम्हारे दोस्तों को नहीं मालूम तो, तुमको कुछ मालूम है जो तुम्हारे दोस्तों को नहीं मालूम तुमको ईर्ष्या करने की जरूरत नहीं रहेगी।

अपना यह जो समय है इसको अच्छी तरीके से बितायें और आनंद लें खुश रहें क्योंकि खुशी तुम्हारे अंदर है और सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 12 00:12:54 लॉकडाउन 12 Video Duration : 00:12:54 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (4 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

भारतवर्ष के श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

आज का दिन — एक दिन और चला गया। मुझे यही आशा है कि आप लॉकडाउन में हैं, आप सुरक्षित हैं, आप आनंद में हैं और आपने यह दिन जो चला गया, इसको अपने हाथों से से खाली निकलने नहीं दिया। किसी न किसी रूप में, किसी न किसी प्रकार से आपने इस जीवन में, इस समय, इस दिन को पकड़ना सीख लिया है। इसको निचोड़कर इसका जो आनंद है, इसके अंदर जो शांति है यह जो चीजें आपके लिए पॉसिबल हैं, उपलब्ध हो जाती हैं, आपने इन चीजों को जाने नहीं दिया और अपने जीवन को सफल बनाने के लिए आप हमेशा परिश्रम करते हैं।

देखिये! कई लोग हैं जिनका यह पता नहीं क्यों दिमाग में बात है कि हमको कुछ ऐसा दे दीजिए कि एक बार हम कर लें तो फिर हम को दोबारा करने की जरूरत ना पड़े। देखिये! एक रात को अगर आप सो गए तो इसका यह मतलब नहीं है कि आपको फिर सोना नहीं पड़ेगा। नहीं! आपको सोना पड़ेगा। हर रात सोना पड़ेगा। नहीं तो आप अपने आपको थका-मांदा महसूस करेंगे। अगर आपने एक दिन खाना खा लिया तो इसका मतलब नहीं है कि आपको कभी खाने की जरूरत नहीं है। नहीं! आपको हर रोज खाना पड़ेगा और जिस दिन आप नहीं खाएंगे उस दिन आपको भूख लगेगी। पानी के साथ भी यही बात है। अगर एक दिन आपने पानी पी लिया, तो इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कभी पानी पीने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पानी पीने की जरूरत भी आपको पड़ेगी। तो ये जो चीजें हैं यह जब भी आपको जरूरत है इनकी आपको यह करनी पड़ेगी — खाना खाना पड़ेगा जब भूख लगेगी, प्यास लगेगी आपको पानी पीना पड़ेगा, जब आप थकेंगे तो आपको सोना पड़ेगा।

ठीक इसी प्रकार, शांति भी एक ऐसी चीज है। अगर आप उस चीज से जुड़े हुए नहीं हैं जो शांति का स्रोत है, तो आपके जीवन के अंदर शांति नहीं होगी। फिर आपको जुड़ना पड़ेगा फिर आप उस चीज से जब जुड़ेंगे, तो आपको शांति का एहसास होगा। यह बड़ी बात नहीं है साधारण सी बात है और अच्छी बात है कि हम उस चीज के साथ — कोई ऐसी चीज है जो हमको प्यास लगाती है उस शांति की तरफ जाने की और हम शांति की तरफ जाएं। हमारा हृदय चाहता है कि हम शांति की तरफ जायें। हम दुनिया की तरफ देखते हैं, दुनिया की तरफ जब देखते हैं तो यही बात होती है कि मेरे को यह करना है, मेरे को वह करना है, मैं कैसे बैठकर शांति की तरफ ध्यान दूं, मेरी जिंदगी इतनी बिज़ी है। सबसे पहली बात यह है कि जिंदगी किसकी है ? यह जिंदगी किसकी है और किसके लिए है ? यह जो आपकी जिंदगी है वह किसके लिए है आपके लिए है या किसी और के लिए है ?

सोचिए आप, ध्यान दीजिए इस बात पर क्योंकि यह बात बहुत जरूरी है। आप इस बात को समझें यह बहुत जरूरी है। पैदा कौन हुआ ? जब आप इस संसार में आए, कौन आया ? आप आये। कौन जाएगा इस संसार में और जिसके जाने के बाद आप किसी चीज का अनुभव नहीं कर पाएंगे ? वह भी आप हैं। यह जिंदगी आपको दी गई है। यह स्वांस किसके अंदर आ रहा है, किसके अंदर जा रहा है ? आपके अंदर आ रहा है, आपके अंदर जा रहा है।

ठीक है! औरों के अंदर आ रहा है, औरों के अंदर जा रहा है। परंतु औरों के अंदर जो वह स्वांस आ रहा है, जो जा रहा है उससे मेरा कुछ ताल्लुकात नहीं है। उससे उनका ताल्लुकात है — अर्थात वह जो स्वांस उनके अंदर आ रहा है, जा रहा है उस स्वांस से वो जिंदा हैं और जो मेरे अंदर आ रहा है, मेरे अंदर जा रहा है उससे मैं जिंदा हूं।

तो यह जिंदगी किसकी है ? सबसे बड़ी बात है यह जिंदगी किसकी है ? यह जिंदगी आपको मिली है और इसका दुरुपयोग अगर करेगा तो कौन करेगा ? आप करेंगे । और इसका सदुपयोग अगर कोई करेगा तो कौन करेगा ? वह भी आप करेंगे।

तो बात आ जाती है कि फिर इसका सदुपयोग क्या है ? सबसे बड़ी बात इस जीवन का असली सदुपयोग क्या है ? मैं फिर सुनाता हूं आपको, अभी कुछ दिन पहले मैंने सुनाया था यह —

बड़े भाग्य मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थन गावा।

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा, पाइ न जेंही परलोक संवारा।

जो देवताओं को भी दुर्लभ है, जो देवताओं को भी दुर्लभ है, क्योंकि यह मनुष्य शरीर — एक खूबी मनुष्य शरीर की यह है, मनुष्य की यह है कि मनुष्य बना भी सकता है और खा भी सकता है। देवता लोग खा सकते हैं, बना नहीं सकते। वो खा सकते हैं, बना नहीं सकते। मनुष्य खा भी सकता है और बना भी सकता है। तो क्या बताया है — संतों ने, महात्माओं ने, वेदों ने, शास्त्रों ने, क्या बताया कि यह काहे के लिए मिला है! यह मिला है —

“साधन धाम मोक्ष कर द्वारा — यह साधना का धाम है और मोक्ष का दरवाजा है।” इसलिए मिला है, इसलिए यह समय है, इसलिए यह मनुष्य शरीर मिला है। और कोई भी चीज जो आप पा सकते हैं वह आपकी होगी नहीं, क्योंकि जब आप जाएंगे तो खाली हाथ आप आये थे, खाली हाथ आपको जाना पड़ेगा। और जो लोग आज की परिस्थिति को देखकर डर रहे हैं, इनको डरने की जरूरत नहीं है। आपको डरने की जरूरत नहीं है। सावधान होने की जरूरत है, सतर्क होने की जरूरत है, पर आपको डरने की जरूरत नहीं है । डरने से कुछ होता नहीं है, डरने से कुछ होता नहीं है। अपनी आंख बंद करने से कुछ होता नहीं है। समझें कि अगर यह जिंदगी सचमुच में "साधन धाम — साधना का धाम है मोक्ष का दरवाजा है" तो क्या मैं यह कर रहा हूं, क्या मैं यह कर रहा हूं ? क्या जो वह ज्ञान है —

