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आपका स्वभाव क्या है 00:08:59 आपका स्वभाव क्या है Audio Duration : 00:08:59 हमारे जीवन में एक आदत है और वह आदत है भूलने की। हम भूल जाते हैं कि हमारा स्वभाव ...

प्रेम रावत:

हमको हमारे जीवन में एक आदत है और वह आदत है भूलने की। हम भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम कौन हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारा स्वभाव क्या है ? हम भूल जाते हैं कि हमारी प्रकृति क्या है ? हम भूल जाते हैं कि हमारी चाह क्या है ? हम भूल जाते हैं कि हमारी जरूरत क्या है ? तो कौन-सी ऐसी चीज है, जिसके भूल जाने से हमारे जीवन के अंदर एक ऐसा माहौल पैदा होता है कि हम समझ नहीं पाते हैं कि ये सबकुछ क्या है ? क्या हो रहा है ? मेरे साथ गलत क्यों होता है ? किसी के साथ सही क्यों होता है ?

ये सारी बातें हम भूल जाते हैं। बात ये है! और सच्चाई है ये! अज्ञानता तुमसे दूर नहीं है और ज्ञान भी तुमसे दूर नहीं है। सुख भी तुमसे दूर नहीं है और दुःख भी तुमसे दूर नहीं है। तुम जहां जाते हो, जो कुछ भी तुम करते हो अपने जीवन के अंदर — जहां भी जाते हो, जो कुछ भी करते हो — सुख और दुःख, दोनों तुम्हारे साथ चलते हैं। अज्ञान और ज्ञान तुम्हारे साथ चलते हैं। अच्छाई और बुराई तुम्हारे साथ चलती है।

अब मनुष्य हो, मनुष्य के नाते तुम्हारी यह प्रकृति है कि दुःख तुमसे सहन नहीं होगा। तुम दुःख को सहन नहीं कर सकते हो। मैं जो बोल रहा हूं ये बात — मैं कितनी ही जेलों में जाता हूं, लोगों को सुनाने के लिए कि जिस शांति की तुमको तलाश है, वो शांति तुम्हारे अंदर है और पहले से ही मौजूद है। उन जेलों में जो लोग पड़े हुए हैं, उनके लिए आशा क्या नाम की चीज है ?

एक आदमी, जिसको दो सौ पचास साल की कैद है, सजा है। दो सौ पचास साल! अर्थात् वो उस जेल से जिंदा नहीं निकलेगा। चाहे वो किसी की भी प्रार्थना कर ले! समझे न मेरी बात! उसका शव ही बाहर निकलना है। तभी उसको आजादी मिलेगी उस जेल से, उससे पहले आजादी उसके लिए संभव नहीं है। तो ऐसे आदमी को क्या कहोगे ? क्या कहोगे ? क्या समझाओगे उसको ?

पर उसको भी समझाना कि तेरे साथ — तेरे कैद में, तेरे जेल में, तेरे सेल में आशा भी तेरे साथ ही लॉक्ड है और निराशा भी तेरे साथ ही लॉक्ड है। दोनों चीजें! और ये जो दीवालें हैं, ये जो खिड़कियां हैं, ये जो लोहे की सलाखें हैं, तेरे शरीर को तो जरूर काबू में, कैद में रख सकती हैं, परंतु एक चीज है तेरे अंदर, जो कभी कैद नहीं की जा सकती। वो कैद में होते हुए भी फरार है। उसको कभी पकड़ा नहीं और न उसको कोई पकड़ सकता है। ये तो हुई बात उस व्यक्ति की, जो दो सौ पचास साल के लिए कैद में है।

अब चक्कर ये है कि जब उन लोगों की बात, मैं उन लोगों को सुनाता हूं जो कैद में नहीं हैं तो वो तो यही सोचते हैं कि ये तो कैदियों की बात कर रहे हैं, हमारे लिए थोड़े ही लागू है ? ऐसी बात नहीं है। तुम भी कैदी हो! तुम भी कैदी हो! वो जो कैद में है, उसके लिए तो बढ़िया है। उसको तीन टाइम का खाना कहां से आएगा, उसको परवाह करने की जरूरत नहीं है। तुम तो हर दिन वो खाना कहां से आएगा, उसकी चिंता करते हो। अच्छा, दूसरी बात! वहां सिक्योरिटी बहुत बढ़िया है। वहां बिना बुलाए कोई नहीं आएगा। तुम तो अपने घर में सलाखें रखते हो, कुत्ते रखते हो, किसी नाइट ड्यूटी वाले को तनख्वाह देते हो। वहां सब प्रबंध है। और तुम भी कैदी हो। और तुम किस चीज के कैदी हो ? अपनी भावनाओं के कैदी हो। अपने विचारों के कैदी हो। उन चीजों ने तुमको कैद करके रखा हुआ है।

