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‘आज’ में ही आनंद छिपा है 00:00:00 ‘आज’ में ही आनंद छिपा है Text श्री प्रेम रावत के शांति सन्देश पर आधारित एक लेख

प्रेम रावत:
काल करे सो आज करि, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब।।

कबीरदास की ये पक्तियां मानव प्रकृति की ओर इशारा करती हैं। क्योंकि मनुष्य की यह आदत है कि वह कुछ कार्यों को तो तुरन्त कर लेता है और कुछ को अगले दिन पर छोड़ देता है। प्रश्न यह है कि वह किस प्रकार के कार्यों को शीघ्र कर लेता है और किन्हें भविष्य के लिए छोड़ देता है। देखा यह गया है कि अधिकांशतः वही कार्य कल पर छोड़े जाते हैं जो बाहरी रूप से देखने पर इतने महत्वपूर्ण नहीं लगते। मनुष्य अपने दिन की सफलता का मूल्यांकन भौतिक उपलब्धियों के आधार पर करता है कि उसने क्या-क्या हासिल किया। परंतु क्या वह थोड़ी देर रुककर कभी यह भी सोचता है कि जिस जीवन को वह भौतिक सुखों को पाने की लालसा में दिन-रात लगा रहा है, वह जीवन उसे क्यों मिला है ? उसके जीवन का उद्देश्य क्या है ?

एक तरफ सारी दुनिया की जिम्मेदारियां हैं और एक तरफ है आपका जीवन! जो आपको दिया गया है जो आपके लिए है। यदि आप इस बात को स्वीकार करते हैं तो प्रश्न उठता है कि जो चीज आपको मिली है क्या उसे भी संभालने की कोशिश आज तक की गई या नहीं ? आज के दिन जो अनमोल चीज आपको मिली है, उसको संवारा या नहीं संवारा ?

जहां पानी की कमी नहीं होती वहां पानी को लोग बर्बाद भी करते हैं, पर जहां पानी नहीं होता है वहां उस पानी के नीचे भी एक डिब्बा रख देते हैं ताकि वह पानी खराब न हो। इसी तरह आपका स्वांस है। एक दिन आया था, जो कि पहला स्वांस था। एक दिन जायेगा, वह आखिरी स्वांस होगा और बीच में है आज का दिन! इसी आज के दिन को आप दुनिया के सभी कार्यों को संवारने में लगा देते हैं लेकिन जो अनमोल स्वांस मिला है, उस पर ध्यान नहीं जाता है। क्योंकि हम उसी दिन को बढ़िया समझते हैं कि जिसमें बिजनेस में वृद्धि हो, अच्छी नौकरी मिल जाए आदि। परंतु सबसे बढ़िया दिन तो वह होगा, जिस दिन आप कहेंगे, “आज के दिन मुझे यह जीवन मिला, मेरा स्वांस चल रहा है, मैं जीवित हूं। मेरे पास यह मौका है, मैं इसे खोना नहीं चाहता। आज के दिन मुझे वह बात समझ में आयी, जिसकी चर्चा सारे संत-महात्मा अपने जीवन भर करते आये हैं।”

समय के सद्गुरु की कृपा से हम इस स्वांस की कीमत को समझ सकते हैं। जिस दिन यह बात समझ जाएंगे, उस दिन से यह जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। उस दिन तुम भी अपना हृदय रूपी डिब्बा उस नल के नीचे रख दोगे। जो पानी व्यर्थ बह रहा था, वह बच जाएगा। जिंदगी संवर जाएगी। वह चीज मिल जाएगी जिससे हम अपने जीवन को पूरा कर सकें। हर दिन आभारी हृदय से, चैन और आनंद से कह सकेंगे, “हे बनाने वाले, तेरा लाख-लाख शुक्र है।” फिर यह कहेंगे कि आज का दिन ही मेरे जीवन का पहला दिन है। कल अगर फिर यह दिन आया तो मैं इसे बेकार नहीं जाने दूंगा। इसी तरीके से हमें हर दिन का स्वागत करना होगा। आने वाले कल के लिए नहीं, न गुजरे हुए कल के लिए, बल्कि आज के लिए और सदा के लिए! क्योंकि इस जीवन में जितने भी दिन आएंगे, वे सब ‘आज’ के रूप में ही आएंगे। कल, परसों, नितरसों करके नहीं आएंगे। 'आज' में ही आनंद छिपा है।

