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मधुमक्खी (Madhumakkhi) 00:05:23 मधुमक्खी (Madhumakkhi) Video Duration : 00:05:23 मैं लोगों से कहता हूं — खाली हाथ तुम आये थे, पर खाली हाथ तुमको जाने की जरूरत नही...

प्रेम रावत:

मधुमक्खी। मधुमक्खी क्या करती है ? उसके बिज़ी होने का एक कारण है। वो ढूंढ रही है, ढूंढ रही है, ढूंढ रही है, ढूंढ रही है — हर एक फूल के पास जा के वो ढूंढ रही है कि, उस फूल में से वो थोड़ा-सा शहद रूपी अमृत मिले और वो उसको ले। कब तक रहेगी वो उस फूल में ? जब तक वो जितना उसको लेना है, वो ले न ले। और जब ले लिया फिर दूसरे फूल के पास, फिर दूसरे फूल के पास, फिर दूसरे फूल के पास।

अगर हर एक स्वांस हमारे लिए एक उस बनाने वाले का एक फूल {flower} है, तो हमको फूल तो मिल गया। मधुमक्खी की तरह उसमें से मीठा अगर रस निकालना हमने सीखा नहीं, तो फूल तो मिलते रहेंगे, मिलते रहेंगे, मिलते रहेंगे, मिलते रहेंगे और बेकार होते रहेंगे, बेकार होते रहेंगे, बेकार होते रहेंगे।

यह जो स्वांस रूपी फूल है, यह भरा हुआ है उस अमृत से...अमृत से...अमृत से...। कौन से अमृत से ? उस शांति के अमृत से — उस आनंद के अमृत से भरा हुआ है।

इस हर एक स्वांस रूपी फूल में से वो जो उसमें अमृत — शहद रूपी जो अमृत उसमें बसा हुआ है, उसको निकालने की विधि मेरे पास है।

और अगर कभी आपको इंट्रेस्ट हो कि आप अपने स्वांस रूपी फूल में से वो अमृत निकालना चाहते हैं, तो मेरे पास आओ।

प्यास के साथ आना, प्यास के बिना मत आना। प्यास क्या है ? उस मधुमक्खी के लिए तो वो इच्छा है कि वो उसको उड़ा के ले जाती है — वह है प्यास। छोटी सी तो है वो! सारे जीवन भर खोजती रहेगी, खोजती रहेगी, खोजती रहेगी— वह है प्यास।

जिस दिन अपनी प्यास को तुम महसूस करो — प्यास ही एक साधन है जो पानी तक ले जायेगी। किसी ने तुम्हारे अन्दर प्यास डाली है।

अगर यह जो स्वांस अन्दर आ रहा है, इसकी कीमत नहीं पहचानी अपने जीवन में, सारा जीवन व्यर्थ चला जायेगा।

आये थे कुछ कमाने के लिए, जाना है खाली हाथ। और मैं लोगों से कहता हूं — खाली हाथ तुम आये थे, पर खाली हाथ तुमको जाने की जरूरत नहीं है।

हर एक फूल में से निकालो जितना निकाल सकते हो, और डालो उस प्याले में ताकि वो भर जाये, वो उस अमृत से भर जाये। फिर जहां जाना है, जब हृदय के अन्दर आनंद है, हृदय के अन्दर तसल्ली है, हृदय के अन्दर शांति है तो चलो, फिर चलो — जहां जाना है चलो। पानी पीयो, ठाठ से पीयो। अपनी प्यास को बुझाओ...प्यास को बुझाओ...प्यास को बुझाओ... प्यास को बुझाओ...।

बात जीवन की (Baat Jeevan Ki) 00:10:06 बात जीवन की (Baat Jeevan Ki) Video Duration : 00:10:06 इस सारे डिप्रेसिंग संसार के बीच में एक खुशखबरी है! वह खुशखबरी है — यह जीवन!

