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शांति और मानवता 00:05:12 शांति और मानवता Video Duration : 00:05:12 मानवता के लिए मानव को समझना बहुत जरूरी है!

प्रश्नकर्ता : हमने शांति को defined किया, मानवता को defined किया, एक आदमी, जो दिन में 150 रुपये कमाता है सारे दिन extreme conditions में काम करता है, उसके लिए शांति और मानवता हम कैसे define करेंगे ?

प्रेम रावत जी : पैसा भी मनुष्य ने बनाया है और पैसे का अभाव भी आज मनुष्य बना रहा है। इस पृथ्वी से सारा धन निकलता है। हीरे-जवाहरात कहां से निकलते हैं ? किसी के safe से निकलते हैं या धरती से निकलते हैं ? वो भी धरती से निकलते हैं। तो ये तो रही बात Inequality की। परंतु हमको अच्छी तरीके से मालूम है कि भूखे पेट से — इसके लिए कहा भी है कि —

बिन भोजन भजन न होय गोपाला।

ये लो अपनी कंठी माला।।

तो शांति जरूरी है और जो concerns आपने कही, ये भी जरूरी हैं। जो concerns हमारी भौतिक concerns हैं, इसके लिए society है। इसके लिए government है, इसके लिए systems हैं और उनके बावजूद भी ये नहीं हो रही है। और मैं ये कह रहा हूं कि जबतक मनुष्य अपने आपको नहीं पहचानेगा तो वो मानवता को — मानवता को, humanity को कैसे establish करेगा ? मानवता के लिए मानव को समझना बहुत जरूरी है! बिना मानव अपने आपको समझे, कैसे मानवता को स्थापित करेगा ? ये संभव नहीं है!

तो इसलिए मेरी कोशिश, मेरी कोशिश आज से नहीं, दो साल से नहीं, तीन साल से नहीं — 50 साल से ऊपर मेरी यही कोशिश रही है कि मनुष्य अपने आपको समझे, क्योंकि मैंने देखा है कि जब मनुष्य अपने आपको समझने लगता है तो उसके माहौल में ऐसा परिवर्तन होता है और सुंदर परिवर्तन होता है। ये बात मैं क्यों कह रहा हूं ? मेरे शब्द खाली नहीं हैं।

हमारा एक प्रोग्राम है, जो कि universities में भी है, libraries में भी है, जो veterans लड़ाइयों से वापिस आ रहे हैं, उनके लिए भी है। और सबसे बड़ी बात है कि वो जेलों में भी है। साउथ अफ्रीका में हर एक single जेल में है वो। हर एक जेल में है वो प्रोग्राम — पीस एजुकेशन प्रोग्राम!

उससे होता क्या है ? उससे होता क्या है ?

वो लोग, वो लोग, जो जेल में बंद हैं और एक साल के लिए नहीं, दो साल के लिए नहीं, तीन साल के लिए नहीं, कई ऐसे लोग हैं, जिनको जिंदगी का sentence मिला हुआ है, Life sentence मिला हुआ है — जब वो आते हैं जेल में तो सबसे पहले उनको यही लगता है कि सोसाइटी का fault है, गवर्नमेंट का fault है, पुलिस का fault है, उनकी फैमिली का fault है, उनके दोस्तों का fault है कि वो जेल में हैं। जब वो अपने आपको समझने लगते हैं, तब जाकर के असली परिवर्तन उनके जीवन में आता है कि इसका रिस्पॉन्सिबल और कोई नहीं, मैं हूं। और जब वो बदलना शुरू करते हैं तो उनके जीवन के अंदर जेल में भी रहकर के सुकून उनको मिलता है। तो जब जेल में रहते हुए उनके जीवन के अंदर शांति आ सकती है।

If they can feel peace in the middle of a prison, then imagine what is possible in the world outside that prison, change, change, change, change for the better, for the better. And that's the betterment of mankind, of mankind. How? By lighting individual candles. You can light a whole city. So, I hope that helps.

उन्नति 00:01:54 उन्नति Video Duration : 00:01:54 जो जीवन मिला है, किस तरीके से हम इसको पूरा करें, किस तरीके से इसको सफल करें।

प्रेम रावत

हम यह सोचें कि हमको यह जो जीवन मिला है, ये किस तरीके से हम इसको पूरा कर सकें, किस तरीके से इसको सफल कर सकें।

परंतु इस बारे में ज्यादा लोग नहीं सोचते हैं। सोचते ये हैं लोग कि हमारी उन्नति कैसे हो ? जब उन्नति पहले से ही हो रखी है पर समझ नहीं पा रहे हैं, देख नहीं पा रहे हैं, जान नहीं पा रहे हैं, तो उन्नति होगी कैसे?

