लॉकडाउन 28

प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (20 अप्रैल, 2020)
Apr 20, 2020
"सपना क्या है और असलियत क्या है ? असलियत है कि तुम जीवित हो, और जो कुछ तुम्हारे इर्द-गिर्द हो रहा है, वह असलियत नहीं है। असलियत यह है कि तुम इस समय जीवित हो और तुम्हारे अंदर अविनाशी विराजमान है। " —प्रेम रावत (20 अप्रैल, 2020) यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) या TimelessToday (customercare@timelesstoday.com) के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं और वह कुछ इस प्रकार से है क्योंकि मैं सोच रहा था — एक तो मैं यही सोच रहा था कि सब कुशल-मंगल तो हैं क्योंकि बहुत जरूरी बात है कि हम सभी आनंद में रहें और इस माहौल में जो भी यह माहौल है इसका उस चीज से कोई लेना-देना नहीं है कि हम एक दीवार से आए और एक दिन हमको दूसरी दीवार से जाना है। कोरोना वायरस हो या कोरोना वायरस ना हो यह तो होगा और हर दिन हमारी जिंदगी के अंदर क्या महत्व रखता है, यह कोरोना वायरस नहीं निकालेगा, कोरोना वायरस से इसका कोई ताल्लुक़ात नहीं है।

तो जो बात मैं सोच रहा था, वह बात यह है कि एक तो हम सुनते हैं कि यह सारा जगत एक सपना है। सपना क्या है और सच्चाई क्या है ? जागना क्या है और यह सपना क्या है ? तो कई बार समझ में नहीं आता है। कई बार यह लगता है कि यह जो संसार है, जो इस संसार के रीति-रिवाज हैं यही सच है। सवेरे-सवेरे उठकर नौकरी पर जाना है यही सच है। भूख लगती है खाना खाना है यही सच है। किसी की शादी हो रही है, किसी से रिश्ता हो रहा है, किसी से नाता हो रहा है, किसी से यह हो रहा है, किसी से वह हो रहा है यही सच है। कोई यह करता है, कोई वह करता है, उसने यह कर दिया, उसने वह कर दिया।

अब अखबार पढ़ते हैं सब लोग बैठ करके — यह तो प्रथा है कई लोगों की बैठ करके चाय सवेरे-सवेरे और अखबार, बैठे हुए हैं। हिंदुस्तान में पता नहीं कितनी ही दुकानें होंगी जहां लोग बैठे हैं बाहर, चाय की दुकान है, कोई समोसा तल रहा है, कोई कुछ हो रहा है, कोई कुछ हो रहा है, चाय भी पी रहे हैं, अखबार भी पढ़ रहे हैं और सबसे बड़ी बात अपनी टिप्पणी भी कर रहे हैं। समझा रहे हैं किसी को कि क्या खबर है यह! समझा रहे हैं, बात हो रही है "यह ऐसा है, वह वैसा है।" अब हिन्दुस्तान है, लोग अपनी-अपनी बात रखना चाहते हैं — "यह ऐसा हो गया, उसने यह कर दिया, उसने यह अच्छा नहीं किया, यह ठीक नहीं हो रहा है, यह गलत है, यह ऐसा है, यह वैसा है।" लोग बहस करते हैं इस पर। क्योंकि वह समझते हैं कि उनकी टिप्पणी करने से कुछ होगा। पर सच तो यह है कि होना-जाना कुछ है नहीं। करते रहें, अपना ओपिनियन (opinion) वह प्रकट करते रहें, उनके अपने विचार वह प्रकट करते रहें, पर उससे कुछ होगा नहीं। पृथ्वी फिर भी वैसे ही चक्कर काटती रहेगी, जैसी चक्कर काटती आ रही है। समय उसी रफ्तार से चलता रहेगा जिस रफ्तार से चलता आ रहा है।