तो प्रश्न ये होता है — प्रश्न ये नहीं है कि ब्रह्म कहां है ? पारब्रह्म परमेश्वर जिसे कहते हैं — प्रश्न ये नहीं है कि वो कहां है ? प्रश्न ये है कि अगर वो तुम्हारे अंदर है, अगर वो तुम्हारे अंदर है तो तुम उसको क्यों नहीं जानते हो ? नहीं ? ये हुआ न प्रश्न ?

दुनिया तो प्रश्न करती है, "है जी! है या नहीं है, हमको नहीं मालूम। आप बताइए। है तो हमको जरा दर्शन कराइए! ये करवाइए, वो करवाइए!"

हम कहते हैं, हम प्रश्न पूछते हैं तुमसे कि अगर तुम्हारे अंदर वो पारब्रह्म परमेश्वर है तो यह कैसे संभव है कि तुम उसको नहीं जानते ? क्या हो रहा है कि तुमने उस पारब्रह्म परमेश्वर को नहीं जाना! क्यों ? क्यों ? कौन-सी ऐसी चीज है इस सारे संसार के अंदर, जो उससे ज्यादा महत्व रखती है कि मैं अपने अंदर स्थित उस ब्रह्म को जानूं! है कोई चीज ? हो सकती है कोई चीज ? हो सकती है कोई चीज ?

शांति की ओर 00:02:07 शांति की ओर Video Duration : 00:02:07 शांति तो सबके अंदर है, परंतु उसको हमने मौका नहीं दिया है, उभरने का।

प्रेम रावत

कई लोग हैं, जो धर्म को नहीं मानते हैं। कई लोग हैं, जो भगवान को भी नहीं मानते हैं। पर इसका मतलब ये नहीं है कि वो शांति का अनुभव नहीं कर सकते।

लोग समझते हैं कि ‘‘नहीं, ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा करो, तब जाकर के ये सबकुछ होगा।’’

नहीं। शांति तो सबके अंदर है, परंतु उसको हमने मौका नहीं दिया है, उभरने का। उसको मौका नहीं दिया है, जानने का।

शांति है मनुष्य के अंदर। शांति है वो चीज, जो कि मनुष्य अपने आपको पहचाने। अपने आपको पहचाने कि — मेरी ताकत क्या है और मेरी कमजोरियां क्या हैं। शांति वो है, जब मनुष्य के अंदर, वो जो तूफान आते रहते हैं, उनसे निकलकर के, वो उस चीज का अनुभव करे, जो उसके अंदर है।

हम उस ताकत को, उस शक्ति को, जिसने सारे विश्व को चला रखा है इस समय, वह हमारे अंदर भी है और वो — उसका अनुभव करना, साक्षात अनुभव करना — मन से नहीं, ख्यालों से नहीं, साक्षात अनुभव करना — उससे फिर शांति उभरती है। क्योंकि वो उस चीज का अनुभव कर रहा है, जिसका कि वो एक हिस्सा है और जिसकी कोई हद नहीं है। इन्फीनिट! जिसका कभी नाश नहीं होगा, वो भी उसके अंदर है। और जबतक वो उसका अनुभव नहीं कर लेगा, वो अपने आपको पहचान नहीं पाएगा पूरी तरीके से कि वो है क्या ?

अविनाशी (ऑडियो) 00:09:13 अविनाशी (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:13 जो था, जो है और जो रहेगा! जिसका कभी नाश नहीं होगा, वह है — अविनाशी!

