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बलवान कौन (ऑडियो) 00:09:28 बलवान कौन (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:28

प्रेम रावत:

एक आदमी था। बहुत मेहनत करता था, पत्थर का काम करता था। वो हर रोज अपने घर से चल के पहाड़ पर जाता था। एक बड़ा-सा टुकड़ा जो वह अपने घर तक ले जा सके, इतना बड़ा पत्थर का तोड़ता था, घर ले जाता था और उसको फिर छेनी से, हथौड़े से उसकी तरह-तरह की चीजें बनाता था — मूर्ति बनाता था, सिलबट्टा बनाता था — ये सारी चीजें बनाता था।

सारे दिन उसको काम करना पड़ता था। धूल उड़ती थी, पसीने का काम था, मेहनत का काम था। हर रोज, चाहे इतवार हो, चाहे शनिचर हो, चाहे शुक्र हो, कोई भी त्योहार हो, उसको तो जाना था। क्योंकि जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बनाकर के वो बाजार में बेचता था, उससे उसका पेट चलता था। अब उसको ऐसा लगता था हमेशा कि जो उसके साथ हो रहा है, वो ठीक नहीं है कि वह शक्तिशाली क्यों नहीं है ? वह इतना गरीब क्यों है ? शक्तिशाली होना चाहिए उसको ।

एक दिन वो सड़क से जा रहा था। एक बहुत बढ़िया आलीशान कोठी थी, वहां पार्टी हो रही थी। तो उसने रुककर के, दीवाल के ऊपर से देखा तो उस घर में — बहुत रईस आदमी का घर था वो। उसके नौकर-चाकर और उसमें उसके गेस्ट आ रखे थे, पार्टी हो रही थी। सब बढ़िया चल रहा था। लोग उसको बधाई दे रहे थे। उसको लगा कि ‘मेरे को तो ये चाहिए!’

तो वो भगवान की तरफ उसने चेहरा किया, ‘‘हे भगवान! मेरे को ऐसा क्यों नहीं बनाया ? ऐसा बना दे!’’

उस दिन भगवान अच्छे मूड में थे। देख रहे थे नीचे की तरफ, उसकी तरफ! चुटकी बजाई और वो रईस बन गया। अब रईस बन गया, उसके नौकर-चाकर सब ‘‘जी हुजूर! जी हुजूर! जी हुजूर!’’ और उसके दोस्त आ रहे हैं, उससे मिलना चाहते हैं। बड़ा ही वो ‘जरूरी आदमी’ बन गया। उसको अच्छा लगा कि ‘‘हां! ये है न जिंदगी! वो पत्थर वाली जिंदगी नहीं, जहां हर रोज पत्थर घसीटना पड़ता है। हर रोज काम करना पड़ता है। अब मेरी कितनी इज्जत है। मैं कितना शक्तिमान हूं।’’

ऐसे-ऐसे करके कुछ दिन निकल गए। तो एक दिन काफी आवाज आ रही थी सड़क से तो उसने जाकर देखा तो वहां सब — सारे शहर के अमीर लोग वहां खड़े हुए और जो आ रहा है, जैसे ही जैसे उसकी सवारी आए, सभी लोग उसके सामने झुक रहे हैं।

उसने पूछा किसी से कि ‘‘ये कौन है, जो मेरे से भी ज्यादा शक्तिशाली है ?’’

तो कहा ‘‘ये राजा है।’’

‘‘राजा तो मेरे से भी शक्तिशाली है! हे भगवान! मुझे राजा बना दे!’’

उस दिन भी भगवान अच्छे मूड में थे और उसकी तरफ देखा, चुटकी बजाई और वो राजा बन गया। अब राजा बन गया तो उसको लगा कि ‘‘यह तो बहुत ही बढ़िया है! अब यहां तो सभी लोग मेरे को — मेरे सामने झुकते हैं। कितनी मेरी शान है!’’

ऐसे करते-करते कुछ दिन बीते तो एक दिन वो सबेरे-सबेरे उठकर के अपने बरांडे में, बाहर खड़ा-खड़ा चाय पी रहा था और उसने देखा कि इतना बड़ा सूरज उगने लगा, उदय होने लगा। और जैसे सूरज उदय होने लगा, सारी चिड़ियां, सारे जानवर जगने लगे, लोग उठने लगे। सबकुछ होने लगा।

उसने कहा, ‘‘बाप रे बाप! ये सूरज कितना बलवान है! ये तो मेरे से भी ज्यादा बलवान है। इसके उदय होने से सारी पृथ्वी जागने लगी है। हे भगवान! मेरे को सूरज बना दो!’’

