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अच्छा बुरा 00:09:17 अच्छा बुरा Audio Duration : 00:09:17 हर एक व्यक्ति में 50 प्रतिशत अच्छाई है और 50 प्रतिशत बुराई है।

प्रेम रावत:

एक बार एक काफिला था, जो एक जगह था। तो एक दिन एक लड़का, एक बच्चा, जो काफिले का सरदार था, उसके पास आया और उसने अपने सरदार से कहा कि "सरदार! मेरा एक सवाल है।"

कहा, "क्या ?"

कहा, "मैं देखता हूं कि कुछ लोग — जो अच्छा महसूस करते हैं, जो अच्छे हैं, कई बार वो बुरा काम करते हैं, बुरी चीज करते हैं और वो लोग, जो बुरी चीज करते हैं, कई बार वो अच्छा करते हैं। जो लोग खुश रहते हैं, वो कई बार दुःखी हो जाते हैं और जो लोग दुःखी रहते हैं, फिर कई बार वो खुश हो जाते हैं। ऐसा क्यों है ?"

सरदार ने कहा, "हर एक मनुष्य के अंदर दो शेर हैं। एक अच्छा शेर है और एक बुरा शेर है। और दोनों शेर आपस में लड़ते हैं।"

उसने सोचा। सोच के वो बोलता है, "फिर क्यों लड़ते हैं ?"

कहा, "इसलिए लड़ते हैं कि तेरे पर काबू कर सकें।"

फिर सोचा उसने। कहा, "सरदार! जीतता कौन है ? कौन-सा शेर जीतेगा ? अंत में कौन-सा शेर जीतेगा ? अच्छा वाला या बुरे वाला ?"

सरदार ने कहा, "जिस शेर को तू खिलाएगा, वही जीतेगा।"

कहानी तुमको पसंद आयी ? बुरे शेर को खिलाओगे, वो जीतेगा। वो तुम पर काबू करेगा, तुम पर राज करेगा। अच्छे शेर को खिलाओगे, वो जीतेगा, वो तुम पर काबू करेगा, तुम पर राज करेगा। अच्छे वाला शेर अच्छा है, बुरे वाला शेर बुरा है।

समझे ? तो किस शेर को खिलाते हो तुम ?

बुरे वाले शेर को खिलाओगे, वही जीतेगा। तुमको गुस्सा करने में कितनी देर लगती है ? तुमको निराश होने में कितनी देर लगती है ? क्या मतलब है इसका ? कौन-से शेर को खिला रहे हो ?

कई लोग तो ये समझते हैं, "हमें बुरे शेर को कुछ नहीं खिलाना चाहिए।"

तो वो किसी को कुछ नहीं खिला रहे हैं। अच्छे शेर को खिलाना जरूरी है! अगर अच्छा चाहते हो तुम अपने जीवन में तो अच्छे शेर को खिलाना जरूरी है! बुरे शेर से संबंध मत बनाओ! उससे न बात करो, न उसके पास जाओ, न उसको कहो कि ‘‘तू बुरा शेर है!’’ अच्छे शेर की देखभाल करो, उसको खिलाओ, हर समय उसको खिलाओ, ताकि वो बलवान हो!

तो अगर तुम यह महसूस करते हो कि तुम बड़ी आसानी से निराश हो जाते हो, अगर तुम यह महसूस करते हो कि बड़ी जल्दी से गुस्सा हो जाते हो, आशाएं टूट जाती हैं, अपने आपको तुम भ्रमित पाते हो, कभी यहां की सोचते हो, कभी वहां की सोचते हो, कभी — ये कैसा है, वो कैसा है ? इसका क्या उत्तर है ? ये ऐसा है, वो वैसा है — इन सब चीजों में लगते हो। इसका मतलब है कि तुम बुरे शेर को खिला रहे हो।

अच्छे शेर को खिलाओगे, तब वो कहेगा, "तेरे को इसकी क्या फिक्र है, उसकी क्या फिक्र है ? अगर तेरे को फिक्र करनी है तो इसकी फिक्र कर, जो तेरे अंदर आ रहा है, जा रहा है। जिसके न आने से तू कुछ भी नहीं कर पायेगा!"

अरे! विटामिन तो ठीक है — ये ऐसी विटामिन है कि इसके बिना एक दिन भी नहीं चलोगे तुम। एक दिन तो छोड़ो, तीन मिनट! तीन मिनट! और ये जब तक चल रहा है, इसकी तरफ तुम ध्यान नहीं देते हो और जब ये बंद होने लगता है, तब तुम्हारा ध्यान जायेगा। तो इसका मतलब है कि तुमने अपने सारे जीवन भर बुरे शेर को खिलाया। वो तुम्हारा बलवान है, वो तुमको खाएगा और उससे बड़ा नर्क हो नहीं सकता! जो आदमी स्वर्ग में बैठा-बैठा नहीं जानता है कि वह स्वर्ग में है, इससे बड़ा नर्क क्या हो सकता है ?

