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पहला कदम (ऑडियो) 00:02:48 पहला कदम (ऑडियो) Audio Duration : 00:02:48 सबसे पहला कदम — इस बात को आप जानिए कि आपके अंदर शांति है।

अगर मैं आपको कहूं कि पहला कदम आपका आगे नहीं होगा।

 

ये सब सोच रहे हैं कि आगे कदम लेना है। आगे कैसे बढ़ेंगे ?

 

आगे नहीं लेना है, अंदर की तरफ लेना है। क्योंकि Peace — जो शांति आपको चाहिए, वह आपके अंदर है। अभी भी है। और जब आप गुस्सा होते हैं न, तब भी है और जब आप अपने को कोसते हैं किसी वज़ह से, तब भी है। और जब आप खुश होते हैं, तब भी है। जब आप दुःखी होते हैं, तब भी है और आपके अंदर है।

 

और पहला कदम है, सबसे पहला कदम है कि — इस बात को आप जानिए कि आपके अंदर शांति है। क्योंकि अभी तक जो कुछ सिखाया गया है आपको, वो ये है कि जो आप — जिस चीज की आपको जरूरत है, वह आपके पास नहीं है।

 

खिलौना जो आपको चाहिए था, वो कहां है ?

 

बाजार में है। वो तो जाकर लेना पड़ेगा।

 

एज़ुकेशन जो आपको चाहिए थी, वो कहां है ?

 

वो स्कूल में है। स्कूल में आपको जाना पड़ेगा।

परंतु शांति की जहां बात है, वो बाहर नहीं है, वह आपके अंदर है। और जिस दिन आप यह जान जाएंगे कि — एक, शांति आपके अंदर है और दूसरी, शांति आपकी जरूरत है, चाहत नहीं। क्योंकि चाहत आपकी बदलती रहती है। इसीलिए आपके क्लॉज़ेट में ऐसी चीजें हैं, जो एक दिन आपने खरीदी और आज आप उनको इस्तेमाल नहीं करते हैं। क्योंकि आपकी चाहत बदलती रहेंगी। परंतु जिस दिन आप पता कर लेंगे कि शांति आपकी जरूरत है, उस दिन...

 

क्योंकि आज लोग यही कर रहे हैं, "मैं खोज रहा हूं। मैं शांति को खोज रहा हूं।"

 

तो ये रूमाल मेरे जेब में है। अब ये रूमाल को कहां ढूंढ़ूं मैं ? और कितना ढूंढूं ? कहां ढूंढ़ूं ?

 

मैं चाहे सारे संसार की यात्रा कर लूं, परंतु ये नहीं मिलेगा मेरे को संसार में। क्योंकि मेरी जेब में है और जेब में ढूंढ़ूंगा तो तुरंत मिलेगा। तो यही बात है। तो लोग खोज रहे हैं। मैं कह रहा हूं, खोज रहे हो तो खोजते रहो। खोज लो! आज तक किसी को मिली नहीं खोजने से, क्योंकि वो  तुम्हारे अंदर है।

 

- प्रेम रावत

कौन हूं मैं (ऑडियो) 00:09:27 कौन हूं मैं (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:27 हम अपने बारे में भूल जाते हैं कि हम कौन हैं और क्या हासिल कर सकते हैं अपने जीवन...

मैं कौन हूं ? मैं हूं, ये मेरे को मालूम है, क्योंकि मैं स्वांस लेता हूं, मैं सोच सकता हूं, मैं देख सकता हूं। सुख और दुःख का मैं अनुभव कर सकता हूं।

 

ये सारी चीजें जो मेरी जिंदगी के अन्दर होती रहती हैं, ये क्यों ? क्योंकि मैं जीवित हूं। मुझे मालूम है कि अगर मैं जीवित नहीं रहता तो न मेरे को सुख का अनुभव होगा, न दुःख का अनुभव होगा।

 

हम अपने बारे में भूल जाते हैं कि हम कौन हैं ? मैं यहां क्यों हूं ? क्या कर रहा हूं ? क्या मैं हासिल कर सकता हूं अपने जीवन के अन्दर ?

