View as
दुःख (Dukh) 00:06:35 दुःख (Dukh) Video Duration : 00:06:35 जो दुःख का कारण है, मेरे इर्द-गिर्द की जो परिस्थितियां हैं, उनको हम कैसे नियंत्र...

प्रश्नकर्ता:

मैं अपने आप में तो खुश रह सकता हूं, क्योंकि मुझे अपने आपसे — और मैं अपने आपको समझता हूं, अपने आपको जानता हूं और अपने आपसे कैसा व्यवहार करना है यह भी मुझे मालूम है। लेकिन जो दूसरा कारण, जब दुःख का बनता है और वो दुःख का कारण है, मेरे इर्द-गिर्द की जो परिस्थितियां हैं, उनको हम कैसे नियंत्रित करें ? जो दुःख मुझे एक्सर्टनल या सोसाइटी या अन्य किसी स्रोत से या अन्य किसी जगह से प्रभावित करता है या किसी क्षण तक प्रभावित करता है, उसका समाधान कैसे होगा ?

प्रेम रावत:

आपके घर में मच्छर आ रहे हैं, मक्खियां आ रही हैं। तो आप सबसे पहले क्या देखेंगे ? आपका घर है, दीवाल हैं, किवाड़ हैं, खिड़कियां हैं। सबसे पहले आप क्या देखेंगे ? अगर मक्खियां आ रही हैं — दरवाजा बंद है या नहीं ? खिड़कियां बद हैं या नहीं ? अगर खिड़कियां खुली हुई हैं सारी तो मक्खी मच्छर तो आएंगे। हो सकता है, खिड़की हमने खोली हो कि फ्रेश हवा, शुद्ध हवा हमारे कमरे में आए। परंतु उसका एक कॉन्सीक्वेन्स भी है कि हवा भी आएगी तो मक्खी भी आएगी, मच्छर भी आएंगे और धूल भी आएगी।

तो सबसे पहले हमको ये देखना है कि हम क्या चाहते हैं ? अगर हम उन मक्खी और मच्छरों से बचना चाहते हैं और वो मक्खी-मच्छर हैं — ‘समस्याएं’। जो थोड़ी-थोड़ी समस्याएं आती हैं या कोई ऐसी चीज कर देता है, जिससे कि हमको दुःख होता है या हम किसी का दुःख नहीं सहन कर पा रहे हैं — ये हैं वो मक्खी और मच्छर! खिड़की बंद करने की जरूरत है।

क्योंकि कोई भी मनुष्य अपने जीवन में एक दीया हो। दीया उजाला देता है। दीया यह नहीं देखता है कि मैं किस पर उजाला दे रहा हूं। उसके पास अगर चोर आएगा, उसके लिए भी उजाला हो जाएगा और अगर कोई संत आएगा, उसके लिए भी उजाला हो जाएगा। ये जितने हमारे फ़र्क हमने बनाए हुए हैं, दीये का इससे कोई लेना-देना नहीं है। उसका काम है — प्रकाश देना।

जैसे सूर्य उदय होता है और वो सारे संसार के अंदर उजाला पैदा करता है। वो यह नहीं देखता है, यह चोर है, यह अच्छा आदमी नहीं है, यह नहीं करूंगा, यह नहीं करूंगा। ये सब हम करते हैं। जबतक हम अपने में यह नहीं जान लेंगे कि मेरा स्रोत, मेरे शांति का स्रोत मेरे अंदर है और जब वो स्रोत, उससे मैं अपना कनैक्शन जोड़ूंगा और वो बाहर आएगा तो मैं — सबके लिए एक ऐसा मेरा माहौल हो जाएगा कि मैं सबमें खुशी बांटने के लिए तैयार हो जाऊंगा।

देखिए! दो प्रकार के लोग होते हैं — एक तो वो, जिनके साथ आप एक मिनट भी नहीं बिता सकते हैं और एक वो, जो आपके जीवन में थोड़ी स्माइल ले आते हैं, थोड़ी खुशी ले आते हैं। हां, अगर हम वैसे होने लगें, हर एक व्यक्ति वैसे होने लगे कि वो थोड़ा-सा सुकून ले आए, थोड़ी-सी मुस्कान ले आए। अब ये नहीं है कि वो सारा माहौल बदल देगा, ये नहीं है कि सारी जो समस्याएं हैं, उनको अपने कंधों पर ले लेगा। नहीं। वो सिर्फ एक छोटी-सी चीज करे।

