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लॉकडाउन 49 00:19:58 लॉकडाउन 49 Video Duration : 00:19:58 पीस एजुकेशन प्रोग्राम की ओर अग्रसर (13 मई, 2020)

ऐंकर : सर! आपका बहुत-बहुत स्वागत है 92.7 बिग एफ.एम. में।

प्रेम रावत जी : बहुत मेरे को खुशी है कि ये मेरे को मौका मिला कि आपके जो श्रोता हैं, उन तक मैं अपनी बात पहुंचा सकूं।

ऐंकर : सर! आपकी जिंदगी कैसी रही है ?

प्रेम रावत जी : मेरी जिंदगी जैसी सबकी है — कभी अच्छा है, कभी बुरा है! कभी ऊपर जाती है, कभी नीचे जाती है! कुछ ये होता है; कभी कुछ होता है, कभी कुछ होता है, कभी कुछ होता है। परंतु इसका यह मतलब नहीं है कि मेरे अंदर शांति नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि जब अच्छा भी हो रहा है, तब भी मेरे अंदर शांति है; जब बुरा भी हो रहा है, तब भी मेरे अंदर शांति है। अगर मैं अपनी — अपनी तरफ झांकना, अपने घट में झांकना न भूलूं तो उस दृश्य से मेरे को वंचित नहीं होना पड़ेगा। ये तो मैं जानता हूं, ये तो मैं समझता हूं। परंतु इसको — इसका अभ्यास करने के लिए कोई आसान काम नहीं है। इसका अभ्यास करना पड़ता है।

ऐंकर : सर! आप किसके करीब बहुत ज्यादा हैं और क्यों ?

प्रेम रावत जी : जो मेरे अंदर स्थित शक्ति है, मैं तो यही समझता हूं कि अगर मेरा कोई दोस्त है तो वो है। क्योंकि स्कूल में जो मेरे दोस्त थे, कई तो गुजर गए और उनसे हमेशा मिलना नहीं होता है, जैसे स्कूल में थे। उसके बाद जो दोस्त थे, वो भी इधर-उधर हो गए।

तो कौन है ऐसा दोस्त मेरा, जो आज भी मेरे साथ है और उस समय तक मेरे साथ रहेगा, जबतक मैं आखिरी स्वांस न लूं ? तो एक अंदर है दोस्त मेरा। और मैं उसी के करीब होना चाहता हूं और कोशिश कर रहा हूं। अभी भी कोशिश कर रहा हूं। क्योंकि कई बार आता हूं और कई बार अपनी वजह से — क्योंकि जिस बात को मैं नहीं समझता हूं, उसी वजह से मैं दूर भी चला जाता हूं। जब दूर चला जाता हूं तो मेरे को लगता है कि ‘‘नहीं! मेरे को पास रहना चाहिए!’’ जब पास रहता हूं तो मेरे को ये याद रखना है कि मैं कुछ भी करूं, यहां से दूर न होऊं!

ऐंकर : सर! जिंदगी में, लाइफ में मतलब, प्रॉब्लम्स, चैलेंजेज़ आते रहते हैं।

प्रेम रावत जी : बिल्कुल आते हैं।

ऐंकर : सर! इनका सामना एक्चुअली कैसे करना चाहिए ?

प्रेम रावत जी : देखिए! ये चैलेंज कहीं आसमान से नहीं आते हैं। ये हमारी करनी के फल हैं। ये हम ही करते हैं, इनका बीज हम ही बोते हैं। तो हम नहीं समझते हैं कि बीज बोते हैं।

अब देखिए! मनुष्य जो है, आज का जो मनुष्य है, वो चाहता है कि भगवान अपने कानूनों को उसके लिए तोड़े!

ऐंकर : अपने कानूनों को उसके लिए तोड़े ?

प्रेम रावत जी : हां! जो भगवान ने प्रकृति के कानून बनाए हुए हैं — मनुष्य चाहता है कि भगवान उस व्यक्ति के लिए उन कानूनों को तोड़ दे! तो मनुष्य समझता है कि मेरे पास पैसा नहीं है। मेरे को पैसा चाहिए! भगवान से जाकर प्रार्थना करता है, ‘‘हे भगवान! मेरे को खूब सारा पैसा दे दे!’’

अब कहां से ? मतलब, किस काम के लिए ? काहे के लिए ? क्या है ? कहां से आएगा ? नहीं! ‘‘दे दे! दे दे! वो तोड़ दे!’’

अब देखिए! मैं सोच रहा था एक दिन कि जब जादूगर लोग कई बार जादू दिखाते हैं — तो कोई कागज लेता है, उसको मशीन में डालता है तो उसमें से सौ का नोट निकल आता है और सब लोग ताली बजाते हैं।

देखिए! हुआ ये है कि आपको बेवकूफ बनाया गया है। सौ प्रतिशत आपको बेवकूफ बनाया गया है। परंतु इस क़दर बेवकूफ बनाया गया है कि आपको अच्छा लगा। {हँसते हुए} तो मनुष्य जब देखता है कि प्रकृति के कानूनों को तोड़ा जा रहा है तो उसको लगता है कि ये चमत्कार है! ये चमत्कार है!

परंतु अगर भगवान राम को देखा जाए तो भगवान राम ने कानून नहीं तोड़े। मां से जन्म लिया। अब आपको — देखिए! छोटा बच्चा जब चलने की कोशिश करता है तो गिरता भी है, दर्द भी होता है, रोता भी है! तो अगर भगवान को कानून तोड़ने का ही कोई रिवाज है तो वो सारा बायपास कर देते! पेड़ से आ जाते! कहीं और से आ जाते, ताकि न मां की दिक्कत रहे, न चलने की दिक्कत रहे। नहीं! परंतु ऐसा नहीं किया। भगवान कृष्ण ने भी ऐसा नहीं किया। परंतु मनुष्य चाहता है कि वो किसी तरीके से प्रकृति के जो कानून, जो भगवान के बनाए हुए हैं, भगवान ही उनको तोड़ दे, ये उसकी कृपा हुई! परंतु ये उसकी कृपा नहीं है। कृपा उसकी ये है कि आपको जीवन मिला है!

आप क्या थे ? देखिए! मैं कई बार ये कहता हूं कि दो दीवालें हैं। एक दीवाल से आप आए, आपका जो जन्म हुआ और ये बीच में आपकी जिंदगी है और एक दीवाल दूसरी है, उससे जाना पड़ेगा। कहां जाएंगे आप ? क्या थे आप ? अगर वैज्ञानिकों की तरफ देखें, जो वैज्ञानिक लोग हैं, तो उनका कहना है कि आप धूल थे — डस्ट! आप धूल थे, अब आप धूल नहीं हो! हो, परंतु अभी धूल नहीं लगते हो! और जब आप उस दीवाल से जाएंगे तो फिर आप धूल बन जाएंगे।

तो मैं लोगों से कहता हूं कि अगर ये सच है तो ये आपका जो जीवन है, ये एक आपका vacation है, छुट्टी है धूल बनने से। धूल ही आपको रहना है करोड़ो-करोड़ों सालों तक! वैज्ञानिकों का यही कहना है। और इस संसार के अंदर — अभी मैं एक मैनेजिंग यूनिवर्सिटी में था। तो वहां यही बात मैंने कही तो वहां पढ़े-लिखे लड़के थे तो उन्होंने कहा कि हां! वैज्ञानिकों का तो यही कहना है कि पहले भी धूल थे। अब धूल नहीं हैं। फिर धूल बनेंगे। और सारा संसार जो है, धूल का बना है। पृथ्वी धूल की बनी हुई है। सूरज भी धूल का बना हुआ है। चंद्रमा भी धूल का बना हुआ है। सारे jupiters, planets, sun, stars, सबकुछ धूल, धूल, धूल, धूल, धूल!

तो ये आपका एक होली-डे है धूल बनने से। तो मेरा प्रश्न ये है कि ‘‘ये होली-डे कैसा चल रहा है आपका ?’’

ऐंकर : फर्स्ट क्लास।

प्रेम रावत जी : क्योंकि अगर दुविधा में हैं आप, परेशान हो रहे हैं — ये परेशानी है, वो परेशानी है, तो ये कोई होली-डे नहीं हुआ। क्योंकि ये होली-डे है तब, जब आप इसमें relaxed हैं। जब इसको आप इंज्वॉय कर रहे हैं। हर एक दिन को इंज्वॉय कर रहे हैं, तब ये बनेगा होली-डे! और ये सबसे बड़ी बात है!

ऐंकर : यस सर! सर! चैलेंजेज़, जैसे कि मैंने अभी पहले भी कहा कि सभी की लाइफ में आते हैं तो आपकी भी लाइफ में चैलेंजेज जरूर आए होंगे।

प्रेम रावत जी : आते हैं!

ऐंकर : आपने उनका सामना कैसे किया, या कैसे करते हैं सर ?

प्रेम रावत जी : देखिए! चैलेंजेज जब आते हैं तो उसका ये मतलब नहीं है कि हर एक चैलेंज में आप सक्सेसफुल होंगे। पर आप कुछ कर सकते हैं। आप हिम्मत रखिए, धीरज रखिए और अपने दिमाग का प्रयोग कीजिए। अपने डर का नहीं, अपने दिमाग का प्रयोग कीजिए। हिम्मत से आगे चलिए। आप मनुष्य हैं! हिम्मत से आगे चलिए। आपके पास हिम्मत है। ये आपकी ताकत है! अगर आप अपने आपको जानेंगे तो आपको पता लगेगा कि आपकी कमजोरियां क्या हैं और आपको ये पता लगेगा कि आपकी ताकतें क्या हैं ? अपने आपको जानना, क्यों ? इसीलिए तो जरूरी बन जाता है! क्योंकि हमको नहीं मालूम कि हमारी कमजोरी क्या है, हमारी ताकतें क्या हैं ? और अगर ताकत से चलेंगे तो किसी भी समस्या का — चैलेंज का सामना किया जा सकता है।

अब देखिए! एक बार मैं इंग्लैंड में था। ट्रैफिक बहुत हो गया है अब लंदन में। तो मैं बैठा हुआ था कार में और मैंने देखा कि एक व्यक्ति, जो visually challenged था, देख नहीं सकता था बेचारा। तो वो अपनी छड़ी लिए हुए और जा रहा है और काफी तेज चल रहा था वो! कार से भी तेज! कार अटकी हुई थी ट्रैफिक में। फिर थोड़ी देर के बाद कार चलने लगी तो उसको ओवरटेक किया, फिर कार रुक गई तो फिर वो आया। फिर मैं देख रहा था — मैं देख रहा था उसकी तरफ कि वो बड़ी अच्छी तरीके से जा रहा है और बड़ी तेज जा रहा है! मैं उसकी तरफ देखता रहा, देखता रहा, देखता रहा काफी समय तक। तब मेरे को लगा — अच्छा! ये क्या कर रहा है ?

ये अपनी छड़ी से साफ रास्ते को देख रहा है। कहां रास्ता साफ है ? वो ये नहीं देख रहा है कि उधर खंभा है, उधर ये बिल्डिंग है, उधर ये लगा हुआ है, उधर ये लगा हुआ है! है न ? वो सिर्फ ये देख रहा है कि कहां रास्ता साफ है ? और कितना साफ है कि वो उससे गुजर जाए। बस!

ऐंकर : बाकी चीजों को वो देख ही नहीं रहा है।

प्रेम रावत जी : देख ही नहीं रहा है। पर हम क्या करते हैं ? हम और चीजों को देखते हैं। हम पहाड़ को देखते हैं। उस रास्ते को नहीं देखते हैं, जो पहाड़ के साथ है। अगर पहाड़ है तो कहीं न कहीं नदी होगी और नदी रास्ता बनाएगी और आप उस रास्ते से कहीं भी जा सकते हैं। तो जरा अपना focus shift कीजिए, आप obstacles को नहीं देखिए! आप clearpath को देखिए!

ऐंकर : परफेक्ट सर! सर! आपकी जिंदगी का कोई ऐसा incident, जिसने आपकी लाइफ को चेंज कर दिया हो ?

ऐंकर : परफेक्ट सर! सर! आपकी जिंदगी का कोई ऐसा incident, जिसने आपकी लाइफ को चेंज कर दिया हो ?

प्रेम रावत जी : हां! एक तो था, पर मेरे को याद नहीं है वो। पर मैं जानता हूं कि वो हुआ है जब मैंने पहला स्वांस लिया। मेरी सारी जिंदगी को बदल दिया। {हँसने लगते हैं}

ऐंकर : अरे सर! {हँसने लगते हैं}

प्रेम रावत जी : मेरे को जीवित कर दिया! उससे पहले मैं क्या था ? अब, मैं स्वांस तो ले नहीं रहा था! जब मैं बाहर आया तो किसी न किसी तरीके से — या तो मेरे को उल्टा पकड़ा होगा या कुछ किया होगा, परंतु मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है, क्योंकि मैंने देखा है बच्चों का जन्म होते हुए, मेरे अपने, कि उस समय, जब बच्चा बाहर आता है तो ख्याल एक ही चीज पर जाता है। ये नहीं कि वो लड़का है या लड़की है; ये कैसा है, कैसा नहीं है! सिर्फ एक चीज पर जाता है — स्वांस ले रहा है या नहीं ?