 

ये है स्टेज। ये है स्टेज और स्टेज में — स्टेज के ऊपर आप हैं। और आप क्या करेंगे, क्या है आपका हिस्सा ? नाचने का है ? गाने का है ? एक्टिंग करने का है ? नहीं, एक्टिंग करने का है ? क्या करने का है ? audience कौन-सी है ? कौन हैं audience में बैठे लोग ? दुनिया कहेगी कि दुनिया है। संसार बैठा हुआ है। संसार नहीं बैठा है। कुछ लोग समझते हैं कि संसार बैठा है audience में और संसार को please करना है। संसार clap करेगा। अगर हम अच्छी एक्टिंग करें, अच्छा गाना गाएं तो संसार clap करेगा। संसार रूपी अगर कोई है तो वो अंधा है, वो कुछ नहीं देख सकता। और बहरा है, कुछ नहीं सुन सकता। और गूंगा है, कुछ नहीं बोल सकता। और न उसके हाथ हैं।

 

तो कौन बैठा है audience में ?

 

मैं आपको बताता हूं, कौन बैठा है audience में। audience में बैठा है आपका हृदय। आपका अपना हृदय जिसको प्यास है अपने बनाने वाले को देखने की। अपने अन्दर स्थित, अपने अंदर स्थित जो परमात्मा है उसको जानने की, उसका अनुभव करने की। और अगर वो प्रकट हो जाए इस show में तो आपका हृदय आपको applaud करेगा।

 

घट घट मोरा सांइया, सूनी सेज ना कोय।

बलिहारी उस घट की, जिस घट प्रगट होय।।

 

जब इस ड्रामे में जिसमें tragedy भी है — मैं नहीं कहता tragedy नहीं है, tragedy है, अज्ञान है, crises है, रोना है, सबकुछ है। पर एक possibility, एक संभावना और है। और वो संभावना है कि इस play में वो, जो अविनाशी हंस हमारे अन्दर बैठा है वो प्रकट हो। अगर वो हो गया, आपने जान लिया, आपने पहचान लिया तो बात ही दूसरी है।

 

एक joke है, चुटकुला है कि एक बुड्ढा आदमी रोड के पास बैठा हुआ रो रहा था। रो रहा था, रो रहा था, रो रहा था, किसी ने पूछा — क्यों रो रहा है ?

 

कहा कि मेरी अभी-अभी नई शादी हुई है और वो भी बहुत जवान लड़की से और बहुत खूबसूरत है वो।

 

तो आदमी ने कहा — भाई इसमें रोने की क्या बात है ? तेरे को तो खुश होना चाहिए।

 

कहा — भाई, यही नहीं, मेरा अभी नया-नया घर बना है और बहुत ही अच्छा घर है, बहुत ही सुन्दर घर है। सब जगह marble है, granite है, air-conditioned है। बहुत ही सुन्दर घर बना है।

 

कहा — तेरे को तो खुश होना चाहिए।

 

कहा — यही नहीं, मैंने अभी-अभी नई कार खरीदी है और बहुत ही बढ़िया कार है।

 

तो आदमी ने कहा कि भाई, ये सारी चीजें तेरे पास हैं, तो तेरे को बहुत ही खुशी होनी चाहिए। तू रो क्यों रहा है ?

 

तो बुड्ढा कहने लगा कि मेरे को मालूम नहीं कि मैं रहता कहां हूं। मैं ये भूल गया कि मैं रहता कहां हूं।

 

ये तो वो वाली बात हो गयी कि कोई आकर कहे कि मेरी याददाश्त बहुत तेज है, ये तो एक बात मेरे को मालूम है और दूसरी चीज मैं भूल गया।

 

तो क्या याद रखा ? क्या याद है कि तुम भी कुछ हो ?

 

सारी technologies हैं, जहां technology की बात है, technology से हमको बहुत प्रेम है। I love technology, latest, greatest everything, read up magazines हैं। परन्तु एक ऐसी भी तो technology होगी, जो मेरे को मेरे तक पहुंचाए। जिस technologies की मैं आज बात कर रहा हूं, जो बाहर की technologies हैं, ये तो बदलती रहेंगी। ये तो बदलती रहेंगी।

 

एक technology जो इस स्वांस तक मिला दे। एक technology जो उस चीज तक मिला दे, जो हमारी जिंदगी के अन्दर सबसे जरूरी है। जिसके बिना हमको नहीं मालूम कि हम रहते कहां हैं। सबकुछ होने के बावजूद भी हम भूल गए कि हम रहते कहां हैं। हम हैं कौन। और अगर यही होता रहेगा हमारी जिंदगी के अन्दर, तो हम अपनी जिंदगी के अन्दर दिशा कैसे पा सकेंगे ?

