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लॉकडाउन — बीसवां दिन 00:16:12 लॉकडाउन — बीसवां दिन Video Duration : 00:16:12 प्रेम रावत के साथ (हिंदी में अनुवादित)

प्रेम रावत:

सबको नमस्कार! उम्मीद है आप ठीक हैं; सुरक्षित हैं और अच्छा महसूस कर रहे हैं।

जिस बारे में मैं आज आपसे बात करना चाहता हूं दोबारा बहुत आसान है। क्योंकि यही तो हम सबको अपने जीवन में सच में करना है, चाहे जो भी परिस्थिति हो सादगी से ही हम उसे पार कर पाएंगे। जीवन की सादगी देखिए, अस्तित्व की सादगी और आप समझेंगे कि मैं क्या बात कर रहा हूं। अपने जीवन में हम कभी-कभी समझ नहीं पाते कि अस्तित्व में सामंजस्य होना कितना जरूरी है। सभी चीजों के साथ सामंजस्य बनाना, प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना, अपने आसपास के लोगों के साथ अच्छे से रह पाना और सबसे जरूरी बात अपने साथ सामंजस्य रखना। हमारे अस्तित्व में शांति, इस स्वांस में सामंजस्य, जो आ-जा रही है, हमारे अंदर जीवन देती हुई — साधारण चीजें, सुंदर और साधारण चीजें, आप — आपका अस्तित्व, आप क्या चाहते हैं वह सब अलग रख दीजिए — लेकिन अपनी जरूरतें उनको भी देखें, आसान-सी बातें पूर्णतया के लिए, शांति के लिए, खुशी के लिए, समझ पाना।

सवाल यह है लेकिन जवाब होने के लिए भी यह समझना कि यह सभी जवाब जो हैं — जवाबों का समुद्र वह आपके भीतर है। वह उलझन कि "यह क्या है" और फिर इस बात का जवाब खोज पा लेना। वह समझ तभी आ सकती है अगर आपके जीवन में सादगी है। अगर आप इस खुशी की ताल को समझते हैं, इस अस्तित्व की ताल को — जो आती है कि अस्तित्व है, आप आगे बढ़ना चाहते हैं आप जिंदा रहने से ज्यादा चाहते हैं कुछ, विकास करना चाहते हैं। इसमें जो जरूरी है वह बस यह कि आपका अस्तित्व सरल होना चाहिए। बस होना अस्तित्व में, सामंजस्य देखना सबसे आसान ढंग से, जटिल तरीके से नहीं। हमें जटिलता पसंद है — ओह, हमें जटिलता बहुत पसंद है। क्योंकि जब उलझा हुआ होता है हमें चुनौतीपूर्ण लगता है, “हम क्या कहें; इसमें गहराई क्या होती है।”

एक बार मैंने देखा कि कोई किसी के पिछले जन्म की बात कर रहा था, "अरे आप तो हाथी थे, अरे आप तो यह थे; आप तो वो थे!" आप यह सब क्यों सोच रहे हैं ? यह जीवन मिला है आपको। वह वाला नहीं जो आपका था। यह जीवन है आपका और आप इस जीवन में क्या कर सकते हैं ? इस जीवन में क्या बन सकते हैं ? क्या आप सरल बन सकते हैं ? क्या आप बच्चे की आंखों से सबकुछ देख सकते हैं ? यह क्या है ? और इसमें बस सरलता है बिना सोचे बस मान लेना। “यह क्या है कि इसका नाम क्या होता है ? इसका कार्य क्या है; इसका उद्देश्य क्या होता है ?” यह सब बाद में होगा — लेकिन एक पड़ाव है जहां बच्चा बस देखकर कुछ अपना लेता है।

कई बार मैंने यह देखा है। आप बच्चे को चांद दिखाइए। आप उन्हें बाहर ले जाइए। अपने आप चांद दिखाइए; अभी रात ही है; वह ऊपर देखेंगे, वह चांद को देखेंगे — उन्हें नहीं पता कि इसे “चांद” कहते हैं और तब मां-बाप कहते हैं कि "यह चांद है" — लेकिन बिना उसे नाम दिए बिना। और किसी चीज के बिना, वह बस उसकी सुंदरता को निहारता है, सराहना करता है यह जाने बिना कि “यह कितना दूर है, चांद का व्यास कितना है, इसकी परिधि कितनी बड़ी है, चांद क्या है, यह कहां से आया" — यह सब बाद में आती है बातें। लेकिन मुद्दा यह है "अच्छा यह बाद में होगा; बाद में हम इसमें पड़ जाते हैं" —लेकिन उस सादगी का क्या ?

मैं हमेशा एक सवाल पूछता हूं "उस बच्चे को क्या हुआ ?" आप वही बच्चे थे एक बार — वह बच्चा तो बहुत ही सरल हुआ करता था। और कई लोगों के लिए वह इसकी गहराई नहीं देखते, मैं देखता हूं। किसी चीज की सच्चाई को देख पाना, उसका नाम क्या है यह जाने बिना, उसकी विशेषता पता किए बिना, उसका उद्देश्य जाने बिना, कुछ भी जाने बिना.. मतलब कि चांद सुंदर क्यों लगता है ? क्या यह है ? जब वह आकाश में चमकता है यह सुंदर लगता है। यह सुंदर क्यों लगता है ? इससे फर्क नहीं पड़ता, यह तो बस है! क्या मैं भी ऐसा ही बन सकता हूं ? क्या मुझे जीवन में होने वाली हर बात के लिए कई हजारों मतलब निकालने जरूरी हैं या मैं बस मान सकता हूं कि “मैं हूं! मेरा अस्तित्व है ?” क्या मैं जरूरतों को मान सकता हूं ? मैं शांत होना चाहता हूं। मुझे अच्छा महसूस करना है। मुझे खुशी को महसूस करना है। मुझे पूर्ण होना है और कई लोग, वह क्या है जिससे हम पूर्ण होंगे ?

किसी ने मुझसे हाल ही में एक सवाल पूछा "शांति क्या है; शांति क्या होती है ?" किसी ने असल में, कई बार लोगों ने मुझसे पूछा है कि "शांति क्या है ?"

वाह! सच में आप जानना चाहते हैं शांति क्या है ? आप महसूस नहीं करना चाहते; आप बस जानना चाहते हैं कि शांति क्या है ? यह क्या बात हुई। चीनी क्या है ? मिर्च क्या है; नमक क्या है ? आप इसे नाम दे सकते हैं "हां, ये ये है; वो ये है; वो ये है।" पर चखिए! इसे चखिए। एक कहानी है जिसमें एक राजा होता है — और वह दरबार में बैठा होता है।

एक राजदूत आता है और उस राजदूत ने कहा कि "उसके राजा ने उसे भेजा है, एक तोहफे की तरह अपने राज्य के इस फल के साथ।" और वह राजा जो बैठा हुआ है वह कहता है "यह क्या है ?"

तो जवाब आता है "यह आम है।"

अब ऐसा हुआ कि उनके राज्य में यह फल नहीं होता था। तो उसने कहा "अच्छा यह क्या काम करता है ?"

तो किसी ने कहा "अच्छा, मैं जरा देखता हूं कि यह क्या है!" तो उन्होंने एक आम को देखा और फिर कहा "राजा यह एक फल है और ऐसा दिखता है और यह एक आम है।” “पर मुझे समझ नहीं आया।"

राजा ने कहा "आम क्या होता है ?"

तो फिर एक आदमी गया और उसने कहा कि "अच्छा, देखते हैं यह कैसा है! उसने कहा, पिलपिला-सा कुछ है।"

राजा ने कहा "मुझे अब भी समझ नहीं आया।"

फिर किसी ने उसे खाया और कहा "ओह यह तो बहुत स्वादिष्ट है; यह मीठा है; इसकी कमाल की महक है।"

राजा ने कहा "मुझे अब भी समझ नहीं आया आम क्या है!" और अंत में यह चलता रहा, चलता रहा और चलता रहा और सब लोग इस बात से तंग हो गए।

फिर एक दरबारी उठा और उसने एक आम का टुकड़ा लिया, प्लेट में रखा और राजा के पास लेकर बोला "राजा इसे खाएं।"

और फिर जैसे ही राजा ने उसे खाया उसने कहा "अच्छा अब मुझे पता है आम क्या है।" धन्यवाद! यह ताकत है जानने की।

और मानने की ताकत ? “ज्यादा, ज्यादा, ज्यादा इसे मानिए; इसे मानिये; इसे मानिए; इसे मानिए; इसे मानिए।” क्योंकि यह जानना नहीं है, “यह है मानना, मानना।” जाकर आप समझें एक गोली बनाकर आपको कोई दे देगा और आपको वह गोली खा लेनी है। आप बोलेंगे "मुझे लगता है मुझे पता है।” पर मैं इस बात में नहीं मानता। “मैं उस बात को मानता हूं और मैं ज्यादा मानता हूं; मैं कम मानता हूं।" और ये चीजें चलती रहेंगी, चलती रहेंगी। और फिर ऐसे भी लोग हैं, जो इसे आपको समझायेंगें। और समझाने वालों की कोई कमी नहीं है आजकल। और फिर वो क्या करते हैं ? वो उठते हैं और वह अपनी किताब खोलते हैं और फिर कहते हैं "अच्छा यह ऐसे होगा मैं आपको बताता हूं। यह इसलिए है, क्योंकि किताब में लिखा हुआ है। वह झूठ है, क्योंकि किताब में लिखा हुआ है और यह गलत है, वह ऐसे है, यह वैसे है।" और यह चलता रहता है पर यही तो है मानना। पर जानने की बात क्या है ? आप अपने जीवन में क्या चाहते हैं; आप जानना चाहते हैं ? और यह है खुद से सामंजस्य बनाए रखना — अपने विरुद्ध नहीं पर खुद से सामंजस्य रखना, सच्चा सामंजस्य, उस ताल में होना।

वरना तो जीवन क्या है ? मैं आपको बता सकता हूं यह है कि संगीतविंद में कोई एक इंसान, कोई एक कलाकार गलत बजा रहा हो और वह जो गलत बजा रहा है वह गलत ताल में है और क्या यह आपके जीवन में ऐसा होता है ? जहां संगीत कुछ अजीब है, क्योंकि कोई और इसे बजा रहा है। यह उसी ताल में नहीं है जैसे आप रहना चाहते हैं। आपके सामंजस्य के हिसाब से नहीं, इस जीवन में हर रोज सामंजस्य होना जरूरी है। हर पल जब आप अस्तित्व में हैं, आपको होना है सामंजस्य में। जैसा समय आजकल है, यह चुनौती है। क्योंकि यह हो रहा है। “अब क्या होने वाला है ?” बस यही बात है — "क्या होने वाला है; कब होने वाला है; ये क्या है; वो क्या है; यह क्या है; वह क्या है।" लेकिन हृदय की दिलचस्पी रोज क्या होता है उसमें है: “आप जीवित हैं”, जीवित हैं, अस्तित्व है आपका।

समझिए सामंजस्य में होना क्या है। समझिये कि आपका सामंजस्य में होना कितना जरूरी है। अस्तित्व के साथ सामंजस्य, जो भी समय है आपके पास — जो भी समय बचा हुआ है। और जब यह खत्म होगा आप तालमेल नहीं कर पाएंगे। क्या करना चाहेंगे ? हां, लेकिन क्या कर पाएंगे ? नहीं! यह है आपका मौका; यह है मौका महसूस करने का, तज़ुर्बा लेने का। यह कितना सुंदर है कि आप इसे अब भी कर सकते हैं; महसूस कीजिए; शांति का अहसास कर सकते हैं; खुशी महसूस कर सकते हैं। जीवित होने की खुशी; अच्छाई; वो सामंजस्य; वो समझ; और आपको यही तो होना भी है अंत में। वो मुश्किल नहीं है, लेकिन आसान-सी बात है।

और जब आप समझते हैं कि यह सादगी क्या है और कितनी अहम है वह सादगी, फिर सबकुछ बदलने लग जाता है। सब चीजों का नया मतलब निकल जाता है। "वाह! मैं आज को कैसे पकड़ूं ? अपने जैसे रहकर” — और आप उसे जीत लेंगे। आप यही तो चाहते हैं। हमेशा एक अच्छा समय रहता है; हमेशा एक सुंदर समय है अगर आप समझ जाएं तो। विश्लेषण नहीं करना है, आकलन करने से नहीं "अरे यह तो….” हमें आकलन चाहिए; मैं नहीं कहता हमें आकलन नहीं चाहिए। हमें आकलन चाहिए। कई बातें हैं जिनमें आकलन जरूरी होता है। लेकिन आपका अस्तित्व वह सच्चा है। आकलन करने का लाभ कोई नहीं है “इसका क्या मतलब, उसका क्या मतलब।” अपनाइये, अपनाईये और समझिये — कि आपको उस आसान सामंजस्य में होना ही है, अपने अस्तित्व के साथ, सरल तालमेल में इस स्वांस के साथ। जितनी आसान है, आपको उतना ही आसान बनना है; आपको उतना सच्चा बनना है।

सच क्या है ? कोई महान बातें नहीं जो समझ में नहीं आ सकतीं। नहीं, नहीं, नहीं इन दो दीवारों के बीच बिल्कुल नहीं। आसान क्या है; सच्चा क्या है आपके लिए ? इस स्वांस का आना और जाना, आपका अस्तित्व। आपका सच है आपकी जरूरत शांति की, शांति की आपकी जरूरत। सच है पूर्ण होने की आपकी जरूरत। सच है आपकी जरूरत उस सादगी में रहने की। सच है जीवन में वह सामंजस्य लाना, आपके जीवन में सामंजस्य होने की जरूरत।

एक बार फिर दुनिया देखें और खुद को बच्चे की आंखों से देखें। मैं हमेशा कहता हूं “उस बच्चे को क्या हुआ, क्या आपने सोचा ?” वह बच्चा अब भी है। वह आप में ही है, कभी किसी समय एक बच्चा ही था। वह बच्चा कभी नहीं मरता। वह बच्चा अब भी यहीं है। उस बच्चे से दोबारा मिलिए; उस सादगी को फिर से जानिए; उस सामंजस्य को फिर समझें; उस खुशी को फिर से समझें। इस सबका पुरस्कार होगा पूर्ण होना, शांति मिलना, यही तो है जीवन की सुंदरता।

सुरक्षित रहें; अच्छे रहें आप सब। धन्यवाद!

