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अपने आपको जानो (Apnay Aap Ko Jano) 00:00:00 अपने आपको जानो (Apnay Aap Ko Jano) Text असली नाता क्या है ? क्या चीज है वह, जिसके होने से सबकुछ है और जिसके अभाव में कुछ...

प्रेम रावत:

एक बार की बात है, एक किसान जंगल से गुजर रहा था तो अचानक उसे शेर का एक छोटा-सा बच्चा मिला। उसने इधर-उधर देखा तो उसे कोई भी दिखाई नहीं दिया। शेर का बच्चा भूख और प्यास के कारण अधमरा-सा हो गया था। उसकी यह दशा देखकर किसान को दया आ गई और वह उसे उठाकर अपने घर ले आया। उसको खिलाया-पिलाया और जब शेर का बच्चा तंदुरुस्त हो गया तो किसान ने सोचा कि इसे कहां रखा जाए। किसान ने काफी भेड़ें पाल रखी थी तो उसने उस शेर के बच्चे को भी इन्हीं भेड़ों के साथ रख दिया।

दूसरे दिन जब भेड़ें चरने के लिए बाहर निकलीं तो शेर का बच्चा भी उनके साथ बाहर निकला। इसी तरह सालों बीत गए और शेर का बच्चा उन भेड़ों के साथ ही चरता रहा, उन्हीं के साथ निकलता था और उन्हीं के साथ घर वापस आता था।

ऐसे ही एक दिन जब वह बच्चा भेड़ों के साथ चर रहा था, तो अचानक एक बड़ा शेर जंगल से आ गया और उसने एक भयभीत करनेवाली दहाड़ मारी। दहाड़ सुनकर छोटी भेड़ें कांप गई और झाड़ियों में छिपने लगीं। शेर का बच्चा, जो अब किशोर हो चुका था, वह भी भेड़ों की तरह डरकर छिपने लगा।

जब बड़े शेर ने देखा कि भेड़ों के साथ एक छोटा शेर भी छिपने की कोशिश कर रहा है, तो बड़ा शेर छोटे शेर के पास गया और उससे पूछा कि ‘‘तुम क्या कर रहे हो ?’’

छोटे शेर ने कहा कि ‘‘मैं छिपने की कोशिश कर रहा हूं।’’

शेर ने कहा कि ‘‘तुम क्या समझते हो, क्या मैं तुम्हें खा जाऊंगा ?’’

तो छोटे शेर ने कहा, ‘‘हां, आप मुझे खा जायेंगे!’’

शेर ने कहा, ‘‘नहीं, नहीं। तुम जानते नहीं हो कि तुम कौन हो।’’

छोटे शेर ने कहा, ‘‘हां, मैं नहीं जानता हूं कि मैं कौन हूं, परंतु यह जानता हूं कि तुम मुझे खा जाओगे, इसलिए मेरा छिपना बहुत जरूरी है।’’

शेर ने कहा, ‘‘नहीं, सच में तुम्हें पता नहीं है कि तुम कौन हो। तुम समझते हो कि तुम भी भेड़ हो, लेकिन तुम भेड़ नहीं हो। आओ, मेरे साथ आओ!’’

वह उसे तालाब के किनारे ले गया और कहा कि ‘‘देख, अपनी परछाईं को देख!’’

जब छोटे शेर ने अपनी परछाईं देखी तो कहा, ‘‘सचमुच में मैं उन भेड़ों की तरह नहीं हूं। मैं तो आपकी तरह हूं!’’ वह बड़े शेर के प्रति अपना आभार प्रकट करने लगा।

तो शेर ने कहा कि ‘‘क्यों! मैंने तो तुम्हें सिर्फ यह दिखाया है कि तुम असल में कौन हो! तुम भेड़ नहीं हो। ठीक है, तुम भेड़ों के साथ रहते थे, परंतु तुम भेड़ नहीं हो। तुम उनके साथ रहते-रहते समझने लगे थे कि तुम भेड़ हो!’’

