लॉकडाउन 11

प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (3 अप्रैल, 2020)
Apr 04, 2020
"जिस सुंदरता को तुम ढूंढ रहे हो, वह सुंदरता तुम्हारे अंदर है, पर तुमने जो मास्क पहन रखा है इसको जबतक निकालोगे नहीं, तब तक तुमको सुंदरता नहीं दिखाई देगी। मास्क को निकालो और तुमको वह असली सुंदरता दिखाई देगी।" (3 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोतागणों को मेरा नमस्कार!

आज मैं जिस बात की चर्चा करने जा रहा हूं वह बात आपके अंदर है, क्योंकि बात है जानने की और समझने की। दिन बीत रहे हैं इस लॉकडाउन में, महामारी लगी हुई है। कुछ लोग इस बात को समझते हैं कि अगर हम आइसोलेटेड रहें तो सबका भला है। कुछ लोग इस बात को नहीं समझ रहे हैं। लोगों में अजीब-अजीब धारणाएं हैं — जैसे, मतलब ये सारी चीजें लोगों में हमेशा ही रहती हैं।

परन्तु समझने की बात यह है कि आपके जीवन के अंदर, आपका जो यह समय है — यह समय लॉकडाउन का नहीं, पर जो समय है, आप पैदा हुए, आपको एक दिन जाना है, तो यह जो समय है इसमें आप कर क्या रहे हैं ? क्या हो रहा है इस समय में ? इसकी कहानी क्या है ? इसके एक्टर कौन-कौन हैं ? इसमें कौन-कौन लगा हुआ है ? इसका तुक क्या है ? इसका मतलब क्या है ?

क्योंकि एक प्रश्न है और वह प्रश्न यह है कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ? अब यह सभी लोग पूछते हैं। कुछ लोग हैं जो पूछते हैं और कुछ लोग हैं जिन्होंने अभी पूछा नहीं है, पर पूछेंगे आगे क्योंकि यह प्रश्न कभी न कभी तो आएगा कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ? मैं यहां कर क्या रहा हूँ ? तो क्या कर रहे हैं आप ? आपके जीवन का उद्देश्य है क्या ? क्या आप अपने आप को समझना चाहते हैं ? क्या आप अपने आपको जानना चाहते हैं ?

क्योंकि जबतक आप अपने आप को जानेंगे नहीं, तबतक आप यह नहीं जान पाएंगे कि जिन चीजों की आपको तलाश है, जिन चीजों को आप चाहते हैं वह पहले से ही आपके अंदर है। अब शांति की लोग खोज करते हैं। कोई कहीं जा रहा है, कोई कहीं जा रहा है, कोई कहीं जा रहा है। अरे! जो चीज तुम्हारे अंदर पहले से ही है, तुम उसको खोज क्यों रहे हो ?

कई लोग मेरे से, मेरे पास — जब मैं 13 साल का था, 14 साल का था, जब मैं विदेश आया। 13 साल का था मैं उस समय, तो लोग हमारे पास आते थे पूछते थे और यह पूछते थे कि "जी! हम खोज रहे हैं कब मिलेगा ?"

तो मैं उनसे कहता था — "जब तुम खोजना बंद कर दोगे तब मिलेगा।"

अब उस समय यह बात लोगों की समझ में आए ना आए मेरे को नहीं मालूम। अब मेरे ख्याल से कई लोगों के यह समझ में नहीं आती थी। अब मैं यही समझाता था लोगों को कि "तुम किस चीज को खोज रहे हो!" तुम्हारी धारणाएं बनी हुई हैं उसको तुम खोज रहे हो। अब जैसे, इसका मतलब क्या हुआ कि कई बार छोटे बच्चे हैं, तो बच्चे हैं तो कभी उनको मस्ती चढ़ती है तो वह किसी को डराना चाहते हैं तो मास्क ले आते हैं। तो मास्क पहना और अब भूत लगने लगे या जानवर लगने लगे या भयानक लगने लगे। तो किसी के पास चले गए और वा.. आ..... करके किया। तो लोग डरते हैं — "क्या है, कौन आ गया, क्या हो गया।"

और उसके बाद वो फिर हंसते हुए उस मास्क को निकालते हैं और उसके पीछे कौन है वह दिखाई देता है, तो सब ठीक है! यह है, यह — इसको मैं जानता हूं यह ठीक है, यह भूत नहीं है, यह जानवर नहीं है, — ठीक है! तो उसी तरीके से हमारे साथ भी यह बात है। हमने भी एक मास्क पहन रखा है — अपने जीवन में हमने भी एक मास्क पहन रखा है कि "मैं यह हूँ!" मेरा, मेरे जीवन का उद्देश्य यह है; मेरे जीवन का मतलब यह है — और यह सारी चीजें हमारे पास रहती हैं। और इस मास्क को लेकर के हम सारे संसार को इंप्रेस करना चाहते हैं, डराना नहीं चाहते हैं, इंप्रेस करना चाहते हैं — "मैं यह हूं; मैं वह हूं; मैंने ऐसा कर दिया; मैंने वैसा कर दिया; मैंने यह हासिल कर लिया; मैंने वह हासिल कर लिया; यह सफलता मिली मेरे को; यह सफलता मिली मेरे को — सारी चीजें। मास्क पहना हुआ है।

और एक समय आता है, जब मनुष्य अपने आपको देखने लगता है तो वह कहने लगता है, "क्या मैं सचमुच में यह हूँ ?"

