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चाहत किसकी (ऑडियो) 00:09:09 चाहत किसकी (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:09 अगर तुम जीना सीखना चाहते हो तो प्रेम को गले लगाना सीखो, नफरत को नहीं।

प्रेम रावत: 

मनुष्य के लिए सुख की कोई सीमा नहीं है, दुःख इतना भी, उसको परेशान कर देता है। हर एक चीज के अंदर, हर एक चीज के अंदर सुख भी है, दुःख भी है। 

तुम्हारे जीवन में सबकुछ है। तुम्हारे जीवन में सबकुछ भी है और कुछ भी नहीं है। दोनों ही हैं। तुम जब अपने कमरे में जाते हो और कुण्डी बंद करते हो अपने दरवाजे में — आज के बाद याद रखना, तुम अकेले नहीं हो उस कमरे में। कितने हैं उस कमरे में भरे हुए! तुम भी हो, अविनाशी भी है, जीवन भी है और मृत्यु भी है। उस कमरे में सब हैं — ज्ञान भी है, अज्ञान भी है, अंधेरा भी है, उजाला भी है। 

अगर उस कमरे को बंद कर दो तुम और सौ ताले लगा दो दरवाजे पर और जैसे ही तुम लाइट बंद करोगे, क्या होगा ? अंधेरा हो जायेगा। नहीं ? कहां से आया अंधेरा ? जब दरवाजा पहले से ही बंद था तो आया कहां से अंधेरा ? क्योंकि वो तुम्हारे दरवाजे बंद करने से पहले ही से अंदर आ रखा था, तुम्हारे साथ ही आया। धर्म भी तुम्हारे साथ है, अधर्म भी तुम्हारे साथ है। सारी चीजें — जहां तुम जाते हो, सब हैं। फ़र्क इतना है, फ़र्क इतना है कि अगर तुम जानते हो कि ये सब साथ हैं तो उसको अपने सीने से लगाओ, जिसको तुम चाहते हो। प्रेम भी तुम्हारे साथ आया है और नफरत भी तुम्हारे साथ आई है। नफरत को तो तुम गले लगाना जानते हो। जानते हो कि नहीं ? नफरत करने में तुमको कितनी देर लगती है ? कितनी देर लगती है ? {चुटकी बजाने जितना समय} परंतु प्रेम को गले लगाना अभी सीखा नहीं। 

मक्खन है, पर ऐसे नहीं निकलेगा। घंटे-घंटे बैठे रहो, करते रहो, करते रहो, करते रहो, करते रहो...। ऐसे नहीं निकलेगा। इसकी विधि चाहिए। 

अगर तुम जीना सीखना चाहते हो तो प्रेम को गले लगाना सीखो, नफरत को नहीं। ज्ञान को अपने पास बुलाना सीखो, अज्ञानता को नहीं। अभी तो ये सीखा है — अज्ञानता क्या है ? कैसे उसको नजदीक लाया जाये। अपने जीवन में अगर प्रकाश चाहते हो तो प्रकाश को कैसे निकाला जाये ? क्योंकि दोनों हैं! अंधेरा भी है और प्रकाश भी है। अपने जीवन में प्रकाश को लाना सीखो! 

आधे से ज्यादा तुम अपनी जिंदगी बदल सकते हो, तीन सेकेण्ड में। तीन सेकेण्ड में! तीन सेकेण्ड में ? सिर्फ तीन सेकेण्ड में। करने से पहले सोचो! सिर्फ तीन सेकेण्ड! क्या करने जा रहे हो ? बस! तीन सेकेण्ड! तीन सेकेण्ड! उसके बाद करो, जो तुमको करना है। पर तीन सेकेण्ड सोचो! क्योंकि गुस्सा भी तुम्हारे साथ है और क्षमा भी तुम्हारे साथ है। तीन सेकेण्ड में तुम चुन सकते हो — गुस्सा चाहिए या क्षमा ? क्षमा प्यार लाएगी। प्यार उजाला लाएगा। उजाला आनंद लाएगा। तीन सेकेण्ड में। और क्योंकि तुम करते पहले हो, सोचते बाद में हो, इसीलिए तुम्हारे जीवन में दुःख रहता है। 

है क्या ? ये संसार का स्वभाव है। 

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय। 

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।

तो तुम कितने बड़े घुन हो, जो बच जाओगे ? अरे! जब वो घुन — जब उसके जीवन के अंदर गेहूं की बोरी आती है। जब घुन कहीं चलते-चलते, चलते-चलते, चलते-चलते पूरी बोरी के पास पहुंचता है कि गेहूं ही गेहूं हैं उसके अंदर, जरा विचार करो, कितना उसको आनंद मिलता होगा। 

‘‘हे भगवान! तैंने मेरी सुन ली! इस बोरी में तो गेहूं ही गेहूं है! बैठ के खा-खाकर के मोटा हो जाऊंगा!’’ 