चाहे वो किसी भी धर्म का हो, किसी भी मजहब का हो; अमीर हो, गरीब हो — स्वांस ले रहा है या नहीं ? और जैसे ही — अगर वो स्वांस नहीं ले रहा है तो डॉक्टर उसको उल्टा पकड़ता है और एक देता है पीछे से, जबतक वो स्वांस लेना शुरू न कर दे। और जब वो स्वांस लेना शुरू करता है तो वो घर आ सकता है। और अगर वो स्वांस नहीं लेगा तो वो घर नहीं आएगा। अस्पताल से ही कहीं और जाएगा। हां! जबतक वो स्वांस ले रहा है, उसके लिए — उसके चाचा होंगे, उसके मामा होंगे, उसकी मां होगी, उसके बाप होंगे, उसके भाई होंगे, उसके दोस्त होंगे, उसके दुश्मन होंगे, उसके सबकुछ होगा। और जिस दिन वो स्वांस लेना बंद कर देगा, उसको अपने ही घर से ले जाएंगे।

वहां रह नहीं सकते। ये स्वांस का चमत्कार है! और इसको नहीं समझेंगे अगर — तो यही एक चीज है, जो हुई मेरे भी जीवन के अंदर! और आज भी वो चीज मेरे अंदर आ रही है और जा रही है।

ऐंकर : राइट सर! सर! आपके हिसाब से धर्म, रिलिजन, मजहब क्या है और क्यों ?

प्रेम रावत जी : देखिए! ये लोगों की आस्था है। लोग जिस चीज में विश्वास करना चाहते हैं, ये करते हैं और इसमें कोई दिक्कत नहीं है। कई लोग हैं, जो हिन्दुस्तान में हैं, सब्जियां खाते हैं। कई लोग हैं — नॉर्थपोल की तरफ या अपर कनाडा में, जो सब्जियां नहीं खाते हैं। मतलब, सब्जी की बात है कि उसमें गरम मसाला और टमाटर का छौंक या प्याज या लहसुन या जो कुछ भी है। कई लोग हैं, जो कि प्याज-लहसुन नहीं खाते हैं। कई लोग हैं, जो फुलका खाते हैं। कई लोग हैं, जो फुलका नहीं खाते हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि वो खाते ही नहीं हैं। खाते हैं। कुछ न कुछ जरूर मनुष्य को खाना है। कोई साफ पानी पीता है, कोई इतना साफ पानी नहीं पीता है। पर पानी सब पीते हैं।

आजकल हिन्दुस्तान में कई शहर हैं, जिनमें हवा बहुत contaminated है, polluted है, प्रदूषण बहुत हो गया है। और इसका ये मतलब नहीं है कि — अब कई लोग हैं, जो स्वांस लेते हैं। कई ऐसी जगह हैं, जहां हवा स्वच्छ है; कई ऐसी जगह है, जहां हवा स्वच्छ नहीं है परंतु स्वांस तो फिर भी लेना है।

तो बाहर जो कुछ भी हो रहा है, हो रहा है। धर्म हैं, लोग उन पर विश्वास करते हैं। और जहां तक मेरी बात है, तो कम से कम वो विश्वास तो कर रहे हैं कि कोई एक है! अब नाम उनके अलग-अलग हैं। अलग-अलग उनके तरीके हैं, पर बात वही है। कहीं का भी कोई हो, किसी भी धर्म का हो, जब मुसीबत आती है, भगवान का नाम लेते हैं और कोशिश करता है कि मुसीबत न आए। और ये भी उसकी इच्छा है, ये भी भगवान की तरफ से ही उसकी इच्छा है कि मुझे मुसीबतों से बचाना। कहीं भी चले जाइए आप!

तो बात उसकी नहीं है, बात मनुष्य की है। और बात ये है कि वो अपने जीवन के अंदर असली चीज, जो वो है और उसके अंदर है, उसको समझे!

ऐंकर : सर! इंसानियत की definition क्या है और क्या हो रहा है इंसानियत के लिए सर! इंसानियत के लिए क्या हो रहा है ?

प्रेम रावत जी : नहीं! इंसानियत की तो बहुत definitions हैं। एक तो ये है कि जो इंसान हैं, जो इंसानों की प्रकृति है, वो इंसानियत है! परंतु दोनों ही संभावना है। आज मनुष्य एक-दूसरे को मारने में लगा हुआ है, ठगने में लगा हुआ है। और एक-दूसरे का भला भी चाह सकता है! पर एक-दूसरे का भला नहीं चाहता है।

इंसानियत चालू कहां से होती है ? क्या आपके परिवार से नहीं होती है ? जब सबेरे-सबेरे आप उठते हैं, आपके बच्चे हैं, आपके परिवार के लोग हैं। कितनी मां हैं, जो सबसे पहला शब्द बच्चों को बोलती हैं, ‘‘लेट हो गया तू! लेट हो जाएगा! जल्दी कर!’’ मतलब, क्या मतलब जल्दी कर ? लेट हो गया!

क्या तुमको कोई खुशी नहीं है अपने बच्चे को देख के ? तो क्या आपको शर्म आती है कि आप उस खुशी को व्यक्त करें ? क्योंकि अगर छोटी-सी भी बात आप कर दें, ‘‘गुड मॉर्निंग बेटा! कैसे हो ?’’

इंसानियत यहां से चालू होती है। एक इंसान, दूसरे इंसान से इस तरीके से व्यवहार करना शुरू करे। पति! अब देखिए! कितने झंझट होते हैं पति-पत्नी में ? क्लेश होता है, डिवोर्स होता है, लड़ाइयां होती हैं!

सबेरे-सबेरे पत्नी उठती है, ‘‘ये ले आना! ये ले आना! ये ले आना!’’

‘‘ये कहां रखा है ?’’ पति बोल रहा है अपनी पत्नी से, ‘‘ये कहां रखा है ? मेरा नाश्ता कहां है ? मेरा ये नहीं है! मेरा वो नहीं है!’’

जिम्मेवारी के बोझ में मनुष्य ऐसा बदल गया है, ऐसा बदल गया है, ऐसा बदल गया है, ऐसा बदल गया है कि — आप जानवरों को देखें, वो अपने बच्चों से ज्यादा प्यार कर रहे हैं, बनिस्पत मनुष्य अपने बच्चों से, अपने परिवार से।

तो जब ऐसा माहौल बन गया है तो इंसानियत कहां रही ? कैसे जाएगी ? जिन लोगों की तरफ हम देखते हैं कि वो हमारा मार्गदर्शन करेंगे, वो ही हमको गुमराह कर रहे हैं! वो ही हमको गुमराह करने में लगे हुए हैं! आज झूठ की क्या कीमत है ? बल्कि ये कहना चाहिए कि सत्य की क्या कीमत है ? सत्य! सत्य की कीमत तो कुछ है ही नहीं! जो चाहे, जैसा चाहे, जितना झूठ बोलना चाहे, उतना झूठ बोलता है। अब उसको ये नहीं है कि इसका क्या नतीजा होगा।

तो जब ये, ऐसा माहौल हमने बना ही लिया है तो इसमें फिर इंसानियत का नाम ही कहां से आएगा ? तो इंसानियत अगर शुरू करनी है दोबारा, तो बड़ी बेसिक से शुरू करनी पड़ेगी, अपने से शुरू करनी पड़ेगी, अपने परिवार से शुरू करनी पड़ेगी, उन लोगों से, जिनसे सचमुच में प्यार है, उनसे चालू करनी पड़ेगी। तभी हम समझ पाएंगे कि दूसरे के साथ कैसा व्यहार करना चाहिए। आजकल का माहौल ये है कि जो पराया है, उसको गुड-मॉर्निंग कहने के लिए हम तैयार हैं और जो अपने हैं, उनके लिए कुछ नहीं है।

ऐंकर : सर! आजकल लोग बहुत जल्दी घबरा जाते हैं किसी भी बात को लेकर और उस घबराहट में गलत कदम भी उठा लेते हैं। तो ऐसे लोगों से आप क्या कहना चाहते हैं ?

प्रेम रावत जी : वो अपनी — अपने आपको नहीं जानते हैं! क्योंकि आपके अंदर हिम्मत है, हिम्मत से काम लीजिए। तभी सब्र आएगा! जिसके पास हिम्मत नहीं है, जिसके पास स्ट्रेंथ नहीं है, जो अपनी स्ट्रेंथ को नहीं समझता है, वो कुछ नहीं कर पाएगा। ये एक चूहे को भी मालूम है। चूहा भागने की कोशिश करता है। सबसे पहले तो भागने की कोशिश करेगा। पर अगर भाग नहीं सका वो तो उसको भी मालूम है कि उसको जो कुछ भी वो कर सकता है — वो है तो बहुत छोटा! परंतु उसको मालूम है कि जो मेरे को करना है — उसमें हिम्मत है! वो हिम्मत नहीं हारता। वो उल्टा मुंह करेगा और कोशिश करेगा, कोशिश करेगा काटने की। उसको मालूम है। उसको मालूम है! देखिए!

हित अनहित पशु पक्षिय जाना।

मानुष तन गुन ग्यान निधाना।।

अच्छा-बुरा तो सब जानते हैं। मनुष्य ही नहीं जानता है। क्योंकि क्या गुण है ? मानुष तन — ये जो शरीर मिला है — गुण, इसका गुण यही है कि वो ज्ञान प्राप्त कर सकता है। तो जब वो है ही नहीं मनुष्य के पास तो फिर ये सारे झंझट होते हैं।

लॉकडाउन 13 00:22:52 लॉकडाउन 13 Video Duration : 00:22:52 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (5 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

क्योंकि यह वीकेंड आ गया है — शनिचर, इतवार का दिन है और प्रश्न पढ़ने का यह मौका है। तो आप लोगों ने जो प्रश्न भेजे हैं, उनका मैं जवाब देने की मैं कोशिश करूँगा।

"मैं अपने अंदर की अच्छाइयों को बाहर नहीं ला पा रही हूँ, क्योंकि मेरे अंदर इतनी कड़वाहट भर गयी है कि अब मुझे इस जीवन से उतना प्यार नहीं रहा, जितना पहले था। मैं भटक चुकी हूँ। मैं वापिस जाना चाहती हूँ पर कुछ तो है जो मुझे रोक रहा है और मैं चाहकर भी नहीं जा पा रही हूँ। मैं दिन भर परेशान रहती हूँ।"

देखिये! आपको परेशान — एक तो परेशान रहने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि जो कुछ भी हो रहा है, जो कुछ भी दुःखों का कारण है वह कितना बड़ा है ? इतना बड़ा है, इतना। जो कुछ भी हो रहा है वह यहां हो रहा है। बाहर की जो परिस्थिति है, वह तो हमेशा बदलती रहती है कभी कुछ है, कभी कुछ है, कभी कैसी है, कभी कैसी है। परन्तु यहां जो आवाज इन कानों के बीच में हो रही है, इसको कैसे रोका जाए ? प्रश्न का मूल जो सवाल है, वह मैं इस प्रकार देख रहा हूँ कि इसको कैसे रोका जाए ? परेशानी जिसकी आप बात कर रहे हैं वह यहां है। बाहर की परिस्थिति तो हमेशा बदलती रहेंगी — "कभी कुछ है, कभी कुछ है, कभी कैसा है, कभी कैसा है!" और अगर हम बाहर की परिस्थितयों में ही लगे रहे तो हमारे जीवन में हम कभी आनंद नहीं ले पाएंगे। जो सुख है, असली सुख है उसकी अनुभूति नहीं कर पाएंगे। लगे रहेंगे, लगे रहेंगे, जैसे वह बैल होता है, जो कुंए के पास चलता है — सारे दिन चलता रहता हैं, चलता रहता है, चलता रहता है, तो वह भी सोचता होगा पता नहीं कहाँ से कहाँ पहुंच गया मैं! पर जब रात को या शाम को उसकी पट्टी खुलती है तो वह अपने आपको वहीं पाता है जहां वह पहले था। तो मनुष्य के साथ भी यही हाल है। हाल क्या है ? मैं फिर सुनाकर बताता हूँ कि —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

आपने देखा होगा भंवर — भैं, भैं, भैं, भैं कभी फूलों के इधर से आता है, कभी उधर से आता है, कभी यहां जाता है, कभी वहां जाता है, कभी इधर बैठता है, कभी उधर, बैठता है। तो वही बात —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो —

तीनों लोकों में — कौन-कौन से लोक हैं, एक पृथ्वी लोक है, पाताल लोक है और स्वर्ग लोक है — तीनों लोकों में वह दौड़ता रहता है। तो —

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

सभी का मन कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है, कभी इधर डोल रहा है, कभी उधर डोल रहा है और उसी के साथ सारे मनुष्य इस सारे संसार के अंदर कभी इधर डोल रहे हैं, कभी उधर डोल रहे हैं, कभी इधर जाते हैं, कभी उधर जाते हैं। यह हो रहा है। और आपके साथ जो हो रहा है — आप दुखी हो रहे हैं उससे। क्योंकि आपको मालूम है कि कोई ऐसी जगह है जहां शांति है, जहां सुख है और आप वहां पहुंचना चाहते है पर पहुंच नहीं सकते हैं। क्योंकि आप समझते हैं कि इन सारी चीजों ने आपको जकड़ा हुआ है।

एक कहावत है अंग्रेजी में कि — "तुमको पंखों की जरूरत नहीं है उड़ने के लिए, तुमको परों की जरूरत नहीं है उड़ने के लिए, यह जो रस्सियां तुमको बांधे हुए हैं, बंधन जो तुमको बांधे हुए हैं इसको काटने की जरूरत है, तुम अपने आप ही उड़ने लग जाओगे।"

एक कहानी भी है इसी प्रकार से — एक आदमी था उसने कभी अपने जीवन में हाथी को नहीं देखा था। तो वह हाथी देखना चाहता था। तो उसने इंटरनेट पर रिसर्च की कि कहाँ हाथी हैं ? तो उसको पता लगा कि साउथ में, दक्षिण की तरफ — वहां हाथी मिलेंगे, तो वह गया। एक गाँव में गया जहां बहुत सारे हाथी थे, तो उसने देखा कि बड़े-बड़े हाथी, सब एक जगह इकट्ठा हो रखे हैं और उन पर ऐसी छोटी-सी धागे की तरह रस्सी बांधी हुई है उनके पैर पर और उस रस्सी के होने से वह कहीं नहीं जा रहे हैं। वह अपने आपको बंधा हुआ पा रहे हैं। यह बड़ा अजीब दृश्य उसको दिखाई दिया कि "इतना बलवान, इतना बड़ा हाथी और इसको बाँध रखा है छोटी-सी कच्ची रस्सी से। यह कैसे बंध गया ?"