प्रेम रावत:

बात है जीवन की। हम जिस बात को करते हैं, उसका किसी मजहब से लेना-देना नहीं है। वो मनुष्य के लिए है। और सबसे जरूरी बात समझना यह है कि क्योंकि हम जीवित हैं, कौन-सी ऐसी चीजें हैं, जो हमारे जीवन में सबसे ज्यादा प्रभाव रखती हैं, जो जरूरी हों ? क्योंकि अगर विषय होता कि आप धन और कैसे कमा सकते हैं — अगर विषय होता कि आप कैसे 50 परसेंट पैसे को बढ़ा सकते हैं, जो आपके पास है, तो यह जगह बहुत छोटी पड़ती। क्योंकि आजकल हम लोगों की जो समझ है, वो कुछ इसी प्रकार की हो गयी है।

एक छोटी-सी कहानी है कि एक बार पांडव भाई, जो वनवास में थे, तो उनको प्यास लगी —बहुत ही प्यासे थे तो खोजना शुरू किया और युधिष्ठिर खोजते-खोजते तालाब के किनारे पहुंचे तो उनको बड़ी खुशी हुई कि पानी मिल गया है। जैसे ही वह पानी की तरफ गए, उनका ध्यान गया कि सारे उनके भाई जमीन पर लेटे हुए हैं, मरे हुए हैं। तो जैसे ही युधिष्ठिर ने हाथ अपना पानी में डाला पानी पीने के लिए, तो जो वहां गंधर्व था, उसने कहा, ‘‘रुको! पानी मत पीओ! मेरे सवालों का पहले जवाब दो, फिर मैं पानी पीने दूंगा।’’

उसने कहा, ‘‘नहीं, मेरे को प्यास लगी है, पानी पीने दो!’’

बोला, ‘‘नहीं! तुम्हारे भाइयों के साथ यही हुआ है। उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी, पानी पीने लगे। मेरे सवालों का जवाब नहीं दिया और सब मरे पड़े हैं। तुम्हारे साथ भी यही होगा।’’

तो युधिष्ठिर रुके, कहा ‘‘पूछो!’’

तो कई सवाल पूछे गए और उनमें से एक सवाल था कि ‘‘सबसे अद्भुत् चीज क्या है ? पीक्यूलियर, स्ट्रेन्ज! अद्भुत!’’

तो युधिष्ठिर कहते हैं, ‘‘मनुष्य है! मनुष्य है!’’

फिर पूछा जाता है उनसे, ‘‘क्यों ? क्यों मनुष्य अद्भुत है ?’’

कहा कि ‘‘इसलिए कि कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जिसको यह नहीं मालूम कि एक दिन उसको मरना है, पर वह जीता ऐसे है कि कभी मरेगा ही नहीं। इसलिए अद्भुत है!’’

बात मरने की नहीं है, बात जीने की है — किस प्रकार जी रहा है ? किस प्रकार जी रहा है ? बात धन कमाने की नहीं है। कमाइए, खूब कमाइए! जितना हो सकता है, उतना कमाइए! बात धन कमाने की नहीं है, पर जिस तरीके से आप कमा रहे हैं, बात उसकी है कि आप किस तरीके से कमा रहे हैं, कि आप उस धन को अपने साथ ले जाएंगे और यह होगा नहीं।

हर एक चीज का एक लिहाज़ होता है। जब आप अपने घर से कहीं जाने के लिए निकलते हैं, दूर सफर करने के लिए निकलते हैं — तीन दिन के लिए जाना है, चार दिन के लिए जाना है, पांच दिन के लिए जाना है, छः दिन के लिए जाना है, उसी तरीके से तो आप पैक करते हैं अपने सूटकेस को ? इस प्रकार से सूटकेस पैक होता है कि उसमें सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ! ये तो नहीं करते हैं! दो दिन के लिए जाना है, तीन दिन के लिए जाना है, उसी चीज को देख के — क्या होना है, क्या करना है ? ये सब देखकर के ही तो आप पैक करते हैं? पर अपने जीवन में किस तरीके से पैक करते हैं?

