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हृदय की चाहत 00:01:42 हृदय की चाहत Video Duration : 00:01:42 हर एक मनुष्य के अंदर एक हृदय है और वह असली आजादी चाहता है।

हर एक मनुष्य के अंदर एक हृदय है। और हृदय क्या कहता है मनुष्य से ? हृदय कहता है मनुष्य से कि मुझे आजादी दे। क्योंकि जिंदगी के अंदर कुछ ऐसी सलाखें हैं, जो वो लोहे की सलाखों से ज्यादा मजबूत हैं। और कैसी सलाखें हैं वो ? वो सलाखें हैं अज्ञानता की, वो सलाखें हैं संशय की। हम अपने जीवन में, हम अपने को समझते हैं कि हम आजाद हैं। पर अगर हम अज्ञानता के पिंजरे में बंधे हुए हैं, सशंय के पिंजरे में बंधे हुए हैं। तो यह हृदय रूपी चिड़िया जो उड़ना चाहती है यह कैसे उड़ेगी ?

हम ऐसी स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं कि जेल के अंदर बैठे भी आदमी उस असली स्वतंत्रता का अनुभव कर सके। ऐसी शांति जो किसी और चीज के ऊपर निर्भर नहीं है जो अपने में ही पूरी है। ऐसी शांति!

- प्रेम रावत

उन्नति 00:01:54 उन्नति Video Duration : 00:01:54 जो जीवन मिला है, किस तरीके से हम इसको पूरा करें, किस तरीके से इसको सफल करें।

प्रेम रावत

हम यह सोचें कि हमको यह जो जीवन मिला है, ये किस तरीके से हम इसको पूरा कर सकें, किस तरीके से इसको सफल कर सकें।

परंतु इस बारे में ज्यादा लोग नहीं सोचते हैं। सोचते ये हैं लोग कि हमारी उन्नति कैसे हो ? जब उन्नति पहले से ही हो रखी है पर समझ नहीं पा रहे हैं, देख नहीं पा रहे हैं, जान नहीं पा रहे हैं, तो उन्नति होगी कैसे?

भगवान से आशीर्वाद मांगते हैं लोग, पर भगवान ने जो आशीर्वाद पहले से ही दिया है, उसको स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं है, तो फिर आशीर्वाद का फल क्या होगा ? क्योंकि आनंद चाहिए मनुष्य को। किसी भी रूप में उसको आनंद चाहिए। परंतु अगर उसके जीवन के अंदर सबकुछ है, और आनंद नहीं है तो उसको यही लगेगा कि मेरी जिंदगी सूनी है। सूनी है!

सारी आशाओं का कुंआ, जब मनुष्य के अंदर पहले से ही है, तो यह कैसे संभव है कि मनुष्य निराश हो जाए? आदमी समझे, सोचे, देखे, अनुभव करे कि जिस चीज की उसको जरूरत है, जिस चीज की उसको प्यास है, जिस चीज की उसको चाह है सबकुछ उसके पास है।

सीखने की रूचि को कैसे बनाए रखें 00:06:36 सीखने की रूचि को कैसे बनाए रखें Video Duration : 00:06:36 इस दुनिया के अंदर ऐसी कोई चीज नहीं है, जो मनुष्य सीख नहीं सकता। सबमें सीखने की क...

Text on screen : हर उम्र में सीखने और सिखाने की रूचि को कैसे बनाए रखें ?

 

प्रेम रावत:

 

अगर हम लोग ये stance नहीं adopt करें कि "हमको कुछ मालूम है, तुमको नहीं मालूम!" क्योंकि मनुष्य हमेशा यही करता रहता है। "मेरे पास कितना है, तुम्हारे पास कितना है! मेरे पास ज्यादा होना चाहिए, तुम्हारे पास कम होना चाहिए! ये मेरा है, ये तेरा है!"