उस दिन भी भगवान कुछ अच्छे मूड में थे, सूरज बना दिया। अब वो जहां जाए, चमके और लोग उसकी तरफ देखें और सारी सृष्टि, सारी चिड़िया, सारे जानवर — जब वो उदय हो, तब वो चलने लगें। लोग उठने लगें। ‘‘यह तो बहुत ही बढ़िया है!’’

एक दिन वो आकाश में चमक रहा था। चमक रहा था। जहां देखो, चमक रहा था। देखा उसने पृथ्वी पर एक जगह थी, जहां वो चमक नहीं पा रहा था। पता नहीं क्या है ये ? मेरी चमक वहां तक क्यों नहीं पहुंच रही है ? तो उसने देखा, एक बादल! अब वो जितनी कोशिश करे उस बादल से चमकने की, वो चमका ही नहीं, उसकी रोशनी पृथ्वी तक पहुंचे ही नहीं।

‘‘ये बादल तो सूरज से भी बलवान है! ये तो सूरज को भी रोक देता है! हे भगवान! मुझे बादल बना दे!’’

अब वो बादल बन गया। और जहां सूरज चमक रहा है, वहां वो आए और सूरज की रोशनी को रोक दे। ऐसा करते-करते, करते-करते उसको लगा कि, ‘‘मैं कितना बलवान हो गया हूं!’’

एक दिन वो अपने बलवानपने पर खूब सोच रहा था, उसके बारे में खुश हो रहा था कि उसने देखा कि वो चल रहा है। एक जगह नहीं है। चल रहा है वो! ‘‘बादल को कौन चला रहा है ? बादल को कौन चला रहा है ? मैं तो सबसे शक्तिमान हूं! मैं तो सूरज से शक्तिमान हूं। जो राजा से शक्तिमान है, जो साहूकार से शक्तिमान है। कौन ऐसी चीज है, जो इस बादल को चला रही है ?’’

उसने देखा, तो हवा! हवा उस बादल को चला रही है। ‘‘हवा मेरे से भी शक्तिमान है ? हवा तो मेरे से भी ज्यादा शक्तिमान है! मैं बादल हूं। बादल सूरज से भी ज्यादा शक्तिमान है। सूरज राजा से भी ज्यादा शक्तिमान है। और राजा साहूकार से ज्यादा शक्तिमान है। और ये हवा तो मेरे से भी ज्यादा शक्तिमान है। हे भगवान! मेरे को हवा बना दे!’’

हवा बन गया वो। जहां जाए, जहां जाए, बहे। सारी टहनियां उसके आगे हिलें, धूल चले, सबकुछ हो रहा है। जा रहा है, जा रहा है, बह रहा है। कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है। बह रहा है, बह रहा है। खूब गति से बह रहा है। बादलों को इधर से उधर कर रहा है। सबकुछ कर रहा है। चल रहा है, चल रहा है। एक दिन आकर के धड़ाक — रुक गया!

‘‘हवा को किसने रोक दिया ? हवा, जो बादल से ज्यादा बलवान है। बादल, जो सूरज से ज्यादा बलवान है। सूरज, जो राजा से ज्यादा बलवान है। राजा, जो साहूकार से ज्यादा बलवान है। किस चीज ने रोक दिया ? देखा तो पहाड़! अब जितनी भी कोशिश करना चाहे हवा पहाड़ के पार नहीं हो सकती।’’

‘‘हे भगवान! मेरे को पहाड़ बना दे!’’ {चुटकी बजाई} पहाड़ बन गया।

सचमुच में सबसे बलवान! खड़ा-खड़ा वहां, ‘‘मैं अब सबसे बलवान हूं!’’

एक दिन वह अपनी शक्ति पर खूब गौर कर रहा था। नीचे से एक आवाज आयी और उसको लगा कि कोई इस पहाड़ को काटने में लगा हुआ है। उसने कहा, ‘‘इस पहाड़ से कौन बलवान हो सकता है ? ज्यादा बलवान, जो पहाड़ को काट रहा है ? क्योंकि पहाड़ हवा से ज्यादा बलवान है। हवा बादल से ज्यादा बलवान है। बादल सूरज से ज्यादा बलवान है। सूरज राजा से ज्यादा बलवान है। राजा साहूकार से ज्यादा बलवान है। पहाड़ तो सबसे बलवान है। फिर उसको कौन काट रहा है ? इससे बलवान कौन हो सकता है ?’’

