लॉकडाउन 31

प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (23 अप्रैल, 2020)
Apr 23, 2020
"हमारे अंदर स्थित स्रोत एक ऐसी चीज है जो दुख में हमें सुख दे सकती है। और वही एक ऐसी चीज है जो सुख में और सुख को बढ़ा सकती है।" —प्रेम रावत (23 अप्रैल, 2020) यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) या TimelessToday (customercare@timelesstoday.com) के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

आज के दिन मैं एक बात कहना चाहता हूं। मैं रात को सोच रहा था तो बात है कि —

बाजी लांऊ राम से पल्टू दोऊ विधि राम।

हारुं तो मैं राम की, जीतूं तो राम।।

अब यह सुनने में बहुत सुन्दर है। इसमें भक्ति है, इसमें भाव है और सबसे बड़ी चीज इसमें यह है कि यही एक चीज है — अपने आप को जानना, अपने अंदर स्थित जो परमात्मा है उसको जानना कि “दोनों तरफ से ही अगर बाजी लगाई जाए हारो तो भी जीतोगे और जीते तो जीतोगे” तो यही एक ऐसी चीज है। क्योंकि इस संसार के अंदर अगर बाजी लगाओगे — जीते तो जीते, हारे तो हारे। यही कारण है क्योंकि ऐसी बाजी हम हमेशा लगाते रहते हैं जो हमारे लिए दुःख का कारण बनता है। मां-बाप पहले, जो बाप है वह बाप नहीं होता है, आदमी है। कर रहा है जो कुछ भी कर रहा है, वह पढ़ रहा है, लिख रहा है। उम्र आती है उसकी शादी की। उसको किसी से प्रेम होता है या उसकी इच्छा होती है किसी से या उसके मां-बाप कोई अरेंज करते हैं उसके लिए शादी। लड़का-लड़की होते हैं, वह दोनों आते हैं शादी होती है। शादी होती है तो बच्चा होता है मां-बाप बनते हैं। अब वह सारा सबकुछ वह खुशी का समय है। शादी हुई यह खुशी होती है, रिश्तेदार सब आते हैं, पकवान बनते हैं, यह होता है, वह होता है, क्या-क्या नहीं होता है। और एक किस्म से वह पति और वह पत्नी एक बाजी लगा रहे हैं कि सबकुछ बढ़िया होगा, सब कुछ बढ़िया होगा।

पहले ही रामायण को अगर देखें तो सब चीजें इसी तरीके से इनका प्रबंध हो रहा है कि सबकुछ बढ़िया होगा, परंतु हुआ नहीं। क्योंकि बाजी संसार के साथ लग रही थी और यही होता है। तो आशाएं हैं कि बच्चा जब बड़ा होगा तो मेरा राजा बेटा है, मेरा यह है, मेरा वह है। जब राजा बेटा बड़ा होता है तो वही अपने माँ-बाप को कटघरे में भेज देता है। यह हमेशा होता रहता है यह पहली बार तो होगा नहीं। कितने ही लोग हैं हमको यह करना है, हमको वह करना है, हमको यह चाहिए, हमको वह चाहिए, अब ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है। क्योंकि हम बाजी लगा रहे हैं और आशा कर रहे हैं कि “हमको संसार यह देगा, हमको संसार यह देगा, हमको संसार यह देगा।”

परंतु यह बाजी जब हम इस दुनिया के साथ लगाएंगे, इस माया के साथ लगाएंगे तो इसमें हार होगी और जीत होगी। जीत बहुत कम होगी, हार बहुत ज्यादा होगी और जिनकी जीत हो गई है वह फिर बाजी लगाएंगे और एक ना एक दिन उनको हारना है। परंतु जो अपने स्थित उस आनंद के साथ, उस शक्ति के साथ जो तुम्हारे अंदर है जिसके लिए कहा है —

