महिला सशक्तीकरण (Mahila Sashaktikaran)

महिलाओं के प्रति भेदभाव को कैसे खत्म किया जा सकता है?
Feb 25, 2019
इस प्रकृति में सभी का योगदान है, बस, उसे स्वीकार करें और एक होकर के आगे चलें।

प्रश्नकर्ता:

प्रेम रावत जी, महिला सशक्तिकरण आज हमारे समाज का एक अहम मुद्दा है। महिलाओं को अवसर देने के लिये बहुत से प्रयास हो रहे हैं और कहीं-कहीं विरोध भी देखने में आता है। महिलाओं के प्रति अपने नजरिये को हम किस तरह से और स्वतंत्र और बड़ा बना सकते हैं?

प्रेम रावत :

देखिए! प्रकृति का एक नियम है कि अगर आप इस प्रकृति में कहीं भी देख लीजिए! अगर आपका कोई योगदान नहीं है तो प्रकृति ने उस चीज को, जिसका कोई योगदान नहीं है, कोई पर्पज़ नहीं है, उसको पहले ही खतम कर दिया। अब एक समय था कि डायनासोर थे! और जो कुछ भी माहौल था, वो डायनासोर्स के लिए खतम हो गया जब, उनकी कोई जरूरत नहीं रही तो प्रकृति ने कहा — जाओ! तो इस प्रकृति में मनुष्य भी है — और मर्द भी है और औरत भी है। इसका मतलब है, सबका योगदान है। तो हम काहे के लिए डरते हैं ? ये चीजें — जो विभाजन होता है कि "नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए। इनको नीचे रखना चाहिए। ये करना...!" ये डर से होता है। अब लोग समझते हैं कि डर से नहीं होता है, पर डर से होता है। बिना औरत के, कोई मर्द पैदा नहीं होता है। और लोग भूल जाते हैं इस बात को। भाई! तुम आए कहां से ? तुम आए कहां से ?

तो जो आदर मिलना चाहिए, जो सत्कार होना चाहिए, वो नहीं करते हैं लोग। उनको डर है कि अगर औरतें — उनको बढ़ावा दिया गया तो वो सारा, सबकुछ रूल करने लगेंगी। नहीं। डर से नहीं, प्यार से, सबको एक साथ लेकर अगर हम आगे चलेंगे तो बहुत दूर तक पहुंच जाएंगे। क्योंकि जो हमारी शक्ति इन विभाजनों में अटक जाती है, वो हमको धीमे कर रही है। सारे समाज को धीमे कर रही है।

तो यह तो समय आ गया है साथ का। सबको साथ होना चाहिए और फिर आगे चलेंगे और सबका कोई न कोई योगदान है, इसीलिए वो यहां हैं। प्रकृति के रूप में अगर देखा जाए तो सभी का कुछ न कुछ योगदान है। और जबतक योगदान है तो उस योगदान को रेकग्नाइज़ करना चाहिए। मैंने तो यह देखा है कि कई बार पुरुष जो हैं, किसी बात को लेकर अटक जाते हैं और उसका हल औरतों को मालूम होता है कि "तुम अटके हुए हो, इसको इस तरीके से देखो!"

तो अगर गाड़ी आगे चलानी है यह, तो ये जो चारों चक्के हैं, इनको एक ही दिशा में चलना पड़ेगा। अगर चारों चक्के अलग-अलग दिशा में चलने लगें तो यह गाड़ी कहीं नहीं जाएगी। और यही हो रहा है! पर समय आ गया है — अब तक जो होते आया है, होते आया है। पर अब समय आ गया है कि हम सब एक होकर के आगे चलें।

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