अभी हमारे पास समय है कि हम कल को संवारने के बजाय आज पर ध्यान दें। आज के दिन में अपने हृदय को शांति और आनंद से भर लें। कल आए न आये, मुझे परवाह नहीं है। यदि कल आएगा तो मैं उसका भी स्वागत आज की ही तरह करूंगा ताकि मेरे हृदय का प्याला दिन-प्रतिदिन भरता चला जाए और मेरा जीवन सफल हो।

कितनी दूर हैं आप खुद से 00:00:00 कितनी दूर हैं आप खुद से Text श्री प्रेम रावत जी के शांति सन्देश पर आधारित एक लेख

दो मुसाफिर जा रहे थे। उनमें से एक मुसाफिर चोर था। चोर ने मुसाफिर से पूछा कि “भाई, तुम कहां जा रहे हो ?’’

 

उस मुसाफिर ने कहा, “मैं धन कमाने के लिए विदेश गया था अब अपनी सारी कमाई लेकर अपने घर जा रहा हूँ।’’

 

चोर ने कहा “मैं भी वहीं जा रहा हूं, दोनों साथ रहेंगे तो ठीक रहेगा।’’ 

 

मुसाफिर ने कहा “अच्छा है भाई। एक से भले दो!’’

 

चलते-चलते रात हो गयी दोनों एक सराय में ठहरे। जैसे ही वह मुसाफिर खाना खाने नीचे गया, चोर ने उसके सामान की,बिस्तर की, खूब तलाशी ली परंतु उसे कुछ नहीं मिला ।

 

चोर सोचता रहा, “सारी जगह ढूंढ लिया धन कहीं नहीं मिला आखिर इसने धन छुपाया कहां ? कहीं यह झूठ तो नहीं बोल रहा।’’

 

अगली सुबह वे दोनों आगे की यात्रा पर निकल पड़े।

 

चोर ने मुसाफिर से पूछा, "क्या तुमने वाकई धन कमाया है।"

 

मुसाफिर बोला, "हां, बहुत सारा धन कमाया है। इतना कि अब मुझे काम करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।"

 

रास्ता लम्बा था, रात हो गई। इस बार भी उन्हें सराय में ठहरना पड़ा। वहां भी चोर ने सब जगह तलाशी ली। इस बार भी उसके हाथ कुछ नहीं लगा।

 

अगले दिन गांव पहुंचने के बाद उस चोर ने मुसाफिर से कहा, “अब तुम अपने घर पहुंच गए हो और सुरक्षित भी हो। मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ। दरअसल, मैंएक चोर हूं। जब तुम नीचे खाना खाने के लिए जाते थे तो मैं धन के लालच में तुम्हारे समान की तलाशी लेता था। दोनों रात मैंने तुम्हारे सामान की तलाशी ली किन्तु मुझे कुछ नहीं मिला। तुमने कुछ कमाया भी है या झूठ बोल रहे हो ?"

 

मुसाफिर बोला – "मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ।"

 

उसने चोर को अपना कमाया हुआ धन दिखाया और कहा, “तुमने हर जगह मेरे धन को ढूंढा, मेरे बक्से, मेरे बिस्तर, मेरे तकिये के नीचे ढूंढ़ा, किन्तु तुमने इसे अपने तकिये के नीचे नहीं ढूंढा।”

 

चोर ने हैरानी से पूछा, “अपने तकिये के नीचे!”