भगवान से आशीर्वाद मांगते हैं लोग, पर भगवान ने जो आशीर्वाद पहले से ही दिया है, उसको स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं है, तो फिर आशीर्वाद का फल क्या होगा ? क्योंकि आनंद चाहिए मनुष्य को। किसी भी रूप में उसको आनंद चाहिए। परंतु अगर उसके जीवन के अंदर सबकुछ है, और आनंद नहीं है तो उसको यही लगेगा कि मेरी जिंदगी सूनी है। सूनी है!

सारी आशाओं का कुंआ, जब मनुष्य के अंदर पहले से ही है, तो यह कैसे संभव है कि मनुष्य निराश हो जाए? आदमी समझे, सोचे, देखे, अनुभव करे कि जिस चीज की उसको जरूरत है, जिस चीज की उसको प्यास है, जिस चीज की उसको चाह है सबकुछ उसके पास है।

सीखने की रूचि को कैसे बनाए रखें 00:06:36 सीखने की रूचि को कैसे बनाए रखें Video Duration : 00:06:36 इस दुनिया के अंदर ऐसी कोई चीज नहीं है, जो मनुष्य सीख नहीं सकता। सबमें सीखने की क...

Text on screen : हर उम्र में सीखने और सिखाने की रूचि को कैसे बनाए रखें ?

 

प्रेम रावत:

 

अगर हम लोग ये stance नहीं adopt करें कि "हमको कुछ मालूम है, तुमको नहीं मालूम!" क्योंकि मनुष्य हमेशा यही करता रहता है। "मेरे पास कितना है, तुम्हारे पास कितना है! मेरे पास ज्यादा होना चाहिए, तुम्हारे पास कम होना चाहिए! ये मेरा है, ये तेरा है!"

 

तुलसीदास जी ने यही कहा है कि "यही माया है! ये मेरा है, ये तेरा है", यही माया है। और यही माया है कि "मैं ये जानता हूं, तू ये नहीं जानता है।"

 

तो अब बात ये हो गई कि जहां टेक्नोलोजी की बात है तो वो छोटे वाले जो हैं, उनको ज्यादा मालूम है तो वो कहते हैं कि "तुमको नहीं मालूम है, तुम नहीं कर सकते।" पर माहौल तो ऐसा होना चाहिए कि "मैं सीखना चाहता हूं! अगर तुम मुझे सिखा सकते हो, सिखाओ!" और अगर मैं कुछ तुम्हें सिखा सकता हूं तो मेरे से सीख लो!"

 

अगर ये exchange होने लगे लोगों में तो देखिए! बड़े-बड़े भी छोटों से सीख लेंगे और छोटे भी बड़ों से सीख लेंगे। फिर ये भेदभाव नहीं रहेगा, क्योंकि माली को जो मालूम है, माली को जो मालूम है, वो मालिक को नहीं मालूम! और मालिक को जो मालूम है, वो माली को नहीं मालूम! और जिस दिन मालिक, माली से सीखने लगेगा, उस दिन उसके लिए कुछ नया ज्ञान पैदा होगा। और माली, मालिक से सीख सकते हैं। और उसके लिए हो सकता है कि वो दो पैसे और बचाना शुरू कर दे! दस पैसे और बचाना शुरू कर दे! बजटिंग चालू कर दे और वो भी एक दिन मालिक बन जाए।

 

ये बात है — क्योंकि हमारे कल्चर में सीखने की बात ही नहीं है। "हम जानते हैं सबकुछ!" और जब छोटा बच्चा — 11 साल का, 12 साल का, जिस फोन को हम नहीं चला सक रहे हैं ठीक ढंग से, वो आकर छीनता है और कहता है, "मेरे को मालूम है, कैसे करना है — खड़- खड़-खड़, हो गया!"

 

हमको ये नहीं होता है कि "मैं क्या इससे सीख सकता हूं!"

 

"बेटा! सिखाना, तुमने क्या किया ?"

 

नहीं। गुस्सा आता है — "इसको मालूम है, मेरे को नहीं मालूम!"

 

लोग अपने पर पाबंदी लगा लेते हैं — "मेरी तो उम्र बहुत हो गई। अब मैं क्या सीखूंगा ?"

