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सपने और हकीकत (ऑडियो) 00:09:34 सपने और हकीकत (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:34 मेरे को आनंद से मतलब है, मेरे को शांति से मतलब है, मेरे को संतोष से मतलब है। मेर...

प्रेम रावत:

एक बार एक राजा ने अपने माली को कहा कि महल के पास यह जगह है और यहां मैं चाहता हूं कि बहुत सुंदर एक बाग लगाओ। तो महल ऊपर पहाड़ी पर बना हुआ था। रोज माली एक बांस बड़ा और आगे एक मटका और पीछे एक मटका, उसको लेकर नीचे रास्ते से जाता था और जो नीचे, पहाड़ के नीचे जो नदी थी, उससे पानी, अपने मटके में भर के और फिर ऊपर तक, अपने बाग तक उसको ले जाता था। ऐसे करते-करते, करते-करते, काफी समय बीता। हरियाली होने लगी बाग में। फूल लगने लगे। बाग अच्छा लगने लगा।

एक दिन माली ने जैसे ही मटके को रखा तो एक मटका, जो पीछे वाला मटका था, उसमें छेद हो गया। फिर भी माली ने उस मटके को फेंका नहीं। और न ही अपने बांस से निकाला। वो रोज उन्हीं दो मटकों को नीचे तक ले जाता था, पानी से भरता था, फिर ऊपर लाता था। चलता रहा ये।

एक दिन आगे वाला मटका, पीछे वाले मटके से बोलता है, ‘‘तू किसी काम का नहीं रहा! तेरे में तो छेद है।’’

जो पीछे वाला मटका था, उसको अहसास हुआ कि सचमुच में किसी काम का नहीं हूं मैं।

आगे वाले मटके ने कहा कि ‘‘ये माली इतनी मेहनत करके नीचे ले जाता है, दोनों मटकों को भरता है और जब तक वो ऊपर, इस बाग में पहुंचता है, तेरे में तो एक बूंद पानी नहीं रहता है। और ये जो बाग — हरियाली इस बाग की जो दिखाई दे रही है, वो तो सिर्फ मेरे कारण है। तेरे कारण तो है नहीं! तू तो किसी काम का नहीं है।’’

मटके को बड़ा बुरा लगा। एक दिन पीछे वाला जो मटका था, वो रोने लगा।

माली आया। माली ने दोनों मटकों को देखा। पीछे वाले मटके को देखकर कहता है, ‘‘तू रो क्यों रहा है ?’’

कहा, ‘‘मैं किसी काम का नहीं रहा। तुम इतनी मेहनत करते हो, नीचे दोनों मटकों को भरते हो, ऊपर लाते हो और जबतक ऊपर लाते हो, मेरे में तो एक बूंद पानी नहीं रहता है। मैं तो किसी काम का नहीं।’’

माली ने कहा, ‘‘ऐसी बात नहीं है। मुझे मालूम है, जिस दिन तेरे में छेद हुआ। मुझे मालूम है। पर मैं तेरे को फिर भी भरता रहा और ऊपर तक लाता रहा। इस बाग में जो हरियाली है, वो तो आगे वाले मटके की वजह से है। परंतु तैंने देखा, जो रास्ता नदी से इस बाग तक आता है, उसमें कितनी हरियाली है! और वो तेरी वजह से है। इस बाग में सब कोई नहीं आ सकता। और उस रोड पर सब लोग आते हैं, जाते हैं और वो उन फूलों को देखकर खुश होते हैं। आगे वाला मटका तो एक ही आदमी को खुश करता है और तू दिन में हजारों लोगों को खुश करता है।’’

क्योंकि सोचने की बात है हम अपने को अभागा समझते हैं। क्योंकि हमारी जो धारणाएं हैं, हमारी जो सोच है — ऐसा होना चाहिए। हमारे जो सपने हैं, ऐसा होना चाहिए, ऐसा होना चाहिए। हम ये चाहते हैं, हम ये चाहते हैं, ये साकार नहीं होते हैं और जब साकार नहीं होते हैं तो हमको दुःख होता है। हम कहते हैं, ‘‘हमारे साथ ये क्यों हो रहा है ? उसके साथ ये क्यों हो रहा है ? उसके साथ सबकुछ अच्छा है, हमारे साथ सबकुछ बुरा है।’’ अपने कर्मों को कोसते हैं। जब दुःख आता है, ‘‘मेरे कर्मों का फल है। मैंने क्या कर्म किए होंगे पिछले जन्म में ?"