जो आपके नाते हैं, रिश्ते हैं — और मैं यह चर्चा इसलिए कर रहा हूं आजकल, जब मैं यहां पहुंचा, मेरे पास एक रिक्वेस्ट आयी कि ‘‘जी! एक व्यक्ति हैं और वो अपने जीवन के आखिरी दौर पर हैं — डॉक्टरों ने कह दिया है। और वो आपसे बात करना चाहते हैं।’’ तो मैंने फोन किया।

तो सबसे पहले उन्होंने कहा कि ‘‘हां, मेरे को कह दिया है कि मैं जा रहा हूं!’’

मैंने कहा कि असलियत तो यह है कि हम सब जा रहे हैं। कोई ऐसा नहीं है, जो नहीं जा रहा है। सिर्फ इतना है कि डॉक्टर ने अभी नहीं कहा है। मतलब, डॉक्टर कह दे — अपशगुन! डॉक्टरों का तो मुंह भी नहीं देखना चाहिए, वो ऐसी चीज कह सकते हैं। पर डॉक्टर कह देते हैं तो हमारा सारा सोचने का तरीका बदल जाता है। डॉक्टर कह देते हैं तो हमारे सोचने का तरीका बदल जाता है। जीने का तरीका बदल जाता है। और डॉक्टर ने नहीं कहा है, फिर भी हकीकत तो वही है।

तो संत-महात्माओं का इसके बारे में यह कहना है कि हम आपने आपको — अब मैं पैराफ्रेज़ कर रहा हूं। अंग्रेजी में जो शब्द होगा कि हम अपने आपको cheat कर रहे हैं — और कोई नहीं, हम अपने आपको cheat कर रहे हैं। जो फैक्ट्स हैं, जो हकीकत है, उसको स्वीकार नहीं कर रहे हैं। परंतु एक ऐसी हकीकत अपने दिमाग में बनाए हुए हैं, जो हकीकत नहीं है। जो हकीकत नहीं है।

तो फिर क्या रह गया ? मतलब, अगर मैं इसी तरीके से बोलता रहूं, थोड़ी देर के बाद आप लोगों को तो रोना आना लगेगा। इतना डिप्रेसिंग बन जाएगा ये सारा सब्जेक्ट — ‘‘जाना है, जाना है, जाना है! इसकी परवाह मत करो! उसकी परवाह मत करो! ये क्या होगा ? वो क्या होगा?’’

नहीं, नहीं, नहीं, नहीं! मैं डिप्रेसिंग बात करने के लिए नहीं आया हूं। डिप्रेसिंग बात करनी है तो आपको मेरी क्या जरूरत है ? टेलीविजन चालू कीजिए, न्यूज चैनल देखिए, डिप्रेशन अपने आप आ जाएगा! अखबार खोल के बैठ जाइए!

परंतु बात कुछ ऐसी है कि इस अंधेरे के बीच में एक रोशनी है। बात कुछ ऐसी है कि इस डिप्रेसिंग न्यूज के बीच में — इस सारे डिप्रेसिंग संसार के बीच में एक खुशखबरी है! और वो खुशखबरी है — यह जीवन! वो खुशखबरी है — यह स्वांस! वो खुशखबरी है — तुम्हारा जिंदा होना!

On screen text:

इस सारे डिप्रेसिंग संसार के बीच में एक खुशखबरी है!

वो खुशखबरी है — ये जीवन!

वॉन्ट्स एंड नीड्स (Wants & Needs) 00:03:34 वॉन्ट्स एंड नीड्स (Wants & Needs) Video Duration : 00:03:34 असली ज़रूरत! मैं उन चीज़ों की बात कर रहा हूं जिनके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकेगा...

प्रेम रावत:

अब देखिए! एक छोटी-सी बात। आपकी वॉन्ट्स भी हैं, आपकी नीड्स भी हैं। क्या कभी आपने बैठ के एक दिन अपने से यह पूछा है कि मेरी वॉन्ट्स क्या हैं और मेरी नीड्स क्या हैं ? या दोनों की खिचड़ी बनी हुई है ?

