लॉकडाउन 22

प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (14 अप्रैल, 2020)
Apr 14, 2020
"यह दिन तुम्हारे सामने से गुजर रहा है और यह दिन कभी वापिस नहीं आएगा। एक बार निकल गया तो यह निकल गया, यह कभी-कभी, कभी-कभी, कभी-कभी, कभी वापिस नहीं आएगा।" —प्रेम रावत (14 अप्रैल, 2020) यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) या TimelessToday (customercare@timelesstoday.com) के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

मेरी यही आशा है कि आप सबलोग कुशल मंगल होंगे, तंदरुस्त होंगे और आनंद में होंगे। क्योंकि जब हम उस आनंद में हैं तो हमारे लिए मंगल ही मंगल है। अमंगल क्या है — जब विपदा सिर पर आती है। अमंगल क्या है — जब हम अपना रास्ता खो जाते हैं। जब हमको वह चीज नहीं दिखाई देती है जो स्पष्ट हमारे सामने है तो हम अपना रास्ता खो बैठें। और जब रास्ता खो जाते हैं और सबसे बड़ी बात रास्ता खोने की यही है कि जब मनुष्य खोने लगता है अपना रास्ता तो उसको मालूम नहीं पड़ता है कि "अब मेरा रास्ता मैं खो रहा हूँ!" अब मैं भटक रहा हूं — यह सबसे बड़ी बात है कि जब मनुष्य भटकने लगता है तो कोई ऐसी चीज नहीं है जो आकर उसको यह बताये कि अब तुम भटक गए हो। जब वह पूरी तरीके से भटक जाता है, तब उसको एहसास जरूर होता है कि "मैं भटक गया हूँ।"

अगर आपके घर से कहीं, जहां आप जा रहे हैं, दुकान पर जा रहे हैं या दुकान से घर पर आ रहे हैं और 10 मिनट का रास्ता है। आपको मालूम है कि 10 मिनट का रास्ता है 10 मिनट के बाद आपका मकान आपको मिल जाएगा और आधे घंटे के बाद भी अगर आप अपने घर पर नहीं पहुंचे हैं तो कुछ ना कुछ तो खराबी है, कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। तो कैसे गड़बड़ मालूम हुई ? जब आप देखते हैं, अपने घड़ी को देखते हैं कि "आधा घंटा हो गया, मैं अभी तक नहीं पहुंचा!" तो मैं खो गया हूँ। सबसे बड़ी बात मेरे कहने का मतलब यही है कि जब हम खो जाते हैं तो कई बार यह नहीं मालूम पड़ता है कि हम कब खोना शुरू हो गए और खो जाते हैं, भटक जाते हैं।

इस पृथ्वी के ऊपर अगर हम भटके तो कम से कम एक बात जरूर है कि पृथ्वी गोल है, तो अगर हम चलते रहे, चलते रहे, चलते रहे, तो वहीं वापिस पहुंच जाएंगे जहां से हम चालू हुए। समुद्र में भी सफर करना पड़ेगा और जगह-जगह जाना पड़ेगा, परन्तु फिर भी वापिस आ जायेंगे। परन्तु इस जीवन में जब भटक जाते हैं तो फिर वापिस कैसे आएं ? जब इस जीवन में हम भटक जाते हैं, सही रास्ते पर नहीं हैं, क्योंकि जब हम पैदा होते हैं तो हमारे सामने यह सारी बड़ी-बड़ी जो मुश्किलें हैं, जो आज हम जिन चीजों को मुश्किलें मानते हैं यह नहीं होतीं। क्या है, जीवन बहुत ही साधारण होता है — भूख लगी रोये, मां ने खाना दे दिया। सब ठीक है। उसके बाद प्यास लगी रोये, मां ने दूध दे दिया। जब संतोष मिल गया तो सो गए, चुप हैं। धीरे-धीरे-धीरे करके हम चलना भी सीखते हैं।

यह मतलब नहीं है कि जब हमने चलना सीख लिया, तो हमको कोई मंज़िल हमारी पहले से ही हमने अपने मन में ठानी हुई थी और वहां जाएंगे। नहीं! कभी इधर जा रहे हैं, कभी उधर जा रहे हैं। कई बार तो मैंने छोटे-छोटे बच्चों को चलते देखा है, वह जाना कहीं और चाहते हैं और जा कहीं और रहे हैं। क्योंकि यह सारी चीजें हैं उनके सीखने की। और सबसे बड़ी बात कि बच्चा गिरता है, फिर उठता है। यह बात आप जानिये और इसको स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश कीजिए मैं क्या कह रहा हूं कि बच्चा गिरता है और गिरता है, इधर-उधर देखता है कि सब ठीक है, अगर उसकी मां हंस रही है तो फिर सब ठीक है। फिर उठता है, फिर दो-तीन कदम चलता है, फिर गिर जाता है। फिर उठता है, फिर दो-तीन कदम चलता है, फिर गिरता है।