आतमज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी।

मृग नाभि में है कस्तूरी, बन बन फिरे उदासी।।

मोहे सुन-सुन आवे हांसी।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवे हांसी।।

फिर वही बात हो गई, फिर वही बात हो गई कि जिस चीज के लिए हम आये वह हम जानते ही नहीं हैं। जो हमको यह साधन मिले हुए हैं — यह सिर है; ये आंखें हैं; यह कान है; नाक है; मुंह है; शरीर है; दिमाग है; यह काहे के लिए मिला हुआ है ? काहे के लिए हमको मिला ? इसका हमको मालूम ही नहीं है। इससे क्या हासिल कर सकते हैं, यह हमको मालूम ही नहीं है। लगे हुए है, लगे हुए हैं, कर रहे हैं, हासिल कर रहे हैं। हासिल कर रहे हैं ऐसे, जैसे कि यह साथ ले जाएंगे। पर, यह साथ नहीं जा सकता। यह साथ नहीं जा सकता। साथ तो सिर्फ एक चीज जा सकती है और वह है “आनंद।” और जबतक आप इस परिस्थिति में भी, जो आपके अंदर का आनंद है इसको अगर आप महसूस करने की कोशिश नहीं करेंगे, तो यह हाथों से निकल जाएगा। दिन निकल जाएगा, समय निकल जाएगा और आप रह जाएंगे।

तो फिर फायदा ही नहीं हुआ। फिर फायदा ही क्या हुआ ? फिर फायदा ही क्या हुआ आने का ? जब खाली हाथ आये और खाली हाथ ही जाना है, तो फिर फायदा ही क्या हुआ ? क्या ले जाएंगे यहां से ? क्या ले जा सकते हैं यहां से ? एक चीज को ले जा सकते हैं — वह जो आपके अंदर है, आपकी जो समझ है। वही मैं कहता हूँ कई बार, कई बार कहता हूँ मैं लोगों से कि जब आप किसी के यहां खाना खाने जाते हैं या अपने दोस्तों से मिलते हैं, तो जब खाना खाने जाते हैं तो आप बर्तन ले जाते हैं साथ ? नहीं! जब आपको खाना खिलाया जाता है या आप अपने मित्र के पास गए, अपने रिश्तेदार के पास गए, उसने खाना खिलाया आपको, तो जो कुछ भी आपको खिलाया वह तो गया। वह तो जाएगा। तो क्या बचेगा उस दिन का ? आनंद जो है वह बचेगा। उस आनंद को आप सालों-सालों रख सकते हैं अपने साथ। खाने को नहीं — जो खाना खाया आपने, अगर वह आपके साथ सालों-सालों रहने लगा, तो आपको कब्ज़ हो जाएगा और वह आपको पसंद नहीं होगा, पसंद नहीं आएगा।

परंतु सबसे बड़ी बात कि वह जो आनंद है वह आप ले जा सकते हैं। खाली हाथ आए थे, खाली हाथ आपको जाना है, परंतु आप जीवन के आनंद को साथ ले जा सकते हैं और इन परिस्थितयों में भी वह आनंद आपके अंदर है। सिर्फ बात यह है कि क्या आप उस खान को जोतना जानते हैं, उस खेत को जोतना जानते हैं क्योंकि अगर आप उस खेत को जोड़ेंगे, जोतेंगे तो वहां से कुछ ना कुछ जरूर निकलेगा।

सब्र की बात है भाई! मैं फिर याद दिलाना चाहता हूं कि सभी को सब्र रखो, डरने की बात नहीं है। समय बीत रहा है डर से कुछ नहीं होगा। सतर्क रहो, हाथ धोओ अपने। "न किसी को यह बीमारी दो न किसी से यह बीमारी लो" — यह आप याद रखिए, बस यह याद रखिए — छः फीट लोगों से दूर रहना ताकि उनका थूक या किसी प्रकार की — किसी प्रकार से भी यह कीटाणु जो है या यह वायरस जो है आपके ऊपर जाकर न पड़े। उसके बाद आनंद ही आनंद से रहिये।

यह समय समस्याओं पर ध्यान देने का नहीं है। यह समय है अपने आप पर ध्यान देने का। अपने आप पर ध्यान दीजिए। समस्याएं तो ऐसी हैं — समस्याएं कहीं जा नहीं रही हैं, उनको आपका नंबर अच्छी तरीके से मालूम है, वह कहीं जा नहीं रही हैं। पर, आप जा रहे हैं तो इसलिए इस समय में ध्यान से, प्रेम से, प्यार से, अपने साथ रहना सीखें, अपने जीवन को सफल करें।

लॉकडाउन 11 00:15:25 लॉकडाउन 11 Video Duration : 00:15:25 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (3 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोतागणों को मेरा नमस्कार!

आज मैं जिस बात की चर्चा करने जा रहा हूं वह बात आपके अंदर है, क्योंकि बात है जानने की और समझने की। दिन बीत रहे हैं इस लॉकडाउन में, महामारी लगी हुई है। कुछ लोग इस बात को समझते हैं कि अगर हम आइसोलेटेड रहें तो सबका भला है। कुछ लोग इस बात को नहीं समझ रहे हैं। लोगों में अजीब-अजीब धारणाएं हैं — जैसे, मतलब ये सारी चीजें लोगों में हमेशा ही रहती हैं।

परन्तु समझने की बात यह है कि आपके जीवन के अंदर, आपका जो यह समय है — यह समय लॉकडाउन का नहीं, पर जो समय है, आप पैदा हुए, आपको एक दिन जाना है, तो यह जो समय है इसमें आप कर क्या रहे हैं ? क्या हो रहा है इस समय में ? इसकी कहानी क्या है ? इसके एक्टर कौन-कौन हैं ? इसमें कौन-कौन लगा हुआ है ? इसका तुक क्या है ? इसका मतलब क्या है ?

क्योंकि एक प्रश्न है और वह प्रश्न यह है कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ? अब यह सभी लोग पूछते हैं। कुछ लोग हैं जो पूछते हैं और कुछ लोग हैं जिन्होंने अभी पूछा नहीं है, पर पूछेंगे आगे क्योंकि यह प्रश्न कभी न कभी तो आएगा कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ? मैं यहां कर क्या रहा हूँ ? तो क्या कर रहे हैं आप ? आपके जीवन का उद्देश्य है क्या ? क्या आप अपने आप को समझना चाहते हैं ? क्या आप अपने आपको जानना चाहते हैं ?