साक्षात्कार:

पुरुष: यह तो एक ही सिक्के के दो पहलू हो गये।

पुरुष: ज़रूरत है . . .

पुरुष: अटेंडेंस . . .

पुरुष: हर चीज़ चाहत है।

पुरुष: पढ़ाई करनी है, जॉब करनी है, पैसे कमाने हैं, जो करना है करना है। लेकिन वॉन्ट्स में क्या हो रहा है सबकुछ करना है हमें।

महिला: अच्छी-सी, मस्त-सी लाइफ बिना शादी के।

पुरुष: चाहत जो है कभी खत्म नहीं होती इंसान की।

महिला: चाहत क्या होती है ?

पुरुष: घूमना सबसे ऊपर है।

महिला: ग्रोथ चाहिए, डेवलपमेंट चाहिए डेफ़िनिटेली मनी इज़ वैरी इम्पोर्टेन्ट

महिला: पहाड़ों में जाकर ट्रैकिंग करना।

पुरुष: चाहत तो यह है कि मैं फ़रारी में घूमूं।

महिला: मेरी! मैं बेसिकली आर्मी में जाना चाहती हूं।

महिला: ज़रूरतें हैं . . .

प्रेम रावत:

असली ज़रूरत! उन चीज़ों की बात कर रहा हूं जिनके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकेगा। मनुष्य की ज़रूरतें क्या हैं ? तीन हफ्ते अगर भोजन न मिले, आप गए!

साक्षात्कार:

पुरुष: तीन हफ्ते खाना...

महिला: बिल्कुल डैमेज़ हो जायेंगे, चल भी नहीं पायेंगे।

पुरुष: अरे! बचेंगे ही नहीं और क्या होगा।

पुरुष: थ्री टाइम्स भी डे...नहीं मिलता आइ कांट लीव विदाउट फूड।

महिला: ओह माइ गॉड! हम लोग फूडी हैं हम लोग को तो वैसे ही चाहिए।

पुरुष: खाना नहीं मिले तो कैसे ? रह नहीं पाऊंगा पहली बात तो।

महिला: मैं तो नहीं रह सकती।

महिला: खाना! खाना तो इंसान की ज़रूरत होती है।

प्रेम रावत:

अगर कोई बिना भोजन के मर गया तो उसके लिए मेडिकल टर्म है — स्टारवेशन। वो मरा स्टारवेशन से। अगर तीन-चार दिन आपको पानी न मिले, हफ्ते भर पानी न मिले, आप गए!

साक्षात्कार:

पुरुष: चाहिए पानी तो।

महिला: पानी के बिना तो नहीं सर्वाइव कर सकते।

महिला: पानी, हवा, खाना नहीं छोड़ सकते आप।

पुरुष: पानी भी नहीं और खाना भी नहीं तो, मर जायेगा वो।

पुरुष: तीन दिन तक अगर एक इंसान को पानी न मिले ना, दो घंटे में मर जाता है इंसान। तुम तीन दिन की बात कर रहे हो यार

महिला: पानी के बिना तो हम तीन घंटे भी नहीं रह सकते।

प्रेम रावत:

कोई अगर पानी के बिना मर गया तो उसके लिए भी मेडिकल टर्म है, वो मर गया डि-हाइड्रेशन से। अगर आप पाँच मिनट हवा नहीं लेंगे, स्वांस नहीं लेंगे, आप गए!