 

तो इस जीवन के अन्दर — इस जीवन के अन्दर, अगर हम किसी चीज को समझ सकते हैं, तो उस चीज को समझें कि हमको उस बनाने वाले ने क्या दिया है। इस स्वांस के अन्दर क्या छिपा है। इस जीवन के अन्दर क्या छिपा है।

 

बहुत सारे जवान लोग हैं वो कहते हैं कि हमारा टाइम नहीं है अभी। हमारा टाइम है, मस्ती लेने का। जब बुड्ढे होंगे, तब इन चीजों के बारे में सोचेंगे। ये आपका प्लान है या उसका प्लान है ? ये आपका प्लान है ? आपके प्लान में — इतने समय से इतने समय तक आप ये करेंगे, इतने समय से इतने समय तक आप मस्ती करेंगे, इतने समय से इतने समय तक आप ये करेंगे। इसके बाद आप वृद्ध होंगे। इसके बाद आप retirement लेंगे। इसके बाद आप इस संसार से जाएंगे। ये आपका प्लान है, क्योंकि वहां एक department है और उसका अपना प्लान है और जो उसका प्लान है, वही होता है। जो आपका प्लान है वो नहीं होगा। अरे! मस्ती करनी है अगर इस संसार के अन्दर, तो करो पर ऐसी मस्ती करो कि जिसमें सचमुच मस्त हो जाओ। सचमुच मस्त हो जाओ। और वो मस्ती बाहर की नहीं है। वो मस्ती है तुम्हारे अन्दर! वो सुख!

 

      राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।

      जो सुख साधु संग में, वो बैंकुंठ न होय।।

 

ये है! ये है वो बात! असली सुख की बात कर रहे हैं। असली आनन्द की बात कर रहे हैं।

 

- प्रेम रावत:

पारिवारिक समस्याओं के बीच शांति कैसे मिलेगी? 00:05:29 पारिवारिक समस्याओं के बीच शांति कैसे मिलेगी? Video Duration : 00:05:29 आप क्या योगदान करते हैं, अपनी फैमिली की हैप्पीनेस के लिए ?

प्रश्नकर्ता : सर! मैं पूछना चाहता हूं कि परिवार की समस्याओं के साथ शांति कैसे लाई जा सके। चूंकि हमारी जिम्मेदारी परिवार के प्रति बहुत होती है और कोशिश भी करते हैं, फिर भी उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। तो कृपया मार्गदर्शन करें!

 

प्रेम रावत जी : देखिए! जहां तक परिवार की बात है — मैं एक चीज आपको याद दिलाऊं कि — आप जानते हैं कि चेन क्या होती है। जैसे बाइसिकिल की चेन होती है। तो उसमें छोटे-छोटे, छोटे-छोटे लिंक्स होते हैं। आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि एक — अगर उसमें सौ लिंक भी हैं और एक लिंक निकाल दिया जाए और 99 हैं तो वो चेन, चेन नहीं रहेगी। अब उसका वो लिंक टूट गया है।

 

सबसे पहले आप यह मालूम करिए अपने आप में कि आप क्या योगदान करते हैं, अपनी फैमिली की happiness के लिए ?

 

मैं खाने की बात नहीं कर रहा हूं, मैं घर की बात नहीं कर रहा हूं! देखिए! फैमिली एक ऐसी चीज है कि वो भूखे हैं, आप हैं, प्यार है तो वो भूखे भी चलेगा, फैमिली रहेगी! बारिश भी हो रही है, छत नहीं है, फैमिली है, आप सब साथ हैं, तो भी चलेगा। फैमिली चीज ही एक ऐसी है। तो आप अपनी फैमिली को क्या योगदान कर रहे हैं ? आप उनके problems solver बन गए हैं या अभी भी आप वो फैमिली के हिस्से हैं, जो कि उस फैमिली में सुकून, चैन, happiness, joy ला सकते हैं। और वो, जब आपकी फैमिली है तो वो रहेगा।

 

अब लोग क्या हैं! लोगों को फैमिली में भी — अभी ये बात मेरे से दो-तीन साल पहले किसी ने पूछी थी कि हमारे फैमिली में ये सब चुगली होती रहती है, ये सबकुछ होता रहता है और disharmony होती रहती है।

 

तो मैंने कहा कि "आपका क्या योगदान है उसमें ?"