 

देखिए! आपका जो शरीर है, इसमें उम्र के कारण आँखें कमजोर होने लगती हैं। हो सकता है, सुनाई कम दे। हो सकता है, दाँत हिलने लगे! और चीजें हैं, उस ढंग से काम न करें, जैसे करती थीं। पर दिमाग एक ऐसी चीज है, जो काम करती रहती है। दिमाग एक ऐसी चीज है, जो काम करती रहती है! और दिमाग एक ऐसी चीज है कि जितना उसको इस्तेमाल करेंगे, उतना ही वो बढ़िया काम करेगा। जितना आप उसको इस्तेमाल करेंगे। तो अगर हमारे कल्चर में — सारे, मैं पृथ्वी की कल्चर की बात कर रहा हूं। मैं सिर्फ हिन्दुस्तान ही के कल्चर की बात नहीं कर रहा हूं। हर एक कल्चर में अगर लोग सीखने लगें और सिखाने लगें एक-दूसरे को — एक तो लोगों में कितनी रिस्पेक्ट होगी! कितनी क़दर करेंगे लोग एक-दूसरे की!

 

अब देखिए! मैं बहुत कुछ कर सकता हूं। क्योंकि मेरी सीखने की आदत है। अब कोई भी — आज भी कोई आदमी कुछ कर रहा है तो मैं उससे कहता हूं, "सिखाओ! मेरे को बताओ, कैसे किया ये ?"

 

मैं सीखना चाहता हूं अपनी जिंदगी में और मैंने बहुत बार कोशिश की। मैं हवाई जहाज भी उड़ा सकता हूं। मैं मशीनों पर भी काम करता हूं। मैंने cars भी restore की हैं! बहुत कुछ किया है। पर रोटी बनाना, बेलना — मैं इसको आसान काम नहीं समझता हूं। और जिनको मैं देखता हूं बेलते हुए — क्या ? क्या खूब बात है, तुमको आता है! और जो बेलते हैं, उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। उनके लिए कि "आप हवाई जहाज उड़ा सकते हैं ?"

 

ये बहुत बड़ी बात है। परंतु ऐसी कोई चीज नहीं है इस दुनिया के अंदर, जो मनुष्य सीख नहीं सकता। सबमें सीखने की क्षमता है। परंतु पहले ही मनुष्य दीवाल बना लेता है कि मैं सीख नहीं सकता।

 

यही बात लागू होती है अपने आपको जानने में। पहले ही वो एक दीवाल बना लेता है कि "ना, ना, ना! इन चीजों से मेरा कुछ लेना-देना नहीं है। इन चीजों को मैं नहीं समझ सकता हूं। ये धार्मिक चीज है।"

 

ये धार्मिक चीज नहीं है। अपने आपको आईने में देखना, धार्मिक नहीं है। आपने आपको जानना, धार्मिक नहीं है। भगवान कैसा है, उसकी फोटो बना के अपने दिमाग में रखना, धार्मिक जरूर हो सकता है, परंतु साक्षात् उस ब्रह्म को अपने अंदर उसको महसूस करना, धार्मिक नहीं है। इसका किसी धर्म से लेना-देना नहीं है। इसका किसी — पहले ही बनी हुई धारणाओं से कुछ लेना-देना नहीं है। ये तो साक्षात् चीज है। और जबतक हम अपने कल्चर में, अपने जीवन में सीखना और सिखाना नहीं ले आएंगे, तबतक ये सारे झंझट जो हैं लोगों के बीच में, जो तनाव बना देते हैं, जो ages को separate कर रहे हैं — क्योंकि "ये तुम्हारी आयु है। तुम जवान हो, तुम बुड्ढे हो! तुम ये हो, तुम वो हो!"

 

ये सारे तबतक खतम नहीं होंगे। ये बढ़ते चले जाएंगे। क्योंकि जो नई-नई टेक्नोलोजी आ रही हैं, नये-नये जो छोटे बच्चे हैं, उनको इस्तेमाल कर रहे हैं। जो बुजुर्ग हैं, वो इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। क्योंकि उन्होंने पहले ही ठान लिया कि "ये हमसे नहीं होगा!"

 

तो ये झंझट बना रहेगा।

संगम (ऑडियो) 00:09:18 संगम (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:18 ये कहानी तुम्हारी है, ये कहानी हमारी है। जब तक हम जीवित हैं, इस कहानी को हम समझे...

प्रेम रावत:

 

आप कौन हैं ? आप कौन हैं ? जब तुम मां के गर्भ से निकले, तब तुम्हारा नाम क्या था ? कुछ भी नहीं था। अभी रखा नहीं गया था। अभी कागज पर नहीं लिखा गया था। अभी किसी ने सोचा भी नहीं था। अभी लोगों को हो सकता है, ये भी नहीं मालूम था कि तुम लड़के हो या लड़की हो, तो नाम पहले रखने से क्या फायदा ? अगर तुम जीवित थे और तुम्हारा कोई नाम नहीं था और फिर भी तुम जीवित थे ? बिना नाम के जीवित थे ? तो तुम्हारा जो नाम है उससे और तुम्हारे से क्या लेना-देना ? कुछ लेना-देना नहीं।

 

दूसरी चीज, ये शरीर किसका है ? ये तुम्हारा है ? ये तुम्हारा है ? किसका है ? बनाने वाले का है ?