तो समझो! ध्यान देने से सबकुछ होगा। उस चीज को अपनाने से सबकुछ होगा। जो तुममें अच्छाई है, उसको उभरकर बाहर आने दो। जितना बाहर आएगी, उतना ही तुम्हारे जीवन के अंदर और सुंदरता आएगी। जो शांति है, उसको आने दो बाहर। अशांति को नहीं।

ये सारी चीजें तुममें हैं। तुममें बुराई भी है और तुममें अच्छाई भी है। और कितनी बुराई है और कितनी अच्छाई है ? हर एक व्यक्ति में, हर एक मनुष्य में 50 प्रतिशत अच्छाई है और 50 प्रतिशत बुराई है।

कोशिश करो! कोशिश करो इस शांति के लिए, इस आनंद के लिए, अपने जीवन को सफल बनाने के लिए। इसमें ज्यादा समय नहीं लगता। इसमें ज्यादा समय नहीं लगता। अच्छाई में रोशनी जब आती है, कितना समय लगता है और रोशनी जब जाती है तो अंधेरे को आने में कितना समय लगता है! रोशनी अंधेरे को हटाती है। ये तो दो बहनें हैं — एक तरफ रोशनी है और एक तरफ अंधेरा है। बस, फ़र्क इतना है कि ये एक-दूसरे को नहीं जानते। पर रहते बहुत नजदीक हैं। बहुत नजदीक हैं! जैसे ही रोशनी जाती है, तुरंत अंधेरा आता है। और जैसे ही — जब रोशनी चली जाती है, अंधेरा ही अंधेरा हो जाता है। बहुत नजदीक हैं एक दूसरे के पर एक दूसरे को नहीं जानते। क्योंकि अंधेरे ने कभी रोशनी को नहीं देखा, रोशनी ने कभी अंधेरे को नहीं देखा।

अच्छाई भी है, बुराई भी है। तुम्हारी अच्छाई, तुम्हारी बुराई को नहीं जानती और तुम्हारी बुराई तुम्हारी अच्छाई को नहीं जानती पर रहते ये एक ही में हैं। तुममें रहते हैं। हममें रहते हैं। और ये हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि मैं उस शांति तक पहुंच सकूं, जो मेरे अंदर अच्छाई है, उस तक मैं पहुंचूं, उसको मैं आगे बढ़ावा दूं और आनंद लो! क्योंकि इसका — इसका सारा सार यही है। सच्चिदानन्द! सत् ये है और जब मेरा चित्त इसमें लगेगा तो क्या मिलेगा ? आनंद मिलेगा। ये सारा — चक्कर ही सारा आनंद का है।

मैं कह रहा था न, दो मौज हैं। एक तो दुनिया की मौज है और एक अंदर की मौज है। अंदर की मौज करोगे तो अंदर की मौज में कितने भी तुम बुड्ढे हो जाओ, कोई अंतर नहीं आएगा।

क्या है असली जरूरत 00:02:54 क्या है असली जरूरत Video Duration : 00:02:54 मेरी असली जरूरत क्या है ? मेरा हृदय क्या मान रहा है, किस बात को जरूरत मानता है।

प्रेम रावत:

हम आज इस संसार को देखें तो जरूरतों के बल पर यह चल रहा है। भूख लगती है, खाना चाहिए। प्यास लगती है, पानी चाहिए। विश्राम चाहिए। नींद आती है, सोने की जगह चाहिए और इन कुछ जरूरतों को लेकर के सारे संसार के अंदर कितना बिज़नेस होता है।

ये जो दुनिया चल रही है आज, ये इसलिए चल रही है कि मनुष्य की कुछ जरूरतें हैं और उनको पूरा करना है। और जो संसार के अंदर लोग हैं जरूरतों को पूरा करने के लिए, हर दिन कुछ न कुछ करते रहते हैं, करते रहते हैं, करते रहते हैं, करते रहते हैं।

वो जरूरतें जो मनुष्य की निजी जरूरतें हैं, उनको पूरा करने के लिए मनुष्य कभी परेशान नहीं होता है। परंतु वो जरूरतें जो सोसायटी ने, जो इस दुनिया ने हमारे ऊपर डाल रखी हैं, थोप रखी हैं, उनको पूरा करने के लिए मनुष्य परेशान जरूर होता है।

भागता है, ये करता है, वो करता है।

जब तक मैं जीवित हूं, मेरी असली जरूरत क्या है ? नकली नहीं! इस संसार की दी हुई जरूरतें नहीं। मेरी असली जरूरत क्या है ? मेरा हृदय क्या मान रहा है, किस बात को जरूरत मानता है। मैं अपने जीवन में कम से कम जो यहां आया हूं, अपनी असली जरूरत को तो पूरा करके जाऊं। सारी जरूरतें मेरी कभी पूरी नहीं होंगी। तो जब सारी जरूरतों को पूरा नहीं कर पायेगा, तो कम से कम एक main जरूरत तो जरूर होगी जिसको पूरा कर सकता है

Text on screen:क्या है असली जरूरत ?