 

तो पहले तो उनको लगा कि "ऐं ? मेरा क्या योगदान है ?" फिर उनको समझ में आया कि मैं क्या कह रहा हूं और उनका वो योगदान था।

 

देखिए! आप घर आते हैं अपनी नौकरी से। थके-मांदे आते हैं। और आपको ये है कि थोड़ा-सा चैन मिल जाए। और घर आते हैं तो कई बार ये होता है कि "मेरे को ये चाहिए, पापा! ये चाहिए, पापा! ये चाहिए, मेरे को ये कर दो! मेरे को ये कर दो, ये कर दो!" ये एक दिन में नहीं बदलेगी बात। क्योंकि ये माहौल आपने बनाया, इसमें मदद किया आपने इस माहौल को बनाने में। क्योंकि जब वो छोटे ही छोटे, छोटे, छोटे, छोटे थे — "वो! बहुत प्यारा है! हां! मैं ऑफिस से आया हूं, ये है, वो है!" पर धीरे-धीरे वो बड़े हो रहे हैं। ये तो वही वाली बात है, जैसे शेर पाल रखा है न ? जब वो छोटा है तो म्याऊं-म्याऊं करता है। और जब बड़ा हो जाता है तो वही शेर "हाऽऽऽऽऽऽ' करके आता है। इस माहौल को भी आप बदल सकते हैं। इस माहौल को भी आप बदल सकते हैं कि "आओ! बैठो! दो बात करो! दो बात! डिमांड नहीं।"

 

देखिए! अब मैं यहां इसलिए नहीं आया हूं कि मैं दुनिया की सारी समस्याएं solve करूं। परंतु सबसे बड़ी चक्कर — सबसे बड़ा चक्कर क्या है इस दुनिया के अंदर आप जानते हैं ? लोग एक-दूसरे की बात नहीं सुनते हैं। लोग एक-दूसरे की बात नहीं सुनते हैं। विद्यार्थी, टीचर की बात नहीं सुनते हैं। और कई बार — विद्यार्थी तो यही कहेंगे, टीचर हमारी बात नहीं सुनते हैं। नागरिक politician की बात नहीं सुनते हैं, politician नागरिक की बात नहीं सुनते हैं। पुलिस वाले यही कहेंगे, वो हमारी बात नहीं सुनते हैं और नागरिक यही कहेंगे, वो हमारी बात नहीं सुनते हैं। दो बात सुनने के लिए क्या लगेगा ? कुछ नहीं। कुछ नहीं! कुछ नहीं! कुछ नहीं। परंतु दो बात सुन लीजिए अपनी फैमिली से। और मैं सच कहता हूं कि वो दो बात अगर आप सुनना शुरू करें तो वो एक दिन तीन शब्दों में बदल जायेगी —  I love you!

तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ? 00:12:29 तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ? Video Duration : 00:12:29 परेशानियों को हटाना संभव नहीं है, परंतु उनसे परेशान न होना संभव है!

Text on screen : आज के समय में समस्याओं का समाधान करके तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ?

प्रेम रावत:

हर एक मनुष्य के पीछे समस्या है, परंतु समझने की बात ये है कि हम चाहते हैं कि वो समस्याएं खतम हो जाएं। वो समस्याएं कभी खतम नहीं होंगी। समस्या, ये समझिए कि एक ऐसी मक्खी है कि आपके ऊपर है, आपने ऐसे किया, आपको छोड़ करके वो किसी और के — किसी और पर बैठ जाएगी। तो समस्याएं तो ऐसी हैं कि हम ही उनके victims हैं। मनुष्य को ही वो परेशान करती हैं और वो पता नहीं, कितने रूप में आती हैं, जाती हैं और इस पृथ्वी पर वो समस्याएं बनी रहती हैं। अर्थात् समस्या वही हैं, आदमी बदलते रहते हैं।