नीचे देखा तो उसी की तरह एक पत्थर को काटने वाला — उसी की तरह एक पत्थर को काटने वाला उस पहाड़ को काट रहा था। तो सबसे बलवान तो वो पहले से ही था पर उसको नहीं मालूम था कि वो बलवान है। पर वो था। ठीक उसी प्रकार से, तुम्हारे जीवन में सब आशीर्वाद हैं।

उन्नति 00:01:54 उन्नति Video Duration : 00:01:54 जो जीवन मिला है, किस तरीके से हम इसको पूरा करें, किस तरीके से इसको सफल करें।

प्रेम रावत

हम यह सोचें कि हमको यह जो जीवन मिला है, ये किस तरीके से हम इसको पूरा कर सकें, किस तरीके से इसको सफल कर सकें।

परंतु इस बारे में ज्यादा लोग नहीं सोचते हैं। सोचते ये हैं लोग कि हमारी उन्नति कैसे हो ? जब उन्नति पहले से ही हो रखी है पर समझ नहीं पा रहे हैं, देख नहीं पा रहे हैं, जान नहीं पा रहे हैं, तो उन्नति होगी कैसे?

भगवान से आशीर्वाद मांगते हैं लोग, पर भगवान ने जो आशीर्वाद पहले से ही दिया है, उसको स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं है, तो फिर आशीर्वाद का फल क्या होगा ? क्योंकि आनंद चाहिए मनुष्य को। किसी भी रूप में उसको आनंद चाहिए। परंतु अगर उसके जीवन के अंदर सबकुछ है, और आनंद नहीं है तो उसको यही लगेगा कि मेरी जिंदगी सूनी है। सूनी है!

सारी आशाओं का कुंआ, जब मनुष्य के अंदर पहले से ही है, तो यह कैसे संभव है कि मनुष्य निराश हो जाए? आदमी समझे, सोचे, देखे, अनुभव करे कि जिस चीज की उसको जरूरत है, जिस चीज की उसको प्यास है, जिस चीज की उसको चाह है सबकुछ उसके पास है। 

तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ? 00:12:29 तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ? Video Duration : 00:12:29 परेशानियों को हटाना संभव नहीं है, परंतु उनसे परेशान न होना संभव है!

Text on screen : आज के समय में समस्याओं का समाधान करके तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ?

प्रेम रावत:

हर एक मनुष्य के पीछे समस्या है, परंतु समझने की बात ये है कि हम चाहते हैं कि वो समस्याएं खतम हो जाएं। वो समस्याएं कभी खतम नहीं होंगी। समस्या, ये समझिए कि एक ऐसी मक्खी है कि आपके ऊपर है, आपने ऐसे किया, आपको छोड़ करके वो किसी और के — किसी और पर बैठ जाएगी। तो समस्याएं तो ऐसी हैं कि हम ही उनके victims हैं। मनुष्य को ही वो परेशान करती हैं और वो पता नहीं, कितने रूप में आती हैं, जाती हैं और इस पृथ्वी पर वो समस्याएं बनी रहती हैं। अर्थात् समस्या वही हैं, आदमी बदलते रहते हैं।

तो समस्याओं से दूर होने का क्या हल है? दूर या नजदीक — इनसे आप नहीं हो सकते। ये तो आपके पीछे लगेंगी। बात है आदमी के दृष्टिकोण की कि "क्या ये सचमुच में मेरी समस्या है या नहीं? मैं कौन हूं और ये समस्या क्या हैं?" कौन नहीं है — अब कई लोग हैं, जो कहते हैं कि "हमको ये रहता है कि ये काम समय पर करना है। ये काम हमको निभाना है।" अब बड़े से बड़े लोग और छोटे से छोटे लोग। एक बस स्टैण्ड पर खड़ा हुआ अपनी घड़ी को देख रहा है कि "मेरी बस लेट हो गयी। मैं काम देर से पहुंचूंगा।" उसको भी चिंता है। एक ऐसा, जो कि करोड़ों का contract साइन करने के लिए जा रहा है, वो भी अपनी घड़ी को देख रहा है कि "अगर मैं टाइम पर नहीं पहुंचा तो हो सकता है, ये contract साइन न हो सके।" चिंता तो वही है और सबको सता रही है। परंतु हम कभी इस बात को इस तरीके से नहीं देखते हैं कि एक दीवाल है इधर और मैं आपको कई बार इसका reference दूंगा क्योंकि ये सारी चीज को एक context में बांधती है।

एक तरफ वो दीवाल, जिससे हम होकर के आए, जब हमारा जन्म हुआ और एक वो दीवाल, जिसमें हम प्रवेश करेंगे और कहां जाएंगे, क्या होगा? हमको कुछ नहीं मालूम। तो एक जन्म है, एक मरण है और इसके बीच में सबकुछ है। आप चाहते क्या हैं? अब किसी को कोई समस्या है, उससे पूछा जाए, "आप क्या चाहते हैं?"