घट में है सूझे नहीं, लानत ऐसी जिन्द।

तुलसी या संसार को, भयो मोतियाबिंद।।

वह जो चीज तुम्हारे अंदर है जिसके बारे में मैंने पहले भी कहा कि जो भजन है कबीरदास जी का —

पानी में मीन प्यासी मोहे सुन सुन आवे हासी

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निरासी

उसी से निराशा होती है लोगों को क्यों ? जो तुम्हारे अंदर है जब उससे तुम बाजी लगाओगे तो अगर तुम हार गए तब उसके और तुम अगर जीत गए तब भी तुम उसके। तो कितनी सुंदर बात है यह कि हम अपने जीवन में एक ऐसी चीज से बाजी लगाएं जिससे हम हार ही नहीं सकते। एक ऐसी चीज हमारे लिए आशा का स्रोत बने जो हमको कभी ठुकराएगा नहीं जिस स्रोत से, जिस आशा से हमको कभी निराश नहीं होना पड़ेगा, हमको कभी निराशा नहीं मिलेगी।

संसार में सारे काम करते हैं निराशा मिलती है, निराशा मिलती है, निराशा मिलती है। लोग हमको चिट्ठी में लिखते हैं, प्रश्नों के बारे में लिखते है, यह सारी चीजें लिखते हैं लोग कि "जी मैं खुश नहीं हूं, मेरे साथ यह हो रहा है, मैं दुखी हूँ" —क्योंकि तुमने अपनी आशा लगाई है इस संसार के अंदर, इस माया के अंदर और आशा का स्रोत तुम्हारे लिए अगर यह माया है, यह दुनिया है तो तुमको निराशा जरूर मिलेगी। और जिसने यह स्रोत समझा है कि जो हमारे अंदर स्थित आनंद है, जो हमारे अंदर स्थित परमात्मा है वह हमारा स्रोत होगा अगर आशाओं के लिए तो हमको कभी निराश नहीं होना पड़ेगा। चाहे कुछ भी हो हमारी जिंदगी के अंदर वह हमेशा हमारे साथ है। दुख में सुख में वही एक ऐसी चीज है जो दुःख में हमारे को सुख दे सकती है। और वही एक ऐसी चीज है जो सुख में और सुख को बढ़ा सकती है।

क्योंकि मनुष्य जब जान जाता है कि वह कौन है, क्या है, एक ढांचा है, बाहर से यह मिट्टी है, जैसे मटका होता है वैसे यह मिट्टी है। और जैसे मटका एक दिन टूटता है और मिट्टी के साथ वापिस जाकर मिल जाता है। इस मिट्टी को भी इस मिट्टी के साथ मिलना है। यह यही मिट्टी है इसी मिट्टी से यह बना है और इसी मिट्टी में जाकर इसको मिलना है। परन्तु तुम यह मिट्टी हो या वह चीज हो जो इस मिटटी के अंदर है और जबतक वह चीज इस मिट्टी के अंदर है यह मिट्टी बोल सकती है, यह मिट्टी सुन सकती है, यह मिट्टी हंस सकती है, यह मिट्टी सोच सकती है, यह मिट्टी चाह सकती है, यह मिट्टी आशा कर सकती है, यह सारी चीजें उस चीज के बदौलत है जो तुम्हारे अंदर है। जिसको जब तक तुम जानोगे नहीं कि वह चीज क्या है — मन से कल्पना करने की बात नहीं कर रहा हूं, मैं जानने की बात कह रहा हूं, पहचानने की बात कह रहा हूं, कल्पना की बात नहीं कर रहा हूं मैं। यह नहीं है कि तुम बैठे-बैठे कल्पना अपनी बनाओ कि — मर्द लोग हैं उनके लिए क्या है —"हां! "अगर मेरी बीवी ऐसी हो या मेरी गर्लफ्रेंड ऐसी हो या ऐसी लड़की मेरे को मिल जाए।" और लड़कियां है — "ऐसा पति मेरे को मिले, मेरा पति ऐसा होना चाहिए, मेरा पति ऐसा होना चाहिए, मेरा पति ऐसा होना चाहिए” और कल्पना की फोटो बन रही है, कल्पना की फोटो बन रही है और फिर उस कल्पना को साक्षात् करने के लिए सब लगे हुए हैं।