मतलब, सारी बात दिमाग में ऐसे-ऐसे घुसेड़ते हैं कि पूछो मत! और घुसेड़ने वाले भी एक नहीं हैं, अनेक हैं। ‘‘जो कुछ आज हो रहा है, वह तेरे कर्मों का फल है।’’ तो मुझे याद क्यों नहीं है ? मैंने क्या कर्म किए थे ? अगर याद होता कि ये-ये कर्म करने से मेरे को अच्छा फल मिल रहा है तो दुबारा करता! याद तो है नहीं! अब क्या करूं ? पर चक्कर है — कर्मों का नहीं, तुम्हारे सपने पूरे न होने का। चक्कर ये है! चक्कर कर्मों का नहीं है। चक्कर कर्मों का नहीं है! चक्कर है — तुमने जो धारणाएं बना रखी हैं कि मेरे सपने ये हैं, मेरे सपने ये हैं और दुनिया तुमको दिखाती है सपने।

क्यों ? ये है मनुष्य इस कलयुग का और भूल गया है मनुष्य अपनी ही प्रकृति को। भूल गया है मनुष्य कि वो सचमुच में वो क्या है, वो कौन है ?

और लोग लगे हुए हैं, ‘‘हां! हां, हां!!’’

देखो! जो तुमको समझ में न आए, वो कूड़ा है। जो तुमको समझ में न आए! अगर वो, जो समझ में नहीं आता है, उसको निकाल दो तो तुम जानते हो, तुम्हारे कंधों का बोझ कितना हल्का होगा ? कर्मों के चक्कर से निकल के तुम किस चक्कर में पड़ोगे कि मेरे को अपने जीवन में शांति चाहिए। मैं आनंदमय — हर दिन मैं आनंदमय होना चाहता हूं। बस! अब ये पैसे से आए तो फिर पैसा कमाऊंगा और पैसे से न आए, जैसे आए, मेरे को आनंद से मतलब है, मेरे को शांति से मतलब है, मेरे को संतोष से मतलब है। मेरे को उस चीज से मतलब है, जो मेरे हृदय में है। और चीजों से मेरे को मतलब नहीं है।

तुम्हारी प्रकृति है ये कि तुम्हें लगी है असली प्यास और असली प्यास है उस परमानन्द की, अपने आपको जानने की। क्योंकि अगर तुम अपने आपको जानते तो तुमको पता लगता कि तुम्हारे में कितना बल है! तुम अगर अपने आपको जानते तो और चीजों के पीछे न लगकर के, अपने पीछे लगते। अपने अंदर स्थित जो मंदिर तुम्हारे हृदय के अंदर है, वहां जाकर तुम दर्शन करते। वहां जाकर के उस भगवान का पूजन करते, जो असली भगवान, जो था, है और रहेगा, तुम्हारे अंदर जो है। 

सरकार और नागरिक 00:03:35 सरकार और नागरिक Video Duration : 00:03:35 सरकार और जनता के बीच एक बेहतर संवाद कैसे स्थापित हो सकता है ?

प्रश्नकर्ता:

सरकार और जनता के बीच एक बेहतर संवाद कैसे स्थापित हो सकता है ?

 

प्रेम रावत:

कहीं भी आप चले जाइए, समाज में एक बीमारी है। और वो बीमारी यह है — भगवान हो, धर्म हो, गवर्नमेंट हो, हम उनको दोषी ठहराना चाहते हैं। "मेरे जीवन  में ये नहीं है, ये नहीं है, ये नहीं है, यह भगवान की — भगवान की गलती है। भगवान को दोष दो! यह ऐसा नहीं है, यह वैसा नहीं है, धर्म को दोष दो!"