अब एक दिन मैं जा रहा था कार से तो मैंने देखा कि एक बस, जो खड़ी हुई थी, वो चलने लगी। एक बेचारा बहुत ही वृद्ध आदमी उस बस के पीछे धीरे-धीरे भागने लगा। और वो बस उसकी थी, परंतु वह छूट गया। और बस धीरे-धीरे तेज़ चलने लगी और उस बेचारे ने भागने की कोशिश की, पर बहुत ही वृद्ध था, वो भाग नहीं सका। मैं सोच रहा था कि मैं ड्राइवर से कहूं कि वो बस के ड्राइवर के पास जाए और उससे कहें। इतने में एक व्यक्ति अपनी मोटर साइकिल से आया और उसने बस को थपथपाया और ड्राइवर से कहा — ‘‘तेरा एक पैसेंजर छूट गया है!’’

ड्राइवर ने बस रोकी और वो वृद्ध आदमी उस पर चढ़ गया। और मैंने देखा कि मोटर साइकिल वाले ने अपनी मोटर साइकिल को रोककर के, बस में चढ़कर के उस वृद्ध आदमी से ये नहीं कहा कि ‘‘तूने थैंक्यू नहीं कहा ?’’ ना। वो चला गया।

मैंने सोचा कि हम एंजेल्स की बात करते हैं। मैंने अभी-अभी एक एंजेल को मोटर साइकिल में देखा और उसने... अब बेचारा वो कहां जा रहा था ? लोग उसकी इंतजार करेंगे। कितने लोगों के लिए उसने एक बहुत ही मुश्किल बात को सरल बना दिया। वो आया। कहां से आया ? पता नहीं। और कहां गया ? मैं देखता रहा, कहां गया ? कहीं चला गया वो। उसके पर नहीं थे और वो देखने में भी कोई ऐसा नहीं लगता था कि विशेष आदमी हो। परंतु वो मनुष्य था। और उस मनुष्य के रूप में वो एंजेल आई — वो था और उसने एक बहुत छोटा-सा काम किया — ‘‘ठक-ठक! तेरा पैसेंजर छूट गया।’’ और चला गया।

ये हम सब कर सकते हैं। हम ये सब कर सकते हैं। यह मानवता है। और जब मनुष्य अपने आपको ही नहीं जानता है तो उसकी मानवता क्या है, वो नहीं समझ पाता है। और ये समझना बहुत जरूरी है।

- प्रेम रावत

उपहार (Uphaar) 00:01:49 उपहार (Uphaar) Video Duration : 00:01:49 अगर कोई आपको उपहार दे और आप उसे स्वीकार न करें तो वो उपहार किसका हुआ ?

प्रेम रावत:

मैं एक सवाल पूछता हूं आपसे। अगर कोई आपको गिफ्ट दे — अगर कोई आपको उपहार दे और आप उस उपहार को स्वीकार न करें तो वह उपहार किसका हुआ ? देने वाले का या लेने वाले का ?

उसी का है, जिसने दिया। आपका नहीं है। वो उपहार तभी आपका होगा, जब आप उसको स्वीकार करेंगे।
तो आपको बनाने वाले ने यह जिंदगी दी। अगर आपने स्वीकार नहीं की तो यह किसकी हुई ?

उसी की हुई। आपकी नहीं हुई। अपनी जिंदगी को जीने के लिए इस जिंदगी को स्वीकार करना बहुत जरूरी है।
किसकी है यह जिंदगी ?

अगर स्वीकार किया, तुम्हारी है। पहले जिंदगी स्वीकार करो, क्योंकि वो देने वाला दे रहा है। उसका नाम ही दाता है, वो सबको देता है। वो तुमको स्वांस रूपी ये चीज दे रहा है, इससे बड़ा धन कोई नहीं है। इससे बड़ा धन कोई नहीं है!

हीरे का हार (The Diamond Necklace) 00:03:31 हीरे का हार (The Diamond Necklace) Video Duration : 00:03:31

The Diamond Necklace

Oftentimes, we tend to anguish over acquiring what we don't have and forget to appreciate the things we do have.

मैं समाज में कैसे कंट्रीब्यूट करूं 00:04:38 मैं समाज में कैसे कंट्रीब्यूट करूं Video Duration : 00:04:38 अब समय आ गया है दरारों को बंद करने का। सब मिलकर के जब करेंगे, नई सीढ़ी बनेगी और इ...

Text on screen:

एक मनुष्य होने के नाते, मैं समाज में कैसे कंट्रीब्यूट कर सकता हूं ?