 

मतलब, अपने आपको समझना — मैं कौन हूं, क्या हूं। ये शरीर इन तत्वों का बना है, उन्हीं चीजों का बना हुआ है, जिसको तुम सबेरे-सबरे धोने की कोशिश करते हो। उसी मिट्टी का बना हुआ है, जिससे तुमको इतनी नफरत है। उन्हीं चीजों का बना हुआ है और जब ये शरीर खत्म होगा तो उन्हीं चीजों में जाकर के मिल जायेगा।

 

लोग कहते हैं न, ‘‘हां! फिर जब आदमी मरता है तो फिर ऊपर जाता है। अच्छा कर्म किया है तो ऊपर जाता है, बुरा कर्म किया है तो नीचे जाता है।’’

 

तो मैं पूछता हूं कि जब तुम्हारा जन्म हुआ तो तुम्हारा वजन अगर पांच पाउंड का था, सात पाउंड का था तो इस पृथ्वी का वजन सात पाउंड बढ़ा ? और अगर तुम्हारा वजन दो सौ पाउंड है और जब तुम मरोगे तो इस पृथ्वी का वजन दो सौ पाउंड कम होगा ? हां या नहीं ?

 

बात यह है, तुमने पहले कभी सोचा नहीं इस बारे में। तो अगर इसका वजन वैसे का वैसे ही रहेगा — मतलब, मनुष्यों के आने-जाने से नहीं बदलेगा तो क्या हो रहा है ? कोई कहीं से आ नहीं रहा है और कोई कहीं जा नहीं रहा है। सब यहीं अटके हैं। और उसी से लौकी बनती है, उसी से कद्दू बनता है, उसी से तुम बनते हो! ये है सच्चाई!

 

चक्कर क्या है ?

 

चक्कर है कि यह एक संगम है। हर एक व्यक्ति जो यहां बैठा है, यह एक संगम है। इस संगम में, इस संगम में एक वो यंत्र है, जो अनुभव कर सकता है और इसी यंत्र में बैठा है वो, जो अविनाशी है। तो, एक तो तुम अनुभव कर सकते हो और एक, इस यंत्र में बैठा है अविनाशी! यंत्र का नाश होगा, अविनाशी का नाश नहीं होगा। परंतु ये दोनों एक जगह, एक समय में आए हुए हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है ? क्या यह संभव है कि इसका मतलब ये हो कि इस यंत्र के द्वारा तुम उस अविनाशी का अनुभव कर सको। इसलिए तुम हो! और अगर तुमने उसका अनुभव किया तो स्वर्ग तुम्हारे लिए यहीं बन जाएगा।

 

एक बार एक कछुए का बाप और कछुए की माँ दोनों खड़े हुए थे और अपने बच्चे — छोटे-से कछुए को देख रहे थे। वो छोटा-सा कछुआ पेड़ के ऊपर चढ़ता, बड़ी मेहनत से, बड़ी कोशिश से और टहनी के ऊपर जाता, बड़ी कोशिश से, बड़ी मेहनत से और फिर कूदता। और जैसे ही कूदता तो धक! जाकर जमीन पर गिरता। फिर वो जाता, फिर पेड़ पर चढ़ता, बड़ी मेहनत से —छोटा कछुआ, छोटा-छोटा कछुआ! फिर जाता है, टहनी के ऊपर जाता, जाता, जाता, जाता बड़ी कोशिश, बड़ी मेहनत से और फिर टहनी से कूदता और धक!

 

माँ, बाप कछुए से बोलती है, ‘‘मेरे ख्याल से इसको बता देना चाहिए कि ये चिड़िया नहीं है।’’

 

क्योंकि वो छोटा कछुआ यही सोच रहा था कि वह चिड़िया है। उड़ने की कोशिश कर रहा था, परंतु वो उड़ नहीं पायेगा।

 

क्या मनुष्य को भी ये बताना पड़ेगा, बताना चाहिए कि वो ये संगम है ? और क्या वो यह समझे कि वो ये संगम है और स्वर्ग यहां है ?

 

लोग लगे रहते हैं — कोई दान कर रहा है, कोई पुण्य कर रहा है। कोई कुछ कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है। कोई कुछ कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है। सब स्वर्ग जाने के लिए कर रहे हैं। कहां जाएंगे ?

 

‘‘स्वर्ग जाएंगे जी! स्वर्ग जाएंगे जी! स्वर्ग जाएंगे जी...!’’