तुम असली में कौन हो 00:15:30 तुम असली में कौन हो Video Duration : 00:15:30 समझो कि ये स्वांस तुम्हारे अंदर जो आ रहा है, जा रहा है, ये क्या है, जिसकी वजह से...

प्रेम रावत:

जो कुछ भी हम सुनते हैं, क्या हम जो सुनते हैं, उसको समझते भी हैं ? उस पर अमल भी करते हैं या नहीं? क्योंकि सिर्फ सुनना पर्याप्त नहीं है। किसी चीज को सुन लिया, किसी ने कुछ कह दिया कि —

"भाई! तुम्हारा जीवन, जो तुमको मिला है, वो बड़े भाग्य से मिला है। और यहां जो तुम हो, जबतक तुम जीवित हो, तुम इसका पूरा-पूरा फायदा उठाओ!"

ये तो कितनी बार हमलोगों ने सुना होगा! एक बार नहीं, हजारों बार सुना होगा। पर इसमें अमल कितने लोग करते हैं ?

जैसे ही घर पहुंचेंगे, तो घर की सारी समस्याएं तुम्हारा इंतजार कर रही हैं। उनको कहां जाना है ? वो कहां जाएंगी ? और चंद मिनटों के बाद तुम उन्हीं चीजों में लग जाओगे, जो तुमको दुःख देती हैं, जिसकी वजह से तुम अपने आपको भाग्यशाली नहीं समझते हो। तुम समझ पाओ कि ये स्वांस तुम्हारे अंदर जो आ रहा है, जा रहा है, ये क्या है, जिसकी वजह से तुम जीवित हो। 

एक बात मैं किसी से कह रहा था — सारी दुनिया स्वर्ग और नरक के चक्कर में पड़ी हुई है, "ये करोगे, वो करोगे तो नरक में जाओगे, ये करोगे, वो करोगे, स्वर्ग में जाओगे।" तो कहां जाएंगे, इसकी सबको पड़ी हुई है। पर कहां से आए, यह कोई नहीं पूछता। कहां जाएंगे — "ये करो, वो करो!" कहां से आए? यह किसी को नहीं मालूम, कहां से आए।

अब बात बताने के लिए लोग बोल देते हैं, "तुम पिछले जन्म में हाथी थे, तुम पिछले जन्म में घोड़ा थे, तुम पिछले जन्म में कीड़े थे, तुम पिछले जन्म में कॉकरोच थे, तुम पिछले जन्म में ये थे, वो थे।" सबूत किसी के पास नहीं है। क्योंकि वो भी ये न बोलते, अगर तुम उस — जो एक चीज है, जो तुम्हारे में एक ताकत है झूठ और सच की, अगर तुम उसको इस्तेमाल करते तो फिर कोई नहीं बक-बक करता।

मतलब, जहां जाओ, उसकी बात नहीं है। बात वो है कि एक जगह है, जहां अगर तुम नहीं गए तो तुम चाहे कहीं भी चले जाओ, तुम कहीं नहीं गए।

और क्या होगा तुम्हारे साथ?

दो दीवाल हैं। एक दीवाल से निकल के आए और दूसरी दीवाल से जाना है। और उसके बीच में है तुम्हारी जिंदगी। कहां से आए ? किसी को नहीं मालूम। और जब दूसरी दीवाल के अंदर घुसेंगे, कहां जाएंगे ? यह किसी को नहीं मालूम। ये दो दीवाल हैं! इसके बीच में है तुम्हारा खेल! उस दीवाल के उधर नहीं है और इस दीवाल के उधर नहीं है। इस दीवाल के इधर है और इस दीवाल के इधर है। इसमें तुम हो। तुम्हारे रिश्ते, तुम्हारे दोस्त, तुम्हारा सुख, तुम्हारा दुःख, तुम्हारी चिंताएं, सब इसके बीच में हैं।

