View as
बलवान कौन (ऑडियो) 00:09:28 बलवान कौन (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:28

प्रेम रावत:

एक आदमी था। बहुत मेहनत करता था, पत्थर का काम करता था। वो हर रोज अपने घर से चल के पहाड़ पर जाता था। एक बड़ा-सा टुकड़ा जो वह अपने घर तक ले जा सके, इतना बड़ा पत्थर का तोड़ता था, घर ले जाता था और उसको फिर छेनी से, हथौड़े से उसकी तरह-तरह की चीजें बनाता था — मूर्ति बनाता था, सिलबट्टा बनाता था — ये सारी चीजें बनाता था।

सारे दिन उसको काम करना पड़ता था। धूल उड़ती थी, पसीने का काम था, मेहनत का काम था। हर रोज, चाहे इतवार हो, चाहे शनिचर हो, चाहे शुक्र हो, कोई भी त्योहार हो, उसको तो जाना था। क्योंकि जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बनाकर के वो बाजार में बेचता था, उससे उसका पेट चलता था। अब उसको ऐसा लगता था हमेशा कि जो उसके साथ हो रहा है, वो ठीक नहीं है कि वह शक्तिशाली क्यों नहीं है ? वह इतना गरीब क्यों है ? शक्तिशाली होना चाहिए उसको ।

एक दिन वो सड़क से जा रहा था। एक बहुत बढ़िया आलीशान कोठी थी, वहां पार्टी हो रही थी। तो उसने रुककर के, दीवाल के ऊपर से देखा तो उस घर में — बहुत रईस आदमी का घर था वो। उसके नौकर-चाकर और उसमें उसके गेस्ट आ रखे थे, पार्टी हो रही थी। सब बढ़िया चल रहा था। लोग उसको बधाई दे रहे थे। उसको लगा कि ‘मेरे को तो ये चाहिए!’

तो वो भगवान की तरफ उसने चेहरा किया, ‘‘हे भगवान! मेरे को ऐसा क्यों नहीं बनाया ? ऐसा बना दे!’’

उस दिन भगवान अच्छे मूड में थे। देख रहे थे नीचे की तरफ, उसकी तरफ! चुटकी बजाई और वो रईस बन गया। अब रईस बन गया, उसके नौकर-चाकर सब ‘‘जी हुजूर! जी हुजूर! जी हुजूर!’’ और उसके दोस्त आ रहे हैं, उससे मिलना चाहते हैं। बड़ा ही वो ‘जरूरी आदमी’ बन गया। उसको अच्छा लगा कि ‘‘हां! ये है न जिंदगी! वो पत्थर वाली जिंदगी नहीं, जहां हर रोज पत्थर घसीटना पड़ता है। हर रोज काम करना पड़ता है। अब मेरी कितनी इज्जत है। मैं कितना शक्तिमान हूं।’’

ऐसे-ऐसे करके कुछ दिन निकल गए। तो एक दिन काफी आवाज आ रही थी सड़क से तो उसने जाकर देखा तो वहां सब — सारे शहर के अमीर लोग वहां खड़े हुए और जो आ रहा है, जैसे ही जैसे उसकी सवारी आए, सभी लोग उसके सामने झुक रहे हैं।

उसने पूछा किसी से कि ‘‘ये कौन है, जो मेरे से भी ज्यादा शक्तिशाली है ?’’

तो कहा ‘‘ये राजा है।’’

‘‘राजा तो मेरे से भी शक्तिशाली है! हे भगवान! मुझे राजा बना दे!’’

उस दिन भी भगवान अच्छे मूड में थे और उसकी तरफ देखा, चुटकी बजाई और वो राजा बन गया। अब राजा बन गया तो उसको लगा कि ‘‘यह तो बहुत ही बढ़िया है! अब यहां तो सभी लोग मेरे को — मेरे सामने झुकते हैं। कितनी मेरी शान है!’’

ऐसे करते-करते कुछ दिन बीते तो एक दिन वो सबेरे-सबेरे उठकर के अपने बरांडे में, बाहर खड़ा-खड़ा चाय पी रहा था और उसने देखा कि इतना बड़ा सूरज उगने लगा, उदय होने लगा। और जैसे सूरज उदय होने लगा, सारी चिड़ियां, सारे जानवर जगने लगे, लोग उठने लगे। सबकुछ होने लगा।

उसने कहा, ‘‘बाप रे बाप! ये सूरज कितना बलवान है! ये तो मेरे से भी ज्यादा बलवान है। इसके उदय होने से सारी पृथ्वी जागने लगी है। हे भगवान! मेरे को सूरज बना दो!’’

उस दिन भी भगवान कुछ अच्छे मूड में थे, सूरज बना दिया। अब वो जहां जाए, चमके और लोग उसकी तरफ देखें और सारी सृष्टि, सारी चिड़िया, सारे जानवर — जब वो उदय हो, तब वो चलने लगें। लोग उठने लगें। ‘‘यह तो बहुत ही बढ़िया है!’’

एक दिन वो आकाश में चमक रहा था। चमक रहा था। जहां देखो, चमक रहा था। देखा उसने पृथ्वी पर एक जगह थी, जहां वो चमक नहीं पा रहा था। पता नहीं क्या है ये ? मेरी चमक वहां तक क्यों नहीं पहुंच रही है ? तो उसने देखा, एक बादल! अब वो जितनी कोशिश करे उस बादल से चमकने की, वो चमका ही नहीं, उसकी रोशनी पृथ्वी तक पहुंचे ही नहीं।

‘‘ये बादल तो सूरज से भी बलवान है! ये तो सूरज को भी रोक देता है! हे भगवान! मुझे बादल बना दे!’’

अब वो बादल बन गया। और जहां सूरज चमक रहा है, वहां वो आए और सूरज की रोशनी को रोक दे। ऐसा करते-करते, करते-करते उसको लगा कि, ‘‘मैं कितना बलवान हो गया हूं!’’