 

हम उन लोगों को एक advice देते हैं, एक सलाह देते हैं। जब तुमको इतनी लगी हुई है जाने की — जाओ! मतलब, इंतजार क्यों कर रहे हो ?

 

इसीलिए कहा है कि अगर अपने आपका ज्ञान नहीं है, आत्मज्ञान नहीं है —

 

आतमज्ञान बिना नर भटके, भटकते रहोगे। तुम क्या हो, तुम समझ नहीं पाओगे। तुम संगम हो, ये नहीं समझ पाओगे। तुम्हारे अंदर वो अविनाशी बैठा है, ये समझ नहीं पाओगे। समझ नहीं पाओगे। लगे रहोगे खुश होने में और खुशी का भंडार तुम्हारे अंदर है। खुशी का भंडार तुम्हारे अंदर है।

 

कितनी सुंदर बात है कि जगह-जगह जाकर मैं जब लोगों को ये बात सुनाता हूं, लोगों को बड़ी अच्छी लगती है, क्योंकि ये बात सरल है, साधारण है और ये कहानी तुम्हारी है, ये कहानी हमारी है। जब तक हम जीवित हैं, इस कहानी को हम समझें, इस मिलन को, इस संगम को हम समझें। ये कहानी तुम्हारी ऐसी हो सकती है कि आनंदमय हो और तुम्हारा जीवन सफल हो सकता है। जीवन सफल करना, उसी को कहते हैं। और जिस दिन जीवन सफल होगा, उस दिन तुम्हारे लिए स्वर्ग ही स्वर्ग है। नरक भी यहां है, स्वर्ग भी यहां है।

 

मानवता का धर्म 00:03:57 मानवता का धर्म Video Duration : 00:03:57 उदारता, दया, क्षमता, क्षमा— ये है तुम्हारा धर्म!

प्रेम रावत:

 

सबसे पहले तुममें शांति होनी चाहिए। और तब, जब तुममें शांति होगी, तब तुम इस संसार से शांति बनाओ! और जब तुम इस संसार से शांति बनाओगे, तब जाकर के इस संसार के अंदर शांति होगी। क्योंकि इस संसार में अशांति का कारण तुम्हीं हो। इस संसार के अंदर जो अशांति फैली हुई है, वह अधर्म के कारण फैली हुई है।

 

अधर्म जो मनुष्य करता है, क्योंकि उसको यही नहीं मालूम कि वो कौन है। उसको ये नहीं मालूम कि वो शेर है या बकरी ? कौन है वो ? उसको नहीं मालूम! और अधर्म होता है।

 

सबसे पहला धर्म क्या है ?

 

सबसे पहला धर्म जो मनुष्य ने बनाया, वो धर्म है — दया होनी चाहिए, उदारता होनी चाहिए। इसीलिए तो इन सब चीजों का वर्णन हर एक धार्मिक धर्म में मिलता है। चाहे वो हिन्दू हो, चाहे वो मुसलमान हो, चाहे वो सिख हो, चाहे वो ईसाई हो, चाहे वो बुद्धिष्ट हो! किसी भी धर्म का हो, सभी धर्मों में ये सारी चीजें बराबर हैं।

 

उदारता होनी चाहिए, दया होनी चाहिए, क्षमता होनी चाहिए, क्षमा होनी चाहिए! ये है तुम्हारा धर्म! और जब तुम क्षमा नहीं करते हो, जब तुम दया नहीं करते हो, तुम अधर्म करते हो! इस अधर्म — नरक की बात छोड़ो! नरक की बात छोड़ो! क्यों छोड़ो ? क्योंकि अधर्म के कारण मनुष्य ने नरक यहीं बना दिया है। जहां स्वर्ग होना चाहिए, वहां मनुष्य ने नरक बना दिया है।

 

असली धर्म को पकड़ो! और वो असली धर्म है — मानवता का धर्म! मानवता का धर्म! जिसमें दया है, उदारता है! और जब उसको पकड़ोगे, अपने आपको पहचानोगे कि तुम कौन हो।

 

मैं बात कर रहा हूं, तुम्हारा! जो मानव होने के नाते जो तुम्हारा धर्म है, इसको निभाना सीखो! जिस दिन तुम इसको निभाने लगोगे, तुम्हारे जीवन के अंदर भी आनंद ही आनंद होगा।

खुशी अपने में ढूंढ़ो 00:15:14 खुशी अपने में ढूंढ़ो Video Duration : 00:15:14 खुशी अपने में ढूंढ़ो पहले। अगर तुम नहीं खुश हो तो किसी और को कैसे खुश करोगे ?

ऐंकर : कुछ लोगों की नजर में जो चीज सही होती है, वही चीज दूसरे लोगों की नजर में गलत होती है। सही और गलत की पहचान कैसे करें ?