तो पहले तो उसने हाथी को देखा, खुश हुआ हाथी को देखकर के। फिर जो वहां प्रधान था उस गांव का, उसके पास वह गया कहा — भाई! एक बात बताइये कि बड़े -बड़े बलवान हाथी हैं, इनको आपने बाँध रखा है इस छोटी-सी रस्सी से, यह कैसे संभव है ? यह तो तोड़ देंगे। तो प्रधान ने कहा "जब यह बच्चे थे, तो ऐसी ही रस्सी से इनको बाँधा जाता था और तब ये उस रस्सी को तोड़ नहीं पाते थे। अब ये बड़े हो गए हैं, पर ये समझते है कि उनसे भी बलवान है यह रस्सी और ये रस्सी को तोड़ नहीं पाएंगे।

देखिये! वही बात है, वही बात है कि जिस चीज से हम बंधे हुए हैं, उससे ज्यादा बलवान हम हैं, अपनी परिस्थितयों से ज्यादा बलवान हम हैं। परन्तु हम भूल गए हैं कि हम ज्यादा बलवान हैं। हम सोचते हैं कि हमारी परिस्थितियां जो हैं, वह हमसे बलवान हैं। जबतक आपके अंदर, कैसा राम बैठा है ?

"एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा, एक राम का जगत पसारा, एक राम जगत से न्यारा!"

वह जो सबके घट में बैठता है, वह राम आपके अंदर है। और राम की बात मैंने क्यों कही ?

क्योंकि जब भगवान राम इस दुनिया में आये, जब उनका अवतार हुआ, तो उनके साथ क्या हुआ ? आप समझते हैं कि जो उनके साथ परिस्थितियां थीं, क्योंकि — मैं फिर याद दिला देता हूँ आपको कि उनके साथ क्या हुआ ?

उनका राज्याभिषेक होना था। और जिस दिन उनका राज्याभिषेक होना था, उनको राजा बनना था, इसके लिए उनको ट्रेंड किया हुआ था, इसके लिए वह समझते थे, वह जानते थे कि “ठीक है, हां! एक दिन मैं राजा बनूंगा।” सबसे बड़े पुत्र वही थे। तब जब समय आया, उनके राज्याभिषेक का, उस दिन जहां खुशियों की बात थी — सीता माता, उनकी अर्धांगिनी, देखने में अति खूबसूरत, सभी गुणों से संपन्न, सम्पूर्ण, वह सीता माता उनको भी खुशी कि आज राज्याभिषेक होगा हमारे पति का, राम का राज्याभिषेक होगा। लक्ष्मण बहुत खुश। उस दिन क्या हुआ ?

राज्याभिषेक नहीं हुआ, उस दिन उनको बताया गया कि "तुम चौदह साल के लिए वनवास जाओगे। एक साल नहीं, दो साल नहीं, तीन साल नहीं, चार साल नहीं, पांच साल नहीं, छः साल नहीं, सात साल नहीं, चौदह साल के लिए तुम वनवास जाओगे। और, और तुम्हारा राज्याभिषेक नहीं होगा। तुम राजा नहीं बनोगे, भरत राजा बनेगा।"

भगवान राम ने कहा — "ठीक है, जैसी उनके पिताजी की आज्ञा, उसी प्रकार से आगे होगा।" कोई बात नहीं — चले गए वह।

इतना ही बहुत था ? ना! राक्षस, राक्षसों को मारा जा रहा है जंगल में हैं — एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, तीन दिन नहीं, चौदह साल के लिए वह जंगल में हैं। उनकी अर्धांगिनी — उनके साथ वह अपना प्यार भी नहीं जता सकते, क्योंकि अगर वह गर्भवती हो जाएंगी, भगवान राम को अच्छी तरीके से मालूम है कि अगर वह गर्भवती हो जाएंगी तो जंगल में ही बच्चा का जन्म होगा और मुश्किलें और बढ़ जाएंगी, तो वह छू भी नहीं सकते। उनके साथ कौन है ? कभी तो भगवान राम बैठकर सोचते होंगे कि क्या दुर्भाग्य की बात है मेरे को भी जंगल में जाना पड़ा, मेरे भाई को भी जंगल में जाना पड़ा और सीता को भी जंगल में जाना पड़ा। अब एक जगह हैं नहीं टिके हुए — कभी किधर जाते हैं, कभी किधर जाते हैं, कभी किधर जाते हैं। खाने के लिए क्या है ? तुम समझते हो खाने के लिए शॉपिंग सेंटर है कोई ? ना! अपने पैरों पर, अपने हाथों से जो कुछ भी मिल जाए — जाना है, हर रोज जंगल में जाना है। जो कुछ भी मिल जाए उसको तोडक़र के लाना है और उससे खाना बनाना है।

उसके बाद सीता की भी चोरी हो जाती है। वह समय, यह समय जैसा आजकल होता है, ऐसा नहीं था। सचमुच में भगवान राम को दुःख हुआ। आज के कई पति हैं जिनको बड़ी खुशी होगी कि "चली गयी"! पर उस समय ऐसा नहीं था। उस समय उनको जेन्यूवाइन्ली (genuinely) दुःख हुआ। सचमुच में दुःख हुआ। सीता चली गयी उसको — किसी तरह से सीता को वापिस लाना है। उनके पास शस्त्र थे, अस्त्र थे सबकुछ था। पर, उनके पास कोई आदमी नहीं थे। कोई लड़ने के लिए सिपाही लोग नहीं थे। वही अकेले थे — सिर्फ लक्ष्मण, सीता और राम!

जो उन्होंने सेना तैयार की वह कैसी सेना थी ? वानरों की और भालुओं की! वानरों की और भालुओं की सेना उन्होंने तैयार की। और उस सेना को ले जाकर के लंका पर उन्होंने हमला बोला। उस समय लड़ाई चल रही है और लक्ष्मण को बाण लगा। और लक्ष्मण की जो लाइफ है, जो जिंदगी है वह मंडरा रही है — कितना दुःख हो रहा है भगवान राम को। मैं अवतार की बात कर रहा हूँ और इतना दुःख हो रहा है, इतना दुःख हो रहा है कि ऋषि-मुनि भगवान को समझा रहे हैं कि "आप विष्णु के अवतार हैं आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है।" ये हालात हैं और फिर भी वह आये और जब उन्होंने रावण को मार दिया और जब वापस वह अयोध्या आये, उनका फिर राज्याभिषेक हुआ, तो तुम समझते हो सारी उनकी परेशानियां खत्म हो गयीं ? नहीं! वह तो और बढ़ीं। कैसे ?

हम तो राम राज्य की बात करते हैं, पर क्या सीता के लिए भी वह राम राज्य था ? जब वह आ गए थे वापिस, तो अब सीता तो गर्भवती थी। किसी बेवकूफ धोबी ने यह कहा कि उसकी बीवी भाग गयी — "उसने कहा अगर मेरी बीवी होती तो मैं राम थोड़े हूँ जो सीता को वापिस ले आता!"

इतना सुनते ही भगवान राम ने कहा लक्ष्मण से — "ले जाओ सीता को, अलग कर दो!" क्या भगवान राम को दुःख नहीं हुआ होगा ? क्या उनको नहीं मालूम था कि सीता गर्भवती है। फिर वाल्मीकि के आश्रम में सीता रही। वहां लव और कुश को जन्म दिया। और जब — फिर भगवान राम ने कहा कि — "ठीक है! सीता तू आ जा, वापिस आ जा, पर एक बार और अग्नि परीक्षा कर ले। ताकि मैं सब से कह सकूं कि "तू पवित्र है!"

सीता ने कहा कि — "कितनी बार करती रहूंगी मैं यह ? धरती तू मेरे को वापिस ले ले।" धरती से ही उनका जन्म हुआ था। धरती फटी और भगवान राम की अर्धांगिनी — सीता हमेशा-हमेशा के लिए उनसे दूर हो गयी।

क्या यह समस्या नहीं है ?

इस समय — इन स्थितियों में कोई भी आपकी परिस्थिति हो, जरा ध्यान दें कि वही राम — "एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा, एक राम का जगत पसारा, एक राम जगत से न्यारा" — तुम्हारे घट में वह राम बैठा है। उसको समझो, उसको जानो, उसको पहचानो। अपने जीवन की कदर जानो। तुम्हारा यह संघर्ष, तुम्हारा यह जीवन जो है इन दुनिया की परिस्थितियों का सामना करने के लिए नहीं है। यह है सच्चिदानंद को जानने के लिए। यह है —

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

इस भवसागर को पार करने का यह साधन है। तो कुछ भी हो, कोई भी परिस्थिति हो हौसला कभी नहीं भूलना चाहिए, छोड़ना चाहिए।

दूसरा सवाल है — "मैं इतनी मेहनत करता हूँ अपने आपको जानने के लिए, लेकिन मैं अभी तक अपने आपको जान नहीं पाया।"

देखिये! आपकी दो आँखें हैं और यह सारी दुनिया को देखती हैं और सबकी आँखों को देखती हैं, पर अगर आप अपने आपको देखना चाहते हैं, तो ये आँखें अपने आपको तभी देख सकेंगी, जब आपके सामने एक दर्पण होगा, आईना होगा, मिरर (mirror) होगा। जबतक ज्ञान रूपी mirror आपके पास नहीं है, तबतक आप अपने आपको जान नहीं पाएंगे, पहचान नहीं पाएंगे। और अगर 'है', तो आपको अपनी आँखें खोलनी पड़ेंगी। तभी उस दर्पण में आप अपने आपको देख पाएंगे। क्योंकि कई लोग हैं जो ज्ञान लेकर भी अपनी आँख बंद रखते हैं और दर्पण को अपने आगे कर लेते हैं और कहते हैं, "मैं अपने आपको क्यों नहीं देख पा रहा हूँ!"

इसलिए नहीं देख पा रहे हैं क्योंकि आँख अभी भी आपकी बंद हैं। आँखें खोलिये, जानिये, उस ज्ञान के अनुभव को स्वीकार कीजिये। जब आपका हृदय पूरी तरह से भरेगा, जब आप उस शांति का अनुभव करेंगे, तब आपके जीवन में वाह-वाह होगी। तब आप जान पाएंगे कि आप दरअसल में कौन हैं!

यह भी सवाल है कि — "मैं अपने आपको स्थिर नहीं कर पा रहा हूँ। जब भी ध्यान में बैठता हूं तो मन में इधर-उधर की बातें याद आती हैं।"

यह आपके साथ अकेला ही सम्बन्ध नहीं है, यह औरों के साथ भी होता है। क्योंकि यह मन है, त्रिलोक में भागता है — "कभी इधर जा रहा है, कभी उधर जा रहा है, कभी उधर जा रहा है, कभी उधर जा रहा है।" तो इसके लिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ।

एक बार एक आदमी था। तो वह अपने गुरु के पास पहुंचा। उसने कहा कि "आपकी सेवा मैंने की है और मैं चाहता हूँ कि आप मेरे को कोई वरदान दें।"

गुरु महाराज जी ने कहा — ठीक है! क्या चाहते हो, क्या मांगते हो ?

कहा कि — "मेरे को ऐसा जिन्न दे दो, जो मेरी सारी इच्छाओं को पूरी कर दे। मैं चाहता हूँ कि मेरी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएं।"

गुरु महाराज जी ने कहा — "ठीक है! हम जिन्न तो तुमको दे देंगे, पर एक बात याद रखना। जब भी तुम्हारे पास उस जिन्न के लिए कुछ नहीं होगा, तो वह जिन्न तुमको खाने के लिए आएगा। तो तुमको खा जाएगा, तुमको मार देगा।"

उसने कहा कि — "जी! आपको चिंता करने की जरूरत ही नहीं है। मेरी तो इतनी इच्छाएं हैं, इतनी इच्छाएं हैं, इतनी इच्छाएं हैं कि मैं उस जिन्न को पूरी तरीके से बिज़ी रखूँगा। उसको कभी मौका ही नहीं मिलेगा, आराम करने का।"

गुरु महाराज जी ने कहा — "देख ले भाई! जान ले, समझ ले नहीं तो फिर तेरे को पछताना पड़ेगा!”

उसने कहा — "नहीं! आप चिंता मत कीजिये, दे दीजिये मुझको !"

तो उसको जिन्न मिल गया। अब जिन्न आया और कहा कि "मैं तेरे को खाऊंगा।"

कहा — नहीं! नहीं! अभी मेरी इच्छा है कि "तू मेरे लिए एक बड़ा सा महल बना।"

जब महल बन गया तो कहा कि "मैं तेरे को खाऊंगा।"

कहा — नहीं! नहीं! मेरी इच्छा है — "तू अच्छे-अच्छे पकवान मेरे लिए तैयार कर!"