क्योंकि जबतक आप अपने आप को जानेंगे नहीं, तबतक आप यह नहीं जान पाएंगे कि जिन चीजों की आपको तलाश है, जिन चीजों को आप चाहते हैं वह पहले से ही आपके अंदर है। अब शांति की लोग खोज करते हैं। कोई कहीं जा रहा है, कोई कहीं जा रहा है, कोई कहीं जा रहा है। अरे! जो चीज तुम्हारे अंदर पहले से ही है, तुम उसको खोज क्यों रहे हो ?

कई लोग मेरे से, मेरे पास — जब मैं 13 साल का था, 14 साल का था, जब मैं विदेश आया। 13 साल का था मैं उस समय, तो लोग हमारे पास आते थे पूछते थे और यह पूछते थे कि "जी! हम खोज रहे हैं कब मिलेगा ?"

तो मैं उनसे कहता था — "जब तुम खोजना बंद कर दोगे तब मिलेगा।"

अब उस समय यह बात लोगों की समझ में आए ना आए मेरे को नहीं मालूम। अब मेरे ख्याल से कई लोगों के यह समझ में नहीं आती थी। अब मैं यही समझाता था लोगों को कि "तुम किस चीज को खोज रहे हो!" तुम्हारी धारणाएं बनी हुई हैं उसको तुम खोज रहे हो। अब जैसे, इसका मतलब क्या हुआ कि कई बार छोटे बच्चे हैं, तो बच्चे हैं तो कभी उनको मस्ती चढ़ती है तो वह किसी को डराना चाहते हैं तो मास्क ले आते हैं। तो मास्क पहना और अब भूत लगने लगे या जानवर लगने लगे या भयानक लगने लगे। तो किसी के पास चले गए और वा.. आ..... करके किया। तो लोग डरते हैं — "क्या है, कौन आ गया, क्या हो गया।"

और उसके बाद वो फिर हंसते हुए उस मास्क को निकालते हैं और उसके पीछे कौन है वह दिखाई देता है, तो सब ठीक है! यह है, यह — इसको मैं जानता हूं यह ठीक है, यह भूत नहीं है, यह जानवर नहीं है, — ठीक है! तो उसी तरीके से हमारे साथ भी यह बात है। हमने भी एक मास्क पहन रखा है — अपने जीवन में हमने भी एक मास्क पहन रखा है कि "मैं यह हूँ!" मेरा, मेरे जीवन का उद्देश्य यह है; मेरे जीवन का मतलब यह है — और यह सारी चीजें हमारे पास रहती हैं। और इस मास्क को लेकर के हम सारे संसार को इंप्रेस करना चाहते हैं, डराना नहीं चाहते हैं, इंप्रेस करना चाहते हैं — "मैं यह हूं; मैं वह हूं; मैंने ऐसा कर दिया; मैंने वैसा कर दिया; मैंने यह हासिल कर लिया; मैंने वह हासिल कर लिया; यह सफलता मिली मेरे को; यह सफलता मिली मेरे को — सारी चीजें। मास्क पहना हुआ है।

और एक समय आता है, जब मनुष्य अपने आपको देखने लगता है तो वह कहने लगता है, "क्या मैं सचमुच में यह हूँ ?"

क्योंकि उसकी आँखें उस मास्क से देख रही हैं। और आईने में जो उसको दिखाई दे रहा है — वह अपने आपको नहीं जानता है। वह आपने आपको नहीं देख रहा है, वह मास्क को देख रहा है। और मास्क को देखते हुए कहता है "आहाह ! मेरा चेहरा ऐसा है, मेरा चेहरा ऐसा है, मेरा चेहरा ऐसा है, मेरा चेहरा ऐसा है। परन्तु मास्क को निकाल करके देखिए आईने में और आपको अपना असली चेहरा दिखाई देगा।

संत-महात्मा क्या कहते हैं कि — जब तुम यह करोगे, इस मास्क को निकलोगे — वह मास्क की बात नहीं करते हैं, वह अपने आपको जानने की बात करते हैं —

मृग नाभि कुण्डल बसे, मृग ढूंढ़े बन माहिं।

ऐसे घट घट ब्रह्म हैं, दुनिया जानत नाहिं।।

जिस चीज की — तुम सुंदरता को ढूंढ रहे हो, पर सुंदरता तुम्हारे अंदर है, पर तुमने जो मास्क पहन रखा है इसको जबतक निकालोगे नहीं, तब तक तुमको सुंदरता नहीं दिखाई देगी। पर मास्क को निकालो और तुमको वह सुंदरता, असली सुंदरता क्या है वह दिखाई देगी। तो बात यही हो जाती है कि क्या सचमुच में हमने वह मास्क पहन रखा है ? कोई दानी है; कोई मां है; कोई भाई है; कोई बहन है; कोई यह है; कोई वह है; और सबने एक-एक मास्क पहन रखा — और परिवार के लोग भी, परिवार के सदस्य जो एक-दूसरे को अच्छी तरीके से जानते हैं। परन्तु कई बार वह भी उस व्यक्ति तक पहुंच नहीं सकते हैं। किसी ने कुछ किया तो किसी को गुस्सा आ गया। अब गुस्से को लेकर के — "इसने यह कर दिया मेरे साथ, ये अच्छा नहीं किया, ये अच्छा नहीं किया — क्लेश जो होता है अंदर से, क्लेश आ रहा है उनके। उसने ये अच्छा नहीं किया, उसने ये कर दिया, उसने ये कर दिया, उसने ये कर दिया।“

पर जानने की बात यह है, पहचानने की बात यह है कि "तुम अपने अंदर उस क्लेश को चाहते हो या नहीं ?" अगर उस क्लेश को नहीं चाहते हो, मैं दूसरे की बात नहीं कर रहा हूं मैं यह नहीं कह रहा हूं कि "उसको तुमने माफ कर दिया या नहीं कर दिया!" नहीं! वह बात तो बाद में आएगी। पर सबसे पहले बात यह है कि क्या तुम अपने अंदर जो तुम कड़वापन, जो जहर तुम अपने अंदर लिए फिर रहे हो यह तुमको चाहिए या नहीं ? इससे तुमको छुटकारा कैसे मिलेगा ? तो पहले अपने आप को तो देखो तुम हो कौन ? तुम अपने आपको तो समझो तुम हो कौन ? क्योंकि जब सारे ही परिवार के सदस्य एक जगह बैठे हुए हैं, एक घर में बैठे हुए हैं तो सबको यह है कि "मैं इसको जानता हूं; यह मेरे को जानता है या मैं उसको जानता हूं; मैं उसको जानता हूं; मैं उसको जानता हूं; मैं उसको जानता हूं। पर तुम जिस चीज को जानते हो वह तो सिर्फ एक मास्क है। तुम असली चीज को नहीं जानते हो ? असली कौन है ? कैसा है ? किसको प्यार चाहिए ? किसको आनंद की जरूरत है ? किसको शांति की जरूरत है ? किसको करुणा की जरूरत है — दो शब्द, दो शब्द मीठे; दो शब्द, दो शब्द मीठे — अगर बोल दो, दूसरा अगला पिघलने के लिए तैयार है।

