View as
गुस्सा (Gussa) 00:08:56 गुस्सा (Gussa) Video Duration : 00:08:56 मुझे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है। मुझे पता है गुस्सा करना गलत है पर फिर भी ...

प्रश्नकर्ता:

मुझे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता है। मुझे पता है गुस्सा करना गलत है पर फिर भी मैं गुस्सा करता हूं। मैं गुस्से को कंट्रोल कैसे करूं ?

प्रेम रावत :

सबसे पहला मेरा यह प्रश्न होगा कि ‘‘आप यह कंट्रोल क्यों करना चाहते हैं ? मतलब, गुस्से में ऐसी क्या बात है, जो आपको पसंद नहीं है ? भाई, आपका स्वभाव है। अगर आपका स्वभाव नहीं होता तो आप गुस्सा कैसे करते ? तो ऐसी क्या चीज़ है, जो गुस्सा करने पर आपको पसंद नहीं है ?’’

मैं आपसे यह प्रश्न इसलिए पूछ रहा हूं, क्योंकि यह प्रश्न मैंने अपने आपसे पूछा। गुस्सा मेरे को भी आता है और लोग ऊटपटांग काम करते हैं तो उससे भी गुस्सा आता है। तो एक दिन मैंने अपने आपसे पूछा कि ठीक है, लोग तो ऊटपटांग काम करते ही हैं — अब जिसकी समझ में नहीं आया, कुछ न कुछ करेगा। वो गलत करेगा। पर तुमको गुस्से से गुस्सा क्यों है ? तो समझ में यह आया कि मुझको गुस्से से गुस्सा इसलिए है, क्योंकि गुस्सा करने के बाद जैसा मैं महसूस करता हूं, वो मुझे पसंद नहीं है। जब गुस्सा हो रहा होता है तो मेरे को मालूम ही नहीं है कि गुस्सा कब आता है ? पर जब चला जाता है, तब मेरे को महसूस होता है कि — ‘‘हां!… ऑ… ऑ… ऑ… हा…हा…  ये अच्छा नहीं था।’’

तो गुस्से के बाद जो होता है, उससे मुझे नफरत है। क्योंकि मैं एक ऐसी चीज बोल जाऊंगा, जो मैं कभी बोलना नहीं चाहता। मैं ऐसी चीज़ कर जाऊंगा, जो मैं कभी करना नहीं चाहता। मतलब, गुस्सा एक ऐसी चीज़ है, जिसमें कि मैं अपने आपको खो देता हूं। जो कुछ भी मैंने अपने से प्रण किया है, जो भी मैंने अपने से कहा है कि ‘‘नहीं, ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है’’, वो मैं तोड़ देता हूं। क्योंकि वो एक ऐसा समय है कि मैं अपना संतुलन खो देता हूं। तो सबसे बड़ा प्रश्न तो मेरे को यह पूछना है अपने से कि ‘‘मेरे लिए, मेरे संतुलन की क्या कीमत है ? मेरे संतुलन के लिए। बात काम की नहीं है, बात औरों की नहीं है। मेरे लिए मेरे संतुलन की क्या कीमत है ?’’ अगर यह मेरे लिए मूल्यवान है तो मुझे मेरा संतुलन खोना अनिवार्य नहीं है।

इसके लिए मैं क्या करूं ? क्या करूं ? बोलने से पहले गुस्से की हालत में — अगर मैं अपने को दो क्षण भी दूं, दो सेकेंड सोचने का, मैं समझ सकता हूं। बात यह वही है कि जब मनुष्य क्रोध में होता है, वो अपने आप से अलग है। वो — वो है, जो वो नहीं होना चाहता है। वो — वो है, जो उसके स्वभाव में नहीं है। और उससे बचने के लिए, उससे बचने के लिए जो कुछ भी उसको करना पड़े। ऐसे भी लोग हैं, जिनको देखते ही गुस्सा आता है। तो फिर पैर तो आपके हैं! वहां क्यों जाते रहते हो ? जाओ! ऐसी संगत में बैठो, ऐसी संगत में बैठो, ऐसी कंपनी में बैठो, ऐसी संगत में बैठो, जिसमें आप उभरो! अंदर से उभरो! कोई चीज़ अच्छी समझो! ऐसी संगत में नहीं, जहां कि आप अपने से दूर होते जा रहे हैं। ये कुसंगत है!