कहां जा रहे हैं ? मंदिर जा रहे हैं, गुरुओं के पास जा रहे हैं — क्यों जा रहे हैं ताकि उनकी वह जो कल्पना है वह साक्षात् हो जाए, यह चक्कर है। और गुरु हैं ऐसे जो कह रहे हैं उस गौ को दो रोटी खिला दे, उस कुत्ते को तीन रोटी खिला दे, उस सुअर को यह दे दे, उस पेड़ पर यह बाँध दे उससे तेरी जो कल्पना है वह साक्षात् हो जाएगी — यह चक्कर क्या है! यह चक्कर है सारे मन का। जैसे कबीरदास जी ने कहा —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

सब आ गए इसमें, सब आ गए इसमें। और यही लोग करते हैं। जाते हैं — क्या चाहिए ? "यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए, यह चाहिए!" अब मेरा विश्वास नहीं हो रहा। किसी दिन शॉपिंग मॉल में जाओ और बैठ जाओ कहीं, जाकर बैठ जाओ। फिर देखो हर एक व्यक्ति जो आ रहा है, कहाँ उसका ध्यान है ? उसका ध्यान अपनी बीवी पर नहीं है, उसका ध्यान अपने बच्चे पर भी नहीं है, उसका ध्यान है "उस दुकान में क्या बिक रहा है, उस दुकान में क्या बिक रहा है, उस दुकान में क्या बिक रहा है, उस दुकान में क्या बिक रहा है ?" सब ऐसे ही भ्रमण कर रहे हैं और कबीरदास जी ने शॉपिंग मॉल होने से पहले ही कह दिया है कि ऐसे ही तुम्हारा मन सब जगह भागता रहता है और यही तुम करते रहते हो “भागते रहते हो, भागते रहते हो, भागते रहते हो, भागते रहते हो” — पैरों से नहीं अपने मन से। और कल्पना की फोटो बनाते रहते हो और उसके पीछे, उसका साक्षात्कार करने के लिए तुम कुछ भी करने के लिए तैयार हो। मेरे पास यह होना चाहिए, मेरे पास यह होना चाहिए और उसके लिए तुम यह ट्रेनिंग लेने के लिए तैयार हो, यह ट्रेनिंग लेने के लिए तैयार हो, यह करने के लिए तैयार हो, यह घूस देने के लिए तैयार हो — हमको तो मालूम भी नहीं था लोग इतनी-इतनी घूस देते हैं ताकि छोटी-सी नौकरी मिल जाये। यह सब होता रहता है। और दुनिया इसमें लगी हुई है। पर जिसने वह —

बाजी लांऊ राम से पल्टू दोऊ विधि राम।

हारुं तो मैं राम की, जीतूं तो राम।।

अगर मैं हारा तब भी राम का और जीता तब भी राम का। क्योंकि राम ही को जीत लिया मैंने। कौन-सा राम ? फिर वही वाली बात आती है, जब राम की बात आती है तो वही बात आती है जो तुम्हारी कल्पना के राम हैं और मैं किस राम की बात कर रहा हूं ? मैं उस राम की बात कर रहा हूं जो तुम्हारे घट के अंदर बैठा हुआ है —