यह बात समझने की है। तो यह जो मास्क पहना हुआ है, इसको कब निकालोगे ? इसको कब छोड़ोगे ? कब इसको अलग रखोगे ? कब तुम समझोगे कि तुम्हारा जीवन, जो तुमको मिला हुआ है इसको अब स्वीकार करने की जरूरत है। यह नहीं कि यह जीवन मिला हुआ है — मैं यह कर लूंगा, मैं वहां चला जाऊंगा, अब यह हो जाएगा, वह जाएगा यह सारी चीजें नहीं बल्कि इसको स्वीकार करने की जरूरत है।

मैं अपने जीवन में उस चीज को चाहता हूं जिस चीज को चाहने से, जिस चीज को पाने से, जिस चीज के मिलने से, मेरा जीवन सफल हो। और वह चीज कहां मिलेगी मेरे को ? वह चीज मेरे को मिलेगी — मेरे ही अंदर, अपने ही अंदर। इससे ज्यादा खुशखबरी क्या हो सकती है ? संभव ही नहीं है।

बात है आनंद की, बात है इस संसार के अंदर असली आनंद लेने की। क्योंकि मैं बात करता हूं कई बार कि आपकी लॉटरी निकली और एक शॉपिंग सेंटर के अंदर आपको भेज दिया गया और उस शॉपिंग सेंटर के अंदर हर एक प्रकार की दुकान है और आप उसमें जा सकते हैं और किसी भी चीज, कोई भी चीज उसको आप ले सकते हैं। बस शर्त यह है कि जब आप उस शॉपिंग सेंटर से बाहर निकलें, आप अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकते हैं तो अब क्या ले जायेंगे ? क्या आप की स्ट्रैटेजी है?

कुछ लोग हैं जो यह कह सकते हैं कि — "मैं तो जाऊंगा ही नहीं जब मैं कुछ ले ही नहीं जा सकता अपने साथ। तो मैं तो उस शॉपिंग सेंटर में जाऊंगा ही नहीं” — ऐसे भी लोग हैं। कुछ लोग हैं — "यह कैसी लॉटरी निकली है ? इसका तुक क्या हुआ ? जब हम वह चीजें पकड़ ही नहीं सकते हैं, उनको ला ही नहीं सकते हैं अपने साथ, तो फिर यह कैसी लॉटरी निकली"— ऐसे भी लोग हैं। और कुछ लोग हैं — जिनकी स्ट्रैटेजी, जिनका लक्ष्य यह है कि मैं जाऊंगा और हर एक चीज का आनंद लूंगा। मैं अपने साथ कोई चीज ला नहीं सकता हूं, पर मैं आनंद को अपने साथ ला सकता हूँ। वह कोई चीज नहीं है। यह सबसे बड़ी बात है कि मैं आनंद को अपने साथ ला सकता हूं।

क्या आप अपने जीवन में उस आनंद को ले रहे हैं या क्लेश से भरे हुए हैं ? अब तक आपने किस चीज को देखा ? क्या अपने अंदर स्थित उस दिव्य शक्ति को देखा ? उस दिव्यता को देखा या आपने सिर्फ लोगों की बुराइयों को देखा ? अगर सिर्फ लोगों की बुराइयों को देखा तो बुराई से आपका परिचय है। और बुरा क्या है —

बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय,

जब घट देखा झांक के, मुझसे बुरा न कोयII

बुराई और अच्छाई — अच्छाई भी तुम्हारे अंदर है; आनंद भी तुम्हारे अंदर है; बोर्डम भी तुम्हारे अंदर है; सारी चीजें तुम्हारे अंदर हैं और तुम अपने जीवन में क्या चाहते हो सबसे बड़ी बात यह है ? तुम अपने जीवन में क्या चाहते हो ? तुम आनंद को चाहते हो; ज्ञान को चाहते हो; समझना चाहते हो; स्पष्टता को चाहते हो; प्रेम को चाहते हो; शांति को चाहते हो, तो ये सारी चीजें भी तुम्हारे अंदर हैं और इनको तुम पा सकते हो। इनको तुम जान सकते हो। यह मौका है। यह कभी न कभी तो होना है।

अगर सचमुच में मास्क पहना हुआ है तो इस मास्क को हटाने का समय आ गया है। तुमको किसी के लिए कुछ बनने की जरूरत नहीं है तुमको अपने आप को समझने की जरूरत है। तुमको किसी और को इंप्रेस करने के लिए, उस पर प्रभाव डालने के लिए तुमको अपना भेष बदलने की जरूरत नहीं है। तुमको अपने आपको जानने की जरूरत है और जबतक अपने आपको जानोगे नहीं, जबतक अपने आप को पहचानोगे नहीं तबतक यह गाड़ी आगे नहीं चलेगी।

शांति क्या है — यह एक प्रश्न बना रहेगा तुम्हारे लिए, उत्तर नहीं! तुम कौन हो — तुम अपने से ही दूर रहोगे तो दूर नहीं रहना चाहिए। अपने आप को जानो; अपने आप को समझो और अपने पास आओ और अपने जीवन को सफल बनाओ।

तो सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

लॉकडाउन 10 00:17:01 लॉकडाउन 10 Video Duration : 00:17:01 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (2 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे सभी श्रोताओं को मेरा हार्दिक नमस्कार!

मुझे आशा है कि आप सब लोग आनंद में हैं और आनंद मंगल में हैं आप। क्योंकि यह जो भी परिस्थिति है कोरोना वायरस की इसका यह मतलब नहीं है कि आपको दुखी होना चाहिए। आप जहां भी हैं, जैसे भी हैं, जो असली खुशी है वह आपके अंदर है। उसका बाहर से क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है इससे कुछ लेना-देना नहीं है। जो असली चीज है वह आपके अंदर है और अगर आप चाहें तो उस खान को जो आपके अंदर है उसको खोदिये। अगर उस खान को आप खोदेंगे तो उसमें से आपको क्या मिलेगा ? वह चीज जो सचमुच में मनुष्य को रईस बनाती हैं, अमीर बनाती हैं।

एक लोग हैं इस दुनिया में, जो समझते हैं कि अगर उनको अमीर बनना है, तो उनको पैसे की जरूरत है और एक वह लोग हैं, जो अच्छी तरह से जानते हैं कि अमीर अगर बनना है तो हृदय उसके लिए होना चाहिए। उसके लिए ज्ञान होना चाहिए। उसके लिए हृदय के अंदर आनंद होना चाहिए। उसके अंदर जो स्थित दिव्य चीज मौजूद है, उसका उससे परिचय होना चाहिए। उसको वह जाने, उसको वह पहचाने तब जाकर के वह असली रईस, रईस बनेगा। यह जो पैसे का रईस है, यह पैसे को अपने साथ नहीं ले जा सकता। आप आनंद को अपने साथ ले जा सकते हैं पर पैसे को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तो अगर आनंद आपको चाहिए तो कैसा आनंद होना चाहिए आपके जीवन में — सच्चा आनंद या झूठा आनंद ? सच्चे आनंद के लिए आपको क्या करना पड़ेगा ? अपने आपको जानना पड़ेगा। अपने आप को पहचानना पड़ेगा।