हर एक आदमी के पास यह उपाय है कि वो अपनी कुछ संगत बनाए। चाहे वो जेल में ही क्यों न हो, जहां कोई भी समझेगा कि यह तो असंभव बात है! परंतु सबसे बड़ी बात है — और फिर यह वही उदाहरण है कि एक मोमबत्ती जो जली हुई है, वो दूसरी मोमबत्ती को जला सकती है। जब मोमबत्तियां जलने लगती हैं तो अंधेरे का आना असंभव हो जाता है।

परंतु ऐसी चीज़ें हैं, जो मेरा ध्यान, जहां होना चाहिए, वहां से अलग करती हैं। तो या तो मैं अब उन चीज़ों की लिस्ट बनाऊं और उन चीजों की लिस्ट अपनी जेब में रखूं और जब कैसी भी परिस्थिति हो, देखूं, आज ये लिस्ट में है या नहीं है। या फिर मैं ये बात समझूं कि मैं चाहता क्या हूं ? हर पल, हर क्षण अपने ज़ीवन में सुबेरे से लेकर शाम तक मैं चाहता क्या हूं ? और यह चाहत मेरी एक ऐसी है, जो मेरे साथ हमेशा बंधी रही है । चाहे मैं कितना भी छोटा था, चाहत यही थी कि ‘‘मैं खुश रहना चाहता हूं। मैं आनंद में रहना चाहता हूं।’’

मेरे गुरु महाराज जी ने, मेरे पिता जी ने मेरे को बताया कि वो आनंद का स्रोत मेरे अंदर है। जिस आनंद को मैं चाहता हूं, वो आनंद का स्रोत मेरे अंदर है। वो बाहर नहीं है। जब बाहर की चीज़ों को बदलना मैंने बंद किया — क्योंकि पहले तो यही था कि मैं ये कर दूंगा, मैं ये कर दूंगा तो अच्छा हो जाएगा। ये कर दूंगा तो अच्छा हो जाएगा। और जब अंदर की चीज़ों में ध्यान देना शुरू किया तो अपने आप फिर वो जो हृदय रूपी प्याला है, वो आनंद से भरने लगा। क्या वो हमेशा भरा रहता है ? नहीं। क्या वो परिस्थितियां आज भी आती हैं, जिनसे कि गुस्सा हो ? बिल्कुल! क्योंकि वो चीज़ मेरे को मालूम पड़ गई है कि जो चीज़ चाहिए मेरे को, वो मेरे अंदर है तो मैं कम से कम उस तरफ कोशिश कर सकता हूं। और जितनी कोशिश मैं करता हूं अपने अंतर्मुख होने की, अंदर जाने की — अंदर जो मेरे सद्भावना है, उसको उभारने की, तो वो कोशिशें सफल होती हैं। अगर मैं ऐसी चीज़ की तरफ कोशिश करूं, जो संभव नहीं है तो वो कोशिश अपने आप असफल होगी। तो अगर मैंने अपनी जिंदगी के अंदर कोशिश की है कि मेरी सारी समस्याएं चली जाएं तो वो सफल नहीं होंगी।

अब लोग यही सोचते हैं कि अगर मेरे पास धन हो तो मेरी मुश्किलें सब खतम हो जाएंगी। देख लीजिए आप! अखबार पढ़िए! लोग हैं, जिनके पास इतना पैसा है, इतना पैसा है कि कई-कई बार उनको खुद नहीं मालूम कि उनके पास कितना पैसा है। तो क्या उनके पीछे समस्याएं नहीं लगी हुई हैं ? बिल्कुल समस्याएं लगी हुई हैं। किसी को — उनका नाम कीचड़ में न उछल जाए — यह उनको समस्या रहती है। कोई उनसे ज्यादा अमीर न हो जाए — यह उनकी समस्या लगी रहती है। समस्याएं तो सबके पीछे लगी हुई हैं। परंतु एक ऐसी भी जगह है, जहां समस्या नहीं हैं। समस्या को हटाने के लिए लोग कोशिश करते आए हैं और सफल नहीं हुए हैं। परंतु जो अंतर्मुख हो करके उस चीज़ को समझते हैं कि आनंद जो मेरे को चाहिए, खुशी जो मेरे को चाहिए — मैं खुश रहना चाहता हूं, वो मेरे अंदर है। और उस तरफ मैं जितनी कोशिश करूंगा, वो सब सफल होंगी, बाहर की तरफ मैं जितनी कोशिश करूंगा, वो सब सफल नहीं होंगी ।

हार-जीत (Haar-Jeet) 00:11:57 हार-जीत (Haar-Jeet) Video Duration : 00:11:57 असली जीत वह है — जब मैंने अपने हृदय को शांत कर लिया है।

प्रेम रावत:

हमारी सारी जिंदगी हम एक ही चीज से तौलते हैं। हार-जीत! हार-जीत! हार-जीत! हमारी जीत हो। हमारी जीत हो। हम सक्सेसफुल हों। इसको हम जीत समझते हैं। आशीर्वाद! आशीर्वाद देते हैं लोगों को। क्या ?

"तुम्हारी मनोकामना पूरी हो!"