उसको क्या मालूम कि इस बोरी में जो गेहूं है, उसका आटा बनना है। उसको चक्की में डाला जाएगा और बच्चू! तू भी उस चक्की में पिसेगा! वो घुन क्या खोज रहा है अपने जीवन में ? गेहूं को खोज रहा है और गेहूं बिखरे हुए नहीं, सब एक ही पोटली में मिल गए उसको। इससे बड़ी चीज क्या हो सकती है, उसके लिए ? परंतु जो उसका ख्वाब होगा — छोटे-से घुन का ख्वाब! गेहूं मिल जाए। ऐसा मिल जाए, इधर-उधर भटकना न पड़े। वो सब उसको मिल गया। परंतु उसको ये नहीं पता कि चक्की में पीसना है। 

जो कुछ भी हम करते हैं, इसमें दोनों ही गुंजाइशें हैं — अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। अगर हम सोच के काम करेंगे, विचार के काम करेंगे, ये जानकर के काम करेंगे कि हमारी प्रकृति है भूलने की। ये हमारी प्रकृति है भूलने की और मेरे को कोशिश करनी है कि मैं भूलूं न। उस चीज को मैं नहीं भूलूं, जो मेरे लिए जरूरी है। अगर ये याद रहेगा, तुम्हारी जिंदगी के अंदर अपने आप परिवर्तन आएगा। अपने आप परिवर्तन आयेगा! 

क्यों ? 

जो कुछ भी तुम कर रहे हो, वो उस आनंद के लिए है, क्योंकि ये भी तुम्हारी प्रकृति है। तुम दुःख को नहीं सह सकते हो। याद है, यही मैं कह रहा था शुरुआत में ? तुम दुःख को नहीं सह सकते हो, परंतु सुख की सीमा तुम्हारे में है ही नहीं! अपार सुख तुम सह सकते हो! कोई ऐसे मंदिर में नहीं जाता है कि ‘‘हे भगवान! बहुत ज्यादा सुख दे दिया। अब थोड़ा कम कर दे!’’ मनुष्य के लिए सुख की कोई सीमा नहीं है, दुःख इतना भी, उसको परेशान कर देता है। हर एक चीज के अंदर, हर एक चीज के अंदर सुख भी है, दुःख भी है। पर तुमको — तुमको चुनना है, क्या तुमको चाहिए अपने जीवन में ? सुख चाहिए या दुःख चाहिए ? जिस दिन दुःख चाहिए, दुःख मौजूद है। जिस दिन सुख चाहिए, सुख भी मौजूद है।

25,550 दिन 00:08:09 25,550 दिन Video Duration : 00:08:09 25,550 दिन। ये है उपहार! बड़ा उपहार!

बदलाव — बहुत से लोगों के लिए बदलाव एक ऐसी चीज है जिसे या तो लोग स्वीकार नहीं करना चाहते या उसके साथ बह जाते हैं। पर क्या हम सचमुच यह समझते हैं कि इसका क्या मतलब है, बदलाव क्या है ? 

क्योंकि जिस तरह हमारा अस्तित्व है, जिस तरह हम जीते हैं हम उस बदलाव के साथ होते हैं। अगर वह स्वांस आया अच्छी बात है — हम जीवित हैं। अगर यह गया तो हम मौत के बहुत करीब हैं हम नहीं जानते हैं कि वह कब आएगी। और फिर अगर यह आया तो वह हमारे लिए फिर एक मौका है जीवित होने का। और अगर यह गया और वापस नहीं आया तो वह एक बहुत बड़ा बदलाव होगा— यही है सभी बदलावों की जननी। 

पर यह हर समय, हर समय होता है, दिन-रात और हम इसे इस तरह नहीं देखते हैं। हम अपने जीवन को आंकड़ों के रूप में देखते हैं — 60 साल, 65 साल, 70 साल औसतन।

 

साक्षात्कार:

महिला: कितने दिन...

महिला: अरे बाप रे!

महिला: अब वो तो हमें मल्टीप्लाई करना पड़ेगा। 

पुरुष: 18,000

पुरुष: 60 से 70 साल।

महिला: 70 years x 365 days + लीप ईयर काउंट so you add one day.

महिला: close to one lakh.

पुरुष: 50,000

पुरुष: 15 to 16,000

पुरुष: 15,000

पुरुष: 15 to 20,000 days.

पुरुष: 1,00,000 days.

महिला: I don't know...कितने हुए।

पुरुष: 20,000 days.

पुरुष: 25 to 30,000

महिला: 50,000

पुरुष: इतने ही अराउंड 50,000.