मतलब उस बच्चे को गिरने से कोई शिकवा नहीं है — "गिरा-गिरा" कोई बात नहीं "उठना" उसका मतलब है। गिरा तो यह नहीं है कि "माँ! मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया, मैं गिर गया!" ना! इधर-उधर देखता है सब ठीक है, फिर उठता है, फिर चलने लगता है। यह चीज आप सबने देखी है, जानते हैं कि बच्चों के साथ यह सब होता है। तो इसका मतलब है कि आप भी जब बच्चे थे आपके साथ भी यह हुआ।

अगर मैं इसको एक शक्ति मानकर चलूं कि यह एक शक्ति है कि जो गिरने के बाद भी उठने की प्रेरणा देती है और गिरने में कोई शर्म की बात नहीं है, पर इतनी हिम्मत जरूर है कि बजाए कि बच्चा शर्म से — मतलब अपनी आँख नीचे करे या रोये या कुछ करे, वह उठता है और फिर चलने लगता है। यह जो शक्ति हम सब में थी यह कहां गयी, क्या हुआ इस शक्ति का ? क्योंकि आज जब हम गिरते हैं — और मेरा मतलब गिरना नहीं है जैसे लुढ़क गए जमीन पर उसका मतलब नहीं है, पर जब हम गिरते हैं — मतलब हमने कोई गलत काम कर दिया या कोई काम ठीक नहीं हुआ या किसी ने कुछ बुरा कह दिया हमको, इस प्रकार का गिरना, जिससे हमको दुख हो तो फिर हम दोबारा उठने की कोशिश क्यों नहीं करते हैं ? उसी के पीछे क्यों लग जाते हैं — "अरे! यह हो गया, वह हो गया, अब क्या होगा मेरा, क्या नहीं होगा।” अब बच्चा अगर यह कहने लगे — "मैं गिर गया, अब क्या होगा, अब मैं तो कभी चल ही नहीं सकूंगा, अब मैं कभी जा ही नहीं सकूंगा, मैं स्कूल कैसे जाऊँगा, मैं फुटबॉल कैसे खेलूंगा, मैं क्रिकेट कैसे खेलूंगा, मेरे साथ अब क्या होगा; यह तो अन्याय हो गया मेरे साथ, किसने यह मेरे साथ किया, यह किस कर्मों का फल है!" कर्मों का फल — तुम समझते हो कि जब बच्चा चलने लगता है और गिर जाता है तो वह बैठ करके यह कहता है "अरे मां! मेरी जन्म-पत्री लाओ, मेरे को बताओ मेरे कौन से कर्मों का फल है कि मैं गिर गया!" क्या समझते हैं ?

किसी बड़े स्वामी के पास जा रहा है; किसी पंडित के पास जा रहा है, "मैं तो 10 नारियल चढ़ाऊंगा मेरे को उठने की शक्ति दो!" ना! बच्चा — उसके लिए गिरना भी और उठना भी उतना ही सरल है। उसको उठने में और गिरने में कोई शर्म नहीं है। पर मनुष्य को है। "मैं गिर गया, मेरे साथ यह हो गया, मैं फेल हो गया या मेरे को पास करवा दो मैं 10 नारियल चढ़ाऊंगा।" तुम समझते हो वह जो छोटा बच्चा है वह कहता है "हे प्रभु! आज मेरे को गिराना मत, मैं तुमको 10 नारियल चढ़ाऊंगा।" ना, उसको क्या, उसको प्रभु — प्रभु तो उसका सब जगह है, मतलब उसको अपने भगवान से जो उनका नाता है, रिश्ता है, आनंद का जो रिश्ता है, आनंद का नाता है वह हर एक जीवन के हर एक क्षण में वह आनंद लेना चाहता है, देखना चाहता है, सुनना चाहता है। ऐसी-ऐसी आवाज़ें, उसके लिए सबकुछ नया है। हमारे लिए तो सबकुछ पुराना है — "हां! मैंने सुनी हुई है, यह आवाज सुनी हुई है, वह आवाज सुनी हुई है।" पर जो छोटा बच्चा है उसके लिए "हां! मैंने यह आवाज कभी नहीं सुनी।"