एक दिन वो अपने बलवानपने पर खूब सोच रहा था, उसके बारे में खुश हो रहा था कि उसने देखा कि वो चल रहा है। एक जगह नहीं है। चल रहा है वो! ‘‘बादल को कौन चला रहा है ? बादल को कौन चला रहा है ? मैं तो सबसे शक्तिमान हूं! मैं तो सूरज से शक्तिमान हूं। जो राजा से शक्तिमान है, जो साहूकार से शक्तिमान है। कौन ऐसी चीज है, जो इस बादल को चला रही है ?’’

उसने देखा, तो हवा! हवा उस बादल को चला रही है। ‘‘हवा मेरे से भी शक्तिमान है ? हवा तो मेरे से भी ज्यादा शक्तिमान है! मैं बादल हूं। बादल सूरज से भी ज्यादा शक्तिमान है। सूरज राजा से भी ज्यादा शक्तिमान है। और राजा साहूकार से ज्यादा शक्तिमान है। और ये हवा तो मेरे से भी ज्यादा शक्तिमान है। हे भगवान! मेरे को हवा बना दे!’’

हवा बन गया वो। जहां जाए, जहां जाए, बहे। सारी टहनियां उसके आगे हिलें, धूल चले, सबकुछ हो रहा है। जा रहा है, जा रहा है, बह रहा है। कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है। बह रहा है, बह रहा है। खूब गति से बह रहा है। बादलों को इधर से उधर कर रहा है। सबकुछ कर रहा है। चल रहा है, चल रहा है। एक दिन आकर के धड़ाक — रुक गया!

‘‘हवा को किसने रोक दिया ? हवा, जो बादल से ज्यादा बलवान है। बादल, जो सूरज से ज्यादा बलवान है। सूरज, जो राजा से ज्यादा बलवान है। राजा, जो साहूकार से ज्यादा बलवान है। किस चीज ने रोक दिया ? देखा तो पहाड़! अब जितनी भी कोशिश करना चाहे हवा पहाड़ के पार नहीं हो सकती।’’

‘‘हे भगवान! मेरे को पहाड़ बना दे!’’ {चुटकी बजाई} पहाड़ बन गया।

सचमुच में सबसे बलवान! खड़ा-खड़ा वहां, ‘‘मैं अब सबसे बलवान हूं!’’

एक दिन वह अपनी शक्ति पर खूब गौर कर रहा था। नीचे से एक आवाज आयी और उसको लगा कि कोई इस पहाड़ को काटने में लगा हुआ है। उसने कहा, ‘‘इस पहाड़ से कौन बलवान हो सकता है ? ज्यादा बलवान, जो पहाड़ को काट रहा है ? क्योंकि पहाड़ हवा से ज्यादा बलवान है। हवा बादल से ज्यादा बलवान है। बादल सूरज से ज्यादा बलवान है। सूरज राजा से ज्यादा बलवान है। राजा साहूकार से ज्यादा बलवान है। पहाड़ तो सबसे बलवान है। फिर उसको कौन काट रहा है ? इससे बलवान कौन हो सकता है ?’’

नीचे देखा तो उसी की तरह एक पत्थर को काटने वाला — उसी की तरह एक पत्थर को काटने वाला उस पहाड़ को काट रहा था। तो सबसे बलवान तो वो पहले से ही था पर उसको नहीं मालूम था कि वो बलवान है। पर वो था। ठीक उसी प्रकार से, तुम्हारे जीवन में सब आशीर्वाद हैं।

असली तोहफा 00:15:12 असली तोहफा Video Duration : 00:15:12 तुम्हारे लिए भी एक तोहफा है। क्या है वो तोहफा ? एक अलग सोचने का तरीका।

इस संसार के अंदर जब लोगों से यह चर्चा होती है कि ऐसी कोई चीज है, शांति भी कोई चीज है, तो सबसे पहले लोग यही कहते हैं कि ‘‘जी! यह तो असंभव है!’’

 

हम कहते हैं, क्यों असंभव है ? काहे के लिए असंभव है ?

 

अब लोगों के साथ यह है कि ये कैसे करोगे ?

 

तो हम लोगों से यही कहते हैं कि भाई! अगर ये जो अशांति है इस संसार के अंदर, अगर वो भेड़ों की वजह से हो या बकरी की वजह से हो या बंदरों की वजह से हो तो ये तो मुश्किल हो जायेगा। क्योंकि भेड़ के साथ कैसे बात करेंगे कि तू क्रांति मत फैला ? या बकरी से कैसे कहें कि तू क्रांति मत फैला ? परंतु ये सब चक्कर मनुष्य का बनाया हुआ है। और मनुष्य एक ऐसी चीज है कि अगर उसकी समझ में आ गया तो वो बदल सकता है।

 

जैसे रत्नाकर डाकू था, जब उसकी समझ में आया तो वह भी बदल गया। तो बड़े-बड़े भी बदल सकते हैं, अगर उनकी समझ में आ जाए। तो मैं तो ये कहता हूं उन लोगों से कि यह तो बड़ी खुशखबरी है कि ये मनुष्य ने फैलाई है। क्योंकि कम से कम अगर मनुष्य ने फैलाई है तो वो उसको खत्म भी कर सकता है, अगर उसकी समझ में आ जाए। तो हम तो दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। और कई जगह मैंने कहा। मैंने कहा कि मैं क्या लाया हूं तुम्हारे लिए ? जब टीवी पर इन्टरव्यू होता है या रेडियो पर इन्टरव्यू होता है — क्या लाया हूं तुम्हारे लिए ? तुम्हारे लिए भी एक तोहफा है। क्या है वो तोहफा ? एक अलग सोचने का तरीका। क्योंकि आज जो भी मनुष्य सोच रहा है, जब उसको दुःख होता है तो वो किसकी तरफ उंगली फैलाता है ? भगवान की तरफ कि भगवान उसको दुःख दे रहा है। ये उसके कर्मों का फल है।

 

अब कर्म क्या होते हैं, तुमको कैसे मालूम ? कर्म होता क्या है, तुमको कैसे मालूम ? और जो तुम कहते हो कि ये पिछले जन्मों का फल है, पिछले जन्मों का ये है, ये तुमको कैसे मालूम ?