लॉकडाउन — उन्नीसवां दिन 00:16:46 लॉकडाउन — उन्नीसवां दिन Video Duration : 00:16:46 प्रेम रावत के साथ (हिंदी में अनुवादित)

प्रेम रावत:

हेलो नमस्कार सभी को।

उम्मीद है आप सब ठीक हैं और इन परिस्थिति में भी ठीक रहने का प्रयास कर रहे हैं। मुझे आपसे ऐसी ही आशा है हम यही कर सकते हैं — एक-एक कदम लें एक-एक दिन करके एक-एक पल यह जीवन का सही तरीका है। तो हर बात को आराम से देखें। हां, हमारी क्षमता है कल का सोचने की। हां, हमें कल का सबकुछ याद भी है। पर हम यह भी समझ सकते हैं कि आज का महत्व क्या है ? हमारे भीतर एक कमाल की ताकत है वर्तमान को समझने की। जबतक हम यह समझदारी प्रयोग में नहीं लाते, वह क्षमता जिससे हम वर्तमान को समझ पाते हैं कि आज का अर्थ क्या है। कल की तैयारी करने को बेमतलब क्यों समझते हैं हम लोग और कल तो जा चुका है और वह वापस नहीं आने वाला और वो कभी नहीं आएगा यह समझ लेना।

लेकिन आज यह पल आपके लिए संदेश लाया है और वह संदेश बहुत गहरा है। यह संदेश बहुत आसान है और यह संदेश बहुत स्पष्ट है और यह संदेश कहता है “आप अस्तित्व, आनंद!” और इस संसार का आनंद नहीं — वह आनंद नहीं जिसकी बात अक्सर आम लोग करते हैं "हां, चलो समुद्र किनारे चलें” या “चलो ऐसा करते हैं, चलो वैसा करते हैं।" वह आनंद जो आपके भीतर छुपा है — वह आनंद जो आपके अस्तित्व में है; वह आनंद जो जीवित होने में है; वह आनंद जो यह समझने में आता है कि यह पल आपके जीवन में क्या बातें या चीजें ला रहा है! क्या यह जीवन, क्या यह अस्तित्व एक तोहफा है ? यह तोहफा है अगर आप समझें कि यह खास है। अगर आप समझें, अगर आप यह तोहफा स्वीकारने को तैयार हैं, अगर आप यह तोहफा लेने को तैयार हैं, अगर आप यह तोहफा खोलना चाहते हैं तो फिर यह तोहफा है। वरना इसका कोई अर्थ नहीं है। मेरा मतलब, आपसे पहले कितने ही लोग और आपके बाद कितने ही लोग इस दुनिया में आए और चले गए हैं और इससे बताइए क्या फर्क पड़ा है ? कोई और इंसान….

आजकल सब कुछ आंकड़ों में है और हर रोज जब मैं उठता हूं मैं एक वेबसाइट देखता हूं और इसका नाम है "वर्ल्डओमीटर्स।" मैं इस वेबसाइट पर देखता हूं कि आंकड़े और संख्या ही हैं। संख्या पैदा हुए लोगों की, वो लोग जो मर गए हैं — सभी लोग सबकुछ और फिर कोरोना वायरस की भी जानकारी होती है वहां पर। मैं उन आंकड़ों को देखता हूं कि "हां यह संख्या इंसानी जिंदगी की है। लेकिन क्या है सच में जो ये आंकड़े दर्शाते हैं कि असल में क्या चल रहा है। जो जीवन पर खतरा है।" आप कहते हैं, " ओह, हां इतने सारे लोग मर गए और वो बुजुर्ग थे।" यह गलत बात है। उदास करने वाली बात। क्योंकि एक पूरी पीढ़ी उस ज्ञान के बिना बड़ी होगी और वो सारी बातें और वो सारी जानकारी जो उनके दादा-दादी उन्हें देते। मेरा मतलब यह कितना कीमती है, कितना जरूरी है यह। कोई बताने वाला तो होता "यह ऐसा करना होता है। कोई बात नहीं।” सबकुछ ठीक हो जाएगा हमेशा हमारे हिसाब से काम नहीं होते हैं; यह तो किसी ने नहीं सोचा था।

कई बार मां-बाप उनके पास समय नहीं होता। लेकिन दादा-दादी के पास समय होता है और वह ज्ञान आगे जाता है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से अगली पीढ़ी और यह है मूल्य — यह संख्या नहीं है, लेकिन मूल्य उस व्यक्ति की जो यहां पर है, जीवन की। क्योंकि इनमें से एक संख्या (शायद वह हजारों में हो), लेकिन वह प्रतिनिधि है इंसानों की। वह आपको दर्शाती है; मेरे बारे में नहीं। दर्शाती है सच में इस स्वांस का सही मतलब, जो हमारे भीतर आ रही है। हमें एक मौका मिला है जीने का — एक मौका मिला है कुछ अच्छा करने का। और मैं आपसे ये सभी बातें बोल रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है कि कभी-कभी हमें अपना सिर रेत से बाहर निकालना चाहिए (एक शुतुरमुर्ग की तरह) और आसपास देखना चाहिए उस सच्चाई को, वह सुंदरता जो अस्तित्व में है। क्योंकि हां — हां कई बुरी चीजें हो रही हैं। कुछ विश्व नेता बिल्कुल सक्षम नहीं हैं। उन्हें सच में कुछ भी नहीं आता। उन्होंने यह तूफान आता हुआ देखा और फिर भी कुछ नहीं किया जबतक देर नहीं हो गई। और इस सबकी इतनी बड़ी सजा मिली है, बुरी हालत, खतरनाक माहौल है…. लेकिन इस परेशानी में भी आपको अपना सिर रेत से बाहर निकालना है और सच्चाई को देखना है। सच क्या है ? सुंदर क्या है; वह जो अच्छा है।

क्योंकि आपके भीतर वो भेड़िये हैं — एक अच्छा भेड़िया और एक बुरा भेड़िया और वह लड़ते हैं। पर कौन-सा भेड़िया जीतेगा ? प्रत्यक्ष है — जिसे आप जीतायेंगे। अगर इस परिस्थिति में आप बुरे भेड़िए को जीता रहे हैं तो वही जीतने वाला है और मेरी सच मानिए जब बुरा भेड़िया जीतता है यह आपका जीवन बुरा बना देता है और यह इतने बुरे वक्त में और भी ज्यादा बुरा हो जायेगा। लेकिन अगर आप अच्छे भेड़िए को जीताते हैं… वह अच्छा भेड़िया क्या चाहता है ? वह चाहता है करुणा। वह चाहता है स्पष्टता। वह चाहता है खुशी, पूर्ण होना। और अगर ये चीजें उस भेड़िए को दी जाती हैं वह मजबूत बनता है और फिर यह बुराई पर और बुरा नहीं होगा यह कुछ अच्छा होगा, कुछ सीखा जाएगा, कुछ समझा जाएगा।

एक कहावत है "जब आप झुके हुए हों कुछ उठा लीजिए। आप इतने करीब तो हैं ही; कुछ उठा लीजिए।" और मैं यह मानता हूं जब आप जीवन में झुके हों, तो कुछ उठाइए। समझे! यह बात हमेशा रही है “जब बुराई का समय होता है आपने इसकी तैयारी तभी कर लेनी चाहिए जब समय अच्छा हो।” बुरे वक्त की तैयारी करने में आप उसकी तैयारी तभी कर लें जब वक्त अच्छा है। और सवाल यह आता है, “क्या आपने किया ? क्या आपने समय रहते तैयारी की ?” या फिर आप बस कह रहे थे "हां, सबकुछ ठीक है; कुछ बुरा नहीं होगा। देखिए, यहां पर..."

यही तो होता है कई बार सभ्यताओं में। और यह पहली बार नहीं होगा कि सभ्यता के इतना विकसित होने के बाद इस ऊंचाई पर लोग खो गए। लोग सोचने लगे कि "हे भगवान, हम इतने ताकतवर हैं; हम ये हैं; हम वो हैं। मतलब कि कुछ बुरा नहीं होगा…” सब लोग अलग सच्चाई में हैं, सब। अब अलग सच्चाई को देखा — काश! हम देख पाते! क्योंकि यह सच्चाई इतनी अच्छी नहीं है। कुछ अलग सच्चाई ही अच्छी थी। इस बात से इंसानों की मदद कैसे होगी ? इसलिए मैं लोगों से कहता रहता हूं, लोग हमेशा मुझसे कहते थे "यह क्या है; इसका अर्थ बताएं ?" और मैं कहता था, “रुकिये, रुकिये, रुकिये, रुकिये, रुकिये, रुकिये, रुकिये आप एक इंसान हैं।” तुलनात्मक रूप से हमने सच में इस आधुनिक रूप में, यह आधुनिक व्यक्ति होने के नाते हमें ज्यादा समय नहीं हुआ है यहां पर। हमने अभी सबकुछ समझा भी नहीं है। हम अब भी पुरानी-सी दुनिया में रहते हैं और हम मतलब कि हम सोच सकते हैं कि इस आधुनिक 2020 में और इस तकनीकी के बीच रह रहे हैं, लेकिन सच्चाई है कि महिलाओं को आज भी हमारे समाज में बराबरी नहीं मिलती है और यह अकल्पनीय है।

ज्यादा समय पहले नहीं कुछ वर्षों पहले ही और मुझे यकीन है कि इंडिया जैसे देशों में यह अब तक चल रहा होगा कि अलग समुदाय में आप शादी नहीं कर सकते। इसका प्यार से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यह है कि "नहीं, नहीं यह व्यक्ति इससे शादी नहीं कर सकता।" हालांकि समाज काफी बदल गया है लेकिन अब भी काफी बदलाव बाकी हैं और एलजीबीटी समुदाय के लोग हैं — जिन्हें इतनी नफरत का सामना करना पड़ता है और हम उन्हें जैसे वो हैं, उन्हें वैसे अपनाते नहीं, इंसान की तरह भी नहीं अपनाते। और समाज अब भी इतना ज्यादा बंटा हुआ है — बुरा लगता है। मुझे यह बात पता है कि टीवी पर ऐसे शोज़ हैं जहां पर लोगों द्वारा जमाखोरी को दिखाया जाता है और उनके पास इतना कुछ है कि यदि आप उनके कमरों में जाएंगे तो जगह भी नहीं मिलेगी। लेकिन आपको क्या लगता है बड़ी कंपनियां क्या कर रही हैं ? और जब वह जमा करती हैं (पैसे इकट्ठा करती हैं), उनकी तारीफ होती है, "आपने तो बहुत अच्छा किया!" लेकिन वह तो बस पैसे को जमा कर रहे हैं। जब, “लेकिन अच्छा, देखिए, देखिए कैसे वह इंसान इतना कामयाब हो गया।" शायद उस इंसान ने, उनके पास क्या है, उन्होंने भी किसी से लिया ही होगा।

जब भ्रष्टाचार होता है तब ऐसा ही होता है। किसी गरीब के मुंह से छीनकर खाना ले लेते हैं। हम जितना उगाते हैं, उससे कहीं ज्यादा बर्बाद कर देते हैं। यह है वह समाज जिसकी रचना हमने अपने लिए की है ? अब वक्त है सच में, सोचने का इस सब पर, यह समझना कि “हमें क्या चाहिए ? क्या हम इस धरती पर बंटकर रहना चाहते हैं या फिर हम एक साथ मिलकर रहना चाहते हैं ? क्या हम ऐसी दुनिया चाहते हैं जिसमें सभी लोग सुरक्षित महसूस कर पायें या हम ऐसी दुनिया चाहते हैं जहां पर सबको खतरा और खतरा और खतरा और खतरा ही महसूस होता रहे ?”