यह जो समय मिला है, तुम कहां लगे हुए हो ? इन दो दीवालों के बीच की सोचने के लिए नहीं। कहां जाता है मनुष्य का ध्यान ? इस दीवाल के उस तरफ क्या है ? फायदा क्या हुआ ? फायदा क्या हुआ ? फायदा क्या हुआ ? क्योंकि वो तो होना ही है। वो तो होकर रहेगा। उसको टालने के लिए तो बहुत लगे हुए हैं पर वो कभी टलेगी नहीं। जब यह हो गया कि तुम इस दीवाल के इस तरफ आए तो अब उस दीवाल के उस तरफ तुमको जाना है। यहां जो जवान लोग बैठे हैं, उनको  यह बात समझ में नहीं आती है।

जवान हैं न ? "नहीं। अभी तो सारी जिंदगी है आगे।"

देखो! जब तुम पैदा होते हो, तुमको कोई ध्यान नहीं है, तुम कौन हो, क्या हो, क्या करते हो, क्या करना है, क्या है, क्या नहीं है ? एक-एक मिनट के आधार पर तुम जीते हो। सबकुछ ठीक है, सबकुछ ठीक नहीं है। भूख लगी है — ऐं! तकलीफ है, क्योंकि डाइपर किसी ने चेंज नहीं किया है तो — ऐंऽ! नींद आ रही है, सो नहीं रहे हैं तो — ऐंऽऽ! उससे मां को पता लग जाता है कि कोई चीज ठीक नहीं है। त,त,त,त,त,त सुला देती है! सोना क्या है ? जागना क्या है ? कुछ नहीं मालूम। यही चक्कर चलता रहता है, चलता रहता है, चलता रहता है, चलता रहता है।

इसमें लगभग समझो — 10 साल लग जाएंगे। फिर अगले 10 साल में सब चक्कर होगा। उसी अगले 10 साल में “टीन एजर” बनोगे। सिर्फ 10 साल में। उसी 10 साल — जैसे पहले 10 साल, वैसे ही दूसरे 20 साल में और 10 साल में तुम “टीन एजर” बनोगे और “टीन एजर” से बाहर भी निकलोगे। नाइनटीन! बस! फिर ट्वेंटी।

फिर अगले 10 साल में, सिर्फ दस साल में — दस साल की बात हो रही है। पहला दस साल, दूसरा दस साल, तीसरा दस साल — सारी दुनियादारी के चक्कर में पड़ोगे। शादी! कोई जब 30 का होने लगता है — ऐंह! उससे पहले ही ये सबकुछ होता है। नौकरी लग जाती है, ये ..! क्योंकि नौकरी लग जाए, फिर शादी भी अच्छी होगी। ग्रेजुएट भी उसी में होना है। अगर कोई डिग्री लेनी है कॉलेज से, वो भी उसी में होगी। ये सबकुछ कर-करा-करके सारी अच्छी तरीके से तुम अगले उस दस साल में फंस जाओगे।

फिर अगले दस साल में तुम क्या करोगे?

फंसे रहोगे। पहले दस साल में उस चक्कर से तुम, निकलने की तुम्हारी इच्छा भी नहीं थी। अगले दस साल में उससे भी तुम्हारी निकलने की इच्छा नहीं थी। अगले दस साल में उससे भी निकलने की इच्छा नहीं थी, परंतु ये जो होंगे अगले, तुम्हारी इच्छा होगी — कैसे निकलें ? फिर ध्यान जाएगा तुम्हारा रिटायरमेंट की तरफ, जो अगले दस साल में होना है। रिटायर भी होना है और होगा क्या ? पहले मंदिरों का चक्कर काटते थे, अब अस्पतालों का चक्कर काटोगे —

"उंह! ये हो गया, वो हो गया! डॉक्टर साहब! ठीक कर दो!"

यही होना है सबके साथ। चाहे कोई अमेरिका में हो, चाहे कोई हिन्दुस्तान में हो, चाहे कोई ऑस्ट्रेलिया में हो, चाहे कनाडा में हो; चाहे कोई साउथ अमेरिका में हो, चाहे कोई अफ्रीका में हो। त,त,त,त,त,त,...धड़क, धड़क, धड़क,धड़क, धड़क, धड़क!

तो तुम जब सोचते हो कि तुम्हारे पास बहुत टाइम है तो जरा सोचो कितना टाइम है। ज्यादा टाइम नहीं है। और इसी में करना है, जो कुछ करना है। इसी में समझना भी है, अपने हृदय को भरना भी है, अपने आपको समझना भी है।

तो उसके प्रति तुम क्या कर रहे हो ?