 

प्रेम रावत जी : सही तो सबके लिए सही होना चाहिए। और सही वो है कि ‘‘तुम भी जीवित हो, मैं भी जीवित हूं। तुम भी मनुष्य हो, मैं भी मनुष्य हूं।’’ इस संसार ने सबके अंदर बंटवारा कर दिया! और बंटवारे के तुम नतीजे में हो! क्या बंटवारा कर दिया ? तुम मर्द हो, तुम औरत हो! क्यों कर दिया बंटवारा ?

 

आए एक ही देश से, उतरे एक ही घाट। 

हवा लगी संसार की, हो गए बारह बाट।।

 

एक होना चाहिए, अनेक नहीं। एक! जबतक इस संसार के अंदर एकता नहीं होगी, ये लड़ाइयां बंद नहीं होंगी। शांति का मतलब, लड़ाई बंद करना नहीं है। शांति तो हर एक मनुष्य के अंदर होती है। पर मनुष्य लड़ता इसलिए है, क्योंकि उसके अंदर भी अशांति है। आदर चला गया। आज क्या हो गया ?

 

"तू अमीर है, तू गरीब है!" फर्क क्या है गरीब में और अमीर में ?

 

मैं बताऊं ? मैं बताऊं ? गरीब ठाट से सोता है! गरीब ठाट से — उसको न भैंस की चिंता है, न भैंसे की चिंता है। न चारे की चिंता है! खाना मिल गया, उससे वो संतुष्ट है और खूब खर्राटे मार के सोता है। उसको तो कहीं — उसके लिए तो सारा संसार एक बिस्तर है। कहीं भी लेट जाएगा, कहीं भी सो जाएगा। हमारे लिए बिस्तर बड़ी सीमित जगह में है। जब वो मिलेगा, तभी उसके ऊपर बैठ करके सोएंगे। तो भाई! समझो इस बात को! ये भेद-भावनाएं अच्छी नहीं हैं। सबका आदर होना चाहिए, क्योंकि सबके अंदर वो बैठा हुआ है। अगर तुम एक-दूसरे का आदर नहीं कर सकते हो तो तुम्हारा आदर कौन करेगा ?

 

भालू ? ऐं ? वो तो तुमको खाना चाहता है। भोजन के रूप में देखता है — "क्या स्वादिष्ट, स्वदिष्ट!" कहता है क्या ? "स्वादिष्ट!"

 

मनुष्य जब दूसरे को देखता है तो "क्या सुंदर-सुंदर बाल हैं!"

 

भालू जब तुमको देखता है, कह रहा है, "स्वादिष्ट-स्वादिष्ट पेट है। खूब चर्बी है! अच्छा स्वाद निकलेगा।"

 

तो मनुष्य हो! मनुष्य की तरह तो रहना सीखो! वो तो जानते नहीं हैं लोग! "तुम फलां-फलां धर्म के हो!" क्या मतलब? जब तुम पैदा होते हो, तुम्हारा धर्म क्या है ? जब तुम गर्भ में रहते हो, तुम्हारा धर्म क्या है ? ऐं ? ये सब संसार के बनाए हुए हैं। उसी के चक्कर में लोग बैठ करके एक-दूसरे का विभाजन करते हैं, एक-दूसरे को बांटने की कोशिश करते हैं — ‘‘तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो!’’ भाषा से विभाजन करते हैं। विभाजन करना सीख लिया, पर जोड़ना नहीं सीखा।

 

अभी तुमको मैथ, गणित विद्या नहीं आती है। पहले गणित विद्या देखो, सीखो, जानो! जोड़ना भी कोई चीज है। जोड़ो! एक-दूसरे को प्रेम से, प्यार से! क्योंकि जो तुम्हारी — क्या तुम समझते हो कि अगर कोई दूसरे धर्म का है — उसको प्यास नहीं लगती ? उसको भूख नहीं लगती ? लगती है। उसको दुःख नहीं होता ? होता है। वो भी तुम जैसा ही है। सब एक हैं!

 

अलख ईलाही एक है, भरम करो मत कोय।

 

भ्रमित मत पड़ना। और ये चीज अगर जान लो कि सब एक हैं। सब एक ही चाहते हैं। सब अपने जीवन के अंदर आनंद चाहते हैं। परंतु जबतक ये आपस में — ‘‘तुम मर्द हो, तुम औरत हो, तुम ये हो, तुम वो हो!’’ सबका आदर होना चाहिए।

 

ऐंकर : आप अक्सर कहते हैं कि हर मनुष्य में 50 प्रतिशत अच्छाई और 50 प्रतिशत बुराई होती है। पर आज लोगों में बुराई का प्रतिशत बढ़ता ही जा रहा है और अच्छाई का प्रतिशत कम होता जा रहा है। ऐसा क्यों ?