इन सवालों के जवाब मेरे दोस्तों आपके हृदय में है और सभी इंसानों के हृदय में है। यह कोई अनोखे विचार नहीं हैं जो 2020 में अभी-अभी दिमाग में आए हैं। यह वो बातें हैं और विचार हैं जो बहुत लंबे समय से रहे हैं। दरअसल तब से जब से दुनिया में समाज रहे हैं। आजाद होने की इच्छा; आगे बढ़ने की इच्छा; बेहतर होने की इच्छा और एकता लाने की इच्छा। और पूरी मानवता की बेहतरी के लिए काम करते रहना। जिस दुनिया का निर्माण हम आज करेंगे, वही दुनिया कल भी रहेगी और उसके बाद भी और उसके बाद भी और उसके बाद भी। चाहे आपको पसंद हो या नहीं, आप ही कल के रचयिता हैं। लेकिन मेरी मानिए आप कभी यह नहीं समझ पाएंगे कि भविष्य का अर्थ क्या है अगर आप वर्तमान को नहीं समझते। आप कल का मूल्य नहीं जान पाएंगे अगर आप आज का मूल्य नहीं जान पाए। अगर वर्तमान आपके लिए रहस्यमय है तो भविष्य भी रहस्यमय ही रहेगा।

इसलिए यही समय है; यह समय है एक कदम लेने का, भीतर देखने का, अनिश्चितता के बारे में सोचने का नहीं। लेकिन निश्चितता के बारे में सोचना जो हम ला सकते हैं। एकजुट होने का समय है जैसे हम पहले कभी नहीं थे। और बाकी पूरी दुनिया के साथ होने से ज्यादा जरूरी होगा कि हम अपने आपके साथ जुड़ें। हम दो नहीं हो सकते, हम तीन नहीं हो सकते, चार नहीं हो सकते — हमें एक होना है अपने आप में। हमें जानना है कि हम कौन हैं; हमें समझना है कि हम कौन हैं ताकि हम आगे बढ़े और सभी के लिए एक बेहतर दुनिया बना पाएं। ताकि हम समझें — हम समझें वह मतलब “मानवता का, मानवता”, करुणा पूरी दुनिया के सभी लोगों के लिए — सबके लिए।

तो आप सभी का धन्यवाद! मैं आपसे फिर बात करूंगा। उम्मीद है आपको कुछ सोचेंगे इस बारे में। और सबसे जरूरी सुरक्षित रहें; ठीक रहें और खुश रहें।

लॉकडाउन — अठारहवां दिन 00:21:08 लॉकडाउन — अठारहवां दिन Video Duration : 00:21:08 प्रेम रावत के साथ (हिंदी में अनुवादित)

प्रेम रावत:

सबको नमस्कार! उम्मीद है आप सुरक्षित हैं।

तो आज मैं आपसे बस इस मौके के बारे में बात करना चाहता हूं — एक मौका होने का खुश रहना और आनंद लेने का मौका, सादा रहना यह समझना कि वो रिश्ता, उन दो दीवारों के बीच आपका खुद से ही है। आपके बारे में है — आपका अस्तित्व है यहां होने के बारे में। यह कोरोना वायरस के बारे में नहीं; यह इस दुनिया के बारे में नहीं; यह विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में नहीं; यह इसके बारे में नहीं है। मैं यह इसलिए बोल रहा हूं वो सभी बातें जिनसे हम परेशान रहते ही हैं वह इंसानों ने ही बनाई हैं। यह अर्थव्यवस्था, ये सभी चीजें यह सब इंसानों ने बनाई हैं। किसी ने सोची हैं ये चीजें — "हमें ऐसा करना चाहिए, हमें वैसा करना चाहिए, हमें ऐसा करना होता है।"

यहां नीतियां हैं; “यहां ये है, वो है और वो हुआ और ऐसे हुआ। बैंक इसे नियंत्रित करता है कुछ लोगों को समूह बनाने में और उसे नियंत्रित करने में अच्छा लगता है।” आप कठपुतली जैसा महसूस करते होंगे ? आप कठपुतली नहीं बनना चाहते, लेकिन हम सब यही तो हैं इसलिए आपको आजादी चाहिए और जब यह शब्द लिखा है "आजादी," यह मजबूत भावना जुड़ी होती है इससे, "हां, हां मैं आजाद होना चाहता हूं।"

पर कभी आपने खुद से पूछा कि "यह क्या है जो आपको बांधता है ? आपको आजादी क्यों चाहिए आप क्यों महसूस करना चाहते हैं ? आपको बंदिश क्यों लगती है ?” और इसकी वजह शायद यह है कि वह सारी बाहरी चीजें जो आपको पकड़ के रखती हैं वह बाहर हैं अपनी असलियत समझने से। आपका यह जीवन है — यह आपका अस्तित्व है और ज्यादातर समय में हमें इसके बारे में कम ही पता होता है। हमने इसे खोजा नहीं है। हमने इसे ढंग से देखा नहीं है, “इसका क्या मतलब है; जीवित होने का क्या मतलब है; अस्तित्व में होने का क्या मतलब है; होने का क्या मतलब है ? इसके होने का क्या मतलब ?” यह मौका होना — या यह पिछले जन्मों में किए कार्यों का परिणाम है और ये और वो और ऐसे लोगों की बिल्कुल कमी नहीं जो मुश्किल बढ़ाते हैं।

जी, आप नहीं जानते कि इस दुनिया में लोगों ने ही धरती पर अस्तित्व कितना जटिल बना दिया है। "ओह आप यहां इसलिए हैं, क्योंकि आपने पिछले जीवन में कुछ किया था। आपने ये किया था, आपने वो किया था" और बस ऐसी ही बातें और वह लोग जो आपको यह सब बताते हैं उन्हें भी यह नहीं पता कि इसका क्या मतलब है। क्यों ? क्योंकि यह एक किताब में है। वो नहीं कहते इस बात को, यह मानने के बारे में है — मानना, मानना, मानना, मानना। हम सब मानकर बहुत खुश हैं। हमारी परेशानियों को हम मान लेते हैं। हम दिक्कतों को बस मान लेते हैं। हम मानते हैं कि रचने वाला कौन है वह। हम मान लेते हैं कि यहां तक हम कैसे आए हैं। हम बस मान लेते हैं कि ये सब, ये सारी बातें। मैं चुनौती देता हूं उन लोगों को! आप क्या जान सकते हैं ? जानते हैं समझने के लिए खुद की जानकारी होने के लिए और यही तो है वह सबसे जरूरी बात — जीवित होने का असली मतलब समझना — और वह भी इस समय में।

तो क्या हुआ ? अब आपने कोई खबर सुनी यह शायद दिसंबर 2019 में थी "हां, ओह! कुछ लोग चाइना में बीमार हो गए हैं।" "वाह अच्छा! उम्मीद है कि जल्द ठीक हो जाएंगे!" हूँ, तो अब वह जल्दी से अच्छे हो जाएँ या ना हों पर वो सभी जानने लग गये, लोगों को समझ में आ गया कि कुछ ठीक नहीं है। और आपने देखा जब मैंने कहा कि “यह सब लोगों का ही किया धरा है।” हम इंसान ही यह करते हैं तो अचानक से ही एयरलाइंस हैं, जो राजी खुशी लोगों को ले जा रही हैं, जहां भी वो जाना चाहें और बिना लोगों को यह बात पता चले कि वायरस भी साथ में जा रहा है और अगली बात क्या हुई ? पूरी दुनिया में यह फैल गया…. तो अब जिसने भी अप्रतिबंधित सफर करने के बारे में सोचा था उनकी मंशा बुरी नहीं थी। वह थी कि "हां यह तो बहुत ही अच्छा होगा लोग जहां भी जाना चाहेंगे वो जा पाएं।"

एक समय था जब ऐसा नहीं था। जब मैं 70 के दशक में सफर करता था, शायद 70 या 71 उस समय में ऐसा बिल्कुल नहीं था। यह आज के समय के सफर जैसा नहीं था। लोग तैयार होते थे यह एक खास मौके की तरह होता था और आपके पास बहुत सारा पैसा होना चाहिए था एक एयरप्लेन में बैठने के लिए और फिर यह कार्टर प्रशासन के समय हुआ कि सबकुछ आसान बना दिया गया। उससे पहले बड़ी एयरलाइंस ने सब बंद किया हुआ था और फिर यह प्रतिबंध हट गए और नई एयरलाइंस भी आ गई थीं और वो सभी कंपनियां आ पायीं जो इस काम को करना चाहती थीं और लोगों को यहां-वहां ले जाना चाहते थे और फिर गुणवत्ता, हां बिल्कुल, चली गई। लेकिन हां, काफी लोगों ने उड़ान भरनी शुरू की और फिर अगली बात क्या हुई ? कुछ कोरोना वायरस जैसा जी हां, सफर, सफर, सफर और इसके जैसा ही कुछ और भी था "स्पेनिश फ्लू" — वह भी लोगों के सफर करने से ही हुआ था। उसमें भी यात्राएं की गई थीं और उन यात्राओं की वजह से बीमारी ज्यादा फैली थी। तो जो भी, इस बात के अलावा जो भी हो रहा है…. यह इंसानों ने अपने आप ही बनाया है, यह मुद्दा — और यह इंसान ही हैं जिन्हें इससे निकलने का रास्ता निकालना पड़ेगा। और ऐसे भी लोग हैं, यकीन है कि "जैसे ओह! यह तो, लेकिन ये मुश्किल है और वो मुश्किल है और ये ऐसे हुआ और वो वैसे हुआ।" इसका इन सबसे कोई लेना-देना नहीं है।

कभी मत भूलिए कि आपका इन दो दीवारों के बीच काम क्या है। कृपया इन बातों से भ्रमित ना हों यह चला जाएगा। आपको क्या करना है यह एक आसान-सी बात है: “दूरी बनाइए, बीमारी ना लें और ना ही दें, अपने हाथ धोएं, दूरी बनाइए” — बस इतना ही। वो काम कर रहे हैं दवाइयों पर — उन्हें बनाने पर। वो दवाई बना लेंगे, बिल्कुल सही चीजें जो भी… और फिर आप अपना काम कर सकते हैं या वह जो भी था जिस पर आप लौटना चाह रहे थे, (जो मैं तो बिल्कुल सोच नहीं सकता कि वह क्या है ऐसा) शायद आपस में लड़ाई करना ? और सभी अजीब चीजें हम यही तो कर रहे थे। पर जरा सुनिए, हम यही तो पहले कर रहे थे आप अखबार उठाकर यह देख सकते हैं जो चीजें हम कर रहे थे और अब हमारे सामने कोरोना वायरस आ गया है जिसमें आपका पूरा ध्यान लगा हुआ है और जब यह खत्म हो जाएगा मुझे यकीन है कि हम उसी पागलपन की ओर वापस लौट जाएंगे। पर हम यहां इसके लिए नहीं आए हैं ना ही कोरोना वायरस के लिए ना ही उस पागलपन के लिए, जो यहां पर हर रोज होता है। हम किसी और चीज के लिए यहां पर आए हैं। आप यहां पूर्ण होने आए हैं।

कई बार की तरह मैं उदाहरण देता हूं जैसे कि आपने एक टिकट खरीदा और आप जीत गए और वह टिकट है बस कुछ ही दिनों के लिए। आप एक कमाल के शॉपिंग सेंटर में रहने वाले हैं और उस शॉपिंग सेंटर में कई तरह की दुकानें हैं, सबसे बेहतरीन दुकानें हैं वहां पर और आप ले सकते हैं — आप किसी भी दुकान में जाकर कुछ भी ले सकते हैं। बस एक ही शर्त है और वह एक शर्त है आप अपने साथ उस जगह से कुछ नहीं ले जा सकते। तो आपकी कार्यनीति क्या होगी ? मुझे पता है मेरी कार्यनीति क्या होगी मैं उस जगह में होने का आनंद लेने वाला हूं। मैं शायद अपने साथ कुछ भी ना ले पाऊं, लेकिन एक चीज है जो मैं वहां से ले जा सकता हूं — और वह मुझे पता है — वह है मेरा 'आनंद।' तो यह है मेरी नीति; मेरी नीति है कि यहां पर मैं हर पल आनंद लूँ और अब परिस्थिति होती हैं, यह तो होंगी ही और लोग सोचते हैं स्थितियां अलग-अलग होती हैं, बातें होती हैं "यह मत करो, वह मत करो, मैं नहीं चाहता आप ये करें, मैं नहीं चाहता वो करें।" और मैं कहता हूं “क्यों ? क्या बात है? आपकी परेशानी क्या है ?” लेकिन फिर आप समझते हैं जैसे कि "देखिए अच्छा है, आने दीजिए!” यह जानना जरूरी है कि — मैं परिस्थिति नहीं संभाल सकता लेकिन अपनी प्रतिक्रिया संभाल सकता हूं अपने ही लिए, किसी और के लिए नहीं, अपने ही लिए। यह एक बहुत बड़ा हिस्सा है उस प्रशिक्षण का जो मैं आपके लिए लाने वाला हूं।

