हिम्मत का समय: पाँचवी कड़ी (ऑडियो)

श्री प्रेम रावत द्वारा, हिम्मत, आशा और विवेक का हार्दिक संदेश
May 29, 2021
"यह जिंदगी मज़ाक नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि इस शरीर में, इस समय, वह शक्ति है, वह रोशनी है, उसका अनुभव करना है।" — प्रेम रावत

प्रेम रावत जी:

सभी लोगों को हमारा नमस्कार!

और हिन्दुस्तान में तो समस्या कोरोना वायरस को लेकर बहुत ही गंभीर है। खैर, मैं बहुत कुछ कह सकता हूँ इसके बारे में, परन्तु यह समय नहीं है दोष देने का। यह समय है एकता का और एक-दूसरे की मदद करने का। क्योंकि सबसे बड़ी चीज तो यह है कि हम लोगों की मदद कैसे कर सकते हैं कि इस बीमारी को फैलायें ना, मास्क पहनें, हाथ धोएं और आइसोलेशन में रहें। आज उसी को लेकर के काफी सारे प्रश्न हैं लोगों के, मैं पढ़ना चाहता हूं।

तो यह कोलकाता से प्रश्न आया है कि "इस महामारी से जहां इंसान काफी डरे हुए हैं, हर तरफ से बुरी खबर आ रही है और लोग अपनी हिम्मत खो रहे हैं और जितना भी कोशिश करते हैं अपने अंदर हिम्मत लाने की लेकिन फिर थोड़ी देर के बाद जैसे ही कोई बुरी खबर आती है तो फिर से घबराने लगते हैं कि अब क्या होगा! ऐसी परिस्थिति में हम अपने आपको कैसे संभालें और इस परेशानी से बाहर कैसे निकलें ?"

तो देखिये, यह बहुत ही गंभीर बात है और सचमुच में घबराने वाली बात भी है। परन्तु इस सारे माहौल के बीच में एक चीज और हो रही है। ठीक है, बुरी तरीके से लोग पेश आ रहे हैं इस चीज से, परेशान हैं इस चीज से, इस कोरोना वायरस से और बहुत इस संसार को छोड़कर जा भी रहे हैं, परन्तु इन सारी चीजों के बीच में एक आप हैं और आपके अंदर यह स्वांस आ रहा है और जा रहा है। अब यह बात मैंने बहुत पहले कही हुई है, परन्तु इसका महत्व इस समय क्या है वह बहुत ही ज्यादा महत्व है, बहुत ही बड़ी बात है कि इस सारे माहौल में, इस माहौल के बीच में आपके अंदर यह स्वांस आ रहा है और जा रहा है। चाहे कैसी भी खबर बाहर से आये, पर अंदर की खबर क्या है! अंदर की खबर है कि अभी भी आपके अंदर यह स्वांस आ रहा है और जा रहा है। उस, जिसने सारे संसार की रचना की है, वह अभी भी आपके अंदर है। वह शक्ति अभी भी आपके अंदर है। यह भी एक खबर है। इन सारी खबरों के बीच में, यह हो गया, वो हो गया, वहां वो गया, वहां वो गया — इन सारी खबरों के बीच में एक और खबर है और वह खबर है कि आप अभी जीवित हैं। यह खबर सुनी ? यह मैं बताऊंगा खबर। क्योंकि यह सबसे बड़ी खबर है, इसको भूल मत जाना। चाहे कितनी भी चीजें आये बाहर से, जो घबराने वाली हों, परन्तु यह एक खबर है जिससे मनुष्य घबरायेगा नहीं और जबतक आप जीवित हैं आपके अंदर हिम्मत है। आप कुछ कर सकते हैं और जो कर सकते हैं वह कीजिये। यह है समय शांत होने का। मैं लोगों से कहता हूँ "शांति तुम्हारे अंदर है" कोई ध्यान नहीं देता है। जरूरत नहीं है, क्योंकि कभी सोशल मीडिया के बीच में जा रहे हैं, कभी ये कर रहे हैं, कभी वो कर रहे हैं।