साक्षात्कार:

पुरुष: नहीं रह पाऊंगा सांस के बिना तो।

महिला: मेरे से तो एक मिनट तक सांस नहीं रोकी जाती।

महिला: एक मिनट भी नहीं हो पाती।

महिला: सांस के बिना मैं एक मिनट भी नहीं सर्वाइव कर पाऊंगी।

महिला: सांस लिये बिना हम यहां पर 30 सेकेंड्स रोकने की कोशिश करते हैं योगा के थ्रू पर वो भी नहीं हो पाता है।

प्रेम रावत:

अगर कोई मर गया बिना हवा के, ऑक्सीजन के तो उसके लिए भी मेडिकल टर्म है — सफोकेशन। पर अगर कोई मर गया बिना टीवी देखने के तो उसके लिए कोई मेडिकल टर्म नहीं है। क्योंकि वो इम्पॉर्टेन्ट नहीं है। मैं बात कर रहा हूं आपकी ज़रूरतें, और आपकी चाहतों की।

साक्षात्कार:

पुरुष: मैं रह ही नहीं पाऊंगा बिना टीवी के।

पुरुष: फ़ोन के बिना तो आइ थिंक मैं सोच सकता हूं कि लाइफ मेरी मॉम मेरे से छीन चुकी हैं।

पुरुष: पहले कैसा था, रोटी, कपड़ा, मकान। अभी रोटी, कपड़ा, मकान एंड मोबाइल।

पुरुष: वॉटसअप चाहिए होता है सबसे पहले। फ़ोन के बिना आज के टाइम में कुछ नहीं है।

महिला: फ़ोन तो लाइफ...।

महिला: लाइफ है आजकल की।

महिला: इंटरनेट इज़ वैरी नेसेसरी।

महिला: फेसबुक, वॉटसअप क्यों ? क्योंकि हमारा टाइम पास नहीं होता है।

महिला: फ़ोन ही सबकुछ हो गया है। फ़ोन ही गर्लफ्रेंड हो गया है, फ़ोन ही बॉयफ्रेंड हो गया है।

महिला: खाने के बिना रह सकते हैं पर फ़ोन के बिना नहीं रह सकते।

महिला: मतलब मैं सबकुछ भूल सकती हूं पर फ़ोन के बिना घर से बाहर इम्पॉसिबल नहीं।

प्रेम रावत:

मेरी ज़रूरत है — ‘शांति!’ ये लग्ज़री नहीं है। क्योंकि अगर ज़ीवन में शांति का अनुभव नहीं कर सकता हूं तो जहां भी जाऊंगा, मैं बिखरा रहूंगा।

On screen text: ज़रूरतें और चाहतें . . . आप किसे ज्यादा महत्व देते हैं ?

मुमकिन है (Mumkin Hai) 00:05:50 मुमकिन है (Mumkin Hai) Video Duration : 00:05:50 जहां हृदय खुश है, शांत है, अंदर शांति है, वहां स्वर्ग है।

संगीत –

मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है

हर डगर सफर ढूंढे दिल मुकाम जो

मिल जाये यूं हीं कहीं, मुमकिन है

रंग इश्क का रंग देता है रूह को

चाहे फासलें भी हों, मुमकिन है

पुरुष: कहीं न कहीं अंदर कुछ अकेलापन-सा हमेशा लगता है, सबकुछ होने के बावजूद भी।

महिला: आजकल फिज़िकल वर्क से ज्यादा मेंटल वर्क है। इस दुनिया में हमें जितना अपना माइंड यूज़ करना पड़ रहा है, उसके लिये हमें एक बहुत ही पॉज़िटिविटी और पीस की जरूरत है।

महिला: शांति जो है वो हमारे जीवन में बहुत जरूरी है। हम यह मानेंगे इसके बगैर हमारा जीवन जो है वह अधूरा है।

महिला: मैं किसी भी कौस्ट पर अपनी शांति — मन की जो है न, खोने नहीं देती।

प्रेम रावत:

अगर तुम्हारे जीवन की शांति बिखर गयी तो तुम भी बिखर जाओगे और जिस दिन तुम्हारे इस जीवन के अंदर शांति आ जायेगी, तुम भी पूरे हो जाओगे।

संगीत –

हर डगर सफर ढूंढे दिल मुकाम जो

मिल जाये यहीं कहीं, मुमकिन है

रंग इश्क का रंग देता है रूह को

चाहे फासलें भी हों, मुमकिन है

जो मिले वो अपना रहे, सदियों तक रहे, मुमकिन है

मोती-सी हूं मैं अगर, मुमकिन है तो यहां, मंजर प्यार भरा मुमकिन है . . .