 

प्रेम रावत जी : नहीं, बढ़ नहीं रहा है, घट नहीं रहा है। उतना का उतना ही है। वो कभी बढ़ता नहीं है। वो किसी भी —किसी भी समय नहीं बढ़ता है। किसी भी समय में घटता नहीं है। इनकी बात है!

 

देखिए! आप सोचते हैं — सबेरे-सबेरे जब सूर्य उदय हुआ तो आप लोगों ने देखा, सूर्य उदय हुआ! है न ? और शाम को आप देखेंगे कि ये सूर्य अस्त होगा। इधर से उदय हुआ, उधर से अस्त होगा। एक निश्चित समय है, जब सूर्य उदय हुआ और एक निश्चित समय है कि सूर्य अस्त हुआ। वो सिर्फ आपके लिए और आप कहां हैं ? क्या आपको मालूम है कि सूर्य हमेशा उदय होता रहता है ? सोचिए! ये पृथ्वी घूम रही है और कहीं न कहीं इस संसार के अंदर, इस पृथ्वी के ऊपर सूर्य उदय हो रहा है और कहीं न कहीं सूर्य अस्त हो रहा है। ये उदय होना और अस्त होना कभी बंद नहीं होता है। ये सिर्फ आपका दृष्टिकोण है, क्योंकि आप जिस जगह हैं, उस जगह जब आप देखते हैं कि सूर्य उदय हुआ तो आप सोचते हैं कि अब सूर्य उदय होकर खतम हो गया, परंतु खतम नहीं हुआ। अभी भी कहीं न कहीं सूर्य उदय हो रहा है और कहीं सूर्य अस्त हो रहा है! ये चक्कर हमेशा लगा रहता है।

 

अच्छाई-बुराई उतनी ही है, पर आपका दृष्टिकोण क्या है ? अच्छाई को देखने के लिए, जो आपके अंदर अच्छाई है, उसको देखने के लिए, जबतक आप नहीं समझेंगे कि इस स्वांस का आना-जाना ही भगवान की कृपा है, तो आपको अच्छाई तो — अच्छाई की परिभाषा क्या है आपके लिए ? आपके अच्छाई की परिभाषा है — आपकी मनोकामना पूरी हो! है कि नहीं ? आपकी मनोकामना पूरी हो — ये अच्छाई है आपके लिए।

 

तो बुराई भी है, अच्छाई भी है। परंतु एक अच्छाई सबके साथ हो रही है। परंतु अगर उसको समझ नहीं सकते हैं तो फिर बुराई ही बुराई नज़र आएगी! देखो! इस संसार के अंदर दया की कमी नहीं है। बहुत लोग दयालु हैं। बहुत लोग दयालु हैं! सच में, मैं सच कह रहा हूं! बहुत लोग दयालु हैं।

 

एक बार हमने देखा जयपुर में। दिल्ली से आ रहे थे जयपुर! एक जगह है बस स्टैण्ड! तो वहां देखा! एक बेचारा काफी बुड्ढा आदमी, पता नहीं कहीं गया होगा कुछ खरीदने के लिए, कुछ करने के लिए, उसकी बस चल दी। तो वो बेचारा बस के पीछे भाग रहा है, पर भाग नहीं सक रहा है। और बस और तेज, और तेज, और तेज, और तेज, और तेज, और तेज जा रही है। तो हमने कहा, ये तो बहुत बुरा हुआ!

 

तो हम कहने ही वाले थे कुछ कि ‘‘भाई! इस बस के आगे इसको रोककर के, इसको कहें कि तेरा एक पैसेंजर रह गया है’’, इतने में दो आदमी मोटर साइकिल पर थे। एकदम गए वो, उन्होंने बस रोकी — रोकवाई और ड्राइवर से कहते हैं, ‘‘एक रह गया है!’’ बस, उसने देखा कि हां! सचमुच में रह गया! उसने रोक ली और वो वृद्ध आदमी जो है, चढ़ गया उस बस के ऊपर। ये भी अच्छाई है। बस ड्राइवर भी दयालु था। वो दो लोग, जो मोटरसाइकिल पर बैठे थे, वो भी दयालु थे। अब पता नहीं, उस बुड्ढे आदमी को समझ में आई बात कि नहीं कि तीन-तीन लोगों ने उसकी मदद की कि वो आज अपने घर या कहीं भी वो जा रहा है, वो पहुंच जाए।

 

तो भाई! दयालुता की कमी नहीं है इस संसार के अंदर। परंतु निर्दयता की भी कमी नहीं है इस संसार के अंदर। जबतक प्रकाश हम अपनी अच्छाइयों पर नहीं डालेंगे, तो वही चीजें प्रबल रहेंगी, जो अच्छी नहीं है। बाकी दोनों ही चीज उतनी की उतनी ही हैं और हमेशा रहेंगी, और हमेशा रहती आई हैं।

 

ऐंकर : और अब अगले प्रश्न की तरफ बढ़ते हैं, जो कि है खुशी के बारे में। हम अपने आसपास के लोगों को खुश रखना चाहते हैं। लेकिन दूसरों को खुश रखने के चक्कर में कई बार हमें अपनी खुशियों का त्याग करना पड़ता है। इन दोनों में तालमेल कैसे बिठाएं ?