तो समस्याओं से दूर होने का क्या हल है? दूर या नजदीक — इनसे आप नहीं हो सकते। ये तो आपके पीछे लगेंगी। बात है आदमी के दृष्टिकोण की कि "क्या ये सचमुच में मेरी समस्या है या नहीं? मैं कौन हूं और ये समस्या क्या हैं?" कौन नहीं है — अब कई लोग हैं, जो कहते हैं कि "हमको ये रहता है कि ये काम समय पर करना है। ये काम हमको निभाना है।" अब बड़े से बड़े लोग और छोटे से छोटे लोग। एक बस स्टैण्ड पर खड़ा हुआ अपनी घड़ी को देख रहा है कि "मेरी बस लेट हो गयी। मैं काम देर से पहुंचूंगा।" उसको भी चिंता है। एक ऐसा, जो कि करोड़ों का contract साइन करने के लिए जा रहा है, वो भी अपनी घड़ी को देख रहा है कि "अगर मैं टाइम पर नहीं पहुंचा तो हो सकता है, ये contract साइन न हो सके।" चिंता तो वही है और सबको सता रही है। परंतु हम कभी इस बात को इस तरीके से नहीं देखते हैं कि एक दीवाल है इधर और मैं आपको कई बार इसका reference दूंगा क्योंकि ये सारी चीज को एक context में बांधती है।

एक तरफ वो दीवाल, जिससे हम होकर के आए, जब हमारा जन्म हुआ और एक वो दीवाल, जिसमें हम प्रवेश करेंगे और कहां जाएंगे, क्या होगा? हमको कुछ नहीं मालूम। तो एक जन्म है, एक मरण है और इसके बीच में सबकुछ है। आप चाहते क्या हैं? अब किसी को कोई समस्या है, उससे पूछा जाए, "आप क्या चाहते हैं?"

"अजी! मैं इस शंका से निवारण चाहता हूं। इस दुःख से निवारण चाहता हूं।"

आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि एक न एक दिन वो दुःख तो रहेगा नहीं। फिर आप क्या चाहते हैं? फिर क्या चाहते हैं? फिर दूसरी समस्या का निवारण चाहते हैं? तो आपको यह लगता है कि आपकी जिंदगी यहां से ले के यहां तक दुःखों से बचने के लिए है या और कुछ भी इसमें संभव है ? इसकी संभावना पूरी तरीके से आपने जानी या नहीं जानी? क्योंकि दुःख तो आएंगे — सुख भी आएगा, दुःख भी आएगा। और मैं तो लोगों से कहता हूं — अगर अब दुःखी समय चल रहा है, थोड़ी देर इंतजार करो, सुखी समय आ जाएगा। जब सुख हो जाएगा, थोड़ी देर इंतजार करो, फिर दुःख आ जाएगा। और फिर दुःख आएगा तो फिर थोड़ी देर इंतजार करो, फिर सुख आ जाएगा। तो ये होता रहता है, होता रहता है, होता रहता है, होता रहता है। परंतु जाना क्या, पहचाना क्या? किस चीज को समझे कि ये जिंदगी इन चिंताओं से मुक्त होने के लिए नहीं है।

कहा है —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास।

और जो चितवे नाम बिन, सोई काल की फांस।।

अगर किसी चीज की चिंता करनी है तो वो जो तुम्हारे अंदर जो आशीर्वाद तुमको मिला है कि —

      नर तन भव बारिधि कहुं बेरो।

      सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।।

क्या मैं उस आशीर्वाद का पूरा-पूरा फायदा उठा रहा हूं या नहीं ?

देखिए! जब कोई चीज बहुमूल्य हमको मिलती है — जैसे, अगर हम कहीं गए। ये उदाहरण है मेरा। खील है! किसी ने हाथ में खील रख दी। तो आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि खील बड़ी जल्दी से गिर भी जाती है, हल्की है। उसको आपने खाया, थोड़ी गिर गई, कोई बात नहीं। कपड़ों पर गिर गई — कई लोगों को तो मैंने देखा है कि वो ऐसे कर देंगे। हटा देंगे उसको। पर अगर आपके हाथ में उतने ही हीरे हों, आप उनको खाएंगे तो नहीं! पर अगर एक गिर गया तो आप उसको ऐसे कर देंगे? नहीं। जो चीज, जिसको हम बहुमूल्य समझते हैं, जिसको मूल्यवान समझते हैं, उसकी हम क़दर करते हैं। उसको व्यर्थ नहीं खोने देते।

      सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।

इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है।

वो तो हीरों से भी ज्यादा मूल्यवान है! वही कृपा है। हम तो प्रार्थना करते हैं —  "हे भगवान! अपनी कृपा कर, मेरे को इस दुःख से बचा ले!"