नहीं करोगे तो उस दीवाल से तो निकलना है। ये तो सबका भाग्य है।इसके लिए हमको पंडित-वंडित की जरूरत नहीं है समझने के लिए। ये तो निकलना है। उस दीवाल से तो निकलना है। ये तो हम प्रीडिक्ट कर सकते हैं। ये तो हम भविष्यवाणी कर सकते हैं कि सबको उस दीवाल से निकलना है।

अब रही धारणाओं की, तो धारणाओं के पीछे हम क्या-क्या नहीं समझा सकते हैं तुमको ? जब कोई पैदा होता है तो इस पृथ्वी का बोझ नहीं बढ़ता है, जब कोई आदमी मरता है तो इस पृथ्वी का बोझ कम नहीं होता है। तो इसका मतलब क्या हुआ ? यहीं से तुम्हारा शरीर है और यहीं तुम्हारा शरीर जाकर इन्हीं पदार्थों में, जिनसे तुम्हारा शरीर बना है, उन पदार्थों के साथ मिल जाएगा।

गुब्बारा देखा है कभी ?

उसमें हवा भरो, वो फूल जाएगा। नहीं ?

जबतक वो गुब्बारा फूला हुआ है, तो उसके अंदर की जो हवा है, वो उस बाहर की जो हवा है, उससे बहुत नजदीक है, परंतु विभिन्न है। और जिस दिन वो गुब्बारा फूटेगा, गुब्बारा फिचिक और हवा, उसी हवा के साथ मिल जाएगी, जिस हवा को तुमने भरा।

यह तो जो कुछ भी हम कर रहे हैं, जिस पर हमको इतना घमंड है, जिसको हम टेक्नोलॉजी कहते हैं — घिसीपीटी बात है। क्योंकि मनुष्य कंट्रोल करना चाहता है। हर एक चीज को कंट्रोल करना चाहता है। मौसम को कंट्रोल करना चाहता है, सूरज को कंट्रोल करना चाहता है, पृथ्वी को कंट्रोल करना चाहता है, नदियों को कंट्रोल करना चाहता है।

यह कंट्रोल करने की भावना आई कहां से उसमें ?

ये सब एक ही चीज का परिणाम है। क्योंकि तुम भी अपनी फैमिली को कंट्रोल करना चाहते हो। तुम भी अपने दोस्तों को कंट्रोल करना चाहते हो। और तुम्हारे आसपास जितने लोग हैं, तुम सबको कंट्रोल करना चाहते हो।

जब तुम मूवी देखने के लिए जाते हो, फिल्म देखने के लिए जाते हो, पिक्चर देखने के लिए जाते हो — लाइन जब ज्यादा लम्बी होती है, तुम्हारे दिल में इच्छा नहीं होती है कि तुम्हारे पास कुछ ऐसा हो और लाइन(खत्म)।

हर एक चीज को तुम कंट्रोल करना चाहते हो। क्यों कंट्रोल करना चाहते हो तुम ? कभी सोचा ? पर कंट्रोल करना चाहते हो। पर यह नहीं मालूम कि क्यों कंट्रोल करना चाहते हो।

तुम इसलिए कंट्रोल करना चाहते हो कि तुम अपने आपको नहीं समझते। और अगर तुम अपने आपको समझ जाओ, तुम अपने आपको जान जाओ कि तुम्हारे अंदर की चीज क्या है — उस ज्ञान द्वारा अपने स्थित जो शक्ति तुम्हारे अंदर विराजमान है, उसका तुम अनुभव करो तो तुम समझने लगोगे कि तुम असली में कौन हो।

आपका स्वभाव क्या है 00:08:59 आपका स्वभाव क्या है Audio Duration : 00:08:59 हमारे जीवन में एक आदत है और वह आदत है भूलने की। हम भूल जाते हैं कि हमारा स्वभाव ...

प्रेम रावत:

हमको हमारे जीवन में एक आदत है और वह आदत है भूलने की। हम भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम कौन हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारा स्वभाव क्या है ? हम भूल जाते हैं कि हमारी प्रकृति क्या है ? हम भूल जाते हैं कि हमारी चाह क्या है ? हम भूल जाते हैं कि हमारी जरूरत क्या है ? तो कौन-सी ऐसी चीज है, जिसके भूल जाने से हमारे जीवन के अंदर एक ऐसा माहौल पैदा होता है कि हम समझ नहीं पाते हैं कि ये सबकुछ क्या है ? क्या हो रहा है ? मेरे साथ गलत क्यों होता है ? किसी के साथ सही क्यों होता है ?