कनुप्रिया:

एक भारतीय होने के नाते, आज मैं अगर अवेयर हूं, मैं अगर थोड़ा-सा जागरूक हो रहा हूं — आपने कहा कि, मैं कितना कूल हूं, खुद ही पहचान लूं अगर मैं जान रहा हूं ये तो मुझे क्या कंट्रीब्यूट करना है कि वो सीढ़ी मैं बना पाऊंगा। ये कुछ जरूर पूछना चाहूंगी मैं ।

प्रेम रावत जी:

देखिए! यह तो बहुत सरल-सी बात है। यह बात है — अगर हम यह जान जाएं कि हमारे पास भी कुछ देने के लिए है और हमारे पास गुंज़ाइश है कुछ लेने के लिए। कुछ लें, कुछ दें। बस!

यह नहीं है कि ‘‘बस, हम तो सिर्फ देंगे, हम लेंगे नहीं! हमको कोई चीज विदेश की नहीं चाहिए।’’

अच्छा, यह आपका फाउंटेन पेन कहां से आया ? आपका फोन कहां से आया ? आपकी बस कहां से आयी ? आपका हवाई जहाज कहां से आया ? आपकी पैंट कहां से आयी ? आपकी शर्ट कहां से आयी ? आपके चश्में कहां से आए ? आपका टूथपेस्ट कहां से आया ?

कोई जवाब नहीं दे रहा है।

कनुप्रिया: बिल्कुल! तो जो अच्छाई हमारे पास है...

प्रेम रावत जी:

नीम की बात नहीं कह रहा हूं मैं, टूथपेस्ट की बात कर रहा हूं। नीम तो आया हिन्दुस्तान से, टूथपेस्ट आया विदेश से।

हैं जी ?

तो ये सारी चीजें ग्रहण करने के लिए तो कोई प्रॉब्लम नहीं है, परंतु शादी-ब्याह होगा और उसमें क्या बजाएंगे ?

वो ट्रमबोन! वो कहां से आया ?

वो हिन्दुस्तानी है ? ना! वो भी विदेश से आया।

ड्रम बजाएंगे, वो कहां से आया ? विदेश से।

हिन्दुस्तानी क्या है ? वो हिन्दुस्तानी नहीं है, पर तबला — ये सारी चीजें। वो तो ज्यादा बजता नहीं है, शादी-ब्याह में जब बारात चलती है।

तो समझने की बात है — कुछ लें, कुछ दें। और हर एक व्यक्ति, जो दिया जाए उसको देखने के लिए, उसको स्वीकार करने के लिए, उसको जानने के लिए राज़ी हो। और जो दिया जाए, वो ऐसा दिया जाए, ताकि औरों का भी भला हो। वो चीजें नहीं दी जाएं, जिनका कोई सिर-पैर ही नहीं है। पर वो चीजें दी जाए, जिससे सबका भला होगा। सबका! सबका!

तभी सब मिलकर के — क्योंकि अब समय आ गया है दरारों को बंद करने का। दरारों को बढ़ाने का नहीं, दरारों को बंद करने का। सब मिलकर के जब करेंगे, नई सीढ़ी बनेगी और इस सीढ़ी के ऊपर सब चढ़ेंगे, सिर्फ युवा ही नहीं। सिर्फ युवा ही नहीं! क्योंकि लोग फिर वही बात करते हैं, युवा पीढ़ी की बात करते हैं।

हम कहते हैं, क्यों जी ? सिर्फ युवा ही क्यों ?

क्योंकि सब लोग अपनी जिम्मेवारी उनके सिर पर थोपना चाहते हैं। नहीं, हम सबको जिम्मेवार होना चाहिए, सबको जिम्मेवार होना चाहिए। समय ज्यादा दूर नहीं है। धीरे-धीरे लोग अस्सी, नब्बे, सौ साल जीना शुरू कर देंगे तो फिर युवा क्या रह जायेंगे, अगर युवा का ही इंतजार करते रहेंगे तो ?