उसने पकवान तैयार कर दी तो कहा कि "मैं खाऊंगा।"

मेरे को नौकर-चाकर चाहिए, मेरे को धन चाहिए, मेरे को ये चाहिए, मेरे को वो चाहिए।

वह करता रहा, करता रहा, करता रहा, करता रहा। एक हफ्ता बीत गया और एक हफ्ते के बाद उसके पास कुछ बचा नहीं मांगने के लिए। सबकुछ, सारी उसकी इच्छाएं पूरी हो गयीं।

अब आया जिन्न कहा कि "मैं तेरे को खाऊंगा।"

तो भागा-भागा वह गया गुरु महाराज जी के पास कि "जी, अब मैं क्या करूँ ? मेरी इच्छाएं तो एक हफ्ते में ही पूरी हो गयीं और यह जिन्न मेरे को खाने के लिए आ रहा है।"

कहा, "हां! इस जिन्न को बैठकर कहो कि मेरा यह जो स्वांस अंदर आ रहा है, जा रहा है इस पर ध्यान दे!"

तो वह भी बैठ गया, जिन्न भी बैठ गया। और जो स्वांस आ रहा है, जा रहा है, उस पर जिन्न का ध्यान जाने लगा। जब जाने लगा तो मोह भी काबू में आ गया। यही बात है समझने कि —

कुंभ का बाँधा जल रहे, जल बिन कुंभ न होय,

ज्ञान का बाँधा मन रहे, गुरु बिन ज्ञान न होय।

तुम्हारे अंदर जो चीज है, जब तुम उसका अनुभव करोगे, अपने मन को उसमें एकाग्र करोगे, तब जाकर तुम्हारा मन उस चीज में लगेगा — उस जिन्न की तरह।

तो अभी काफी समय हो गया है। मुझे आशा है कि आप लोगों को, यह वीडियो जो हम बना रहे हैं, आप लोगों तक पहुंचा रहे हैं। यह आपको पसंद आ रही हैं। अगर आपको पसंद आ रही हैं तो, प्लीज हमें write कीजिए — जो अलग-अलग तरीके हैं लिखने के, वह भेजिए — जो आपको अच्छी लगीं तो, जो आपका अनुभव है उसको हमारे तक भेजिए। और प्रश्न भेजिए ताकि हम आपको इनके उत्तर दे सकें। सभी लोगों को, सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

लॉकडाउन 56 00:22:23 लॉकडाउन 56 Video Duration : 00:22:23 पीस एजुकेशन प्रोग्राम की ओर अग्रसर (20 मई, 2020)

गंगटोक, सिक्किम

प्रेम रावत:

क्या तुम जानते हो कि इस धरती पर हर क्षण सूर्य उदय होता है। क्या तुम जानते हो ? और इस पृथ्वी पर हर क्षण सूर्य अस्त होता है। पृथ्वी घूम रही है। कहीं न कहीं सूर्य उधर उग रहा है, उदय हो रहा है और कहीं अस्त हो रहा है। कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। परंतु तुम्हारे को क्या है ? ‘‘ओह! अब सबेरा हो गया!’’ कहीं रात हो रही है, कहीं दिन हो रहा है। ये सारा इस पृथ्वी पर सब समय होता रहता है। कभी ऐसा समय नहीं है कि ऐसा नहीं होता है। सूर्य कभी छिपता नहीं है। सूर्य कभी उठता नहीं है। ये तुम सिर्फ देखते हो तो कहते हो, ‘‘अब सूर्य उदय हो गया है!’’ नहीं, सूर्य तो हमेशा कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। और जहां मनुष्य है, वो ऊपर की तरफ देखता है, कहता है — ‘‘अब रात हो गयी! अब दिन हो गया! अब उदय हो गया, अब अस्त हो गया।’’ परंतु ये तो सब जगह हो रहा है। एक जगह की बात नहीं है। सब जगह हो रहा है! हमेशा हो रहा है। इसी प्रकार तुम्हारे जीवन में जो भी हो रहा है, तुम उसी चीज को देखते हो, उसी चीज को पहचानते हो और उसी के आधार पर तुम जीना चाहते हो! परंतु सोचो, क्या हो रहा है ?

दुःख क्या है ? दुःख क्या है ? दुःख तुम्हारे अंदर है। सुख क्या है ? सुख तुम्हारे अंदर है। दुःख का स्रोत तुमसे बाहर हो सकता है, पर दुःख तुम्हारे अंदर है। सुख का स्रोत तुमसे बाहर हो सकता है, पर सुख तुम्हारे अंदर है।

एक दिन सचमुच में मैं बहुत परेशान था! परेशान था — क्योंकि मेरे को ऐसी खबर मिली, ऐसी खबर मिली कि उस खबर ने मेरे को परेशान कर दिया। अब मैं अपने ऑफिस में बैठा हूं और परेशान हूं। और वो सारी बातें — ये कैसे हो गया ? ये तो नहीं होना चाहिए था। ये…! मन है! ब्रूम्पऽऽऽ! अपनी बैण्ड बजाने लगा। मैंने कहा — ठीक है! जो भी खबर मेरे को मिली! मिली! इसके बारे में तो मैं कुछ कर नहीं सकता। ये तो हो गया! परंतु ये परेशानी जो मैं महसूस कर रहा हूं, क्या मैं महसूस करना चाहता हूं या नहीं ? ये मैंने अपने आपसे कहा। परेशान होना चाहता है तू या नहीं ? तो अंदर से आवाज आयी — क्या आवाज आयी होगी ?

श्रोतागण: नहीं!

प्रेम रावत:

तुम वहां नहीं थे तो तुमको कैसे मालूम ? वहां नहीं भी थे, फिर भी तुमको मालूम है, क्योंकि तुम भी मनुष्य हो, मैं भी मनुष्य हूं। परेशान तुम भी नहीं होना चाहते, मैं भी नहीं होना चाहता। तो वही बात हुई। ठीक उसी तरीके से मैंने कहा — ‘‘हां तो भाई! परेशान होने की क्या जरूरत है ? काहे के लिए परेशान होता है ?’’

सुख भी मेरे अंदर है, दुःख भी मेरे अंदर है। सुख भी मेरे अंदर है, दुःख भी मेरे अंदर है। परंतु मैं अपना संबंध दुःख से नहीं, सुख से बनाना चाहता हूं। मैं अपना संबंध अंधेरे से नहीं, प्रकाश से बनाना चाहता हूं। मैं अपना संबंध मौत से नहीं, जीवन से बनाना चाहता हूं।

हम तो अपने जीवन में मौत को लिए फिरते हैं। जीवन का हमको पता नहीं। स्वांस की क़दर नहीं, जिसके बिना जीवन नहीं।

स्वांस को क्या जानते हैं हम ? जिस दिन निकलने लगता है, उस दिन हमको याद आती है — स्वांस गया, अरे बाप रे! कहां गया ? बिना स्वांस के तीन मिनट से ज्यादा — चाहे तुम कितने भी बलवान हो, कितनी भी कसरत करते हो, तुम्हारी मसल्स यहां तक भी हों — तीन मिनट जो स्वांस नहीं चला, तो मसल्स भी कुछ नहीं कर पाएंगी। कसरत भी कुछ नहीं कर पाएगी। कितनी जरूरी चीज है ये! अगर तुम स्वांस नहीं ले पाए तो तुम मर जाओगे और तुम्हारे डेथ सर्टिफिकेट में क्या लिखा जाएगा ? मौत हुई, एफेक्सीएशन से। स्वांस न लेने के कारण से मौत हुई! है न ? यही तो लिखा जाएगा न, डेथ सर्टिफिकेट पर ? ये एक मेडिकल कन्डीशन है। ये रैकग्नाइज्ड — इसको मेडिकल साइन्स, डॉक्टर लोग रैकग्नाइज़ करते हैं, इसको जानते हैं कि अगर आदमी स्वांस न ले तो वो मर जाएगा। ठीक है न ?

अच्छा, कभी किसी को टीवी न देखने से मरना जो है, कभी सुना है इसके बारे में ? क्योंकि इसके लिए कोई मेडिकल टर्म नहीं है कि — ये आदमी टीवी न देखने के कारण मर गया। या ये आदमी बस की इंतजार करते-करते मर गया। या ये आदमी अपनी गर्ल-फ्रैण्ड के पीछे भागता-भागता मर गया। या ये लड़की अपने ब्वाय-फ्रैण्ड के पीछे भागते-भागते मर गयी। नहीं। ये कोई मेडिकल इस पर नाम नहीं है इसका। परंतु अगर तुमको खाना न मिले, तीन दिन पानी न मिले, तीन हफ्ते खाना न मिले और तीन मिनट हवा न मिले, तुम्हारी हवा निकल जाएगी। तो क्या समझे ?

तो जो मैं कहने के लिए मैं यहां आया हूं, वो खुशखबरी है! क्यों खुशखबरी है कि — शांति आपके अंदर है, सुख आपके अंदर है। क्यों ? जिस चीज की तुमको तलाश है, वो तुम्हारे ही अंदर है। वो ब्रह्म, वो तुम्हारे ही अंदर है। वो भगवान, जिसको तुम बाहर खोजते हो, वो तुम्हारे ही अंदर है। जबतक तुम जीवित हो, तुम्हारे ही अंदर है और उसी की वजह से तुम्हारे अंदर परमानन्द बैठा हुआ है, परमानन्द है! और जहां परमानन्द है, वहां अपार सुख है, अपार शांति है और उसको न जानना ही अपार दुःख है।

मनुष्य के लिए दुःख की क्या परिभाषा है ? सुख में न होना ही मनुष्य के लिए दुःख है। कारण की वजह से नहीं — अगर तुम सुख में नहीं हो तो तुम दुखी हो! चाहे तुम उसको जानते हो या नहीं जानते हो।

ज्ञानी में और अज्ञानी में क्या अंतर है ? यह नहीं है कि ज्ञानी का सिर बड़ा है। यह नहीं है कि ज्ञानी के कंधे बड़े हैं। यह नहीं है कि ज्ञानी का कद बड़ा है। यह नहीं है कि ज्ञानी का वजन कम है। ना! ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर यह है कि ज्ञानी जानता है, अज्ञानी नहीं जानता है। और जिसको जानना है, जिसको जानने से वो ज्ञानी बन सकता है और जिसको न जानने से वो अज्ञानी है, वो चीज भी तुम्हारे ही अंदर है। उसको पहचानो, उसको जानो! और जब तुम जान जाओगे, तुम दुःख से बच जाओगे — ये है मेरा संदेश!

लोग सोचते हैं, लोग सोचते हैं कि इस पृथ्वी पर शांति कैसे होगी ? ना, ना, ना, ना, ना, ना! यह गलत सवाल है। क्यों ? सबसे पहले तुममें शांति होनी चाहिए। सबसे पहले तुममें शांति होनी चाहिए। और तब जब तुममें शांति होगी, तब तुम इस संसार से शांति बनाओ! और जब तुम इस संसार से शांति बनाओगे, तब जाकर के इस संसार के अंदर शांति होगी। क्योंकि इस संसार में अशांति का कारण तुम हीं हो। यह अच्छी खबर नहीं है, परंतु मैं क्या करूं ? जब हो ही तुम कारण, तो मैं कैसे कहूं कि तुम नहीं हो। अशांति का कारण मनुष्य है।

शेर को शिकार करने की जरूरत है — है कि नहीं ? शेर को शिकार करने की जरूरत है, परंतु अगर शेर का पेट भरा हुआ है तो वो शिकार नहीं करेगा। मनुष्य ही ऐसा जानवर है कि पेट भरा हुआ है, फिर भी शिकार करेगा। शेर नहीं करेगा ये। शेर को तो शिकार करने की जरूरत है और यहां दुकानें भरी पड़ी हैं खाने के लिए, फिर भी जा रहा है। ऐसा शेर तुमको कहीं नहीं मिलेगा। ऐसा शेर तुमको कहीं नहीं मिलेगा। मच्छर भी — मच्छर भी नहीं काटेगा, अगर उसने पहले काट लिया किसी को, उसका पेट भरा हुआ है। पहले उसको पचाएगा, तब बाद में काटेगा किसी को अगर भूख लगेगी। बिना भूख के वो मच्छर भी नहीं काटता है।

पर मनुष्य है कि बिना भूख के भी शिकार करता है, बिना किसी कारण के काटता है और धर्म क्या है, मनुष्य भूल गया है। और जो कुछ भी मनुष्य करता है, जिसको नहीं मालूम कि असली धर्म क्या है, वही अधर्म है। और इस संसार के अंदर जो अशांति फैली हुई है, वो अधर्म के कारण फैली हुई है। अधर्म जो मनुष्य करता है। क्योंकि उसको यही नहीं मालूम कि वो कौन है ? उसको ये नहीं मालूम कि वो शेर है या बकरी ? कौन है वो ? उसको नहीं मालूम! और अधर्म होता है।

सबसे पहला धर्म क्या है ? विचार करो! उससे पहले कि मनुष्य ने देवी-देवताओं को स्वीकार करना शुरू किया, सबसे पहला धर्म जो मनुष्य ने बनाया, वो धर्म है — दया होनी चाहिए। उदारता होनी चाहिए। इसीलिए तो इन सब चीजों का वर्णन हर एक धार्मिक धर्म में मिलता है। चाहे वो हिन्दू हो, चाहे वो मुसलमान हो, चाहे वो सिख हो, चाहे वो ईसाई हो, चाहे वो बुद्धिष्ट हो! किसी भी धर्म का हो, सभी धर्मों में ये सारी चीजें बराबर हैं। उदारता होनी चाहिए, दया होनी चाहिए, क्षमता होनी चाहिए, क्षमा होनी चाहिए! ये है तुम्हारा धर्म! और जब तुम क्षमा नहीं करते हो, जब तुम दया नहीं करते हो, तुम अधर्म करते हो! और इस अधर्म — नर्क की बात छोड़ो! नर्क की बात छोड़ो! क्यों छोड़ो ? क्योंकि अधर्म के कारण मनुष्य ने नर्क यहीं बना दिया है। मरने की क्या जरूरत है ? नर्क यहीं बना हुआ है! जहां स्वर्ग होना चाहिए, वहां मनुष्य ने नर्क बना दिया है।