मनोकामना मतलब, मन की कामना पूरी हो। हृदय की नहीं, मन की कामना। मुझे कोई व्यक्ति समझा दे कि क्या ऐसा भी मन होता है, जिसकी सारी कामना पूरी हो चुकी हों।

मन के बहुत तरंग हैं, छिन छिन बदले सोय।

एक ही रंग में जो रहे, ऐसा बिरला कोय।।

बात विभिन्न तरंगों की नहीं है, बात है ‘छिन-छिन बदले सोय’। बदलता रहता है, बदलता रहता है, बदलता रहता है। आज ये है, आज वो है, आज वो है, आज वो है, आज वो है, आज वो है।

माता-बहनें — मैंने देखा हुआ है। जाती हैं साड़ी खरीदती हैं। साड़ी कैसे खरीदी जाती है ?

आप दुकान में जाते हैं, दुकानदार से कहते हैं, "साड़ी दिखाओ!"

वह आपको एक साड़ी दिखाता है। आप उसको खरीद लेते हैं। ऐसे ही तो है न ? ना!

"और दिखाइए! कोई बढ़िया दिखाइए! और कौन-कौन से रंग हैं आपके पास ?" 

ये माता-बहनों की ही बात नहीं है। जब लोग टाई खरीदने के लिए जाते हैं, वही बात होती है। औरतें तो साड़ी पहनती हैं, मर्द टाई पहनते हैं। वही उनके लिए साड़ी है। वो उसी को — ऐसी होनी चाहिए, ऐसी होनी चाहिए, ऐसी होनी चाहिए, ऐसी होनी चाहिए, ऐसी होनी चाहिए।

तो हमारे लिए जीत क्या है ? जीत वो है कि जब हमारी मन की कामनाएं पूरी हों तो हमारी जीत हो गयी। और हमारी मन की कामना पूरी नहीं हो रही है तो हम हार रहे हैं। जब आप समझ जाएंगे और अपना जीवन अपने मन से नहीं, पर अपने हृदय से जीना शुरू करेंगे — जिस दिन आप प्यार अपनी जिंदगी के अंदर अपने हृदय से करना शुरू करेंगे, उस दिन आपको सच्चे प्यार का अहसास होगा। जिस दिन आप अपने मन से नहीं, पर अपने हृदय से जीना शुरू करेंगे, जिंदगी क्या है, आपको समझ में आएगी।

हृदय भी है मनुष्य के पास। मन भी है मनुष्य के पास, हृदय भी है मनुष्य के पास। मन का उपयोग कैसे करते हैं, यह सबको भलीभांति मालूम है। पर हृदय का प्रयोग कैसे होता है, ये किसी को — बहुत बिड़ला कोई मिलेगा, जिसको मालूम हो। जो एक ही रंग में रहना जानता हो, बहुत बिड़ला है। बिड़ला मतलब — रेयर! आसानी से नहीं मिलेगा।

तो अगर आप अपनी हार से बाहर जाना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको यह समझना पड़ेगा कि असली जीत क्या है। और असली जीत है — जब मैंने अपने मन को नहीं, अपने हृदय को शांत कर लिया है, जब मैंने अपने हृदय की पुकार को सुनना शुरू कर दिया है। नहीं तो मेरे को सारे जीवन में — बात यह है जी कि कई बार हम समझते हैं कि हम जीत गए। और जीत के भी फिर अहसास बाद में जाकर होता है कि वो जीत नहीं थी, वो तो हार है। उस समय लगा कि जीत गए।

जब नयी-नयी लोगों की शादी होती है, बच्चे होते हैं। बड़ा प्यार है बच्चे से। बड़ा नटखट है, बड़ा ये है, वो है। वो नटखट कितना नटखट है। जरा 16-17-18 साल तक पहुंचने दो, अपने आप पता लगेगा।

मां कई बार बड़े प्यार से अपने बच्चे के बारे में बोलती है, "ये मेरी बात सुनता नहीं है।"

हां! जरा पहुंचने दो 18 साल तक, तब पता लगेगा। क्यों ? अगर बच्चे से प्यार नहीं है, बच्चे को क्या बनना चाहिए, सिर्फ उसी चीज से प्यार है तो तुम्हारी हार निश्चित है।

सबसे बड़ी बात है कि एक बार लोगों से पूछा गया कि "तुम कितने दिन जीओगे ?" 

तो अगर 70 साल भी अगर जिए, उसके बनते हैं लगभग — 25 हजार 550 दिन। और अगर सौ साल भी जिये तो 36 हजार 500 दिन। 36,500। पर जब लोगों से पूछा गया कि अगर सौ साल भी जीओ तो कितने दिन जीओगे ?

