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बुद्ध का कटोरा 00:03:34 बुद्ध का कटोरा Video Duration : 00:03:34 "यदि हम इस उपहार को स्वीकार न करें, तो यह हमारा नहीं है। यह सिर्फ वहाँ निहित है,...

टॉम प्राइस : (होस्ट)
और यह है — मेरा आपसे सवाल। और फिर हम आपके सवाल पर जाएंगे; आप बिलकुल भी चिंता न कीजिये। मेरे लिए कमाल का मौका है, कमाल का प्रेम जी से सवाल पूछने का।

तोहफा खोलने वाला उदाहरण कमाल का है। पर एक बार अगर आपने ये तोहफा खोल लिया, “आप इस तोहफे को दोबारा बंद होने से कैसे रोकेंगे, कैसे रोकेंगे!”

प्रेम रावत जी :

अब यह अहम सवाल है। बस इतने समय में क्या आपने सोचा कि तोहफा खुद नहीं खुला होगा, आपने इसे खोला है। तो बस आप ही हैं जो इसे बंद करके वापस रख सकते हैं। हां बिल्कुल, आप ऐसा कभी भी कर सकते हैं। तो एक तोहफा, तो तोहफा ही है जब आप स्वीकार नहीं करते, यह तोहफा नहीं है।

एक कहानी है मतलब कि इस उदाहरण से पहले भी कुछ आता है पर मैं अपनी बात बताता हूं एक समय भगवान बुद्ध अपने एक शिष्य के साथ जा रहे थे। उस शहर में सब बुद्ध को बुरा कह रहे थे। कहते हैं, "आप अच्छे नहीं हैं, आप ये नहीं करते, आप वो नहीं करते और ये सब।"

तो उनके शिष्य ने कहा, " बुद्ध, यह आपको परेशान नहीं करता इतने सारे लोग आपके बारे में बुरा बोल रहे हैं, बोलते जा रहे हैं!"

तो जब बुद्ध वापिस आये उन्होंने एक कटोरा लिया और उनका शिष्य वहीं बैठा था। उन्होनें एक कटोरा लिया और सरका दिया और फिर पूछा "यह किसका है ?" और उनके शिष्य ने कहा, "यह आपका है।" फिर बुद्ध ने थोड़ा और सरकाया और पूछा "यह अब किसका है ?"

शिष्य ने कहा "यह अब भी आपका है।"

वह ऐसा करते रहे और पूछते गए कि "यह किसका है; यह किसका है!" और शिष्य कहता रहा "यह आपका है; यह आपका है।" फिर उन्होंने कटोरा लिया और शिष्य की गोद में रख दिया और फिर पूछा कि "अब किसका है ?"

उसने कहा "यह अब भी आपका है।"

उन्होंने कहा "बिल्कुल सही।" अगर मैं बुराई को नहीं मानता तो वो मेरी नहीं है और यह वही बात है अगर हम इस तोहफे को नहीं अपनाते, यह हमारा नहीं है। यह बस पड़ा रहेगा ऐसे ही। हम इस दुनिया में आते हैं और एक दिन हमें यहां से जाना है और फिर हम सोचते हैं और यह बहुत ज्यादा लोगों के साथ होता रहता है। बस आखिरी क्षण में वह कहते हैं कि "मैंने अब तक क्या किया ?"

फिर भी सब सुलझाने का समय होता ही नहीं है जैसा कि आप करना चाहते थे कि वो हो। लेकिन अभी वह समय है अभी आप जीवित हैं और आप वो सब कर सकते हैं या जीवन बर्बाद कर सकते हैं। और बात यह है जीवन वापस लौट कर आपसे यह नहीं कहेगा कि आप बर्बाद कर रहे हैं। ऐसा होता तो अच्छा होता। जानते हैं ना, पर ऐसा नहीं होता। और इसकी एक और खूबसूरती है कि जब भी आप तोहफे को स्वीकारने का सोचते हैं, यह उसी समय आपका बन जाता है। तो ज्यादा देर नहीं हुई है फ़र्क़ नहीं पड़ता। अगर आप खुद से कहते हैं कि "अच्छा अब तो मैं 84 का हूं मेरे लिए बहुत देर हो चुकी है।"