तुम जब बादलों को देखते हो तो क्या कहते हो अपने से ? कुछ नहीं! बादल आये, आये! तुम जानते हो कि हर एक बादल जो आकाश में आता है, उसका रंग-ढंग सबकुछ अलग है। मनुष्य को तो लगता है कि सब एक ही जैसे हैं। पर एक जैसे, कैसे हैं ? सब अलग-अलग हैं। जब बारिश होती है, एक-एक बूंद उस बारिश की अलग-अलग है। जब बर्फ पड़ती है, एक-एक क्षण जो बर्फ पड़ रही है, वह सारी बर्फ — उसका एक-एक हिस्सा अलग-अलग है। वैज्ञानिक लोग कहते हैं कि जब तुम तारों को देखते हो, आकाश में जब तारों को देखते हो तो कितने तारे देख रहे हो ? जितने-जितने भी समुद्र के किनारे, नदियों के किनारे, जितनी भी रेत है, उनका हर एक-एक-एक जो कण है उससे ज्यादा हैं सितारे आकाश में। जब मैंने पहली बार यह बात सुनी, मैं अचंभे में रह गया कि ऐसे कैसे सम्भव हो सकता है! परन्तु इतना विशाल है यह और इतने तारे हैं, इतने तारे हैं, इतने तारे हैं, इतने तारे हैं कि जितने समुद्र के किनारे जो रेत है उसका एक-एक कण भी लें तो उससे भी ज्यादा तारे आकाश में हैं।

यह सब कुछ अचंभे की बात हर समय तुम्हारे सामने हो रही है पर मनुष्य है कि उसके लिए क्या चिंता है — "मेरी भैंस कहां है ?" यह नहीं, मतलब एक तो चिंता यह है कि "मेरा क्या होगा, क्या मैं आज का जो दिन है जो कभी — सोचिये आप, विचारिये! मैं कहने वाला था कि आज का जो दिन है वह कभी वापिस नहीं आएगा। सोचिये आप, विचारिये! कब वापिस आएगा ? कभी नहीं, कभी नहीं, मतलब कभी नहीं, कभी नहीं — सौ साल में नहीं, दो साल में नहीं, दो करोड़ साल में नहीं, दो हजार लाख करोड़ साल में नहीं, दो अरब साल में नहीं, एक हजार, दो हज़ार, पांच हज़ार, दस हज़ार अरब सालों में भी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। कभी नहीं वापिस आएगा।

कितने ही लोग हैं जो अपने घर में बैठे हैं इस कोरोना वायरस की वजह से और बोर हो रहे हैं। तुम तो बोर हो रहे हो पर तुम्हारे सामने से क्या गुजर रहा है ? तुम्हारे सामने से गुजर रहा है यह दिन और यह दिन कभी वापिस आएगा नहीं। एक बार निकल गया तो यह निकल गया यह कभी-कभी, कभी-कभी, कभी-कभी, कभी वापिस नहीं आएगा। यह तुम जानते हो अच्छी तरीके से। इससे कोई अंजान नहीं है इस बात से कोई अंजान नहीं है । फिर भी लोग अपना समय किस तरीके से गुजार रहे हैं, जैसे फिर यह कल दोबारा आएगा।

कितने ही लोग इस कोरोना वायरस से मर गए। जब यह — जब वही लोग नवंबर में थे, तब उनको यह था कि कोरोना वायरस से मरेंगे ? नहीं! दिसंबर में यह सारी बातें चालू हुईं। तो क्या होगा, क्या नहीं होगा इसका सबकुछ होते हुए तुम इसके बारे में बता नहीं सकते। क्यों जी ? 2019 में क्या आपको मालूम था अप्रैल में कि यह होने वाला है ? तब तक तो आप सभी लोग, हम सभी लोग खोए हुए थे कि "टेक्नोलॉजी में यह हो गया, टेक्नोलॉजी में यह हो गया।" सबके पीछे क्या था "5G आएगा, जी! 5G आएगा।" अरे! 5G को मारो गोली, आ गया कोरोना जी। अब क्या करोगे ? सबको घर में बिठा दिया। मतलब कोई यह सोच नहीं सकता था, सोच नहीं सकता था। हमको अच्छी तरीके से याद है हम तो (मेरे ख्याल से नवंबर का समय था) नवंबर का समय था, 2020 की बात थी, इस साल की बात थी कि — "हम वहां जाएंगे, हम वहां जाएंगे, हम वहां जाएंगे, वहां जाएंगे, वहां जाएंगे, वहां जाएंगे, टूर की बात हो रही थी, तो वही वाली बात थी कि "हां! हिंदुस्तान चलें, वहां चलें, वहां चलें, वहां चलें, वहां चलें।"