“आपके नियंत्रण में क्या है ?” आप स्थिति नहीं संभाल सकते, बिल्कुल आप परिस्थिति संभालना चाहते हैं लेकिन आप हर समय स्थिति को नियंत्रण में नहीं रख सकते। लेकिन आपके बस में एक चीज है और वह है आपकी प्रतिक्रिया, आपका रिएक्शन, आपकी प्रतिक्रिया। अगर आप उसे नियंत्रित कर पायें अपने खुद के लिए, किसी और के लिए नहीं तो वह सबकुछ आपको ही लाभ देगा। अगर आप खुद से करुणा नहीं दिखा सकते; आप दूसरों को करुणा नहीं दिखा पाएंगे। अगर आप खुद को नहीं समझ सकते, तो आप दूसरों को नहीं समझ पाएंगे। अगर आप स्वयं पूर्ण नहीं हैं तो आप दूसरों को पूर्ण नहीं कर सकते। अगर आप खुद से प्यार नहीं करते तो दूसरों से नहीं कर पाएंगे। अगर आप स्पष्ट नहीं हैं तो आप दूसरों को स्पष्टता नहीं दिखा सकते। सबसे पहले यह आपके लिए होना चाहिए। अगर यह आपके लिए हो पाया तब आप पर निर्भर है आप इससे क्या करना चाहते हैं। यह आप पर निर्भर है कि आप इसे कैसे चाहते हैं। यह आप पर है कि “आप इसका क्या करते हैं ?” क्योंकि आप अभी जागे हुए हैं और वह सुंदरता, वह सुन्दर ताकत जो आपके भीतर ही है। वह सब आप में है वह सबकुछ आपके भीतर है। क्या हम उदास नहीं होंगे कभी ? हां बिल्कुल, हम उदास होंगे।

किसी ने मुझसे एक सवाल पूछा कि मैं इसके बारे में सोच रहा हूं — “मेरे दादाजी हैं और मैं उनसे मिलने जा नहीं सकता, उन्हें अलविदा नहीं कह सकता, मैं उनका ख्याल नहीं कर सकता तो मैं क्या करूं ?" जब मैंने यह चिट्ठी पढ़ी पता है बिल्कुल, मैं भी उदास हो गया। यह अच्छा नहीं है यह उदासीन करने वाला है। अब इस वायरस के बाद क्या होने वाला है मेरा मतलब यह तो अभी शुरू ही हुआ है सोच सकते हैं उन सभी गरीब लोगों का — गरीब ही हैं जिनका हमेशा सबसे ज्यादा नुकसान होता है — सबसे ज्यादा नुकसान। मेरा मतलब यहां आमतौर पर सबका एक घर होता है, एक जगह जिसमें आप अच्छी-पक्की दीवारों के बीच सोते हैं, रहते हैं। क्या आप सोच सकते हैं कितने लोग ऐसे हैं जो छोटे-छोटे टीन के मकानों में रहते हैं ? हर वक्त बस यही, वो टीन के मकान ? सोचिए जरा और अब तो गर्मियां आ गयी हैं। मेरा मतलब, कैलिफोर्निया में बाहर अब भी ठीक है, परेशानी नहीं है। लेकिन इंडिया जैसी जगहों में जैसे कि अफ्रीका मतलब कि उत्तरी भाग में गर्मियां हैं। हे भगवान, और बात यह है कि आप अलग कैसे रहते हैं ? कहां बनाएंगे दूरियों को ?

तो इसके बारे में मैंने सोचा ये सभी चीजें — फिर भी मैंने उस इंसान से क्या कहा अंत में, “जिनके दादाजी हैं…” जैसे कि "आप प्यार कर सकते हैं। आप उन्हें प्यार कर सकते हैं।” प्यार ही वह चीज है जो दीवार को नहीं देखता। जो दरवाजे नहीं देखता, जो समय नहीं देखता। वह परिस्थिति नहीं देखता, जो अमीरी-गरीबी नहीं देखता। जो अर्थव्यवस्था नहीं देखता। जो कुछ भी नहीं देखता। प्यार बस है और यह सबसे ताकतवर चीजों में से एक है आपका प्यार ? आपका प्यार ? हे भगवान, यह सबसे ताकतवर चीज है जो है मौजूद हमारे पास। यह किसी को मुंह पर चोट पहुंचाने से भी ज्यादा ताकतवर बात है। प्यार! प्यार ऐसी ही एक चीज है कि जब एक इंसान इसे महसूस करे वह भूलेंगे नहीं। अगर आप किसी को दर्द देते हैं वह शायद ठीक होने के बाद वह सबकुछ भूल जायें, बेहतर हो जायें। लेकिन प्यार उन्हें भूलने नहीं देगा जो आप उनके लिए अच्छा करते हैं, प्यार से करते हैं। वह आपके भीतर है आपको बस इस्तेमाल नहीं करना आता, आपको खोजना नहीं आता। क्यों ? आप हमेशा उन छोटे पोस्ट कार्ड्स के बारे में सोचते रहते हैं जो यह प्रिंटर छापता रहता है हमेशा। प्यार के बारे में क्या सोचा है ? आपका दृष्टिकोण उस अच्छे इंसान के बारे में जिसे आप प्यार देना चाहते हैं। यही तो होता है हर बार यह पिक्चर्स जितना मैं इनके बारे में सोचता हूं कि यह कितनी बुरी हैं ? हर एक बार यह लोगों को बदलती हैं, मेरी काबिलियत, वह संभावना कि मैं इन दो दीवारों के बीच में क्यों हूं यहां पर ? जो समय मेरे पास है.. और वह इस प्रिंटर की वजह से सोच में पड़ जाते हैं जो और ज्यादा और ज्यादा और ज्यादा प्रिंट करता रहता है और मैं उन प्रिंट्स को देख कर कहता हूं कि "यह कितना अच्छा है।"

मेरे लिए तो यह अच्छा सफर रहा है। मेरा मतलब मैं स्पेन से बाहर आया — और लॉकडाउन शुरू नहीं हुआ था उस वक्त। वहां बस बातें ही चल रही थी और मैं निकल आया और फिर ब्राजील आ गया मैं। और उस समय में जब मैं ब्राजील आया था दक्षिण अमेरिका जाना ठीक था, अर्जेंटीना जाना भी ठीक था, मोंटेवीडियो जाना सुरक्षित था। पर मैं वहां कुछ दिनों तक रहने वाला था, शायद तीन दिन रहता और फिर उन्होंने कहा "नहीं, नहीं कोई अर्जेंटीना नहीं आएगा। मैंने फैसला लिया कि "अब हम सम्मेलन नहीं करेंगे। क्योंकि हम लोगों को एक साथ नहीं बुलाना चाहते यह समय गलत होगा।" तो मैंने कहा "नहीं मैं यह नहीं करूंगा" और फिर जब मैं निकला ब्राजील से अगले ही दिन खबर आई कि वहां लॉकडाउन होने वाला है, वो भी बंद कर रहे हैं।

मैंने देखा कि मैं कहां हूं और लोग इतने गरीब हैं, दूर रहना ही काफी नहीं है उनके लिए। वह तो बस और इसमें बस — उन्हें तो दूर रहना भी नहीं आता। पर गरीब लोग यही तो करते हैं वह साथ में मिलते हैं, चाय की दुकान पर जाते हैं, वह कॉफी की दुकान पर जाते हैं, वह कहीं और जाते हैं, वह मिलते हैं और यहीं पर वो लोग आपस में मिलकर बातें करते हैं, खबरें सुनते हैं और यही तो सबकुछ होता है। क्योंकि उनमें से कई प्रवासी मजदूर हैं और वह अलग-अलग गांव से आए हैं। उनके परिवार गांव में ही हैं और वो सब शहरों में कुछ पैसे कमाने के लिए आते हैं।

मैंने सोचा कि हे भगवान, गरीब लोग तो इससे बर्बाद हो जाएंगे और यह इतना जरूरी है कि सभी देशों की सरकारें और हम सब लोग इंसान होने के नाते जितना हो पाए हम मदद करें और मेरे पास कुछ अच्छी खबर है इसके नाते। तो मैंने टीपीआरएफ और साथ ही आरवीके इंडिया से एक रिपोर्ट मांगी कि टीपीआरएफ और आरवीके क्या कर रहे हैं! मैं आपसे ये सभी बातें साझा करना चाहूंगा। पर यह कमाल होता है देखना कि हम क्या-क्या कर सकते हैं, चाहे छोटा ही सही और उससे कितना ज्यादा प्रभाव पड़ता है।

इसलिए मैं जानता हूं चाहे कितनी भी मुश्किल परिस्थितियां क्यों न आएं, हृदय से सबके लिए सोचना शुरू करें। क्योंकि वो भी उसी नाव में हैं; हम सब उसी नाव में हैं; हम सब उसी नाव में हैं। नाव बिल्कुल अलग नहीं है। कोई एक तरफ हो सकता है; कोई दूसरी तरफ हो सकता है; कोई बीच में भी हो सकता है; कोई इधर-उधर — पर नाव एक ही है। तो कोई कह सकता है "हाँ मैं रास्ते में हूं; वहां जल्द पहुंचूंगा।" और फिर कोई और कहेगा कि "हां मैं कहीं और हूं और थोड़ी देर हो सकती है।" और फिर कोई कहे कि "मैं तो इस तरफ हूं, पहले डॉक में जाऊंगा।" और फिर कोई कहे कि.... "मैं स्टारबोर्ड और फिर डॉक जा रहा हूं।" पर यह एक ही नाव है। हमें समझना होगा और यह एक अहम पल होगा अगर हम समझें कि इंसानियत का उद्देश्य क्या है — इन समय में भी इंसानियत का मतलब क्या है। यह स्पेनिश फ्लू जैसा नहीं होने देना है दोबारा। यह दुनिया जिसमें इतनी तकनीकी है, इतनी जानकारी मौजूद है भूल गये कि असल में क्या था ?

तो उम्मीद है कि आप ठीक रहेंगे। कृपया सुरक्षित रहें; अच्छे रहें; सबसे जरूरी है, यह जीवन। धन्यवाद आप सबका!

लॉकडाउन — सत्रहवां दिन 00:18:05 लॉकडाउन — सत्रहवां दिन Video Duration : 00:18:05 प्रेम रावत के साथ (हिंदी में अनुवादित)

प्रेम रावत:

हेलो नमस्कार सभी को! उम्मीद है आप ठीक हैं।

और जिस बारे में आज मैं बात करना चाहता हूं वह बहुत ही आसान है। क्योंकि यह शब्द है “सादगी” — कभी-कभी हम भूल जाते हैं कि सादगी होने का क्या मतलब है, इन स्थितियों में जब कोरोना वायरस में सब लोग अलग-अलग हैं, यह शब्द सही लग रहा है — क्योंकि वो लोग जो सच में इस शब्द के अर्थ को समझते हैं यानि “सादगी” वह इस स्थिति में ढल सकते हैं आसानी से। तो “सादगी” क्या है ? सादगी है यह स्वांस जो आप में आ रही है, बिना किसी मेहनत के जब आपको सोचना नहीं पड़ रहा — और यह आपको जीवन का तोहफा लाती है। कितना आसान है कि आप अपनी आंखों से देख सकते हैं यह नीला आसमान, यह बादल और आप संतुष्ट हो सकते हैं।

सादगी है अपने जीवन को देखना और समझना कि आपका अस्तित्व है, आप हैं — और यह कितना गहरा है, यह कितना सुंदर है; यह साधारण है। सादगी है, आपके हृदय में प्यार है और यह कि इस हृदय से आप प्यार कर सकते हैं और आपके पास प्यार का तोहफा है, सबके लिए — कोई भी जो प्यार को जगा सके आपके अंदर। आप प्यार दे सकते हैं उसे। अस्तित्व इतना आसान है। जीवन इतना आसान है, जीवित होना इतना आसान है और गहराई का तज़ुर्बा है इस सबके बीच में भी, यही तो है सादगी।

कल रात मैं सोने की कोशिश कर रहा था — और एक तूफान आया और हवा चल रही थी। आप बारिश को सुन सकते थे और हमें तूफान पसंद नहीं है; क्योंकि तूफान का दूसरा नाम कुछ अच्छा नहीं है। लेकिन तूफान क्या है ? हवा चलती है — अब हमें हवा पसंद है; पर बहुत ज्यादा नहीं। जब हवा हमारे बाल खराब करती है और हमें, और चीजों को, और इधर-उधर फेंक देती है। हम ड्राइव नहीं कर पाते हैं; हम उड़ान नहीं भर पाते हैं प्लेन में। चीजें कुछ खराब हो जाती हैं। बारिश आती है, हमें बारिश नहीं पसंद। हमें गीला होना पसंद नहीं। हमें गीला होना क्यों नहीं पसंद ? अब जब आप देखेंगे कि भाप बनती है — जब हम गीले होते हैं तो भाप बनती है और हमें ठंड लगती है। हमें ठंडा होना पसंद नहीं। हमारा तापमान बहुत जल्दी बदलता है। फिर हवा तेज हो सकती है, ठंड हो सकती है, बारिश आ सकती है, बर्फ पड़ सकती है। तूफान आ सकता है और फिर भी आप क्या कर सकते हैं जब एक तूफान आता है ?