सबको मिलकर के — सब एक हैं। सब मनुष्य हैं! जबतक ये स्वांस तुम्हारे में आ रहा है, जा रहा है, तुम पर भगवान की कृपा है। उठो और इस जिंदगी को स्वीकार करो! इस कृपा को स्वीकार करो अपने जीवन में, ताकि हम सभी इस पृथ्वी के वासी सब एक होकर के — एक होकर के अपनी, सबकी-सबकी तकदीर बदल सकें।

Text on screen:

इस पृथ्वी के वासी सब एक होकर के

अपनी और सबकी तकदीर बदल सकते हैं।

दो मेंढक (Do Mendak) 00:03:07 दो मेंढक (Do Mendak) Video Duration : 00:03:07 हमें जरूरत है अपनी धारणाओं की दुनिया से बाहर निकलने की।

Title : दो मेंढक

पहला मेंढक : हैलो! तुम यहां घूमने आये हो ?

दूसरा मेंढक : हां, भाई! मैं तो बस यहां से गुजर रहा था तभी अचानक बारिश आ गई।

पहला मेंढक : अरे परेशान मत हो दोस्त, तुम सही जगह आये हो। मैं तो यहां इस तालाब में रहता हूं। आओ देखो!

पहला मेंढक : तो देखा तुमने! कितना बड़ा है मेरा तालाब।

दूसरा मेंढक : हूं!

पहला मेंढक : अच्छा, तुम कहां रहते हो ?

दूसरा मेंढक : मैं तो एक समुंदर में रहता हूं।

पहला मेंढक : समुंदर! हूं... वो कितना बड़ा होगा ?

दूसरा मेंढक : हूं... बहुत बड़ा।

पहला मेंढक : क्या तुम्हारा समुंदर इतना बड़ा है ?

दूसरा मेंढक : नहीं, इससे बड़ा।

पहला मेंढक : तो क्या तुम्हारा समुंदर इतना बड़ा है ? इतना बड़ा ? इतना बड़ा ?

पहला मेंढक : तो क्या वो इससे भी बड़ा है ?

दूसरा मेंढक : समुंदर इससे बहुत बड़ा होता है, मेरे दोस्त।

पहला मेंढक : मैं नहीं मानता। इतने सालों से मैं यहां रह रहा हूं, मगर मैंने तो आजतक कोई ऐसी जगह देखी नहीं, जो मेरे तालाब से बड़ी हो। ऐसा हो ही नहीं सकता कि इससे भी बड़ी कोई जगह हो।

दूसरा मेंढक : हूं... तो ठीक है चलो मेरे साथ। आओ मैं तुम्हें दिखाता हूं कि समुंदर कैसा होता है।

पहला मेंढक : ओह! माफ करना मेरे दोस्त। आजतक मैं यही सोचता रहा कि मेरा तालाब सबसे बड़ा है। मगर मुझे अब अहसास हुआ कि मैं गलत था।

कहानी का सार यही है कि हम अपनी धारणाओं की दुनिया में एक छोटे तालाब की तरह रहते हैं और सोचते हैं कि इस दुनिया से बेहतर और कुछ नहीं है। जब कोई बताता है कि इसके अलावा एक दूसरी दुनिया भी है, तो उस पर यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है।

निराशा क्यों होती है (Niraasha Kyun Hoti Hai) 00:04:09 निराशा क्यों होती है (Niraasha Kyun Hoti Hai) Video Duration : 00:04:09 हमारी नासमझी ही हमारी निराशा का कारण है।

Title : निराशा क्यों होती है ?

कनुप्रिया: निराशा न सिर्फ एक पीढ़ी को, हर पीढ़ी में फैल रही है। क्या है यह निराशा का इतना प्रभाव कि उठने को ही नहीं आने दे रहा है ? सबकुछ होते हुए भी, सबकुछ ना होते हुए भी, निराशा एक है, जो है साथ में।

प्रेम रावत जी: एक छोटा बच्चा डॉक्टर के पास गया और बच्चे ने डॉक्टर से कहा कि ‘‘डॉक्टर साहब! मैं अपने को जहां भी छूता हूं, दर्द होता है।

कनुप्रिया: बहुत सही बात है!

प्रेम रावत जी: ‘‘मेरे घुटने में भी दर्द हो रहा है, मेरे सिर में भी दर्द हो रहा है, मेरे कान में भी दर्द हो रहा है, मेरी नाक में भी दर्द हो रहा है, मेरे दांत में भी दर्द हो रहा है, मेरे सिर के ऊपर भी दर्द हो रहा है, मैं यहां लगाता हूं फिर भी दर्द हो रहा है, सब जगह दर्द हो रहा है।’’

डॉक्टर ने जांच-बींच की और कहा, ‘‘तेरी उंगली टूटी हुई है। तू अपनी उंगली को जहां भी लगाता है, दर्द होता है।’’