"अजी! मैं इस शंका से निवारण चाहता हूं। इस दुःख से निवारण चाहता हूं।"

आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि एक न एक दिन वो दुःख तो रहेगा नहीं। फिर आप क्या चाहते हैं? फिर क्या चाहते हैं? फिर दूसरी समस्या का निवारण चाहते हैं? तो आपको यह लगता है कि आपकी जिंदगी यहां से ले के यहां तक दुःखों से बचने के लिए है या और कुछ भी इसमें संभव है ? इसकी संभावना पूरी तरीके से आपने जानी या नहीं जानी? क्योंकि दुःख तो आएंगे — सुख भी आएगा, दुःख भी आएगा। और मैं तो लोगों से कहता हूं — अगर अब दुःखी समय चल रहा है, थोड़ी देर इंतजार करो, सुखी समय आ जाएगा। जब सुख हो जाएगा, थोड़ी देर इंतजार करो, फिर दुःख आ जाएगा। और फिर दुःख आएगा तो फिर थोड़ी देर इंतजार करो, फिर सुख आ जाएगा। तो ये होता रहता है, होता रहता है, होता रहता है, होता रहता है। परंतु जाना क्या, पहचाना क्या? किस चीज को समझे कि ये जिंदगी इन चिंताओं से मुक्त होने के लिए नहीं है।

कहा है —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास।

और जो चितवे नाम बिन, सोई काल की फांस।।

अगर किसी चीज की चिंता करनी है तो वो जो तुम्हारे अंदर जो आशीर्वाद तुमको मिला है कि —

      नर तन भव बारिधि कहुं बेरो।

      सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।।

क्या मैं उस आशीर्वाद का पूरा-पूरा फायदा उठा रहा हूं या नहीं ?

देखिए! जब कोई चीज बहुमूल्य हमको मिलती है — जैसे, अगर हम कहीं गए। ये उदाहरण है मेरा। खील है! किसी ने हाथ में खील रख दी। तो आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि खील बड़ी जल्दी से गिर भी जाती है, हल्की है। उसको आपने खाया, थोड़ी गिर गई, कोई बात नहीं। कपड़ों पर गिर गई — कई लोगों को तो मैंने देखा है कि वो ऐसे कर देंगे। हटा देंगे उसको। पर अगर आपके हाथ में उतने ही हीरे हों, आप उनको खाएंगे तो नहीं! पर अगर एक गिर गया तो आप उसको ऐसे कर देंगे? नहीं। जो चीज, जिसको हम बहुमूल्य समझते हैं, जिसको मूल्यवान समझते हैं, उसकी हम क़दर करते हैं। उसको व्यर्थ नहीं खोने देते।

      सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।

इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है।

वो तो हीरों से भी ज्यादा मूल्यवान है! वही कृपा है। हम तो प्रार्थना करते हैं —  "हे भगवान! अपनी कृपा कर, मेरे को इस दुःख से बचा ले!"

भगवान कह रहे हैं — "नहीं, नहीं, नहीं! इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है!"

उसको हम— उसकी क़दर ही नहीं जानते हैं। उसको — खील की तरह इधर-उधर गिर रही है — कोई बात नहीं। और ऐसी चीज के पीछे पड़े हैं, जिससे मुक्त होने के लिए सबकुछ करने के लिए तैयार हैं। और वो ही समस्या तुम्हारे पास ऐसी हाथ धो के बैठी है कि तुमको परेशान करके रखेगी। क्योंकि ये उसकी प्रकृति है।

हर एक चीज की प्रकृति होती है। उस प्रकृति को समझना जरूरी है। अगर अपना ध्यान उस, जो असली चीज है, उससे निकाल दिया गया तो फिर ऐसी-ऐसी जगह जाएगा कि "ये क्यों हो रहा है? ऐसा क्यों हो रहा है? अरे बाप रे! अब ये हो गया! अरे अब मैं ...... ।" बच्चे हैं — क्या करते हैं? मेहनत करनी चाहिए पढ़ने की। और सबसे ज्यादा मेहनत करनी चाहिए बात को समझने की। क्योंकि अगर बात कोई समझ में आ गई तो आपको दोबारा-दोबारा पढ़ने की जरूरत नहीं है। वो चली गई अक्ल में। और बुद्धि एक ऐसी चीज है, उसको याद करके रखेगी। पर समझ में तो आया नहीं और उसको तोते की तरह रट रहे हैं। और जब बैठेंगे इम्तिहान में तो अगर वो तोता नहीं बोला ठीक समय पर तो वो प्रश्न तो गया।