तो लोगों का पहला कैलक्युलेशन था — तीन लाख। 3,65,000। थ्री हंड्रेड सिक्सटी फाइव थाउजेंड। वो जीरो एक और लगाना चाहते थे, जो जीरो लगता नहीं है। क्योंकि सबकी ख़्वाहिश है — सिर्फ इतने ही दिन थोड़े जीना है। क्या है मनुष्य के साथ ?

वही वाली बात। एक योद्धा की कहानी कि चाहे वो कितना भी लड़े, कैसे भी लड़े, खूब लड़े, परंतु उसको मरना है।

समझिए आप! कितनी गंभीर बात यह है कि वो लड़ाई कर रहा है। और वो लड़ रहा है। क्यों ? ताकि उसकी जीत हो! तो लड़ रहा है, लड़ रहा है, लड़ रहा है। मार रहा है, और लोगों को मार रहा है, खूब लड़ रहा है, खूब लड़ रहा है, खूब लड़ रहा है। परंतु उसको कोई आकर के अगर यह बताए कि "तू जितना चाहे लड़ ले, पर तेरे को इसी रणभूमि में गिरना है। कट के गिरेगा!" अर्थात्, कितना भी वो लड़ ले, उसकी जीत नहीं होगी।

वो योद्धा कौन है ? आप हो। मैं हूं। और हम क्या कर रहे हैं ? हम लड़ रहे हैं। और कोई हमको आकर बताता है, "लड़ ले! खूब लड़ ले! पर जीत नहीं होगी तेरी।"

तो क्या करोगे ? क्या करोगे ? लड़ते रहोगे ? और अगर वही प्रश्न उससे पूछा जाए कि ‘‘अगर मेरे को इस रणभूमि में गिरना ही है तो मेरी जीत कैसे संभव है ?” और अगर वही व्यक्ति उसको कहे कि तू लड़ाई में नहीं जीत सकता, क्योंकि तेरे को इसी रणभूमि में गिरना है। तू लड़ाई में नहीं जीतेगा। कोई नहीं जीतेगा। तू हारेगा भी नहीं, पर तू जीतेगा भी नहीं। क्योंकि सभी को इस रणभूमि में गिरना है।

तो अगर तू अपनी जीत चाहता है तो जो तू जीता हुआ है — और यह भी कितनी सुंदर बात है। देखिए, शब्दों का खेल है! तू अगर अपनी जीत चाहता है तो तू समझ कि तू जीता हुआ है। अब इसके दो शब्द हो गए। एक तो कि पहले ही तुम्हारी जीत हो रखी है और दूसरा कि तुम जीते हुए हो। अर्थात्, तुम जिंदा हो! जिंदा होने में ही तुम्हारी जीत है। लड़ाई में तुम्हारी कभी जीत नहीं होगी। लड़ाई में जीत नहीं होगी। ये जानने में तुम्हारी जीत होगी, ‘‘तुम जीते हुए हो।’’ तो वही, ‘‘जीते हुए हो।’’ मतलब, जीते हुए हो — ‘‘पहले से ही तुम्हारी जीत हो रखी है’’ या फिर दूसरा कि ‘‘तुम जिंदा हो! जीते हो!’’ इसको जानो! इसको समझो कि ये क्या है।

असली जीत है — जब मैंने अपने मन को नहीं, अपने हृदय को शांत कर लिया हो।

किसान (Kisaan) 00:04:54 किसान (Kisaan) Video Duration : 00:04:54

प्रेम रावत:

जमीन में कुछ न कुछ उगना है। हल चला लो, पानी दो, बीज़ मत डालो। कुछ न कुछ जरूर उगेगा। कुछ न कुछ जरूर उगेगा। बात यह है कि जो उगेगा वो खाने लायक नहीं है।

तो किसान क्या करता है ? उसको मालूम है कुछ न कुछ जरूर उगेगा। सबसे पहले वो उग जाए, जो खाने लायक हो तो अच्छा रहेगा। तो वो बीज़ डालता है, पानी देता है और क्या करता है कि वो चीज़ जो खाने लायक नहीं है वो न उगे तो उसको निकालता रहता है। ताकि क्या उपजे जो खाने लायक है।

तुम भी किसान हो और तुम्हारी ज़िंदगी खेत है। और यह स्वांस रूपी हल चल रहा है और इस खेत में कुछ न कुछ जरूर उगेगा। ज़ीवन तो निकल रहा है इसको कोई रोक नहीं सकता। समय है, आ रहा है और जा रहा है, आ रहा है और जा रहा है। आता रहेगा और जाता रहेगा। इसको कोई रोक नहीं सकता, इसको कोई थाम नहीं सकता। और ऐसे ही तुम्हारे अन्दर यह स्वांस आ रहा है और जा रहा है, आ रहा है और जा रहा है, आ रहा है और जा रहा है। और सबसे बड़ी चीज़ जो मनुष्य के लिये हो रही है वो है, कि उसका ज़ीवन इस समय मौजूद है।

तुम्हारी ज़िंदगी खेत है और यह स्वांस रूपी हल चल रहा है और इस खेत में कुछ न कुछ जरूर उगेगा। प्रश्न यह है क्या ?