पुरुष: हर एक कौम के लिए शांति आजकल बहुत जरूरी है। हर-एक भागम-भाग में लगा हुआ है। कोई अपने बारे में नहीं सोच रहा।

पुरुष: Success means peace, peace in your life. If you are living peacefully, तो आप अच्छे से आराम से रह रहे हो।

पुरुष: बगैर शांति के कुछ भी नहीं है, जीवन अधूरा है।

महिला: अगर हरेक मुहल्ले में से कोई भी समझदार होता है, तो वो सबको समझा सकता है, तो इससे पूरे विश्व में, संसार में शांति रहेगी।

प्रेम रावत:

जहां हृदय खुश है, शांत है, अंदर शांति है, वहां स्वर्ग है।

संगीत –

देखो जुगनू को अंधेरों में, रोशनी कैसे मिल जाती है

आसमां की गोदी से चलकर, ये घटाएं कहां जाती हैं

जो वो आसमां ए रूका बस वहां

जो ये मुमकिन तो सब मुमकिन है

मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है . . .

पुरुष: जिंदगी में कभी भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए। कभी भी कोई नेगेटिव फीलिंग को अंदर ना आने देना, वही पीस है।

महिला: जब आप मेंटल पीस में होंगे तब आपको पता चलेगा क्या चीज सही है और क्या चीज गलत है। तभी आप डिसीज़न ले पायेंगे।

पुरुष: पीस अंदर, अंदर पड़ी है आपके, बाहर नहीं है। जो बाहर ढूंढेगा उसको नहीं मिलने वाली।

प्रेम रावत:

संभावना क्या हो सकती है ?

संभावना तो यह है कि तुम यह जीवन सुख और चैन से जीयो। दिन और रात शांति का अनुभव करो। ना एक दिन और की आशा हो, ना एक दिन कम की निराशा हो। और चैन, सुकून, शांति से यह जीवन बीते, यह संभावना है।

संगीत –

बूंदें गिरती हैं जो छम से, फिर जाने कहां जाती हैं

तितलियां उड़ती हैं साथ में, लेकिन कुछ आगे निकल जाती हैं

गर सोच से आगे हम चलें, नामुमकिन भी तो मुमकिन है

मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है...

मुमकिन है, मुमकिन है, मुमकिन है...।

Text on screen: शांति मुमकिन है . . .

खूबी (Khubi) 00:00:52 खूबी (Khubi) Video Duration : 00:00:52 अपनी खूबियों को जानने की कोशिश करो।

आप में कोई कमी नहीं है बस अपनी खूबियों को जानने की कोशिश करो।

प्रेम रावत: 

गुस्सा (Gussa) 00:08:56 गुस्सा (Gussa) Video Duration : 00:08:56 मुझे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है। मुझे पता है गुस्सा करना गलत है पर फिर भी ...

प्रश्नकर्ता:

मुझे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है। मुझे पता है गुस्सा करना गलत है पर फिर भी मैं गुस्सा करता हूं। मैं गुस्से को कंट्रोल कैसे करूं ?

प्रेम रावत :

सबसे पहला मेरा यह प्रश्न होगा कि ‘‘आप यह कंट्रोल क्यों करना चाहते हैं ? मतलब, गुस्से में ऐसी क्या बात है, जो आपको पसंद नहीं है ? भाई, आपका स्वभाव है। अगर आपका स्वभाव नहीं होता तो आप गुस्सा कैसे करते ? तो ऐसी क्या चीज़ है, जो गुस्सा करने पर आपको पसंद नहीं है ?’’