जी नहीं! देर नहीं हुई है और ये आप कहते हैं कि "अच्छा, मैं तो बहुत छोटा हूं।"

नहीं, आप छोटे नहीं हैं,आप बड़े नहीं है बस जिस दिन आप स्वीकारते हैं वह आपका है।

चाहत किसकी (ऑडियो) 00:09:09 चाहत किसकी (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:09 अगर तुम जीना सीखना चाहते हो तो प्रेम को गले लगाना सीखो, नफरत को नहीं।

प्रेम रावत: 

मनुष्य के लिए सुख की कोई सीमा नहीं है, दुःख इतना भी, उसको परेशान कर देता है। हर एक चीज के अंदर, हर एक चीज के अंदर सुख भी है, दुःख भी है। 

तुम्हारे जीवन में सबकुछ है। तुम्हारे जीवन में सबकुछ भी है और कुछ भी नहीं है। दोनों ही हैं। तुम जब अपने कमरे में जाते हो और कुण्डी बंद करते हो अपने दरवाजे में — आज के बाद याद रखना, तुम अकेले नहीं हो उस कमरे में। कितने हैं उस कमरे में भरे हुए! तुम भी हो, अविनाशी भी है, जीवन भी है और मृत्यु भी है। उस कमरे में सब हैं — ज्ञान भी है, अज्ञान भी है, अंधेरा भी है, उजाला भी है। 

अगर उस कमरे को बंद कर दो तुम और सौ ताले लगा दो दरवाजे पर और जैसे ही तुम लाइट बंद करोगे, क्या होगा ? अंधेरा हो जायेगा। नहीं ? कहां से आया अंधेरा ? जब दरवाजा पहले से ही बंद था तो आया कहां से अंधेरा ? क्योंकि वो तुम्हारे दरवाजे बंद करने से पहले ही से अंदर आ रखा था, तुम्हारे साथ ही आया। धर्म भी तुम्हारे साथ है, अधर्म भी तुम्हारे साथ है। सारी चीजें — जहां तुम जाते हो, सब हैं। फ़र्क इतना है, फ़र्क इतना है कि अगर तुम जानते हो कि ये सब साथ हैं तो उसको अपने सीने से लगाओ, जिसको तुम चाहते हो। प्रेम भी तुम्हारे साथ आया है और नफरत भी तुम्हारे साथ आई है। नफरत को तो तुम गले लगाना जानते हो। जानते हो कि नहीं ? नफरत करने में तुमको कितनी देर लगती है ? कितनी देर लगती है ? {चुटकी बजाने जितना समय} परंतु प्रेम को गले लगाना अभी सीखा नहीं। 

मक्खन है, पर ऐसे नहीं निकलेगा। घंटे-घंटे बैठे रहो, करते रहो, करते रहो, करते रहो, करते रहो...। ऐसे नहीं निकलेगा। इसकी विधि चाहिए। 

अगर तुम जीना सीखना चाहते हो तो प्रेम को गले लगाना सीखो, नफरत को नहीं। ज्ञान को अपने पास बुलाना सीखो, अज्ञानता को नहीं। अभी तो ये सीखा है — अज्ञानता क्या है ? कैसे उसको नजदीक लाया जाये। अपने जीवन में अगर प्रकाश चाहते हो तो प्रकाश को कैसे निकाला जाये ? क्योंकि दोनों हैं! अंधेरा भी है और प्रकाश भी है। अपने जीवन में प्रकाश को लाना सीखो! 