तो हम तो लग गए हैं लोगों को दोष देने में। जबतक ये कीड़ा हम अपने दिमाग से नहीं निकालेंगे हम सरकार क्या होती है, नहीं समझ पाएंगे। इस समय हालत ये है कि सरकार को चाहिए वोट और लोगों को चाहिए तरक्की। और इस पिंग-पोंग में, इस खेल में अगर थोड़ा-बहुत कहीं गुंज़ाइश है — क्योंकि सबसे पहले लोग ही जाते हैं, सरकार को सत्ता में लाते हैं वोट देकर और जैसे ही वोट दे दी, फिर उन पर आरोप के बाद आरोप, आरोप के बाद — ‘‘उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया।"

तो ये जो कीड़ा है दूसरों को दोष देने का, "उनकी वजह से नहीं हो रहा है, उनकी वजह से...।"

"मैं क्या कर सकता हूं, मैं क्या कर सकता हूं ?"

अब ये एक बात है कि जो आज देख रहे हैं हिन्दुस्तान में — स्वच्छ भारत! कितना बढ़िया आइडिया है। कितना सुंदर आइडिया है। मतलब, ये तो बेसिक चीज है। क्योंकि हमको साफ रहना — इसका मतलब है कि हम बीमार नहीं होंगे। देखने में भी अच्छा लगता है।

परंतु मैं देखता हूं कि कई जगह जो स्वच्छता होनी चाहिए, वो नहीं है। तो पहले मेरे में यही प्रेरणा आती है कि मैं गवर्नमेंट को दोष दूं। उनकी वजह से नहीं हो रहा है। परंतु मैं भी तो कुछ कर सकता हूं। अगर मैं कूड़ा फेंकना छोड़ दूं — हैं, जी ? तो क्या परिवर्तन नहीं आएगा ? क्योंकि ये कूड़ा आया कहां से ? आया कहां से ? ये आसमान से तो आया नहीं ? ये नहीं है कि बारिश शुरू हुई और कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा! नहीं। ये कूड़ा हम ही पैदा करते हैं और अगर हम ही थोड़ी-सी जिम्मेवारी लें कि हम कूड़ा न फेंकें या उसको ठीक तरीके से डिस्पोज़ करें तो इसमें असर पड़ेगा।

पर वो नहीं हो रहा है। वो नहीं हो रहा है। लोग मज़ाक उड़ाने के लिए तैयार हैं, परंतु जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। दोष देने के लिए तैयार हैं, पर जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। तो कोई भी चीज हो इस संसार के अंदर, मनुष्य की भी तो कोई जिम्मेवारी बनती है ? जो यहां के नागरिक हैं, उनकी भी तो कोई जिम्मेवारी बनती है ? और जबतक वो जिम्मेवारी नहीं लेंगे और वो समझेंगे कि ऐसी सरकार आए, जो उनके सारे प्रॉब्लम्स को सॉल्व कर दे, वो कभी होगा नहीं। कभी हुआ नहीं है, कभी होगा नहीं। 

शांति क्या है 00:02:34 शांति क्या है Video Duration : 00:02:34 शांति क्या है ? शांति है वह चीज कि मनुष्य अपने आप को पहचाने।

प्रेम रावत :

सबसे बड़ी बात यह है। जो भी मेरा संदेश है, वह बड़ा साधारण संदेश है कि ‘‘भाई! जिस चीज की तुमको तलाश है, वह तुम्हारे अंदर है।’’ 

अब बाहर तो हम सबकुछ करते हैं, क्योंकि बाहर हम देखते हैं, सजाते हैं अपने आपको। 

पर हम अंदर के लिए क्या कर रहे हैं ? संदेश यह है कि अंदर के लिए हम क्या कर रहे हैं ? 