ये सारी बातें हम भूल जाते हैं। बात ये है! और सच्चाई है ये! अज्ञानता तुमसे दूर नहीं है और ज्ञान भी तुमसे दूर नहीं है। सुख भी तुमसे दूर नहीं है और दुःख भी तुमसे दूर नहीं है। तुम जहां जाते हो, जो कुछ भी तुम करते हो अपने जीवन के अंदर — जहां भी जाते हो, जो कुछ भी करते हो — सुख और दुःख, दोनों तुम्हारे साथ चलते हैं। अज्ञान और ज्ञान तुम्हारे साथ चलते हैं। अच्छाई और बुराई तुम्हारे साथ चलती है।

अब मनुष्य हो, मनुष्य के नाते तुम्हारी यह प्रकृति है कि दुःख तुमसे सहन नहीं होगा। तुम दुःख को सहन नहीं कर सकते हो। मैं जो बोल रहा हूं ये बात — मैं कितनी ही जेलों में जाता हूं, लोगों को सुनाने के लिए कि जिस शांति की तुमको तलाश है, वो शांति तुम्हारे अंदर है और पहले से ही मौजूद है। उन जेलों में जो लोग पड़े हुए हैं, उनके लिए आशा क्या नाम की चीज है ?

एक आदमी, जिसको दो सौ पचास साल की कैद है, सजा है। दो सौ पचास साल! अर्थात् वो उस जेल से जिंदा नहीं निकलेगा। चाहे वो किसी की भी प्रार्थना कर ले! समझे न मेरी बात! उसका शव ही बाहर निकलना है। तभी उसको आजादी मिलेगी उस जेल से, उससे पहले आजादी उसके लिए संभव नहीं है। तो ऐसे आदमी को क्या कहोगे ? क्या कहोगे ? क्या समझाओगे उसको ?

पर उसको भी समझाना कि तेरे साथ — तेरे कैद में, तेरे जेल में, तेरे सेल में आशा भी तेरे साथ ही लॉक्ड है और निराशा भी तेरे साथ ही लॉक्ड है। दोनों चीजें! और ये जो दीवालें हैं, ये जो खिड़कियां हैं, ये जो लोहे की सलाखें हैं, तेरे शरीर को तो जरूर काबू में, कैद में रख सकती हैं, परंतु एक चीज है तेरे अंदर, जो कभी कैद नहीं की जा सकती। वो कैद में होते हुए भी फरार है। उसको कभी पकड़ा नहीं और न उसको कोई पकड़ सकता है। ये तो हुई बात उस व्यक्ति की, जो दो सौ पचास साल के लिए कैद में है।

अब चक्कर ये है कि जब उन लोगों की बात, मैं उन लोगों को सुनाता हूं जो कैद में नहीं हैं तो वो तो यही सोचते हैं कि ये तो कैदियों की बात कर रहे हैं, हमारे लिए थोड़े ही लागू है ? ऐसी बात नहीं है। तुम भी कैदी हो! तुम भी कैदी हो! वो जो कैद में है, उसके लिए तो बढ़िया है। उसको तीन टाइम का खाना कहां से आएगा, उसको परवाह करने की जरूरत नहीं है। तुम तो हर दिन वो खाना कहां से आएगा, उसकी चिंता करते हो। अच्छा, दूसरी बात! वहां सिक्योरिटी बहुत बढ़िया है। वहां बिना बुलाए कोई नहीं आएगा। तुम तो अपने घर में सलाखें रखते हो, कुत्ते रखते हो, किसी नाइट ड्यूटी वाले को तनख्वाह देते हो। वहां सब प्रबंध है। और तुम भी कैदी हो। और तुम किस चीज के कैदी हो ? अपनी भावनाओं के कैदी हो। अपने विचारों के कैदी हो। उन चीजों ने तुमको कैद करके रखा हुआ है।

तो प्रश्न ये होता है — प्रश्न ये नहीं है कि ब्रह्म कहां है ? पारब्रह्म परमेश्वर जिसे कहते हैं — प्रश्न ये नहीं है कि वो कहां है ? प्रश्न ये है कि अगर वो तुम्हारे अंदर है, अगर वो तुम्हारे अंदर है तो तुम उसको क्यों नहीं जानते हो ? नहीं ? ये हुआ न प्रश्न ?

दुनिया तो प्रश्न करती है, "है जी! है या नहीं है, हमको नहीं मालूम। आप बताइए। है तो हमको जरा दर्शन कराइए! ये करवाइए, वो करवाइए!"

हम कहते हैं, हम प्रश्न पूछते हैं तुमसे कि अगर तुम्हारे अंदर वो पारब्रह्म परमेश्वर है तो यह कैसे संभव है कि तुम उसको नहीं जानते ? क्या हो रहा है कि तुमने उस पारब्रह्म परमेश्वर को नहीं जाना! क्यों ? क्यों ? कौन-सी ऐसी चीज है इस सारे संसार के अंदर, जो उससे ज्यादा महत्व रखती है कि मैं अपने अंदर स्थित उस ब्रह्म को जानूं! है कोई चीज ? हो सकती है कोई चीज ? हो सकती है कोई चीज ?