अकेलापन (Akelapan) 00:10:05 अकेलापन (Akelapan) Video Duration : 00:10:05 अकेलापन महसूस करना — यह सब मन का खेल है।

प्रश्नकर्ता:

मुझे अकेलापन महसूस होता है, इस अकेलेपन से बचने का क्या उपाय है?

प्रेम रावत:

देखिए! यह एक बहुत इन्टरेस्टिंग सवाल है। और इन्टरेस्टिंग यह इसलिए है कि हम करते क्या हैं अपने जीवन में ? तो, पहले तो हम बच्चे रहते हैं — खेलते हैं, कूदते हैं, फिर हमारा स्कूल आना-जाना होता है। वहां मित्र बनाते हैं, पढ़ाई करते हैं, जिम्मेवारियों को समझते हैं, गृहकार्य मिलता है। धीरे-धीरे-धीरे करके हमारी पढ़ाई और आगे बढ़ती है। हम और कल्चर्स के बारे में पढ़ते हैं। हम इतिहास के बारे में पढ़ते हैं। हम जॉग्रफी के बारे में पढ़ते हैं। धीरे-धीरे करके वो भी बढ़ती हैं चीजें। और लोगों के बारे में सुनते हैं और करते-करते-करते हमारे एम्बिशन्स भी बहुत बढ़ते हैं — हमारी धारणाएं, हमारे विचार, हमारी इच्छाएं! हम ऐसा बनना चाहते हैं। हम ऐसा बनना चाहते हैं और स्कूल और यूनिवर्सिटीज़ का काम ही यह है कि वो माइंड को शेप करें।

तो धीरे-धीरे-धीरे करके हमको यह लगने लगता है कि ‘‘अच्छा! हम ये बनेंगे! हम डॉक्टर बनेंगे, हम इंजीनियर बनेंगे! हम ये करेंगे, हम ये करेंगे! हम उस जैसा बनना चाहते हैं। हम उस जैसा बनना चाहते हैं।’’ तो फिर इन चीज़ों को ले करके आगे — यूनिवर्सिटीज़ में जाते हैं, ग्रेजुएट होते हैं और बाहर आकर के जॉब लेते हैं, नौकरी करते हैं।

तो अगर इस सारी चीज को देखा जाए तो ये हुई — रिवर्स इंजीनियरिंग! पर रिवर्स इंजीनियरिंग का मतलब कि आपका लक्ष्य ये है और आप इतना सबकुछ कर रहे हैं, उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए। तो ये लक्ष्य और इतना सबकुछ आपको करना पड़ रहा है। इसमें आप अपना समय का भी बलिदान कर रहे हैं। इसमें आप अपनी एनर्जी का भी बलिदान कर रहे हैं। इसमें आप अपने रिश्तों का भी बलिदान कर रहे हैं और करते-करते, करते-करते और फिर आप उस लक्ष्य तक पहुंचते हैं। अब आपके दिमाग में यह था कि जब वो लक्ष्य पूरा कर लेंगे तो फिर हम बहुत ही खुश हो जाएंगे। सबकुछ ठीक हो जाएगा! फिर कोई चिंता करने की चीज नहीं रहेगी। परंतु उस लक्ष्य तक जितने भी पहुंचे हुए हैं, वो कभी यह नहीं कहते हैं कि ऐसा होता नहीं है। वो सारी चीज़ें तब भी बनी रहती हैं।

तो एक प्रश्न उठता है कि ‘‘क्या इस जिंदगी को रिवर्स इंजीनियरिंग के लिए — यह उचित है या किसी और चीज के लिए ?’’ मतलब, ये भी संभव है कि आप अपनी जिंदगी में तो — रिवर्स इंजीनियरिंग तो हुई, ये लक्ष्य हुआ और ये ऐसा हो गया। और अगर जरा विचार करिए! बजाय ऐसे के, अगर ऐसा हो तो क्या हो ? मतलब, आप क्या नहीं हासिल कर सकते हैं ?

अगर आपने अपने जीवन के अंदर खुशी हासिल कर ली, अपने जीवन के अंदर अपने आपको पहचान लिया, अपने जीवन के अंदर कुछ ऐसा कर दिया कि जो आपके सपने थे, वो टूट गए और सपने से भी बहुत बड़ी चीज आपने हासिल कर ली।

तो मैं समझता हूं कि जिंदगी की ये पोटेंशियल है। आपके लाइफ की ये पोटेंशियल है। ये संभावना है! ये नहीं, ये संभावना है कि एक चीज नहीं, बहुत-कुछ आप हासिल कर सकते हैं। परंतु इसके लिए रिवर्स इंजीनियरिंग नहीं, इसके लिए आपको दिल से काम करना पड़ेगा।

जो आपका — जो आप दिल से काम करेंगे, वो काम नहीं है। उसको आप इंज्वाय करेंगे, उसका आप पूरा-पूरा फायदा उठाएंगे।

तो ये कैसे हो ? और जो कुछ भी और जो समस्याएं हैं — आज के यूथ में ये है। सब लोग ये कर रहे हैं — रिवर्स इंजीनियरिंग, रिवर्स इंजीनियरिंग!