तो यही चीज हम करते रहते हैं अपनी जिंदगी में और परेशानियां हमारे पीछे पड़ी रहती हैं। किस चीज के पीछे पड़ना चाहिए? इस दुनिया के अंदर आप अगर सुकून से रहें और सुकून वो, जो आपके हृदय से आता है, जो आपके अंदर से आता है, जो अपने आपको समझने में आता है। ये नहीं है कि बाहर सबकुछ बदल जाएगा। बाहर सबकुछ नहीं बदलेगा। समस्याएं तो फिर भी आएंगी, परंतु आपको जीने का तरीका मिल जाएगा। आपको वो रास्ता मिल जाएगा, जिससे कि वो परेशानियां आपको परेशान न करें! एक बार परेशानियां अगर परेशान करना छोड़ दें तो वो परेशानियां नहीं रहतीं। आई, गई! आई, गई!

भगवान ने आपको एक चीज दी है, वो है — सब्र! और लोग कितना सब्र करते हैं? छूट गया लोगों का। दौड़ रहे हैं, परंतु ये नहीं मालूम किसके पीछे ? फिर मैं कहता हूं — एक वो दीवाल, जब पैदा हुए। एक वो दीवाल, जब आपको जाना है! भागिए! जाएंगे कहां? जाएंगे कहां? ये एक ऐसी रेस है, ये एक ऐसी दौड़ है कि अगर आप उल्टा भी भागना चाहें तो इधर ही भागेंगे! यहां से आए, यहां जाना है! इसको कोई नहीं टाल सकता। इस तरफ भागेंगे तो इसी तरफ जाएंगे, इस तरफ भी भागेंगे तो भी इसी तरफ जाएंगे! ये एक ऐसी रेस है! ये एक ऐसी दौड़ है! तो आदमी किस चीज के पीछे दौड़ रहा है? इस चीज के पीछे दौड़ रहा है। इस चीज के पीछे दौड़ना अच्छा नहीं है। क्योंकि ये तो होगा!

कब आता है आदमियों को चैन? रिटायरमेंट के बाद, अपने आप से जीना मुश्किल हो जाता है! अपने आप से जीना मुश्किल हो जाता है! ये देखिए! एक दिन काम पर जा रहे हैं, सबकुछ है और दूसरे दिन रिटायर्ड! अब क्या करेंगे? कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है — बिज़ी रहने की कोशिश करता है! क्यों? जेलों में सबसे बड़ी सजा क्या है? Solitary confinement! जब मनुष्य को हर एक चीजों से हटा करके बंद कर देते हैं। अब उसके पास कौन है? सिर्फ वो है! और वो अपने साथ नहीं जी सकता। कभी सीखा ही नहीं! कभी सीखा ही नहीं! 

लोग ऐसी जगह हो जाते हैं कभी — खो गए, जंगल में खो गए और कोई है ही नहीं! सिर्फ वो ही हैं। बाप रे बाप! बचाओ! बचाओ! बचाओ! बचाओ! क्यों ? अपने आप से जीना कभी सीखा ही नहीं। और इस जिंदगी में जिसने जीना ही नहीं सीखा, तो उसके लिए ये जिंदगी है या नहीं है — परेशान है या नहीं है, एक ही चीज है। और हर एक चीज उसको परेशान करेगी। तो बात परेशानियों से बचने की नहीं है। क्योंकि मैं तो ये कहता हूं कि बारिश तो होगी, पर अगर छाता है तो भीगने की जरूरत नहीं है। बात है भीगने की, बारिश की नहीं। बारिश तो होगी। पर क्या आप भीगना चाहते हैं या नहीं?

हमको अच्छी तरीके से मालूम है, जब सर्दी का मौसम आता है, लोग कम्बल निकालते हैं। क्यों ? सर्दी तो होगी! वो तो मौसम है, सर्दी तो आएगी, पर यह जरूरी नहीं है कि आप ठंडे हो जाएं, आपको ठंड लग जाए। कम्बल ढूंढ़िए! जैकेट ओढ़िए, स्वेटर ओढ़िए, पहनिए। तो यह बात है! और जो समझदार लोग हैं, वो इस पर अमल करते हैं कि यह तो होगा! जबतक मैं हूं, परेशानियां तो आएंगी! परंतु मेरे को परेशान होने की जरूरत नहीं है। और चक्कर है परेशानी नहीं! परेशान होना। अगर परेशान — परेशानियों से आदमी परेशान न हो तो फिर उन परेशानियों का उस पर कोई असर नहीं। और यह संभव है! परेशानियों को हटाना संभव नहीं है, परंतु उनसे परेशान न होना संभव है।

सपने और हकीकत (ऑडियो) 00:09:34 सपने और हकीकत (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:34 मेरे को आनंद से मतलब है, मेरे को शांति से मतलब है, मेरे को संतोष से मतलब है। मेर...