एक राम दशरथ का बेटा। एक राम घट-घट में बैठा।।

एक राम का जगत पसारा। एक राम जगत से न्यारा।

एक राम जो जगत से न्यारा है — उसको तुम पकड़ोगे कैसे ? उसको देखोगे कैसे ? उसको जानोगे कैसे ? वह तो न्यारा है, वह तो अलग है। एक राम दशरथ का बेटा — दशरथ के जो बेटा राम थे, वह तो अब नहीं हैं। उनको तो देवी-देवताओं ने कहा कि "अब आइये" — एक तो वह कहानी है जो मैं सुनाता हूं — हनुमान वाली और दूसरा है कि वह गए और सरजू नदी में उन्होंने गोता लगाया फिर वापिस आये नहीं। तो वह तो गए। पर हां, एक राम घट-घट में बैठा और जो तुम्हारे घट में बैठा है उसको तुम जान सकते हो, उसको तुम पहचान सकते हो, वह तुम्हारे आशाओं का स्रोत होना चाहिए। जिस दिन हो जाएगा तुम्हारे आशाओं का स्रोत तो तुमको यह कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि मैंने इस आदमी पर विश्वास किया और इसने मेरे साथ विश्वासघात किया। क्योंकि जो हृदय की बात है, वह हृदय की बात है। उसमें विश्वासघात नहीं होता है। जब उसको जानने की बात है जो तुम्हारे घट में बैठा हुआ है उसमें विश्वासघात नहीं होता है। वह साक्षात् चीज है। जो शांति की ओर चलता है उसके साथ विश्वासघात नहीं क्योंकि वह शांति को जानता है, समझता है, जानना चाहता है, उस पर विश्वास करना चाहता है।

यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम क्या चाहते हैं अपने जीवन के अंदर। निराशा किसी को अच्छी नहीं लगती, दुःख किसी को अच्छा नहीं लगता, परंतु दुःख से बचने के लिए सब चाहते हैं। निराशा से बचने के लिए सब लोग निकलते हैं। सब चाहते हैं कि निराशा ना हो। परंतु जबतक तुम ऐसा स्रोत नहीं ढूंढोगे जिस स्रोत से सिर्फ आशा ही आशा निकले तब तक कैसे संभव होगा कि तुम्हारे जीवन के अंदर वह दुख नहीं होगा, वह निराशा नहीं होगी, क्योंकि तुमको मालूम ही नहीं है।

अब जैसे लोग कुआं खोदते हैं और कुआं खोदते हैं तो वह सूख जाता है, जब सूख जाता है तो फिर दिक्कत होती है। फिर जब बारिश का मौसम आता है तो थोड़ा-बहुत पानी उसमें पड़ता है तब भरता है। भाई! यही बात है एक ऐसा कुआं चाहिए जो हमेशा गर्मियों में भी, सर्दियों में भी, बारिश में भी और सूखे समय में भी हमेशा उसमें पानी रहे, ऐसी क्या चीज है ? वह तुम्हारे अंदर है इसीलिए तुम भाग्यशाली हो, इसीलिए तुम भाग्यशाली हो, क्योंकि वह चीज तुम्हारे अंदर है तुमको प्यासा मरने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुम्हारे अंदर एक ऐसा कुआं है जिसमें हमेशा पानी रहता है।

अचरज देखा भारी साधू, अचरज देखा भारी रे।।

बिन भूमी के महल खड़ा है, तामे ज्योत उजारि रे।

अँधा देख देख सुख पावे, बात बतावे सारी रे।।

कैसी चीज! ऐसी चीज तुम्हारे अंदर है।

पंगु पुरुष चढ़े बिन सीढ़ी, पीवे भर भर झारी रे।।

बिन बजाए निशदिन बाजें, घंटा शंख नगारी रे।

बहरा सुन सुन मस्त होत है, तन की खबर बिसारी रे।।

ऐसी चीज तुम्हारे अंदर है। तुम्हारे अंदर है। परन्तु जबतक तुम उस चीज को अपने जीवन का, इन चीजों का स्रोत नहीं बनाओगे और दुनिया की तरफ देखोगे तो कोई बाजी हारोगे, कोई बाजी जीतोगे और जीत भी गए फिर बाजी लगाओगे फिर हारोगे। तो यही सारा चक्कर दुनिया के साथ हमेशा चलता रहता है। जबतक हम अपने आप को जानेंगे नहीं, पहचानेंगे नहीं, जबतक हम अपने जीवन को सचेत रूप में जीयेंगे नहीं, जबतक हमारा हृदय आभार से भरा नहीं रहेगा तब तक कुछ ना कुछ, कुछ ना कुछ, कुछ ना कुछ इस संसार के अंदर होता रहेगा।