 

किसी ने कभी कह दिया। मां-बाप ने कह दिया — पिछले कर्मों का फल है। तुमने स्वीकार कर लिया। उसके बाद तोते की तरह रटते रहे — पिछले कर्मों का फल है, पिछले कर्मों का फल है, पिछले कर्मों का फल है। तकदीर का फल है, तकदीर का फल है, तकदीर का फल है। और आधे से ज्यादा अगर तुम अपनी समस्याओं को दूर करना चाहते हो तो बैठकर के यह सोचो कि कितनी चीज तुमने रट लगाकर सीखी हुई हैं और कितनी तुमने अनुभव से सीखी हुई हैं। जो रट लगाकर सीखी हुई हैं चीजें, उसके बारे में तुम कुछ कह नहीं सकते। जैसे पानी को — भाषा जो है न, वो भी रट लगाकर सीखी जाती हैं। उसका कोई तुक नहीं है भाषा का। तुमने सुना अपने मां-बाप को बोलते हुए और तुमने भी सीख लिया।

 

तो पानी को पानी क्यों कहते हैं ? नहीं मालूम न ?

 

एक को एक क्यों कहते हैं ? नहीं मालूम।

 

क्योंकि ये सब रट से सीखा है। और अनुभव से क्या सीखा है ?

 

मां ने कहा, ‘‘इसे मत छू, यह गरम है।’’ यही पर्याप्त था तुम्हारे लिए ? जब तुम छोटे थे, मां ने कहा, ‘‘इसको मत छू, यह गरम है।’’ यही पर्याप्त था ?

 

छुआ! जब छुआ, तब अहसास हुआ, यह गरम है। इससे जलता है, इससे दर्द होता है। उसके बाद अनुभव से तुमने सीखा और आज तुम भी लोगों को सिखाते हो, ‘‘इसको मत छू, यह गरम है। इसको मत छू, यह गरम है।’’ तो ये बात है सारे संसार की। किसी ने किताब से पढ़ लिया, रट लगा ली — ततततततत...! मतलब क्या है उसका ?

 

जब महाभारत खत्म हो गई और अर्जुन अपने महल में चले गया सब लड़ाई-वड़ाई खत्म हो गई तो भगवान कृष्ण एक दिन अर्जुन से मिलने के लिए गए। तो अर्जुन से मिलने के लिए गए तो कहा, ‘‘भाई! क्या हालचाल है ?’’

 

कहा, सब ठीक है।

 

कहा, क्या हो रहा है ?

 

कहा, नहीं, सब ठीक है। इतने साल वनवास में रहे। बड़ा अच्छा लगता है, महल में रहते हैं, एक ही जगह रहते हैं। सब हैं। सबकुछ बढ़िया है।

 

कहा, कोई कष्ट नहीं, कोई दुविधा नहीं ? कोई प्रश्न नहीं ?

 

कहा, एक प्रश्न है।

 

कहा, क्या ?

 

‘‘जी! आप ने वो बताया था न वो गीता, जो कुछ भी ज्ञान दिया था, वो मैं भूल गया। वो मैं भूल गया तो कृपा करके मेरे को दुबारा बता दो!’’

 

उसमें दो बातें हैं। एक तो वो फर्स्ट नॉलेज रिव्यू था — पहला नॉलेज रिव्यू, वो भूल गया। और जहां तक रही गीता की बात तो भगवान कहते हैं, ‘‘मेरे को भी याद नहीं है। अब जो सुना दिया तेरे को, उस समय सुना दिया। अब यह थोड़े ही है कि मैंने याद करके सुनाया।’’ और यहां लोग लगे हुए हैं उसको याद करने में। सीखने में नहीं, समझ में नहीं आयेगी बात, पर उसको रट — तोते की तरह उसको सीखने में लोग लगे हुए हैं। तो जबतक ये चक्कर तुम्हारी जिंदगी में भी चलता रहेगा, तो तुम आगे थोड़े ही जा पाओगे ?

 

एक कहावत है अंग्रेजी में कि ‘‘उड़ने के लिए पर नहीं चाहिए। उड़ने के लिए पर नहीं चाहिए, पर जो जंजीरों ने तुमको बांध के रखा हुआ है, इनको काटने की जरूरत है। अगर ये कट जाएं तो तुम अपने आप ही उड़ने लगोगे।’’

 

और ये जंजीरे हैं किस चीज की ?

 

यही सब भावनाओं की, जो लोगों ने बना रखी हैं। अनुभव किसी का कुछ है नहीं।

 

आज मेरे से पूछा गया प्रश्न में। तो जो इन्टरव्यू हो रहा था, उसमें पूछा कि ‘‘आप भगवान से मिले हैं ?’’

 

मैंने कहा, मिलने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है। जो कभी अलग ही नहीं हुआ हो, उससे मिलना क्या है ? जो कभी अलग ही नहीं हुआ, उससे मिलेंगे कैसे ? वो तो हमेशा ही साथ है। मैंने कहा, अनुभव की बात है। अगर अनुभव की बात करो, अनुभव है ? तो हां, अनुभव है।

 

तो उसने कहा, कैसे ? आपको कैसे मालूम कि भगवान है ?

 

मैंने कहा कि —

नर तन भव बारिधि कहुं बेरो।

सन्मुख मरूत अनुग्रह मेरो।।

 

यह शरीर इस भवसागर को पार करने का साधन है और इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है। तो मैंने कहा, जब तुम्हारा स्वांस अंदर आता है और जाता है, इसका मतलब है क्या ? भगवान है। क्योंकि यही उनकी कृपा है। और यही कृपा है। इसी से शरीर चलता है।

 

तो बात यह है। अब ये सारा जो कुछ भी हो रहा है इस संसार के अंदर — और क्या फिर — फिर मनुष्य दुःखी होता है। फिर मनुष्य दुःखी होता है तो कहता है, ऐसे मेरे को दुःख क्यों मिल रहा है ? मैं ऐसा क्यों नहीं हूं ? मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं है, मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं है ? ये कब होगा ? ये कब होगा ?