आधे से ज्यादा तुम अपनी जिंदगी बदल सकते हो, तीन सेकेण्ड में। तीन सेकेण्ड में! तीन सेकेण्ड में ? सिर्फ तीन सेकेण्ड में। करने से पहले सोचो! सिर्फ तीन सेकेण्ड! क्या करने जा रहे हो ? बस! तीन सेकेण्ड! तीन सेकेण्ड! उसके बाद करो, जो तुमको करना है। पर तीन सेकेण्ड सोचो! क्योंकि गुस्सा भी तुम्हारे साथ है और क्षमा भी तुम्हारे साथ है। तीन सेकेण्ड में तुम चुन सकते हो — गुस्सा चाहिए या क्षमा ? क्षमा प्यार लाएगी। प्यार उजाला लाएगा। उजाला आनंद लाएगा। तीन सेकेण्ड में। और क्योंकि तुम करते पहले हो, सोचते बाद में हो, इसीलिए तुम्हारे जीवन में दुःख रहता है। 

है क्या ? ये संसार का स्वभाव है। 

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय। 

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।

तो तुम कितने बड़े घुन हो, जो बच जाओगे ? अरे! जब वो घुन — जब उसके जीवन के अंदर गेहूं की बोरी आती है। जब घुन कहीं चलते-चलते, चलते-चलते, चलते-चलते पूरी बोरी के पास पहुंचता है कि गेहूं ही गेहूं हैं उसके अंदर, जरा विचार करो, कितना उसको आनंद मिलता होगा। 

‘‘हे भगवान! तैंने मेरी सुन ली! इस बोरी में तो गेहूं ही गेहूं है! बैठ के खा-खाकर के मोटा हो जाऊंगा!’’ 

उसको क्या मालूम कि इस बोरी में जो गेहूं है, उसका आटा बनना है। उसको चक्की में डाला जाएगा और बच्चू! तू भी उस चक्की में पिसेगा! वो घुन क्या खोज रहा है अपने जीवन में ? गेहूं को खोज रहा है और गेहूं बिखरे हुए नहीं, सब एक ही पोटली में मिल गए उसको। इससे बड़ी चीज क्या हो सकती है, उसके लिए ? परंतु जो उसका ख्वाब होगा — छोटे-से घुन का ख्वाब! गेहूं मिल जाए। ऐसा मिल जाए, इधर-उधर भटकना न पड़े। वो सब उसको मिल गया। परंतु उसको ये नहीं पता कि चक्की में पीसना है। 

जो कुछ भी हम करते हैं, इसमें दोनों ही गुंजाइशें हैं — अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। अगर हम सोच के काम करेंगे, विचार के काम करेंगे, ये जानकर के काम करेंगे कि हमारी प्रकृति है भूलने की। ये हमारी प्रकृति है भूलने की और मेरे को कोशिश करनी है कि मैं भूलूं न। उस चीज को मैं नहीं भूलूं, जो मेरे लिए जरूरी है। अगर ये याद रहेगा, तुम्हारी जिंदगी के अंदर अपने आप परिवर्तन आएगा। अपने आप परिवर्तन आयेगा! 

क्यों ? 

जो कुछ भी तुम कर रहे हो, वो उस आनंद के लिए है, क्योंकि ये भी तुम्हारी प्रकृति है। तुम दुःख को नहीं सह सकते हो। याद है, यही मैं कह रहा था शुरुआत में ? तुम दुःख को नहीं सह सकते हो, परंतु सुख की सीमा तुम्हारे में है ही नहीं! अपार सुख तुम सह सकते हो! कोई ऐसे मंदिर में नहीं जाता है कि ‘‘हे भगवान! बहुत ज्यादा सुख दे दिया। अब थोड़ा कम कर दे!’’ मनुष्य के लिए सुख की कोई सीमा नहीं है, दुःख इतना भी, उसको परेशान कर देता है। हर एक चीज के अंदर, हर एक चीज के अंदर सुख भी है, दुःख भी है। पर तुमको — तुमको चुनना है, क्या तुमको चाहिए अपने जीवन में ? सुख चाहिए या दुःख चाहिए ? जिस दिन दुःख चाहिए, दुःख मौजूद है। जिस दिन सुख चाहिए, सुख भी मौजूद है।

क्या है असली जरूरत 00:02:54 क्या है असली जरूरत Video Duration : 00:02:54 मेरी असली जरूरत क्या है ? मेरा हृदय क्या मान रहा है, किस बात को जरूरत मानता है।