 

तुलसीदास जी ने यही कहा है कि "यही माया है! ये मेरा है, ये तेरा है", यही माया है। और यही माया है कि "मैं ये जानता हूं, तू ये नहीं जानता है।"

 

तो अब बात ये हो गई कि जहां टेक्नोलोजी की बात है तो वो छोटे वाले जो हैं, उनको ज्यादा मालूम है तो वो कहते हैं कि "तुमको नहीं मालूम है, तुम नहीं कर सकते।" पर माहौल तो ऐसा होना चाहिए कि "मैं सीखना चाहता हूं! अगर तुम मुझे सिखा सकते हो, सिखाओ!" और अगर मैं कुछ तुम्हें सिखा सकता हूं तो मेरे से सीख लो!"

 

अगर ये exchange होने लगे लोगों में तो देखिए! बड़े-बड़े भी छोटों से सीख लेंगे और छोटे भी बड़ों से सीख लेंगे। फिर ये भेदभाव नहीं रहेगा, क्योंकि माली को जो मालूम है, माली को जो मालूम है, वो मालिक को नहीं मालूम! और मालिक को जो मालूम है, वो माली को नहीं मालूम! और जिस दिन मालिक, माली से सीखने लगेगा, उस दिन उसके लिए कुछ नया ज्ञान पैदा होगा। और माली, मालिक से सीख सकते हैं। और उसके लिए हो सकता है कि वो दो पैसे और बचाना शुरू कर दे! दस पैसे और बचाना शुरू कर दे! बजटिंग चालू कर दे और वो भी एक दिन मालिक बन जाए।

 

ये बात है — क्योंकि हमारे कल्चर में सीखने की बात ही नहीं है। "हम जानते हैं सबकुछ!" और जब छोटा बच्चा — 11 साल का, 12 साल का, जिस फोन को हम नहीं चला सक रहे हैं ठीक ढंग से, वो आकर छीनता है और कहता है, "मेरे को मालूम है, कैसे करना है — खड़- खड़-खड़, हो गया!"

 

हमको ये नहीं होता है कि "मैं क्या इससे सीख सकता हूं!"

 

"बेटा! सिखाना, तुमने क्या किया ?"

 

नहीं। गुस्सा आता है — "इसको मालूम है, मेरे को नहीं मालूम!"

 

लोग अपने पर पाबंदी लगा लेते हैं — "मेरी तो उम्र बहुत हो गई। अब मैं क्या सीखूंगा ?"

 

देखिए! आपका जो शरीर है, इसमें उम्र के कारण आँखें कमजोर होने लगती हैं। हो सकता है, सुनाई कम दे। हो सकता है, दाँत हिलने लगे! और चीजें हैं, उस ढंग से काम न करें, जैसे करती थीं। पर दिमाग एक ऐसी चीज है, जो काम करती रहती है। दिमाग एक ऐसी चीज है, जो काम करती रहती है! और दिमाग एक ऐसी चीज है कि जितना उसको इस्तेमाल करेंगे, उतना ही वो बढ़िया काम करेगा। जितना आप उसको इस्तेमाल करेंगे। तो अगर हमारे कल्चर में — सारे, मैं पृथ्वी की कल्चर की बात कर रहा हूं। मैं सिर्फ हिन्दुस्तान ही के कल्चर की बात नहीं कर रहा हूं। हर एक कल्चर में अगर लोग सीखने लगें और सिखाने लगें एक-दूसरे को — एक तो लोगों में कितनी रिस्पेक्ट होगी! कितनी क़दर करेंगे लोग एक-दूसरे की!

 

अब देखिए! मैं बहुत कुछ कर सकता हूं। क्योंकि मेरी सीखने की आदत है। अब कोई भी — आज भी कोई आदमी कुछ कर रहा है तो मैं उससे कहता हूं, "सिखाओ! मेरे को बताओ, कैसे किया ये ?"

 

मैं सीखना चाहता हूं अपनी जिंदगी में और मैंने बहुत बार कोशिश की। मैं हवाई जहाज भी उड़ा सकता हूं। मैं मशीनों पर भी काम करता हूं। मैंने cars भी restore की हैं! बहुत कुछ किया है। पर रोटी बनाना, बेलना — मैं इसको आसान काम नहीं समझता हूं। और जिनको मैं देखता हूं बेलते हुए — क्या ? क्या खूब बात है, तुमको आता है! और जो बेलते हैं, उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। उनके लिए कि "आप हवाई जहाज उड़ा सकते हैं ?"