 

तो जबतक हम समझ नहीं पाएंगे अपने जीवन को, तबतक तो दुःख आएगा ही आएगा। और जिस दिन समझ लेंगे कि हमको मांगने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि जो हम मांग भी नहीं सकते हैं, वो हमको मिल रहा है। और किस रूप में मिल रहा है ? वो इस स्वांस के रूप में मिल रहा है। अब कैसे मांगें इसको ? हम तो इसके बारे में सोच भी नहीं सकते हैं।

 

सबसे पहले तुम मनुष्य हो! मनुष्य के नाते तुम्हारे अंदर ये स्वांस आ रहा है, जा रहा है। तुमको ज्ञान के द्वारा ये विधि मिली है कि तुम उस चीज को समझ सको, उसका तुम अनुभव कर सको। जब तुम उसका अनुभव करते हो तो क्या मिलता है ? उसके बदले में जो प्रसाद तुम्हें मिलता है, उसको शांति कहते हैं। उस शांति का प्रसाद जो तुमको मुफ्त में दिया जा रहा है, उसको ग्रहण करो! उसको फेंको मत! उसको ग्रहण करो!

 

क्योंकि लोग हैं, शंका करना चाहते हैं। शंका करना चाहते हैं! क्यों शंका करना चाहते हैं ? ये तुम्हारे में आदत कहां से आयी ?

 

याद है, जब तुम छोटे थे ? ‘‘देख के काम कर! गलती मत कर!’’

 

ये बात भी तुम्हारे दिमाग में डाली हुई है कि तुमको शंका करनी चाहिए। और तुम ऐसे भक्त हो ‘रट’ के, रट लगाने के — हर एक चीज पर शंका करते हो। ‘‘भगवान है या नहीं है ? मुझे मंदिर जाना चाहिए, नहीं जाना चाहिए ?’’

 

वही — जब इम्तिहान देने के लिए जाते हैं — क्या मैंने सही जवाब दिया ? क्या मतलब, सही जवाब दिया ? क्या मतलब, सही जवाब दिया ? आता था या नहीं आता था ? आता था तो आता था। नहीं आता था तो नहीं आता था। पर शंका करने की क्या जरूरत है ? जब घर में खाना बनाते हो तो बैठे-बैठे शंका करते रहते हो ? ना! चखते हो उसको कि नमक ज्यादा है या कम है — चखते हो! शंका का तो सवाल ही नहीं है! ये थोड़े ही है कि बैठे-बैठे, ‘‘दाल गल गयी, नहीं गली ? टाइम तो हो गया, पर हो सकता है, नहीं गली हो!’’ नहीं ? उसको उठाते हैं — गरम-गरम को ही उठाते हैं और चावल को देखते हैं कि वो बन गया ? भात बन गया या नहीं ? नहीं ?

 

तो फिर जब ये ज्ञान की बात आती है तो फिर शंका क्यों है ? अपने हृदय से पूछो! अपने अनुभव से पूछो!

 

तुम जीवित हो। जबतक तुम जीवित हो, तुम्हारे पर कृपा हो रही है। और क्या चाहिए तुमको ? और क्या चाहिए ? ये तो — इसके बाद तो जो भी तुम इस दुनिया के अंदर करना चाहते हो, यह संभव है। कोई असंभव नहीं है। संभव है! परंतु सबसे पहले क्या चीज चाहिए ? तुम्हारा जीना होना बहुत जरूरी है। अगर तुम जीवित नहीं हो तो फिर सबकुछ असंभव है। और तुम जीवित हो तो फिर सब संभव है। इसके लिए हिम्मत की जरूरत है। हिम्मत भी तुम्हारे अंदर है। हिम्मत भी तुम्हारे अंदर है! और जो कुछ भी तुम चाहते हो, इसके बारे में भी सोचो!

 

तुम वहां बैठे-बैठे सोच रहे होगे, कैसे करेंगे जी ? कैसे करेंगे जी ? कैसे करेंगे जी ? वही संशय है न ? ‘‘कर पाएंगे, नहीं कर पाएंगे! कर पाएंगे....।’’

 

अब इसका उदाहरण देता हूं मैं। और लोगों को बड़ा पसंद आता है ये उदाहरण। इन्टरव्यू में मैंने बहुत बार दिया हुआ है कि जब तुम छोटे बच्चे थे और चलना सीख रहे थे, तुम गिरे कि नहीं गिरे ? तुम्हारा उद्देश्य क्या था ? चलना। पर गिरे। फेल हुए कि नहीं हुए ? असफल हुए या नहीं हुए ? परंतु तुमने असफलता को कभी स्वीकार नहीं किया। फिर दोबारा खड़े हुए। और आज क्या करते हो ? करने से पहले — कोशिश करने से पहले सोचते हो किसके बारे में ? असफलता — सफलता के बारे में नहीं, असफलता के बारे में। और जैसे ही सोचते हो सफलता के बारे में, करेंगे ही नहीं। पहले असफलता! पहले असफलता!

 

यही तो, यही तो बीमारी है सारी दुनिया को। पहले असफलता। पर कोशिश तो करो! जैसे बच्चा करता है खड़ा होकर — जब वह पहला कदम लेता है, उसको मालूम ही नहीं कि वह चल भी रहा है। बस — त, त, त, त! उसको दिशा का कोई ज्ञान नहीं है। उसके जीवन के अंदर उस समय ऐसी प्यास है चलने के लिए, ऐसी चाह है चलने के लिए, जो उसको किसी ने सिखाया नहीं है। क्योंकि वह समझता नहीं है अभी बात — जरूरी क्या है, जरूरी क्या नहीं है ? वह चल देगा। चल देगा। और अगर असफल भी हुआ, उसको स्वीकार नहीं करेगा। फिर खड़ा होगा। यह हिम्मत नहीं है तो क्या है ? और जब इतनी छोटी-सी उम्र में तुम्हारे पास इतनी हिम्मत थी, आज तुम्हारी हिम्मत को क्या हो गया है ?