बताइए मेरे को क्या — और ये इसके लिए तो कोर्सेज भी हैं। जो आप कोर्स ले सकते हैं कि ये हासिल करने के लिए आपको क्या-क्या, क्या-क्या करना पड़ेगा। सारी जिंदगी को रिवर्स इंजीनियरिंग कर रखा है।

परंतु जिंदगी की पोटेंशियल, संभावना रिवर्स इंजीनियरिंग के लिए नहीं है, जिंदगी की पोटेंशियल इसके लिए है। और जबतक आप इस पर नहीं आएंगे, तो ये तो और जो चीज़ें हैं, अब जैसे — परिवार से अलग होना या अपने आपको लोनली महसूस करना! लोनली महसूस तो वो लोग भी करते हैं, जो अपने परिवार के साथ हैं। क्योंकि वो भी रिवर्स इंजीनियरिंग कर रहे हैं। वो समझते हैं कि ‘‘मैं यहां अटका हुआ हूं।’’ कोई गांव में है, वो पढ़-लिख तो लिया, पर वो देख रहा है कि यहां कोई संभावना तो है नहीं उसके लिए, पर वो अटका हुआ है। तो मां-बाप के साथ तो है, परिवार के साथ तो है, परंतु ध्यान कहां है ? कहीं और है — ‘‘काश! मैं भी वहां होता!’’ दूसरा वो, जो अटका हुआ नहीं है, जो चले गया — ‘‘काश! मैं वो होता!’’ तो ये ‘‘काश’’ तो दोनों ही कर रहे हैं! काश, काश, काश, काश!

तो बात वो नहीं है कि वो माहौल बदल जाए या वो माहौल बदल जाए। आप अपने में देखिए! कि आप क्या कर सकते हैं ? आप अपने में देखिए कि क्या संभावना है ? आपको लोनली होने की जरूरत नहीं है। आप कहीं भी हों, क्योंकि आप अपने साथ हैं। आपका प्रकाश आपके अंदर है। आपकी दोस्ती आपके अंदर है, आपका प्यार आपके अंदर है, आपकी खुशी आपके अंदर है, आपकी सक्सेस आपके अंदर है। इसीलिए, इसीलिए कितना जरूरी है कि आप अपने आपको जानें! और इस संभावना को, अपनी जिंदगी की संभावना को पूरा करें। उसके बिना ये तो सारे चक्कर बने रहेंगे। कोई ये चाहता है, कोई ये चाहता है, कोई ये चाहता है, कोई ये चाहता है।

अब देखिए! आप जा रहे हैं कहीं, आपने एक खिड़की में देखा, दुकान में देखा, एक सूट है। अच्छी सूट है। आपने खरीद ली। तो उसका यह मतलब थोड़े ही है कि आप और सूट नहीं खरीदेंगे। दो महीने के बाद, तीन महीने के बाद, एक साल के बाद — हो सकता है वो सूट आपको फिट न हो। फिर आप देखें दूसरी। वो पहन लेंगे, वो खरीद लेंगे।

तो पहली वाली क्यों खरीदी ? क्योंकि उस समय वो सूट आपको सूट कर रही थी। तो आपकी परिस्थितियां बदली तो कुछ और बदल गया। कुछ परिस्थिति बदली तो कुछ और बदल गया। कुछ और बदल गया तो कुछ और बदल गया। तो कुछ और बदल गया तो कुछ और बदल गया। तो कुछ और बदल गया तो कुछ और बदल गया। कुछ और बदल गया तो कुछ और बदल गया। ये तो सारी बदलती रहेंगी। अब एक लहर एक जगह आती है। उसी पर आँख बनाए रखना कि दूसरी भी वहीं आएगी, गलत है। वो वहां नहीं आएगी। वो लहर कहीं और आएगी, कहीं और आएगी, कहीं और आएगी। तो समुद्र की लहरों को गिनने से मतलब ?