 

मुसाफिर बोला “तुमने इस धन को पाने के लिए हर जगह ढूंढा किन्तु वहां नहीं ढूँढा जहां यह था, तुम्हारे खुद अपने तकिये के नीचे। मुझे मालूम था तुम सब जगह ढूंढोगे परन्तु अपने तकिये के नीचे कभी नहीं ढूंढ़ोगे, इसलिए तुमसे नजर बचाकर इस धन को मैं तुम्हारे तकिये के नीचे रख देता था।”

 

चोर ने निराश होते हुए कहा, “काश! मैंने अपने तकिये के नीचे देखा होता।’’

 

ठीक उसी प्रकार वह परम सत्ता, वह ईश्वर हमारे अंदर मौजूद है, किन्तु लोग उसे खोजने के लिए इधर-उधर भटकते हैं, जो बाहर ढूंढने से नहीं मिलेगा। उसके लिए भटकने की जरूरत नहीं है।

कृतज्ञता का भाव 00:00:00 कृतज्ञता का भाव Text हमारी जिंदगी में वह समय कब आएगा, जब हम अपने हृदय का प्याला पूरी तरह से भर सकेंगे...

एक कहानी है, एक आदमी राजा के दरबार में नौकरी मांगने के लिये आया। राजा ने उसको नौकरी दे दी। वह राजा की खूब सेवा करता था। राजा को भी वह बहुत प्रिय था। राजा ने उसके काम और उसकी ईमानदारी को देखकर उसे अपने राज्य का सेनापति बना दिया। जिससे दरबार में सब उससे ईर्ष्या करने लगे और उसे सेनापति पद से हटाने की कोशिश में लग गए। लोगों ने उसकी जासूसी करनी शुरू कर दी ताकि उसे राजा के सामने नीचे दिखा सकें। लोगों ने देखा कि हर रोज सेनापति दरबार खत्म होने के बाद एक बहुत ही सुनसान जगह पर बनी एक कोठरी में जाकर दरवाजा बंद करके घंटों-घंटों बिताता था।

लोगों ने देखा तो उन्हें लगा कि यह बात राजा को बतानी चाहिए, फिर राजा इसे नौकरी से निकाल देंगे।

लोग राजा के पास गये। राजा से शिकायत की कि "महाराज, सेनापतिहर रोज दरबार खत्म होने के बाद एक सुनसान जगह पर कमरे में घंटों-घंटों बिताते हैं। पता नहीं वह क्या करते हैं ?"

राजा को धीरे-धीरे शक होने लगा कि कुछ गड़बड़ जरूर है!

एक दिन राजा उसके पीछे-पीछे गया और देखा कि सचमुच जब सेनापति दरबार से निकला तो वह उसी कमरे में गया और काफी घंटों के बाद कमरे से बाहर आया ।

दूसरे दिन राजा ने फिर उसका पीछा किया। इस बार जब वह कमरे में चला गया तो राजा ने दरवाजा खटखटाया। उसने दरवाजा खोला और राजा को वहां देख हैरान हो गया।

उसने कहा, "महाराज, आप यहां क्या कर रहे हैं ? यह जगह आपके लिए उचित नहीं है।"

राजा ने कहा, "मैं देखना चाहता हूं कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?"

राजा अंदर गया तो देखा कि एक बड़ा बक्सा कमरे के बीच में रखा हुआ है।

राजा को शक हुआ कि हो सकता है इसमें चोरी का सामान हो।

राजा ने कहा, "इस बक्से को खोलो!"

सेनापति ने कहा, "महाराज, इस बक्से में ऐसी कोई चीज नहीं है जो आपके देखने योग्य हो।"

अब राजा का शक और बढ़ गया। उसने गुस्से में कहा "इस बक्से को खोलो"।

सेनापति ने बक्सा खोल दिया।

बक्से में पुराने-मैले कपड़े देखकर राजा ने पूछा, "ये क्या है ?"