महिला: नहीं, इतना तो कभी calculate नहीं किया।

पुरुष: 100, 200, 250 करोड़।

पुरुष: Yah exactly same.

महिला: एक्चुअली calculation तो हमारी years की है डेज़ तो calculate किये नहीं।

 

मैं आपको अर्थशास्त्र का एक पाठ पढ़ाता हूं। अगर मैं आपसे कहूं कि आपको 25,550 रुपये मिलने वाले हैं, क्या ये बहुत सारे रुपये हैं ? 

कुछ लोगों के लिए ये बहुत सारे रुपये हैं। कुछ लोगों के लिए ये बहुत सारे रुपये नहीं हैं। 25,550 रुपये में आप एक घर, एक गाड़ी, एक रेफ्रिजरेटर और एक वॉशिंग मशीन नहीं खरीद सकते हैं और बहुत दिनों तक अपना भोजन नहीं खरीद सकते हैं। 

मेरा मतलब है, आज के जमाने में 25,550 रुपये बहुत ज्यादा नहीं हैं। और अगर आपके पास इतने ही रुपये हैं, बस यही हैं आपको और नहीं मिलने वाले हैं, तो मुझे लगता है कि आप काफी उदास हो जायेंगे क्योंकि ये ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाले हैं। मेरा मतलब घूमना-फिरना तो भूल जाइए। हो सकता है आपको दुकान तक पैदल चलकर जाना पड़े। ऐशो-आराम की सारी चीजें तो भूल ही जाइए। 

तो मैं आपसे क्यों बात कर रहा हूं 25,550 रुपये की ? इससे आपका क्या मतलब है ? 

मतलब है, रुपये नहीं कुछ और। औसतन रूप से अगर मनुष्य 70 साल तक जीवित रहता है तो इस तरह आपको मिलते हैं 25,550 दिन! बस। 

 

साक्षात्कार:

महिला: 25,550 दिन।

पुरुष: 70 years तो काफी कम हैं मतलब।

पुरुष: मैं generally ये expect करके चल रहा था कि मैं 30,000 दिन तो जीऊंगा।

महिला: Life is too short.

पुरुष: हां, वही मतलब।

पुरुष: Enough me यार! और भी चाहिए मुझे क्योंकि मेरे गोल बहुत हैं तो मुझे और बहुत सारे डेज़ चाहिए।

महिला: 25,550 तो सच में कम लग रहा है। सोचा नहीं था इतना कम परbut I think 75 years तो बहुत लगता है लेकिन 25,550 कम लग रहा है। 

पुरुष: हम ऐसे नॉर्मल सोच रहे थे 80,000-90,000 बट ऐसा आपने बताया 70 years x 365 = 25,000 तो obviously. 

पुरुष: बस इतने से ही दिन है 25,550 दिन। मुझे लगा 70 साल बहुत ज्यादा होते हैं। 

 

आप जीवित हैं। और बहुत से लोगों के लिए ये कोई जमीन को हिला देने वाला संदेश नहीं है। तो जरा सोचिए इसके बारे में! अगर कोई आपसे कहे आप मरने वाले हैं। ये जमीन को हिला देने वाली खबर है। तो ये उल्टी बात क्यों है ? अगर एक डॉक्टर आपसे कहे आप सिर्फ दो महीने और जीयेगें तो लोग कहेंगे, हे भगवान! 

जब हम जीवित होते हैं तो क्या हम इस बात को समझते हैं कि जीवित होने का क्या मतलब है ? या क्या ये बात तभी हमारे दिमाग में घुसती है जब इसकी संभावना समाप्त हो जाती है ?

 

साक्षात्कार:

महिला: Of courseअब मुझे लग रहा है कि हां इतना कम दिन है हमारे पास। इसको जितना, जितना ज्यादा जी लो उतना ही अच्छा है।

महिला: अगर आपको पता ही है कि definitely सिर्फ इतने ही दिन हैं then मेरे ख्याल से आपको किसी की हेल्प करनी चाहिए जो less fortunate हैं।

पुरुष: कोई टेंशन नहीं है। इस बात की टेंशन नहीं है दिन कितने गुजार दिये, जितने बचे हैं उन पर concentrate अपना।

महिला: छोटी-छोटी चीजों की वैल्यू पता लगनी शुरू हो जायेगी just क्योंकि तुमको पता है कि तुम्हारे पास अब कम टाइम है।

पुरुष: तो मेरे पास 25,550 दिन हैं तो मैं पूरी कोशिश करूंगा मैं उतने में ही अपना गोल अचीव करू लूं।

महिला: मायने तो यही है हर दिन को वैल्यू करेंगे और हार्ड वर्क करेंगे अपनी सारी ड्रीम्स को फुलफिल करेंगे। 