असली धर्म को पकड़ो! और वो असली धर्म है — मानवता का धर्म! मानवता का धर्म! जिसमें दया है, उदारता है! और जब उसको पकड़ोगे, अपने आपको पहचानोगे कि तुम कौन हो ? और जब तुम अपने आपको जानोगे, कौन हो ? तो तुम जानोगे कि सुख भी तुम्हारे अंदर है, परमात्मा भी तुम्हारे अंदर है, शांति भी तुम्हारे अंदर है, ज्ञान भी तुम्हारे अंदर है। और यह भी जानोगे कि अज्ञानता भी तुम्हारे अंदर है। अगर तुम जानोगे कि अज्ञानता तुम्हारे अंदर है — नम्र रहो! नम्र रहो! नम्र! नम्रता को स्वीकार करो! क्यों ? अज्ञानता तुम्हारे अंदर है। इसलिए सिर थोड़ा बचा के। नहीं तो जब अज्ञानता की तलवार चलेगी और तुम्हारा — तुम्हारी गरदन होगी ज्यादा ऊपर तो तुरंत जाके तुम्हारी गरदन पर पड़ेगी।

तुम क्या समझते हो ? तुम्हारी अज्ञानता का सबसे बड़ा शिकार कौन बनता है ? कोई और ? तुम्हीं बनते हो। तुम जब गुस्सा करते हो, तुम समझते हो कि वो तुम्हारे गुस्से का शिकार बन रहा है ? नहीं भाई! सबसे पहले तुम्हारे गुस्से का शिकार तुम बनते हो। ब्लड-प्रेशर तुम्हारा बढ़ता है। उसका बढ़े, न बढ़े! दूसरे का बढ़े, न बढ़े, गला तुम्हारा दर्द करेगा। ब्लड-प्रेशर तुम्हारा बढ़ेगा! लाल तुम होगे, दुःख तुमको होगा! तो गुस्से का सबसे पहला शिकार तो हो तुम! उसके बाद दूसरा हो या न हो। पर ये तुमको नहीं मालूम!

जब तुम गुस्सा करते हो — अब गुस्सा भी तो ऐसी चीज है कि जब आता है तो दरवाजे पर खटखटाता तो है नहीं कि ‘‘मैं आ जाऊं ?’’ कहां से आया, कब आया, पता ही नहीं! क्योंकि शब्द क्या है — गुस्सा आया! यही है न ? गुस्सा आया! गुस्सा आता है। ये गलत है। गुस्सा आता नहीं है। गुस्सा तो पहले से ही अंदर है। गुस्सा तो पहले से ही अंदर है! तुम समझते हो, तुमने दरवाजे की चिटकनी बंद कर दी, अब कोई अंदर नहीं आयेगा ? बहुत सारे अंदर आ गये हैं। तुम नहीं जानते हो उनको, पर वो बहुत ही आ गये हैं अंदर। तुम्हारा गुस्सा भी तुम्हारे साथ चलता है। तुम बस में एक सीट की टिकट लेते हो, अरे! तुम्हारा गुस्सा भी तुम्हारे साथ चलता है। तुम्हारी दया भी तुम्हारे साथ चलती है। तुम्हारा ज्ञान भी तुम्हारे साथ चलता है, तुम्हारा अज्ञान भी तुम्हारे साथ चलता है। ये सारी चीजें तो जहां भी तुम जाते हो, तुम्हारे साथ हैं। कोई घर से पैक्ड थोड़े ही करता है ? ये थोड़े ही है कि घर छोड़ दिया अगर तुमने दो दिन के लिए या तीन दिन के लिए तो गुस्सा भी तुम्हारा घर पर ही रह गया या भूल गये पैक करना। ना! जहां भी तुम जाओ, गुस्सा साथ में है। तो गुस्सा आता नहीं है, दुःख आता नहीं है। दुःख पहले से ही वहां है। पर इस बात को समझो! इस बात को जानो!

क्योंकि अगर तुम इन चीजों से ऊपर उठना चाहते हो तो तुम उठ सकते हो। यह तुम पर निर्भर करता है। जिस शांति की मैं बात कर रहा हूं, इसीलिए खुशखबरी है कि — वो शांति पहले से ही तुम्हारे अंदर है। पर शांति का अनुभव कैसे कर पाओगे, अगर दिन-रात तुम अधर्म करते रहते हो ? अधर्म मत करो! धर्म, जो तुम्हारा धर्म है, जो मानवता का धर्म है — देवी-देवताओं के धर्म की बात नहीं कर रहा हूं। ये तो तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। मैं बात कर रहा हूं, तुम्हारा! जो मानव होने के नाते जो तुम्हारा धर्म है, इसको निभाना सीखो! और जिस दिन तुम इसको निभाने लगोगे, तुम्हारे जीवन के अंदर भी आनंद ही आनंद होगा। ये आज की बात नहीं है। ये आज की बात नहीं है। ये बात तो पता नहीं कितने समय से चली आ रही है। तो जानो, पहचानो और अपने जीवन को सफल करो।

लॉकडाउन 55 00:24:18 लॉकडाउन 55 Video Duration : 00:24:18 पीस एजुकेशन प्रोग्राम की ओर अग्रसर (19 मई, 2020)

प्रेम रावत:

बात है जीवन की। हम जिस बात को करते हैं, उसका किसी मज़हब से लेना-देना नहीं है। वो मनुष्य के लिए है। और सबसे जरूरी बात समझना यह है कि क्योंकि हम जीवित हैं, कौन-सी ऐसी चीजें हैं, जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा प्रभाव रखती हैं, जो जरूरी हों ? क्योंकि अगर विषय होता कि आप धन और कैसे कमा सकते हैं — अगर विषय होता कि आप कैसे 50 परसेंट पैसे को बढ़ा सकते हैं, जो आपके पास है तो यह जगह बहुत छोटी पड़ती। क्योंकि आजकल हमलोगों की जो समझ है, वो कुछ इसी प्रकार की हो गयी है।

बात धन कमाने की नहीं है। कमाइए, खूब कमाइए! जितना हो सकता है, उतना कमाइए! बात धन कमाने की नहीं है, पर जिस तरीके से आप कमा रहे हैं, बात उसकी है कि आप किस तरीके से कमा रहे हैं कि आप उस धन को अपने साथ ले जाएंगे। और यह होगा नहीं।

हर एक चीज का एक लिहाज़ होता है। जब आप अपने घर से कहीं जाने के लिए निकलते हैं, दूर सफर करने के लिए निकलते हैं — तीन दिन के लिए जाना है, चार दिन के लिए जाना है, पांच दिन के लिए जाना है, छः दिन के लिए जाना है, उसी तरीके से तो आप पैक करते हैं अपने सूटकेस को। यह थोड़े ही है कि जब आपको एक दिन के लिए कहीं जाना है तो सूटकेस — अब माता-बहनों की बात अलग है। परंतु वो इस प्रकार से सूटकेस पैक होता है कि उसमें सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ! ये तो नहीं करते हैं। दो दिन के लिए जाना है, तीन दिन के लिए जाना है, उसी चीज को देखकर — क्या होना है, क्या करना है ? ये सब देखकर के ही तो आप पैक करते हैं ? पर अपने जीवन में किस तरीके से पैक करते हैं ?

जो आपके नाते हैं, रिश्ते हैं — और मैं यह चर्चा इसलिए कर रहा हूं आज, क्योंकि अभी तो पांच बजे हैं — एक बजे मैंने एक फोन-कॉल की। मेरे पास कल, जब मैं यहां पहुंचा, मेरे पास एक रिक्वेस्ट आयी कि ‘‘जी! एक व्यक्ति हैं और वो अपने जीवन के आखिरी दौर पर हैं — डॉक्टरों ने कह दिया है। और वो आपसे बात करना चाहते हैं।’’ तो मैंने फोन किया।

तो सबसे पहले उन्होंने कहा कि ‘‘हां, मेरे को कह दिया है कि मैं जा रहा हूं!’’

मैंने कहा कि असलियत तो यह है कि हम सब जा रहे हैं। कोई ऐसा नहीं है, जो नहीं जा रहा है। सिर्फ इतना है कि डॉक्टर ने अभी नहीं कहा है। मतलब, डॉक्टर कह दे — अपशगुन! डॉक्टरों का तो मुंह भी नहीं देखना चाहिए, वो ऐसी चीज कह सकते हैं। पर डॉक्टर कह देते हैं तो हमारा सारा सोचने का तरीका बदल जाता है। डॉक्टर कह देते हैं तो हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है, जीने का तरीका बदल जाता है। और डॉक्टर ने नहीं कहा है, फिर भी हकीकत तो वही है। तो संत-महात्माओं का इसके बारे में यह कहना है कि हम अपने आपको — अब मैं पैराफ्रेज़ कर रहा हूं। और अंग्रेजी में जो शब्द होगा कि हम अपने आपको cheat कर रहे हैं। और कोई नहीं, हम अपने आपको cheat कर रहे हैं। जो फैक्ट्स हैं, जो हकीकत है, उसको स्वीकार नहीं कर रहे हैं। परंतु एक ऐसी हकीकत अपने दिमाग में बनाए हुए हैं, जो हकीकत नहीं है। जो हकीकत नहीं है।

तो फिर क्या रह गया ? मतलब, अगर मैं इसी तरीके से बोलता रहूं, थोड़ी देर के बाद आप लोगों को तो रोना आना लगेगा। इतना डिप्रेसिंग बन जाएगा ये सारा सब्जेक्ट — ‘‘जाना है, जाना है, जाना है। इसकी परवाह मत करो। उसकी परवाह मत करो। ये क्या होगा ? वो क्या होगा।’’ नहीं, नहीं, नहीं! मैं डिप्रेसिंग बात करने के लिए नहीं आया हूं। डिप्रेसिंग बात करनी है तो आपको मेरी क्या जरूरत है ? टेलीविजन चालू कीजिए, न्यूज चैनल देखिए, डिप्रेशन अपने आप आ जाएगा। अखबार खोल के बैठ जाइए।

परंतु बात कुछ ऐसी है कि इस अंधेरे के बीच में एक रोशनी है। बात कुछ ऐसी है कि इस डिप्रेसिंग न्यूज़ के बीच में — इस सारे डिप्रेसिंग संसार के बीच में एक खुशखबरी है। और वो खुशखबरी है — यह जीवन! वो खुशखबरी है — यह स्वांस! वो खुशखबरी है — तुम्हारा जिंदा होना! और अगर आप थोड़ी-सी चीजों को समझ जाएं तो आपका पूरा जीवन बदल जाएगा — खुशी में!

कितने ही लोग हैं, कितने ही लोग हैं, जिनके जीवन के अंदर दुःख है और उन दुःखों का कारण और कोई नहीं, वही लोग हैं, जिनको वो बहुत प्यार करते हैं। है कि नहीं ? ताना सुनना — द,द,द,द,द... द,द,द,द... द,द,द,द,द!

अब बात आती है — प्रेम करने की। क्या आपको प्रेम करना आता है ?

‘‘I loveyou, I loveyou, I loveyou’’ के कार्ड खरीदते रहते हैं। जवान थे तो ज्यादा कहते थे, अब थोड़ा बुड्ढे हो गये तो कम कहते हैं। देखिए! मनुष्य को प्यार करना चाहिए तो प्यार करना चाहिए। उससे प्यार करना चाहिए, जिसे वो प्यार करना चाहता है। और असली प्यार वो है कि प्यार हुआ जिससे हुआ, पर उसके कामों से नहीं। तो मैं ऊपर से बात चालू करता हूं।

आप भगवान से प्यार करते हैं ? इसके दो ही उत्तर हो सकते हैं — हां या ना! मल्टीपल च्वाइस है ये! हां या ना! करते हैं ?

आप भगवान से प्यार करते हैं और इसलिए करते हैं, क्योंकि जो वो करता है या भगवान से प्यार करते हैं, इनडिपेंडेंट ऑफ — वो जो करता है ?

आप अपनी मां से प्यार करते हैं, क्योंकि आप अपनी मां से प्यार करते हैं या आप अपनी मां से प्यार करते हैं, क्योंकि वो जो आपके लिए करती है ?

आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं — आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं या पत्नी से इसलिए प्यार करते हैं, कि वो जो आपके लिए करती है ?

मैं — आप समझें न समझें, मैं इसको बहुत इम्पोर्टेंट समझता हूं। क्योंकि अगर मैं भगवान से इसलिए प्यार करता हूं, क्योंकि मैं भगवान से आशा रखता हूं, उपेक्षा रखता हूं कि मेरे लिए वो ये करेगा, ये करेगा, ये करेगा, ये करेगा, ये करेगा, ये करेगा, तो ठीक है। मैं भी भगवान से प्यार करने के लिए तैयार हूं।

मतलब, लोगों का यह है कि हम इतने स्वार्थी हो गए हैं — हम अपने आपको स्वार्थी नहीं मानते।

जब सबेरे-सबेरे उठते हैं, कोई कहे, ‘‘तुम स्वार्थी हो।’’ ‘‘ना! हम कैसे स्वार्थी हैं ?’’