 

ये बहुत बड़ी बात है। परंतु ऐसी कोई चीज नहीं है इस दुनिया के अंदर, जो मनुष्य सीख नहीं सकता। सबमें सीखने की क्षमता है। परंतु पहले ही मनुष्य दीवाल बना लेता है कि मैं सीख नहीं सकता।

 

यही बात लागू होती है अपने आपको जानने में। पहले ही वो एक दीवाल बना लेता है कि "ना, ना, ना! इन चीजों से मेरा कुछ लेना-देना नहीं है। इन चीजों को मैं नहीं समझ सकता हूं। ये धार्मिक चीज है।"

 

ये धार्मिक चीज नहीं है। अपने आपको आईने में देखना, धार्मिक नहीं है। आपने आपको जानना, धार्मिक नहीं है। भगवान कैसा है, उसकी फोटो बना के अपने दिमाग में रखना, धार्मिक जरूर हो सकता है, परंतु साक्षात् उस ब्रह्म को अपने अंदर उसको महसूस करना, धार्मिक नहीं है। इसका किसी धर्म से लेना-देना नहीं है। इसका किसी — पहले ही बनी हुई धारणाओं से कुछ लेना-देना नहीं है। ये तो साक्षात् चीज है। और जबतक हम अपने कल्चर में, अपने जीवन में सीखना और सिखाना नहीं ले आएंगे, तबतक ये सारे झंझट जो हैं लोगों के बीच में, जो तनाव बना देते हैं, जो ages को separate कर रहे हैं — क्योंकि "ये तुम्हारी आयु है। तुम जवान हो, तुम बुड्ढे हो! तुम ये हो, तुम वो हो!"

 

ये सारे तबतक खतम नहीं होंगे। ये बढ़ते चले जाएंगे। क्योंकि जो नई-नई टेक्नोलोजी आ रही हैं, नये-नये जो छोटे बच्चे हैं, उनको इस्तेमाल कर रहे हैं। जो बुजुर्ग हैं, वो इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। क्योंकि उन्होंने पहले ही ठान लिया कि "ये हमसे नहीं होगा!"

 

तो ये झंझट बना रहेगा।

संगम (ऑडियो) 00:09:18 संगम (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:18 ये कहानी तुम्हारी है, ये कहानी हमारी है। जब तक हम जीवित हैं, इस कहानी को हम समझे...

प्रेम रावत:

 

आप कौन हैं ? आप कौन हैं ? जब तुम मां के गर्भ से निकले, तब तुम्हारा नाम क्या था ? कुछ भी नहीं था। अभी रखा नहीं गया था। अभी कागज पर नहीं लिखा गया था। अभी किसी ने सोचा भी नहीं था। अभी लोगों को हो सकता है, ये भी नहीं मालूम था कि तुम लड़के हो या लड़की हो, तो नाम पहले रखने से क्या फायदा ? अगर तुम जीवित थे और तुम्हारा कोई नाम नहीं था और फिर भी तुम जीवित थे ? बिना नाम के जीवित थे ? तो तुम्हारा जो नाम है उससे और तुम्हारे से क्या लेना-देना ? कुछ लेना-देना नहीं।

 

दूसरी चीज, ये शरीर किसका है ? ये तुम्हारा है ? ये तुम्हारा है ? किसका है ? बनाने वाले का है ?