महिला: मैं calculate करने लग जाऊंगी obviously कि मुझे क्या-क्या चीजें कितने-कितने टाइम तक क्या-क्या करना है और कितनी जल्दी मुझे क्या-क्या चीजें अचीव करनी है तो obviously मैं वो चीज अपने माइंड में calculate करने लग जाऊंगी।

पुरुष: मैं और ज्यादा livingly जीऊंगा। ऐसे अभी कोई फालतू चीजों में टाइम वेस्ट कर देता हूं। उससे ज्यादा मैं चीजों को पकड़कर और ज्यादा इंजॉय करूंगा each and every secondको मैं इंजॉय करना शुरू कर दूंगा। 

 

मेरे दोस्तों आप क्या खरीदना चाहते हैं उन रुपयों से जो आपको मिल रहे हैं हर दिन 25,550 दिनों तक ? 

मैं उससे खरीदना चाहता हूं — सच्चा आनंद। मैं अपने लिए संतुष्टि पाना चाहता हूं। 

कल कैसा होगा ? 

एक मायने में आज से अलग नहीं और बीते हुए कल से अलग नहीं। और अगर आप संतुष्ट हैं तो ये बिल्कुल अलग होगा। ये आज से अलग होगा। और ये बीते हुए कल से अलग होगा। और उसके पिछले दिन से अलग होगा और फिर भी हम गिन नहीं सकते 25,550 दिन। इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। ये है उपहार! बड़ा उपहार! बहुत बड़ा नहीं लेकिन बड़ा। 25,550!

टेक्नोलॉजी (Technology) 00:02:57 टेक्नोलॉजी (Technology) Video Duration : 00:02:57 मैं यही लोगों को प्रेरित करता हूं — तुम भी शांति के इस मार्ग में मदद करो।

टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल कैसे हो सकता है ?

प्रश्नकर्ता :

आज का दौर साइंस और टेक्नोलॉजी का है। लेकिन जैसे-जैसे हम उन्नति करते जा रहे हैं, आगे बढ़ते जा रहे हैं, अपने आपसे दूर होते जा रहे हैं। तकनीक का इस्तेमाल विनाश के हथियार बनाने के लिये भी हो सकता है और मनुष्य के कल्याण के लिये भी। हम किस तरह से तकनीकी प्रगति का इस्तेमाल मानवता और शांति के लिये कर सकते हैं ?

प्रेम रावत :

यह तो वो वाली बात है न कि अगर मैं किसी चीज की जरूरत नहीं समझता हूं, मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है तो फिर मैं उसकी तरफ ध्यान नहीं दूंगा। यही बात होती है कि क्या हम इस बात को इसकी जरूरत समझते हैं कि इस संसार के अंदर शांति होनी चाहिए ? क्या यह हमारे लिए कोई महत्व रखती है या नहीं या सिर्फ यह है कि मैं इस चीज का आविष्कार करूंगा तो मेरे को मान्यता मिलेगी, मेरे को पैसा मिलेगा, मेरे को मान-सम्मान मिलेगा ?

तो अब एक वही व्यक्ति, जो चक्कू बनाता है, वह तलवार भी बना सकता है। चक्कू घर में भोजन बनाने में मदद करेगा और एक दूसरे को मारने में मदद करेगा। परंतु यहां क्या हो रहा है ? यहां (दिमाग में) क्या बसा हुआ है ? अगर सिर्फ बात है मान-सम्मान की, बात है पैसे की तो फिर आदमी के लिए कोई लिमिट ही नहीं है।

"बनाओ, ये बनाओ! ठीक है, ये बम हजारों लोगों को मार सकता है।"

और अगर बात है कि नहीं, मेरी भी कोई जिम्मेवारी है तो लोग फिर उस टेक्नोलोजी को उस तरीके से इस्तेमाल करने लगेंगे, जिसमें लोगों का भला होगा। तो दोनों ही बातें हैं।

अब एक कैप्टन है, अगर वो समझता है कि जो उसके पैसेंजर हैं, जहाज में पैसेंजर हैं, वो उसकी जिम्मेवारी है और उसकी जिम्मेवारी है कि वो उनको सुरक्षित रखे तो वो उस पर ध्यान देगा। और अगर उसके दिमाग में यह बात नहीं है, कोई और फितूर चढ़ा हुआ है तो वही जहाज, वो पत्थरों पर चढ़ा सकता है, सबको मार सकता है।

तो यह तो बात मनुष्य की है। अब उसको अगर समझ में नहीं आई है बात तो फिर वो वही करेगा, जो उसकी मर्ज़ी आती है। जिसमें वो यह देखता है शॉर्टकट क्या है ?