प्रेम रावत:

एक बार एक राजा ने अपने माली को कहा कि महल के पास यह जगह है और यहां मैं चाहता हूं कि बहुत सुंदर एक बाग लगाओ। तो महल ऊपर पहाड़ी पर बना हुआ था। रोज माली एक बांस बड़ा और आगे एक मटका और पीछे एक मटका, उसको लेकर नीचे रास्ते से जाता था और जो नीचे, पहाड़ के नीचे जो नदी थी, उससे पानी, अपने मटके में भर के और फिर ऊपर तक, अपने बाग तक उसको ले जाता था। ऐसे करते-करते, करते-करते, काफी समय बीता। हरियाली होने लगी बाग में। फूल लगने लगे। बाग अच्छा लगने लगा।

एक दिन माली ने जैसे ही मटके को रखा तो एक मटका, जो पीछे वाला मटका था, उसमें छेद हो गया। फिर भी माली ने उस मटके को फेंका नहीं। और न ही अपने बांस से निकाला। वो रोज उन्हीं दो मटकों को नीचे तक ले जाता था, पानी से भरता था, फिर ऊपर लाता था। चलता रहा ये।

एक दिन आगे वाला मटका, पीछे वाले मटके से बोलता है, ‘‘तू किसी काम का नहीं रहा! तेरे में तो छेद है।’’

जो पीछे वाला मटका था, उसको अहसास हुआ कि सचमुच में किसी काम का नहीं हूं मैं।

आगे वाले मटके ने कहा कि ‘‘ये माली इतनी मेहनत करके नीचे ले जाता है, दोनों मटकों को भरता है और जब तक वो ऊपर, इस बाग में पहुंचता है, तेरे में तो एक बूंद पानी नहीं रहता है। और ये जो बाग — हरियाली इस बाग की जो दिखाई दे रही है, वो तो सिर्फ मेरे कारण है। तेरे कारण तो है नहीं! तू तो किसी काम का नहीं है।’’

मटके को बड़ा बुरा लगा। एक दिन पीछे वाला जो मटका था, वो रोने लगा।

माली आया। माली ने दोनों मटकों को देखा। पीछे वाले मटके को देखकर कहता है, ‘‘तू रो क्यों रहा है ?’’

कहा, ‘‘मैं किसी काम का नहीं रहा। तुम इतनी मेहनत करते हो, नीचे दोनों मटकों को भरते हो, ऊपर लाते हो और जबतक ऊपर लाते हो, मेरे में तो एक बूंद पानी नहीं रहता है। मैं तो किसी काम का नहीं।’’

माली ने कहा, ‘‘ऐसी बात नहीं है। मुझे मालूम है, जिस दिन तेरे में छेद हुआ। मुझे मालूम है। पर मैं तेरे को फिर भी भरता रहा और ऊपर तक लाता रहा। इस बाग में जो हरियाली है, वो तो आगे वाले मटके की वजह से है। परंतु तैंने देखा, जो रास्ता नदी से इस बाग तक आता है, उसमें कितनी हरियाली है! और वो तेरी वजह से है। इस बाग में सब कोई नहीं आ सकता। और उस रोड पर सब लोग आते हैं, जाते हैं और वो उन फूलों को देखकर खुश होते हैं। आगे वाला मटका तो एक ही आदमी को खुश करता है और तू दिन में हजारों लोगों को खुश करता है।’’

क्योंकि सोचने की बात है हम अपने को अभागा समझते हैं। क्योंकि हमारी जो धारणाएं हैं, हमारी जो सोच है — ऐसा होना चाहिए। हमारे जो सपने हैं, ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए। हम ये चाहते हैं, हम ये चाहते हैं, ये साकार नहीं होते हैं और जब साकार नहीं होते हैं तो हमको दुःख होता है। हम कहते हैं, ‘‘हमारे साथ ये क्यों हो रहा है ? उसके साथ ये क्यों हो रहा है ? उसके साथ सबकुछ अच्छा है, हमारे साथ सबकुछ बुरा है।’’ अपने कर्मों को कोसते हैं। जब दुःख आता है, ‘‘मेरे कर्मों का फल है। मैंने क्या कर्म किए होंगे पिछले जन्म में ?"