भगवान कह रहे हैं — "नहीं, नहीं, नहीं! इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है!"

उसको हम— उसकी क़दर ही नहीं जानते हैं। उसको — खील की तरह इधर-उधर गिर रही है — कोई बात नहीं। और ऐसी चीज के पीछे पड़े हैं, जिससे मुक्त होने के लिए सबकुछ करने के लिए तैयार हैं। और वो ही समस्या तुम्हारे पास ऐसी हाथ धो के बैठी है कि तुमको परेशान करके रखेगी। क्योंकि ये उसकी प्रकृति है।

हर एक चीज की प्रकृति होती है। उस प्रकृति को समझना जरूरी है। अगर अपना ध्यान उस, जो असली चीज है, उससे निकाल दिया गया तो फिर ऐसी-ऐसी जगह जाएगा कि "ये क्यों हो रहा है? ऐसा क्यों हो रहा है? अरे बाप रे! अब ये हो गया! अरे अब मैं ...... ।" बच्चे हैं — क्या करते हैं? मेहनत करनी चाहिए पढ़ने की। और सबसे ज्यादा मेहनत करनी चाहिए बात को समझने की। क्योंकि अगर बात कोई समझ में आ गई तो आपको दोबारा-दोबारा पढ़ने की जरूरत नहीं है। वो चली गई अक्ल में। और बुद्धि एक ऐसी चीज है, उसको याद करके रखेगी। पर समझ में तो आया नहीं और उसको तोते की तरह रट रहे हैं। और जब बैठेंगे इम्तिहान में तो अगर वो तोता नहीं बोला ठीक समय पर तो वो प्रश्न तो गया।

तो यही चीज हम करते रहते हैं अपनी जिंदगी में और परेशानियां हमारे पीछे पड़ी रहती हैं। किस चीज के पीछे पड़ना चाहिए? इस दुनिया के अंदर आप अगर सुकून से रहें और सुकून वो, जो आपके हृदय से आता है, जो आपके अंदर से आता है, जो अपने आपको समझने में आता है। ये नहीं है कि बाहर सबकुछ बदल जाएगा। बाहर सबकुछ नहीं बदलेगा। समस्याएं तो फिर भी आएंगी, परंतु आपको जीने का तरीका मिल जाएगा। आपको वो रास्ता मिल जाएगा, जिससे कि वो परेशानियां आपको परेशान न करें! एक बार परेशानियां अगर परेशान करना छोड़ दें तो वो परेशानियां नहीं रहतीं। आई, गई! आई, गई!

भगवान ने आपको एक चीज दी है, वो है — सब्र! और लोग कितना सब्र करते हैं? छूट गया लोगों का। दौड़ रहे हैं, परंतु ये नहीं मालूम किसके पीछे ? फिर मैं कहता हूं — एक वो दीवाल, जब पैदा हुए। एक वो दीवाल, जब आपको जाना है! भागिए! जाएंगे कहां? जाएंगे कहां? ये एक ऐसी रेस है, ये एक ऐसी दौड़ है कि अगर आप उल्टा भी भागना चाहें तो इधर ही भागेंगे! यहां से आए, यहां जाना है! इसको कोई नहीं टाल सकता। इस तरफ भागेंगे तो इसी तरफ जाएंगे, इस तरफ भी भागेंगे तो भी इसी तरफ जाएंगे! ये एक ऐसी रेस है! ये एक ऐसी दौड़ है! तो आदमी किस चीज के पीछे दौड़ रहा है? इस चीज के पीछे दौड़ रहा है। इस चीज के पीछे दौड़ना अच्छा नहीं है। क्योंकि ये तो होगा!

कब आता है आदमियों को चैन? रिटायरमेंट के बाद, अपने आप से जीना मुश्किल हो जाता है! अपने आप से जीना मुश्किल हो जाता है! ये देखिए! एक दिन काम पर जा रहे हैं, सबकुछ है और दूसरे दिन रिटायर्ड! अब क्या करेंगे? कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है — बिज़ी रहने की कोशिश करता है! क्यों? जेलों में सबसे बड़ी सजा क्या है? Solitary confinement! जब मनुष्य को हर एक चीजों से हटा करके बंद कर देते हैं। अब उसके पास कौन है? सिर्फ वो है! और वो अपने साथ नहीं जी सकता। कभी सीखा ही नहीं! कभी सीखा ही नहीं! 