"मेरे को मान-सम्मान चाहिए!" अब लोगों को मान-सम्मान चाहिए!

लोग कहते हैं, "अजी! आपको ये पदवी मिली हुई है! आपको शांतिदूत की पदवी मिली हुई है।" शांतिदूत की पदवी का मतलब क्या है ? शांतिदूत की पदवी का मतलब है कि जहां जाओ, और शांतिदूत बनाओ! ये है। और मैं यही लोगों को प्रेरित करता हूं — तुम भी शांति के इस मार्ग में मदद करो।

तो अगर यह हमारी समझ रही तो कोई भी टेक्नोलोजी हमारे पास आएगी, हम उसका सदुपयोग करेंगे। दुरूपयोग नहीं करेंगे! परंतु अगर हमारी समझ खराब है तो दुरूपयोग होगा।

सफलता (Safalta) 00:05:54 सफलता (Safalta) Video Duration : 00:05:54 हमें जिन्दगी में ऐसी कौन-सी और कब ऐसी सक्सेस मिलेगी जिसमें हम कम्प्लीटली सैटिस्फ़...

प्रश्नकर्ता : अंकिता

हैलो! प्रेम रावत जी, मेरा नाम अंकिता है और मैं एक स्टूडेंट हूं। मैंने आपके प्रोग्राम को बहुत बार सुना है और इतनी बार सुनने के बाद मेरे मन में एक क्वेश्चन आया है, जो कि मैं आपसे पूछना चाहती हूं। लोग जॉब करते हैं, पढ़ाई करते हैं, सबकुछ करते हैं सिर्फ सक्सेस पाने के लिए। क्योंकि उनका मेन मोटिव होता है that is to only achieve success, at onceलोग सक्सेसफूल हो जाते हैं। पर तब भी उन्हें सैटिस्फैक्शन नहीं होती है। They are always dissatisfied. कई लोग होते हैं कि सक्सेसपन नहीं मिलती तो डिप्रेशन में चले जाते हैं। तो मेरा क्वेश्चन यह है कि ये सैटिस्फैक्शन, मतलब हमें जिन्दगी में ऐसी कौन-सी और कब ऐसी सक्सेस मिलेगी जिसमें हम कम्प्लीटली सैटिस्फ़ाइड रहेंगे ?

प्रेम रावत:

चार चीजें — किसी भी मनुष्य के जीवन में स्थापित हो जाएं तो सारा रूख बदल जाए। अब मैं ये चार चीजों के बारे में इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि ये हमारे स्केल में नहीं हैं। जो हम लाइन बनाते हैं, उसमें नहीं है। और लाइन हो या न हो; आप अमीर हों या न हों; आप सक्सेसफुल हों या न हों; इससे कोई मायने नहीं रखता। ये आपकी चार निज़ी चीजें आपके अंदर होनी चाहिए।

सबसे पहली बात कि मनुष्य अपने आपको जाने! 

दूसरा — उसके जीवन में आभार होना चाहिए। आभार! तो इसका मतलब है कि आप अपने बच्चे को, जिसने शैतानी की है, जिसको आप डाँटना चाहते हैं — डाँटने से पहले आप यह सोचें कि ये जो बच्चा है आपका, आपके जीवन में है, क्या आपके हृदय में इसके प्रति आभार है या नहीं ?

महिला एंकर : बच्चे के प्रति! 

प्रेम रावत:

Are you thankful for your child ? किसी से आप लड़ने जा रहे हैं। आप भी जीवित हैं, वो भी जीवित है। क्या आपके जीवन में आपके जीने का आभार — इसका अनुभव करते हैं या नहीं ? आभार! To be thankful! इस जीवन के अंदर!

तीसरी चीज है कि आप अपने जीवन में असफलता को कभी स्वीकार न करें। आप अपने जीवन में असफलता को कभी स्वीकार न करें। असफलता हो — मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप कभी असफल न हों। नहीं। आप असफल तो होंगे। सफल भी होंगे, असफल भी होंगे। परंतु जब आप असफल हों तो उस असफलता को कभी स्वीकार न करें। 

उदाहरण देता हूं मैं। जब आप, सभी लोग, सारे श्रोता जब आप बच्चे थे और आपने चलना सीखा, तो आप खड़े हुए। सबसे पहले खड़े हुए! फिर आपने थोड़े हिलकर के कदम लिए और आप गिर गए। असफल हुए। तो आप बैठ गए ? फिर खड़े हुए। तो आपके अंदर एक समय था कि ऐसी प्रेरणा थी कि असफल होते हुए भी आपने असफलता को कभी स्वीकार नहीं किया और फिर खड़े हुए और फिर खड़े हुए, और फिर खड़े हुए, और फिर खड़े हुए। और एक दिन आपने चलना सीख लिया। जब आपने बाइसकिल चलाना सीखा, साइकिल चलाना सीखा, आप गिरे, पर आपने कभी उस असफलता को स्वीकार नहीं किया। तो ये सफल होना और असफल होना, अपने में एक बात है और उस असफलता को स्वीकार करना अपने में दूसरी बात है। और आप अपने जीवन के अंदर असफलता को स्वीकार न करें।