 

मतलब, अपने आपको समझना — मैं कौन हूं, क्या हूं। ये शरीर इन तत्वों का बना है, उन्हीं चीजों का बना हुआ है, जिसको तुम सबेरे-सबरे धोने की कोशिश करते हो। उसी मिट्टी का बना हुआ है, जिससे तुमको इतनी नफरत है। उन्हीं चीजों का बना हुआ है और जब ये शरीर खत्म होगा तो उन्हीं चीजों में जाकर के मिल जायेगा।

 

लोग कहते हैं न, ‘‘हां! फिर जब आदमी मरता है तो फिर ऊपर जाता है। अच्छा कर्म किया है तो ऊपर जाता है, बुरा कर्म किया है तो नीचे जाता है।’’

 

तो मैं पूछता हूं कि जब तुम्हारा जन्म हुआ तो तुम्हारा वजन अगर पांच पाउंड का था, सात पाउंड का था तो इस पृथ्वी का वजन सात पाउंड बढ़ा ? और अगर तुम्हारा वजन दो सौ पाउंड है और जब तुम मरोगे तो इस पृथ्वी का वजन दो सौ पाउंड कम होगा ? हां या नहीं ?

 

बात यह है, तुमने पहले कभी सोचा नहीं इस बारे में। तो अगर इसका वजन वैसे का वैसे ही रहेगा — मतलब, मनुष्यों के आने-जाने से नहीं बदलेगा तो क्या हो रहा है ? कोई कहीं से आ नहीं रहा है और कोई कहीं जा नहीं रहा है। सब यहीं अटके हैं। और उसी से लौकी बनती है, उसी से कद्दू बनता है, उसी से तुम बनते हो! ये है सच्चाई!

 

चक्कर क्या है ?

 

चक्कर है कि यह एक संगम है। हर एक व्यक्ति जो यहां बैठा है, यह एक संगम है। इस संगम में, इस संगम में एक वो यंत्र है, जो अनुभव कर सकता है और इसी यंत्र में बैठा है वो, जो अविनाशी है। तो, एक तो तुम अनुभव कर सकते हो और एक, इस यंत्र में बैठा है अविनाशी! यंत्र का नाश होगा, अविनाशी का नाश नहीं होगा। परंतु ये दोनों एक जगह, एक समय में आए हुए हैं। इसका क्या मतलब हो सकता है ? क्या यह संभव है कि इसका मतलब ये हो कि इस यंत्र के द्वारा तुम उस अविनाशी का अनुभव कर सको। इसलिए तुम हो! और अगर तुमने उसका अनुभव किया तो स्वर्ग तुम्हारे लिए यहीं बन जाएगा।

 

एक बार एक कछुए का बाप और कछुए की माँ दोनों खड़े हुए थे और अपने बच्चे — छोटे-से कछुए को देख रहे थे। वो छोटा-सा कछुआ पेड़ के ऊपर चढ़ता, बड़ी मेहनत से, बड़ी कोशिश से और टहनी के ऊपर जाता, बड़ी कोशिश से, बड़ी मेहनत से और फिर कूदता। और जैसे ही कूदता तो धक! जाकर जमीन पर गिरता। फिर वो जाता, फिर पेड़ पर चढ़ता, बड़ी मेहनत से —छोटा कछुआ, छोटा-छोटा कछुआ! फिर जाता है, टहनी के ऊपर जाता, जाता, जाता, जाता बड़ी कोशिश, बड़ी मेहनत से और फिर टहनी से कूदता और धक!

 

माँ, बाप कछुए से बोलती है, ‘‘मेरे ख्याल से इसको बता देना चाहिए कि ये चिड़िया नहीं है।’’

 

क्योंकि वो छोटा कछुआ यही सोच रहा था कि वह चिड़िया है। उड़ने की कोशिश कर रहा था, परंतु वो उड़ नहीं पायेगा।

 

क्या मनुष्य को भी ये बताना पड़ेगा, बताना चाहिए कि वो ये संगम है ? और क्या वो यह समझे कि वो ये संगम है और स्वर्ग यहां है ?

 

लोग लगे रहते हैं — कोई दान कर रहा है, कोई पुण्य कर रहा है। कोई कुछ कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है। कोई कुछ कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है। सब स्वर्ग जाने के लिए कर रहे हैं। कहां जाएंगे ?

 

‘‘स्वर्ग जाएंगे जी! स्वर्ग जाएंगे जी! स्वर्ग जाएंगे जी...!’’

 

हम उन लोगों को एक advice देते हैं, एक सलाह देते हैं। जब तुमको इतनी लगी हुई है जाने की — जाओ! मतलब, इंतजार क्यों कर रहे हो ?