प्रेम रावत:

आइंस्टाइन का नाम सुना है कभी ? बहुत बड़ा वैज्ञानिक, साइन्टिस्ट था वो।

उसने कहा है कि "जिस चीज की रचना हुई है, उसको खत्म भी होना पड़ेगा।"

तो ये सारे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है और इस सबको खत्म होना पड़ेगा। इसमें पृथ्वी भी आ गई, इसमें सूरज भी आ गया, इसमें चन्द्रमा भी आ गया। सबकुछ, जो तुमको दिखाई देता है और नहीं दिखाई देता है ब्रह्माण्ड में, जब ऊपर की तरफ देखते हो — सब खत्म होगा! पानी भी खत्म होगा, हवा भी खत्म होगी, नमक भी खत्म होगा, धरती भी खत्म होगी। मतलब सबकुछ खत्म होगा! इसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। मैं नहीं कर सकता।

अविनाशी वो है कि ये सबकुछ खत्म हो जायेगा, फिर भी वह रहेगा। और अविनाशी न मर्द है, न औरत है, न उसके पैर हैं, न उसका सिर है, न उसको सिर की जरूरत, न उसको पैर की जरूरत, न उसको नाखून की जरूरत, न उसको आँख की जरूरत, न उसको कान की जरूरत। क्योंकि जितनी भी सृष्टियां आकर चली जाएं, वो रहेगा। जो था, जो है और जो रहेगा! जिसका कभी नाश नहीं होगा, उसे कहते हैं — अविनाशी

तुम्हारा दिमाग तो सिर्फ इतना ही बड़ा है। तुम्हारा दिमाग तो सिर्फ इतना ही बड़ा है और जिस दिन तुमको ढंग की चाय नहीं मिलती है, ये दिमाग परेशान हो जाता है। जिस दिन तुम्हारी दाल में थोड़ा-सा नमक ज्यादा हो जाता है तो ये दिमाग परेशान हो जाता है। ये अविनाशी को कैसे समझेगा ? ये अविनाशी को कैसे समझेगा परंतु कहा है कि वही अविनाशी तुम्हारे अंदर है।

और फिर लोग सवाल करेंगे, "अजी! वो अविनाशी हमारे अंदर है तो हमको पता क्यों नहीं लगता?"

एक किताब पढ़ रहा था मैं आज, तो उसमें एक कहानी थी। वो कहानी सुनाता हूं। तो कहानी है, अकबर और बीरबल की!

एक दिन अकबर कहता है बीरबल से कि "अगर भगवान सर्वव्यापक है तो दिखाई क्यों नहीं देता? पता क्यों नहीं लगता, कहां है? बताओ बीरबल!"

अब बीरबल को लगा कि गए! कैसे इसका जवाब दें। तो फिर बीरबल ने कहा, "जी! कुछ दिन की मोहलत दीजिए, हम मालूम करके आपको बताएंगे।"

तो बीरबल गया घर, सिर लटकाया हुआ, दुःखी! कैसे — उसका ये कहना है कि सर्वव्यापक तो है, पर अब इसको कैसे बताऊंगा अकबर को, कैसे दिखाऊंगा, कैसे बताऊंगा कि है ? कैसे उसको prove करूंगा? कैसे साबित करूंगा? अब उसके घर में उसके कुछ रिश्तेदार आए हुए थे और उनका एक लड़का था।
तो लड़के ने कहा, "चाचा बीरबल! क्या बात है, बड़े दुःखी नजर आ रहे हो?"

तो कहा, "मैं दुःखी तो हूं!"

कहा, "क्या हुआ?"

कहा, "हुआ ये कि बादशाह ने ये सवाल पूछा है कि अगर भगवान सर्वव्यापक है, भगवान जब हमारे अंदर है तो हमको दिखाई क्यों नहीं देता ? हमको पता क्यों नहीं है?"

तो लड़का बोलता है, आप चिंता मत कीजिए! कल जाइए आप ठाठ से और बादशाह से कहिए कि "अजी! इस सवाल का जवाब मैं क्या दूंगा, ये मेरा एक छोटा रिश्तेदार है, उम्र में छोटा है, यही आपको बता देगा।"

बीरबल ने कहा, "ठीक है!"

तो दूसरे दिन दोनों गए।

बादशाह हंसा! बीरबल फंसा! कहा, "बीरबल! हमारे सवाल का जवाब है तुम्हारे पास?"

कहा, "हुजूर! मैं क्या आपको जवाब दूंगा, ये तो मेरा रिश्तेदार है, अभी उम्र ज्यादा नहीं है इसकी, यही दे देगा।"

बादशाह बोला, "इतनी बड़ी बात का ये लड़का जवाब देगा ?" बादशाह ने कहा, "ठीक है, जवाब दो!"