यह भवसागर भी एक भवसागर है। इसमें भी लहर आती रहती हैं, जाती रहती हैं, आती रहती हैं। यह तो इसकी प्रकृति है। काहे के लिए गिन रहे हो उन लहरों को ? अगर कुछ करना है इस भवसागर के लिए तो वो करिए कि आपकी नौकाएं लहरों के कारण न डूबें। लहरों को गिनने से क्या फायदा ? अपनी पतवार से लहरों को ऐसे ऊपर से मारने से क्या फायदा ? उससे क्या होगा ? बस! कुछ अगर प्रबंध करना है तो कुछ ऐसा प्रबंध करना है कि जिस नौका में आप बैठें हैं, वो डूब न जाए, इन लहरों के कारण। और ये वही डूबने की बात है, जो अपने आपको अकेलापन महसूस करना — तो यह सब मन का खेल है।

मन के बहुत तरंग हैं, छिन छिन बदले सोय।

एक ही रंग में जो रहे, ऐसा बिरला कोय।।

इस मन की तो लहर आती रहती है। किसी को कुछ दुःख है, किसी को कुछ दुःख है। किसी को कुछ दुःख है, किसी को कुछ दुःख है। दुःख तो सबको परेशान करता है। सुखी कौन है ? सुखी वही है, जो अपने अंदर की चीज को जानता है। जो उसके अंदर विराजमान है, जो उसके अंदर बैठी है, उसको जानता है।

भेड़ चाल (Bhed chaal) 00:05:37 भेड़ चाल (Bhed chaal) Video Duration : 00:05:37 इस जीवन का लक्ष्य भेड़-चाल में फंसे रहना नहीं है।

प्रेम रावत:

हम लोगों की एक आदत है और वो आदत भेड़ में भी है। एक भेड़ इधर गई, तो सबके सब उधर ही जायेंगे। तो जब मनुष्य होकर के भी भेड़ जैसा ही रहना है, तो मनुष्य होने से क्या फायदा? मनुष्य होने से क्या फायदा? भेड़ को तो खेती करनी नहीं पड़ती, बाजार जाना नहीं पड़ता। कोई उसको खिलाता है, कोई उसके लिए खेती करता है। कोई चारा डालता है तो भेड़ तो मनुष्य से अच्छी हुई। क्योंकि मनुष्य हो करके भी अगर व्यवहार वही है जो भेड़ का है तो कम से कम भेड़ को तो हमेशा खाना मिलता है और तुम उसके लिए पता नहीं कहां-कहां भागते फिरते हो। फिर फायदा क्या हुआ?

आप मेरी बात समझो, मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूं। क्योंकि बात गम्भीर है। है मजाकिया पर है गम्भीर। और गम्भीर इसलिए है क्योंकि आप मनुष्य हैं। मैं मनुष्य हूं। और मैं मनुष्य के नाते आपसे कह रहा हूं। मैं भी मनुष्य हूं, आप भी मनुष्य हो। मैं मनुष्य के नाते, एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से ये कह रहा है कि — नहीं, इस जीवन का लक्ष्य ये नहीं है। क्योंकि आप जीवित हैं। आप कुछ और पा सकते हैं। कुछ और कर सकते हैं। आप अपने जीवन में शांति का अनुभव कर सकते हैं।

आप अपने जीवन को सफल कर सकते हैं। किसी लिस्ट से नहीं, अपने हृदय के अंदर उस सक्सेस को महसूस करके कि — हां, सचमुच में, सचमुच में मैं कितना धन्य हूं कि मैं जीवित हूं।

सब दबे हुए हैं अपने बोझ से। हम ये कैसे करें, हम ये कैसे करें, हमारे पर ये बोझ है, हमारे पर ये बोझ है, हमारे पर ये बोझ है। मैं आप पर बोझ नहीं डालना चाहता। मैं आपका बोझ हल्का करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आप अपने कंधों से इस बोझ को नीचे रखें। इसका यह मतलब नहीं है कि आप अपनी जिम्मेवारी न निभायें। पर ये जिम्मेवारी बोझ क्यों बन गई? अब जिम्मेवारी है, ये बोझ क्यों बन गई? क्योंकि एक चीज है आपके अंदर जो कुछ और पाना चाहती है। और आपका जो दिमाग है इसमें टेप लगी हुई है — नहीं, तुमको कुछ और पाना है।

अगर वो होने लगे आपके जीवन में जो आपका हृदय चाहता है तो ये जिम्मवारियां बोझ नहीं रहेंगी। ये जिम्मवारियां बोझ नहीं रहेंगी। इनको आप निभा सकेंगे। इनको उतना ही टाइम देंगे, जितना देना है। उससे ज्यादा नहीं। क्योंकि अभी तो हर एक चीज जो आपको करनी है पहाड़ जैसी लगती है। नहीं? वो भी दिन भी होते हैं कि ऐसे लगता है अब ये भी करना है, अब वो भी करना है, अब वो भी करना है, अब वो भी...।आह! बताऊं क्यों? क्योंकि तुम नहीं करना चाहते। जो तुम नहीं करना चाहते, वो पहाड़ जैसी लगती है, जो करना चाहते हो, वो पहाड़ जैसी नहीं लगती।