 

मतलब, तुम जीवित भी हो और तुमने जीवन को त्याग भी दिया है। अभी मौत नहीं आई है, पर जीवन को भी तुमने त्याग दिया है। क्या होगा मेरा ?

 

जो असफलता को स्वीकार करना ही नहीं चाहता है। न वह सीखना चाहता है उस असफलता को, न उसको स्वीकार करना चाहता है। जितनी बार वह गिरेगा, उसको कोई गम नहीं है। वह फिर खड़ा होगा, फिर चलेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि चलना उसके लिए बहुत आसान हो जाएगा।

 

- प्रेम रावत

खुशी अपने में ढूंढ़ो 00:15:14 खुशी अपने में ढूंढ़ो Video Duration : 00:15:14 खुशी अपने में ढूंढ़ो पहले। अगर तुम नहीं खुश हो तो किसी और को कैसे खुश करोगे ?

ऐंकर : कुछ लोगों की नजर में जो चीज सही होती है, वही चीज दूसरे लोगों की नजर में गलत होती है। सही और गलत की पहचान कैसे करें ?

 

प्रेम रावत जी : सही तो सबके लिए सही होना चाहिए। और सही वो है कि ‘‘तुम भी जीवित हो, मैं भी जीवित हूं। तुम भी मनुष्य हो, मैं भी मनुष्य हूं।’’ इस संसार ने सबके अंदर बंटवारा कर दिया! और बंटवारे के तुम नतीजे में हो! क्या बंटवारा कर दिया ? तुम मर्द हो, तुम औरत हो! क्यों कर दिया बंटवारा ?

 

आए एक ही देश से, उतरे एक ही घाट। 

हवा लगी संसार की, हो गए बारह बाट।।

 

एक होना चाहिए, अनेक नहीं। एक! जबतक इस संसार के अंदर एकता नहीं होगी, ये लड़ाइयां बंद नहीं होंगी। शांति का मतलब, लड़ाई बंद करना नहीं है। शांति तो हर एक मनुष्य के अंदर होती है। पर मनुष्य लड़ता इसलिए है, क्योंकि उसके अंदर भी अशांति है। आदर चला गया। आज क्या हो गया ?

 

"तू अमीर है, तू गरीब है!" फर्क क्या है गरीब में और अमीर में ?

 

मैं बताऊं ? मैं बताऊं ? गरीब ठाट से सोता है! गरीब ठाट से — उसको न भैंस की चिंता है, न भैंसे की चिंता है। न चारे की चिंता है! खाना मिल गया, उससे वो संतुष्ट है और खूब खर्राटे मार के सोता है। उसको तो कहीं — उसके लिए तो सारा संसार एक बिस्तर है। कहीं भी लेट जाएगा, कहीं भी सो जाएगा। हमारे लिए बिस्तर बड़ी सीमित जगह में है। जब वो मिलेगा, तभी उसके ऊपर बैठ करके सोएंगे। तो भाई! समझो इस बात को! ये भेद-भावनाएं अच्छी नहीं हैं। सबका आदर होना चाहिए, क्योंकि सबके अंदर वो बैठा हुआ है। अगर तुम एक-दूसरे का आदर नहीं कर सकते हो तो तुम्हारा आदर कौन करेगा ?

 

भालू ? ऐं ? वो तो तुमको खाना चाहता है। भोजन के रूप में देखता है — "क्या स्वादिष्ट, स्वदिष्ट!" कहता है क्या ? "स्वादिष्ट!"

 

मनुष्य जब दूसरे को देखता है तो "क्या सुंदर-सुंदर बाल हैं!"

 

भालू जब तुमको देखता है, कह रहा है, "स्वादिष्ट-स्वादिष्ट पेट है। खूब चर्बी है! अच्छा स्वाद निकलेगा।"

 

तो मनुष्य हो! मनुष्य की तरह तो रहना सीखो! वो तो जानते नहीं हैं लोग! "तुम फलां-फलां धर्म के हो!" क्या मतलब? जब तुम पैदा होते हो, तुम्हारा धर्म क्या है ? जब तुम गर्भ में रहते हो, तुम्हारा धर्म क्या है ? ऐं ? ये सब संसार के बनाए हुए हैं। उसी के चक्कर में लोग बैठ करके एक-दूसरे का विभाजन करते हैं, एक-दूसरे को बांटने की कोशिश करते हैं — ‘‘तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो, तुम ये हो!’’ भाषा से विभाजन करते हैं। विभाजन करना सीख लिया, पर जोड़ना नहीं सीखा।

 

अभी तुमको मैथ, गणित विद्या नहीं आती है। पहले गणित विद्या देखो, सीखो, जानो! जोड़ना भी कोई चीज है। जोड़ो! एक-दूसरे को प्रेम से, प्यार से! क्योंकि जो तुम्हारी — क्या तुम समझते हो कि अगर कोई दूसरे धर्म का है — उसको प्यास नहीं लगती ? उसको भूख नहीं लगती ? लगती है। उसको दुःख नहीं होता ? होता है। वो भी तुम जैसा ही है। सब एक हैं!

 

अलख ईलाही एक है, भरम करो मत कोय।

 

भ्रमित मत पड़ना। और ये चीज अगर जान लो कि सब एक हैं। सब एक ही चाहते हैं। सब अपने जीवन के अंदर आनंद चाहते हैं। परंतु जबतक ये आपस में — ‘‘तुम मर्द हो, तुम औरत हो, तुम ये हो, तुम वो हो!’’ सबका आदर होना चाहिए।

 

ऐंकर : आप अक्सर कहते हैं कि हर मनुष्य में 50 प्रतिशत अच्छाई और 50 प्रतिशत बुराई होती है। पर आज लोगों में बुराई का प्रतिशत बढ़ता ही जा रहा है और अच्छाई का प्रतिशत कम होता जा रहा है। ऐसा क्यों ?