समझो कि तुम्हारा असली स्वरूप क्या है ? तुम कौन हो ? अभी तक तो तुमने नातों को समझा है कि ‘‘मैं किसी का बेटा हूं, मैं किसी का चाचा हूं।’’ इन्हीं चीजों को समझा है। पर असली नाता क्या है ? क्या चीज है वह, जिसके होने से सबकुछ है और जिसके अभाव में कुछ भी नहीं है। जिसको हम पहचानने की कोशिश करते हैं, वह सब बाहर की तरफ है। परंतु हमारे अंदर जो स्थित है, क्या हमने उसको भी पहचानने की कोशिश की है कि हमारा असली स्वरूप क्या है ? जिस पल हम यह पहचान जाएंगे कि हमारा असली स्वरूप क्या है, तो हमारे बहुत सारे भ्रम मिट जाएंगे।

असली आनंद की प्यास आपके अंदर है 00:00:00 असली आनंद की प्यास आपके अंदर है Text आनंद की प्यास मनुष्य के अंदर स्वाभाविक रूप से है। यह आपका स्वभाव है। इसको आप बदल...

प्रेम रावत:
प्रत्येक मनुष्य के जीवन में तीन बातें हैं – एक तो जन्म हुआ, एक जीवन है और एक अंत होगा। एक हो गया। इसीलिए तो यहां हैं। अगर जन्म ही नहीं हुआ होता तो संसार में आते कैसे ? एक हो गया है, एक हो रहा है, एक होने के लिए बाकी है। एक और जरूरी बात है – क्या आप जानते हैं कि आप में क्या है ? क्या आप समझते हैं कि आप के ऊपर किस प्रकार से बनाने वाले ने कृपा की है ? अथाह! जिसका कोई अंत नहीं है, अथाह! अथाह! कृपा से आपको यह मनुष्य शरीर मिला है।

हम बात करते हैं मनुष्य शरीर की, हम बात करते हैं जीवित, जीते-जागते मनुष्यों की...आज की बात कर रहा हूं मैं, क्योंकि ये स्वांस आया, आज आया, कल आएगा। अगर ये कृपा रही – जिस कृपा के कारण ये स्वांस आज आया तो कल भी आयेगा। पर मुझको मालूम नहीं, क्या बढ़िया प्रकृति बनाई है कि धन तो दे दिया, पर कितना है, ये नहीं मालूम और खर्च करोगे। चाहे तुम चाहो या न चाहो, खर्च तो ये होगा। परंतु किस चीज पर खर्च करना है, ये तुम्हारे ऊपर निर्भर है। यह समझने की बात है।

सबसे बड़ी बात एक यह है कि क्या आप अपने जीवन में इस चीज को स्वीकार करते हैं कि आपके अंदर ही परमानन्द है। परम आनन्द आपके अंदर है।

दूसरी बात, इसको जानने की प्यास आपको कैसे लगी ? इसके बारे में भी आप समझिए। यह आपकी करनी नहीं है। ये स्वांस, इस आनंद की प्यास मनुष्य के अंदर स्वाभाविक रूप से है। यह आपका स्वभाव है। इसको आप बदल नहीं सकते। जब आप खुश होते हैं तो मुस्कुराते हैं। इसको आप बदल नहीं सकते। जब आपको दुःख होता है तो रोते हैं। इसको आप बदल नहीं सकते। कोशिश करते हैं लोग। यह आपका स्वभाव है कि जब आप सुंदर चीज के दर्शन करते हैं तो आपको आनंद मिलता है। यह आपका स्वभाव है। इसको सीखने की जरूरत नहीं पड़ती। यह सिखाने की जरूरत नहीं है। सीखने की जरूरत नहीं है। इसके लिए स्कूल जाने की जरूरत नहीं है, यह आपका स्वभाव है।

तो आपका स्वभाव क्या है ? आपका स्वभाव है आनंद से, परमानंद से प्रेम करना। आपका स्वभाव है शांति में रहना। एक शांति वह है, जो परिस्थितियों पर निर्भर है। जब बाहर सबकुछ ठीक होगा, तब वह शांति महसूस होगी। पर एक शांति वह है कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, मनुष्य अपने अंदर उस शांति का अनुभव कर सकता है। उस शांति में ही आनंद है और उस आनंद में है वह शांति!