शांति की ओर 00:02:07 शांति की ओर Video Duration : 00:02:07 शांति तो सबके अंदर है, परंतु उसको हमने मौका नहीं दिया है, उभरने का।

प्रेम रावत

कई लोग हैं, जो धर्म को नहीं मानते हैं। कई लोग हैं, जो भगवान को भी नहीं मानते हैं। पर इसका मतलब ये नहीं है कि वो शांति का अनुभव नहीं कर सकते।

लोग समझते हैं कि ‘‘नहीं, ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा करो, तब जाकर के ये सबकुछ होगा।’’

नहीं। शांति तो सबके अंदर है, परंतु उसको हमने मौका नहीं दिया है, उभरने का। उसको मौका नहीं दिया है, जानने का।

शांति है मनुष्य के अंदर। शांति है वो चीज, जो कि मनुष्य अपने आपको पहचाने। अपने आपको पहचाने कि — मेरी ताकत क्या है और मेरी कमजोरियां क्या हैं। शांति वो है, जब मनुष्य के अंदर, वो जो तूफान आते रहते हैं, उनसे निकलकर के, वो उस चीज का अनुभव करे, जो उसके अंदर है।

हम उस ताकत को, उस शक्ति को, जिसने सारे विश्व को चला रखा है इस समय, वह हमारे अंदर भी है और वो — उसका अनुभव करना, साक्षात अनुभव करना — मन से नहीं, ख्यालों से नहीं, साक्षात अनुभव करना — उससे फिर शांति उभरती है। क्योंकि वो उस चीज का अनुभव कर रहा है, जिसका कि वो एक हिस्सा है और जिसकी कोई हद नहीं है। इन्फीनिट! जिसका कभी नाश नहीं होगा, वो भी उसके अंदर है। और जबतक वो उसका अनुभव नहीं कर लेगा, वो अपने आपको पहचान नहीं पाएगा पूरी तरीके से कि वो है क्या ?

अविनाशी (ऑडियो) 00:09:13 अविनाशी (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:13 जो था, जो है और जो रहेगा! जिसका कभी नाश नहीं होगा, वह है — अविनाशी!

प्रेम रावत:

आइंस्टाइन का नाम सुना है कभी ? बहुत बड़ा वैज्ञानिक, साइन्टिस्ट था वो।

उसने कहा है कि "जिस चीज की रचना हुई है, उसको खत्म भी होना पड़ेगा।"

तो ये सारे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है और इस सबको खत्म होना पड़ेगा। इसमें पृथ्वी भी आ गई, इसमें सूरज भी आ गया, इसमें चन्द्रमा भी आ गया। सबकुछ, जो तुमको दिखाई देता है और नहीं दिखाई देता है ब्रह्माण्ड में, जब ऊपर की तरफ देखते हो — सब खत्म होगा! पानी भी खत्म होगा, हवा भी खत्म होगी, नमक भी खत्म होगा, धरती भी खत्म होगी। मतलब सबकुछ खत्म होगा! इसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। मैं नहीं कर सकता।

अविनाशी वो है कि ये सबकुछ खत्म हो जायेगा, फिर भी वह रहेगा। और अविनाशी न मर्द है, न औरत है, न उसके पैर हैं, न उसका सिर है, न उसको सिर की जरूरत, न उसको पैर की जरूरत, न उसको नाखून की जरूरत, न उसको आँख की जरूरत, न उसको कान की जरूरत। क्योंकि जितनी भी सृष्टियां आकर चली जाएं, वो रहेगा। जो था, जो है और जो रहेगा! जिसका कभी नाश नहीं होगा, उसे कहते हैं — अविनाशी

तुम्हारा दिमाग तो सिर्फ इतना ही बड़ा है। तुम्हारा दिमाग तो सिर्फ इतना ही बड़ा है और जिस दिन तुमको ढंग की चाय नहीं मिलती है, ये दिमाग परेशान हो जाता है। जिस दिन तुम्हारी दाल में थोड़ा-सा नमक ज्यादा हो जाता है तो ये दिमाग परेशान हो जाता है। ये अविनाशी को कैसे समझेगा ? ये अविनाशी को कैसे समझेगा परंतु कहा है कि वही अविनाशी तुम्हारे अंदर है।

और फिर लोग सवाल करेंगे, "अजी! वो अविनाशी हमारे अंदर है तो हमको पता क्यों नहीं लगता?"

एक किताब पढ़ रहा था मैं आज, तो उसमें एक कहानी थी। वो कहानी सुनाता हूं। तो कहानी है, अकबर और बीरबल की!

एक दिन अकबर कहता है बीरबल से कि "अगर भगवान सर्वव्यापक है तो दिखाई क्यों नहीं देता? पता क्यों नहीं लगता, कहां है? बताओ बीरबल!"