कई बार मैं विचार करता हूं कि एक तरफ मनुष्य के लिए एक चीज मौजूद है, एक संभावना है और वह संभावना है कि वह खुशी से भरा हुआ है, आनंद से भरा हुआ है, उसके अंदर जो दिव्य है उसको वह जानता है, उसको वह पहचानता है और वह — जब भी उसको समय मिलता है तो वह एकदम व्यस्त है इस जीवन में जो ज्ञान की खान उसके अंदर है उसको खोदने में। आनंद ही आनंद लेने में वह व्यस्त है। और आनंद से उसका जीवन भरा हुआ है। उसको फिक्र नहीं है अगर उसको कोई है —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास

और जो चितवे नाम बिनु, सोई काल की फांस

उसका चिंतन — चिंता अगर वह करता है, तो वह सतनाम की चिंता करता है। सिर्फ! जब भी उसको समय मिलता है। मेहनत करता है ताकि उसका पेट भी भरे। लेकिन बिना पेट के तो वो वाली बात है कि —

बिन भोजन भजन न होय गोपाला।

ये लो अपनी कंठी माला।।

तो करता है वह मेहनत करता है। और उस मेहनत में कभी वह सफल भी होता है कभी वह जो कुछ भी करता है उसकी उसको सफलता नहीं मिलती है। परन्तु उसका उद्देश्य "सफल होना इस दुनिया में न सफल होना" यह उसका उद्देश्य नहीं है। उसका उद्देश्य है कि उसके अंदर जो खान है — आप मेरी बात सुन लीजिए आप क्योंकि ऐसा कई बार लगता है कि लोग वहां बैठे-बैठे कह रहे हैं कि " फिर हम खायेंगे कैसे, ये कैसे करेंगे !"

सुन लीजिये मेरी बात कि मैं यह कह रहा हूँ कि — नहीं! खाने की जरूरत है। ठीक है! घर होना चाहिए, कपड़ा होना चाहिए ये सारी चीजें होनी चाहिए इसके लिए कुछ ना कुछ मेहनत करनी पड़ती है। परन्तु जो भी उसको समय उस चीज में लगाना है, वह लगाता है पर जो भी उसको समय मिलता है वह उस — अंदर की जो खान है उसमें से वह खोद, खोदकर के और एक ऐसी चीज निकाल रहा है जो सोने से भी ज्यादा है, जो हीरों से भी ज्यादा है। वह आनंद की खान को खोद रहा है। तो एक तो यह संभावना है उसकी, मनुष्य की।

एक दूसरी संभावना है और दूसरी संभावना क्या है ? दूसरी संभावना है कि वह परेशान है — सुबह भी परेशान है, शाम को भी परेशान है, दोपहर में भी परेशान है; हर घंटे परेशान है। वह इतना परेशान है, इतना परेशान है और इस दुनिया में कुछ बनने की कोशिश कर रहा है और कुछ हो नहीं रहा है उसके साथ। फिर भी उसको अच्छी तरीके से मालूम है कि सारी परेशानी उसके जीवन के अंदर है और फिर भी उसको मालूम है कि खाना तो कहीं से खाना है। तो परेशान होने के बावजूद भी वह खाना खाता है। कहीं से कुछ प्रबंध करता है। मकान का प्रबंध है, किराए का प्रबंध है; यह सारी चीजों का प्रबंध है। परन्तु वह हमेशा परेशान रहता है दुखी रहता है, दुखी, दुखी।

दो संभावना है। एक में, एक संभावना है उसके लिए उसमें वह जानता है कि और हमेशा पहचानने की कोशिश करता है कि उसके अंदर जो स्वांस आ रहा है उसकी — वह कितना अमूल्य है। और दूसरी तरफ स्वांस आ रहा है, जा रहा है उसको कोई मतलब नहीं है। उसको यह भी मतलब नहीं है कि उसके अंदर जिस चीज को वह सचमुच में खोज रहा है, क्या है वह चीज और वह उसके अंदर विराजमान है। उसको इससे भी मतलब नहीं है। होगा क्या — दोनों लोगों में होगा क्या ? एक दिन इस व्यक्ति को भी जाना है और एक दिन इस व्यक्ति को भी जाना है। जब यह व्यक्ति जाएगा तो कहा है कि —

जब तुम आये जगत में जग हंसा तुम रोय

अब कुछ ऐसा कीजिये तुम हंसो जग रोय

तो यह, जब यह जाएगा तो यह अपने साथ यह कहकर जाएगा कि "तेरा बहुत-बहुत धन्यवाद तैनें यह मौका दिया; यह जीवन दिया — हर एक स्वांस का धन्यवाद अदा करेगा!" जब यह जायेगा, दूसरा वाला तो इसके लिए तो यह होगा कि "अच्छा हुआ छुट्टी मिली यह भी कोई जिंदगी होती है!"

अब आप देखिये इन दो व्यक्तियों में से आपको कौन सा पसंद है ?

एक तो वह जिसने सबकुछ भर लिया — भरा हुआ है, हृदय भरा हुआ है। आनंद है और एक वह जो खाली है। एक वह है, जो इस संसार में आया तो था खाली हाथ पर खाली हाथ जा नहीं रहा है उसके हाथ में क्या है? उसके हाथ में आनंद भरा हुआ है, उसके हाथ में ज्ञान भरा हुआ है; उसके हाथ में उसके जीवन की वाह-वाह भरी हुई है; उसके हाथ में क्या भरा हुआ है ? उसके हाथ में आभार भरा हुआ है।

जो दूसरा है, उसके हाथ खाली हैं, गया कुछ नहीं रह गया उसके पास। अब इन दो लोगों में से आप कौन सा होना चाहते हैं ? अगर आप वह व्यक्ति होना चाहते हैं, जो जब जाए तो आभार उसके हाथ में है; आनंद उसके हाथ में है इसके लिए, वह आदमी बनने के लिए, वह मनुष्य बनने के लिए आपको अब काम करना शुरू करना पड़ेगा। और अगर यह दूसरा वाला आपको पसंद है, जो खाली हाथ आया था खाली हाथ तो लगे रहो, लगे रहो इस दुनिया में। क्योंकि परेशान होते रहो। आभार कहाँ से आएगा ? परेशान होने से कौन हमारी बनता है ? कोई नहीं। लगे हुए हैं — “लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो।“ कैसे लगे हुए हैं ? जैसे बैल! और बैल सोचता होगा, जब वह कुएं के चारों तरफ घूमता है। उसकी आँखें बंद कर देते है और घूम रहा है, घूम रहा है, घूम रहा है तो पता नहीं क्या सोचता होगा कि कहाँ से कहाँ पहुंच गया मैं । पर जब उसकी आंख की पट्टी खुलती है तो उसको मालूम पड़ता है कि मैं तो वहीं का वहीं हूँ। कुछ नहीं बदला।