 

प्रेम रावत जी : नहीं, बढ़ नहीं रहा है, घट नहीं रहा है। उतना का उतना ही है। वो कभी बढ़ता नहीं है। वो किसी भी —किसी भी समय नहीं बढ़ता है। किसी भी समय में घटता नहीं है। इनकी बात है!

 

देखिए! आप सोचते हैं — सबेरे-सबेरे जब सूर्य उदय हुआ तो आप लोगों ने देखा, सूर्य उदय हुआ! है न ? और शाम को आप देखेंगे कि ये सूर्य अस्त होगा। इधर से उदय हुआ, उधर से अस्त होगा। एक निश्चित समय है, जब सूर्य उदय हुआ और एक निश्चित समय है कि सूर्य अस्त हुआ। वो सिर्फ आपके लिए और आप कहां हैं ? क्या आपको मालूम है कि सूर्य हमेशा उदय होता रहता है ? सोचिए! ये पृथ्वी घूम रही है और कहीं न कहीं इस संसार के अंदर, इस पृथ्वी के ऊपर सूर्य उदय हो रहा है और कहीं न कहीं सूर्य अस्त हो रहा है। ये उदय होना और अस्त होना कभी बंद नहीं होता है। ये सिर्फ आपका दृष्टिकोण है, क्योंकि आप जिस जगह हैं, उस जगह जब आप देखते हैं कि सूर्य उदय हुआ तो आप सोचते हैं कि अब सूर्य उदय होकर खतम हो गया, परंतु खतम नहीं हुआ। अभी भी कहीं न कहीं सूर्य उदय हो रहा है और कहीं सूर्य अस्त हो रहा है! ये चक्कर हमेशा लगा रहता है।

 

अच्छाई-बुराई उतनी ही है, पर आपका दृष्टिकोण क्या है ? अच्छाई को देखने के लिए, जो आपके अंदर अच्छाई है, उसको देखने के लिए, जबतक आप नहीं समझेंगे कि इस स्वांस का आना-जाना ही भगवान की कृपा है, तो आपको अच्छाई तो — अच्छाई की परिभाषा क्या है आपके लिए ? आपके अच्छाई की परिभाषा है — आपकी मनोकामना पूरी हो! है कि नहीं ? आपकी मनोकामना पूरी हो — ये अच्छाई है आपके लिए।

 

तो बुराई भी है, अच्छाई भी है। परंतु एक अच्छाई सबके साथ हो रही है। परंतु अगर उसको समझ नहीं सकते हैं तो फिर बुराई ही बुराई नज़र आएगी! देखो! इस संसार के अंदर दया की कमी नहीं है। बहुत लोग दयालु हैं। बहुत लोग दयालु हैं! सच में, मैं सच कह रहा हूं! बहुत लोग दयालु हैं।

 

एक बार हमने देखा जयपुर में। दिल्ली से आ रहे थे जयपुर! एक जगह है बस स्टैण्ड! तो वहां देखा! एक बेचारा काफी बुड्ढा आदमी, पता नहीं कहीं गया होगा कुछ खरीदने के लिए, कुछ करने के लिए, उसकी बस चल दी। तो वो बेचारा बस के पीछे भाग रहा है, पर भाग नहीं सक रहा है। और बस और तेज, और तेज, और तेज, और तेज, और तेज, और तेज जा रही है। तो हमने कहा, ये तो बहुत बुरा हुआ!

 

तो हम कहने ही वाले थे कुछ कि ‘‘भाई! इस बस के आगे इसको रोककर के, इसको कहें कि तेरा एक पैसेंजर रह गया है’’, इतने में दो आदमी मोटर साइकिल पर थे। एकदम गए वो, उन्होंने बस रोकी — रोकवाई और ड्राइवर से कहते हैं, ‘‘एक रह गया है!’’ बस, उसने देखा कि हां! सचमुच में रह गया! उसने रोक ली और वो वृद्ध आदमी जो है, चढ़ गया उस बस के ऊपर। ये भी अच्छाई है। बस ड्राइवर भी दयालु था। वो दो लोग, जो मोटरसाइकिल पर बैठे थे, वो भी दयालु थे। अब पता नहीं, उस बुड्ढे आदमी को समझ में आई बात कि नहीं कि तीन-तीन लोगों ने उसकी मदद की कि वो आज अपने घर या कहीं भी वो जा रहा है, वो पहुंच जाए।

 

तो भाई! दयालुता की कमी नहीं है इस संसार के अंदर। परंतु निर्दयता की भी कमी नहीं है इस संसार के अंदर। जबतक प्रकाश हम अपनी अच्छाइयों पर नहीं डालेंगे, तो वही चीजें प्रबल रहेंगी, जो अच्छी नहीं है। बाकी दोनों ही चीज उतनी की उतनी ही हैं और हमेशा रहेंगी, और हमेशा रहती आई हैं।

 

ऐंकर : और अब अगले प्रश्न की तरफ बढ़ते हैं, जो कि है खुशी के बारे में। हम अपने आसपास के लोगों को खुश रखना चाहते हैं। लेकिन दूसरों को खुश रखने के चक्कर में कई बार हमें अपनी खुशियों का त्याग करना पड़ता है। इन दोनों में तालमेल कैसे बिठाएं ?