वास्तव में आपका स्वभाव है, अपने जीवन को सफल बनाना। चाहे आप न भी बनाना चाहें, फिर भी आपका स्वभाव है। इसको आप बदल नहीं सकते। तो मैं अपने स्वभाव को समझूं। अपनी प्यास को समझूं। बिना प्यास के पानी की कोई कीमत नहीं है। जहां प्यास लगी, पानी की कीमत अपने आप पता चल जाती है। प्रश्न यह है कि क्या आपको उस शांति की, उस परमानंद की प्यास है या नहीं ? अगर है और आप अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो मैं आपकी मदद कर सकता हूं।

सफलता के मायने (Safalta kay Mainay) 00:00:00 सफलता के मायने (Safalta kay Mainay) Text इस दुनिया में कोई भी चीज निरर्थक नहीं है। यह जीवन अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण है।

कहानी

एक बार एक राजा ने अपने माली को बुलाया और कहा, "इस पहाड़ी पर जो हमारा महल है, यहां एक बहुत सुंदर बगीचा होना चाहिए।"

माली ने कहा, "जी हजूर!"

वह बगीचे की तैयारी में लग गया। पानी पहाड़ी के नीचे था, नीचे नदी थी। माली दो बड़े-बड़े मटकों को लेकर हर रोज नीचे जाता था, पानी से भरता था, फिर धीरे-धीरे करके वह ऊपर पहुँचता था और अपने बगीचे में पानी देता था।

काफी दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन जो पीछे वाला मटका था, उसमें किसी चीज से ठोकर लगने के कारण या अन्य किसी कारण छेद हो गया। वह माली पहाड़ी के नीचे जाए, दोनों मटकों को पानी से भरे और जबतक वह ऊपर तक आये तो आगे वाले मटके में तो पूरा पानी भरा रहता था, परन्तु पीछे वाला मटका खाली हो जाता था। यह सिर्फ कहानी है।

एक दिन आगे वाले मटके ने पीछे वाले मटके से कहा, "तू तो किसी काम का नहीं है। तुझ में तो छेद हो गया है। तू किसी काम का नहीं रहा। देख! मेरी वजह से राजा का बगीचा इतना हरा-भरा रहता है, क्योंकि मैं ही यहां तक पानी लाता हूं। जबतक तू यहाँ पहुँचता है, तुझ में तो एक बूंद भी पानी नहीं बचता है। अब तू किसी काम का नहीं है।"

पीछे वाले मटके ने जब यह सुना कि वह किसी काम का नहीं है तो बड़ा उदास हुआ। दूसरे दिन माली आया, उसने दोनों मटकों को देखा तो उसने देखा कि पीछे वाला मटका बड़ा उदास है। उसने मटके से पूछा, "क्या बात है ? तू उदास क्यों है ?"

तब उस मटके ने कहा, "आगे वाले मटके ने मुझसे कहा है कि मैं किसी काम का नहीं हूं। जब सवेरे-सवेरे पानी लेने के लिए आप जाते हैं, फिर जबतक आप बाग में पहुंचते हैं तो आगे वाले मटके में तो पानी रहता है, परन्तु मेरे अंदर छेद होने की वजह से एक बूंद भी पानी नहीं बचता है। इस आगे वाले मटके का यह कहना है कि जो बाग हरा- भरा है, वह उसकी वजह से है, मेरी वजह से नहीं है।"

माली ने हँसते हुए कहा, "तू जानता नहीं है। तेरे भीतर छेद होने के बावजूद भी मैंने तुझे फेंका नहीं है। मैं तुझे हर रोज नीचे ले जाता हूं, तेरे अंदर पानी भरता हूं और तुझे ऊपर तक लाता हूं। हाँ, यह सही बात है कि इस बाग में जो कुछ भी हरियाली है, हरा-भरा है, वह इस आगे वाले मटके की वजह से है, परन्तु क्या तुमने देखा नहीं कि उस नदी से लेकर ऊपर इस बाग तक जो फूल उग रहे हैं, वे सब तुम्हारी वजह से उग रहे हैं ? उन सबको तेरी वजह से पानी मिलता है। यह तो एक ही बाग है, पर तेरी वजह से वह सारा का सारा रास्ता — उस नदी से लेकर इस बाग तक हरा-भरा है, क्योंकि उनको तुझसे पानी मिलता है।"