इसलिए मैं यह सोच रहा था। तो मैं यहां हूं जैसे कि “अब मैं क्या करूं; कोई क्या करे जब तूफान आए ?” और एक तरह से तूफान आपके नियंत्रण में नहीं है, यह आपके नियंत्रण में नहीं हो सकता। लेकिन आप इस तूफान में क्या करेंगे ? आप कैसे प्रतिक्रिया देते हैं ? यह आपके नियंत्रण में है। आप इसके बारे में कुछ कर सकते हैं। यह छोटी-सी बात, यह छोटा-सा रास्ता जो आपके पास है विश्व में काफी फर्क़ ला सकता है। यह छोटा-सा सुनाई दे सकता है। यह कम जरूरी लग सकता है — पर यह सबसे जरूरी है। "मेरा तूफान पर नियंत्रण नहीं, लेकिन मैं कैसे…?"

और आप जानते हैं, मैं बिस्तर में पड़ा हुआ था — और बहुत आराम से था और हालांकि बाहर कुछ तूफान तो है, पर मैं ठीक से था, क्योंकि मैं तो वहीं था। बिल्कुल इसी तरह जब हमारे कानों के बीच में तूफान आता है एक जगह ढूंढने के लिए, हृदय में शांति प्राप्त करने के लिए और आराम से बैठें, शांति से और फिर अचानक से ही… हालांकि तूफान तो है आपने एक गहरी जगह ढूंढ ली है जो आपके भीतर इतनी सुंदर है। और उस जगह में, हृदय की उस जगह में आपको आराम मिल सकता है। आनंद ले सकते हैं आप और तूफान को सुन और देख सकते हैं। और जब तूफान चला जाएगा, सूरज फिर से आएगा। यह बात समझनी इतनी जरूरी है कि "जी हां, जीवन में तूफान आते हैं, स्थितियां बदलती हैं, पर उस स्थिति के सामने झुकना नहीं है।" हमें तब भी याद रखना होगा कि यह जानना कितना जरूरी है कि हम इस मौके को समझें कि यह मौका क्या है ? मेरा मतलब यह मौका क्या है ? सच में, क्या आप जानते हैं ? मैं सोच रहा था जैसे कि “क्या इसमें कुछ भी अच्छा है ?”

क्योंकि मेरे बहुत सारे प्लांस थे। मैंने इतनी जगहों पर जाना था, कई लोगों से मिलना था और मुझे इवेंट्स की याद आ रही थी, जहां पर सब दिखते हैं। मुझे लोगों की आंखों में देखना पसंद है और उनके सामने सीधे-सीधे बात करना पसंद है। मेरा मतलब, यह ठीक है — मतलब कि मेरे सामने दो काली चीजें हैं मैं इसे देख रहा हूं और इनमें कोई भी भाव बिल्कुल भी नहीं हैं। यह मेरी कही हुई कोई भी बात नहीं मानते। मेरी किसी बात को ना ही मना करते हैं, ना ही मेरी कोई बात मानते हैं। यह बस यहां पर हैं — यह दो काले गड्ढे जो कि कैमरा के लेंसेज हैं। मेरा मतलब, मैं कल्पना ही कर सकता हूं कि सब देख रहे हैं, सुन रहे हैं, कोई उनके लिविंग रूम में है, कोई कहीं और देख रहा है, कुछ, कुछ, कुछ ऐसा ही। लेकिन यह मौका क्या है — और मेरा मतलब यह बुरी स्थिति है दुनिया के नेता झूठ बोल रहे हैं। सभी नेता कोशिश में हैं और अचानक से ही कि उनकी कुर्सी किसी तरह बच जाए और अगर यह कहानी बुरी होती है, दुर्घटना होती है तो वह कह देंगे कि यह आने ही वाला तो था। वह पूरी दुनिया की तैयारी में मदद नहीं कर रहे हैं। और पूरी दुनिया के पास तैयारियों का वक्त तो था, काफी वक्त था तैयारियों का, लेकिन गलतियां हुई हैं। सच मानिए हम इसके बीच में हैं, लेकिन बाद में मुझे उम्मीद है कि लोग इससे कम से कम कुछ सीख ही पाएंगे।

क्योंकि मैं हाल ही में एक दिन एक डॉक्यूमेंट्री सुन रहा था। वह स्पेनिश फ्लू के बारे में थी — और वह काफी समय पहले हुआ था। उस स्पेनिश फ्लू और आज की बीमारी में इतनी सारी बातें मिलती-जुलती हैं क्या बताऊं आपको। और लोगों ने इज्जत नहीं की — दुनिया भर के नेताओं ने जो भी कहा उसकी बेइज़्ज़ती की गयी। जैसे कि कुछ नहीं सीखा हो और जो भी आप देखते हैं कि आज जो हो रहा है उसकी तुलना में स्पेनिश फ्लू के समय हुआ था, ऐसे ही मानिए कि एक भी बात नहीं सीखी गई है, कुछ नहीं सीखा हमने। और इतनी सारी सूचना तकनीकी के साथ भी और जो भी उपलब्ध है मेरा मतलब, यह इतनी बुरी स्थिति बना दी गई है, क्योंकि मेरे लिए एक मृत्यु, एक मृत्यु ही इस सबको होने से बचा सकती थी — बस एक ही काफी थी। तो इस बहुत ही बुरी, भयावह समय और स्थिति में क्या कुछ अच्छा है ? क्या कुछ ठीक है ?

मैं देखता हूं एक चीज अच्छी है कि आप खुद के करीब जा सकते हैं। अपने अस्तित्व को समझना। समझना कि आप असल में क्या हैं, आपके भीतर क्या है — इस जीवन की अहमियत को समझना और समझना और सराहना करना कि कानों के बीच का शोर कितना ताकतवर है। और जब मैं उस शोर की बात करता हूं, कई लोग कहते हैं कि "ओके, हां, हां, मुझे भी लगता है!” लेकिन अब ऐसा है कि शायद यह कई गुना बढ़ गया है, बहुत-बहुत-बहुत ज्यादा। यह शोर कितना ज्यादा हो गया है, यह आता है इतनी तेज और चुभता है दिन और रात, दिन और रात, दिन और रात और यह यही है! कितना ताकतवर है यह है ना ? पता है ना आपको ?

वो लोग हैं जो “अध्यात्म” में चले जाते हैं, वो अध्यात्म को समझने लगते हैं। कहते हैं जैसे कि "सब के लिए इस तरफ का सफर करना अच्छा है, हमें यह करना है, हमें वो करना है…" और लोग सबकुछ देख रहे हैं। लेकिन अब इस जगह आपके पास एक शोर है जो आपको परेशान कर रहा है और बस सोचिये इसके बारे में हर समय यह सुनाई देती जा रही है। और कभी-कभी आप नहीं सुनते क्योंकि आप भ्रमित हैं। लेकिन वह तब भी है और आप बस बैठकर यह शोर सुनते नहीं रहते, क्योंकि आप इससे भ्रमित हैं। आप इसकी वजह से भ्रमित हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि लोगों को भ्रमित होना पसंद है और उन्हें यह शोर सुनना ना पड़े, इससे वो बचने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन यह शोर चलता जाता है। पर अब इसकी वॉल्यूम, इसकी ध्वनि बहुत ज्यादा है, पर आपको अब असंभव करके दिखाना है जो कि है "आपको खुद के साथ जीना है।" मुझे पता है ऐसे कई लोग हैं जो ऐसा नहीं कर सकते, वो इसे झेल नहीं सकते — वो खुद को झेल नहीं सकते। क्या यह दुखद बात है ? हूँ, मुझे तो लगता है हां यह काफी दुखद है। अगर आप खुद के साथ नहीं रह सकते, अपने खुद के साथ, अगर आप खुद के साथ खुश नहीं हैं तो फिर किसके साथ आप खुश रह पाएंगे कभी भी ?

काफी समय पहले मुझे यकीन है यह काफी अलग रहा होगा कि आप हर रोज जाते हैं और पूरा-पूरा दिन आप बैरीज़ इकट्ठी करते हैं और आप इन्हें खोजते हैं या आपको जो भी मिल जाए वो। आप हंटर गैदरर हैं, हम यही लोग तो थे उस वक्त पुराने जमाने में और आप इकट्ठा करके खाते हैं। फिर शाम को आप सो जाते हैं, आप नींद लेते हैं और उम्मीद होती है कि रात को कोई जानवर आकर आपको खा ना जाए। पर आप नींद लेते हैं फिर सुबह उठते हैं और फिर वही सब करते हैं और मुझे यकीन है कि लोग इससे तंग आ चुके होंगे कि "काश हमारे पास कोई एक जगह होती जहां जाकर खाना मिल जाता।" उस समय से हमने एक प्रणाली विकसित की है और जो प्रणाली हमने विकसित किया है यह बात कि आपको ऐसा करने में पूरा दिन लगाना पड़ता है यह बदला नहीं है। क्योंकि अब आप बैरीज़ या खाना इकट्ठा करने नहीं जाते। अब आप काम करते हैं ताकि आप खाना खरीद सकें, यही तो है बदलाव जो हम लेकर आए हैं। पहले हम लोग तो बस किसी को पैसे नहीं देते थे, हम पैसे कमाने की कोशिश में नहीं थे। हमें पैसे की जरूरत नहीं थी, क्योंकि गुफाएं मुफ्त थीं और हमें बस क्या करना था कि हमें बाहर जाना था, पूरा-पूरा दिन और जो भी मिले फल मिले, बैरी मिले वापस लाना था और उसे खाना था — और बस इतना ही था।

एक बड़ी समस्या जो मैंने सोची उन दिनों में रही होगी कि "आपको रोज खाना मिलेगा या नहीं ?" तो कुछ दिन ऐसे भी थे जब खाना नहीं मिलता था और आप भूखे ही रहते थे। एक तरह से अब हमने एक समाज बनाया है जहां हम व्रत रखकर खुश होते हैं। तो यह वही बात है — लेकिन तब यह अपने आप होता था क्योंकि आपको कुछ खाना नहीं मिलता था और आपको चलते रहना था और अब आप जान-बूझकर यह करते हैं। आप कहते हैं ताकि, जानते हैं, जिस भी वजह से। और आप यह रहे, आप पूरा दिन काम करते हैं पुराने दिनों की तरह आप सुबह से उठकर बाहर जाते हैं, काम करते हैं, पैसा कमाते हैं ताकि आप खाना खरीद सकें — आप खाना खरीद सकें इसलिए। इस प्रणाली में सुनिश्चित करते हैं कि खाना हमेशा हमें मिलता ही रहे। हमने कुछ ज्यादा ही खाना बना लिया है मतलब कि, कितनी ज्यादा मात्रा में खाना उगाते हैं हम कि वह बर्बाद जाता है अब। हम खा नहीं पाते उसे और जब आप देखें इतने जानवर जिन्हें मारने के लिए ही पाला जाता है यह बात तो समझ से बिल्कुल बाहर है।

जब आप इस सब को देखते हैं हमने एक प्रणाली बनाई है, लेकिन अब समस्या यह है कि हम इससे जूझ नहीं पा रहे हैं। यह अब भी समस्या हमारे सामने ही मौजूद है। हमारे पास ज्यादा खाना है, हमें खाना ढूंढना नहीं है। लेकिन अब भी बाकी काम तो हैं ही, जिसका काम है “पैसा कमाना।” आपको पैसा बनाना है, पैसा बनाइए और उसमें पूरा दिन लगता है और फिर उस पैसे से हम खाना खरीदते हैं। देखिए, मैं वह नहीं जो फैसला दे कि यह सब अच्छा है या नहीं है ? आप इसका फैसला ले सकते हैं। पर मुझे यह किसी तरह आसान-सा नहीं लगता है। मैं बात कर रहा हूं सादगी की, मैं बात कर रहा हूं आपके भीतर के सीधे-साधे अस्तित्व के नियम की, जो बेहद आसान-सा है, बहुत आसान। वो जरूरतें जो आपकी हैं — चाहतें नहीं जरूरतें, जो आपकी हैं। हवा, जल — एक बड़ी-सी प्रणाली, जिसे खारे पानी को लेकर मीठा पानी बनाया जाता है, साफ पानी। उस पानी को उपलब्ध करवाना, सभी नदियों की प्रणाली, सभी झरने, दुनिया की सभी प्रणालियां। हवा… यहां है; वहां है, सब जगह है।

सादा, सच्चा, प्यारा, यह है जीवन। आसान-सी बातें, आसान, आसान, आसान चीजें स्पष्टता के लिए, समझ के लिए, आगे बढ़ने के लिए, खुश रहने के लिए, हर रोज का आनंद लेने के लिए। और एक दिन तो सब खत्म होना है, सर्कस उठ जाएगा, सब खत्म होगा। लेकिन उस दिन तक हर रोज आनंद, आनंद, आनंद, यहां से नहीं — लेकिन इधर से सबसे अच्छा, सबसे सुन्दर तरीका।

तो आप ठीक रहें; सुरक्षित रहें और आपसे फिर बात होगी। धन्यवाद!