सपना क्या है और असलियत क्या है ? जो भी हम समझते हैं इस संसार के अंदर, जो असलियत जिसको हम मानते हैं, जिसके आगे हम सिर झुकाते हैं, जिसके आगे हम अपना शरीर झुकाते हैं। जो हमारे नाते हैं, जो हमारे रिश्ते हैं, यह जो सारी चीजें हैं, हमारा बॉस है, हमको नौकरी करनी है, हमको यह करना है, हमको वह करना है, यह सारे रीति-रिवाज जो बनाए हुए हैं यह मनुष्य के बनाए हुए हैं। यह बनाने वाले के नहीं बनाए हुए हैं। इसका बनाने वाले से कोई लेना-देना नहीं है। कई लोग हैं जो अपने बच्चों से दुखी हैं। उनके बच्चे वह नहीं करते हैं जो वह चाहते हैं। आपका बच्चा अगर वह नहीं कर रहा है जो आप चाहते हैं तो एक मिनट के लिए एक बात आप सोचना — भगवान कृष्ण के जो पुत्र थे, भगवान कृष्ण उनसे खुश नहीं थे। और वही कारण थे — उनके पुत्र जो थे वही कारण बने जो सारी द्वारका, जो सारी चीजें खत्म हुईं, लड़ाईयां हुईं उसके कारण वही थे। सोचने की बात है। इसका मतलब यह हुआ कि यह जरूरी नहीं है कि महापुरुष का बच्चा भी महापुरुष ही हो। बड़े आदमी का बच्चा बड़ा हो यह नहीं है बात। सबका अपना-अपना है जब जो, जैसी जिसकी समझ है। पर सबसे बड़ी बात सपना क्या है और असलियत क्या है ? असलियत क्या है ? असलियत है कि तुम जीवित हो, यह असलियत है और जो कुछ तुम्हारे आसपास इर्द-गिर्द हो रहा है, वह असलियत नहीं है। असलियत यह है कि तुम इस समय जीवित हो और तुम्हारे अंदर, तुम्हारे अंदर अविनाशी विराजमान है।

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं, मुनिजन सहस अठासी।

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।।

क्यों, क्यों असलियत है ? क्योंकि वही है एक — "जो था, जो है और जो हमेशा रहेगा।" क्योंकि वह असलियत है। नकली क्या है — "जो नहीं था, जो है और जो नहीं रहेगा।" "जो नहीं रहेगा — जो नहीं था, जो है और नहीं रहेगा उसको असली नहीं समझ सकते, वह सपना है।”

जैसे कोई अगर तुमको नयी कार बेचे और कहे कि "यह पहले आपके पास नहीं थी, अब आपके पास है और एक दिन यह आपके पास नहीं रहेगी", तो आप तो उसको देखेंगे कि बेवकूफ आदमी है मेरी कार है जितने दिन मैं चाहता हूँ उसको रखना मैं रख सकता हूँ। बात इसकी नहीं है, बात है कि वह खुद ही नहीं रहेगी। जो रिश्ते-नाते जिनको आप देखते हैं वह खुद, जिनके साथ यह रिश्ते हैं, वही नहीं रहेंगे। इस पृथ्वी को देखते हैं आप — यह पृथ्वी भी नहीं थी, है और नहीं रहेगी। यह भी असली नहीं है। चंदा भी असली नहीं है। सूरज भी असली नहीं है। पर क्या असली चीज है ? वह असली चीज है जो आपके अंदर विराजमान है और जबतक वह आपके अंदर विराजमान है तब तक आप भी असली हैं। तब तक आप भी असली हैं। कौन सी चीज ? शरीर नहीं, कोई ऐसी चीज है जबतक वह आपके अंदर है तब तक आप भी असली हैं क्योंकि वह भी असली है और जब वह असली चीज, वह तो हर एक जगह है वह तो आती-जाती है नहीं पर जिस दिन आपके अंदर वह नहीं रहेगी आप उससे हट जाएंगे तो आप भी असली नहीं रहेंगे। आप भी चले जायेंगे।

सपना क्या है और सच्चाई क्या है ? सच्चाई अंदर है, सच्चाई को अगर बाहर ढूंढेंगे तो आपको जो सच्चाई मिलेगी बाहर, वह सच्चाई, सच्चाई नहीं है, वह असली चीज नहीं है। देखिये! इसको ज्यादा दूर ले जाएंगे आप इस बात को तो आप फिर भ्रमित होंगें। हवाई जहाज में बैठने की बात, हवाई जहाज में अगर आप बैठेंगे तो असली नहीं है तो आप गिर नहीं जाएंगे नीचे! नहीं, उसकी बात नहीं हो रही है। पर एक दिन हवाई जहाज नहीं था, आज है और एक दिन ऐसा आएगा कि हवाई जहाज वह उड़ान नहीं भरेगा। इसलिए नहीं क्योंकि वह क्रैश हो गया। नहीं! हवाई जहाज की भी एक जीवन लिमिट होती है उसके बाद उसको नहीं उड़ाते हैं, उसको रख देते हैं कहीं। ठीक इसी प्रकार, सारी चीजें जिनको आप देखते हैं, जिनसे आप भ्रमित होते हैं, यह चीज असली नहीं हैं।