ये जग अंधा मैं केहि समझाऊं, सभी भुलाना पेट का धन्धा।

सबका…सबका…सबके साथ। परंतु यहां जो मैं चीज कह रहा हूं वो अलग है। क्योंकि ये एक प्लेटफार्म, ये स्टेज कोई पॉलिटिकल स्टेज नहीं है। कोई धर्म की स्टेज नहीं है। ये मानव के नाते एक स्टेज है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से मानवता के नाते से कह रहा है कि तुम जिस जीवन को जी रहे हो, यह असली में तुम्हारा जीवन नहीं है। एक और जीवन है जिसके अंदर तुम हर एक दिन खुशी को महसूस करो।

इस जीवन का लक्ष्य भेड़-चाल में फंसे रहना नहीं है। क्योंकि आप मनुष्य हैं, आप अपने जीवन में शांति का अनुभव कर सकते हैं।

एक पल (Ek Pal) 00:02:45 एक पल (Ek Pal) Video Duration : 00:02:45 याद रहे कि वो चीज़ जो मुझे जिन्दा रखती है, हर स्वांस के साथ मेरे अंदर आ रही है।

प्रेम रावत:

आप तो प्लानिंग करते हैं एक हफ्ते की, एक महीने की, दो महीने की, एक साल की। अजी छोड़िये। आप एक पल की प्लानिंग करिये। अगर कर सकते हैं तो और पल के बारे में आप क्या जानते हैं जी ? कुछ नहीं! सिर्फ आया और गया। चिंता करते हैं आप कल की। ऐं ? कल क्या होगा और कल क्या हो गया ? ये दो चिंता लगी रहती हैं। और सारा जीवन कहाँ है ? एक पल-पल में।

आप जहां खड़े हुए हैं, वहां से आप देख रहे हैं और बस चल रही है। और कुछ नहीं चल रहा — बस चल रही है। पेड़ वहीं के वहीं खड़े हुए हैं, रोड वहीं का वहीं है और बस चलती हुई दिखाई दे रही है। इसका क्या मतलब हुआ ? आप बस में नहीं बैठे हैं। और अगर सबकुछ और चलता हुआ दिखाई दे रहा है — पेड़ जा रहे हैं इधर-उधर, रोड जा रही है इधर-उधर, पर बस वहीं की वहीं है। यह अच्छी बात है। इसका मतलब है आप बस में बैठे हुए हैं। कहने का मतलब — लोग कहते हैं कि “टाइम कितना जल्दी निकल जाता है, मालूम भी नहीं पड़ा।” लोग देखते हैं अपने आपको, कहते हैं “टाइम कहां गुज़र गया, कुछ नहीं मालूम।” इसका क्या मतलब हुआ ? इसका मतलब यह हुआ कि आप खड़े हुए हैं और जो टाइम की बस है वो निकल रही है। वो जा रही है। वो चलती दिखाई दे रही है। और आप खड़े हुए हैं, वो गयी निकल।

याद रहे, याद रहे कि वो चीज़ जो मुझे जिन्दा रखती है, हर स्वांस के साथ मेरे अंदर आ रही है। हर स्वांस के साथ, वो चीज़ आ रही है और जा रही है, और हर पल, हर क्षण वो मुझे छू रही है।

 

Log In
Create Account
Forgot Password
Forgot Password?
OR
Don’t have an account? Create Account
Hide

I have read the Privacy Policy and agree.

Have an account? Log In

Forgot Password?

Let us know your email address and we will send you a password reset link.

Please enter the first name. Please enter the last name. Please enter an email address. Please enter a valid email address. Please enter a password. Passwords must be at least 6 characters. Please Re Enter the password. Password and Confirm Password should be same. Please agree to the privacy policy to continue. Please enter the full name. Show Hide
Activate Account

You're Almost Done

ACTIVATE YOUR ACCOUNT

You should receive an email within the next hour.
Click on the link in the email to activate your account.

You won’t be able to log in or purchase a subscription unless you activate it.

Can't find the email?
Please check your Spam or Junk folder.
If you use Gmail, check under Promotions.

Activate Account

Your account linked with johndoe@gmail.com is not Active.

Activate it from the account activation email we sent you.

Can't find the email?
Please check your Spam or Junk folder.
If you use Gmail, check under Promotions.

OR

Get a new account activation email now

Need Help? Contact Customer Care

Activate Account

Account activation email sent to johndoe@gmail.com

ACTIVATE YOUR ACCOUNT

You should receive an email within the next hour.
Click on the link in the email to activate your account.

Once you have activated your account you can continue to log in

You haven't marked anything as a favorite so far. Please select a product Please select a play list Failed to add the product. Please refresh the page and try one more time.