लॉकडाउन — उन्तीसवां दिन

प्रेम रावत के साथ (हिंदी में अनुवादित)
Apr 18, 2020
"प्रेम में कोई सीमा नहीं होती; प्रेम में कोई दीवार नहीं होती; प्रेम में कोई दूरी नहीं होती; प्रेम में कोई ऊंचाई नहीं होती; प्रेम में कोई गहराई नहीं होती। प्रेम के लिए कुछ भी असम्भव नहीं होता। प्रेम में कोई बाधा नहीं होती।" — प्रेम रावत / प्रेम रावत जी "पीस एजुकेशन प्रोग्राम" की वीडियो श्रृंखला को प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान आपके लिए उनके पूर्व प्रकाशित अंग्रेजी लॉकडाउन वीडियो जो हिंदी में अनुवादित है, प्रस्तुत हैं।

प्रेम रावत:

सबको नमस्कार! उम्मीद है आप सब ठीक हैं; सेहतमंद हैं — और इस लॉकडाउन में भी आनंद ले रहे हैं। और दोबारा से, सवालों के साथ आगे बढ़ते हुए, “मैं देख सकता हूं कि मेरे बच्चे जीवन में कहां पर हैं; मेरी पिक्चर को उन्होंने खराब कर दिया है पूरी तरह से। पिता होने के नाते मेरी जिम्मेदारी है कि यह देखूं कि वह सही रास्ते पर चलें। मैं यह कैसे करूं ? मुकेश!”

जी अच्छा, दिलचस्प सवाल है। आप इस लॉकडाउन में अपने बच्चों के साथ हैं और देख रहे हैं कि वह कैसे उस तरीके से नहीं हैं जैसा आप ने उन्हें बड़ा होते हुए सोचा था। तो, मैं आपको इसका जवाब देने की कोशिश करता हूं। क्या आप बच्चों को कहते रहते हैं कि उन्हें कैसा होना चाहिए — या आप उन्हें बातचीत का हिस्सा बनाते हैं अपने साथ ? क्या आप उनकी सलाह लेते हैं, यह पूछकर कि क्या किया जाना चाहिए — और उन्हें समझाना कि क्या होगा आगे ? और फिर उन्हीं से समाधान भी पूछना ताकि उनकी मदद से कार्य पूरा हो। और सिर्फ उनसे समाधान ही नहीं पूछना, लेकिन उनकी मदद भी करना ताकि उनकी सलाह लेते हुए और उनकी बातें मानना भी; उस सलाह को लेना।

तो आपके बच्चों के साथ, आप उन्हें बताते हैं कि क्या करना है — और उम्मीद करते हैं कि वो मानेंगे। आप अपने दोस्तों के साथ, जबकि, बिल्कुल वैसा ही करते हैं, जैसा अभी मैंने आपको बताया है; आपकी जो भी समस्या है वह बताते हैं — उनके साथ बैठकर समाधान पर सलाह-मशवरा करते हैं। और फिर उनकी सुनते हैं और वही करते हैं, अगर आपको सलाह अच्छी लगती है तो।

अब इसमें थोड़ा-सा समय लगेगा। आपके बच्चे पहले ही दिन अच्छे जवाब नहीं देने वाले — क्योंकि उन्हें जवाब नहीं मालूम है। उन्हें भरोसा करना होगा आप पर। पर उनकी क्षमता को कम मत समझिए। उन्हें बेवकूफ मत समझिए सिर्फ इसलिए क्योंकि आप पिता हैं। तो उन्हें आप इज्जत दीजिए — और वो आपको इज्जत देंगे। इज्जत लेने के लिए इज्जत देनी भी पड़ती है। इसमें दो लोग लगते हैं कि एक ही बात पर अमल करें और बात आगे बढ़े।