सपना है और सपने में क्या होता है ? लगता है कि चीज असली है — जब सपना आता है तो लगता है कि चीज असली है। बात जो हो रही है सपने के अंदर असली है। परंतु जैसे ही आंख खुलती है पता लगता है कि वह असली नहीं थी। यही बात समझने की है। आंख जब खुलती हैं, ये आँख जब खुलती हैं। जब मन के पीछे आप भाग रहे हैं और मन आपके पीछे भाग रहा है, जब आप मन के पीछे भाग रहे हैं और मन दुनिया के पीछे भाग रहा है तो फिर कहां कोई किसी को पकड़ पाएगा। क्योंकि दुनिया भाग रही है बहुत तेज, उसके पीछे मन भाग रहा है बहुत तेज और फिर लोग मन के पीछे भाग रहे हैं बहुत तेज और सभी भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं। कोरोना वायरस ने सबको घर में बिठा दिया। कोरोना वायरस ने सबको घर में बिठा दिया। अब क्या भाग रहा है ? अब मन भाग रहा है और लोग उसके पीछे भागने की कोशिश कर रहे हैं, उसके पीछे भागने की कोशिश कर रहे हैं। "हम लॉकडाउन में नहीं रहना चाहते हैं, हम यह करना चाहते हैं, हमको यह मत कहो, हमको वह मत कहो, हम भी बाहर आएंगे, हम लॉकडाउन में नहीं रहना चाहते हैं।"

भलाई इसमें किसकी है, किसकी जान बचेगी, किसके लिए अच्छा होगा, देश के लिए अच्छा होगा — यह सब कोई नहीं सोचता। थोड़े बहुत लोग हैं जो यह बात सोच रहे हैं और लोग हैं जो नहीं "हम बाहर आएंगे, हम यह करेंगे, हम वह करेंगे, हम यह आंदोलन करेंगे, हम वह आंदोलन करेंगे!" भाई! तुम्हारी मर्ज़ी तुम जो करो हम रोकने के लिए नहीं कह रहे हैं। हम यह कह रहे हैं कि कुछ बातें होती हैं जो तुम्हारी अच्छाई के लिए हैं। अगर तुम उस बात को समझ पाए तो अच्छी बात है।

यही कबीरदास जी ने कहा है कि — "अगर सच बोलें तो मार पड़ेगी झूठ बोलें तो वह हमको पचता नहीं है तो हम करें तो करें क्या!" यही बात होती है।

संसार इस माया के पीछे भाग रहा है जो सपना है उसको साक्षात्कार करने के लिए आदमी भागता रहता है। यही लोग कहते हैं "यह मेरा सपना है, मैं अपने सपने को पूरा करना चाहता हूं।" अरे भाई! सपने को पूरा करोगे तो अगर पूरा हो भी गया, तो जिस दिन तुम्हारी आँख खुलेगी, उस दिन वह भी खत्म हो जायेगा, सपने की तरह। यह तो एक, जैसे गुब्बारा होता है और गुब्बारे में हवा भरी हुई है और ऐसा लगता है कि सबकुछ ठीक है पर कोई छोटी-सी भी चीज अगर उस गुब्बारे से लग गयी और वह गुब्बारा फुट गया जिसे बुलबुला कहते हैं, जो साबुन का बनाते हैं तो जो बुलबुला है वह हवा में जा रहा है ऐसा लगता है कि सबकुछ ठीक है। कोई भी चीज उसके साथ आकर लगेगी, वह फट जाएगा। खत्म हो जाएगा। यही हाल है इस दुनिया का। पर तुम अपने जीवन में जो असली चीज है उसको पकड़ने की कोशिश करो, उसको पाने की कोशिश करो। वह चीज तुम्हारे अंदर है

“विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं” — ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिसका ध्यान करते हैं। वह चीज तुम्हारे अंदर है