 

इसीलिए कहा है कि अगर अपने आपका ज्ञान नहीं है, आत्मज्ञान नहीं है —

 

आतमज्ञान बिना नर भटके, भटकते रहोगे। तुम क्या हो, तुम समझ नहीं पाओगे। तुम संगम हो, ये नहीं समझ पाओगे। तुम्हारे अंदर वो अविनाशी बैठा है, ये समझ नहीं पाओगे। समझ नहीं पाओगे। लगे रहोगे खुश होने में और खुशी का भंडार तुम्हारे अंदर है। खुशी का भंडार तुम्हारे अंदर है।

 

कितनी सुंदर बात है कि जगह-जगह जाकर मैं जब लोगों को ये बात सुनाता हूं, लोगों को बड़ी अच्छी लगती है, क्योंकि ये बात सरल है, साधारण है और ये कहानी तुम्हारी है, ये कहानी हमारी है। जब तक हम जीवित हैं, इस कहानी को हम समझें, इस मिलन को, इस संगम को हम समझें। ये कहानी तुम्हारी ऐसी हो सकती है कि आनंदमय हो और तुम्हारा जीवन सफल हो सकता है। जीवन सफल करना, उसी को कहते हैं। और जिस दिन जीवन सफल होगा, उस दिन तुम्हारे लिए स्वर्ग ही स्वर्ग है। नरक भी यहां है, स्वर्ग भी यहां है।

 

मानवता का धर्म 00:03:57 मानवता का धर्म Video Duration : 00:03:57 उदारता, दया, क्षमता, क्षमा— ये है तुम्हारा धर्म!

प्रेम रावत:

 

सबसे पहले तुममें शांति होनी चाहिए। और तब, जब तुममें शांति होगी, तब तुम इस संसार से शांति बनाओ! और जब तुम इस संसार से शांति बनाओगे, तब जाकर के इस संसार के अंदर शांति होगी। क्योंकि इस संसार में अशांति का कारण तुम्हीं हो। इस संसार के अंदर जो अशांति फैली हुई है, वह अधर्म के कारण फैली हुई है।

 

अधर्म जो मनुष्य करता है, क्योंकि उसको यही नहीं मालूम कि वो कौन है। उसको ये नहीं मालूम कि वो शेर है या बकरी ? कौन है वो ? उसको नहीं मालूम! और अधर्म होता है।

 

सबसे पहला धर्म क्या है ?

 

सबसे पहला धर्म जो मनुष्य ने बनाया, वो धर्म है — दया होनी चाहिए, उदारता होनी चाहिए। इसीलिए तो इन सब चीजों का वर्णन हर एक धार्मिक धर्म में मिलता है। चाहे वो हिन्दू हो, चाहे वो मुसलमान हो, चाहे वो सिख हो, चाहे वो ईसाई हो, चाहे वो बुद्धिष्ट हो! किसी भी धर्म का हो, सभी धर्मों में ये सारी चीजें बराबर हैं।

 

उदारता होनी चाहिए, दया होनी चाहिए, क्षमता होनी चाहिए, क्षमा होनी चाहिए! ये है तुम्हारा धर्म! और जब तुम क्षमा नहीं करते हो, जब तुम दया नहीं करते हो, तुम अधर्म करते हो! इस अधर्म — नरक की बात छोड़ो! नरक की बात छोड़ो! क्यों छोड़ो ? क्योंकि अधर्म के कारण मनुष्य ने नरक यहीं बना दिया है। जहां स्वर्ग होना चाहिए, वहां मनुष्य ने नरक बना दिया है।

 

असली धर्म को पकड़ो! और वो असली धर्म है — मानवता का धर्म! मानवता का धर्म! जिसमें दया है, उदारता है! और जब उसको पकड़ोगे, अपने आपको पहचानोगे कि तुम कौन हो।

 

मैं बात कर रहा हूं, तुम्हारा! जो मानव होने के नाते जो तुम्हारा धर्म है, इसको निभाना सीखो! जिस दिन तुम इसको निभाने लगोगे, तुम्हारे जीवन के अंदर भी आनंद ही आनंद होगा।

क्या कहानियां आज भी महत्त्वपूर्ण हैं? 00:07:45 क्या कहानियां आज भी महत्त्वपूर्ण हैं? Video Duration : 00:07:45

Text on screen:

बच्चों और बड़ों को कुछ समझाने के लिए क्या कहानियां आज भी महत्त्वपूर्ण हैं ?