लॉकडाउन — सोलहवां दिन 00:16:17 लॉकडाउन — सोलहवां दिन Video Duration : 00:16:17 प्रेम रावत के साथ (हिंदी में अनुवादित)

प्रेम रावत:

आप सबको नमस्कार,

उम्मीद है आपकी सेहत बिल्कुल ठीक है। वीकेंड आ गया है और इसलिए हम कुछ सवालों के जवाब देंगे। “मैं किस तरह से सुंदरता और शांति ढूंढ सकता हूं जब दुनिया में इतना अंधकार फैला हुआ है और मुझमें भी ? मुझे अपने भीतर के जीवन से जुड़ने का तरीका नहीं मिल रहा है। मुझे पता है वह है जैसे आपके साथ शांति मिली है, मैं प्यार के माध्यम से बुरे विचारों और दर्द को मिटाना चाहता हूं ?”

यह बहुत ही आसान है कि यहां पर यह अजीब है कि मैंने अभी-अभी ऐसे ही सवाल का जवाब दिया ही था, बस मिलता हुआ। तो बात यह है कि आप समझें कि यह अंधकार यहां पर है लेकिन यहां पर रोशनी भी है और यह आप पर निर्भर करता है कि आप क्या चुनते हैं। पसंद आपकी होगी — आप अंधकार चुन सकते हैं और अंधकार आपको मिल जाएगा। और आप रोशनी चुन सकते हैं और रोशनी आपको मिलेगी, यह इतना ही आसान है बस। यह आसान है ना ?

अब आप सोचिए! जी हां, जब हम एक बुरी परिस्थिति में होते हैं कई बार तो हमें पता भी नहीं चलता कि हम उस स्थिति में जा रहे हैं, लेकिन हम धीरे-धीरे और यकीनन उस अंधकार की ओर जा रहे होते हैं। सचेत जीवन खो जाता है। हम सचेत होकर जीना नहीं चाहते हैं उसमें परेशानी होती है, वह मुश्किल भरा है तो हम क्या करना शुरू करते हैं ? सचेत जीयें! हम ध्यान नहीं देते — “यहां क्या होता है; वहां क्या होता है; यह क्या है; वह गलत; यह सही” और बस हम शुरू हो जाते हैं। हम यह कदम बनाते हैं, हम यह कदम चलते हैं और अंधकार की ओर जाते रहते हैं। हम अंधकार की ओर जा रहे हैं, हम यह बात ध्यान नहीं देते, सोचते नहीं कि हम खो रहे हैं और खोना एकदम से नहीं होता — यह एकदम से, अचानक से नहीं होता है। आपको लगता है कि आप सही जगह पर जा रहे हैं, लेकिन अचानक से ही ऐसा होता है कि “नहीं यह तो वह जगह नहीं, जहां पर मैं होना चाहता था।” और फिर अचानक आपको समझ में आता है और यह समझ में आना बहुत ज्यादा परेशान करने वाली चीज है कि “भाई क्या हुआ ? मैं कहां था ?” यह गलत सवाल है “मैं कैसे खो गया ?” पर सवाल होना चाहिए “मैं वापस कैसे जाऊं ?” यह नहीं कि “मैं कैसे खो गया!”

तो हम अंधकार की ओर जाते हैं। जीवन अचेतना में जीते हैं और यह आप इसे कह भी सकते हैं कि यह तो होने ही वाला है। लेकिन तब जीवन सचेत होकर जीने का भी विकल्प है आपके पास। मेरी भी एक पसंद है उन बातों को समझना, जो रोशनी के स्रोत हैं — वह मुझमें ही हैं। समझ के स्रोत मुझमें ही हैं। स्पष्टता के स्रोत — मेरे ही भीतर हैं और मुझे बाहर नहीं भटकना है, उसे देखते हुए और सोचना कि यह सब कहां पर है और बहुत सारे लोग वो कहते हैं कि “अरे! वह कितना अच्छा समय था लेकिन वह कहां चला गया ?”

देखिए! वह कहीं नहीं गया वह आप में ही है, हमेशा वह आप में ही है, हमेशा आप में ही था और हमेशा आप में ही रहेगा, आखिरी स्वांस तक। जी हां! क्या होता है हमारी स्थिति जो है — चाहे स्थिति जो भी हो ज्यादा भावुक कर देती है, पकड़ लेती है हमें, हरा देती है हमको, हमारी पसंद पर वह काबू पा लेती है। हमारी पसंद, हमारी समझ; हमारी स्पष्टता और उसे करने ही देते हैं हम लोग। क्योंकि तब ही इन चीजों पर काबू मिलता है उसे। और आपको इससे बिल्कुल विपरीत करना है, इससे उल्टा। आपको अपनी स्पष्टता को पकड़े रहना है। आपको उम्मीद को नहीं छोड़ना, आपको खुशी को नहीं छोड़ना, आपको समझ को नहीं छोड़ना, आपको अपनी शांति को नहीं छोड़ना और फिर एक तूफान की तरह तूफान चला जाएगा। सूरज फिर से उगेगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा। तो यही बात आपको समझनी है कि ये ऐसे ही काम करता है और आप में वह सुंदरता है और वह सुंदरता हमेशा आप में ही रहेगी।

यह है एक और सवाल! “कई लोगों के सामने आर्थिक और नौकरी की परेशानी है। क्या आप हिम्मत की कुछ बातें उनसे कह सकते हैं जो लोग ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं ?”

दोबारा, वही बात जो भी बाहर हो आपको आगे बढ़ने की ताकत रखनी ही होगी। वह हिम्मत ताकि आप आगे बढ़ें। अब दोबारा मैं आपको यह उदाहरण बताऊंगा जो मैं कई बार बताता हूं — जब आप अपनी मां के गर्भ से बाहर आए, जब आप पैदा हुए आपको जो करना था वह असंभव था। उस वक्त, जीवन के उस पल में आप सबसे कमजोर थे। हे भगवान! आप चल नहीं सकते थे, बात नहीं कर सकते थे, आप कुछ कह नहीं सकते थे, कुछ उठा नहीं सकते थे, आप बेहद कमजोर थे और सबकुछ, सबकुछ सच में आपके खिलाफ ही था। आपको तो उस समय में दुनिया बदलनी पड़ी थी असल में। मेरा मतलब, जी हां, वह सब जिसमें आप उस समय तक थे आपके लिए सबकुछ मां से ही मिल रहा था और अब वह सब चला गया था, बिल्कुल अलग। आपको स्वतंत्र बनना था जितनी ताकत आपको अपनी मां के गर्भ से बाहर निकलने में लगानी पड़ी होगी उतने में एक बड़ा रॉकेट धरती के वातावरण से बाहर निकल जाता, यह थी स्थिति। सोचिए! यह थी स्थिति।

आप अपनी मां के गर्भ में थे, पानी में डूबे हुए थे और अब आप बाहर आने वाले थे इस दुनिया में, जहां आपको हवा से सांस लेनी थी और मैं तो शारीरिक स्थिति की बात कर रहा हूं। यह बिल्कुल ही अलग होने वाली थी, बिल्कुल, बिल्कुल, बिल्कुल अलग। तो फिर आपने क्या किया ? आपने स्थिति की गंभीरता को देखा और फिर कहा कि “जी नहीं!” तो आप तो पैदा ही नहीं होते — ऐसे तो आप पैदा ही नहीं होते। तो आपने उस चुनौती का सामना किया। वह इच्छा आप में थी। जी हां, और हां बिल्कुल आपने उसे चुनौती की तरह नहीं देखा आपको बस वह सामने से मिल गई थी और बस यही था। तो क्या आपको लगता है ये जितनी भी चुनौतियां हैं जिनके बारे में आप आज सोच रहे हैं यह उस चुनौती से बड़े थे, जो आप पार करके आए हैं। मैं सोच भी नहीं सकता ऐसा कि ये उस बात से बड़े हो सकते हैं, किसी भी तरह।

मैं बात करता हूं बदलने की — अनचेंज। लोगों को बदलाव शब्द पसंद नहीं “मैं नहीं बदलना चाहता।” लोग खुद से कहते हैं “मुझे नहीं बदलना!” तो मैंने सोचा किसी तरह, किसी और तरह से बताया जाए। तो इसका मतलब जीवन में एक समय पर आप बहुत मजबूत थे। आप बहुत ज्यादा ताकतवर थे; आप स्पष्ट थे कि आपके उद्देश्य क्या हैं! आप उन्हें अच्छे से जानते थे और आप में कोई झिझक नहीं थी उन्हें पूरा करने में। तो यह बदलना, अनचेंज — बदलाव तो हुआ है और अब चीजें काफी बदल रही हैं तो शायद एक अलग बदलाव चाहिए हमें ताकि वह ताकत वापस मिल पाए। वह स्पष्टता वापस चाहिए; वह समझ वापस चाहिए — कमजोरी नहीं, उदासी नहीं, निराशा नहीं, ये बहस की बातें नहीं कि “ओह अब मेरे साथ क्या होगा ?” जो चुनौती आए उसे झूझिये और मेरी मानिए यह होगा! कई लोगों के लिए बस एक लंबा, लंबा सफर जो अभी शुरू ही हुआ है — अलग रहना और बाकी सब इसका एक भाग ही हैं। इसके बाद हमें देखना है कि क्या होता है, क्योंकि मैं बता सकता हूं सबकुछ ठीक नहीं लग रहा है।

कुछ नेता जो आज हमारे पास हैं दुनिया में वह अच्छे नहीं हैं, मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। जी हां, पर वह अच्छे नेता नहीं हैं। वह बिल्कुल, आप उन्हें देख सकते हैं कुछ भी बोलते हुए। वह कुछ भी कहते हैं, जैसे काम के बीच में लंच करने गए हों और वापस आए ही ना हों। तो आप समझ सकते हैं कि वह कैसे हैं! उनको कुछ नहीं पता कि क्या चल रहा है! उनको लगता है कि मृत्यु और ये सब बातें सिर्फ एक संख्या है, यह ग्राफ है। पर मेरे लिए एक मृत्यु भी — मतलब एक नुकसान भी यह प्राकृतिक नहीं था, यह काफी था। यह बुरा था और हम इसके बारे में कुछ कर सकते थे। देखिए हमें मदद कहना नहीं आता। हम मदद कहना भूल गए है; हम मदद भूल गए हैं। हम यह कहना भूल गए हैं कि “मैं आपकी मदद कर दूं!” हम भूल गए हैं इंसानियत — इंसानियत अब खत्म हो रही है और जबतक इंसानियत कम होती रहेगी हम इंसानों के पास क्या बचेगा ? कुछ नहीं! हम किस पर निर्भर करेंगे ? कुछ नहीं! हम किसी की ओर देख भी पाएंगे उम्मीद से ? जी नहीं! तो यह एक बहुत-बहुत ही लंबा सफर होने वाला है।

तो यह है एक और जरूरी सवाल मेरे हिसाब से। “डियर प्रेम रावत! मुझे आपको सुबह-सुबह सुनना अच्छा लगता है। मेरी 95 वर्ष की दादी वृद्ध आश्रम में हैं और वहां जाना मना है। मुझे डर है उन्हें कुछ हो ना जाए अकेले में ही और मौका ना मिले मुझे उनको अलविदा कहने का।” (अच्छा है, अच्छा ये दादा की बात कर रहे हैं माफ कीजिएगा।) “अलविदा कहने का कोई मौका नहीं है। अंतिम-संस्कार करने का भी मौका नहीं है। मुझे पता है उनका जीवन अच्छा था, लेकिन इस तरह से जीवन अंत हो यह कौन चाहता है। मैं उनको क्या लिखूं ताकि उनकी मदद हो पाए इस समय ?”