क्योंकि राजा ने सोचा था कि उस बक्से में सोने-चांदी की कोई चीज मिलेगी, लेकिन फटे-पुराने, मैले कपड़े उसमें रखे हुए थे।

तब सेनापति ने कहा, "महाराज, जब आपके दरबार से मैं आता हूं, मैं जानता हूं कि आपकी ही कृपा से जहां मैं हूं, मैं हूं। जो मैं आज हूं, वह आपकी की ही दया से हूं, आप ही की कृपा से हूं। जब मैं आपके दरबार में आया था तो इन कपड़ों को पहनकर आया था। मैं हर रोज इन कपड़ों को पहनता हूं और अपने को याद दिलाता हूं कि मैं कौन हूं। अगर आपकी दया न हो, आपकी कृपा न हो तो मेरा यही हाल होगा। क्योंकि मैं वाकई में यह हूं। जहां आपने पहुंचा दिया, मैं वहां नहीं हूं। वह तो आपकी दया है, आपकी कृपा है। आपकी कृपा और दया का मुझको हमेशा पात्र बने रहना है। इस बात को याद दिलाने के लिए मैं इस कमरे में आता हूं।"

सेनापति की बात सुनकर राजा की आँखों में ख़ुशी के आंसू आ गए और खुश होकर उन्होंने उसे अपने राज्य का मंत्री घोषित कर दिया।

समझने की बात है कि हम भी बिना ज्ञान के कहां थे ? कहां भटक रहे थे ? किस-किस बात को हमने सोच रखा था ? जो बातें दुनिया के लोगों ने हमको बतायीं, उन्हीं बातों को लेकर के हम बैठे हुए हैं।

हममें से कितने व्यक्ति हैं जो इस पर विचार करते हैं ? एक-एक दिन करके धीरे-धीरे सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो जाता है। क्या हम जीवित होने के महत्व को समझ पाते हैं ? क्या हमें मालूम है कि हमारी एक-एक स्वांस में अपार आनंद भरा हुआ है और हम उसे जीते-जी प्राप्त कर सकते हैं ? हमारी जिंदगी में वह समय कब आएगा, जब हम अपने हृदय का प्याला पूरी तरह से भर सकेंगे ? क्योंकि यह जीवन तो हर क्षण बीत रहा है।

- श्री प्रेम रावत 

असली जरूरत 00:00:00 असली जरूरत Text मेरी सारी जरूरतें तो कभी पूरी नहीं होंगी, परन्तु मैं अपने जीवन में अपनी असली जरू...

प्रेम रावत:

यह संसार जरूरतों के आधार पर चल रहा है। मनुष्य की साधारण जरूरतें हैं। भूख लगती है तो खाना चाहिए। प्यास लगती है तो पानी चाहिए। जब आदमी थक जाता है तो उसे विश्राम चाहिए। नींद आती है, सोने के लिए जगह चाहिए। इन जरूरतों के कारण संसार में कितना बिज़नेस होता है। मनुष्य ही इन जरूरतों को बनाता है। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए हम पैसा देते हैं।

हमारी प्रवृत्ति है कि हम जीवन में एक साथ सबकुछ पा लेना चाहते हैं और अपने विचारों के साथ दुनिया में आगे बढ़ते हैं। कई बार हम अपने विचारों से दुनिया की हर एक चीज को पकड़ना चाहते हैं, परन्तु कुछ चीजें ऐसी हैं कि उनका सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। एक साधारण उदाहरण है  — जैसे भोजन। भोजन क्यों आवश्यक है ? रसोई क्यों आवश्यक है ? क्योंकि मनुष्य को खाने की जरूरत है। अगर मनुष्य को भूख नहीं लगती तो वह क्यों खायेगा ? जब मनुष्य को भूख लगती है तो उसे वह महसूस होती है। जब उसके शरीर को उन पदार्थों की जरूरत पड़ती है, जिनसे उसके शरीर का संचालन हो तो उसके लिए बनाने वाले ने मनुष्य में भूख भी बनायी। मनुष्य को भूख लगती है तो भोजन चाहिए। भोजन मिल सके, इसलिए मनुष्य ने रसोई की रचना की, ताकि वहां खाना बन सके।