 

प्रेम रावत:

 

देखिए! कहानी के दो कारण होते हैं। एक तो जो कहानी सुनाने वाला है, उसको अच्छी तरीके से मालूम है कि वो क्या कहना चाहता है। परंतु जो वो कहना चाहता है, वो हो सकता है कि दूसरा समझ न पाए। क्योंकि हो सकता है कि वो चैलेंजिंग भी हो! और जो सुनने वाला है, वो कहे, ‘‘नहीं!’’

 

तो कई बार कहानी एक ऐसी चीज है कि जब गोली खाते हैं न, कई गोलियां हैं, उन पर बाहर चीनी लगा देते हैं, मीठा लगा देते हैं, ताकि उसको हजम करने में अच्छा लगे, कड़वापन न आए। तो एक स्थिति, परिस्थिति और वो ऐसी परिस्थिति, जो entertaining हो! और उसके बीच में वो शिक्षा पड़ी हुई है। और बच्चा उसकी imagination जो है, वो trigger हो! तो जब बच्चा सुन रहा है उसको तो वो सोच भी रहा है और देख रहा है अपने दृष्टिकोण से कि ‘‘अच्छा! ये राजा था! वो ऐसा था! वो वैसा था! वो ऐसा था! वो ऐसा था!’’

 

अगर कहानी को प्योरिली इंटरटेनमेंट रूप से लिया जाए तो आप टेलीविजन के साथ कैसे compete करेंगे, जिसमें कहानी पूरी की पूरी है ?

 

राजा कैसे कपड़े पहनते थे, ये बच्चे को imagine करना था। अब imagine करने की क्या जरूरत है ? सिर्फ आँखें खोलिए, पर्दे पर देखिए, टेलीविजन पर देखिए और आपको दिखाई देगा कि उन्होंने कैसे कपड़े पहने हुए हैं। तलवार कैसी होती थी ? ये है, वो है! ये सारी चीजें तो imagination नहीं fire हो रही है। अब, जब मूवी देखते हैं हम, कोई भी मूवी तो हमको कुछ करने की जरूरत नहीं है। Imagine करने की जरूरत नहीं है। कहानी अपने आप unfold करेगी और उसमें जहां-जहां emphasis डालना है, वो डाला जाएगा, म्यूजिक के द्वारा डाला जाएगा, डायलॉग के द्वारा डाला जाएगा। धमाके के साथ डाला जाएगा। हमको तो सिर्फ वहां बैठना है, आँखें खोलनी है और देखते रहो!

 

कहानी ऐसी चीज नहीं है। कहानी एक very human चीज है। एक बहुत मानवता की बात है! मनुष्य की बात है! उसकी imagination trigger करने की बात है। तो सबसे पहले मैसेज क्या है ? अगर मैसेज को देखा जाए — और वो मैसेज नहीं है उसमें और सिर्फ entertainment है तो काम नहीं चलेगा। वो इसलिए नहीं चलेगा, क्योंकि आप compete कैसे करेंगे कार्टून के साथ ? आप compete कैसे करेंगे, जो वो मूवी फोन पर देख सकता है, वो अपने आई-पैड पर देख सकता है या अपनी टेबलेट पर देख सकता है या अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर देख सकता है या टेलीविजन पर देख सकता है। Impossible! संभव नहीं है। तो एक मूवी है, जो टेलीविजन पर देखता है और एक मूवी है, जो वो अपने दिमाग से देखता है। कहानी है वो चीज, जो वो टेलीविजन {इशारा करते हुए} यहां से देखे! तो सारा उसको, सारे एक्टर उसको लाने हैं। सबकुछ — ड्रामा उसको लाना है, सबकुछ लाना है। और वो इतना engage हो जाता है उसमें —