तो उनसे उनकी सलाह पूछिए कि "यह कैसे होगा; वह कैसे होना चाहिए ?" ऐसा ही तो करते हैं आप जब हॉस्पिटल जाते हैं। आप डॉक्टर के पास जाते हैं और कहते हैं "डॉक्टर मेरे हाथ में दर्द है। मैं क्या करूं कि यह ठीक हो जाए ?" फिर डॉक्टर आपको सलाह देता है और आप वह बात मान लेते हैं। अगर डॉक्टर आपसे कहे कि "मैं आपका हाथ काटने वाला हूँ," तो आप कहेंगे, "जी नहीं, यह तो बस खरोंच है। और यह बताइए कि आप मेरा हाथ क्यों काटना चाहते हैं ?" और वह कहता है कि "मुझे हाथ काटना पसंद है।" तो आप कहेंगे "नहीं, मुझे आप एक डॉक्टर के तौर पर पसंद नहीं हैं; मैं किसी और के पास जाऊंगा।"

इसमें वह भरोसा लगता है जो आप अपने परिवार के साथ बनाते हैं, अपनी पत्नी के साथ, बच्चों के साथ। अपने परिवार में तानाशाह होना चाहते हैं आप। पर मेरी मानिए, यह आप पर ही भारी पड़ जाएगा। आप इस समय (मुझे नहीं पता कि आपके बच्चे कितने बड़े हैं), लेकिन अगर आप पिक्चर्स को फाड़ने की बात कर रहे हैं, सुनिए, आपका साम्राज्य बिखरने वाला है — अगर आप चीजें ऐसे नहीं करते जिसमें बच्चे को समाधान का हिस्सा बनाना है… मैंने बच्चों को समाधान निकालते देखा है, जो ढंग से बात भी नहीं कर सकते थे, वो बच्चे, इतने छोटे। आपको उनसे पूछना है "तो तुम्हें क्या लगता है; क्या लगता है यह कैसे होगा ?" और वो समाधान निकाल लेंगे, “हम क्या कर सकते हैं।”

अगर बच्चा स्कूल में अच्छा नहीं भी कर रहा, जैसे कि "तुम कैसे स्कूल में अच्छा करने वाले हो ?" और उनकी बात सुनकर; फिर उन्हें सोचने देना कि क्या वह सोचने लायक नहीं हैं ? वह बिल्कुल सोचने लायक हैं — और मेरी मानिये आप हैरान होंगे; आप बहुत, बहुत हैरान हो जाएंगे; जब आपको पता चलेगा कि वह काफी सोचने की क्षमता रखते हैं। तो कृपया, सबसे पहले, अपने बच्चों को इज्जत दीजिए — अगर आप उनसे इज्जत चाहते हैं तो — और उन्हें फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल कीजिए अपने साथ।

पता है, ऐसे मत बन जाइये — सभी नेता बुरे नहीं होते, लेकिन कुछ नेता, वो आते हैं — और आपका वोट लेने के लिए कुछ भी कह देते हैं। फिर उसके बाद आपको किनारे कर देते हैं बिल्कुल दरकिनार। (मुझे नहीं पता क्यों, किसी भी वजह से।) तो ऐसे मत बनिए; ऐसे बिल्कुल मत बनिए। एक पिता का यह मतलब नहीं होता, एक पिता बनिए। आप एक तानाशाह नहीं हैं; आप एक पिता हैं; आपको गुलाम इकट्ठे नहीं करने अपने लिए। आपको गुलाम नहीं बनाने। आप एक पिता हैं — और आपको देखना है कि बच्चों को फैसला लेने की प्रक्रिया को सिखाना भी है, बाकी सभी चीजों के अलावा।

मैं देखना चाहता हूं कि इतने लोगों ने जो बनाया है, अपने सामने एक असंभव कार्य — क्योंकि वह नहीं चाहते, “बच्चों को शामिल करना” — क्योंकि जब शामिल करते हैं, फिर एक समूह बन जाता है, एक टीम। जब आपका परिवार होता है — फिर आपके पास सिर्फ परिवार नहीं, एक टीम होती है। और जब वो टीम है, आपको साथ मिलकर काम करना है। यह कमाल का होता है; यह बढ़िया है। और साथ में काम करना बढ़िया हो सकता है, कितना सुंदर हो सकता है यह। तो आपको इस बात पर काम करना होगा। उम्मीद है इसका मतलब कुछ बना होगा। यह रहा एक रफैल से — "मैं और कुछ नहीं चाहता बस यह कि जीवन के हर पल में उपस्थित रहूँ। क्या हम अपनी भूमिका प्यार के साथ रहते नहीं निभा सकते, अपने जीवन में हर रोज के काम करते हुए भी क्या यह संभव है कि दोनों को साथ में लाएं काम और तज़ुर्बा दोनों को, क्या हम इतने सक्षम बन सकते हैं ?"