और चौथी चीज — आपके बारे में कोई क्या सोचता है, इससे आपको मतलब नहीं होना चाहिए। 

पुरुष एंकर :  बहुत अच्छी आपने यह बात बोली।

प्रेम रावत :  तो ये चार चीजें अगर मनुष्य के जीवन में हो जाएं...

महिला एंकर : यही नहीं हो पाता। कोई आपके बारे में क्या सोचता है, इससे बहुत फर्क पड़ता है। 

पुरुष एंकर : हमारा ज्यादा वक्त इसी में निकल जाता है कि लोग हमारे बारे में क्या सोच रहे हैं।

प्रेम रावत:

जो आप सोच रहे हैं, वो आप सोच रहे हैं और जो आपको मालूम है, वो उसको नहीं मालूम है, जिसके बारे में आप सोच रहे हैं कि वो मेरे बारे में क्या सोच रहा है। तो वो क्या सोच रहा है ? वो सोच रहा है — किस फिल्म को देखने जाएं ? क्या खाएं ? आपके बारे में थोड़े ही सोच रहा है ? वो अपने सोच में मस्त है! परंतु आप बैठे-बैठे ये सोच रहे हैं कि वो मेरे बारे में क्या सोच रहा है, जबकि आपको नहीं मालूम कि वो नहीं सोच रहा है। परंतु फिर भी, क्योंकि आप हैं। आप कह रहे हैं, ‘‘अच्छा, मैं — ये सोच रहा होगा। ये सोच रहा होगा। क्योंकि, मैं होता तो मैं ये सोचता।’’ परंतु ये सबकुछ हो नहीं रहा है। ये सिर्फ एक इमेजिनेशन है आपके दिमाग में कि ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा। परंतु ये सारी चीजें दरअसल में नहीं होती हैं।

सफलता की जो लाइन है, जो दर्ज़ा है, वो हमसे शुरू होना चाहिए। किसी और से नहीं। तो ये चीजें अगर हम जरा ध्यान में रखें और अपने हृदय में हमेशा आभार! हर एक चीज की — हमारी माता हैं, हमारे पिता हैं, हमारे भाई हैं, हमारे बंधु हैं। अपने जीवन में जो कुछ है — जो कुछ नहीं है, नहीं। जो कुछ है, उसके लिए आभार है या नहीं ?

कामयाबी (Kaamyaabi) 00:09:12 कामयाबी (Kaamyaabi) Audio Duration : 00:09:12 आज जो तुम्हारे जीवन में असफलता आती है — कभी भी आती है तो तुम हार क्यों मान लेते ...

प्रेम रावत:

अगर मनुष्य को देखा जाए तो हर एक मोड़ पर मनुष्य हार मान लेता है। वो कहता है कि मैं अब आगे नहीं जा सकता। भगवान से प्रार्थना करता है, मंदिरों में जाता है, मन्नतें मांगता है। क्या-क्या नहीं करता है ? क्योंकि वो समझता है कि वो आगे नहीं चल सकता। जीवन में समस्याएं आती हैं और जितनी बड़ी समस्या होती है, उतना ही वो अपने आपको छोटा पाता है।

पर एक बात मैं कहना चाहता हूं और वो बात ये है कि एक समय था, जब एक व्यक्ति, जिसको भगवान के बारे में नहीं मालूम था। दुनियादारी के बारे में नहीं मालूम था। कौन-सा हवन करूं, कौन-सा यज्ञ करूं — कुछ नहीं। वो किसी गुरु के पास जाकर के सत्संग नहीं सुन सकता था। वो किसी inspirational speaker के पास जाकर के कोई उसका लेक्चर नहीं सुन सकता था।

पर उसके जीवन के अंदर एक ऐसा मौका आया, जिसको पूरा करने के लिए उसकी सारी शक्ति लगी। और कितनी ही बार — एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं, चार बार नहीं। कितनी ही बार वो कामयाब नहीं रहा। परंतु फिर भी उसने हार नहीं मानी। वो कौन था ? हम सब थे। और बात कर रहा हूं मैं उस समय की, जब आप छोटे बच्चे थे। चलना सीख रहे थे। कितनी बार गिरे आप ? आपने कोशिश की खड़ा होने की, कदम लेने की और गिर गये। असफलता हर कदम में थी। टांगें — इनमें बल नहीं था कि तुम्हारा वजन उठा सके। तो जब बच्चे को देखते हो, जब खड़े होने की कोशिश करता है तो वो हिलता है। क्योंकि उसके पैर अभी इतने मजबूत नहीं हैं और असफलता हर कदम में। परंतु वो कभी अपनी हार को नहीं मानता है।

आप जितने भी यहां बैठे हुए हैं, आपके साथ यही हुआ है। अब आपको याद हो या न हो, पर हुआ। और असफलता हर एक कदम में — उठे, कोशिश की, गिरे! कई बार रोये भी!