मन के बहुत तरंग हैं, छिन छिन बदले सोय ।

एकै रंग में जो रहै, ऐसा बिरला कोय ।।

सारी दुनिया बदलती रहती है उसके पीछे सब लोग भाग रहे हैं, कोई ये कर रहा है, कोई वो कर रहा है, कोई वो कर रहा है, कोई वो कर रहा है और अब आयी कोरोना वायरस और इसने सारे-सारे विश्व को बैठा दिया। सारे विश्व को इसने बैठा दिया, बैठ जाओ। किसके साथ रहोगे तुम ? अपने साथ रहोगे तुम। तो जो अपने को जानता ही नहीं है, अपने को समझता ही नहीं है, वह अपने साथ कैसे रहेगा! होना तो ये चाहिए, होना तो ये चाहिए कि मनुष्य को अगर अपने साथ रहना पड़े तो उसको कोई संकोच नहीं होना चाहिए। मैं ढंग की बात कह रहा हूं कि नहीं ? उसको कोई संकोच नहीं होना चाहिए। उसको अपने घर में जाते हुए कोई संकोच नहीं होना चाहिए। उसको अपना खाना खाते हुए कोई संकोच नहीं होना चाहिए। उसको अपने पलंग पर लेटने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। उसको अपना पानी पीने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। यही तो हम कोशिश करते हैं! यही तो हम कोशिश करते हैं।

देखिये, मेरे को मालूम नहीं है कि आप कभी अपने बच्चों को लेने के लिए स्कूल गए। हो सकता है आपके बच्चे ही ना हों, पर फिर भी आपने देखा होगा कि बच्चों को लेने के लिए स्कूल जाते हैं माँ-बाप। कभी पिता जाता है, कभी माँ जाती है। तो उनको हजारों बच्चे आ रहे हैं, हो सकता है 500 बच्चे हों, 600 बच्चे हों, 1000 भी हों उनको उन 1000 में से कुछ लेना-देना नहीं है, एक बच्चा जो उनका है उसको वो देखना चाहते हैं। बच्चे आ रहे हैं, कोई उनका रिएक्शन नहीं है, कोई ये नहीं है कि आओ और जैसे ही वो जो उनका है, जैसे ही उसको देखते हैं उनके मुंह में मुस्कान आ जाती है। अपना जो है अगर इसको हम नहीं जानते, तो फिर किस चीज को जानते हैं ? जो अपना है अगर उसी को नहीं पहचानते हैं, तो क्या पहचानते हैं ? जो अपना नहीं है तो इसका मतलब है कि जो अपना बच्चा है उसको तो कोई ले नहीं रहा है, कोई लेने के लिए आया ही नहीं है और सारे बच्चे जो हैं उनको इकट्ठा करके अपने कार में रख रहे हैं। तो ऐसे कैसे काम चलेगा ? यह तो गलत बात है। यह तो गलत बात है।

अगर आप ट्रेन स्टेशन पर जाते हैं या हवाईअड्डे पर जाते हैं, अपनी पत्नी को लेने के लिए जाते हैं या अपने पति को लेने के लिए जाते हैं या अपने भाई को लेने के लिए जाते हैं तो कितने ही लोग वहां से गुजर रहे हैं उनसे आपका क्या लेना-देना है, कुछ लेना-देना नहीं है। परन्तु एक व्यक्ति जिसको आप लेने के लिए आये हैं, उसको पहचानना बहुत जरूरी है। उसको पहचानना बहुत जरूरी है। तो यह तो हालत हो गयी है हमारी इस दुनिया में कि हम अपने आपको नहीं जानते हैं और सबकुछ जानते हैं। और सबकुछ जानने के लिए हम अपने आपको खोने में मजबूर हो गए हैं। इसका परिणाम क्या होगा ? देख लीजिये क्या परिणाम है इसका! लोग व्याकुल हो जाते हैं। अपने साथ नहीं रह सकते, क्योंकि समझते ही नहीं हैं कि वह कौन हैं। ये जानते हैं यह मेरा है। यह कहने के लिए तो बिलकुल तैयार हैं, यह मेरा है, यह मेरा है, यह मेरा है, यह मेरा है, यह मेरा है, पर मैं कौन हूं यह किसी को नहीं मालूम। तो जब मैं कौन हूं नहीं मालूम है, तो 'यह मेरा है' यह कैसे आपको मालूम कि यह किसका है ?