तो यही बात हमारे साथ है। मतलब, मैं अपने को इस बात से जुदा नहीं कर रहा हूं। क्योंकि जो निराशा का कारण है, वो है हमारी नासमझ! और नासमझ एक ऐसी चीज है, जो हमारे साथ चलती है। जहां हम जाते हैं, हमारे साथ आती है। नासमझ यह थोड़े ही है कि किसी चीज को निकाल करके यहां रख दिया। ना! हमको यह समझना है कि समझ भी हमारे अंदर है और नासमझ भी हमारे अंदर है। अंधेरा भी हमारे अंदर है, प्रकाश भी हमारे अंदर है। जिसको आप प्रकट करेंगे, वही प्रकट होगा, जिसको आप प्रकट करेंगे।

गुस्सा करने में आपको कितने मिनट लगते हैं, कितने सेकेंड लगते हैं ?

क्योंकि गुस्सा भी आपके अंदर है। परंतु आपकी समझ क्या है ? झुंझलाए हुए हैं। सब के सब झुंझलाए हुए हैं। एक तिनका और अगर सिर पर पड़ जाए, खत्म! स्ट्रेस! स्ट्रेस! स्ट्रेस! स्ट्रेस! स्ट्रेस! सबके ऊपर!

होता क्या है ? लोग हैं, लगे हुए हैं, लगे हुए हैं, लगे हुए हैं, लगे हुए हैं...। चैन का कोई नाम नहीं ले रहा है। शांति का कोई नाम नहीं ले रहा है। जब उम्र ज्यादा हो जाएगी तो जितना कमाया, जितना कमाया, ये सब डॉक्टरों के पास जाएगा, सब डॉक्टरों के पास जाएगा। क्यों ?

फिर तबियत खराब होगी, फिर अस्पताल में ले जाएंगे और पड़े रहेंगे — अब ये चाहिए, अब ये चाहिए, अब ये चाहिए! अरे! मैं मर गया! अरे! मेरा यहां दर्द हो रहा है। अब यहां दर्द हो रहा है। चैन से तो जिंदगी गुजारी नहीं।

तो जब हमारी जिंदगी के अंदर कुछ इस प्रकार की चीजें होने लगती हैं, तो यह गलत दिशा है। और कम से कम मैं इस बात को समझता हूं और जो मैं कह रहा हूं, इस बात को आप लोग भी समझते हैं।

आप लोगों ने भी देखा है, क्या होता है ? बेपरवाही! इस जिंदगी के अंदर बेपरवाही!

इस स्वांस को न समझना, इस आशीर्वाद को न समझना — तो इसके साथ यही होगा। और सारी दुनिया कन्फ्यूज़ पड़ी है।

और मेरा यह कहना है कि वो, जो तुम्हारे हृदय के अंदर व्यापक है, वह ठीक करना चाहता है, परंतु उसको ठीक करने तो दो! और वह कहां से करेगा ठीक ? तुमसे करेगा ठीक!

Text on screen:

हमारी नासमझी ही हमारी निराशा का कारण है!

Log In
Create Account
Forgot Password
Forgot Password?
OR
Don’t have an account? Create Account
Hide

I have read the Privacy Policy and agree.

Have an account? Log In

Forgot Password?

Let us know your email address and we will send you a password reset link.

Please enter the first name. Please enter the last name. Please enter an email address. Please enter a valid email address. Please enter a password. Passwords must be at least 6 characters. Please Re Enter the password. Password and Confirm Password should be same. Please agree to the privacy policy to continue. Please enter the full name. Show Hide
Activate Account

You're Almost Done

ACTIVATE YOUR ACCOUNT

You should receive an email within the next hour.
Click on the link in the email to activate your account.

You won’t be able to log in or purchase a subscription unless you activate it.

Can't find the email?
Please check your Spam or Junk folder.
If you use Gmail, check under Promotions.

Activate Account

Your account linked with johndoe@gmail.com is not Active.

Activate it from the account activation email we sent you.

Can't find the email?
Please check your Spam or Junk folder.
If you use Gmail, check under Promotions.

OR

Get a new account activation email now

Need Help? Contact Customer Care

Activate Account

Account activation email sent to johndoe@gmail.com

ACTIVATE YOUR ACCOUNT

You should receive an email within the next hour.
Click on the link in the email to activate your account.

Once you have activated your account you can continue to log in

You haven't marked anything as a favorite so far. Please select a product Please select a play list Failed to add the product. Please refresh the page and try one more time.