प्रेम रावत:

हम आज इस संसार को देखें तो जरूरतों के बल पर यह चल रहा है। भूख लगती है, खाना चाहिए। प्यास लगती है, पानी चाहिए। विश्राम चाहिए। नींद आती है, सोने की जगह चाहिए और इन कुछ जरूरतों को लेकर के सारे संसार के अंदर कितना बिज़नेस होता है।

ये जो दुनिया चल रही है आज, ये इसलिए चल रही है कि मनुष्य की कुछ जरूरतें हैं और उनको पूरा करना है। और जो संसार के अंदर लोग हैं जरूरतों को पूरा करने के लिए, हर दिन कुछ न कुछ करते रहते हैं, करते रहते हैं, करते रहते हैं, करते रहते हैं।

वो जरूरतें जो मनुष्य की निजी जरूरतें हैं, उनको पूरा करने के लिए मनुष्य कभी परेशान नहीं होता है। परंतु वो जरूरतें जो सोसायटी ने, जो इस दुनिया ने हमारे ऊपर डाल रखी हैं, थोप रखी हैं, उनको पूरा करने के लिए मनुष्य परेशान जरूर होता है।

भागता है, ये करता है, वो करता है।

जब तक मैं जीवित हूं, मेरी असली जरूरत क्या है ? नकली नहीं! इस संसार की दी हुई जरूरतें नहीं। मेरी असली जरूरत क्या है ? मेरा हृदय क्या मान रहा है, किस बात को जरूरत मानता है। मैं अपने जीवन में कम से कम जो यहां आया हूं, अपनी असली जरूरत को तो पूरा करके जाऊं। सारी जरूरतें मेरी कभी पूरी नहीं होंगी। तो जब सारी जरूरतों को पूरा नहीं कर पायेगा, तो कम से कम एक main जरूरत तो जरूर होगी जिसको पूरा कर सकता है

Text on screen:क्या है असली जरूरत ?

अच्छा बुरा 00:09:17 अच्छा बुरा Audio Duration : 00:09:17 हर एक व्यक्ति में 50 प्रतिशत अच्छाई है और 50 प्रतिशत बुराई है।

प्रेम रावत:

एक बार एक काफिला था, जो एक जगह था। तो एक दिन एक लड़का, एक बच्चा, जो काफिले का सरदार था, उसके पास आया और उसने अपने सरदार से कहा कि "सरदार! मेरा एक सवाल है।"

कहा, "क्या ?"

कहा, "मैं देखता हूं कि कुछ लोग — जो अच्छा महसूस करते हैं, जो अच्छे हैं, कई बार वो बुरा काम करते हैं, बुरी चीज करते हैं और वो लोग, जो बुरी चीज करते हैं, कई बार वो अच्छा करते हैं। जो लोग खुश रहते हैं, वो कई बार दुःखी हो जाते हैं और जो लोग दुःखी रहते हैं, फिर कई बार वो खुश हो जाते हैं। ऐसा क्यों है ?"

सरदार ने कहा, "हर एक मनुष्य के अंदर दो शेर हैं। एक अच्छा शेर है और एक बुरा शेर है। और दोनों शेर आपस में लड़ते हैं।"

उसने सोचा। सोच के वो बोलता है, "फिर क्यों लड़ते हैं ?"

कहा, "इसलिए लड़ते हैं कि तेरे पर काबू कर सकें।"

फिर सोचा उसने। कहा, "सरदार! जीतता कौन है ? कौन-सा शेर जीतेगा ? अंत में कौन-सा शेर जीतेगा ? अच्छा वाला या बुरे वाला ?"

सरदार ने कहा, "जिस शेर को तू खिलाएगा, वही जीतेगा।"

कहानी तुमको पसंद आयी ? बुरे शेर को खिलाओगे, वो जीतेगा। वो तुम पर काबू करेगा, तुम पर राज करेगा। अच्छे शेर को खिलाओगे, वो जीतेगा, वो तुम पर काबू करेगा, तुम पर राज करेगा। अच्छे वाला शेर अच्छा है, बुरे वाला शेर बुरा है।

समझे ? तो किस शेर को खिलाते हो तुम ?