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मेरे संदेश का मकसद इस बात से है कि आपको यह मनुष्य शरीर मिला है और आप इसका महत्त्व समझें, जानें। क्योंकि अन्य सारी चीजें तो इस संसार के अंदर बदलती रहेंगी। आज आप हैं। एक दिन ऐसा भी आएगा कि आप इस संसार में नहीं रहेंगे। यह नियम संसार का हमेशा रहा है। परन्तु सबसे बड़ी बात है कि जबतक हम जीवित हैं, जीवन होने की वजह से हमारे जीवन में अनंत सम्भावनाएं हैं।

- श्री प्रेम रावत

आज का दिन (Aaj ka Din) 00:00:00 आज का दिन (Aaj ka Din) Text आज का दिन कैसे बीतना चाहिए ? हम इस दिन में क्या-क्या हासिल कर सकते हैं ?

कितना सुंदर यह आज का दिन है! आज के दिन तो यह स्वांस भी है, यह जीवन भी है, यह हृदय भी है! मैं आज के दिन की बात कर रहा हूँ। मैं जीवन की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं आज के दिन की बात कर रहा हूँ, क्योंकि वे सब 'आज' करके ही आयेंगे। कल, परसों, नरसों करके नहीं आएंगे, 'आज' करके आएंगे, ‘आज' बनेंगे।

जिस दिन हर्ष हो, खुशी हो, हृदय में तसल्ली हो, आशा हो, वह दिन सचमुच में धन्य है। उस दिन हृदय में आनंद है, आशा है, खुशी है, मौके हैं, हम सब उन मौकों का पूरा-पूरा फायदा उठा सकते हैं। अगर यह बात है तो आज का दिन धन्य हो गया।

आज का दिन कैसे बीतना चाहिए ? हम इस दिन में क्या-क्या हासिल कर सकते हैं ? कैसे इस दिन को सफल कर सकते हैं ? क्या इन चीज़ों का हमको ज्ञान है ? अगर नहीं है तो यह बड़ी खतरनाक बात हो गयी है! आप बस में जा रहे हैं और कोई ऐसा आदमी, जिसको बस चलानी नहीं आती है, परन्तु वह बस चला रहा है और बस खूब तेज चल रही है। अगर आपको कहीं पता लग गया कि ड्राइवर को बस चलाना नहीं मालूम है तो क्या आपको डर नहीं लगेगा ? अगर 'आज का दिन' एक बस है और आप स्टीयरिंग व्हील के पीछे बैठे हैं तो मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आपको इस 'आज रूपी बस' को चलाने का ज्ञान है ?

आपके जीवन में जितने भी दिन आएंगे, वे सब 'आज' करके आयेंगे। कितना सरल कर दिया है, जैसे स्वांस लेना! आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है। अपने आप आयेगा, अपने आप जायेगा। आपके लिए उस हर एक स्वांस के आने-जाने में क्या छिपा है? आपके लिए हर एक 'आज' के आने-जाने में, हर एक स्वांस में छिपी है — सच्ची शांति!

यह जो मौका मिला है, इसको अपनाइये। यह जो स्वांस मिला है, इसको अपनाइये। आप उस शांति की जगह में जाइये और एक-एक स्वांस में लीन हो जाइये। शांति का अनुभव करके अपने जीवन को सफल बनाइये। जब आप अपने हृदय को शांति से भर लेंगे तो यह दिन कहीं नहीं जा सकता। आज के दिन को सफल कीजिये। यह जो हर एक स्वांस का उपहार मिल रहा है, हर एक स्वांस के अंदर जो शांति छिपी है, इसको स्वीकार कीजिये।

- श्री प्रेम रावत

जीवन में शांति संभव है या नहीं? (Jeevan Mein Shanti Sambhav Hai Ya Nahi) 00:00:00 जीवन में शांति संभव है या नहीं? (Jeevan Mein Shanti Sambhav Hai Ya Nahi) Text यह अनुभव की बात है