क्योंकि उसकी आँखें उस मास्क से देख रही हैं। और आईने में जो उसको दिखाई दे रहा है — वह अपने आपको नहीं जानता है। वह आपने आपको नहीं देख रहा है, वह मास्क को देख रहा है। और मास्क को देखते हुए कहता है "आहाह ! मेरा चेहरा ऐसा है, मेरा चेहरा ऐसा है, मेरा चेहरा ऐसा है, मेरा चेहरा ऐसा है। परन्तु मास्क को निकाल करके देखिए आईने में और आपको अपना असली चेहरा दिखाई देगा।

संत-महात्मा क्या कहते हैं कि — जब तुम यह करोगे, इस मास्क को निकलोगे — वह मास्क की बात नहीं करते हैं, वह अपने आपको जानने की बात करते हैं —

मृग नाभि कुण्डल बसे, मृग ढूंढ़े बन माहिं।

ऐसे घट घट ब्रह्म हैं, दुनिया जानत नाहिं।।

जिस चीज की — तुम सुंदरता को ढूंढ रहे हो, पर सुंदरता तुम्हारे अंदर है, पर तुमने जो मास्क पहन रखा है इसको जबतक निकालोगे नहीं, तब तक तुमको सुंदरता नहीं दिखाई देगी। पर मास्क को निकालो और तुमको वह सुंदरता, असली सुंदरता क्या है वह दिखाई देगी। तो बात यही हो जाती है कि क्या सचमुच में हमने वह मास्क पहन रखा है ? कोई दानी है; कोई मां है; कोई भाई है; कोई बहन है; कोई यह है; कोई वह है; और सबने एक-एक मास्क पहन रखा — और परिवार के लोग भी, परिवार के सदस्य जो एक-दूसरे को अच्छी तरीके से जानते हैं। परन्तु कई बार वह भी उस व्यक्ति तक पहुंच नहीं सकते हैं। किसी ने कुछ किया तो किसी को गुस्सा आ गया। अब गुस्से को लेकर के — "इसने यह कर दिया मेरे साथ, ये अच्छा नहीं किया, ये अच्छा नहीं किया — क्लेश जो होता है अंदर से, क्लेश आ रहा है उनके। उसने ये अच्छा नहीं किया, उसने ये कर दिया, उसने ये कर दिया, उसने ये कर दिया।“

पर जानने की बात यह है, पहचानने की बात यह है कि "तुम अपने अंदर उस क्लेश को चाहते हो या नहीं ?" अगर उस क्लेश को नहीं चाहते हो, मैं दूसरे की बात नहीं कर रहा हूं मैं यह नहीं कह रहा हूं कि "उसको तुमने माफ कर दिया या नहीं कर दिया!" नहीं! वह बात तो बाद में आएगी। पर सबसे पहले बात यह है कि क्या तुम अपने अंदर जो तुम कड़वापन, जो जहर तुम अपने अंदर लिए फिर रहे हो यह तुमको चाहिए या नहीं ? इससे तुमको छुटकारा कैसे मिलेगा ? तो पहले अपने आप को तो देखो तुम हो कौन ? तुम अपने आपको तो समझो तुम हो कौन ? क्योंकि जब सारे ही परिवार के सदस्य एक जगह बैठे हुए हैं, एक घर में बैठे हुए हैं तो सबको यह है कि "मैं इसको जानता हूं; यह मेरे को जानता है या मैं उसको जानता हूं; मैं उसको जानता हूं; मैं उसको जानता हूं; मैं उसको जानता हूं। पर तुम जिस चीज को जानते हो वह तो सिर्फ एक मास्क है। तुम असली चीज को नहीं जानते हो ? असली कौन है ? कैसा है ? किसको प्यार चाहिए ? किसको आनंद की जरूरत है ? किसको शांति की जरूरत है ? किसको करुणा की जरूरत है — दो शब्द, दो शब्द मीठे; दो शब्द, दो शब्द मीठे — अगर बोल दो, दूसरा अगला पिघलने के लिए तैयार है।

