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क्या कहानियां आज भी महत्त्वपूर्ण हैं? 00:07:45 क्या कहानियां आज भी महत्त्वपूर्ण हैं? Video Duration : 00:07:45

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बच्चों और बड़ों को कुछ समझाने के लिए क्या कहानियां आज भी महत्त्वपूर्ण हैं ?

 

प्रेम रावत:

 

देखिए! कहानी के दो कारण होते हैं। एक तो जो कहानी सुनाने वाला है, उसको अच्छी तरीके से मालूम है कि वो क्या कहना चाहता है। परंतु जो वो कहना चाहता है, वो हो सकता है कि दूसरा समझ न पाए। क्योंकि हो सकता है कि वो चैलेंजिंग भी हो! और जो सुनने वाला है, वो कहे, ‘‘नहीं!’’

 

तो कई बार कहानी एक ऐसी चीज है कि जब गोली खाते हैं न, कई गोलियां हैं, उन पर बाहर चीनी लगा देते हैं, मीठा लगा देते हैं, ताकि उसको हजम करने में अच्छा लगे, कड़वापन न आए। तो एक स्थिति, परिस्थिति और वो ऐसी परिस्थिति, जो entertaining हो! और उसके बीच में वो शिक्षा पड़ी हुई है। और बच्चा उसकी imagination जो है, वो trigger हो! तो जब बच्चा सुन रहा है उसको तो वो सोच भी रहा है और देख रहा है अपने दृष्टिकोण से कि ‘‘अच्छा! ये राजा था! वो ऐसा था! वो वैसा था! वो ऐसा था! वो ऐसा था!’’

 

अगर कहानी को प्योरिली इंटरटेनमेंट रूप से लिया जाए तो आप टेलीविजन के साथ कैसे compete करेंगे, जिसमें कहानी पूरी की पूरी है ?

 

राजा कैसे कपड़े पहनते थे, ये बच्चे को imagine करना था। अब imagine करने की क्या जरूरत है ? सिर्फ आँखें खोलिए, पर्दे पर देखिए, टेलीविजन पर देखिए और आपको दिखाई देगा कि उन्होंने कैसे कपड़े पहने हुए हैं। तलवार कैसी होती थी ? ये है, वो है! ये सारी चीजें तो imagination नहीं fire हो रही है। अब, जब मूवी देखते हैं हम, कोई भी मूवी तो हमको कुछ करने की जरूरत नहीं है। Imagine करने की जरूरत नहीं है। कहानी अपने आप unfold करेगी और उसमें जहां-जहां emphasis डालना है, वो डाला जाएगा, म्यूजिक के द्वारा डाला जाएगा, डायलॉग के द्वारा डाला जाएगा। धमाके के साथ डाला जाएगा। हमको तो सिर्फ वहां बैठना है, आँखें खोलनी है और देखते रहो!

 

कहानी ऐसी चीज नहीं है। कहानी एक very human चीज है। एक बहुत मानवता की बात है! मनुष्य की बात है! उसकी imagination trigger करने की बात है। तो सबसे पहले मैसेज क्या है ? अगर मैसेज को देखा जाए — और वो मैसेज नहीं है उसमें और सिर्फ entertainment है तो काम नहीं चलेगा। वो इसलिए नहीं चलेगा, क्योंकि आप compete कैसे करेंगे कार्टून के साथ ? आप compete कैसे करेंगे, जो वो मूवी फोन पर देख सकता है, वो अपने आई-पैड पर देख सकता है या अपनी टेबलेट पर देख सकता है या अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर देख सकता है या टेलीविजन पर देख सकता है। Impossible! संभव नहीं है। तो एक मूवी है, जो टेलीविजन पर देखता है और एक मूवी है, जो वो अपने दिमाग से देखता है। कहानी है वो चीज, जो वो टेलीविजन {इशारा करते हुए} यहां से देखे! तो सारा उसको, सारे एक्टर उसको लाने हैं। सबकुछ — ड्रामा उसको लाना है, सबकुछ लाना है। और वो इतना engage हो जाता है उसमें —