यह किसी — एक भी व्यक्ति ने उस मीटिंग में यह नहीं कहा कि "जी! सब घर बैठे होंगे और आप भी घर में लॉक्ड होंगे" — किसी ने नहीं कहा। यह सोच भी नहीं सकता था कोई कि ऐसा समय होगा। अजी! हम तो सब जानते हैं, सबको ऐंठ थी अपनी, अहंकार जिसे कहते हैं। "हमने तो यह कर लिया हासिल, हमने यह कर लिया हासिल, हमने यह कर लिया हासिल।" अब कर लो हासिल क्या करना है! इसने अच्छे-अच्छों को बिठा दिया घर में। तो क्या करोगे ? कैसे करोगे ?

तब बात आती है उस हिम्मत की, उस दृष्टिकोण की कि "मैं अपने जीवन में उस चीज को पाऊं। अगर मैं गुम भी हो गया तो बात गुम होने की नहीं है, बात है वापिस रास्ते पर आने की।" उसके लिए कैसी हिम्मत की जरूरत है ? वैसी हिम्मत की जरूरत है कि बिना शर्म के, बिना किसी चीज को सोचे हुए, जैसे बच्चा जब गिरता है तो फिर उठता है और आगे चलता है। अभी वह चल नहीं सकता है, उसको अच्छी तरीके से मालूम है वह ज्यादा चल नहीं सकता है। वह एक-दो कदम लेता है, गिर जाता है। पर फिर उठता है और वह जो उसका उठना है वही एक चीज है जो उसको वह मौका देगी कि फिर वह दो कदम और चल सके। फिर तीन, फिर चार, फिर पांच, फिर छह, फिर सात और ऐसे-ऐसे वह चलता रहे और ऐसे-ऐसे करता रहेगा तो वह कुछ सीखेगा — और चलना सीखेगा।

यह बात है कि हम इसको अपने जीवन में अपनाएं, इस हिम्मत को जो हमारे अंदर है। जब हम बच्चे थे हमारे अंदर थी यह सबके साथ हुआ है — चाहे आप औरत हो, चाहे आप मर्द हो यह सबके साथ हुआ है और यह आपके अंदर अभी हिम्मत है। पर इस हिम्मत को बाहर लाओ और कैसे बाहर लाओगे ? जबतक तुम बात की स्पष्टीकरण नहीं करोगे। क्योंकि तुम दुख में — जो दुख में बात होती है, बात तो अलग है, दुख अलग है, जो बात तुमको दुख देती है वह बात अलग है, दुख अलग है। तुम्हारा सिर है घुसा हुआ दुख में, तुम वह जो बात जो तुमको दुख दे रही है उसको नहीं देख रहे हो और हटाना है उसको जो दुख दे रही है जैसे कोई अगर चीज है जिससे बदबू आ रही है, तो बदबू आ रही है तो अपना नाक बंद कर लिया। परन्तु तुमको अच्छी तरीके से मालूम है कि तुम कब तक अपना नाक बंद करोगे, स्वांस तो तुमको लेना पड़ेगा। तो तुम क्या करते हो ? तुम वही करते हो जो बुद्धिमानी रूप वाली बात है कि जो श्रोत है उस बदबू का उसको उठाकर कहीं फेंक देते हो, अपने से दूर। जब ऐसा करते हो तो बदबू भी उस चीज की उसके साथ चली जाती है। ठीक उसी प्रकार, जो चीज दुख देने वाली है तुम्हारा सिर घुसा हुआ है दुख में, तुमने अपनी नाक बंद कर रखी है जबतक वह चीज जो तुमको दुख दे रही है, जबतक उसको नहीं हटाकर फेंकोगे दुख तुम्हारा कहीं नहीं जाएगा, क्योंकि उसका श्रोत वह चीज है।

तो मुझे आशा है कि जो मैंने आज कहा उससे आपको कुछ समझ में आएगा और आप उसका पूरा-पूरा फायदा ले सकेंगे और आपके जीवन में थोड़ा-सा आनंद और आए। और आपका जीवन मंगलमय बीते।

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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