हां, हम अपना किरदार निभा सकते हैं — पर ये सब सचेतना से ही करना होगा। पर फिर, सबसे पहले मुझे एक सवाल पूछना है आपसे, "क्या इसकी भी कोई पिक्चर आपने मन में बनाई हुई है कि यह कैसा दिखता है ?" क्योंकि अगर है, आप खुद को फंसा रहे हैं; आप विफलता के लिए तैयार हो रहे हैं। कई लोगों में यह बात होती है, जैसे कि "अब आप पर ऐसा होने वाला है, अब यह स्थिति आने वाली है और सब लोग आजाद होंगे और यह होगा।" और कई लोग दुनिया में ऐसे हैं जो इस तरह की बातें करते हैं। पर यही बातें हमें धोखा देती हैं और इन बेहद आसान-सी चीजों को असल में नामुमकिन बना देती हैं। तो कृपया पहले इस पिक्चर को छोड़ दें। और फिर, फिर जो होगा वो होने दीजिये, बस यही बात है। आप समझ रहे हैं….

तो एक और सवाल, "मैं इस जीवन में आया और मुझे बहुत ही ज्यादा घबराहट है,” यह भेजा है सिलेस्ट ने; “मैं सोचता हूं क्या खुद को बदल सकता हूं मैं ?"

हां, आप घबराना छोड़ दीजिए। आप जितना अपने जीवन के नियंत्रण में हैं और जो कुछ भी हो रहा है उसके भी नियंत्रण में, उतना ही घबराने की वजह कम होंगी आपके जीवन में। और हां, बिल्कुल, कभी-कभी ज्यादा घबराहट हो जाती है, इसके लिए फिर आपको डॉक्टर के पास जाना पड़ता है फिर मनोवैज्ञानिक से मिलना पड़ता है जो आपकी मदद कर पायें। लेकिन जितना आप जीवन को नियंत्रित करते हैं, घबराहट उतनी ही कम होगी आपके जीवन में। तो मुझे उम्मीद है इससे मदद मिलेगी।

"क्या कुछ शब्द हैं प्रेरणा के” — यह विक्टोरिया ने भेजा है — “क्या कुछ शब्द हैं प्रेरणा देने के लिए ताकि मैं हर रोज को अपने नियंत्रण में कर पाऊं ?" हां, आश्वस्त रहें। समझें कि नियंत्रण का अर्थ क्या है!

ऐसा नहीं कि अचानक से ही, आप वो मिक्की माउस बन जाएंगे, वह जादूगर जो उंगली हिलाकर झाड़ू को उसकी जगह से बुलाता है ताकि अपने आप फर्श साफ होने लग जाये और बाल्टी में पानी भरने लगता है और ऐसी ही चीजें। यह इसके बारे में नहीं। यह आपके बारे में है पूर्ण होना है अस्तित्व से — खुद को समझें, यह कहना कि "हां, ठीक है, अगर यह काम नहीं किया मैंने, मैं ठीक रहूंगा तब भी। मैं ठीक हूं। मैं ठीक हूं।" “ऐसा नहीं कि अगर यह नहीं हुआ तो मैं खत्म हो जाऊंगा।” ऐसे काम नहीं चलेगा। “मैं तब भी ठीक रहूंगा, मैं ठीक रहूंगा।”

अगर आप बीन्स उबाल रहे हैं; यह एक आपदा है; बीन्स सब जगह फैल गए हैं — परेशान ना हों; पिज्जा ऑर्डर कीजिये। अंत में, आपको खाना ही तो चाहिए बस। उस दिन बीन्स मत खाइए; बीन्स को अगले दिन बना लीजिए। जो सीखा है उससे कल बेहतर बनाइए और अच्छी बीन्स बनाइए, मुसीबत मत होने दीजिये।