आज इस दुनिया के अंदर जहाँ भी देखो, हर एक चीज़ में मनुष्य ने दीवार डाल दी — "तुम गोरे हो, तुम काले हो। तुम स्त्री हो, तुम पुरुष हो। तुम बच्चे हो, तुम बूढ़े हो। तुम पढ़े-लिखे हो, तुम अनपढ़ हो।" परन्तु असलियत में कोई अंतर नहीं है। हम सब एक ही हैं। एक ही चीज़ से जीवित हैं। यह स्वांस आती है, जाती है। चाहे बूढ़े हैं या जवान हैं, चाहे पढ़े-लिखे हैं, चाहे अनपढ़ हैं, चाहे अमीर हैं, चाहे गरीब हैं। वही स्वांस सबके अंदर आ रही है, जा रही है।

सबके पास हृदय है और वह हृदय एक ही चीज़ की पुकार कर रहा है कि "इस जीवन के अंदर शांति होनी चाहिए। किसी तरीके से यह जीवन सफल हो। मैं अपने जीवन में असली शांति का अनुभव कर सकूं।"

दुनिया के अंदर सभी की यही ख़्वाहिश है। जब तक उस चीज़ का अनुभव नहीं हो जाता, तब तक सारी कहानी अधूरी है। इसका निर्णय कौन लेगा कि जीवन में शांति संभव है या नहीं ? यह अनुभव की बात है। आपको ही अपने जीवन में निर्णय करना है कि आपको शांति हो गई है या नहीं हुई है, आपके जीवन में शांति है या नहीं है। इसके बारे में कोई दूसरा व्यक्ति निर्णय नहीं ले सकता है।

लोग भूल जाते हैं कि हमारे हृदय की ख्वाहिश क्या है? वह चीज़ जो आपके चेहरे पर आज मुस्कान लाती है, वह चीज़, जो आपको हर दिन प्रेरित करती है कि आप अपना जीवन सफल करो, उस चीज़ को पहचानो। उस चीज़ को अपने जीवन में आने दो। उस शांति को अपने जीवन में आने दो। जब तक नहीं आने देंगे, तब तक आप क्या हैं और आपकी सम्भावना क्या हैं, आपको पता नहीं लगेगा। आप नहीं जान सकेंगे कि "आप क्या हैं?" जिस शक्ति ने सारे संसार की रचना की है, आपको उसी शक्ति ने बनाया है।

लोग समझते हैं कि "शांति पाने के लिये सबकुछ छोड़ना पड़ेगा" — नहीं, ऐसी बात नहीं है। इस दुनिया के अंदर रह करके, इस समाज के अंदर रह करके आप शांति का अनुभव कर सकते हैं — ऐसी है "शांति!" क्योंकि वह आपकी निजी बात है। आपके अंदर की बात है। अगर कहीं से अँधेरा निकालना है, तो वहां ज्योति की जरूरत है, प्रकाश की जरूरत है। आपको अपने जीवन के अंदर जो कुछ भी करना है, कीजिये, परन्तु एक काम और कीजिये — अपने अंदर की प्यास को भी जरूर बुझाइये। किसी चीज़ को छोड़ने की जरूरत नहीं है, त्यागने की जरूरत नहीं है। आप जो भी हैं, आप धन्य हैं, क्योंकि आप जीवित हैं।

- प्रेम रावत

क्या है हमारी असली चाहत (Kya Hai Hamari Asli Chahat) 00:00:00 क्या है हमारी असली चाहत (Kya Hai Hamari Asli Chahat) Text श्री प्रेम रावत के संदेश पर आधारित एक लेख

इस संसार के अंदर जो कुछ भी मनुष्य करता है, वह अपने सुख-शांति के लिए करता है। उसकी धारणाएं हैं कि अगर मैं यह हासिल कर लूंगा या अगर मुझको यह मिल जायेगा तो इससे मेरे जीवन में सुख मिल जायेगा, जीवन में शांति हो जाएगी। सारी दुनिया के लोग इसी चक्कर में इधर-उधर भाग रहे हैं — कोई पुत्र के पीछे भागता है, कोई अपने बिज़नेस के पीछे भागता है। कोई किसी चीज़ के पीछे भागता है, कोई किसी चीज़ के पीछे भागता है।