लोग ऐसी जगह हो जाते हैं कभी — खो गए, जंगल में खो गए और कोई है ही नहीं! सिर्फ वो ही हैं। बाप रे बाप! बचाओ! बचाओ! बचाओ! बचाओ! क्यों ? अपने आप से जीना कभी सीखा ही नहीं। और इस जिंदगी में जिसने जीना ही नहीं सीखा, तो उसके लिए ये जिंदगी है या नहीं है — परेशान है या नहीं है, एक ही चीज है। और हर एक चीज उसको परेशान करेगी। तो बात परेशानियों से बचने की नहीं है। क्योंकि मैं तो ये कहता हूं कि बारिश तो होगी, पर अगर छाता है तो भीगने की जरूरत नहीं है। बात है भीगने की, बारिश की नहीं। बारिश तो होगी। पर क्या आप भीगना चाहते हैं या नहीं?

हमको अच्छी तरीके से मालूम है, जब सर्दी का मौसम आता है, लोग कम्बल निकालते हैं। क्यों ? सर्दी तो होगी! वो तो मौसम है, सर्दी तो आएगी, पर यह जरूरी नहीं है कि आप ठंडे हो जाएं, आपको ठंड लग जाए। कम्बल ढूंढ़िए! जैकेट ओढ़िए, स्वेटर ओढ़िए, पहनिए। तो यह बात है! और जो समझदार लोग हैं, वो इस पर अमल करते हैं कि यह तो होगा! जबतक मैं हूं, परेशानियां तो आएंगी! परंतु मेरे को परेशान होने की जरूरत नहीं है। और चक्कर है परेशानी नहीं! परेशान होना। अगर परेशान — परेशानियों से आदमी परेशान न हो तो फिर उन परेशानियों का उस पर कोई असर नहीं। और यह संभव है! परेशानियों को हटाना संभव नहीं है, परंतु उनसे परेशान न होना संभव है।

सरकार और नागरिक 00:03:35 सरकार और नागरिक Video Duration : 00:03:35 सरकार और जनता के बीच एक बेहतर संवाद कैसे स्थापित हो सकता है ?

प्रश्नकर्ता:

सरकार और जनता के बीच एक बेहतर संवाद कैसे स्थापित हो सकता है ?

 

प्रेम रावत:

कहीं भी आप चले जाइए, समाज में एक बीमारी है। और वो बीमारी यह है — भगवान हो, धर्म हो, गवर्नमेंट हो, हम उनको दोषी ठहराना चाहते हैं। "मेरे जीवन  में ये नहीं है, ये नहीं है, ये नहीं है, यह भगवान की — भगवान की गलती है। भगवान को दोष दो! यह ऐसा नहीं है, यह वैसा नहीं है, धर्म को दोष दो!"

तो हम तो लग गए हैं लोगों को दोष देने में। जबतक ये कीड़ा हम अपने दिमाग से नहीं निकालेंगे हम सरकार क्या होती है, नहीं समझ पाएंगे। इस समय हालत ये है कि सरकार को चाहिए वोट और लोगों को चाहिए तरक्की। और इस पिंग-पोंग में, इस खेल में अगर थोड़ा-बहुत कहीं गुंज़ाइश है — क्योंकि सबसे पहले लोग ही जाते हैं, सरकार को सत्ता में लाते हैं वोट देकर और जैसे ही वोट दे दी, फिर उन पर आरोप के बाद आरोप, आरोप के बाद — ‘‘उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने ये नहीं किया।"

तो ये जो कीड़ा है दूसरों को दोष देने का, "उनकी वजह से नहीं हो रहा है, उनकी वजह से...।"

"मैं क्या कर सकता हूं, मैं क्या कर सकता हूं ?"