बुरे वाले शेर को खिलाओगे, वही जीतेगा। तुमको गुस्सा करने में कितनी देर लगती है ? तुमको निराश होने में कितनी देर लगती है ? क्या मतलब है इसका ? कौन-से शेर को खिला रहे हो ?

कई लोग तो ये समझते हैं, "हमें बुरे शेर को कुछ नहीं खिलाना चाहिए।"

तो वो किसी को कुछ नहीं खिला रहे हैं। अच्छे शेर को खिलाना जरूरी है! अगर अच्छा चाहते हो तुम अपने जीवन में तो अच्छे शेर को खिलाना जरूरी है! बुरे शेर से संबंध मत बनाओ! उससे न बात करो, न उसके पास जाओ, न उसको कहो कि ‘‘तू बुरा शेर है!’’ अच्छे शेर की देखभाल करो, उसको खिलाओ, हर समय उसको खिलाओ, ताकि वो बलवान हो!

तो अगर तुम यह महसूस करते हो कि तुम बड़ी आसानी से निराश हो जाते हो, अगर तुम यह महसूस करते हो कि बड़ी जल्दी से गुस्सा हो जाते हो, आशाएं टूट जाती हैं, अपने आपको तुम भ्रमित पाते हो, कभी यहां की सोचते हो, कभी वहां की सोचते हो, कभी — ये कैसा है, वो कैसा है ? इसका क्या उत्तर है ? ये ऐसा है, वो वैसा है — इन सब चीजों में लगते हो। इसका मतलब है कि तुम बुरे शेर को खिला रहे हो।

अच्छे शेर को खिलाओगे, तब वो कहेगा, "तेरे को इसकी क्या फिक्र है, उसकी क्या फिक्र है ? अगर तेरे को फिक्र करनी है तो इसकी फिक्र कर, जो तेरे अंदर आ रहा है, जा रहा है। जिसके न आने से तू कुछ भी नहीं कर पायेगा!"

अरे! विटामिन तो ठीक है — ये ऐसी विटामिन है कि इसके बिना एक दिन भी नहीं चलोगे तुम। एक दिन तो छोड़ो, तीन मिनट! तीन मिनट! और ये जब तक चल रहा है, इसकी तरफ तुम ध्यान नहीं देते हो और जब ये बंद होने लगता है, तब तुम्हारा ध्यान जायेगा। तो इसका मतलब है कि तुमने अपने सारे जीवन भर बुरे शेर को खिलाया। वो तुम्हारा बलवान है, वो तुमको खाएगा और उससे बड़ा नर्क हो नहीं सकता! जो आदमी स्वर्ग में बैठा-बैठा नहीं जानता है कि वह स्वर्ग में है, इससे बड़ा नर्क क्या हो सकता है ?

तो समझो! ध्यान देने से सबकुछ होगा। उस चीज को अपनाने से सबकुछ होगा। जो तुममें अच्छाई है, उसको उभरकर बाहर आने दो। जितना बाहर आएगी, उतना ही तुम्हारे जीवन के अंदर और सुंदरता आएगी। जो शांति है, उसको आने दो बाहर। अशांति को नहीं।

ये सारी चीजें तुममें हैं। तुममें बुराई भी है और तुममें अच्छाई भी है। और कितनी बुराई है और कितनी अच्छाई है ? हर एक व्यक्ति में, हर एक मनुष्य में 50 प्रतिशत अच्छाई है और 50 प्रतिशत बुराई है।