तो लड़का बोलता है, "आप बादशाह हैं। हिन्दुस्तान के राजा हैं। आपको इतनी भी कद्र नहीं है कि आपके दरबार में एक मेहमान आया है और आप उसकी जरा ज़र्रानवाज़ी करें!"

तो अकबर को लगा कि बाप रे बाप! तुरंत उसने आज्ञा दी — अच्छा! क्या चाहिए, क्या चाहिए ? क्या चाहिए?

कहा, "ज्यादा नहीं, दो गिलास के — दो दूध के गिलास मंगवा दीजिए!"

दो गिलास लेकर के सिपाही आये और उसके आगे रख दिया।

अब बादशाह कहता है, "जल्दी, जल्दी पीओ आप और हमारे सवाल का जवाब दो!"

कहा, एक मिनट! लड़का बैठा, उस दूध के गिलास में अपनी उंगली डालता है। एक गिलास में एक उंगली और एक गिलास में एक उंगली और उसको ऐसे-ऐसे करने लगता है {उंगली के इशारे से समझाया}। अब घंटा भर बीत गया! बैठे-बैठे बादशाह देख रहा है और उसको लग रहा है कि क्या कर रहा है ये ? दो घंटे बीत गये!

अकबर बोलता है, "मेरे सवाल का जवाब कब दोगे?"

कहा, "धीरज रखिए! अभी तो दो ही घंटे बीते हैं, अभी धीरज रखिए!"

तीन घंटे बीत गये। चार घंटे बीत गये। अब बादशाह से रहा नहीं गया तो कहा, "भाई! क्या कर रहे हो? ये उंगली डाली हुई है दूध के गिलास में। क्या कर रहे हो?"

कहा, "बादशाह! एक बात बताइए, इस दूध में मक्खन है?"

कहा, "हां! है!"

कहा, "मैं मक्खन निकाल रहा हूं!"

बादशाह ने कहा, "ऐसे मक्खन नहीं निकलेगा। ऐसे मक्खन नहीं निकलेगा! इस दूध को जमाना पड़ेगा, तब ये दही बनेगा। दही को फिर बिलोना पड़ेगा, तब जाकर के मक्खन निकलेगा!"

लड़का बोलता है, ठीक इसी तरीके से वो है, पर उसको निकालने के लिए विधि की जरूरत है। अगर तुमको वो विधि नहीं मालूम है तो तुम नहीं जान पाओगे, नहीं समझ पाओगे।

तो अपने आपको जानना — अपने आपको जानना, मतलब आत्मज्ञान!

बिना अपने आपको जाने, बिना आत्मज्ञान के मनुष्य भटक रहा है और भटकेगा।

जीवन की सरलता (Jeevan ki Saralta) 00:03:16 जीवन की सरलता (Jeevan ki Saralta) Video Duration : 00:03:16 क्रिएटिव सबसे ज्यादा आप तभी बनेंगे, जब आप सरल होंगे।

Text on screen:

क्या हम लाइफ की सिम्पलिसिटी को भूल गये हैं ?

प्रेम रावत:

क्रिएटिव सबसे ज्यादा आप तभी बनेंगे जब आप सिम्पल होंगे। क्योंकि हम सिम्पल नहीं हैं — क्योंकि हम सिम्पल नहीं हैं, तो यह समझिए कि दो चीजें हैं जो आपस में रगड़ रही हैं — एक तो हृदय है जो जीना चाहता है, जो आनंद लेना चाहता है, जो शांति का अनुभव...। और दूसरी तरफ — ये सारा कूड़ा जो हमारे कमरे में पड़ा हुआ है, जो सड़ रहा है, बास आ रही है। तो एक तरफ तो इच्छा है कि मैं इस कमरे में रहूं और दूसरी तरफ जो बास है वो कह रही है बाहर निकल। तो रगड़ रहा है आदमी, अपने से ही रगड़ रहा है।