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी —

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं, मुनिजन सहस अठासी।

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।।

अविनाशी — उसका कभी नाश नहीं हो सकता है। जिस चीज का नाश हो सकता है वह आज है पर कल नहीं रहेगी। क्योंकि उसका नाश तो होना है। पर अविनाशी की प्रकृति यह है कि उसका नाश नहीं होना है।

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं, मुनिजन सहस अठासी।

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।।

पर चक्कर क्या है कि "पानी में मीन प्यासी मोहे सुन सुन आवे हासी" — जिसके पास सबकुछ है, सबकुछ है, सबकुछ है वही संतुष्ट नहीं है अपने आप से तो और क्या चाहिए ? जब तुम अपने आप से ही संतुष्ट नहीं हो, अपने आप से ही तुम प्रसन्न नहीं हो तो फिर किससे प्रसन्न होगे ? कौन ऐसा होगा जो तुमको प्रसन्न कर सकता है ? जब तुम अपने आप से ही खुश नहीं हो, किस चीज से, क्या चीज होगी जिससे खुश हो पाओगे। मन कहता है "यह कर लो, वह कर लो, उससे खुश हो जाओगे, उससे खुश हो जाओगे, उससे खुश हो जाओगे!" पर उन चीजों से खुश नहीं होना है। खुश होना है तो अपने आप से खुश हो।

अगर सचमुच में सपने की तरफ नहीं भागना चाहते हो तो अंदर की ओर भागो। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सारे संसार के काम तुमको बंद करने पड़ेंगे। नहीं, देखो! सपना देखो! इसमें क्या बात है। पर कम से कम जहां तुमको होना चाहिए वहां तुमको होना चाहिए अर्थात तुमको अच्छी तरीके से मालूम हो कि तुम्हारे साथ जो अविनाशी तुम्हारे अंदर बैठा है इसको तुम अच्छी तरीके से जानते हो। इसको तुम अच्छी तरीके से समझते हो। और हर पल में जो यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है इसका तुम स्वागत कर रहे हो। इसका तुम आनंद ले रहे हो। क्योंकि यही बात है अगर समझो इस बात को और समझ सको।

अभी अंग्रेजी की जो मैंने ब्रॉडकास्ट बनाई इसमें मैं सुना रहा था लोगों को तो मैंने कहा कि "सबसे बड़ी बात आज के दिन का महत्व क्या है, अब का महत्व क्या है ?" अब का महत्व यह है कि मैं किसी भी चीज के बारे में सोच सकता हूँ। किसी भी चीज के बारे में सोच सकता हूँ। परन्तु जो करना है, जो करनी है, जो कर्म है वह अब होगा, वह आज के दिन मैं कर सकता हूँ, कल नहीं कर सकता कर्म। सोच सकता हूं कल के बारे में, कल के बारे में सोच सकता हूं — "मैं यह करूंगा, मैं वह करूंगा, मैं वह करूंगा, वह वह करूंगा, मैं वहां जाऊंगा, मैं यह करूंगा, मैं वह करूंगा, पर किया नहीं कुछ भी।" करना है, कर्म करना है तो वह 'आज के दिन' ही होगा, आज के दिन। 'पास्ट' में नहीं, 'जो बीत गया' उसमें नहीं। 'भूतकाल' में नहीं और 'कल' में नहीं वह 'आज' कर्म करना है। तो जो कर्म किया, आज कर्म करना है अगर वह सोच-विचार के नहीं किया और कर दिया, अंधाधुंध कर दिया तो उसका फल भी अंधाधुंध मिलेगा।

इसी से लोग परेशान होते हैं। जब फल उनको अंधाधुंध मिलता है, जैसी उनकी चाहत है उसके अनुकूल नहीं मिलता है तो लोग परेशान होते हैं। पर कल, तुम कल के बारे में सोच सकते हो पर कल तुम कुछ कर नहीं सकते हो। करोगे जो कुछ भी करना है वह आज करोगे चाहे वह कल का दिन — जब कल का दिन आएगा तो कैसे आएगा आज के रूप में आएगा। आज बनकर आएगा। करना जो कुछ है वह आज के दिन करना है, सोच-समझ के करना है। पर तुम्हारी सोच है कल के लिए या तुम विचार करते हो जो दिन बीत गया उसके लिए ? करना है ‘आज के दिन’— इसका यह महत्व है।

अपने जीवन को सफल बनाओ; आनंद लो और सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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