 

प्रेम रावत जी : ये दीवाली आती है। दीवाली में क्या करते हो ? दीये जलाते हो ? जलाते हो दीया ? तो कैसे जलाते हो ? पहले एक दीया लेते हो, पहले उसको जलाते हो! या पहले सारे दीये जलाते हो, उसके बाद फिर उस दीये को जलाते हो ? क्या करते हो ? पहले एक दीये को जलाते हो, फिर उससे अलग–अलग दीये को जलाते हो। ठीक यही बात करनी है। खुश हो! पहले तुम खुश हो! तुम दीया हो! अगर तुम जल नहीं रहे हो, तो और दीयों को कैसे तुम जलाओगे ? बुझा हुआ दीया कुछ नहीं कर सकता है। जलता हुआ दीया बुझाये हुए दीए को जला सकता है। खुशी अपने में ढूंढ़ो पहले। अगर तुम नहीं खुश हो तो किसी और को क्या खुश करोगे ?

 

ऐंकर : धन्यवाद! ये एक बहुत ही इंटरेस्टिंग सवाल है। आज के युग में जो लोग छल और कपट करते हैं, उनकी प्रगति होती है। जबकि ईमानदार और सच्चे लोग कहीं पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में ये लोग अपनी अच्छाई को कैसे पहचानें ?

 

प्रेम रावत जी : देखिए! वो लोग, जो छल-कपट से प्रगति करते हैं, वो कभी अपने आपको सक्सेसफुल नहीं महसूस करते हैं। उनको मालूम है! अंदर से खटकती है बात! उनको मालूम है! और जो— मैंने देखा है। गरीब लोगों के चेहरे पर वो मुस्कान — उनके पास ज्यादा नहीं है। पर जितना है, उनका है! चाहे वो विदेश की सूट नहीं पहने हुए हैं — खद्दर के ही पैजामा है, खद्दर का ही कुर्ता है, परंतु नहा-धोकर के, अच्छे नये कपड़े पहनकर के जो उनके चेहरे पर मुस्कान है, वो बड़े-बड़े ऑफिसरों के चेहरे पर कई बार हमने नहीं देखी है। तो मुस्कान तो एक ऐसी चीज होती है कि दूसरे को देख करके अपने आप भी मुस्कुराने लगे, उसको असली मुस्कान — ये होती है असली मुस्कान! और दांत दिखाने वाली मुस्कान अलग होती है। वो उससे फिर कुछ नहीं होता है। तो सबसे बड़ी बात है कि वो जो प्रगति कर रहे हैं, उनको मालूम है कि वो प्रगति नहीं कर रहे हैं। परंतु जो है — जिसका हृदय संतुष्ट है, उसको मालूम है, क्या है!

 

ऐंकर :  जिन चीजों के बारे में हम जानते नहीं हैं या मैं ऐसा कहूं — जिन चीजों को हम नहीं समझते हैं, हमें उन चीजों से डर क्यों लगता है ?

 

प्रेम रावत जी : हां! डर तो लगना चाहिए, पर लगता नहीं है। उन्हीं चीजों के पीछे पड़ जाते हैं, जिन चीजों को हम समझते नहीं हैं। वही वाली बात है कि —

मन तू नाहक धुंध मचाए। 

कर आसमान छुए नहीं काहू, पाती फूल चढ़ाए। 

मूरति से दुनिया फल मांगे, अपने ही हाथ बनाए।। 

चलत फिरत में  — दुनिया पूजे देवी-देवरा, तीरथ बरत अन्हाए।

चलत-फिरत में पांव दुखत हैं, ये दुख कहां समाए।।

झूठी माया, झूठी काया, झूठन झूठ लखाए।

बांझी गाय दूध नहीं देवे, माखन कहां से लाए।।

साच के संग सांच बसत है, झूठन मार गिराए।

कहै कबीर जहां सांच बसत है, सहज ही दरसन पाए।।

कितनी सहज बात है। जो है सच में, उसको जानो! उसको पहचानो!

 

 

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