साधारणता में, सरलता में, जिसको चित्र नहीं बनाना आता, वो कोशिश करेगा, कोशिश करेगा, कोशिश करेगा। देखिए! एक चीज मैंने, इसको मैंने देखा है। अगर आप छोटे बच्चे को कहो कि तुम ऐक्टिंग करो कि तुम सो रहे हो। तो वो जानते हैं क्या करेंगे ? अपनी आंख को बड़ी जोर से बंद करेंगे कि वो सो नहीं रहे हैं। उनको अहसास नहीं है कि मैं कैसा दिख रहा हूं। तो अपनी आंख को बंद करेंगे — ऐसे-ऐसे-ऐसे करेंगे। परंतु जो सो रहा है, बच्चा भी सो रहा है, तो वो ऐसा-ऐसा नहीं करेगा। उसकी आंख स्वाभाविक तरीके से बंद होगी। एक तरफ हम कोशिश कर रहे हैं अच्छा बनने के लिए। पर उसमें सरलता नहीं है। सरलता जब होगी, इसका मतलब है जो होना है वो हो रहा है। हम उस चीज को जान रहे हैं। सच में हमको नींद आ रही है, हम सोने की एक्टिंग नहीं कर रहे हैं। तो वो होना चाहिए। ये जीवन एक्टिंग के लिए नहीं है। अब फिल्म स्टार को एक्टिंग करनी है वो तो करनी है।

एंकर : ये उसका प्रोफेशन है।

प्रेम रावत : उसका प्रोफेशन है। परंतु ये एक्टिंग के लिए नहीं है। हमको एक्ट नहीं करना है कि हम इंटेलीजेंट हैं — या तो हैं या नहीं हैं। अब अगर एक्टिंग करने लगेंगे कि हम इंटेलीजेंट हैं जब हम इंटेलीजेंट नहीं हैं, तो फिर गड़बड़ होगी। तो इसलिए जीवन को स्वीकार करना सीखो।

एंकर : सहजता में जीना सीखो।

प्रेम रावत : सहजता में जीना सीखो। स्वीकार करना सीखो। तो इसमें आपको एक सहजता मिलेगी, एक सरलता मिलेगी। एक सिम्पलिसिटी मिलेगी। और यह आपके जीवन के अंदर एक अनोखा आनंद लायेगी, क्योंकि आप जिसको इम्प्रेस करने की कोशिश कर रहे हो, वो कभी इम्प्रेस होगा नहीं।

एंकर : जी।

प्रेम रावत : उसको — जैसे ही वह इम्प्रेस होने लगेगा उसको ईर्ष्या होगी। और जैसे ही ईर्ष्या होने लगेगी, वो फिर आपसे द्वेष करना शुरू कर देगा, बजाय आपको स्वीकार करने के। किसी को इम्प्रेस करने की जरूरत नहीं है। अगर किसी को इम्प्रेस करना है तो अपने आपको इम्प्रेस करना है।

Text on screen:

क्रिएटिव सबसे ज्यादा आप तभी बनेंगे, जब आप सिम्पिल होंगे।

जीवन में सकारात्मक सोंच कैसे लायें 00:05:51 जीवन में सकारात्मक सोंच कैसे लायें Video Duration : 00:05:51 जबतक तुम अपने आपको नहीं जानोगे, यह जीवन किस तरीके से चलना चाहिए, कौन समझायेगा तु...

कनुप्रिया:

यही सवाल लोगों के भी हैं कि विचार जो चल रहे हैं, चलते जाते हैं, चलते जाते हैं। पॉज़िटिव भी आता है, सही भी आता है, सकारात्मक भी और साथ ही साथ नकारात्मक भी, नेगेटिव भी उतना ही आ जाता है। ये जो लगातार चलती एक बातचीत है हमारे दिमाग में विचारों की, उसको उस सकारात्मक तक फोकस कैसे करें ? क्योंकि वह तो एक आएगा और जो नेगेटिव थॉट है, उसकी तादाद बहुत तेजी से आती है।

प्रेम रावत:

बिल्कुल! ये तो — इसको संशय कहते हैं। संशय जब आने लगता है मनुष्य के अंदर, क्योंकि वो जब कमजोर पड़ने लगता है तो उसके अंदर संशय आने लगता है।

आपने देखा होगा, माता-बहनें चक्की चलाती हैं। चक्की चल रही है, चल रही है, चल रही है।

अब कहीं वो — जो माताएं या बहनें हैं, कोई भी चक्की चला रहा है, वो कहे, ‘‘ये इधर क्यों घूम रही है ? इसको ऐसे क्यों नहीं घुमाते हैं ?’’

और फिर इधर से करने लगे, ‘‘नहीं, इसको ऐसे ठीक रहेगा। नहीं, ये ऐसे ठीक रहेगा। नहीं, ये ऐसे ठीक रहेगा।’’ तो ऐसे करते रहेंगे तो आटा तो मिलेगा नहीं। जब भूख लगेगी, आटा तो मिलेगा नहीं।

यही हाल इस दुनिया का है। कोई कहता है, ‘‘ऐसे करो!’’ कोई कहता है, "ऐसे करो!" कोई कहता है, "ऐसे करो!" कोई कहता है, "ऐसे करो!"