मतलब किसी भूखे को खाना भी खिलाना, उसमें भी हम अपेक्षा करते हैं कि वो कुछ कर्म हमारे — यहां जाएगा जेब में और भगवान हमको दया दृष्टि से देखेगा और हमारा बिज़नेस अच्छा चलेगा। तो हर एक चीज की अपेक्षा हो गयी।

आप अपने बेटे से प्यार करते हैं। इसलिए प्यार करते हैं, क्योंकि वो आपका कहा मानता है और अगर आपका कहा न माने तो वही प्यार करते रहेंगे उसको ?

यहां तक भी क्वेश्चन आ जाता है कि ‘‘तू मेरा बेटा हो ही नहीं सकता!’’

मतलब, कुछ ऐसा माहौल बना दिया है हमने अपने दिमाग में कि जो हकीकत है, उस हकीकत को हम नहीं देख रहे हैं।

अच्छा, भगवान की बात भी हो गयी, बीवी की बात भी हो गयी, बेटे की बात भी हो गयी। बीच में और कोई है तो उसकी बात भी समझो, हो गयी! क्योंकि वही बात है। वो जबतक हमको सैटिस्फाई करते रहेंगे, हम ठीक हैं और हम अपने आपको — अगर वो हमको सैटिस्फाई नहीं कर रहे हैं तो फिर गड़बड़ है।

अच्छा! अब ले जाते हैं बात एक कदम आगे! और कौन है एक कदम आगे ? आप!

आप अपने आप से प्यार करते हैं या नहीं ?

और अगर करते हैं तो इसलिए करते हैं, क्योंकि आप अपने आपको पहचानते हैं इसलिए आप अपने से प्यार करते हैं या आप इसलिए प्यार करते हैं कि आपकी जो आशाएं हैं, जबतक आप उन आशाओं को, उन ख्वाबों को पूरा करते रहेंगे, आप ठीक हैं। और जब आप नहीं करने लगेंगे अपने ही ड्रीम्स को पूरा — अपने ही ख्वाबों को पूरा। क्योंकि देखिए! लोग हैं इस संसार के अंदर, जो खुदकुशी करते हैं। खुदकुशी करना कोई आसान चीज नहीं है। पर वो अपने से ही इतने निराश हो गये हैं कि अब उनको जीवन में आगे चलने के लिए कोई आशा ही नहीं दिखाई देती है।

तो अगर प्यार करना है तो प्यार करना सीखना पड़ेगा बिना अपेक्षा के। और यह आसान काम नहीं है।

मैं सिर्फ आपके सामने बात रख रहा हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप सबको डिवोर्स ले लेना चाहिए या अपने बच्चों को अनाथाश्रम में डाल देना चाहिए या अपनी जॉब से फायर कर लेना चाहिए। सिर्फ बात है दृष्टिकोण की, बात है समझ की।

अब बैलेंस की बात होती है। बैलेंस तो हो नहीं सकेगा। आई एम सॉरी! आई एम सॉरी! फिजिक्स इज़ इन्वॉल्व! एक तरफ इन्फिनिट — जिसका कभी अंत ही नहीं होता है — जिसका कभी अंत ही नहीं होता है और एक तरफ वो, जिसका अंत निश्चित है। सचमुच में दोनों को एक ही तराजू में रखेंगे ?

वाह, वाह, वाह! क्योंकि होगा नहीं। एक अथाह, दूसरा अथाह नहीं।

तो फिर इसका दृष्टिकोण क्या निकलता है ?

इसका दृष्टिकोण यह निकलता है कि जो भी मैं अपने जीवन में करूं, मैं एक चीज को ध्यान में हमेशा रखूं कि मेरी खुशी बाहर से नहीं आएगी, मेरी खुशी मेरे अंदर से आएगी। मेरी शांति बाहर से नहीं आएगी, मेरी शांति मेरे अंदर से आएगी। मेरा भगवान मेरे को बाहर नहीं मिलेगा, मेरा भगवान मेरे को अंदर में मिलेगा।

ये आपके ऊपर निर्भर है, आप किसको प्यार करें और कैसे प्यार करें ? ये आपके ऊपर निर्भर है! दिल से प्यार करें या दिमाग से प्यार करें ?

एक बार मैं था रेडक्रॉस ब्लड डोनर्स ड्राईव, इटली में — मैंने कहा कि सभी लोगों को ‘‘पीस एम्बेसडर’’ होना चाहिए। सभी लोगों को! शांति की बात करता हूं मैं, परंतु शांति तब तक संभव नहीं होगी, जबतक तुम अपने आपको नहीं पहचानोगे। हो ही नहीं सकती।

जबतक यह नहीं जानोगे कि ‘‘शांति तुम्हारी चाह नहीं है, तुम्हारी जरूरत है।’’ अभी तो लोग समझते हैं कि ‘‘आहा! अच्छा होगा शांति हो जाए!’’ बिना शांति के ये संसार नहीं चल पाएगा। बिना शांति के यह संसार नहीं चल पाएगा, चाहे कितनी भी टेक्नोलॉजी हो! आज सबसे अव्वल टेक्नोलॉजी इस संसार के अंदर शांति की नहीं है, अशांति की है। सबसे अव्वल टेक्नोलॉजी, सबसे एडवांस टेक्नालॉजी डिप्लॉय हुई है लड़ाई करने के लिए।

शांति के लिए क्या करना है ? कुछ नहीं!

लड़ाई के लिए क्या करना है? बहुत कुछ!

शांति के लिए क्या करना है ? कुछ नहीं।

कोई बम नहीं बनाना है, कोई फाइटर जेट नहीं बनाना है, कोई कुछ नहीं बनाना है, कोई सर्वेलेन्स नहीं करनी है, कोई रेडार नहीं चाहिए, कोई सेल्फट्रैकिंग मिसाइल नहीं चाहिए, कोई जीपीएस नहीं चाहिए। सिर्फ मनुष्य चाहिए और सिर्फ मनुष्य चाहिए! लोग कहते हैं, ‘‘हमको शांति के लिए क्या करना चाहिए ?’’

हम कहते हैं, ‘‘कुछ नहीं!’’ तुम जो कर रहे हो, उससे नहीं हो रही है। करना छोड़ो! तुम्हारे अंदर है। तुम्हारे अंदर है। जिस चीज को तुम खोज रहे हो, वो तुम्हारे अंदर है, तुम्हारे पास है। इस बात को जानो, इस बात को समझो और सिर्फ अपने दृष्टिकोण को बदलने की बात है। सिर्फ अपने दृष्टिकोण को बदलने की बात है। समझने की बात है और फिर इस जीवन के अंदर आनंद ही आनंद संभव है। यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं। क्योंकि मैं नहीं कह रहा कि मेरे को समस्याएं नहीं तंग करती हैं। करती हैं। खूब करती हैं।

लोगों का काम ही है, अपनी समस्या मेरे सिर पर डालना सबेरे से लेकर शाम तक। और किसी और की हो न हो, वो तो किराये पर भी ले आते हैं। परंतु मेरा दृष्टिकोण बदला ? क्योंकि मैंने अपने से एक सवाल पूछना शुरू किया, ‘‘क्या मैं इस समस्या के कारण परेशान होना चाहता हूं या नहीं ? समस्या को तो देख लेंगे। पर क्या मैं परेशान होना चाहता हूं या नहीं ?’’

और जब उत्तर मेरे को मिला — नहीं! तो मैंने कहा, ठीक है। अब हम समस्या से लड़ने के लिए तैयार हैं।

दृष्टिकोण की बात है। समस्या से तो लड़ेंगे! लड़ना पड़ेगा, लड़ेंगे! परंतु अगर परेशान हैं तो बीमारी पहले ही लगी हुई है। परेशान होकर नहीं, दृढ़ता से! करेज! वीकनेस के साथ नहीं, कमजोरी के साथ नहीं, साहस के साथ। क्योंकि एक ही समस्या से नहीं लड़ना है। और यह जो जंग है, इसको जीतना है। छोटी-मोटी बैटल्स जो हैं — कभी जीतेंगे, कभी हारेंगे। कोई बात नहीं। परंतु जो वॉर है, उसे नहीं हारना है। कभी नहीं। कभी नहीं।

ये है जी 50 साल का एक्सपीरियन्स थोड़े ही शब्दों में। इनमें से कोई भी चीज आपको अच्छी लगे, अपने जीवन में इस्तेमाल कीजिए। कई लोग कहते हैं, ‘‘जी! हम कोई भी चीज इस्तेमाल नहीं करेंगे, क्योंकि हमको ये बात अच्छी नहीं लगी और ये बात अच्छी नहीं लगी और ये बात अच्छी नहीं लगी।’’

उन लोगों को मेरा यह कहना है कि जब आप सुपरमार्केट में जाते हैं तो पूरा सुपरमार्केट खरीद के ले जाते हैं या वही ले जाते हैं, जो आपको चाहिए ? जो आपकी जरूरत है। ठीक उसी तरीके से यह भी सुपरमार्केट है। यहां बहुत सारी चीजें कही गई हैं। जिसकी आपको जरूरत है, ले जाइए! और जिसकी नहीं है, उसको छोड़ दीजिए।

अभी लोग हैं, ऐसे कहते हैं, ‘‘जी! हम ये नहीं करेंगे, हम वो नहीं करेंगे।’’

हमारा तो यह है कि किसी ने भी कहा हो, किसी ने भी कहा हो — चाहे वो लड़के ने कहा, लड़की ने कहा। हमसे जवान, हमसे वृद्ध! अच्छा है तो हम रख लेंगे। नहीं है, नहीं रखेंगे। ये मतलब थोड़े ही है कि सारा का सारा सुपरमार्केट खरीद करके अपने घर में ले जाना है। फिट भी नहीं होगा। और करेंगे क्या ? तो जो अच्छा लगे, उसको रखो। जो बुरा लगे, कोई बात नहीं। पर अच्छे को रखोगे, तुम्हारे जीवन में भी अच्छाई आएगी।

लॉकडाउन 54 00:17:30 लॉकडाउन 54 Video Duration : 00:17:30 पीस एजुकेशन प्रोग्राम की ओर अग्रसर (18 मई, 2020)

प्रेम रावत:

एक बात है सोचने की, क्योंकि मैं जगह-जगह जाता हूं। और मेरे पास काफी प्रश्न भी आते हैं लोगों के, जो सिर्फ हिन्दुस्तान से ही नहीं, सारे देशों से। कई लोग हैं, जो जेलों में हैं, उनसे भी आते हैं। तो इन सब प्रश्नों को पढ़कर मुझे क्या लगता है ? तो मेरे को यही लगता है कि सब मनुष्य इस संसार के अंदर ओवरलोड हो रखे हैं। सब! छोटे हैं, उनको भी ओवरलोड किया हुआ है। बड़े हैं, उनको भी ओवरलोड किया हुआ है। परिवार के सारे सदस्य — ओवरलोड! देश के नागरिक — ओवरलोड! देश के नेता — ओवरलोड! देश के सिपाही — ओवरलोड! देश की पुलिस — ओवरलोड! सबके साथ यही हाल है। क्योंकि जब ओवरलोड होता है, जब बोझ ज्यादा हो जाता है तो दुःख होता है। जब इतना वजन पड़ने लगता है इन कंधों पर, इस गरदन पर, जो सहा नहीं जा सकता, तो फिर दुःख होता है। और इसके लिए क्या कहा है कि — भूले मन! समझ के लाद लदनियां।

अखबार उठाया मैंने एक दिन, उसमें लिखा हुआ था कि ‘‘आप अच्छी सेहत के लिए ये खाइए! ये खाइए! आप अच्छी सेहत के लिए ऐसा योग कीजिए! आप असली सेहत के लिए, अच्छी सेहत के लिए ये करिए, वो करिए!’’ और कहीं नहीं लिखा था कि — भूले मन! समझ के लाद लदनियां।।

और दरअसल में जड़ सारे मुश्किलों की वही है! आज जो मनुष्य तड़प रहा है, कहां भागता है ?

कोई मंदिर भागता है। पर किसी भी धर्म का व्यक्ति हो, वो अपने भगवान की ओर भागता है। क्यों भागता है ?

क्योंकि ‘‘मुझे दुःख से बचा लो! मेरी विनती सुन लो! कुछ करो!’’ परंतु उसको ये समझाने वाला कोई नहीं है —

भूले मन! समझ के लाद लदनियां।।

नए कानून बन गए! नए कानून बन गए कि इतनी कक्षा से इतनी कक्षा तक विद्यार्थियों को गृहकार्य नहीं करना पड़ेगा। परंतु उनको ये समझाने वाला फिर भी कोई नहीं है कि —

भूले मन! समझ के लाद लदनियां।।

थोड़ा लाद, बहुत मत लादे, टूट जाए तेरी गरदनियां।

भूले मन! समझ के लाद लदनियां।।

यही समझाने के लिए मैं यहां आया हूं कि — भूले मन!

ये बात मैं सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं कह रहा हूं। ये बात मेरे पर भी लागू होती है। लोगों को मैं देखता हूं, अपने आपको मैं देखता हूं। कई बार चिंतित पाता हूं।

तब, जब याद आती है कि ‘‘भूले मन! समझ के लाद लदनियां।’’

क्या-क्या लाद रहा है अपने गर्दन पर तू ?

और — भूखा हो — भूख लगी है अगर — और किस चीज की भूख ?