तो ये दुनिया में ऐसे ही सारे चक्कर रहते हैं। एक खबर है कि आप अभी जीवित हैं, इस खबर को भी सुनिये। इसको भी सुनिये और इसका क्या मायने है, इसको भी समझिये। क्योंकि यह खबर जो है, यह एकदम ताज़ा खबर है। यह अब की खबर है — कल की नहीं, परसों की नहीं, यह अब की खबर है कि आपके अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है, आप जीवित हैं। इसको मत भूलिए। आगे बहुत कुछ होना है। पर आगे बहुत कुछ, जो कुछ भी होना है ध्यान जाना चाहिए कि इस समय क्या हो रहा है। तो यह बहुत जरूरी बात है।

दूसरा प्रश्न, उत्तराखंड से आया है — "मैंने आपका "हिम्मत का सन्देश" कार्यक्रम देखा। आप कहते हैं कि मनुष्य अपने साथ रहना भूल गया है। जब हम आइसोलेशन में रहते हैं, तो बहुत निराश हो जाते हैं। जमाने के साथ रहते हुए खुद के साथ समय कैसे बितायें ? ऐसा क्या किया जाए कि अपने साथ रहने में बोरियत न हो ?"

बोर, बोर हो जाते हैं लोग, अपने साथ — दूसरों के साथ नहीं, अपने साथ, क्योंकि अपने को नहीं समझते हैं। अपने को नहीं जानते हैं। क्या चाहिए ? वही वाली बात है कि मनुष्य मेले में गया। मेले में जब बच्चा जाता है कभी गुब्बारे देखता है, कभी ये देखता है, कभी वो देखता है। ये सारी चीजें लगी हुई हैं, लगी हुई हैं, लगी हुई हैं, लगी हुई हैं और एक ऊंगली जो उसने पकड़ी हुई है, वो ऊंगली कितना जरूरी है उसको पकड़ना, वो वह भूल जाता है। और धीरे-धीरे उसका ध्यान भटकते-भटकते-भटकते गुब्बारों में जा रहा है कभी, खिलौनों में जा रहा है कभी, खाने पर जा रहा है कभी, यहां जा रहा है कभी वहां जा रहा है, उस ऊंगली को छोड़ देता है। जब वह ऊंगली को छोड़ देता है, तो जिस चीज ने उसका ध्यान भटकाया वह वहां अभी भी है। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे उसको एहसास नहीं होता है कि क्या हो गया, खो जाता है। फिर जब उसको यह एहसास होता है कि कितनी जरूरी बात है कि वो ऊंगली मैंने पकड़ी हुई है और जब अपनी माँ या पिता की तरफ देखने की कोशिश करता है तो वहां कोई है ही नहीं। तब क्या हाल होता है ? तब क्या हाल होता है ? वो सारी चीजें जो उसको, जिसके कारण उसने वो ऊंगली छोड़ दी वो तो अभी भी वहां हैं, पर अब उसमें कोई भी दिलचस्पी उस बालक की नहीं है। जिस चीज के बारे में मैं आपसे कह रहा हूं वह बोरिंग की बात नहीं है।

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं, मुनिजन सहस अठासी।

सोई हंस तेरे घट माहि, अलख पुरुष अविनाशी।।

अगर आपको उसकी दोस्ती, उससे मिलन हो जाए, उसके साथ रहना हो तो क्या आप बोर होंगे ? बोर होना चाहिए ?

अरे, मन के पीछे क्या भाग रहे हैं आप! इस दुनिया के पीछे क्या भाग रहे हैं आप! यह दुनिया मतलब की है और जिस दिन आप इसके पीछे नहीं भाग रहे होंगे, यह आपको छोड़ देगी। इस दुनिया के पीछे भागना वैसे ही भागना है जैसे कुत्ते कार के पीछे भागते हैं। आपने देखा होगा, कुत्ते कार के पीछे भागते हैं। तो जैसे कुत्ते कार के पीछे भागते हैं, वैसे ही मनुष्य जो इस माया में लगा हुआ है वह वही कर रहा है। तो कुत्ता क्या समझता है कि वह कार पकड़ लेगा ? अगर पकड़ भी लेगा तो करेगा क्या उसके साथ ? खा तो सकता नहीं है उसको। करेगा क्या, कुछ नहीं करेगा। इस जिंदगी के अंदर तुम हो।