मैं आपसे यह प्रश्न इसलिए पूछ रहा हूं, क्योंकि यह प्रश्न मैंने अपने आपसे पूछा। गुस्सा मेरे को भी आता है और लोग ऊटपटांग काम करते हैं तो उससे भी गुस्सा आता है। तो एक दिन मैंने अपने आपसे पूछा कि ठीक है, लोग तो ऊटपटांग काम करते ही हैं — अब जिसकी समझ में नहीं आया, कुछ न कुछ करेगा। वो गलत करेगा। पर तुमको गुस्से से गुस्सा क्यों है ? तो समझ में यह आया कि मुझको गुस्से से गुस्सा इसलिए है, क्योंकि गुस्सा करने के बाद जैसा मैं महसूस करता हूं, वो मुझे पसंद नहीं है। जब गुस्सा हो रहा होता है तो मेरे को मालूम ही नहीं है कि गुस्सा कब आता है ? पर जब चला जाता है, तब मेरे को महसूस होता है कि — ‘‘हां!… ऑ… ऑ… ऑ… हा…हा…  ये अच्छा नहीं था।’’

तो गुस्से के बाद जो होता है, उससे मुझे नफरत है। क्योंकि मैं एक ऐसी चीज बोल जाऊंगा, जो मैं कभी बोलना नहीं चाहता। मैं ऐसी चीज़ कर जाऊंगा, जो मैं कभी करना नहीं चाहता। मतलब, गुस्सा एक ऐसी चीज़ है, जिसमें कि मैं अपने आपको खो देता हूं। जो कुछ भी मैंने अपने से प्रण किया है, जो भी मैंने अपने से कहा है कि ‘‘नहीं, ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है’’, वो मैं तोड़ देता हूं। क्योंकि वो एक ऐसा समय है कि मैं अपना संतुलन खो देता हूं। तो सबसे बड़ा प्रश्न तो मेरे को यह पूछना है अपने से कि ‘‘मेरे लिए, मेरे संतुलन की क्या कीमत है ? मेरे संतुलन के लिए। बात काम की नहीं है, बात औरों की नहीं है। मेरे लिए मेरे संतुलन की क्या कीमत है ?’’ अगर यह मेरे लिए मूल्यवान है तो मुझे मेरा संतुलन खोना अनिवार्य नहीं है।

इसके लिए मैं क्या करूं ? क्या करूं ? बोलने से पहले गुस्से की हालत में — अगर मैं अपने को दो क्षण भी दूं, दो सेकेंड सोचने का, मैं समझ सकता हूं। बात यह वही है कि जब मनुष्य क्रोध में होता है, वो अपने आप से अलग है। वो — वो है, जो वो नहीं होना चाहता है। वो — वो है, जो उसके स्वभाव में नहीं है। और उससे बचने के लिए, उससे बचने के लिए जो कुछ भी उसको करना पड़े। ऐसे भी लोग हैं, जिनको देखते ही गुस्सा आता है। तो फिर पैर तो आपके हैं! वहां क्यों जाते रहते हो ? जाओ! ऐसी संगत में बैठो, ऐसी संगत में बैठो, ऐसी कंपनी में बैठो, ऐसी संगत में बैठो, जिसमें आप उभरो! अंदर से उभरो! कोई चीज़ अच्छी समझो! ऐसी संगत में नहीं, जहां कि आप अपने से दूर होते जा रहे हैं। ये कुसंगत है!