तो अब यह समय आया है, लॉकडाउन का समय आया है। तो जो लोग वो हैं, जो परेशान होते रहते हैं वह अब भी परेशान हैं। वह अपनी सारी परेशानी से दूर हैं फिर भी परेशान हैं। और वो लोग जो अंदर जाना चाहते हैं, अपने अंदर उस दिव्य चीज का अनुभव करना चाहते हैं वह परेशान नहीं हैं, वह आनंद में हैं। तो, अब यह तो अपनी-अपनी बात होती है। क्योंकि कुछ लोग तो होंगे जो कहेंगे कि "नहीं हमको परेशानी पसंद है।"

परन्तु जहाँ तक मेरी बात है — मैं तो वह आदमी बनना चाहता हूं। मैं वह बनना चाहता हूं जिसके हाथ में हमेशा आभार है। आभारी हूं मैं कि मुझको यह मनुष्य शरीर मिला। आभारी हूं मैं कि यह स्वांस मेरे अंदर आया। आभारी हूं मैं कि मुझको यह मौका दिया गया। मैंने कोई बटन नहीं दबाया कहीं से। मैंने कुछ नहीं किया। मुझको यह मनुष्य शरीर मिला। जबतक है मैं आभारी रहना चाहता हूँ। मैं आभार प्रकट करना चाहता हूँ; मैं आनंद लेना चाहता हूं और ऐसा-वैसा आनंद नहीं उस दिव्य शक्ति का जो मेरे अंदर मौजूद है, मैं उसका आनंद लेना चाहता हूं, क्योंकि उसका आनंद अटूट आनंद है।

मैं कहीं भी हूं, कुछ भी कर रहा हूं मैं उस आनंद को पा सकता हूं। यह मेरे लिए एक संभावना है। अब इसमें से किस संभावना को मैं पसंद करता हूं, किस संभावना को लेता हूँ, यह तो मेरे ऊपर है। यह किसी और के ऊपर नहीं है। अब लोग कहते हैं — "वही होगा जो भगवान चाहता है!" भगवान ने तो अपने आप को तुम्हारे अंदर रख दिया और क्या करें कि अगर जानना चाहते हो तो जानो, पहचानना चाहते हो तो पहचानो। कितने नजदीक कि तुमसे कभी दूर हो ही नहीं सकते। यह है नजदीकी — अगर किसी को नजदीक होना है, तो नजदीक होना है तो ऐसे नजदीक होना चाहिए कि तुम दूर हो ही नहीं सकते — यह कर दिया है, यह बना दिया है। यह हो गया है। यह हो रहा है इस समय — तुम जो बैठे इस वीडियो को देख रहे हो, तब भी तुम्हारे अंदर यह स्वांस चल रही है। और वह दिव्य शक्ति तुम्हारे अंदर मौजूद है। जैसे कहा है कि —

ज्यों तिल माहीं तेल है ज्यों चकमक में आग,

तेरा सांई तुझमें जाग सके तो जाग

तेरा साईं तुझ में जाग सके तो जाग

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निरासी,

कहै कबीर सुनो भई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।

मोहे सुन सुन आवे हाँसी।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवे हाँसी।

यह मीन तुम हो और कबीरदास जी को आ रही है हंसी तुम पर कि हो तुम प्यासे और पानी — सब जगह पानी ही पानी, पानी ही पानी, पानी ही पानी, पानी ही पानी।

तो अगर हम इस बात को समझ गए और इस बात पर अमल करने की हम कोशिश करें, थोड़ी सी भी कोशिश करें और कितना सुंदर यह समय है, कितना सुंदर यह समय है कि हम इस बात पर अमल करें, इस बात को समझें। इन दो संभावना से एक संभावना को हम चूज़ (choose) करें, एक संभावना को पसंद करें और उस संभावना के साथ आगे चलें।

दूसरी संभावना, परेशान वाली इसके लिए तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं। मनुष्य अपने आप ऑटोमेटिकली परेशान होते रहता है — हर एक चीज पर परेशान होता रहता है। उसका तो हाल ही यह है। कभी इस चीज की परेशानी, कभी — पहले जब उसकी शादी नहीं होती है, तो उसको शादी की परेशानी लगती है "कब शादी हो।" जब शादी हो जाती है तो उसको यह परेशानी है कि "यह शादी कब टूटे।" फिर जब बच्चे हो जाते हैं, छोटे होते हैं जब बच्चे तो बड़ी खुशी होती है। जब बड़े होने लगते हैं तब “फिर क्या होगा इनका!”

तो सुख-दुःख इसमें सब लगे हुए हैं। इस संसार के सुख-दुख में सब लगे हुए हैं। पर एक असली सुख है और वह सुख है — तुम्हारे अंदर, तुम्हारे हृदय का। जबतक तुम उस सुख को नहीं समझोगे, उस सुख को नहीं जानोगे, उस सुख को नहीं पसंद नहीं करोगे, चूज़ (choose) नहीं करोगे तब तक तुम्हारे हाथ में आभार नहीं आएगा, तुम्हारे हृदय में आभार नहीं आएगा; तुम्हारी जिंदगी में आभार नहीं आएगा। और जैसे आए थे वैसे ही तुम एक दिन जाओगे। परन्तु संभावना यही है कि तुम अपने जीवन को पूरा करो।

तो सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार और अपना ख्याल रखो और आनंद लो!

लॉकडाउन 9 00:16:51 लॉकडाउन 9 Video Duration : 00:16:51 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (1 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज के दिन जो मैं कहना चाहता हूं वह यही है कि वैसे तो काफी दिन निकल गए हैं और लॉकडाउन के लिए तो अभी थोड़े दिन और बाकी हैं। और मेरे को तो यही आशा है कि सभी लोग जो हैं जो यह समय बिताने की कोशिश कर रहे हैं सबका समय अच्छी तरीके से बीत रहा है। कुछ समझ रहे है, यही नहीं है कि परिस्थिति पर गुस्सा हो गए और सब काम ठीक हो जाएगा। गुस्सा होने से कुछ नहीं होगा यह समझने की बात है।

एक किस्म से अगर देखा जाए तो जो कुछ भी अब यहां हो रहा है आपके जीवन में, लॉकडाउन में, कहीं जा नहीं सकते, तो यह जीवन का भी एक ऐसा ही दृश्य है, क्योंकि आपको इन परिस्थितियों में सीखना पड़ेगा कि आप अपने साथ कैसे रहें। आप और लोगों के साथ कैसे रहेंगे यह तो आपको अच्छी तरीके से मालूम है। जब दोस्त होते हैं तो दोस्तों के पास चले गए गपशप मारी, इसकी बात की, उसकी बात की, यह बात की, वह बात की, घर आ गए। कोई अपने बच्चों के साथ है तो, बच्चों से ये बात की, वो बात की। फिर वह सब अपने कमरे में गए और आप अपने कमरे में गए। इन परिस्थिति में आपको अपने साथ कैसे रहना है यह सीखना पड़ेगा। क्या आप और चीजों में व्यस्त हो करके अपने आप को खो देते हैं ? लोग अधिकतर यही करते हैं।