मनुष्य का संगठन बल है — सोसाइटी। वही बोझ डालती है कि तुम्हारी भी कुछ जरूरतें हैं। सब लोग जरूरतों को पूरा करने के लिए हर दिन कुछ न कुछ करते रहते हैं। वे जरूरतें, जो मनुष्य की निजी जरूरतें हैं, उन्हें पूरा करने के लिए मनुष्य कभी परेशान नहीं होता है। परन्तु वे जरूरतें, जो सोसाइटी ने, जो इस दुनिया ने हमारे ऊपर डाल रखी हैं, उनको पूरा करने के लिए मनुष्य जरूर परेशान होता है। परन्तु क्या कभी आपने सोचा है कि आपकी असली जरूरत क्या है ? लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगे हुए हैं, परन्तु यह कभी नहीं सोचते हैं कि "यह मेरा जीवन है, मैं जिंदा हूं, मेरे अंदर स्वांस आता है, मेरे अंदर स्वांस जाता है। परन्तु एक समय आएगा जब मैं जिंदा नहीं रहूंगा। मुझे नहीं मालूम कि वह समय कब आएगा, पर इतना जरूर मालूम है कि आएगा। और जबतक मैं जीवित हूं, मेरी असली जरूरत क्या है ? मेरी सारी जरूरतें तो कभी पूरी नहीं होंगी, परन्तु मैं अपने जीवन में अपनी असली जरूरत को तो पूरा करते जाऊं!"

इस संसार में सुनाने वालों की कमी नहीं है। सब सुनाते हैं, "खाली हाथ आये थे और खाली हाथ जाना है।" अगर ऐसा ही है तो फिर बनाने वाले ने हाथ ही क्यों दिए ? जब खाली हाथ आये थे और खाली हाथ जाना है, तो इन सबका का क्या फायदा ? इस शरीर का क्या फायदा ? सच्चाई क्या है ? एक समय था कि कुछ नहीं था और एक समय आएगा कि कुछ था, जो अब है और एक समय आएगा कि कुछ नहीं रहेगा। अपनी असली जरूरत को पूरा कीजिये और आपकी असली जरूरत क्या है, यह आप अपने हृदय से पूछिए, क्योंकि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता।

क्या हम स्वतंत्र हैं ? 00:00:00 क्या हम स्वतंत्र हैं ? Text जो हमने अपनी विचारों की दुनिया बनाई हुई है, क्या सचमुच में इससे निकलकर के हम ऐसी...

जहां घना जंगल होता है, वहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती है, क्योंकि पेड़ रोशनी को रोक लेते हैं और अंधेरा ही अंधेरा हो जाता है। हमारे विचार, हमारे ख्याल भी उसी वृक्ष की तरह हैं, जिसने सारी रोशनी रोकी हुई है। जब हम अपने विचारों या कल्पना के जंगल से बाहर निकलेंगे, तब रोशनी दिखाई देगी। जीवन-यात्रा में जो बोझ हमने अपने कंधों पर उठाया हुआ है, यह छोटा-मोटा बोझ नहीं है। जो हमने अपनी विचारों की दुनिया बनाई हुई है, क्या सचमुच में इससे निकलकर के हम ऐसी जगह आ सकते हैं जहां ज्ञान की रोशनी हो ?