यह बात समझने की है। तो यह जो मास्क पहना हुआ है, इसको कब निकालोगे ? इसको कब छोड़ोगे ? कब इसको अलग रखोगे ? कब तुम समझोगे कि तुम्हारा जीवन, जो तुमको मिला हुआ है इसको अब स्वीकार करने की जरूरत है। यह नहीं कि यह जीवन मिला हुआ है — मैं यह कर लूंगा, मैं वहां चला जाऊंगा, अब यह हो जाएगा, वह जाएगा यह सारी चीजें नहीं बल्कि इसको स्वीकार करने की जरूरत है।

मैं अपने जीवन में उस चीज को चाहता हूं जिस चीज को चाहने से, जिस चीज को पाने से, जिस चीज के मिलने से, मेरा जीवन सफल हो। और वह चीज कहां मिलेगी मेरे को ? वह चीज मेरे को मिलेगी — मेरे ही अंदर, अपने ही अंदर। इससे ज्यादा खुशखबरी क्या हो सकती है ? संभव ही नहीं है।

बात है आनंद की, बात है इस संसार के अंदर असली आनंद लेने की। क्योंकि मैं बात करता हूं कई बार कि आपकी लॉटरी निकली और एक शॉपिंग सेंटर के अंदर आपको भेज दिया गया और उस शॉपिंग सेंटर के अंदर हर एक प्रकार की दुकान है और आप उसमें जा सकते हैं और किसी भी चीज, कोई भी चीज उसको आप ले सकते हैं। बस शर्त यह है कि जब आप उस शॉपिंग सेंटर से बाहर निकलें, आप अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकते हैं तो अब क्या ले जायेंगे ? क्या आप की स्ट्रैटेजी है?

कुछ लोग हैं जो यह कह सकते हैं कि — "मैं तो जाऊंगा ही नहीं जब मैं कुछ ले ही नहीं जा सकता अपने साथ। तो मैं तो उस शॉपिंग सेंटर में जाऊंगा ही नहीं” — ऐसे भी लोग हैं। कुछ लोग हैं — "यह कैसी लॉटरी निकली है ? इसका तुक क्या हुआ ? जब हम वह चीजें पकड़ ही नहीं सकते हैं, उनको ला ही नहीं सकते हैं अपने साथ, तो फिर यह कैसी लॉटरी निकली"— ऐसे भी लोग हैं। और कुछ लोग हैं — जिनकी स्ट्रैटेजी, जिनका लक्ष्य यह है कि मैं जाऊंगा और हर एक चीज का आनंद लूंगा। मैं अपने साथ कोई चीज ला नहीं सकता हूं, पर मैं आनंद को अपने साथ ला सकता हूँ। वह कोई चीज नहीं है। यह सबसे बड़ी बात है कि मैं आनंद को अपने साथ ला सकता हूं।

क्या आप अपने जीवन में उस आनंद को ले रहे हैं या क्लेश से भरे हुए हैं ? अब तक आपने किस चीज को देखा ? क्या अपने अंदर स्थित उस दिव्य शक्ति को देखा ? उस दिव्यता को देखा या आपने सिर्फ लोगों की बुराइयों को देखा ? अगर सिर्फ लोगों की बुराइयों को देखा तो बुराई से आपका परिचय है। और बुरा क्या है —

बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय,

जब घट देखा झांक के, मुझसे बुरा न कोयII

बुराई और अच्छाई — अच्छाई भी तुम्हारे अंदर है; आनंद भी तुम्हारे अंदर है; बोर्डम भी तुम्हारे अंदर है; सारी चीजें तुम्हारे अंदर हैं और तुम अपने जीवन में क्या चाहते हो सबसे बड़ी बात यह है ? तुम अपने जीवन में क्या चाहते हो ? तुम आनंद को चाहते हो; ज्ञान को चाहते हो; समझना चाहते हो; स्पष्टता को चाहते हो; प्रेम को चाहते हो; शांति को चाहते हो, तो ये सारी चीजें भी तुम्हारे अंदर हैं और इनको तुम पा सकते हो। इनको तुम जान सकते हो। यह मौका है। यह कभी न कभी तो होना है।

अगर सचमुच में मास्क पहना हुआ है तो इस मास्क को हटाने का समय आ गया है। तुमको किसी के लिए कुछ बनने की जरूरत नहीं है तुमको अपने आप को समझने की जरूरत है। तुमको किसी और को इंप्रेस करने के लिए, उस पर प्रभाव डालने के लिए तुमको अपना भेष बदलने की जरूरत नहीं है। तुमको अपने आपको जानने की जरूरत है और जबतक अपने आपको जानोगे नहीं, जबतक अपने आप को पहचानोगे नहीं तबतक यह गाड़ी आगे नहीं चलेगी।

शांति क्या है — यह एक प्रश्न बना रहेगा तुम्हारे लिए, उत्तर नहीं! तुम कौन हो — तुम अपने से ही दूर रहोगे तो दूर नहीं रहना चाहिए। अपने आप को जानो; अपने आप को समझो और अपने पास आओ और अपने जीवन को सफल बनाओ।

तो सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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