कभी-कभी इतना आसान होता है। कभी-कभी बिल्कुल, यह इतना आसान नहीं होता — लेकिन हर रोज, इसकी अहमियत को समझें — और आपका किस पर नियंत्रण है। आपको पता होना चाहिए कि किस पर नियंत्रण है और किस बात पर नियंत्रण नहीं है। और कई लोगों को पता ही नहीं होता कि किस पर नियंत्रण नहीं है और वह उन्हीं चीजों पर नियंत्रण पाने की कोशिश करते हैं; ऐसे विपत्ति आ जाती है। एक मुसीबत आ जाती है। आपको किस पर नियंत्रण करना है ? जो महसूस करते हैं। यह स्थिति नहीं है; यह आपकी प्रतिक्रिया है। यह तो बिल्कुल साफ है। तो अपने जीवन में हर रोज मेहनत कीजिए, सचेत रहें और आगे बढ़ते रहें।

"मैं अभी समझा कि जीवन में फंसा हुआ हूं, कोविड वायरस की वजह से नहीं — क्योंकि मैं तो इसके बीच ही था; मुझे वायरस था, पर मैं ठीक हो गया — कुछ लक्षण थे, कुछ गंभीर नहीं थे। मेरी परेशानी है, मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या चल रहा है। हिम्मत मुझमें है, इसलिए मैं उठकर काम पर जाता हूं। लेकिन बुजुर्ग अकेले मर रहे हैं और उनके पास कोई मौका नहीं है इंटेंसिव केयर की अनुमति न मिलना उम्र की वजह से, एक संख्या है बस — सच में। मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो 86 या 92 की उम्र में 50 वालों से ज्यादा चुस्त हैं। और एक डॉक्टर होने के नाते, मेरी जिम्मेदारी खबर देने की है बस, यह नहीं कि बीमार हैं, लेकिन परिवार को बताना। यह बहुत बुरा है। मैं इस शर्म को कैसे संभालूं ? मैं जानता हूं मेरे हाथ में नहीं है; लेकिन इतनी शर्म क्यों आ रही है ?"

नहीं, आपको शर्म नहीं आनी चाहिए। आपको शर्म नहीं आनी चाहिए। आप एक अजीब स्थिति में हैं, काफी अजीब स्थिति है।

अर्जुन ने युद्धभूमि में कहा, उसके बीच में — और अर्जुन ने बिल्कुल यही कहा था कि "मैं नहीं लड़ना चाहता; मैं जानता हूं इन लोगों को। मैं इन्हें मारने के लिए जिम्मेदार नहीं होना चाहता। यह बहुत ही बुरा होगा तो मैं यह नहीं करूंगा।"

फिर कृष्ण ने कहा "करो — करो जो तुम्हें करना है; अपना काम करो। परिणाम की चिंता मत करो; अपना कर्म करो।" सिर्फ यह बात… यह है इंडिया में बहुत बड़ी चीज — और गीता में एक खंड है पूरा कर्म पर, जिसमें लिखा है "कर्म करो; फल की चिंता मत करो!"

आप डॉक्टर हैं; अपना काम कीजिए। आपने इतने लोगों की मदद की है। आप मदद करना जारी रखिये। शर्म को बीच में मत आने दीजिये। क्या हो रहा है ? बुरे फैसले। शायद इतिहास इसका गवाह बनेगा, इस पर सोचेगा, बुरे फैसले जो कुछ नेता ले रहे हैं, अजीब-सी बातें, अजीब से निष्कर्ष। और मुझे लगता है यह चलेगा बहुत, बहुत लंबे समय तक।