 

प्रेम रावत जी : ये दीवाली आती है। दीवाली में क्या करते हो ? दीये जलाते हो ? जलाते हो दीया ? तो कैसे जलाते हो ? पहले एक दीया लेते हो, पहले उसको जलाते हो! या पहले सारे दीये जलाते हो, उसके बाद फिर उस दीये को जलाते हो ? क्या करते हो ? पहले एक दीये को जलाते हो, फिर उससे अलग–अलग दीये को जलाते हो। ठीक यही बात करनी है। खुश हो! पहले तुम खुश हो! तुम दीया हो! अगर तुम जल नहीं रहे हो, तो और दीयों को कैसे तुम जलाओगे ? बुझा हुआ दीया कुछ नहीं कर सकता है। जलता हुआ दीया बुझाये हुए दीए को जला सकता है। खुशी अपने में ढूंढ़ो पहले। अगर तुम नहीं खुश हो तो किसी और को क्या खुश करोगे ?

 

ऐंकर : धन्यवाद! ये एक बहुत ही इंटरेस्टिंग सवाल है। आज के युग में जो लोग छल और कपट करते हैं, उनकी प्रगति होती है। जबकि ईमानदार और सच्चे लोग कहीं पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में ये लोग अपनी अच्छाई को कैसे पहचानें ?

 

प्रेम रावत जी : देखिए! वो लोग, जो छल-कपट से प्रगति करते हैं, वो कभी अपने आपको सक्सेसफुल नहीं महसूस करते हैं। उनको मालूम है! अंदर से खटकती है बात! उनको मालूम है! और जो— मैंने देखा है। गरीब लोगों के चेहरे पर वो मुस्कान — उनके पास ज्यादा नहीं है। पर जितना है, उनका है! चाहे वो विदेश की सूट नहीं पहने हुए हैं — खद्दर के ही पैजामा है, खद्दर का ही कुर्ता है, परंतु नहा-धोकर के, अच्छे नये कपड़े पहनकर के जो उनके चेहरे पर मुस्कान है, वो बड़े-बड़े ऑफिसरों के चेहरे पर कई बार हमने नहीं देखी है। तो मुस्कान तो एक ऐसी चीज होती है कि दूसरे को देख करके अपने आप भी मुस्कुराने लगे, उसको असली मुस्कान — ये होती है असली मुस्कान! और दांत दिखाने वाली मुस्कान अलग होती है। वो उससे फिर कुछ नहीं होता है। तो सबसे बड़ी बात है कि वो जो प्रगति कर रहे हैं, उनको मालूम है कि वो प्रगति नहीं कर रहे हैं। परंतु जो है — जिसका हृदय संतुष्ट है, उसको मालूम है, क्या है!

 

ऐंकर :  जिन चीजों के बारे में हम जानते नहीं हैं या मैं ऐसा कहूं — जिन चीजों को हम नहीं समझते हैं, हमें उन चीजों से डर क्यों लगता है ?

 

प्रेम रावत जी : हां! डर तो लगना चाहिए, पर लगता नहीं है। उन्हीं चीजों के पीछे पड़ जाते हैं, जिन चीजों को हम समझते नहीं हैं। वही वाली बात है कि —

मन तू नाहक धुंध मचाए। 

कर आसमान छुए नहीं काहू, पाती फूल चढ़ाए। 

मूरति से दुनिया फल मांगे, अपने ही हाथ बनाए।। 

चलत फिरत में  — दुनिया पूजे देवी-देवरा, तीरथ बरत अन्हाए।

चलत-फिरत में पांव दुखत हैं, ये दुख कहां समाए।।

झूठी माया, झूठी काया, झूठन झूठ लखाए।

बांझी गाय दूध नहीं देवे, माखन कहां से लाए।।

साच के संग सांच बसत है, झूठन मार गिराए।

कहै कबीर जहां सांच बसत है, सहज ही दरसन पाए।।

कितनी सहज बात है। जो है सच में, उसको जानो! उसको पहचानो!

 

 

शांति और मानवता 00:05:12 शांति और मानवता Video Duration : 00:05:12 मानवता के लिए मानव को समझना बहुत जरूरी है!

प्रश्नकर्ता : हमने शांति को defined किया, मानवता को defined किया, एक आदमी, जो दिन में 150 रुपये कमाता है सारे दिन extreme conditions में काम करता है, उसके लिए शांति और मानवता हम कैसे define करेंगे ?

प्रेम रावत जी : पैसा भी मनुष्य ने बनाया है और पैसे का अभाव भी आज मनुष्य बना रहा है। इस पृथ्वी से सारा धन निकलता है। हीरे-जवाहरात कहां से निकलते हैं ? किसी के safe से निकलते हैं या धरती से निकलते हैं ? वो भी धरती से निकलते हैं। तो ये तो रही बात Inequality की। परंतु हमको अच्छी तरीके से मालूम है कि भूखे पेट से — इसके लिए कहा भी है कि —

बिन भोजन भजन न होय गोपाला।

ये लो अपनी कंठी माला।।

तो शांति जरूरी है और जो concerns आपने कही, ये भी जरूरी हैं। जो concerns हमारी भौतिक concerns हैं, इसके लिए society है। इसके लिए government है, इसके लिए systems हैं और उनके बावजूद भी ये नहीं हो रही है। और मैं ये कह रहा हूं कि जबतक मनुष्य अपने आपको नहीं पहचानेगा तो वो मानवता को — मानवता को, humanity को कैसे establish करेगा ? मानवता के लिए मानव को समझना बहुत जरूरी है! बिना मानव अपने आपको समझे, कैसे मानवता को स्थापित करेगा ? ये संभव नहीं है!

तो इसलिए मेरी कोशिश, मेरी कोशिश आज से नहीं, दो साल से नहीं, तीन साल से नहीं — 50 साल से ऊपर मेरी यही कोशिश रही है कि मनुष्य अपने आपको समझे, क्योंकि मैंने देखा है कि जब मनुष्य अपने आपको समझने लगता है तो उसके माहौल में ऐसा परिवर्तन होता है और सुंदर परिवर्तन होता है। ये बात मैं क्यों कह रहा हूं ? मेरे शब्द खाली नहीं हैं।

हमारा एक प्रोग्राम है, जो कि universities में भी है, libraries में भी है, जो veterans लड़ाइयों से वापिस आ रहे हैं, उनके लिए भी है। और सबसे बड़ी बात है कि वो जेलों में भी है। साउथ अफ्रीका में हर एक single जेल में है वो। हर एक जेल में है वो प्रोग्राम — पीस एजुकेशन प्रोग्राम!