और लोग हैं, जो कहते हैं, "कैसे करें ? ऐसे करे ? ऐसे करें ? कैसे करें ?"

"ऐसे नहीं होना चाहिए! नहीं, ऐसे करो! नहीं, ऐसे करो! नहीं, ऐसा करो! नहीं, ऐसा करो!"

जबतक तुम अपने आपको नहीं जानोगे, यह चक्की किस तरीके से चलनी चाहिए, कौन समझाएगा तुमको ?

यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है कि यह तुम्हारे — संभावना यह है कि तुम्हारा यह जो जीवन है, इसको तुम सुख और शांति से बिता सकते हो। यह संभावना है और इसका पहला फैसला तुमको लेना पड़ेगा। कोई और नहीं ले सकता।

क्या चाहते हो तुम ? जलन करते हो, ईर्ष्या करते हो ? करते हो ?

तुम्हारे जीवन के अंदर महाभारत हो न हो, छोटी-छोटी महाभारत तुम्हारे परिवार में होती रहती है। क्या परिवार का यही मतलब होता है ?

"बुजुर्ग हो। बुजुर्ग हो तो बात करना सीखो, हुक्म चलाना नहीं — तू ऐसा नहीं करेगा!"

अरे! बात करना सीखो! बैठाओ! पहले समझाओ! बात करो! उसकी सुनो! अपनी कहो, फिर उसकी सुनो!

कई लोग आते हैं मेरे पास कि "जी! परिवार में ये सारी चीजें — झगड़ा बना रहता है। कैसे सुलझाया जाए ?"

मैं सोच रहा था इसके बारे में। जब लड़का-लड़की में प्यार होता है — पहला-पहला प्यार! पहला-पहला प्यार!

क्या करते हैं ?

बात करते हैं। तत...तत...तत..तत...तत! उससे — आइसक्रीम से पहले, कुल्फी से पहले बात होती है।

"कैसे हो ? क्या है ? कैसा रहा तुम्हारा दिन ?"

और अगर लड़की कहे, ‘‘मैं तो परेशान हूं।"

"क्या परेशानी है ?"

नहीं ? मैं गलत कह रहा हूं ? शादी के बाद ? बात-वात सब खत्म!

"मेरी रोटी कहां है ? तैंने — मेरे को करारी रोटी नहीं चाहिए थी, तैंने ज्यादा सेंक दी। इसमें नमक ज्यादा डाल दिया।"

अगर यही बात तुम तब करते तो तुम्हारा आगे झंझट ही नहीं चलता। वो तुम्हारी गर्ल-फ्रैण्ड कब का तुमको छोड़-छाड़ के भाग जाती। परंतु तुम भी ऐसे निकले — मीठी-मीठी बात! अपना उल्लू सीधा करने के लिए और अब शादी हो गयी और मीठी बात सब खत्म।

अरे! वो मीठी बात लाओ!

पति घर आता है। छः घंटे, सात घंटे की नौकरी करके, उसको लिस्ट मत थमाओ!

उससे पूछो, "‘उसका दिन कैसे गया ?"

तुमको कुछ करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ सुनने की जरूरत है। सुनने की ताकत लोगों में खत्म हो गयी है। सुनो! तुमको हां मिलाने की जरूरत नहीं है। तुमको हां कहने की जरूरत नहीं है। तुमको ना कहने की जरूरत नहीं है। सिर्फ सुनने की जरूरत है।

Text on screen:

जब तक तुम अपने आपको नहीं जानोगे,

यह जीवन किस तरीके से चलना चाहिए,

कौन समझायेगा ?

 

जीवन एक उपहार 00:09:31 जीवन एक उपहार Audio Duration : 00:09:31 अगर तुम अपने जीवन में आनंद चाहते हो, सुख चाहते हो तो उसका तुमको प्रबंध करना पड़ेग...

प्रेम रावत:
प्रश्न यह है कि तुमने अपनी जिंदगी का क्या प्रबंध किया है ? और मैं ये क्यों कह रहा हूं ? मैं इसलिए कह रहा हूं कि — एक बात पर ध्यान दिया जाय!