मतलब, सारी बात दिमाग में ऐसे-ऐसे घुसेड़ते हैं कि पूछो मत! और घुसेड़ने वाले भी एक नहीं हैं, अनेक हैं। ‘‘जो कुछ आज हो रहा है, वह तेरे कर्मों का फल है।’’ तो मुझे याद क्यों नहीं है ? मैंने क्या कर्म किए थे ? अगर याद होता कि ये-ये कर्म करने से मेरे को अच्छा फल मिल रहा है तो दुबारा करता! याद तो है नहीं! अब क्या करूं ? पर चक्कर है — कर्मों का नहीं, तुम्हारे सपने पूरे न होने का। चक्कर ये है! चक्कर कर्मों का नहीं है। चक्कर कर्मों का नहीं है! चक्कर है — तुमने जो धारणाएं बना रखी हैं कि मेरे सपने ये हैं, मेरे सपने ये हैं और दुनिया तुमको दिखाती है सपने।

क्यों ? ये है मनुष्य इस कलयुग का और भूल गया है मनुष्य अपनी ही प्रकृति को। भूल गया है मनुष्य कि वो सचमुच में वो क्या है, वो कौन है ?

और लोग लगे हुए हैं, ‘‘हां! हां, हां!!’’

देखो! जो तुमको समझ में न आए, वो कूड़ा है। जो तुमको समझ में न आए! अगर वो, जो समझ में नहीं आता है, उसको निकाल दो तो तुम जानते हो, तुम्हारे कंधों का बोझ कितना हल्का होगा ? कर्मों के चक्कर से निकल के तुम किस चक्कर में पड़ोगे कि मेरे को अपने जीवन में शांति चाहिए। मैं आनंदमय — हर दिन मैं आनंदमय होना चाहता हूं। बस! अब ये पैसे से आए तो फिर पैसा कमाऊंगा और पैसे से न आए, जैसे आए, मेरे को आनंद से मतलब है, मेरे को शांति से मतलब है, मेरे को संतोष से मतलब है। मेरे को उस चीज से मतलब है, जो मेरे हृदय में है। और चीजों से मेरे को मतलब नहीं है।

तुम्हारी प्रकृति है ये कि तुम्हें लगी है असली प्यास और असली प्यास है उस परमानन्द की, अपने आपको जानने की। क्योंकि अगर तुम अपने आपको जानते तो तुमको पता लगता कि तुम्हारे में कितना बल है! तुम अगर अपने आपको जानते तो और चीजों के पीछे न लगकर के, अपने पीछे लगते। अपने अंदर स्थित जो मंदिर तुम्हारे हृदय के अंदर है, वहां जाकर तुम दर्शन करते। वहां जाकर के उस भगवान का पूजन करते, जो असली भगवान, जो था, है और रहेगा, तुम्हारे अंदर जो है। 

सरकार और नागरिक 00:03:35 सरकार और नागरिक Video Duration : 00:03:35 सरकार और जनता के बीच एक बेहतर संवाद कैसे स्थापित हो सकता है ?

प्रश्नकर्ता:

सरकार और जनता के बीच एक बेहतर संवाद कैसे स्थापित हो सकता है ?

 

प्रेम रावत:

कहीं भी आप चले जाइए, समाज में एक बीमारी है। और वो बीमारी यह है — भगवान हो, धर्म हो, गवर्नमेंट हो, हम उनको दोषी ठहराना चाहते हैं। "मेरे जीवन  में ये नहीं है, ये नहीं है, ये नहीं है, यह भगवान की — भगवान की गलती है। भगवान को दोष दो! यह ऐसा नहीं है, यह वैसा नहीं है, धर्म को दोष दो!"

तो हम तो लग गए हैं लोगों को दोष देने में। जबतक ये कीड़ा हम अपने दिमाग से नहीं निकालेंगे हम सरकार क्या होती है, नहीं समझ पाएंगे। इस समय हालत ये है कि सरकार को चाहिए वोट और लोगों को चाहिए तरक्की। और इस पिंग-पोंग में, इस खेल में अगर थोड़ा-बहुत कहीं गुंज़ाइश है — क्योंकि सबसे पहले लोग ही जाते हैं, सरकार को सत्ता में लाते हैं वोट देकर और जैसे ही वोट दे दी, फिर उन पर आरोप के बाद आरोप, आरोप के बाद — ‘‘उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया।"

तो ये जो कीड़ा है दूसरों को दोष देने का, "उनकी वजह से नहीं हो रहा है, उनकी वजह से...।"

"मैं क्या कर सकता हूं, मैं क्या कर सकता हूं ?"