सिर्फ एक बात लिखिये कि आप प्यार करते हैं उनसे। आप यही कह सकते हैं “मैं आपसे प्यार करता हूं। आप अच्छी रहिए; सुरक्षित रहिए। और मैं आपसे प्यार करता हूं और मैं आपको हमेशा प्यार करता रहूंगा। आप मेरी यादों में हैं और आप मेरी यादों में हमेशा ही रहेंगी; मेरे हृदय में और मैं आपसे प्यार करता हूं।” और आप क्या कह सकते हैं ? सच मानिए! क्या कह सकते हैं! आपको स्थिति स्वीकारनी होगी। कई बार जो रास्ता होता है वह वैसा नहीं होता, जैसा हमने सोचा होता है। सच मानिए, मेरी बात! आप इस बारे में कुछ नहीं कर सकते हैं। अफसोस की बात है। यह बुरा है। वह बीमारी को बढ़ने आप नहीं देना चाहते हैं इसलिए अलग किया हुआ है सबको। आप वहां नहीं जा सकते हैं। मुझे पता है आप कुछ सोच के ही बैठे हुए थे, लेकिन आपको वह मन की तस्वीर अब अलग रखनी होगी और एक सच्चाई को आपको देखना होगा। और सच्चाई भी सुंदर ही है कि आप प्यार करते हैं और वह भी आपसे प्यार करते हैं — यह सच बात है!

कोरोना वायरस हो या ना हो आप प्यार करते हैं उनसे और वह आपसे। कोई दीवार, कोई दूरी नहीं है। वो दो दीवारें भी प्यार को अलग नहीं कर सकती हैं, यही तो है प्यार! प्यार दीवार पार कर सकता है; प्यार लंबी दूरी तय कर सकता है; प्यार समुद्र की गहराई में पहुंच सकता है; प्यार ऊपर आकाश में स्वर्ग तक पहुंच सकता है। प्यार है और यही प्यार को खास बनाता है। इसकी कोई सीमा नहीं है। यह कभी नहीं खत्म होगा। जबतक आप जीवित हैं आप उन्हें रोज प्यार करते रहेंगे और वह आपको प्यार करते रहेंगे, यह कितनी कमाल की बात है, कितना अच्छा है ये। जो स्थिति है उसे अपनाइए और सबसे जरूरी बात उस प्यार को मानिए जो आप में है अपने प्रियजनों के लिए। ऐसा ही होना चाहिए। अपने मन में कोई ख्याली तस्वीर मत रहने दीजिए, बस उन्हें सच्चाई बनाइए। सच्चाई को देखिए जो है और शायद आपको उससे मदद मिलेगी।

तो आप सबका धन्यवाद! आज के लिए इतना ही समय है हमारे पास। हम कल कुछ और सवालों के साथ लौटेंगे। सुरक्षित रहें और रहिए खुश!

लॉकडाउन 58 00:25:27 लॉकडाउन 58 Video Duration : 00:25:27 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (5 जून, 2020)

प्रेम रावत जी:

हमारे सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज फिर मौका मिला है आपलोगों के साथ बात करने का। मेरे को जो खबर मिली है उसके अनुसार बहुत ही शीघ्र हिंदुस्तान में जो लॉकडाउन है वह इज अप होगा, थोड़ी-सी उसमें स्वतंत्रता मिलेगी। और धीरे-धीरे फिर इसको और बढ़ाया जाएगा। तो यह तो एक किस्म से खुशखबरी भी है, परंतु यह एक गंभीर बात भी है और गंभीर इसलिए है, क्योंकि अब कन्टैमनैशन के जो चांसेज हैं, जो संभावना है कन्टैमनैशन होने की, वह और भी बढ़ गई है। और जैसे-जैसे लोग आपस में मिलेंगे, रेस्टोरेंट्स में जाएंगे, मंदिरों में जाएंगे, जहां भी जाएंगे तो यह कन्टैमनैशन जो है, यह जो महामारी की बीमारी है यह और फैलेगी। क्योंकि लोग जो नहीं जानते हैं कि वह इसको अपने साथ ले जा रहे हैं इन जगहों में, तो उनके साथ यह मतलब — कोई यह जानबूझकर नहीं करेगा, परंतु गलती से यह सबकुछ संभव है।

तो हम इसके बारे में क्या करें ? एक तो वही बात आती है कि — एक तो जितना संभव हो सके उतना मास्क पहनिये और वही दो बातें — "एक किसी को दो मत और एक किसी से लो मत!" तो वही अगर थोड़ा-सा आप ध्यान रखें उसमें तो ठीक है, सबकुछ ठीक रहेगा। परन्तु सबसे बड़ी बात है कि जो यह है, जो मन है इसको कैसे समझायें ? क्योंकि इसमें तो सारी वहीं फीलिंग्स आती हैं। उसमें डर भी है, उसमें ये सारी चीजें हैं कि "अब मेरा क्या होगा, यह नहीं होना चाहिए, यह नहीं होना चाहिए।" और कहीं किसी ने छींक भी दिया तो गड़बड़ हो जायेगी। क्योंकि फिर वही विचार आने लगेंगे।

अभी मैं पढ़ रहा था कुछ लोगों के प्रश्न, तो उसमें कई लोग हैं कि "भाई! हम जब बैठते हैं तो हमारे विचार इधर-उधर भागते हैं।" कभी इस तरफ भागता है, कभी उस तरफ भागता है। अब सबसे बड़ी बात यह है कि यह जो मन की प्रकृति है इधर-उधर भागने की, यह तो तब भी है जब सबकुछ यह महामारी नहीं थी। कबीर दास जी इसके बारे में कहते हैं। उसके बारे में मैंने काफी कहा भी है, तो ये सारे झंझट तो हमेशा मन के चलते ही रहते हैं। बात यह है कि यह जो रेलगाड़ी है, यह जो गाड़ी है इसकी एक संभावना यह है कि यह ऐसे रास्ते से गुजरेगी जिसमें गड्ढे बहुत हैं, ऊपर-नीचे होगा और जो भी उस गाड़ी में बैठा हुआ है उसको अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि सारी चीजें हिलेंगी। बात यह है कि यह जो मन की गाड़ी है क्या आपको इसमें बैठना ही है, क्या यह जरूरी है या आपको इसमें नहीं बैठना है ? खड़े हैं — बगल में खड़े हैं गाड़ी आ रही है, जा रही है, ठीक है कोई बात नहीं।

यह प्रश्न — आपको इसका उत्तर देना है कि आप अपने जीवन में क्या चाहते हैं ? क्योंकि दुनिया है और दुनिया लगी हुई है "कोई कुछ कह रहा है; कोई कुछ कह रहा है; कोई कुछ कह रहा है; कोई कुछ कह रहा है" और लोगों को दिक्कत हो रही है। कुछ लोगों की बात सुन रहे हैं लोग — "यह उसने कैसे कह दिया, यह उसने कैसे कह दिया, यह उसने कैसे कह दिया।" भाई! कह दिया उसका मुंह है। अब जैसे आप बोलते हैं, वैसे उसने बोल दिया। इसका यह मतलब थोड़े ही है कि उसने वह सोचा या विचारा कि "मेरे को क्या कहना चाहिए!" कई लोग हैं जो मुँह खोलते हैं और कुछ भी बक देते हैं। परन्तु क्या यही मनुष्य की सबसे अच्छी चीजें हैं मनुष्य के अंदर ? जो कुछ भी बढ़ियापन है मनुष्य का वह क्या है ? खो जाना चीजों में या अपने जीवन के अंदर उस चीज के बारे में चिंता करना जैसे कहा है कि —

“चिंता तो सतनाम की और न चितवे दास” — उसके बारे में मैं बहुत सोचता हूँ, क्योंकि हर एक चीज की चिंता होती है — "कभी यह करना है, कभी यह करना है, कभी यह करना है, कभी यह करना है।" परंतु चिंता किस चीज की होनी चाहिए ? चिंता होनी चाहिए कि यह मेरा जो शरीर है जबतक मैं यहां जीवित हूं मेरा समय बेकार न जाए। जो कुछ भी मेरे को करना है — पहले तो यह मालूम करना चाहिए अपनी जिंदगी के अंदर कि करना क्या है! कौन-सी ऐसी चीज है जो करनी चाहिए! दुनिया के लोग बताते हैं कि "यह करना चाहिए; वह करना चाहिए; ऐसा होना चाहिए; ऐसा होना चाहिए" उसके पीछे हम लग जाते हैं। परन्तु इसके लिए आपको मनुष्य शरीर नहीं मिला है। मनुष्य शरीर किसी और चीज के लिए मिला है। क्या ? "साधन धाम मोक्ष कर द्वारा" — यह साधना का धाम है, मोक्ष का दरवाजा है — इसके लिए आपको यह शरीर मिला है। इसके लिए नहीं कि हम यह कर लेंगे, हम ये चला लेंगे!" हवाई जहाज मैं भी चलाता हूं पर मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है कि हवाई जहाज चलाने के लिए मेरे को यह मनुष्य शरीर नहीं मिला है।

अभी कुछ ही दिन पहले 40 साल हो गए मेरे को हवाई जहाज उड़ाते हुए। मेरे को तो याद भी नहीं कि कब मैंने चालू किया। किसी ने कहा कि "आपको बहुत-बहुत मुबारक हो 40 साल हो गए!" मैंने कहा, "बड़ी अच्छी बात है।" परन्तु जो सारी चीजें मैं करता हूँ, "कभी ये हो रहा है, कभी ये हो रहा है, कभी ये हो रहा है" — यह मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है कि इसलिए मेरे को यह मनुष्य शरीर नहीं मिला है। करता हूं मैं ये सारी चीजें जो करनी हैं, जो मेरी जिम्मेवारियां हैं उनको मैं पूरी करता हूं, परंतु मेरे को अच्छी तरीके से यह ज्ञान है कि मेरे को मनुष्य शरीर इसलिए मिला है कि मैं वह साधना करूं और अपने समय को, अपने शरीर को यह जो मेरे को मौका मिला है इसको मैं सफल करूं। कई लोग हैं जो यह कहते हैं इसका क्या मतलब हुआ जी ? इसका मतलब हमको ये नहीं करना चाहिए, हमको वो नहीं करना चाहिए।

नहीं! बात यह नहीं है कि आपको ये नहीं करना चाहिए, वो नहीं करना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप अपनी सारी जिम्मेवारियों को छोड़ दीजिए। अगर आपके बच्चे हैं आपकी वो जिम्मेवारियां हैं। परन्तु इन जिम्मेवारियों के होते हुए भी उस जिम्मेवारी को भी समझिये जो जिम्मेवारी है। जिसके लिए आपको यह मनुष्य शरीर मिला है। यह ज्यादा दिन के लिए नहीं है। ये सारी चीजें जो हो रही हैं इससे आप विचलित नहीं होइए, क्योंकि यह सचमुच में मनुष्य को बेचैन बनाने वाली चीजें हैं। जिससे मनुष्य बेचैन होता है, चैन नहीं है। और आपको चाहिए चैन और वह चैन कहां है ? वह आपके अंदर है। जो शक्तियां आपके पास हैं आप उनको भूल जाते हैं। भ्रमित होने का सबसे बड़ा कारण मनुष्य का यही है कि जो वह जानता है उसी चीज को वह भूल जाता है। उसी चीज को वह भूल जाता है। जब भूल जाता है तो उसको यह समझ में नहीं आता अब मैं क्या करूं ? किस तरफ जाऊं ? मेरे साथ क्या होगा ? तो सचमुच में एक-एक कदम — अगर हम अपनी जिंदगी के अंदर एक-एक कदम देखकर चलें। यह नहीं है कि पीछे से हमको लोग धक्का मार रहे हैं भेड़ की तरह हम भी चल रहे हैं। परंतु सचेत होकर के यह जानकर के कि "यह मेरी जिंदगी है, यह मुझे मिली है, एक-एक कदम अगर हम सोचकर, समझकर के आगे रखेंगे तो हमको इस जीवन के अंदर जीने में जिम्मेवारियों के होते हुए भी, समस्याओं के होते हुए भी हमको आनंद मिलेगा।