अब बीरबल को लगा कि गए! कैसे इसका जवाब दें। तो फिर बीरबल ने कहा, "जी! कुछ दिन की मोहलत दीजिए, हम मालूम करके आपको बताएंगे।"

तो बीरबल गया घर, सिर लटकाया हुआ, दुःखी! कैसे — उसका ये कहना है कि सर्वव्यापक तो है, पर अब इसको कैसे बताऊंगा अकबर को, कैसे दिखाऊंगा, कैसे बताऊंगा कि है ? कैसे उसको prove करूंगा? कैसे साबित करूंगा? अब उसके घर में उसके कुछ रिश्तेदार आए हुए थे और उनका एक लड़का था।
तो लड़के ने कहा, "चाचा बीरबल! क्या बात है, बड़े दुःखी नजर आ रहे हो?"

तो कहा, "मैं दुःखी तो हूं!"

कहा, "क्या हुआ?"

कहा, "हुआ ये कि बादशाह ने ये सवाल पूछा है कि अगर भगवान सर्वव्यापक है, भगवान जब हमारे अंदर है तो हमको दिखाई क्यों नहीं देता ? हमको पता क्यों नहीं है?"

तो लड़का बोलता है, आप चिंता मत कीजिए! कल जाइए आप ठाठ से और बादशाह से कहिए कि "अजी! इस सवाल का जवाब मैं क्या दूंगा, ये मेरा एक छोटा रिश्तेदार है, उम्र में छोटा है, यही आपको बता देगा।"

बीरबल ने कहा, "ठीक है!"

तो दूसरे दिन दोनों गए।

बादशाह हंसा! बीरबल फंसा! कहा, "बीरबल! हमारे सवाल का जवाब है तुम्हारे पास?"

कहा, "हुजूर! मैं क्या आपको जवाब दूंगा, ये तो मेरा रिश्तेदार है, अभी उम्र ज्यादा नहीं है इसकी, यही दे देगा।"

बादशाह बोला, "इतनी बड़ी बात का ये लड़का जवाब देगा ?" बादशाह ने कहा, "ठीक है, जवाब दो!"

तो लड़का बोलता है, "आप बादशाह हैं। हिन्दुस्तान के राजा हैं। आपको इतनी भी कद्र नहीं है कि आपके दरबार में एक मेहमान आया है और आप उसकी जरा ज़र्रानवाज़ी करें!"

तो अकबर को लगा कि बाप रे बाप! तुरंत उसने आज्ञा दी — अच्छा! क्या चाहिए, क्या चाहिए ? क्या चाहिए?

कहा, "ज्यादा नहीं, दो गिलास के — दो दूध के गिलास मंगवा दीजिए!"

दो गिलास लेकर के सिपाही आये और उसके आगे रख दिया।

अब बादशाह कहता है, "जल्दी, जल्दी पीओ आप और हमारे सवाल का जवाब दो!"

कहा, एक मिनट! लड़का बैठा, उस दूध के गिलास में अपनी उंगली डालता है। एक गिलास में एक उंगली और एक गिलास में एक उंगली और उसको ऐसे-ऐसे करने लगता है {उंगली के इशारे से समझाया}। अब घंटा भर बीत गया! बैठे-बैठे बादशाह देख रहा है और उसको लग रहा है कि क्या कर रहा है ये ? दो घंटे बीत गये!

अकबर बोलता है, "मेरे सवाल का जवाब कब दोगे?"

कहा, "धीरज रखिए! अभी तो दो ही घंटे बीते हैं, अभी धीरज रखिए!"

तीन घंटे बीत गये। चार घंटे बीत गये। अब बादशाह से रहा नहीं गया तो कहा, "भाई! क्या कर रहे हो? ये उंगली डाली हुई है दूध के गिलास में। क्या कर रहे हो?"

कहा, "बादशाह! एक बात बताइए, इस दूध में मक्खन है?"

कहा, "हां! है!"

कहा, "मैं मक्खन निकाल रहा हूं!"

बादशाह ने कहा, "ऐसे मक्खन नहीं निकलेगा। ऐसे मक्खन नहीं निकलेगा! इस दूध को जमाना पड़ेगा, तब ये दही बनेगा। दही को फिर बिलोना पड़ेगा, तब जाकर के मक्खन निकलेगा!"

लड़का बोलता है, ठीक इसी तरीके से वो है, पर उसको निकालने के लिए विधि की जरूरत है। अगर तुमको वो विधि नहीं मालूम है तो तुम नहीं जान पाओगे, नहीं समझ पाओगे।

तो अपने आपको जानना — अपने आपको जानना, मतलब आत्मज्ञान!

बिना अपने आपको जाने, बिना आत्मज्ञान के मनुष्य भटक रहा है और भटकेगा।

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