 

जब मैं छोटा था, मैं कहानी का मेरे को इतना शौक था कि आप पूछिए मत! जो कोई भी मेरे को कहानी सुना सकता था, मैं उसके पास जाकर बैठ जाता था, ‘‘सुनाओ!’’ सबेरे हो, शाम हो, दोपहर हो! और ये imagine! क्योंकि उस समय —टेलीविजन नहीं आया था। सिर्फ रेडियो था। और रेडियो की भी बहुत थोड़ी-सी चैनल थी। और सबेरे-सबेरे थोड़े से भजन आते थे, फिर खबर आती थी, फिर थोड़ी और खबर आती थी और उसको दोहराया जाता था, फिर रेडियो बन्द! फिर लंच टाइम के समय थोड़ा-सा और रेडियो आता था, फिर रेडियो बंद! फिर शाम के समय रेडियो आता था। मतलब, रेडियो भी हमेशा नहीं चलता था। तब entertainment के लिए क्या करें ?

 

वो कहानियां explore करना, बाहर जाना, पेड़ को देखना, आम चखना, लीचियों को चखना! और सारे दिन, गर्मियों के दिन यही करना। तो ये चीजें आज बहुत दुर्लभ हो गई हैं। हैं! दुर्लभ हो गई हैं। आदमी को खींच के रखा हुआ है। अब मैं नहीं कह रहा हूं कि टीवी गलत है। मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं नहीं कह रहा हूं कि जो मूवीज़ हैं, वो गलत हैं। नहीं। ये तो होगा। बात ये है कि मनुष्य को सोचने की जरूरत है। और अपने बारे में सोचने की जरूरत है। और जहां तक कहानियों की बात है — जब वो आदमी के लिए मैसेज क्लीयर है तो वो कहानी सुना सकता है।

 

क्योंकि कहानी एक आदमी के हृदय से, एक आदमी के दिमाग से दूसरे की तरफ जा रही है। और ये चीज बहुत जरूरी है।

 

अब एक बात मैं थोड़े रूप में कहता हूं। हो सकता है कि आगे जाकर इसका और खुला-खुलासा हो! तो ये है कानून दो मोमबत्तियों का। यह भी एक कानून है। अगर एक मोमबत्ती जल रही है और एक मोमबत्ती बुझी हुई है और आप दोनों मोमबत्तियों को साथ में लगाएं तो कानून यह है कि जो जल रही है, वो बुझी हुई मोमबत्ती को जला देगी। कानून यह नहीं है कि बुझी हुई मोमबत्ती जलती हुई मोमबत्ती को बुझा दे। यह कानून है! प्रकृति का कानून है! और इसकी वजह से जो मोमबत्ती जल रही है, उसमें ये क्षमता है कि वो दूसरी मोमबत्ती को जला दे। यह सबकी जिम्मेवारी है। हर एक मनुष्य जो है इस संसार के अंदर — चाहे वो मर्द हो, चाहे वो औरत हो, चाहे वो बच्चा हो, चाहे वो बूढ़ा हो — यह सबमें क्षमता है। बात ये नहीं है कि जो जलती हुई मोमबत्ती है, उसको लम्बा होना चाहिए, उसको बड़ा होना चाहिए। ना! चाहे वो बहुत छोटी-सी क्यों न हो, पर जल रही हो तो वो बहुत बड़ी, लम्बी-चौड़ी बुझी हुई मोमबत्ती को भी जला सकती है। तो हो सकता है कि आगे इसका और खुलासा किया जाए। पर यह बात बहुत जरूरी है। और ये कहानियां, ये संदेश इसीलिए जरूरी है लोगों तक पहुंचे। क्योंकि यह उनको include करता है। यह नहीं है कि इस टेलीविजन को देखिए! यह टेलीविजन बढ़िया है या इस मूवी को देखिए! या ये करिए, वो करिए! नहीं! जो आपके पास है, उसको देखिए! जो आप हैं, उसको जानिए! जो आप हैं, उसको पहचानिए! यह आप पर निर्भर है।

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