कैसा आनंद ? वैसा आनंद जब मनुष्य समझता है कि यह जो आवाज आ रही है जिससे कि मैं विचलित हो रहा हूं। ये जो समस्याएं आ रही हैं जिससे मैं विचलित हो रहा हूं, मेरे को विचलित होने की जरूरत नहीं है अर्थात ये समस्याएं भी चली जाएंगी। फिर नई वाली आएंगी, पुरानी वाली जाएंगी, फिर नई वाली आएंगी। आप अपने जीवन को देख सकते हैं, जो समस्याएं आपके पास तब थीं जब आप 5 साल के, 6 साल के, 7 साल के थे, अब वह समस्याएं नहीं हैं। अब दूसरी तरह की समस्याएं हैं और ये भी चली जायेंगी। फिर नयी समस्याएं आएंगी, वो भी चली जायेंगी। फिर दूसरी किस्म की समस्याएं आएगीं, वो भी चली जाएंगी। अर्थात आप यह जानकर के चलिए कि इन समस्याओं का आना-जाना लगा रहेगा। आपको विचलित होने की जरूरत नहीं है; आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। और एक चीज का और आना-जाना रहेगा। क्या है वो चीज ? और जबतक उस चीज का आना-जाना है — देखिये समस्याएं आयीं और चली गयीं; आयीं और चली गयीं। कुछ समस्याओं पर आपने ध्यान दिया, कुछ समस्याओं के कारण आप बहुत परेशान हुए, समय आया वह भी चली गयीं।

परन्तु एक है चीज, जो आपके अंदर आ रही है और जा रही है। जबतक वह आ रही है और जा रही है और आ रही है और जा रही है और आ रही है और जा रही है तबतक सबकुछ ठीक है — सबकुछ ठीक है अर्थात सबकुछ ठीक है। परन्तु जिस दिन वह नहीं आएगी उस दिन सबसे बड़ी समस्या आपके पास होगी, परंतु उस समस्या का कोई भी हल आपके पास नहीं होगा। और वह ऐसी समस्या होगी कि आपको खुद ही वह अपने साथ ले जाएगी, जो कहते हैं कि मनुष्य चला जायेगा। बात जाने की नहीं है, बात उस समस्याओं की नहीं है, बात है उस स्वांस को स्वीकार करने की, उस चीज को समझने की जो आपके अंदर है। आप जानें उस चीज को, आप पहचानें उस चीज को कि वह चीज क्या है ? और जबतक आपका ध्यान उसमें है, तबतक आपके जीवन में आनंद है। जब ध्यान उस चीज से हट जाएगा तो फिर वह मन जो है सब जगह भ्रमण करने लगता है — कभी कहीं जाता है, कभी कहीं जाता है, कभी कहीं जाता है, कभी कहीं जाता है।

समझने की बात है कि जिन दुखों से आप भाग रहे हैं, ये दुःख भी जा रहे हैं — आ रहे हैं, जा रहे हैं, आ रहे हैं, जा रहे हैं, आ रहे हैं, जा रहे हैं। जैसे नदी का पानी आता है, जाता है, बहता है। समुद्र की लहरें आती हैं, जाती हैं, आती हैं, जाती हैं। हवा के झोंके में पेड़ झूलते हैं कभी इधर जाते हैं, कभी उधर जाते हैं, कभी इधर जाते हैं, कभी उधर जाते हैं। ये सबकुछ होता रहता है। परंतु आपकी लहर, सबसे बड़ी लहर इस स्वांस की है, जो आपके अंदर आ रहा है, जा रहा है। मनुष्य जब इस संसार को देखता है तो बहुत भ्रमित होता है। कितने ही प्रश्न मेरे पास हैं — "अरे यह गलत हो रहा है, यह ठीक नहीं हो रहा है, ये ठीक नहीं हो रहा है मेरे साथ, ये ठीक नहीं हो रहा है, मेरे साथ यह जुर्म हो रहा है, और लोग कर रहे हैं।" बात जुर्म की नहीं है, बात और क्या कर रहे हैं इससे आपका क्या मतलब है ? सबसे बड़ी बात है आप क्या कर रहे हैं!

मैं एक उदाहरण देता हूं आपको। कई लोग हैं जो कहते हैं, "जी उसने ये कर दिया, उसने वो कर दिया, उसने वो कर दिया, उसने वो कर दिया।" ठीक है! मैं उदाहरण देता हूं कि आपके घर के पास एक गली है। हैं जी? और उस गली में दो मंजिल के मकान हैं। ऊपर एक कोई रहता है और 9 बजे, ठीक 9 बजे, ठीक 9 बजे, एक बरामदा है ऊपर वाले मकान में, बरामदे के पास वह आता है — बरामदे पर वह आता है और जो सब्जियों के छिलके हैं, जो कुछ भी कूड़ा-करकट घर में है वह टोकरी में रहता है उसके और ठीक 9 बजे वह आकर के अपनी बालकनी से, अपनी छज्जे से और उस कटोरी को, उस टोकरी को खाली करता है और जो गली है नीचे वहां फेंक देता है। अब कोई नीचे आ रहा है, जा रहा है तो सारा कूड़ा-करकट उसके ऊपर पड़ता है और वह मैला हो जाता है। आपको भी उसी गली से गुजरना है, पर आपको मालूम है कि 9 बजे, ठीक 9 बजे वह यह गड़बड़ काम करता है, तो आप क्या करेंगे ?

मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है कई लोग वहाँ बैठे हुए होंगें अपने लिविंग रूम में और कह रहे होंगे "जी अब उसको जाकर के घूसा मारेंगे!" उससे कहेंगे कि "ऐसा मत कर!" पुलिस के बारे में — पुलिस के पास जाएंगे एफ आई आर लिखवाएंगें। अखबार में हम इख़्तियार देंगें कि "यह ऐसा-ऐसा करता है।" फेसबुक में डालेंगे, टि्वटर में डालेंगे, व्हाट्सएप में डालेंगे, यह करेंगे, वह करेंगे, ऐसा कर देंगे, उसकी यह शिकायत कर देंगे, उसके साथ यह कर देंगे। परन्तु अगर आपको मालूम है कि वह ठीक 9 बजे यह करता है — 1 मिनट आगे नहीं, 1 मिनट पीछे नहीं, 9 बजे, ठीक 9 बजे वह करता है तो आप वहां से 8:55 मिनट पर भी तो चल सकते हैं! 5 मिनट ज्यादा, ज्यादा से ज्यादा 5 मिनट पर। यह सबकुछ करने की जरूरत है ? एफ आई आर में लिख देंगे, ये कर देंगें, फेसबुक में लिख देंगें, उसके साथ ये कर देंगें, उसकी हड़ताल कर देंगें, ये कर देंगें, वो कर देंगें, धरना देंगे उसके घर के आगे या अपना थोड़ा-सा टाइम 1 मिनट भी थोड़ा-सा आगे कर लीजिये — 1 मिनट, 1 मिनट। अगर वह ठीक 9 बजे आता है तो 1 मिनट ऐसा टाइमिंग कर लीजिये कि उसके घर के आगे से आप 1 मिनट पहले, 9 बजने से 1 मिनट पहले गुजर जाएं — 1 मिनट, 1 मिनट। अगर वह इतना ही पक्का है अपने टाइम का तो 30 सेकंड भी बहुत हैं।

पर ये नहीं सोच रहे लोग। क्या सोचते हैं ? वही जो मैंने कहा — "ये कर देंगें, वो कर देंगें, ऐसा कर देंगें, वैसा कर देंगें।" तो यह है इस मन की चंचलता, इस मन के काम करने के तौर और तरीके और वह तौर-तरीके नहीं हैं कि "भाई मेरे को भी तो कुछ करना है!" जो मैं यहां आया हूं ये सब लड़ाइयों के लिए थोड़ी आया हूं। मुझको यह जो मनुष्य शरीर मिला है — अगर संत-महात्माओं की बात के तौर पर देखा जाए तो उनका तो कहना है कि इसलिए नहीं मिला है। तो जब इसलिए नहीं मिला है तो मैं क्या वह कर रहा हूं, वह काम मैं कर रहा हूं जिसके लिए मुझको मिला है या नहीं ? वह मैं काम कर रहा हूं या नहीं ?

अब एक गिलास है — हिंदुस्तान में पीतल के भी गिलास मिल जाते हैं, टीन के भी गिलास मिल जाते हैं, स्टील के भी गिलास मिल जाते हैं। पर गिलास है काहे के लिए ? पानी पीने के लिए ताकि होंठ पर अच्छी तरीके से आ जाये, पानी भी उसमें आ जाए, पानी इधर-उधर नहीं जाए, पानी को रखें और उससे पानी पी सकें। अब अगर उस गिलास से आप अपना घर बनाना चाहते हैं और उसको उस काम में लगाएं तो लगा तो सकते हैं, क्यों नहीं लगा सकते हैं, परन्तु कब तक चलेगा, कब तक चलेगा वह ? उसके लिए वह बना नहीं है। हर एक चीज के लिए औजार होता है और उस औजार को इस्तेमाल करने से अच्छा रहता है। क्यों ? अच्छा रहता है। यह छोटी-मोटी बात नहीं है, यह बहुत बड़ी बात है "अच्छा रहता है।" अगर आप अपने से हमेशा यह बोल सकें "कैसा चल रहा है ? अच्छा चल रहा है!" क्योंकि यह शरीर, यह समय जो कुछ भी आपको मिला है — जो कुछ भी आपको मिला है उसको आप सही तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं तो अच्छा चल रहा है। जिस चीज के लिए वह बना नहीं है, उसको इस्तेमाल करेंगे; उस तरीके से इस्तेमाल करेंगे; उसके लिए इस्तेमाल करेंगे जिसके लिए वह बना नहीं है, तो गड़बड़ तो होगी।

कैसी गड़बड़ होगी ? देख लीजिये इस संसार के अंदर क्या-क्या हो रहा है, जो कि इसके लिए नहीं बना है। यह जो स्वांस आपके अंदर आ रहा है, जा रहा है, यह इसके लिए नहीं बना है। यह आपके लिए है, यह जीवन ताकि आप उस आनंद को समझ सकें, उस चीज को समझ सकें जो आपके अंदर है। क्या होगा, क्या होगा ? यह होगा कि जिस मिट्टी से आप आए, उसी मिट्टी से जाकर के आप मिल जायेंगें — यह होगा! और कब तक उस मिट्टी से मिले रहेंगें ? करोड़ों साल ? हां! और क्या है यह मिट्टी ? यह धरती इससे नहीं बनी हुई है — सब चीजें जो आप देखते हैं तारे, सितारे, जो कुछ भी आप देखते हैं आकाशमंडल में वह सब इसी मिट्टी का बना है। इसी मिट्टी के आप बने हैं। इसी से आये हो, इसी में जाकर मिलना है — यह होना है! चाहे कोई भी आप डिग्री हासिल कर लीजिये, कुछ भी आप कर लीजिये, कहीं के भी मशहूर बन जाइए, पर यही होना है। क्योंकि यही होता आ रहा है और आगे भी होगा; अब भी हो रहा है, पीछे भी हो रहा था और यही होना है। अब यह आपके ऊपर निर्भर है — बाहर की कोई भी परिस्थिति हो, अंदर की परिस्थिति क्या है ? क्या आप वह कर रहे हैं जिसके लिए आपको यह शरीर मिला ?

नर तन भव बारिध कहुं बेरो, सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।

इस भवसागर को पार करने का यह साधन है। इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है — भगवान राम कहते हैं!

जो आपके सामने चैलेंजेज हैं, बात उन चैलेंजेज की नहीं है। बात है उस चैलेंजेज को आप किस रूप में पूरा कर रहे हैं ? सबसे बड़ी बात यह है।

परिस्थितियां बदलेंगी, धीरे-धीरे यह लॉकडाउन भी बदलेगा और हम यही आशा करते हैं कि जैसे ही मौका मिलेगा हम हिन्दुस्तान आएंगे। जो कुछ भी हम कर पाएंगे — हम नहीं चाहते हैं कि हम इस महामारी को — हम कुछ ऐसा करें जिससे यह महामारी और फैले। पर, जो कुछ भी हम कर पाएंगे जिससे कि यह बीमारी नहीं फैले उस हद तक हम करने के लिए तैयार हैं। तो अब देखते हैं क्या होता है! कुछ ही दिनों में और खुलने वाला है हिन्दुस्तान, परंतु आप अपना ख्याल रखिए — "ना किसी को यह बीमारी दीजिए, ना किसी से यह बीमारी लीजिए" — और आनंद में रहिये!

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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