देखो, तीन चीजें हैं — एक तो वो है जो था, है और रहेगा, वह तुम्हारे अंदर है। “सोई हंस तेरे घट माहि, अलख पुरुष अविनाशी” — जिसका कभी नाश नहीं होगा, जो हमेशा है। और एक तुम हो, जो नहीं थे, हो और आगे नहीं रहोगे। तुम तो हो बीच में। एक तरफ तो है वह अलख पुरुष अविनाशी, जो था, है, रहेगा। बीच में हो तुम, जो नहीं थे, हो और आगे नहीं रहोगे और तुम पीछे किसके भाग रहे हो ? पीछे भाग रहे हो उसके जो न थी, न है, न रहेगी। जिसको कहते हैं 'माया'।

लोग हमसे, जब हम यह बात कहते थे लोगों से तो लोग कहते थे कि "जी आप प्रैक्टिकल बात नहीं कर रहे हो, प्रैक्टिकल बात होनी चाहिए। अब कर लो प्रैक्टिकल। क्या करोगे ? गवर्नमेंट ने तो साफ कह दिया, आइसोलेशन में रहो। क्या करोगे ? एक मास्क पहनने में लोगों को दिक्कत हो गयी है। अरे, ठीक है यह बीमारी बहुत बड़ी बीमारी है, परन्तु इसका इलाज भी तो बड़ा सरल है। आइसोलेशन में रहो, मास्क पहनो और हाथ धोओ। कम से कम छह फीट का वास्ता रखो, डिस्टेंस रखो लोगों से। सरल बात है, परन्तु यह भी करने में लोगों को संकोच होता है।

एक और है, यह आया है रायगढ़ से प्रश्न। नहीं, यह वाला है, बोकारो से — "मेरे जान-पहचान के बहुत सारे लोगों का इस कोरोना महामारी से देहांत हो गया है और रोज न्यूज़ चैनलों पर मरने वाली न्यूज़ सुनकर मेरे अंदर एक डर पैदा होता है। कृपया आप मेरी मदद करें मैं इस डर से कैसे बाहर निकलूं ?”

डरने का समय नहीं है यह। डरने से होगा क्या ? कभी डरने से कुछ हुआ है ? कभी डरने से कुछ हुआ है ? किसी का भी कुछ हुआ है ? किसी का कुछ नहीं हुआ है। डरने का समय नहीं है, हिम्मत का समय है। जो है उस चीज को देखो। क्या है ? तुम जीवित हो, इस चीज को क्यों नहीं देख रहे हो ? यह भी तो है। ठीक है, लोग मर रहे हैं, ये है, वो है। अरे, हमारे — हमको दुःख होता है, हम तो अमेरिका में बैठे हुए हैं, परन्तु जब सुनते हैं कि कितने लोगों के साथ ये हो रहा है हमें सचमुच में बहुत दुःख होता है। फिर क्या ऐसा नहीं होना चाहिए! सबसे बड़ी बात तो इस बीमारी की यह है कि जो कुछ भी इससे हो रहा है यह बड़ी आसानी से टाला जा सकता था, परन्तु लोगों ने जहां ध्यान नहीं दिया, तो वहां टाल नहीं सके और ऐसे लोग हैं — अभी मैं देख रहा था खबर में ऐसे लोग हैं, जिनके ट्रांसप्लांट हो रखे हैं। जैसे गुर्दे ट्रांसप्लांट हो गये या उनका दिल ट्रांसप्लांट हो गया और उनलोगों के साथ, यह अभी खबर आयी है कि वो जो लोग हैं जिनका ट्रांसप्लांट हुआ है, तो उनको गोली लेनी पड़ती है कि रिएक्शन न हो, ट्रांसप्लांट का।