उससे होता क्या है ? उससे होता क्या है ?

वो लोग, वो लोग, जो जेल में बंद हैं और एक साल के लिए नहीं, दो साल के लिए नहीं, तीन साल के लिए नहीं, कई ऐसे लोग हैं, जिनको जिंदगी का sentence मिला हुआ है, Life sentence मिला हुआ है — जब वो आते हैं जेल में तो सबसे पहले उनको यही लगता है कि सोसाइटी का fault है, गवर्नमेंट का fault है, पुलिस का fault है, उनकी फैमिली का fault है, उनके दोस्तों का fault है कि वो जेल में हैं। जब वो अपने आपको समझने लगते हैं, तब जाकर के असली परिवर्तन उनके जीवन में आता है कि इसका रिस्पॉन्सिबल और कोई नहीं, मैं हूं। और जब वो बदलना शुरू करते हैं तो उनके जीवन के अंदर जेल में भी रहकर के सुकून उनको मिलता है। तो जब जेल में रहते हुए उनके जीवन के अंदर शांति आ सकती है।

If they can feel peace in the middle of a prison, then imagine what is possible in the world outside that prison, change, change, change, change for the better, for the better. And that's the betterment of mankind, of mankind. How? By lighting individual candles. You can light a whole city. So, I hope that helps.

संबंध 00:01:57 संबंध Video Duration : 00:01:57 जबतक ये स्वांस चल रहा है, वो तुम्हारा धन है। असली धन!

प्रेम रावत:

किस चीज से तुम्हारा संबंध है ? किस चीज से तुम्हारा तार जुड़ा हुआ है ? उस चीज से अगर तुम्हारा तार जुड़ा हुआ है, जो सत्य है, जो तुम्हारे अंदर है, जो अविनाशी है तो फिर चाहे कुछ भी हो बाहर, कुछ भी हो बाहर, कुछ नहीं होगा तुमको। क्योंकि तुम्हारा धैर्य अंदर से आयेगा। अपने अंदर उन चीजों को प्रोत्साहन दो, जो अच्छी चीजें हैं, जो सुंदर चीजें हैं, जिनसे आनंद मिलेगा। हृदय को आनंद मिलेगा।

तो शांति का अनुभव तो हर एक व्यक्ति कर सकता है। हर एक व्यक्ति कर सकता है, चाहे किसी भी परिस्थिति में क्यों न हो।

‘‘लोग तो कोसते हैं अंधेरे को, पर अंधेरे को कोसने से उजाला नहीं होगा। दीया जलाने से उजाला होगा।’’

अपने अंदर का दीया कभी जलाया ?

अपने अंदर का दीया जलाओ! अपने अंदर का तुम दीया जलाओगे तो फिर अंधेरे से डरने की क्या जरूरत रहेगी ?

जबतक स्वांस चल रहा है, अभी भी कुछ है। और जो है, वो सबसे शक्तिशाली है। उसको चोर नहीं चुरा सकता। उसको बॉउन्ड्रीज़ अलग नहीं कर सकती। उसको बड़े से बड़े देश, उसको नहीं ले सकते। वो तुम्हारा है, तुम्हारा रहेगा। जबतक ये स्वांस चल रहा है, वो तुम्हारा धन है। असली धन! असली धन वो है!

फरिश्ता 00:02:00 फरिश्ता Video Duration : 00:02:00 किसका इंतजार है हमें ?

Text on screen:

कौन है वो ?

किसका इंतजार है हमें ?

हम आसमान में देखते हैं और किसी फरिश्ते का इंतजार करते हैं कि कोई धरती पर आयेगा हमारी सारी समस्याएं सुलझा देगा।

तुम ही वो फरिश्ता हो, जो तुम्हारी समस्याएं सुलझा सकता है।

- प्रेम रावत

Log In / Create Account




TimelessToday

Log In or Create an Account



OR




Accounts created using Phone Number or
Email Address are separate. 
Account Information




  • You can create a TimelessToday account with either your Phone Number or your Email Address. Please Note: these are separate and cannot be used interchangeably!

  • Subscription purchase requires that you are logged in with a TimelessToday account.

  • If you purchase a subscription, it will only be linked to the Phone Number or Email Address that was used to log in at the time of Subscription purchase.

Please enter the first name. Please enter the last name. Please enter an email address. Please enter a valid email address. Please enter a password. Passwords must be at least 6 characters. Please Re Enter the password. Password and Confirm Password should be same. Please agree to the privacy policy to continue. Please enter the full name. Show Hide Please enter a Phone Number Invalid Code, please try again Failed to send SMS. Please try again Please enter your name Please enter your name Unable to save additional details. Can't check if user is already registered Please enter a password Invalid password, please try again Can't check if you have free subscription Can't activate FREE premium subscription Resend code in 00:30 seconds
Activate Account

You're Almost Done

ACTIVATE YOUR ACCOUNT

You should receive an email within the next hour.
Click on the link in the email to activate your account.

You won’t be able to log in or purchase a subscription unless you activate it.

Can't find the email?
Please check your Spam or Junk folder.
If you use Gmail, check under Promotions.

Activate Account

Your account linked with johndoe@gmail.com is not Active.

Activate it from the account activation email we sent you.

Can't find the email?
Please check your Spam or Junk folder.
If you use Gmail, check under Promotions.

OR

Get a new account activation email now

Need Help? Contact Customer Care

Activate Account

Account activation email sent to johndoe@gmail.com

ACTIVATE YOUR ACCOUNT

You should receive an email within the next hour.
Click on the link in the email to activate your account.

Once you have activated your account you can continue to log in

You haven't marked anything as a favorite so far. Please select a product Please select a play list Failed to add the product. Please refresh the page and try one more time.