एक तो यह बात जानना जरूरी है कि अगर मनुष्य जो कुछ भी कर रहा है, वह अपने सुख-शांति के लिए कर रहा है, तो उसके अंदर सुख-शांति की जो चाहत है, जो इच्छा है वह कहाँ से आयी? वह इच्छा किसने पैदा की? यह चीज़ हमने अपनी ज़िन्दगी में सीखी है या स्वाभाविक है? कुछ चीज़ें स्वाभाविक होती हैं और कुछ चीज़ें सीखी हुई होती हैं। कई चीज़ों को सीखने के लिए हमें स्कूलों, महाविद्यालयों, बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों में जाना पड़ता है। वहां सीखने के बाद हमारी इच्छाएं, कामनाएं, आकांक्षाएं उत्पन्न होती हैं। कई बड़े-बड़े विज्ञापन और पोस्टर देखते हैं, हमको दोस्तों ने कुछ बताया, हमको मित्रों ने बताया, तो हमने सीख लिया, हमारी इच्छाएं उत्पन्न हो गईं । परन्तु कुछ ऐसी इच्छाएं होती हैं, जिन्हें हमें सीखना नहीं पड़ता, बल्कि स्वाभाविक होती हैं। जैसे भूख का लगना स्वाभाविक है। इसके लिए हमको कहीं जाकर सीखना नहीं पड़ता। जब खाने की जरूरत पड़ती है, तो यह शरीर हमें बताता है कि — "खाना खा लो!"

प्रकृति ने पहले से ही ऐसा प्रबंध कर दिया है क्योंकि उसको मालूम था कि हो सकता है, आदमी काम में इतना फंस जाये कि उसे अपने शरीर का भी ख्याल न रहे। इसलिए उसने भूख बना दी। जब भूख लगती है तो खाने की इच्छा पैदा होती है और आदमी खाने को ढूंढ़ता है। यह स्वाभाविक चीज़ है। इसको सीखना नहीं पड़ता। जब प्यास लगती है तो आदमी पानी पीता है। क्या असली सुख-शांति की चाहत स्वाभाविक है या सीखी हुई है? यह स्वाभाविक प्यास है। यह अंदर की प्यास है। बाहरी समस्याओं का हल बाहर मिलता है। उसी प्रकार अंदर की चाहत, हृदय की प्यास, असली सुख-शांति को पाने की प्यास का हल आपको अपने अंदर ही मिलेगा, बाहर नहीं।

जिस प्रकार अगर हमको पानी की जरूरत है, पानी की प्यास है तो हम पानी को उस चीज़ में ढूंढेंगे, वहां ढूंढेंगे, जहां पानी का स्रोत है — जैसे नलका, कुआँ, नदी या झरना हो। उसी प्रकार यह समझना जरूरी है कि जिस चीज़ को हम ढूंढ रहे हैं, जिस सुख को हम अपनी ज़िन्दगी के अंदर चाहते हैं, वह कहाँ है? वह चीज़, वह सुख हमारे अंदर है। परन्तु उसको हम ढूंढ कहाँ रहे हैं? उसे हम बाहर ढूंढ रहे हैं।

हम सोचते हैं कि अगर हमारी तरक्की हो जाएगी, तो हमको सुख-शांति मिल जाएगी। परन्तु यह वह सुख नहीं है, जिसकी हमारे हृदय को तलाश है। वह सुख अलग है। अगर हम यही कहते रहेंगे कि मुझको पारिवारिक सुख मिल जायेगा तो मेरे हृदय में तसल्ली हो जाएगी — यह बात गलत है। बाहरी सारे सुखों के बावजूद भी एक ऐसा सुख है, जिसको जाने और समझे बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है! आतंरिक सुख की चाहत का बीज बनाने वाले ने आपके हृदय में डाला है कि खोजो, ढूंढो, पता करो, जानो और पहचानो कि असली सुख और शांति कहाँ है?

शांति की जरूरत हृदय को हर दिन है, हर क्षण है। लोग शांति की बात करते हैं, कहते हैं, "विश्व में शांति होनी चाहिए।" हम कहते हैं कि विश्व में शांति नहीं आपके हृदय के अंदर शांति होनी चाहिए। विश्व में है कौन? मनुष्य ही तो हैं।

- श्री प्रेम रावत के संदेश पर आधारित एक लेख

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