अब ये एक बात है कि जो आज देख रहे हैं हिन्दुस्तान में — स्वच्छ भारत! कितना बढ़िया आइडिया है। कितना सुंदर आइडिया है। मतलब, ये तो बेसिक चीज है। क्योंकि हमको साफ रहना — इसका मतलब है कि हम बीमार नहीं होंगे। देखने में भी अच्छा लगता है।

परंतु मैं देखता हूं कि कई जगह जो स्वच्छता होनी चाहिए, वो नहीं है। तो पहले मेरे में यही प्रेरणा आती है कि मैं गवर्नमेंट को दोष दूं। उनकी वजह से नहीं हो रहा है। परंतु मैं भी तो कुछ कर सकता हूं। अगर मैं कूड़ा फेंकना छोड़ दूं — हैं, जी ? तो क्या परिवर्तन नहीं आएगा ? क्योंकि ये कूड़ा आया कहां से ? आया कहां से ? ये आसमान से तो आया नहीं ? ये नहीं है कि बारिश शुरू हुई और कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा! नहीं। ये कूड़ा हम ही पैदा करते हैं और अगर हम ही थोड़ी-सी जिम्मेवारी लें कि हम कूड़ा न फेंकें या उसको ठीक तरीके से डिस्पोज़ करें तो इसमें असर पड़ेगा।

पर वो नहीं हो रहा है। वो नहीं हो रहा है। लोग मज़ाक उड़ाने के लिए तैयार हैं, परंतु जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। दोष देने के लिए तैयार हैं, पर जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं। तो कोई भी चीज हो इस संसार के अंदर, मनुष्य की भी तो कोई जिम्मेवारी बनती है ? जो यहां के नागरिक हैं, उनकी भी तो कोई जिम्मेवारी बनती है ? और जबतक वो जिम्मेवारी नहीं लेंगे और वो समझेंगे कि ऐसी सरकार आए, जो उनके सारे प्रॉब्लम्स को सॉल्व कर दे, वो कभी होगा नहीं। कभी हुआ नहीं है, कभी होगा नहीं। 

शांति क्या है 00:02:34 शांति क्या है Video Duration : 00:02:34 शांति क्या है ? शांति है वह चीज कि मनुष्य अपने आप को पहचाने।

प्रेम रावत :

सबसे बड़ी बात यह है। जो भी मेरा संदेश है, वह बड़ा साधारण संदेश है कि ‘‘भाई! जिस चीज की तुमको तलाश है, वह तुम्हारे अंदर है।’’ 

अब बाहर तो हम सबकुछ करते हैं, क्योंकि बाहर हम देखते हैं, सजाते हैं अपने आपको। 

पर हम अंदर के लिए क्या कर रहे हैं ? संदेश यह है कि अंदर के लिए हम क्या कर रहे हैं ? 

क्योंकि जो कुछ भी बाहर है, वह तो अंदर से आ रहा है। अब अगर अंदर आदमी को चिढ़ लगी हुई है तो उसको कितना भी आप मुस्कुराने के लिए कहिए, जैसे ही उसका ध्यान कहीं और जाएगा और वह मुस्कुराना बंद करेगा, उसकी जो चिढ़ है, वह बाहर आ जाएगी। तो जो कुछ भी हम कर रहे हैं, वह अंदर के लिए नहीं कर रहे हैं, बाहर के लिए कर रहे हैं। और बाहर हम चाहे कितना भी परिश्रम कर लें, शांति आपके अंदर से शुरू होनी है, बाहर से नहीं। 

जो बाहर आप लक्षण देख रहे हैं शांति का, लोग अपनी धारणाएं लेते हैं कि अगर शांति हो तो ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा! उनमें लगे हुए हैं, पर उनसे शांति नहीं होगी। शांति होगी तब, जब अंदर से शांति होगी। 

अंदर की शांति ये नहीं है कि हमारी समस्याओं का हल हो जाए तो हम शांत हो जाएंगे क्योंकि हमारी समस्याएं बदलती रहेंगी। लोग समझते हैं कि ये लड़ाइयां बंद हो जाएं तो शांति हो जाएगी। यह भी शांति नहीं है। 

तो अब शांति क्या है ? शांति है मनुष्य के अंदर। शांति है वह चीज, जो कि मनुष्य अपने आप को पहचाने। 

आपके अंदर आनंद को अनुभव करने की भी ताकत है और आपके अंदर परेशान होने की भी ताकत है। ये दो ताकत जो आपकी हैं, इससे आप कभी वंचित नहीं हैं। मतलब, आप कहीं भी चले जाएं, ये दोनों चीजें आपके साथ-साथ चलती हैं। आप क्रोधित भी हो सकते हैं और आप आनंद में भी हो सकते हैं। आप प्यार भी कर सकते हैं, आप नफरत भी कर सकते हैं। दोनों चीजें आपके साथ चलती हैं। 

तो अब बात यह है कि हम किस चीज को प्रेरणा देते हैं ?

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