क्योंकि लोगों के पास अपना गुस्सा या अपना डर या जो भी वो व्यक्त करना चाहते थे उसके लिए उनके पास संसाधन नहीं थे, पहले के समय में — लेकिन अब वह संसाधन हैं। और इसलिए मुझे लगता है यह बहुत, बहुत लंबे समय तक चलेगा। मैं आपको कहूँगा कि शर्म बिल्कुल महसूस मत कीजिये; आपको शर्म नहीं आनी चाहिए। आप में हिम्मत होनी चाहिए, आगे बढ़ने के लिए — और इस हिम्मत को लें, शंका को दूर करें; मैं यही कहता हूं, “दूर हटाइए शंका को!” यह शर्म यहां से हटा दीजिए। यह हृदय से नहीं आती; यह दिमाग से आती है। यह तर्क और वजह खोजने से आती है।

लेकिन इस आग के बीच में यह समय सोचने का नहीं है कि आग कहां से शुरू हुई; कैसे शुरू हुई। सबसे अच्छी बात है, आग से लड़ें। तो अब मैं यही कह सकता हूं कि — आप डॉक्टर हैं — “आप शर्म का एहसास मत कीजिए; इसे हटाइए आगे बढ़ें और लोगों की मदद करें, जितनी हो सके उतनी मदद करें। उन्हें प्यार दें, उनकी देखभाल करें — उन्हें वो दीजिए, वह आराम जो सिर्फ आप ही दे सकते हैं।” तो आपके साथ अच्छा हो।

यह है मलेशिया से यसोथा ने भेजा है मेरा सवाल है — "जिन लोगों को वायरस लगता है वह हॉस्पिटल वार्ड में जाते हैं और अगर हालत बुरी हो तो आईसीयू में अगर वह जिन्दा नहीं बचते, तो मृत्यु हो जाती है। परिवार के लोगों को देखने नहीं दिया जाता। क्या यह सच में वही है कि आप अकेले आए हैं और आप अकेले जाते हैं और हॉस्पिटल के लोग ही आपको दफना देते हैं ? यह बहुत उदास करने वाला है; मरीज के लिए बुरा लगता है, वह अपने परिजनों को देखना चाहते हैं, पर नहीं देख सकते। आप क्या सोचते हैं ? अगर हृदय पूर्ण हो, फिर उनको क्या बुरा नहीं लगेगा ?"

अब मैं इसमें कुछ मतलब बताता हूं। मैंने यह नियम बिल्कुल नहीं बनाया कि वह एक-दूसरे को नहीं देख पायें — पर एक बात मैं जानता हूँ कि प्यार सीमाएं नहीं जानता; प्यार दीवारें नहीं जानता; प्यार दूरी नहीं जानता; प्यार ऊंचाई नहीं जानता; प्यार गहराई नहीं जानता। प्यार के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। उसे रुकावट नहीं पता। आप जिनसे प्यार करते हैं; उनसे प्यार करते रहेंगे और हमेशा करते ही रहेंगे।

क्या होता है — जब आप यहां उन्हें याद करते हैं। कम से कम, वो जो चले गए हैं वो उदास तो नहीं हैं। उन्हें नहीं पता; वो तो चले गए हैं। यही तो मतलब है “जाने का” वो जा चुके हैं। उस दिमाग को छोड़ गए हैं जो तर्क देता रहता है, आंखें जो पहचानती हैं; आंखें जो देखती हैं, कान जो सुनते थे… और जब यह एक अलग दुनिया में हैं, उस विचार से, उस तर्क से। आपको उन्हें प्यार करना है; यही तो है आपके हिसाब से उनकी याद, जो वो पीछे छोड़ गए हैं। वो आप में रहते हैं, आपके मां-बाप दादा-दादी, वो आपके भीतर रहते हैं।

हां, यह बहुत बुरा है, एक दुर्घटना। पर यही तो करता है यह दानव। सबसे अच्छी बात प्यार करना है। आप क्या कर सकते हैं — आपको यही याद रखना है, किसी भी स्थिति में, “क्या है, जो मैं खुद कर सकता हूं ?” यह नहीं कि “मैं क्या नहीं कर सकता।” यह तो समय की बर्बादी होगी। पर इस स्थिति में, हर रोज जब यह चल ही रहा है, आपको याद रखना है कि आप क्या कर सकते हैं। आप अब भी प्यार कर सकते हैं, प्यार, प्यार और प्यार।

आप सुरक्षित रहें और आप खुश रहें!

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