अगर किसी पक्षी को छोटे पिंजरे से निकाल करके बड़े पिंजरे में डाल दिया जाए, तो क्या उस पक्षी को स्वतंत्रता मिल गयी ? जब तक हम अपने आपको जानेंगे नहीं, तब तक हम स्वतंत्र नहीं हो सकते। हम सब अपने आपको मानते हैं कि हम तो स्वतंत्र हैं! पर किस चीज से स्वतंत्र हैं ? स्वतंत्रता है कहां ? ऐसी स्वतंत्रता जो ख्यालों में नहीं हो, कल्पना में नहीं हो। क्योंकि 'परम स्वतंत्रता' की सचमुच कोई सीमा नहीं है। इस जीवन को सफल करने के लिए एक ऐसी स्वतंत्रता की जरूरत है, जो सबके हृदय में व्याप्त है। वह है असली स्वतंत्रता! ऐसी स्वतंत्रता, जिसे कोई छीन नहीं सकता है।

अज्ञानता ने आपका हाथ पकड़ा हुआ है। वह अज्ञानता ही आपको सताती है, वह अज्ञानता ही आपको अशांत करती है। क्या आप जानते हैं कि आपका असली स्वरूप क्या है ? यह चेहरा आपका असली स्वरूप नहीं है। उम्र के साथ यह चेहरा बदलता रहेगा। जो आँखें बचपन में अच्छा देख लेती थीं, वे देख नहीं सकेंगी। कानों के साथ भी यही होगा। जो अच्छा सुनाई देता था, वह भी धीरे-धीरे खत्म हो जायेगा। पर असली चीज क्या है ?

सबसे बड़ी अज्ञानता यह है कि आपके अंदर स्थित जो चीज है, आप उस तक नहीं पहुंच पाते हैं। हमारे अंदर जो तराजू का पलड़ा है, उसमें एक तरफ तो हृदय है, आनंद है और दूसरी तरफ सारी दुनिया है। एक तरफ सत्य है, दूसरी तरफ असत्य है; एक तरफ ज्ञान है , एक तरफ अज्ञान है; एक तरफ परम स्वतंत्रता है, दूसरी तरफ माया-मोह रूपी पिंजरा है। एक तरफ दुनिया की जगमगाहट है, चाहे वह कितनी ही नकली क्यों न हो, परंतु फिर भी मनुष्य को फंसा लेती है। तराजू के दूसरे पलड़े में है सिर्फ हृदय, जिसकी भाषा सब लोग नहीं समझते हैं। उसमें सिर्फ आनंद और वह कृपा महसूस होती है। यह हृदय आपका ही एक हिस्सा है। यह आपसे अलग नहीं है। जिस दिन इस हृदय की पुकार को सुनना शुरू करेंगे, उस दिन मालूम पड़ेगा कि स्वतंत्रता क्या होती है। तब जीवन में असली आनंद आएगा।

वह एक ऐसी स्वतंत्रता है कि उसे कोई छीन नहीं सकता है। वह एक ऐसी शांति है कि चाहे कितना भी भयानक युद्ध हो, उसे कोई भंग नहीं कर सकता है। चाहे कैसा भी संकट आये, एक ऐसी सच्चाई है कि कोई भी इस संसार के अंदर उस सत्य को झूठ नहीं बना सकता है। उस अच्छाई को समझ करके जियो। उस शांति का अनुभव करके जियो, चाहे कैसी भी परिस्थिति हो।

जीवन में असली स्वतंत्रता को पहचानिये। आपका हृदय रूपी पक्षी उड़ना चाहता है, उस अनंत आकाश में! पल दो पल के लिए नहीं, जीवन भर के लिए वह उस स्वतंत्रता को महसूस करना चाहता है, जहां चिंताएं नहीं, बल्कि सिर्फ आनंद ही आनंद हो! अगर आपने उसकी पुकार को अनसुना कर दिया तो यह जीवन भी सुना-सुना रहेगा। क्या हम विचार करते हैं कि यही मौका है, यही अवसर है ?

- प्रेम रावत

जीवन रूपी रेलगाड़ी का सफर 00:00:00 जीवन रूपी रेलगाड़ी का सफर Text आपने बड़े-बड़े प्लान बनाये हुए हैं, पर क्या इस जीवन रूपी रेलगाड़ी की यात्रा करने का...