मां ने कहा, "बेटा! उठ! कोशिश कर! अच्छा बच्चा है, अच्छी बच्ची है।"

वो समझ में नहीं आया, क्या कहा, पर कोशिश की। हार नहीं मानी। हार नहीं मानी तो फिर उठने की कोशिश की। फिर असफलता मिली। फिर कोशिश की। फिर असफलता मिली! फिर एक दिन उन सारी असफलताओं के बावजूद — क्योंकि आपने हार नहीं मानी, उसका परिणाम क्या हुआ ? उसका परिणाम हुआ कि एक दिन आपने एक कदम लिया और आप नहीं गिरे! फिर दूसरा कदम लिया और आप नहीं गिरे। फिर तीसरा, फिर चौथा, फिर पांचवां, फिर छठा! और आपने क्या हासिल कर लिया ? आपने चलना हासिल कर लिया। और जिस दिन आपने चलना हासिल कर लिया, उस दिन आपने अपने आपको एक ऐसा तोहफा दिया, ऐसी कामयाबी पायी कि आपने संसार में एक ताला ऐसा खोल दिया कि अब आपके पास स्वतंत्रता थी कि आप जहां जाना चाहें, आप जा सकते हैं।

और इसका मूल कारण क्या था ? असफलता या हार न मानना! असफलता तो थी! जैसे ही पहली बार कोशिश की — भड़ंक! दूसरी बार कोशिश की — भड़ंक! उसके बाद ऐसी भी हालत आयी कि एक कदम लिया और फिर — धड़ाम, फिर खत्म! तो ये तुम्हारे साथ हुआ ?

फिर क्या हुआ ? उसके बाद तो तुमको पता लग गया — भगवान कौन है, क्या है, कहां रहता है। वो ऊपर रहता है, ये होता है, वो होता है। पाठ है, पूजा है, पंडित हैं! और हार माननी शुरू कर दी! एक तरफ ज्ञानी बने। और ज्ञानी कैसे बने ? जैसे ही ज्ञानी बने, पहले अज्ञान के कुएं में छलांग मारी। मारी कि नहीं मारी ? उस बच्चे का अज्ञान देखो! उसे न मालूम है, न परवाह है। उसे न मालूम है, न परवाह है, परंतु एक चीज उसने हासिल की, तुमने हासिल की! तो आज जो तुम्हारे जीवन में असफलता आती है — कभी भी आती है तो तुम हार क्यों मान लेते हो ? जब तुमको मालूम है कि तुम्हारे जीवन में एक ऐसा हादसा हुआ है, जिसमें तुमने कभी हार नहीं मानी और हार न मानने की वजह से, उसकी सफलता तुम्हारे जीवन भर साथ है। ये सच्चाई है! ये कहानी नहीं है।

ये कामयाबी — क्या सबकुछ इतना बदल गया है कि वो कामयाबी आज संभव नहीं है तुम्हारे जीवन में ? पर किन बातों में फंस गये हो ? क्या है तुम्हारी सोच ? 

खुशी असल में है क्या ? 00:04:52 खुशी असल में है क्या ? Video Duration : 00:04:52 असली खुशी, असली हैपीनेस अंदर से आती है।

Title on screen: खुशी असल में है क्या ?

ऐंकर: हैपिनेस की बात होती है। शांति की, पीस की बात होती है। और इसीलिए शायद हमारे देश में कुछ स्टेट के गवर्नमेंट भी आगे आते हैं।

हैपिनेस डिपार्टमेंट तक बना दिया। डिपार्टमेंट बना देने से क्या कोई खुश हो सकता है ? या उसके लिए कुछ और करने की जरूरत है हमको ?
प्रेम रावत जी: बात यह है कि हम हैपीनेस को समझते ही नहीं हैं। अब बना दिया डिपार्टमेंट। हैपीनेस डिपार्टमेंट बना दिया। वो एक्शन लेगा। कुछ करेगा। सबसे पहले यह बात समझने की होनी चाहिए कि हैपीनेस सब्जेक्टिव है या ऑब्जक्टिव है ? सब्जेक्टिव का मतलब — ये आपके एहसास करने की बात है। ऑब्जेक्टिव है — नहीं, इसका एक फॉर्मूला है। तो अगर हम हैपीनेस को ऑब्जेक्टिव बना दें, जबकि वो सब्जेक्टिव है। कोई आदमी है, वो खुश है या नहीं है ? उसके पास पैसे नहीं हैं। वो खुश है या नहीं है ? कैसे पूछेंगे आप?