देखिये तीन प्रकार के लोग हैं। एक, वह जो किसी चीज का ख्याल नहीं करते हैं । एक, वह जो सारे समाज का ख्याल करते हैं लोग क्या कहेंगे, ऐसा करना है, ऐसा करना है, ऐसा करना है। और एक इस प्रकार के लोग जिनको कि इस सारे समाज से कुछ लेना-देना नहीं है, सन्यासी! और कबीरदास जी भी बात करते हैं इनकी कि —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

इसमें तीनों प्रकार के आ गए। जो सबकुछ — जो समाज कहता है, समाज के अनुकूल करते हैं और कुछ लोग हैं जो कहते हैं "नहीं मेरे को समाज से कुछ मतलब नहीं है।" जैसे ब्रह्मानंद जी का भी एक भजन है कि —

मुझे है काम ईश्वर से जगत रूठे तो रूठन दे

जगत से कुछ काम नहीं है, कुछ मतलब नहीं है। और एक, वह जो कुछ कहा जाता है उसका उल्टा, उसके विपरीत करते हैं। इसमें यति में — दानव आ गए, यह सब कुछ आ गए। मतलब, जिनका जंगल रूल (rule) है, वह उस तरीके से काम करते हैं। आप कोई भी हों आपको इस संसार के अंदर भी रहना है, परन्तु सबसे बड़ी बात है कि आप अपने साथ अगर नहीं रह सकते हैं, तो आपने कुछ जाना नहीं, आपने कुछ सीखा नहीं, आपने कुछ समझा नहीं। और यही बात है अपने आपको जानने की, अपने आपको समझने की, क्योंकि जब मनुष्य को कहा जाता है कि "तुम धीरज रखो", तो जो धीरज रखने वाले हैं ठीक है उनके लिए अच्छी बात है "धीरज रखो", परन्तु कई लोग ऐसे हैं जिनको यह मालूम नहीं है कि धीरज कैसे रखा जाए!

देखो! हम बड़ी आसानी — बड़ी आसान बात है कि हम हर एक चीज को कंट्रोल करना चाहते हैं ताकि वही हो जो हम चाहते हैं और जो हम नहीं चाहते हैं वह न हो। और सोक्रेटीज़ का भी एक quote है कि — "हम तब खुश नहीं होते हैं, जब जो हम चाहते हैं वह न हो और वह यह भी कहते हैं कि हम तब भी खुश नहीं होते हैं, जब जो हम चाहते हैं वह होता है तब भी हम खुश नहीं होते हैं।" क्योंकि वह वैसा नहीं रहता है वह बदल जाता है समय के साथ, तो हम चाहते हैं कि हम खुश हों, हम चाहते हैं कि कोई चीज बदले ना और प्रकृति की — प्रकृति का कानून यह है कि हर एक चीज बदलेगी तुम्हारा चेहरा बदलेगा, तुम्हारा शरीर बदलेगा, तुम क्या खाते हो यह बदलेगा, तुम किस चीज को पसंद करते हो यह बदलेगा, तुम्हारा परिवार बदलेगा। जब बच्चे छोटे-छोटे होते हैं सबको अच्छा लगता है, पर फिर धीरे-धीरे-धीरे-धीरे जब बड़े होते हैं और बड़े होकर फिर कोई अपनी तरफ चाहता है, कोई इधर जाता है, कोई किधर जाता है। यह भी सब बदलेगा। इसको तुम काबू इस पर कर नहीं सकते हो, इसको तुम अपनी जेब में नहीं रख सकते हो, ये सारी चीजें बदलने वाली हैं।

अब जो बदलाव आया है, यह बदलाव यह है, बड़ी साधारण सी बात है कि — तुम और लोगों से दूर रहो, और लोगों से दूर रहो ताकि अगर किसी को वह कोरोना वायरस की बीमारी है तो वह तुमको ना लगे। इससे साफ बात क्या हो सकती है, इससे साधारण बात क्या हो सकती! परन्तु यह इतनी साधारण बात नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि लोग जब लॉकअप में हैं तब क्या करें, करने के लिए क्या है। कोई कुछ करने की कोशिश कर रहा है, कोई कुछ करने की कोशिश कर रहा है, बोर्डम आने लगती है। ये सारी बातें होने लगती हैं। पर बात दरअसल में वही है न, काबू में सारी चीजें हों, जैसे आप चाहते हैं वैसे ही सारी चीजें हों। आप जो नहीं चाहते हैं वह ना हो। किसी चीज को चाहने से वह चीज आपके चाहत के अनुकूल हो यह तो किसी चीज को नहीं मालूम। चिड़िया है, चिड़िया उड़ती है। अब चिड़िया को अगर कोई चाहता है कि "नहीं, तू वही रहे।" वह तो नहीं रहेगी उसको — वह जो करना चाहती है, वह करना चाहती है, क्या वह आपकी इच्छा के अनुकूल होगा ? आपको नहीं मालूम हो या ना हो।

कोई किसान है वह बीज बोता है, वह चाहता है कि "यह बीज जल्दी-जल्दी उगे।" वह उगेंगे, तब उगेंगे जब वो जैसा चाहते हैं। जब ऋतु आएगी तब फल होगा। यही तो है न बात कि —

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, जब ॠतु तब फल होय।

उसके बाद नहीं, उसके पहले नहीं 'जब ऋतु तब फल होय।' और इस समय इस बात की बहुत ज्यादा कीमत है, इंपोर्टेंस (importance) है कि आप अपने जीवन में इस बात को सीखें कि सब्र क्या होता है! सब्र करने में भी जो आनंद ले लेता है उसके लिए सबकुछ है, जो सब्र में आनंद नहीं ले सकता उसके लिए कुछ नहीं है। किसी भी परिस्थिति में जो उस परिस्थिति में से आनंद ले सकता है —