क्योंकि जो कुछ भी बाहर है, वह तो अंदर से आ रहा है। अब अगर अंदर आदमी को चिढ़ लगी हुई है तो उसको कितना भी आप मुस्कुराने के लिए कहिए, जैसे ही उसका ध्यान कहीं और जाएगा और वह मुस्कुराना बंद करेगा, उसकी जो चिढ़ है, वह बाहर आ जाएगी। तो जो कुछ भी हम कर रहे हैं, वह अंदर के लिए नहीं कर रहे हैं, बाहर के लिए कर रहे हैं। और बाहर हम चाहे कितना भी परिश्रम कर लें, शांति आपके अंदर से शुरू होनी है, बाहर से नहीं। 

जो बाहर आप लक्षण देख रहे हैं शांति का, लोग अपनी धारणाएं लेते हैं कि अगर शांति हो तो ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा! उनमें लगे हुए हैं, पर उनसे शांति नहीं होगी। शांति होगी तब, जब अंदर से शांति होगी। 

अंदर की शांति ये नहीं है कि हमारी समस्याओं का हल हो जाए तो हम शांत हो जाएंगे क्योंकि हमारी समस्याएं बदलती रहेंगी। लोग समझते हैं कि ये लड़ाइयां बंद हो जाएं तो शांति हो जाएगी। यह भी शांति नहीं है। 

तो अब शांति क्या है ? शांति है मनुष्य के अंदर। शांति है वह चीज, जो कि मनुष्य अपने आप को पहचाने। 

आपके अंदर आनंद को अनुभव करने की भी ताकत है और आपके अंदर परेशान होने की भी ताकत है। ये दो ताकत जो आपकी हैं, इससे आप कभी वंचित नहीं हैं। मतलब, आप कहीं भी चले जाएं, ये दोनों चीजें आपके साथ-साथ चलती हैं। आप क्रोधित भी हो सकते हैं और आप आनंद में भी हो सकते हैं। आप प्यार भी कर सकते हैं, आप नफरत भी कर सकते हैं। दोनों चीजें आपके साथ चलती हैं। 

तो अब बात यह है कि हम किस चीज को प्रेरणा देते हैं ?

उत्सव 00:01:19 उत्सव Video Duration : 00:01:19

कुछ लोगों को उत्सव मनाने के लिए पूरे साल इंतजार करना पड़ता है।

कुछ लोग हर दिन उत्सव मनाते हैं।

जीवन का उत्सव मनाओ। 

बत्ती जलाओ, अंधेरा मिटाओ 00:01:51 बत्ती जलाओ, अंधेरा मिटाओ Video Duration : 00:01:51 जब प्रकाश होगा तो तुम देख पाओगे!

Voiceover:

मुझे तो आप बखूबी जानते ही होंगे! क्योंकि इस दुनिया में आज मैं ही तो हूं, जो अलग-अलग रूपों में छाया हूं।

सही पहचाना!

मैं आपका दिल अजीज़ अंधेरा हूं। आप से तो मेरा बहुत पुराना याराना है। आज संसार में जो अज्ञानता, भ्रष्टाचार, आतंकवाद फैला है ये मेरे ही तो अंग हैं। और इन सबसे जब आप अशांत होते हैं तब मेरा मकसद पूरा होता है।

वैसे आप मुझे दूर हटाने की कोशिश तो बहुत करते हैं लेकिन छोड़िए जनाब! आपकी सब मेहनत बेकार है, क्योंकि मैं इस कदर आपकी जिंदगी पर घर कर चुका हूं कि मुझे कोई नहीं हटा सकता। आज सारे संसार पर धीरे-धीरे मेरा कब्जा होता जा रहा है। आप मजबूर हैं मुझे बर्दाश्त करने के लिए। मैं ऐसे ही आपको अशांत करता रहूंगा क्योंकि आपके पास कोई तरीका नहीं है। मैं यूं ही आप पर हावी रहूंगा। मुझको कोई नहीं हटा सकता, कोई नहीं हटा सकता, कोई नहीं हटा सकता, कोई नहीं हटा सकता....!

प्रेम रावत:

बत्ती जलाओ, अंधेरा मिटाओ। जब प्रकाश होगा तो तुम देख पाओगे! जब तुम देख पाओगे तो तुम्हारे संशय अपने आप दूर होंगे।

पहचान (ऑडियो) 00:09:22 पहचान (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:22 यह जो जीवन रूपी दिन मिला है, यह जो सूरज चढ़ा है, क्या करोगे तुम इस दिन में ? क्या...