अब ये एक बात है कि जो आज देख रहे हैं हिन्दुस्तान में — स्वच्छ भारत! कितना बढ़िया आइडिया है। कितना सुंदर आइडिया है। मतलब, ये तो बेसिक चीज है। क्योंकि हमको साफ रहना — इसका मतलब है कि हम बीमार नहीं होंगे। देखने में भी अच्छा लगता है।

परंतु मैं देखता हूं कि कई जगह जो स्वच्छता होनी चाहिए, वो नहीं है। तो पहले मेरे में यही प्रेरणा आती है कि मैं गवर्नमेंट को दोष दूं। उनकी वजह से नहीं हो रहा है। परंतु मैं भी तो कुछ कर सकता हूं। अगर मैं कूड़ा फेंकना छोड़ दूं — हैं, जी ? तो क्या परिवर्तन नहीं आएगा ? क्योंकि ये कूड़ा आया कहां से ? आया कहां से ? ये आसमान से तो आया नहीं ? ये नहीं है कि बारिश शुरू हुई और कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा! नहीं। ये कूड़ा हम ही पैदा करते हैं और अगर हम ही थोड़ी-सी जिम्मेवारी लें कि हम कूड़ा न फेंकें या उसको ठीक तरीके से डिस्पोज़ करें तो इसमें असर पड़ेगा।

पर वो नहीं हो रहा है। वो नहीं हो रहा है। लोग मज़ाक उड़ाने के लिए तैयार हैं, परंतु जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। दोष देने के लिए तैयार हैं, पर जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। तो कोई भी चीज हो इस संसार के अंदर, मनुष्य की भी तो कोई जिम्मेवारी बनती है ? जो यहां के नागरिक हैं, उनकी भी तो कोई जिम्मेवारी बनती है ? और जबतक वो जिम्मेवारी नहीं लेंगे और वो समझेंगे कि ऐसी सरकार आए, जो उनके सारे प्रॉब्लम्स को सॉल्व कर दे, वो कभी होगा नहीं। कभी हुआ नहीं है, कभी होगा नहीं। 

शांति क्या है 00:02:34 शांति क्या है Video Duration : 00:02:34 शांति क्या है ? शांति है वह चीज कि मनुष्य अपने आप को पहचाने।

प्रेम रावत :

सबसे बड़ी बात यह है। जो भी मेरा संदेश है, वह बड़ा साधारण संदेश है कि ‘‘भाई! जिस चीज की तुमको तलाश है, वह तुम्हारे अंदर है।’’ 

अब बाहर तो हम सबकुछ करते हैं, क्योंकि बाहर हम देखते हैं, सजाते हैं अपने आपको। 

पर हम अंदर के लिए क्या कर रहे हैं ? संदेश यह है कि अंदर के लिए हम क्या कर रहे हैं ? 

क्योंकि जो कुछ भी बाहर है, वह तो अंदर से आ रहा है। अब अगर अंदर आदमी को चिढ़ लगी हुई है तो उसको कितना भी आप मुस्कुराने के लिए कहिए, जैसे ही उसका ध्यान कहीं और जाएगा और वह मुस्कुराना बंद करेगा, उसकी जो चिढ़ है, वह बाहर आ जाएगी। तो जो कुछ भी हम कर रहे हैं, वह अंदर के लिए नहीं कर रहे हैं, बाहर के लिए कर रहे हैं। और बाहर हम चाहे कितना भी परिश्रम कर लें, शांति आपके अंदर से शुरू होनी है, बाहर से नहीं। 

जो बाहर आप लक्षण देख रहे हैं शांति का, लोग अपनी धारणाएं लेते हैं कि अगर शांति हो तो ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा! उनमें लगे हुए हैं, पर उनसे शांति नहीं होगी। शांति होगी तब, जब अंदर से शांति होगी। 

अंदर की शांति ये नहीं है कि हमारी समस्याओं का हल हो जाए तो हम शांत हो जाएंगे क्योंकि हमारी समस्याएं बदलती रहेंगी। लोग समझते हैं कि ये लड़ाइयां बंद हो जाएं तो शांति हो जाएगी। यह भी शांति नहीं है। 

तो अब शांति क्या है ? शांति है मनुष्य के अंदर। शांति है वह चीज, जो कि मनुष्य अपने आप को पहचाने। 

आपके अंदर आनंद को अनुभव करने की भी ताकत है और आपके अंदर परेशान होने की भी ताकत है। ये दो ताकत जो आपकी हैं, इससे आप कभी वंचित नहीं हैं। मतलब, आप कहीं भी चले जाएं, ये दोनों चीजें आपके साथ-साथ चलती हैं। आप क्रोधित भी हो सकते हैं और आप आनंद में भी हो सकते हैं। आप प्यार भी कर सकते हैं, आप नफरत भी कर सकते हैं। दोनों चीजें आपके साथ चलती हैं। 

तो अब बात यह है कि हम किस चीज को प्रेरणा देते हैं ?

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