देखिये! शांति की बात करते हैं, तो अगर कोई यह कहे कि "भाई तुम जेल चले जाओ, जेल में तुमको शांति मिलेगी" तो लोग कहेंगे यह तो संभव नहीं है आप गलत कह रहे हैं। परन्तु एक व्यक्ति था साउथ अफ्रीका में तो वह पीस एजुकेशन प्रोग्राम कर रहा था। जब मेरे को सुन रहा था वह — तो मैं जब बात करता हूं उनलोगों से तो मैं उनके स्वांस की बात करता हूँ कि तुम्हारे अंदर स्वांस आ रहा है, जा रहा है। तो वह एक दिन, उसने सोचा कि मैं जाऊंगा अपने कमरे में, जब जाऊँगा अपने लॉकअप में, जब जाऊँगा, तो मैं जानना चाहता हूँ कि यह स्वांस क्या है! तो वह लेट गया — तो वह किसी को बता रहा था कि वह लेट गया और वह अपने स्वांस के ऊपर उसका ध्यान गया — अंदर आ रहा है, जा रहा है, अंदर आ रहा है, जा रहा है। उसका ध्यान स्वांस के ऊपर गया। तो वह कहता है कि वैसे तो उसके कमरे में — और कमरा ही क्या, क्या कमरा है, उसमें सलाखें लगी हुईं थी। जेल थी वह। मेरे को ऐसा भी नहीं लगता कि उसका जो बैड था, पलंग था वह कोई अच्छा पलंग था या सॉफ्ट था या कम्फर्टेबल (comfortable) था, आरामदायक था। नहीं! जेल में तो यह सारी चीजें उपलब्ध नहीं होती हैं, परन्तु वह वहां लेटा हुआ और अपने स्वांस के ऊपर उसका ध्यान गया। और जब स्वांस के ऊपर उसका ध्यान गया, तो वह कहता है कि मेरे को शांति का अनुभव होने लगा और धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे मैं उस शांति के अनुभव को करता चला गया और इतनी शांति हुई, इतनी शांति हुई, इतनी शांति का अनुभव किया कि मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि मेरे अंदर इतनी शांति होगी। यह कैसे संभव हुआ ? यह जेल में संभव हुआ ? जेल में एक व्यक्ति शांति का एहसास कर रहा है यह कैसे कैसे संभव है ?

मेरा कहने का मतलब यही है कि कोई भी परिस्थिति हो उस परिस्थिति में से आप उस मूल चीज को ले सकते हैं। कोई भी चीज हो, कोई भी बात हो रही हो। वह स्वांस जबतक आपके अंदर आ रहा है, जा रहा है तब तक उस शांति का अनुभव आप कर सकते हैं। अब शांति का मतलब क्या है ? कई लोगों के लिए तो शांति का मतलब है कि बाहर अगर ज्यादा आवाज है, तो वह आवाज खत्म हो गई तो अब शांत हो गया। वह शांति नहीं है, वह शांति नहीं है, वह आवाज कम हो गई। यह है वो, आवाज कम हो गई। कहीं जाते हैं जंगल है वहां पर झिंगुर चें-चें कर रहे हैं तो लोगों को लगता कि बड़ी शांति है। नहीं! वह झींगुर की आवाज है। तो शांति क्या है ? शांति वह चीज है जो आपका हृदय आपको बताएगा कि हां यह शांति है। जब शांति का अहसास होगा तब। असली शांति वह है, वह परिभाषा में नहीं पड़ती। जैसे मीठा क्या है! उसकी कोई परिभाषा नहीं है। जब मीठा आप खाते हैं, आपको जब वह एहसास होता है आप कहते हैं "हां! यह मीठा है।"

अब यह बात नहीं है कि — एक बार मैं एक उदाहरण देता हूँ — एक बार मुंबई में मेरे को किसी आदमी ने बुलाया अपने घर में खाने के लिए। तो मेरे को यह लगा कि खाना बड़ा अच्छा बनेगा, तो मैंने नाश्ता भी ज्यादा नहीं किया। दोपहर में खाना था, दोपहर में हम गए। भूख खूब लगी हुई थी, खूब भूख लगी हुई थी। और यह मैं चाहता था कि खाना — मेरे को यह एहसास हुआ कि खाना अच्छा बनेगा। तो मैं गया। जब खाना आया तो सच में बहुत सुंदर और तरह-तरह के पकवान बने हुए और सबकुछ बहुत बढ़िया बना हुआ। मैं बहुत छोटा था उस समय। तो मेरे को लगा यह तो बहुत बढ़िया हो गया। जैसे ही मैंने पहला खाना थोड़ा सा लिया और अपने मुंह में रखा, मीठा! तो मेरे को लगा कि यह कैसे संभव है ? मैंने दाल थी, वह मुँह में डाली, वह भी मीठी। सब्जी बनी हुई थी, वह भी मुंह में डाली, वह भी मीठी। सारी चीजें देख करके — मतलब मन में तो यह धारणा थी कि सबकुछ नमकीन होगा। क्योंकि उससे पहले मैंने ऐसा मीठा खाना कभी खाया नहीं था कि सब चीजों में मिठास। ऐसा कभी खाया नहीं था। जो भी घर में मिलता था खाना, वह सब नमकीन होता था।

तो जब वह मीठा उसका एहसास हुआ तो यह बात नहीं है कि "नहीं यह मीठा हो नहीं सकता।" मैं जिस चीज का एहसास कर रहा हूं वह गलत है, नहीं! मीठा, मीठा है। नमकीन, नमकीन है। उसमें यह बात नहीं है कि मेरी जो धारणा है वह अलग है और यह इसका स्वाद अलग है। कोई भी धारणा हो, कोई भी — यह बनाई हुई है कि "भाई! यह नमकीन खाना है, यह मीठा खाना है।" पर अगर उसमें नमक पड़ा हुआ तो वह नमकीन होगा और चीनी पड़ी हुई है तो वह मीठा होगा। और जब वह मुंह में जाएगा तो मुँह थोड़ी यह कहेगा कि "भाई! नहीं तुम तो सोच रहे थे कि नमकीन है तो मैं इसको नमकीन बना देता हूं।" मुँह या जो जुबान है, वह जो चखने की उसमें गुंजाईश है, ताकत है वह खाने को मीठा या नमकीन नहीं बनाती है वह तो सिर्फ बताती है कि यह मीठा है या नमकीन है। जो चखने से पता लगता है कि यह मीठा है या नमकीन है।

ठीक इसी प्रकार शांति भी ऐसे ही है। जब शांति होती है तब मनुष्य कह सकता कि "हां! मेरे को इस शांति का अनुभव है।" और जब नहीं होती है तब मन अशांत रहता है। कहीं इधर भाग रहा है, कभी उधर भाग रहा है। परन्तु सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह तो चक्कर ऐसा हो जाता है कि इतना मन भागता है, इतना मन भागता है, इतना मन भागता है और सारे दिन, सारी रात भागता रहता है कि लोगों को यह नॉर्मल हो गया है, यह नॉर्मल हो गया है। और अब जो स्थिति हुई है आपको अपने साथ रहना है, अकेले में रहना है वह सारी चीजें, जो इधर भागते थे, उधर भागते थे, यह सब खत्म। तो अब क्या करोगे ? अब लगता है कि अब नॉर्मल है, ठीक नहीं है। परन्तु भाई! तुम हो और तुम्हारे में यह ताकत है धीरज से, प्रेम से, प्यार से अपने हृदय के अंदर जो आपके अंदर शांति है उसका अनुभव कीजिए और इस परिस्थिति में भी आनंद लीजिए। आनंद आप इस परिस्थिति में भी ले सकते हैं।

तो सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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