मैंने देखा है छोटे बच्चों को रोड पर, उनके — जूते नहीं हैं उनके पास और एक बाइसिकल का चक्का लेकर के एक लकड़ी के साथ — उसको चला रहे हैं और उनकी स्माइल है इतनी बड़ी। वो हैपी हैं या नहीं ? खुश हैं या नहीं ? तो हमारे दिमाग में एक बात डाल दी गई है कि तुम तब खुश होगे, जब तुम्हारे पास जॉब होगा, जब तुम्हारे पास पैसा होगा, जब तुम्हारे पास कार होगी, जब तुम्हारे पास ये होगा, वो होगा। अब लोग हैं, कई लोग हैं, जो बड़े खुशी से शादी करते हैं। इतनी बड़ी स्माइल! बैंड बज रहा है, बाजा बज रहा है। सब नाच रहे हैं। चार महीने के बाद, पांच महीने के बाद वो स्माइल जो है, यहां आ गई।

ऐंकर: स्क्वीज़ हो जाती है।

प्रेम रावत जी: क्या हुआ ? क्या हुआ ? अगर आप अपनी खुशी और चीजों पर निर्भर रखेंगे तो यही होगा। यही होगा! क्योंकि खुशी, असली खुशी, असली हैपीनेस अंदर से आती है। जब कोई चीज सेट हो, जब कोई चीज ठीक हो अंदर से तो ये बहुत जरूरी है इस बात को जानना कि एक तो हमारे जीवन के अंदर हमको आभार का अहसास होना चाहिए।

और दूसरी चीज, हम ये न सोचें कि दूसरा मेरे बारे में क्या सोच रहा है। एक, फिर तीसरी चीज, हम अपने आपको जानें। अपने आपको पहचानें। और हमारे जीवन के अंदर हमेशा आशा रहनी चाहिए। ये हैं बेसिक फंडामेंटल्स! और गवर्नमेंट इसके बारे में क्या कर सकती है ? नहीं। मनुष्य को करना पड़ेगा। हमारी रिलॉयबिलिटी कि गवर्नमेंट हमारी प्रॉब्लम्स सॉल्व करेगी, इतनी हो गई है, इतनी हो गई है और अगर हम रिपोर्ट-कार्ड देखें — देखिए! अगर आपका बच्चा स्कूल जाता है तो वो कैसा पढ़ रहा है ? पास हो रहा है या नहीं हो रहा है ? ये आप रिपोर्ट-कार्ड से देखते हैं। उसके दिमाग में आया भी है या नहीं आया? हम गवर्नमेंट का रिपोर्ट-कार्ड बनाते हैं ?

ऐंकर: ना।

प्रेम रावत: कितनी प्रोमिसेज़ की और कितनी प्रोमिसेज़ रखीं।

ऐंकर: नो चेकिंग बैलेंस।

प्रेम रावत: कहां है रिपोर्ट-कार्ड ? सोसाइटी ने कहा, हम तुमको ये देंगे, ये देंगे, ये देंगे, ये देंगे! कहां है रिपोर्ट-कार्ड ? और अगर रिपोर्ट-कार्ड आज बनाया जाये तो मैं आपको गारंटी देता हूं कि सारीकी सारी चीजें फेल होंगी। एक भी पास नहीं होगा उसमें से।

क्योंकि वर्ल्ड-लीडर्स आते हैं, उन पर हम रिलॉय करते हैं कि ये शांति लाएंगे। लाया कोई ? तो कब छोड़ेंगे हम ये आदत ? उन पर रिलॉय मत करें, अपने पर रिलॉय करें। अगर आपको सचमुच में सफाई चाहिए अपने देश में तो यह आप पर निर्भर है। आप गंदा न करें। क्योंकि मैं देखता हूं। देखता हूं! लोग जो सोचते भी नहीं हैं और कूड़ा फेंकते हैं। सोचा भी नहीं। मतलब, एक सेकेंड भी नहीं सोचा। ये कहां जाएगा ? मैनुफैक्चर्स बना रहे हैं चीजें, उनको पैकेजेज़ में डाल रहे हैं और कूड़ा इकट्ठा हो रहा है। कहां ? कब लेगा मनुष्य अपनी जिम्मेवारी अपने पर ? और जबतक ये नहीं होगा, कोई खुश नहीं हो सकता।

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