तो उनके साथ यह चक्कर चल रहा है कि जब कोरोना वायरस का वो वैक्सीन लेते हैं, तो कोई उससे इम्युनिटी होती ही नहीं है। वो काम ही नहीं कर रहा है। तो कम से कम उनलोगों के लिए, उनलोगों की खातिर, जो लोग वृद्ध हैं उनके खातिर कम से कम हम अपने, जो कुछ भी हम कर सकते हैं, मास्क पहनें। अरे, अपने लिए नहीं करना है तो मत करो, परन्तु दूसरे लोग भी तो हैं। दूसरे लोग भी हैं। कम से कम एक-दूसरे का — यह तो मान-सम्मान नहीं भी करना है, तो कम से कम यह तो करो कि मत इस बीमारी को फैलाओ। यह बहुत जरूरी बात है।

तो डरने से कुछ नहीं होगा। डर की बात नहीं है। तुम्हारे अंदर हिम्मत है, इसको बाहर लाओ। तुम्हारे अंदर शांति की प्यास है, इसको बाहर लाओ। तुम्हारे अंदर अपने को जानने की इच्छा है, इसको बाहर लाओ। तुम भी उस अविनाशी के साथ रहना चाहते हो, उस अविनाशी का अनुभव करना चाहते हो, उसको बाहर लाओ। और जो इच्छायें तुम्हारी हैं आयेंगी, जायेंगी; आयेंगी, जायेंगी, नहीं भी पूरी हुईं तो नहीं भी पूरी हुईं। निराशा की बात नहीं है। निराशा तो उस चीज की होनी चाहिए और अगर डर ही कर रहना है तुमको, तो क्या कहा है कि —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास।

और जो चितवे नाम बिनु, सोई काल की फांस।।

वही चीज, चिंता अगर किसी चीज की करनी है तो उस चीज की चिंता करो, तुम्हारे अंदर अभी भी जीवन है और इसको स्वीकार करो, सचमुच में इसको स्वीकार करो और भ्रमित मत हो। तुम्हारे अंदर हिम्मत है, इसको बाहर लाओ।

और यह है रायगढ़ का — "आपने कहा कि हम भाग्यशाली हैं, लेकिन संसार में इतना अँधेरा है कि हमको रोशनी दिखाई नहीं दे रही है। अपने भाग्य को हम कैसे पहचानें ? वर्तमान परिस्थितियों में कैसे सुख और शांति प्राप्त हो ?"

ठीक है, आपको बाहर रोशनी नहीं दिखाई दे रही है, कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। बाहर रोशनी दिखाई दे न दे, अंदर तो रोशनी दिखनी चाहिए। अंदर तुम्हारे रोशनी है। बाहर चाहे कितना भी अँधेरा हो, अगर अंदर रोशनी है तो तुम्हारे लिए सबकुछ है। इस, हम बात करते हैं दीये की, पर एक दिन मैं सोच रहा था दीया बुझा भी हो सकता है, परन्तु जो रोशनी है, वह रोशनी है। चाहे वह दीये में हो, चाहे वह लकड़ी जलने से हो, चाहे किसी भी चीज से हो रोशनी तो रोशनी है और तुम्हारे अंदर एक रोशनी है। क्यों रोशनी है ? क्योंकि वो जो सब चीजों की रोशनी है, वह तुम्हारे अंदर विराजमान है। जबतक तुम उस रोशनी को देखना शुरू नहीं करोगे, जबतक तुम्हारे जिंदगी के अंदर वो रोशनी का उजाला नहीं होगा तबतक तुम समझ नहीं पाओगे कि यह जिंदगी क्या है। अगर सचमुच में देखा जाए तो कितना बड़ा जोक है यह। एक दिन पैदा हुए, कुछ दिनों के लिए रहते हैं और उसके बाद चले गए। कहां गए, किसी को नहीं मालूम। वापिस आने का कोई मतलब नहीं है। कहां से आये, यह नहीं मालूम। कहां जायेंगे, यह नहीं मालूम। चंद दिनों के लिए जिंदा हैं और वह भी समय इतनी जल्दी गुजर जाता है कि पूछिए मत।

यह तो मज़ाक है। कैसा मज़ाक है! कैसा मज़ाक है! तो फिर ऐसा क्यों कहा जा रहा है कि — बड़े भाग्य मानुष तन पावा — क्यों ? इस जिंदगी का अस्तित्व क्या हुआ ?