प्रेम रावत:

यह जीवन रूपी रेलगाड़ी ऐसी अद्भुत रेलगाड़ी है जो कभी रुकती नहीं है। निरंतर चलती रहती है! इसमें यात्री चढ़ते-उतरते हैं, परंतु यह यात्रियों के लिए नहीं रुकती है। हर सेकंड लगभग चार यात्री इस रेलगाड़ी पर चढ़ते हैं और दो यात्री इससे उतरते हैं अर्थात इस संसार के अंदर हर सेकंड चार व्यक्तियों का जन्म होता है और दो व्यक्ति कूच करते हैं। यह रेलगाड़ी कहीं रुकती नहीं है, इसलिए एक बार जब इस रेलगाड़ी में चढ़ गए तो चढ़ गए और जब आप उतरेंगे तो उतर जायेंगे। आपकी मंजिल क्या है ? कहां पहुंचेगी यह रेलगाड़ी ? यह दिन-रात चलती रहती है, परंतु जाती कहीं नहीं है।

अद्भुत है यह रेलगाड़ी और इसमें यात्री बैठे हैं! कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है, कोई कुछ समझता है और कोई कुछ समझता है। सभी यात्रियों ने अपना सामान ऐसे बाँधा हुआ है, जैसे कहीं जायेंगे, पर जहां आपको जाना है, वहां आपको इन सब की जरूरत ही नहीं है।

हम सब इस जीवन रूपी रेलगाड़ी में बैठे हुए हैं और यह रेलगाड़ी लगातार चल रही है। क्या आपको नहीं लगता है कि आप रेलगाड़ी में बैठे हुए हैं ? क्या आपको नहीं लगता है कि आप चल रहे हैं ? इसका एक प्रमाण है। अपने स्वांस को देखिये, यह चल रहा है! यह स्वांस जो आ रहा है और जा रहा है, यह है इस जीवन की रेलगाड़ी। यह आपके सफर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है! इस स्वांस को व्यर्थ मत होने दीजिये। बनाने वाला यह स्वांस मुफ्त में देता है तो इसका यह मतलब नहीं है कि इस स्वांस की कोई कीमत नहीं है। अगर यह स्वांस मुफ्त में है तो इसलिए है कि कोई इसकी कीमत अदा नहीं कर सकता। संसार के अंदर कितना भी धन हो, कोई इस स्वांस को खरीद नहीं सकता। इस स्वांस का आना-जाना ही आपके ऊपर भगवान की कृपा है! यह है भगवान का चमत्कार, जो आपके ऊपर हर क्षण हो रहा है, परंतु आप इसे समझ नहीं पा रहे हैं।  आप कभी इधर देखते हैं, कभी उधर देखते हैं, पर अपने घट की तरफ नहीं देख रहे हैं।

जो स्वांस जा रहा है, वह वापिस कभी नहीं आएगा। क्या आपको मालूम है कि आज आपके कितने स्वांस निकल गए ? यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है। यही एक चीज है, जो भूलनी नहीं है।  अन्य सारी चीजें तो आप दे भी सकते हैं और ले भी सकते हैं, पर यह ऐसी चीज है जो न कोई आपको दे सकता है और न कोई आपसे ले सकता है। जो दे रहा है, वह दे रहा है। उसको स्वीकार कीजिये। अपने जीवन को सफल बनाइये, चाहे आपको कुछ भी करना पड़े। एक दिन इस स्वांस का आना-जाना बंद हो जायेगा, क्योंकि यह तो यात्रा है और चल रही है। इसका यही मौका है।  जिस दिन यह स्वांस चलना बंद हो जायेगा उस दिन आप भी खत्म हो जायेंगे। आपने बड़े-बड़े प्लान बनाये हुए हैं, पर क्या इस जीवन रूपी रेलगाड़ी की यात्रा करने का भी कोई प्लान बनाया है ?

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