हर एक व्यक्ति को परमानंद की भूख है। वो आनंद में रहना चाहता है, उस सच्चिदानंद से मिलना चाहता है, अपने जीवन को सफल करना चाहता है। और कई बार उसको यह भी नहीं मालूम कि वो ये करना चाहता है। क्योंकि लगा हुआ है, इतना लगा हुआ है, इतना लगा हुआ है — बोझ है! तो —

भूखा होय तो भोजन पा ले, आगे हाट न बनियां।।

दो दीवाल हैं। एक दीवाल से तुम आए — जब तुम पैदा हुए। कहां थे तुम ? किसी को नहीं मालूम! क्या कर रहे थे तुम ? किसी को नहीं मालूम! पर उस दीवाल से निकले! आज जिंदा हो। एक दूसरी दीवाल है और तुमको उस दीवाल से भी जाना है। और जब जाओगे, कहां जाओगे ? किसी को नहीं मालूम। कोई तुमसे संपर्क नहीं रख पाएगा। सेलफोन तुम ले जा नहीं सकते अपने साथ कि वहां से फोन कर लें, ‘‘मैं यहां हूं!’’ कुछ नहीं। पर अगर जो कुछ करना है, इन दीवालों के बीच में करना है। तो अगर भूखे हो तुम — ये भोजन की बात नहीं हो रही है सिर्फ। ये खाने की बात — दाल की, भात की, रोटी की, चटनी की, सब्जियों की, अचारों की बात नहीं हो रही है। जो भूख लगी है तुम्हारे हृदय में, तुम्हारे अंदर, उसको अगर पूरा करना है तो अब कर लो! ‘‘आगे हाट न बनियां।’’ कोई खिलाने वाला, कोई देने वाला नहीं है।

प्यासा होय तो पानी पी ले, आगे देश निपनियां।।

आगे कुछ नहीं मिलेगा। आगे कोई सुराही देने वाला नहीं है, कोई मटका रखने वाला नहीं है, कोई पानी देने वाला नहीं है। कोई नदी नहीं है, कोई झरना नहीं है, कोई कुआं नहीं है, कोई नलका नहीं है। जो कुछ है, यहां है। और जो तेरे को करना है, यहां करना है।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, काल के हाथ कमनियां।।

आखिर में किसने पकड़ना है तुमको ?

काल ने पकड़ना है। वो ले जाएगा।

अब लोग अपने ख्यालों में विचार करते हैं कि हम अगर ये काम करें, ये काम करें, ये काम करें तो हम स्वर्ग जाएंगे।

धारणाएं हैं मनुष्य की। मनुष्य है जमीन पर, ऊपर की तरफ देखता है। क्या देखता है ? वो ऊपर वाला! कौन ऊपर वाला ? कौन ऊपर वाला ? कौन ऊपर वाला ?

अरे! वो ऊपर वाला तो तुम्हारे अंदर वाला भी है। पर ऊपर ही देखते रहोगे या अंदर की तरफ भी झांकोगे ? अंदर की तरफ झांकना नहीं आता है ? मैं दावे से कहता हूं कि लोगों को अंदर की तरफ झांकना नहीं आता है। बाहर घूर-घूर के देखते रहते हैं — कहां है ? कहां है ? कहां है ? कहां है ? कहां है ? ... और क्या कहते हैं ? ‘‘अगर भगवान! तू है तो सामने आ!’’

भगवान है, पर वो अंदर है। और जबतक तुम अंदर झांक के नहीं देखोगे, तुमको दिखाई नहीं देगा। तुमको पता नहीं लगेगा। बाहर की तरफ देखोगे, क्या मिलेगा ? इस दुनिया का क्लेश मिलेगा। लोग लड़ते हुए मिलेंगे!

जबतक तुम हर दिन, जिसमें तुम जिंदा हो, उसको अगर तुम नहीं समझोगे कि ये क्या है, तबतक तुमको भगवान की असली लीला क्या है, कभी समझ में नहीं आएगी। भगवान क्या है, ये भी तुमको समझ में नहीं आयेगा। चाहे तुम किसी भी धर्म को मानने वाले हो — हम तो कहते हैं, तुमको समझ में ही नहीं आएगा। परंतु जिस दिन तुम समझना शुरू करोगे कि ये क्या आशीर्वाद मिला है — असली त्योहार, वो त्योहार है, जिसमें मनुष्य अपने आपको समझने लगता है, वो त्योहार असली है। औरों का नहीं, अपना त्योहार!

व्रत रखते हैं ? व्रत रखते हैं, क्यों रखते हैं ?

ये {दिमाग की तरफ इशारा करते हुए} कहता है। ये {दिमाग की तरफ इशारा करते हुए}!

ये नहीं{हृदय की तरफ इशारा करते हुए}, हृदय काहे के लिए कहेगा व्रत रखो ? ये {दिमाग की तरफ इशारा करते हुए} कहता है — व्रत रखो तो कुछ अच्छा हो जाएगा। और पेट क्या कहता है ? खिला दे भाई! खिला दे! खिला दे, खिला दे! सारे दिन पेट क्या कहता है ?

‘‘गुर्रऽऽऽऽऽ! घुर्रऽऽऽऽऽऽऽऽ! गुर्रऽऽऽऽऽऽऽऽ! घुर्रऽऽऽऽऽऽ! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा ? मुझे क्यों नहीं खिला रहा है ?’’ और खाना क्या है ? वही खाना है, जो भगवान बनाता है। क्या उल्टी गंगा है!

कहते हैं — किसान, ‘‘फसल को उपजाता है।’’ उपजाता है ? परंतु उसको, उस बीज को धरती से कौन निकालता है ? किसान ? वही, जिसके लीले की बात कर रहे हैं, वही-वही —

कामिल काम कमाल किया, तैंने ख्याल से खेल बनाय दिया।

वो! वही! वही किसान है! वही खाने वाला है, वही बनाने वाला है। वही बनाता है, वही भूख बनाता है, वही खाना बनाता है और उसी के नाम पर तुम व्रत करते हो।

परंतु व्रत भी रखेंगे। मैं नहीं कह रहा हूं कि मत रखो! रखो! शौक से रखो! पर ज्यादा लम्बा मत रखना, नहीं तो तुम कहीं और पहुंच जाओगे। अच्छा कर्म करने का कोई व्रत नहीं रखता कि आज ये नहीं कि ‘‘आज के दिन मैं जो कुछ भी करूंगा, अच्छा करूंगा! ये कोई नहीं करता। आज के दिन मैं अपनी पत्नी से अच्छा व्यवहार करूंगा।’’ ये व्रत रखना है, ये रख के देखो! और पत्नी कहे, ‘‘मैं आज के दिन पति से अच्छा व्यवहार करूंगी।’’ और माता-पिता कहें, ‘‘आज हम अपने बच्चों से अच्छा व्यवहार करेंगे!’’ और बड़े-बड़े लीडर, ‘‘आज हम अपने देशवासियों से अच्छा व्यवहार करेंगे।’’ देशवासी — ‘‘आज हम पुलिस से अच्छा व्यवहार करेंगे। आज हम एक-दूसरे से अच्छा व्यवहार करेंगे।’’

एक दिन तो होगा नहीं तुमसे। एक घंटे से चालू करो कि अगले एक घंटे में — और पड़ोसी से नहीं, सिर्फ अपने परिवार में। देखो, क्या असर होता है! अब एक घंटे काम किया तो फिर दो घंटे कर लेना। दो घंटे काम किया तो तीन कर लेना। फिर चार, फिर पांच!

देखो! जब तुम गुस्सा होते हो तो तुम्हारे शरीर को हानि होती है। और जब तुम प्रसन्न होते हो तो तुम्हारे शरीर को कोई हानि नहीं होती है। इसका मतलब समझे ? पहले प्रश्न तो ये होना चाहिए कि क्या तुम अपने शरीर को हानि पहुंचाना चाहते हो ? हां या नहीं ?

{श्रोतागण} — नहीं।

नहीं ? ऐं ? नहीं ? नहीं!

तो अगर शरीर को हानि नहीं पहुंचाना चाहते हो तो इसका क्या मतलब हुआ ? प्रसन्न रहना अच्छा है। नहीं ? बजाय नाराजगी करने के। नफरत करोगे, तुम्हारे शरीर को हानि पहुंचेगी। प्यार करोगे, तुम्हारे शरीर को हानि नहीं पहुंचेगी। तो इसका मतलब क्या हुआ ? अभी भी तुम्हारा कम्प्यूट करने की जरूरत है इसको!

प्यार करना तुम्हारा स्वभाव है। इसलिए तुमको हानि नहीं पहुंचेगी। नफरत करना तुम्हारा स्वभाव नहीं है, इससे तुमको हानि पहुंचेगी। जो तुम करोगे, जो तुम्हारे स्वभाव में नहीं है, उससे तुमको हानि पहुंचेगी। अज्ञानता में रहोगे, तुमको हानि पहुंचेगी। ज्ञान में रहोगे, तुमको हानि नहीं पहुंचेगी। आनंद में रहोगे, तुमको कोई हानि नहीं पहुंचेगी। क्योंकि ये तुम्हारा स्वभाव है। तुमको बनाया ही इसलिए गया है।

अनुभव करो! मालूम करो! जानो! अपने जीवन की क़दर जानो! अपने जीवन के अंदर क्या संभावना है, इसको जानो! सीखो!

लॉकडाउन 53 00:24:13 लॉकडाउन 53 Video Duration : 00:24:13 पीस एजुकेशन प्रोग्राम की ओर अग्रसर (17 मई, 2020)

प्रेम रावत:

We came here to talk about peace.

पीस, शांति कोई किसी देश, किसी कल्चर, किसी धर्म की exclusive नहीं है। ये सारे विश्व को चाहिए। इसकी जरूरत सारे विश्व को है। शांति के बारे में अगर बात करें तो दो-तीन प्रश्न पहले उठते हैं। एक, तो यह कि शांति के बारे में तो बहुत समय से सुनते आ रहे हैं। मतलब, मैं दो साल, तीन साल की बात नहीं कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं हजारों सालों की। हजारों सालों की! और अगर शांति की परिभाषा आगे रखी जाए तो ये तो सबको चाहिए! किसी भी धर्म का हो, कोई भी हो, सबको यह बात पसंद है कि शांति होनी चाहिए। 

प्रश्न ये उठता है कि ‘‘हो क्यों नहीं रही है ?’’ बजाय इसके कि हम शांति के और करीब जाएं, हम शांति से और दूर जा रहे हैं। लड़ाइयां हो रही हैं और सभी लोग बैठे-बैठे तमाशा देख रहे हैं, क्या हो रहा है ? बड़े-बड़े भाषण होते हैं शांति के ऊपर, पर शांति का कहीं नामो-निशान ही नहीं है। क्यों ? क्यों ? आखिर शांति है क्या ? अगर लड़ाइयां बंद हो जाएं तो शांति हो जाएगी ? तो समय तो ऐसा पहले भी रहा है, जब लड़ाइयां नहीं हो रही थीं। तो जब लड़ाइयां नहीं हो रही थीं, तो शांति थी ? अगर शांति थी, तो फिर लड़ाइयां क्यों चालू हो गईं दुबारा ? शांति तो लड़ाइयों को जन्म दे नहीं सकती! तो शांति है क्या ? 

हम सबके दिमाग में एक विचार है और वो विचार है — यूटोपिया का। अब आप समझते हैं यूटोपिया ? एक ऐसा हमने दृश्य बना रखा है अपने दिमाग में कि ऐसा समय आएगा, कुछ ऐसा होगा कि न ज्यादा गर्मी होगी, न ज्यादा ठंडी होगी। न कोई भूखा होगा, न कोई प्यासा होगा। न कोई चोर होगा, न कोई चोरी होगी। सब लोग, जितने दुनिया के लोग हैं, सब आपस में मिलजुल के रहेंगे। 

पर यूटोपिया की परिभाषा क्या है ? यूटोपिया का मतलब क्या है ? असली मतलब क्या है यूटोपिया का ? क्या आप जानते हैं ? 

यूटोपिया का असली मतलब है — ये ग्रीक से हुआ। और जो उसके दो पहले शब्द हैं, उनका मतलब है — नॉट! नहीं! नहीं! और टोपिया आया — टोपोग्राफी से! टोपोग्राफी का मतलब हुआ — कोई जगह! तो जिसने इस शब्द को coin किया, phrase किया, उसका ये कहना है कि कोई ऐसी जगह नहीं है और हम उसी चित्र को लेकर के बैठ गए। अगर हम देखें कि हो क्या रहा है ? दूर से देखेंगे — एक दूसरा दृश्य नजर आएगा। नजदीक से देखेंगे — एक दूसरा दृश्य नजर आएगा। नजदीक से देखेंगे, आपको कौन लड़ता हुआ मिलेगा ? दूर से देखेंगे तो हो सकता है, सिर्फ धुआं दिखाई दे! लड़ाई का धुआं दिखाई दे। नजदीक से देखेंगे तो आप देखेंगे कि लोग लड़ रहे हैं। लोग लड़ रहे हैं। धुआं लड़ाई नहीं पैदा करता, घर लड़ाई नहीं पैदा करते, लोग लड़ाई पैदा करते हैं। और लोगों को चाहिए शांति! अगर कहीं परिवर्तन आना है तो लोगों में आना है। 

अब मैं आपको दूसरी दिशा में ले जाता हूं। आपने microscope का नाम तो सुना होगा। Magnifying glass का नाम सुना होगा। उससे हम नजदीक से देख सकते हैं, उस चीज को बड़े रूप में देख सकते हैं नजदीक से और मालूम कर सकते हैं कि ये असली में क्या है ? तो कहां ले जा रहा हूं मैं आपको कि — 

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवे हांसी। 

आतमज्ञान — सेल्फ नॉलेज! Without knowing yourself! 

आतमज्ञान बिना नर भटके — सॉक्रटीज़ भी कहता है क्या ? ‘‘know thyself’’ यहां भी कहा जा रहा है — 

आतमज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी। 

कहीं भी चले जाओ। 

मृग नाभि में है कस्तूरी, बन बन फिरै उदासी।। 

मोहे सुन सुन आवे हांसी।। 

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।। 

सुना ? हां! 