कोशिश करो! कोशिश करो इस शांति के लिए, इस आनंद के लिए, अपने जीवन को सफल बनाने के लिए। इसमें ज्यादा समय नहीं लगता। इसमें ज्यादा समय नहीं लगता। अच्छाई में रोशनी जब आती है, कितना समय लगता है और रोशनी जब जाती है तो अंधेरे को आने में कितना समय लगता है! रोशनी अंधेरे को हटाती है। ये तो दो बहनें हैं — एक तरफ रोशनी है और एक तरफ अंधेरा है। बस, फ़र्क इतना है कि ये एक-दूसरे को नहीं जानते। पर रहते बहुत नजदीक हैं। बहुत नजदीक हैं! जैसे ही रोशनी जाती है, तुरंत अंधेरा आता है। और जैसे ही — जब रोशनी चली जाती है, अंधेरा ही अंधेरा हो जाता है। बहुत नजदीक हैं एक दूसरे के पर एक दूसरे को नहीं जानते। क्योंकि अंधेरे ने कभी रोशनी को नहीं देखा, रोशनी ने कभी अंधेरे को नहीं देखा।

अच्छाई भी है, बुराई भी है। तुम्हारी अच्छाई, तुम्हारी बुराई को नहीं जानती और तुम्हारी बुराई तुम्हारी अच्छाई को नहीं जानती पर रहते ये एक ही में हैं। तुममें रहते हैं। हममें रहते हैं। और ये हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि मैं उस शांति तक पहुंच सकूं, जो मेरे अंदर अच्छाई है, उस तक मैं पहुंचूं, उसको मैं आगे बढ़ावा दूं और आनंद लो! क्योंकि इसका — इसका सारा सार यही है। सच्चिदानन्द! सत् ये है और जब मेरा चित्त इसमें लगेगा तो क्या मिलेगा ? आनंद मिलेगा। ये सारा — चक्कर ही सारा आनंद का है।

मैं कह रहा था न, दो मौज हैं। एक तो दुनिया की मौज है और एक अंदर की मौज है। अंदर की मौज करोगे तो अंदर की मौज में कितने भी तुम बुड्ढे हो जाओ, कोई अंतर नहीं आएगा।

बत्ती जलाओ, अंधेरा मिटाओ 00:01:51 बत्ती जलाओ, अंधेरा मिटाओ Video Duration : 00:01:51 जब प्रकाश होगा तो तुम देख पाओगे!

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मुझे तो आप बखूबी जानते ही होंगे! क्योंकि इस दुनिया में आज मैं ही तो हूं, जो अलग-अलग रूपों में छाया हूं।

सही पहचाना!

मैं आपका दिल अजीज़ अंधेरा हूं। आप से तो मेरा बहुत पुराना याराना है। आज संसार में जो अज्ञानता, भ्रष्टाचार, आतंकवाद फैला है ये मेरे ही तो अंग हैं। और इन सबसे जब आप अशांत होते हैं तब मेरा मकसद पूरा होता है।

वैसे आप मुझे दूर हटाने की कोशिश तो बहुत करते हैं लेकिन छोड़िए जनाब! आपकी सब मेहनत बेकार है, क्योंकि मैं इस कदर आपकी जिंदगी पर घर कर चुका हूं कि मुझे कोई नहीं हटा सकता। आज सारे संसार पर धीरे-धीरे मेरा कब्जा होता जा रहा है। आप मजबूर हैं मुझे बर्दाश्त करने के लिए। मैं ऐसे ही आपको अशांत करता रहूंगा क्योंकि आपके पास कोई तरीका नहीं है। मैं यूं ही आप पर हावी रहूंगा। मुझको कोई नहीं हटा सकता, कोई नहीं हटा सकता, कोई नहीं हटा सकता, कोई नहीं हटा सकता....!

प्रेम रावत:

बत्ती जलाओ, अंधेरा मिटाओ। जब प्रकाश होगा तो तुम देख पाओगे! जब तुम देख पाओगे तो तुम्हारे संशय अपने आप दूर होंगे।

उत्सव 00:01:19 उत्सव Video Duration : 00:01:19

कुछ लोगों को उत्सव मनाने के लिए पूरे साल इंतजार करना पड़ता है।

कुछ लोग हर दिन उत्सव मनाते हैं।

जीवन का उत्सव मनाओ। 

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