आना, जाना इस संसार के अंदर जैसे लहर आती जाती रहती हैं, जैसे ये बादल आते जाते रहते हैं, जैसे ये सूरज सबेरे चढ़ता है और शाम को ढल जाता है — ये है तुम्हारी जिंदगी। ये एक दिन का सूरज का चढ़ना है — ये एक सबेरा है, एक दोपहर है, एक शाम है। सूरज के चढ़ने से पहले भी अंधेरा था और सूरज के ढलने के बाद भी अंधेरा हो जायेगा। पर ये जो दिन मिला है, ये जो जीवन रूपी दिन मिला है, ये जो सूरज चढ़ा है, क्या करोगे तुम इस दिन में ? क्या करोगे तुम आज ? क्योंकि ये है तुम्हारा आज। ये जीवन, ये शरीर, इस जीवन का मिलना है तुम्हारा आज, ये है तुम्हारा सवेरा, और एक दिन दोपहर भी होगी और फिर सूरज ढलेगा और शाम भी होगी, और शाम के बाद फिर रात भी होगी।

क्या किया तुमने आज ?

जो तुम कर रहे हो अपने जीवन में, अगर तुमने उस ‘हंस’ को, जो तुम्हारे अंदर विराजमान है, अगर उसको नहीं जाना तो तुम्हारा आना-जाना बराबर है। क्या आना-जाना ?

मुट्ठी बांधे आया जग में, हाथ पसारे जायेगा।

सोचो! सोचने की बात है! अगर विचार करोगे, बच जाओगे। विचार करोगे, बच जाओगे।

एक छोटा-सा कुत्ता था। तो एक दिन टहलते-टहलते, टहलते-टहलते, टहलते-टहलते, वो जंगल में चला गया। और जब जंगल में चला गया तो उसको लगा कि बाप रे बाप! मैं इतने गहरे जंगल में आ गया हूं। खतरा लगा उसको! खतरा लगा तो वो सूंघा उसने। कुत्ता तो है ही! सूंघा उसने। तो उसको गंध ऐसी आई जैसे पहले कभी आयी नहीं थी। तो उसको लगा कि ये कोई शेर-वेर है, जो मेरे को खायेगा। तो आगे चलता गया, चलता गया, चलता गया, चलता गया। आगे उसको मिला एक हड्डियों का बहुत बड़ा ढेर! तो वहां जाकर के बैठ गया। बैठ गया।

अब सोचने लगा, "बचना है, सोच ले!"

इतने में आया शेर पीछे से गुर्राता हुआ।

तो कुत्ता बोलता है, "वाह, वाह, वाह!" कुत्ता बोलता है, "वाह, वाह, वाह! इतने शेरों को खा गया, अभी भी मेरी भूख खत्म नहीं हुई है। एक और शेर मिल जाए तो हो सकता है, मेरी भूख खत्म हो जाए।"

जैसे ही शेर ने ये सुना कि एक छोटा-सा कुत्ता और उसके सामने हड्डियों का ढेर! तो उसको भी लगा कि "हो सकता है, ये मेरे को खा जाय।"

तो शेर बेचारा मुड़ा और चल दिया वहां से दुम दबाए हुए। एक बंदर पेड़ पर चढ़ा हुआ ये सब देख रहा था। बंदर आया नीचे, गया शेर के पास और शेर को उसने बताया, "ये तेरे को बेवकूफ बना रहा है। ये छोटा कुत्ता तेरे को बेवकूफ बना रहा है। ये कह रहा था इसलिए सिर्फ, ताकि तू डर जाये। इसने किसी शेर-वेर को नहीं खाया।"

शेर को बड़ा गुस्सा आया। शेर को बड़ा गुस्सा आया कि मेरे को बेवकूफ बनाता है।

तो बंदर ने कहा, "चलो, वापिस चलो, खाने के लिए उसको!"

शेर ने कहा, "तू बैठ मेरी पीठ पर। चलते हैं।"

बंदर बैठ गया शेर की पीठ पर और चलने लगे।

अब कुत्ता वहीं का वहीं था। सोचा, "फिर सोच ले! अब की गया! इस बार तो बंदर भी आ रहा है। इसी ने कहीं गड़बड़ की होगी। सोच ले!"