मान के चलें कि एक हवाई जहाज ऊपर से जा रहा है। और जहां सामान रखा जाता है हवाई जहाज में, वहां एक बहुत बड़ा बक्सा रखा हुआ है। उस बक्से में भरे हुए हैं पत्थर! और संदूक हवाई जहाज से हट गया है और गिर रहा है। और किस रफ्तार से गिर रहा है ? दो फीट प्रति सेकेंड — प्रति सेकेंड की स्पीड से वो गिरेगा। अंग्रेजी में ‘‘two feet per second, per second.’’ तुम्हारे लिए क्या ? तुम तो अपने जीवन में व्यस्त हो, वो बक्सा गिर रहा है। वो बक्सा गिर रहा है और वो तभी रुकेगा — कब रुकेगा ?

कब रुकेगा वो बक्सा ? मालूम है तुमको ?

जब वो इस पृथ्वी पर आकर टकरायेगा।

और तुम कहां हो ? कहां हो तुम ? कहां हो तुम ? कहां हो ? नहीं मालूम ?

पृथ्वी पर हो। कैसा लगा तुमको, जब मैंने बोला कि वो डब्बा गिर रहा है ?

इस पृथ्वी पर सात बिलियन लोग हैं। और जो-जो जिंदा है, सबके नाम का बक्सा गिर रहा है। अरे! तुम्हारा नाम लिखा है उस पर। वो इधर-उधर नहीं टकरायेगा। वो ठीक तुम्हारे सिर पर फूटेगा। प्रबंध कर लिया है इसका कि ये होगा ? प्रबंध कर लिया इसका ?

ये जानने के बाद तुमने अपने जीवन में क्या प्रबंध किया है ?

अगर तुम अपने जीवन में आनंद चाहते हो तो उसका भी तुमको प्रबंध करना पड़ेगा। अगर तुम अपने जीवन में सुख चाहते हो तो उसका भी तुमको प्रबंध करना पड़ेगा।

कई लोगों ने जीवन की तुलना की है कई चीजों से।

कुछ लोग बोलते हैं कि "यह जीवन जो है यह नदी के समान है, बह रहा है।"

कोई बोलता है कि "यह जीवन नौका के समान है।"

कोई बोलता है कि "यह जीवन जैसे संगीत का कोई instrument होता है, यंत्र होता है उसके समान है।"

कोई बोलता है कि "यह जीवन एक पतंग के समान है।"

सुनो! अगर यह जीवन नौका के समान है तो नौका वालों, इस नौका को डूबना नहीं चाहिए। अगर यह नौका डूब गई तो गड़बड़ होगी।

अगर यह जीवन नदी के समान है — डूब मत जाना। डूब मत जाना!

अगर यह जीवन — जैसे साज़ का कोई यंत्र है, ऊटपटांग मत बजाना। लय से, स्वर ठीक होना चाहिए। ये नहीं है कि अंधाधुंध — टें, टें, टें, टें, टें.... नहीं।

यह जीवन कोई थ्यौरी नहीं है भाई! यह जीवन कोई किताब नहीं है। यह जीवन किसी का आइडिया नहीं है। यह तो जीती-जागती चीज है। और जब तक इस जीवन को पूरा नहीं करोगे, तब तक भटकते रहोगे। कभी इधर जाओगे, कभी उधर जाओगे। कभी ये मन उधर भागेगा। कभी इधर जायेगा, कभी उधर जायेगा, कहीं-कहीं जायेगा, क्या-क्या करेगा — पता नहीं। अब ये दुनिया का सारा चक्कर है। ये दुनिया का सारा चक्कर है। परन्तु जो इससे आगे निकलकर के यह समझ लेता है कि यह जीवन एक थ्यौरी नहीं है, यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसको मैं डब्बे में बंद करके रख दूं कहीं। यह तो ऐसी चीज है जो जीती-जागती है। यह तो सचमुच में उपहार है। और मैं अपने जीवन का पूरा-पूरा फायदा उठाऊं। पूरा-पूरा! आधा नहीं, चौथाई नहीं। पूरा-पूरा फायदा उठाऊं। ये मेरे हृदय की इच्छा है। क्या तुम्हारे हृदय की ये इच्छा नहीं है ? कौन ऐसा आदमी है इस संसार के अंदर जिसकी ये इच्छा न हो कि वह अपने जीवन को सफल बनाये ?

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