अब यह जो समय आया इस समय में इसकी कल्पना लोगों ने नहीं की थी, क्योंकि इतना सबकुछ भरा हुआ था लोगों के अंदर, इतना अभिमान भरा हुआ था कि "जी! अब तो हम ऐसे समय में रहते हैं कि देखो हमारे पास यह है, हमारे पास वह है, हमारे पास जी पी एस है, हमारे पास सैटेलाइट्स हैं, हमारे पास जहाज हैं, हमारे पास हवाईजहाज हैं, हमारे पास यह है, हमारे पास वह है। इसने सारी सिवलिज़ैशन को, सारी सिवलिज़ैशन को एकदम ब्रेक लगा दिया है। अब यह अच्छी बात है, बुरी बात है!

देखिये! मैं बैठकर खुश नहीं हो रहा हूं कि यह कोरोना वायरस हो रही है। क्योंकि मेरा तो बहुत बड़ा प्रोग्राम बना हुआ था कि "यहां जायेंगें, वहां जायेंगे।" अब यह समय आ रहा है, "मेरे को साउथ अफ्रीका में होना था" और लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं वहां। परन्तु उनको मालूम है कि मैं नहीं आ सकता। क्योंकि न तो मैं उड़ सकता हूं — आने नहीं देंगे मेरे को अंदर और कोरोना वायरस की वजह से प्रोग्राम तो हो नहीं सकते। मेरे को कोई खुशी नहीं है, परंतु जब सोचता हूं इसके बारे में कि हम लोग किस दिशा में जा रहे थे और कितनी तेज उस दिशा में जा रहे थे और इस कोरोना वायरस ने एकदम ब्रेक लगा दिया कि "नहीं! तुम कहीं नहीं जा रहे हो!"

देखो क्या है! तुम अपने आप को देखो क्या है! छोटी-सी बात लोगों को कहा कि "तुम अपने घर में रहो, अपने घर में रहो" — लोग नहीं रह सकते। "अपने साथ रहो" — लोग नहीं रह सकते। "शांतिपूर्वक रहो" — लोग नहीं रह सकते। यह हाल है इस दुनिया का, यह हाल है इस दुनिया का। यह हो रहा है इस दुनिया के अंदर। किसी से कहो “थोड़े दिन शांति से बैठ जाओ!” नहीं, बैठ नहीं सकते — यह चाहिए, वह चाहिए, परेशान हो रहे हैं। परेशान हो रहे हैं क्यों ? अपने साथ नहीं रह सकते ना। अपने आपको नहीं जाना। अब अपने साथ कोई रहने के लिए बोलता है तो उनको दुख लगता है, उनको अजीब लगता है। अजीब लगता है! अजीब!! अरे! किसी गैर के साथ रहने में अजीब नहीं लगता है, पर अपने साथ रहने में अजीब लगता है। तो कहीं ना कहीं तो उलटी गंगा बह रही है यह — कहीं ना कहीं तो यह उलटी गंगा बह रही है। जैसा उसको बहना चाहिए वैसे नहीं बह रही है।

तो यह समझने की बातें हैं। और सबसे बड़ी बात तो यही है कि जो चीज जिसकी आपको तलाश है वह आपके अंदर है। कोरोना वायरस हो या नहीं हो अपने जीवन में उस चीज को पहचानो। और सबसे बड़ी बात कि वही चीज आपके आशाओं का स्रोत बने तो आपके जीवन के अंदर धन्य-धन्य होगा। वही आपके शांति का स्रोत बने तो सचमुच में आपके जीवन के अंदर शांति होगी। और वही आपके आनंद का स्रोत बनें तो आपका सारा जीवन आनंद से भर जाए।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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