तब कुत्ता बोलता है कि "वो बंदर गया कहां ? उसको आधे घंटे मैंने पहले भेजा था शेर लाने के लिए, अभी तक वापिस नहीं आया।"

और जैसे ही शेर ने सुना, उठाया बंदर को, फेंका नीचे और भागना शुरू कर दिया उसने।

सोच लो! क्यों सोच लो ? वो तो शेर था। तुम्हारे आसपास काल मंडरा रहा है। काल! इंतजार कर रहा है, "कब मौका मिले ?" इंतजार कर रहा है, "कब मौका मिले ?" तुम हो, तुमको परवाह ही नहीं है, क्योंकि तुम घमण्ड के नशे में चूर हो। घमण्ड हो जाता है न, घमण्ड! "मैंने ये कर लिया, मैं ये हूं! मेरा ये है, मेरा वो है!" और भूल जाते हैं कि यहां क्यों आए ? क्यों आए ? क्यों तुम्हारा जन्म हुआ ? इसके लिए नहीं। अरे, ये तो कुत्ते के पास भी है। कबीरदास जी कहते हैं, कि "तुम्हारा जन्म हुआ है, ताकि तुम उस चीज को पहचानो, उसको जानो और अपने जीवन को सफल बनाओ।" इसीलिए तुम्हारा जन्म हुआ।

देखो इस दुनिया को। आज जितने स्कूल हैं इस दुनिया के अंदर, पहले कभी नहीं थे। और जितनी क्रांति है इस संसार के अंदर, पहले कभी नहीं थी।

लोग तो कहते हैं न कि "अगर लोग पढ़े-लिखेंगे तो अच्छे बनेंगे।"

अरे, अब इतने स्कूल हैं तो क्रांति क्यों फैल रही है ? पढ़ने-लिखने से क्रांति का कोई संबंध नहीं है। क्रांति मन की अशांति के कारण फैलती है। जबतक मन शांत नहीं होगा लोगों का, जबतक शांति का अहसास नहीं होगा उनको अपने जीवन के अंदर, क्रांति फैलती रहेगी। तुम्हारे जीवन के अंदर भी क्रांति है। तुमको भी परेशान करती है। बिना बात के परेशान करती है। और तुम्हारे घट में है क्या ? अलख पुरुष अविनाशी! और तुम उसको जानते नहीं हो। अगर तुम उसको जान जाओ, तभी तुम्हारे जीवन के अंदर शांति आयेगी। उससे पहले नहीं आ सकती। घमण्ड करने से कुछ नहीं होगा इस संसार के अंदर!

एक वैद्य था — हकीम! उसको मालूम था कि जब वो, उसका टाइम आने वाला है, मरेगा। तो उसको मालूम था कि आयेगा, यमराज का दूत आयेगा। और उसको ये भी मालूम था कि वो एक ही को ले जा सकता है, दो को नहीं ले जा सकता। तो उसने अपना पुतला बनाया और ऐसा पुतला बनाया, ऐसा पुतला बनाया, ऐसा पुतला बनाया कि दोनों एक ही तरीके से दिखाई दें। और जब समय आया तो वो भी लेट गया अपने पुतले को साथ में रख दिया।

आया यमराज का दूत लेने के लिए।

अब वो भी दुविधा में पड़ गया कि "एक ही को ले जाना है, यहां तो दो हैं। किसको ले जाऊं ?"

अब वो भी पड़ा हुआ है वहां, कुछ बोल नहीं रहा है। अपने पुतले की तरह ही वो भी चुपचाप है।

तब यमराज का दूत बोलता है, "हकीम जी! मान गये आपको। ऐसा पुतला बनाया है, ऐसा पुतला बनाया है कि हम भी अचंभे में पड़ गये! पर आप एक चीज भूल गये।"

अब हकीम से रहा नहीं गया। बोलता है, "क्या भूल गया ?"

यम का दूत बोलता है, "ये भूल गया! चुप रहना भूल गया। घमण्ड है तेरे को इतना कि तू चुप नहीं रह सका। तेरे को बोलना था। क्या भूल गया ? यही भूल गया कि तू घमण्ड के अधीन है। चल!" ले गया। यही मनुष्य के साथ होता है।

- प्रेम रावत

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