हर एक आदमी के पास यह उपाय है कि वो अपनी कुछ संगत बनाए। चाहे वो जेल में ही क्यों न हो, जहां कोई भी समझेगा कि यह तो असंभव बात है! परंतु सबसे बड़ी बात है — और फिर यह वही उदाहरण है कि एक मोमबत्ती जो जली हुई है, वो दूसरी मोमबत्ती को जला सकती है। जब मोमबत्तियां जलने लगती हैं तो अंधेरे का आना असंभव हो जाता है।

परंतु ऐसी चीज़ें हैं, जो मेरा ध्यान, जहां होना चाहिए, वहां से अलग करती हैं। तो या तो मैं अब उन चीज़ों की लिस्ट बनाऊं और उन चीजों की लिस्ट अपनी जेब में रखूं और जब कैसी भी परिस्थिति हो, देखूं, आज ये लिस्ट में है या नहीं है। या फिर मैं ये बात समझूं कि मैं चाहता क्या हूं ? हर पल, हर क्षण अपने ज़ीवन में सुबेरे से लेकर शाम तक मैं चाहता क्या हूं ? और यह चाहत मेरी एक ऐसी है, जो मेरे साथ हमेशा बंधी रही है । चाहे मैं कितना भी छोटा था, चाहत यही थी कि ‘‘मैं खुश रहना चाहता हूं। मैं आनंद में रहना चाहता हूं।’’

मेरे गुरु महाराज जी ने, मेरे पिता जी ने मेरे को बताया कि वो आनंद का स्रोत मेरे अंदर है। जिस आनंद को मैं चाहता हूं, वो आनंद का स्रोत मेरे अंदर है। वो बाहर नहीं है। जब बाहर की चीज़ों को बदलना मैंने बंद किया — क्योंकि पहले तो यही था कि मैं ये कर दूंगा, मैं ये कर दूंगा तो अच्छा हो जाएगा। ये कर दूंगा तो अच्छा हो जाएगा। और जब अंदर की चीज़ों में ध्यान देना शुरू किया तो अपने आप फिर वो जो हृदय रूपी प्याला है, वो आनंद से भरने लगा। क्या वो हमेशा भरा रहता है ? नहीं। क्या वो परिस्थितियां आज भी आती हैं, जिनसे कि गुस्सा हो ? बिल्कुल! क्योंकि वो चीज़ मेरे को मालूम पड़ गई है कि जो चीज़ चाहिए मेरे को, वो मेरे अंदर है तो मैं कम से कम उस तरफ कोशिश कर सकता हूं। और जितनी कोशिश मैं करता हूं अपने अंतर्मुख होने की, अंदर जाने की — अंदर जो मेरे सद्भावना है, उसको उभारने की, तो वो कोशिशें सफल होती हैं। अगर मैं ऐसी चीज़ की तरफ कोशिश करूं, जो संभव नहीं है तो वो कोशिश अपने आप असफल होगी। तो अगर मैंने अपनी जिंदगी के अंदर कोशिश की है कि मेरी सारी समस्याएं चली जाएं तो वो सफल नहीं होंगी।

अब लोग यही सोचते हैं कि अगर मेरे पास धन हो तो मेरी मुश्किलें सब खतम हो जाएंगी। देख लीजिए आप! अखबार पढ़िए! लोग हैं, जिनके पास इतना पैसा है, इतना पैसा है कि कई-कई बार उनको खुद नहीं मालूम कि उनके पास कितना पैसा है। तो क्या उनके पीछे समस्याएं नहीं लगी हुई हैं ? बिल्कुल समस्याएं लगी हुई हैं। किसी को — उनका नाम कीचड़ में न उछल जाए — यह उनको समस्या रहती है। कोई उनसे ज्यादा अमीर न हो जाए — यह उनकी समस्या लगी रहती है। समस्याएं तो सबके पीछे लगी हुई हैं। परंतु एक ऐसी भी जगह है, जहां समस्या नहीं हैं। समस्या को हटाने के लिए लोग कोशिश करते आए हैं और सफल नहीं हुए हैं। परंतु जो अंतर्मुख हो करके उस चीज़ को समझते हैं कि आनंद जो मेरे को चाहिए, खुशी जो मेरे को चाहिए — मैं खुश रहना चाहता हूं, वो मेरे अंदर है। और उस तरफ मैं जितनी कोशिश करूंगा, वो सब सफल होंगी, बाहर की तरफ मैं जितनी कोशिश करूंगा, वो सब सफल नहीं होंगी ।

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