अगर यही होना है कि एक दिन पैदा हुए, एक दिन जाना है, चंद दिन रहना है और अपने साथ कुछ ले जा नहीं सकते। ऊपर से अपने साथ कुछ ले जा नहीं सकते और कोशिश कर रहे हैं, कर रहे हैं, कर रहे हैं, कर रहे हैं, कर रहे हैं हर दिन, हर रात। किसी को अपने बेटे की लगी है, किसी को अपनी बीवी की लगी है , किसी को अपनी पत्नी की लगी है, किसी को अपने बाप की लगी है, किसी को अपने चाचा की लगी है, किसी को अपनी गाय की लगी है, किसी को अपनी भैंस की लगी है। किसी को कुछ न कुछ, कुछ न कुछ, कुछ न कुछ, कुछ न कुछ, कुछ न कुछ, कुछ न कुछ लगा हुआ है और न अपनी भैंस साथ ले जा सकते हो, न अपनी बीवी साथ ले जा सकते हो, न अपना बेटा साथ ले जा सकते हो, न अपनी चाची साथ ले जा सकते हो, न अपना चाचा साथ जायेगा, कोई भी नहीं जाएगा।

किसी को अपने घर की पड़ी है, घर भी साथ नहीं जाएगा। किसी को अपनी घड़ी की पड़ी है, वह भी साथ नहीं जाएगी। किसी को अपने सूट की पड़ी है, वह भी साथ नहीं जायेगा। लो भला बताओ, इतनी मेहनत करके तो सबकुछ इकट्ठा किया और ये भी सब साथ नहीं जाएगा। तो ये कैसे हो गया ? ये कैसे हो गया ? तो यह तो मज़ाक है, परन्तु यह जिंदगी मज़ाक नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि इस, इस शरीर में, इस शरीर में, इस समय, इस समय —

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं — ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिसका ध्यान करते हैं —

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं, मुनिजन सहस अठासी।

सोई हंस तेरे घट माहि, अलख पुरुष अविनाशी।।

क्योंकि वह है, क्योंकि वह शक्ति है, वह रोशनी है, अँधेरा नहीं है, तो उसको बाहर लाना है। उसको, अपने अंदर उसका अनुभव करना है। तो यह बहुत जरूरी चीज है।

यह दिल्ली से आया है — "मैंने अंजन टीवी पर आपका कार्यक्रम देखा। आपने हिम्मत की बात की। आपके कार्यक्रम का शीर्षक भी है "हिम्मत का समय".... आपको इस टाइटल का विचार कहां से आया ?

भाई, हिम्मत का समय है। यह तो जब भी, जब भी बुरा समय मनुष्य का आता है, हिम्मत की जरूरत है। जब सबकुछ उसके अनुकूल हो रहा है, तब उसको हिम्मत की जरूरत नहीं है, परन्तु एक बात का ख्याल रखो। जब सबकुछ बढ़िया चल रहा है, तो सबसे सावधान तब ही होना चाहिए। अब यह मैंने कैसे कह दिया कि जब सबकुछ बढ़िया चल रहा हो, तब सबसे ज्यादा सावधान होना चाहिए। तो मैं आपको छोटी-सी बात सुनाता हूं। अगर प्याला एकदम भरा हुआ है, ऊपर तक भरा हुआ है और उसको आप एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हैं, तो आपको कितना ध्यान देना पड़ेगा ? धीरे, बड़ा सावधान होकर के चलना पड़ेगा या नहीं ? जब सबकुछ बढ़िया हो रहा है, जब सबकुछ बढ़िया है तब मनुष्य को सबसे सावधान होना चाहिए। जो प्याला भरा हुआ नहीं है उसको ले जाने में क्या सावधानी! तो जब बुरा समय आता है, हिम्मत की जरूरत है और जब अच्छा समय भी चल रहा है तब भी हिम्मत की जरूरत है कि ध्यान बंटे ना और ध्यान उस चीज पर रहे जो चीज हमारे अंदर है।

तो आगे और प्रश्न हैं काफी सारे आये हुए हैं, उनका और भी जवाब देंगे।

कृपया हिम्मत से काम लें और आपके अंदर जो चीज विराजमान है उसको मत भूलो। कोई भी खबर बाहर से आये, कितनी भी बुरी खबर आये यह मत भूलो कि आपके अंदर अभी यह स्वांस चल रहा है।

सभी लोगों को मेरा नमस्कार!

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