जानते हो क्या है ? 

हां! हमारे अंदर है। और फिर लड़ाई-झगड़े के लिए चल दिए। फिर लड़ाई-झगड़े के लिए चल दिए! फिर झगड़ा हो रहा है। झगड़ा कहां हो रहा है ? बाहर से, बाहर झगड़ा तो बाद में होता है भाई! झगड़ा पहले तुम्हारे अंदर हो रहा है। तो समझने की बात है कि वो शांति, शांति का स्रोत भी हमारे अंदर है। 

हृदय के बारे में तो आपने सुना होगा, पर हृदय होता क्या है ? जो भी आपमें अच्छाई है, आप जानते हैं कि आपमें क्या-क्या चीज अच्छी नहीं हैं। आप जानते हैं कि आपमें क्रोध है। क्रोध बाहर से नहीं आता है। क्रोध आपके अंदर से आता है और जहां आप जाते हैं, आपका क्रोध आपके साथ जाता है। आपका संशय भी आपके साथ जाता है। परंतु जैसे सिक्के का एक side नहीं हो सकता। एक तरफ अंधेरा है तो दूसरी तरफ उजाला है। एक तरफ अगर doubt है तो दूसरी तरफ clarity है। एक तरफ अगर anger है तो दूसरी तरफ compassion है। इन सारे attributes को आप जानते हैं ये आपके अंदर है। जब आपको कहीं गुस्सा होना पड़ता है तो ये थोड़े ही है कि वो एस.एम.एस. के रूप में आपके फोन में आता है ? नहीं! वो तो आपके अंदर है! कहींभी। पर क्या आप जानते हैं कि उसके दूसरी तरफ क्या है ? उस गुस्से के दूसरी तरफ compassion है। पर हम अपने जीवन में इस बात पर कभी ध्यान नहीं देते हैं। 

है घट में पर दूर बतावें — हा, हा! 

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निराशी। 

इसीलिए सारा संसार निराश होता है — दूर की बात निराशी।। 

कहे कबीर — गुरु के बिना — 

कहे कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।।

तो शुरू से अगर लिया जाए इसको तो कहा जा रहा है कि जिस चीज की हमको तलाश है, वो हमारे अंदर है। पर आज मनुष्य के ऊपर focus नहीं है, सोसाइटी के ऊपर focus है। सोसाइटी को बदलना चाहिए। सोसाइटी की वजह से गड़बड़ हो रही है। सोसाइटी की वजह से ये हो रहा है। गवर्नमेंट्स को बदलना चाहिए, गवर्नमेंट्स को बदलना चाहिए। गवर्नमेंट्स को बदलना चाहिए। लीडर्स को बदलना चाहिए। पर लीडर हैं कौन ? वो भी मनुष्य हैं। सोसाइटी के सदस्य हैं कौन ? वो भी मनुष्य हैं। तो बात सोसाइटी की हो रही है, मनुष्य की नहीं हो रही है। change गवर्नमेंट की हो रही है, मनुष्य की नहीं हो रही है। मनुष्य को बदलने में कोई interested ही नहीं है।

देखिए! लगभग दो हजार कुछ साल पहले इस भारतवर्ष पर एक लड़ाई हुई थी, जिस लड़ाई का नाम था महाभारत! हुई थी, नहीं हुई थी, पर उसका वर्णन जरूर है। और क्या हुआ था उस लड़ाई के अंदर ? क्या हुआ था उस लड़ाई के अंदर ? किस बारे में थी वो लड़ाई ? कहां —हजारों कहानियां हैं — किस बारे में थी! छोड़िए कहानियों को। पर मूल में क्या है ? क्या चीज थी ? जब मनुष्य के — मनुष्य, मनुष्य के विपरीत हो गया तो वो लड़ाई हुई। जब मनुष्य, मनुष्य के विपरीत हो गया, तब वो लड़ाई हुई। कारण बड़े बन गए, खून बहना कम हो गया। खून का महत्व कम हो गया, मनुष्यों की जिंदगी का महत्व कम हो गया और जो कारण थे, उनका महत्व ज्यादा हो गया। दो हजार कुछ साल पहले। 

और आज ? मनुष्य का महत्व कम हो गया, खून का महत्व कम हो गया — बिल्कुल वही हाल है। और कारणों का महत्व ज्यादा हो गया। और महाभारत हो रही है। पर सबसे बड़ी महाभारत होती कहां है ? 

सबसे बड़ी महाभारत बाहर नहीं होती है, वो तो सिर्फ 18 दिन की लड़ाई थी। वो तो थी जो लड़ाई, वो अलग बात है, परंतु यहां ये लड़ाई होती है — पच्चीस हजार, पांच सौ पचास दिन। अगर आपकी उम्र 70 साल की — 70 साल आप जीएंगे तो उसका calculate कर लीजिए! कितने दिन आपको जीना है! ये लड़ाई चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है और बहुत खूंखार रूप ले लेती है। 

तो मेरा कहने का मतलब यह है सार में कि अगर किसी भी चीज को बदलना है तो, उसके लिए आपको मनुष्य को भी देखना पड़ेगा। ईंटों की संख्या से बिल्डिंग की मजबूती नहीं आती है। ईटों की मजबूती से बिल्डिंग की मजबूती आती है। संख्या से नहीं। इसी प्रकार — in the same way — हर एक व्यक्ति की मजबूती से शांति स्थापित हो सकती है। जो बिल्डिंग हम लोग, सभी लोग, इस दुनिया के सभी लोग, जो बिल्डिंग बनाना चाहते हैं, उसकी मजबूती depend करेगी हर एक individual पर, हर एक व्यक्ति पर, जो उस बिल्डिंग की ईंट होगी, जो उस बिल्डिंग की बुनियाद होगी। न कि उस बिल्डिंग की ऊंचाई होगी। कितना भी उसको ऊंचा बनाना है, पर ईंट को उतना ही मजबूत होना चाहिए। ये मेरा कहना है। 

मेरी कोई philosophy नहीं है। मैं मनुष्य हूं। मुझे भी अपने जीवन के अंदर शांति की जरूरत है। जैसे आपको जरूरत है, मेरे को भी जरूरत है। मैं वो मृग नहीं बनना चाहता, जो जंगलों में भागता रहता है और जो चीज उसके अंदर है, वही उसको मालूम नहीं है। क्योंकि जिस चीज की मेरे को तलाश है, उसी चीज की आपको भी तलाश है। जिस चीज को मेरा हृदय चाहता है, उसी चीज को आपका हृदय चाहता है। हृदय वो जगह है, जहां मेरी अच्छाई बसती है। हृदय वो जगह है, जहां मेरी वो कस्तूरी बसती है। हृदय वो चीज है, जहां मेरे जीवन के अंदर प्रकाश बसता है, अंधेरा नहीं। जहां ज्ञान बसता है, अज्ञान नहीं। जहां करुणा बसती है, खौफ नहीं। उस जगह को मैं हृदय कहता हूं। वह सबके अंदर है। 

देखिए! आपकी आंख हैं। इन आंखों से आप सबकी आंखें देख सकते हैं, पर अपनी आंख नहीं देख सकते हैं। उसके लिए आपको आईने की जरूरत है। अपनी आंखें देखने के लिए आपको आइने की जरूरत है, दूसरे लोगों की आंखें देखने के लिए आपको आइने की जरूरत नहीं है। 

तो समझने की बात है कि अगर मैं अपने आपको देख सकूं तो मुझे क्या दिखाई देगा उस आईने में ? मेरी अच्छाई ? अरे! कम से कम अगर दोनों चीजें दिखाई दे जाएं मेरे को कि मेरी अच्छाई भी है, मेरे में बुराई भी है। तो मैं कम से कम चूज़ तो कर सकता हूं अपनी अच्छाई ? पर जब मेरे को मालूम ही नहीं है कि वो क्या है — अगर — अब मैं आखिरी बात कहूंगा कि अगर इस दुनिया के अंदर कोई hope है, आशा है — क्योंकि कई लोग यहां बैठे हुए हैं और मैं अच्छी तरीके से जानता हूं कि वो ये कहेंगे कि शांति कभी हो ही नहीं सकती। 

क्योंकि कई लोग मेरे से ये कहते हैं। ‘‘हो नहीं सकती, हो नहीं सकती!’’ 

आखिरी बात मैं ये कहना चाहूंगा कि यहां ऊपर आने से पहले हम लोगों ने — जो यहां पैनल बैठी है, उन्होंने ये दीया जलाया। आपने देखा होगा। जलाया। आपने कुछ ध्यान दिया, कैसे हुआ ये ? क्योंकि जब हम आए दीये के पास तो सारी जो बत्तियां हैं, वो बुझी हुई थीं। और दीप जलाने का ये मौका था। 

तो हुआ क्या ? 

तो ये एक मोमबत्ती लाए, जो जल रही थी। समझ रहे हैं, अब मैं कहां जा रहा हूं इसको लेकर कि एक जलती हुई मोमबत्ती में एक शक्ति है और उस मोमबत्ती में ये शक्ति है कि वो बुझी हुई बत्ती को जला सकती है। ये कानून प्रकृति का कानून है! और ये कानून हम सबको आशा देता है कि जलती हुई मोमबत्ती बुझी हुई मोमबत्ती को जला सकती है। बुझी हुई मोमबत्ती जलती हुई मोमबत्ती को बुझा नहीं सकती। कोशिश भी करेगी तो जलने लगेगी। नजदीक भी आएगी तो जलने लगेगी। क्योंकि ये कानून है और ये कानून कायम है। ये कानून आज भी कायम है। ये सब हम लोगों को आशा देता है कि जो बदलाव हम लाना चाहते हैं, जिस अंधेरे में हम प्रकाश लाना चाहते हैं, ये हो सकता है क्योंकि ये कानून है। अगर हम लोगों को उस मोमबत्ती की तरह जलाना शुरू करें तो एक मोमबत्ती बताइए, कितनी मोमबत्तियों को जला सकती है ? एक-एक का रेसियो नहीं है। एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी, चौथी के बाद — अब यहां कितनी बत्तियां हैं ? एक, दो, तीन, चार, पांच! एक ही मोमबत्ती ने पांचों को जला दिया। 

तो ये एक चीज है। इसे हम लोग समझें। इसको लेकर के आगे बढ़ें तो सचमुच में हम अपने जीवन के अंदर इस शांति को स्थापित कर सकते हैं। मैं ये मानता हूं। क्योंकि लोग चाहते हैं इस शांति को। ये ऐसी बात नहीं है कि ये फॉरेन आइडिया है। अगर हम ऊपर देखना बंद करें और अपनी तरफ देखना शुरू करें तो बहुत-कुछ परिवर्तन आ सकता है। जब मैंने ये prisons में देखा हुआ है, जब जेलों में देखा हुआ है, soldiers में देखा हुआ है, veterans में देखा हुआ है, hospice में देखा हुआ है, hospitals में देखा हुआ है — हर एक वर्ग में। Libraries में देखा हुआ है, schools में देखा हुआ है, universities में देखा हुआ है। तो लोग अपनी तरफ देखना शुरू करते हैं, बजाय ऊपर के। क्योंकि हर एक चीज ऊपर, ऊपर, ऊपर। ऊपर से आएगी। ऊपर से आएगी। ऊपर से नहीं आ रही है। नहीं आ रही है।

कितनी देर इंतजार करोगे ? आप बस का इंतजार करोगे। कितनी देर करोगे बस का इंतजार ? हैं जी ? आप कितनी देर करते हैं बस का इंतजार ? एक साल ? अगर आप बस अड्डे पर खड़े हुए हैं, बस नहीं आई तो एक साल इंतजार करेंगे ? चलिए, दो साल खड़े रहेंगे वहीं ? तीन साल ? चार साल ? पांच साल ? या मैं उल्टी तरफ जा रहा हूं ? 15 मिनट, 20 मिनट ? 20 मिनट में तो उतावले हो ही जाएंगे आप! आधा घंटा ? पैंतालिस मिनट ? और मनुष्य कितनी साल से इंतजार कर रहा है कि कोई आएगा, फिर सबकुछ बदलेगा। 

जब बदलने की शक्ति हम सबको मिली हुई है! और बदलना क्या है ? बदलना क्या है ? बदलना कुछ नहीं है! जो अच्छाई है, उसको उभरना है। कहां से चालू होगा ये ? आप अपने घर से चालू कीजिए। आप अपने परिवार से चालू कीजिए। आपको बाहर जाकर भाषण देने की जरूरत नहीं है, अपने घर से चालू कर लीजिए। वहां सबेरे-सबेरे जब आप उठते हैं, आपका बेटा या आपकी बेटी, जो सबेरे-सबेरे आपको देखने के लिए मिलती है तो क्या कहते हैं उनको ? 

‘‘तू लेट हो गई! तू लेट हो गई! जल्दी तैयार हो, तेरी बस आ गई है!’’ 

ये कोई मिलने का तरीका है ? कितने दोस्त बचेंगे आपके, अगर इस तरीके से मिलने लगे, ‘‘तू लेट हो गया! तू लेट हो गया!’’ 

दुनिया को तो गुड-मॉर्निंग कहने के लिए तैयार हैं और जिनसे प्रेम करते हैं, उनका नाम ही नहीं है। ऐसी हालत में क्या बदला जाएगा ? धीरे-धीरे ये सारी चीजें — यूटोपिया नहीं, असली शांति की बात कर रहा हूं मैं, तब स्थापित होगी। जब हम इस चीज को समझेंगे कि एक जलती हुई मोमबत्ती, एक बुझी हुई बत्ती को जला सकती है। 

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