 

जब मैं छोटा था, मैं कहानी का मेरे को इतना शौक था कि आप पूछिए मत! जो कोई भी मेरे को कहानी सुना सकता था, मैं उसके पास जाकर बैठ जाता था, ‘‘सुनाओ!’’ सबेरे हो, शाम हो, दोपहर हो! और ये imagine! क्योंकि उस समय —टेलीविजन नहीं आया था। सिर्फ रेडियो था। और रेडियो की भी बहुत थोड़ी-सी चैनल थी। और सबेरे-सबेरे थोड़े से भजन आते थे, फिर खबर आती थी, फिर थोड़ी और खबर आती थी और उसको दोहराया जाता था, फिर रेडियो बन्द! फिर लंच टाइम के समय थोड़ा-सा और रेडियो आता था, फिर रेडियो बंद! फिर शाम के समय रेडियो आता था। मतलब, रेडियो भी हमेशा नहीं चलता था। तब entertainment के लिए क्या करें ?

 

वो कहानियां explore करना, बाहर जाना, पेड़ को देखना, आम चखना, लीचियों को चखना! और सारे दिन, गर्मियों के दिन यही करना। तो ये चीजें आज बहुत दुर्लभ हो गई हैं। हैं! दुर्लभ हो गई हैं। आदमी को खींच के रखा हुआ है। अब मैं नहीं कह रहा हूं कि टीवी गलत है। मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं नहीं कह रहा हूं कि जो मूवीज़ हैं, वो गलत हैं। नहीं। ये तो होगा। बात ये है कि मनुष्य को सोचने की जरूरत है। और अपने बारे में सोचने की जरूरत है। और जहां तक कहानियों की बात है — जब वो आदमी के लिए मैसेज क्लीयर है तो वो कहानी सुना सकता है।

 

क्योंकि कहानी एक आदमी के हृदय से, एक आदमी के दिमाग से दूसरे की तरफ जा रही है। और ये चीज बहुत जरूरी है।

 

अब एक बात मैं थोड़े रूप में कहता हूं। हो सकता है कि आगे जाकर इसका और खुला-खुलासा हो! तो ये है कानून दो मोमबत्तियों का। यह भी एक कानून है। अगर एक मोमबत्ती जल रही है और एक मोमबत्ती बुझी हुई है और आप दोनों मोमबत्तियों को साथ में लगाएं तो कानून यह है कि जो जल रही है, वो बुझी हुई मोमबत्ती को जला देगी। कानून यह नहीं है कि बुझी हुई मोमबत्ती जलती हुई मोमबत्ती को बुझा दे। यह कानून है! प्रकृति का कानून है! और इसकी वजह से जो मोमबत्ती जल रही है, उसमें ये क्षमता है कि वो दूसरी मोमबत्ती को जला दे। यह सबकी जिम्मेवारी है। हर एक मनुष्य जो है इस संसार के अंदर — चाहे वो मर्द हो, चाहे वो औरत हो, चाहे वो बच्चा हो, चाहे वो बूढ़ा हो — यह सबमें क्षमता है। बात ये नहीं है कि जो जलती हुई मोमबत्ती है, उसको लम्बा होना चाहिए, उसको बड़ा होना चाहिए। ना! चाहे वो बहुत छोटी-सी क्यों न हो, पर जल रही हो तो वो बहुत बड़ी, लम्बी-चौड़ी बुझी हुई मोमबत्ती को भी जला सकती है। तो हो सकता है कि आगे इसका और खुलासा किया जाए। पर यह बात बहुत जरूरी है। और ये कहानियां, ये संदेश इसीलिए जरूरी है लोगों तक पहुंचे। क्योंकि यह उनको include करता है। यह नहीं है कि इस टेलीविजन को देखिए! यह टेलीविजन बढ़िया है या इस मूवी को देखिए! या ये करिए, वो करिए! नहीं! जो आपके पास है, उसको देखिए! जो आप हैं, उसको जानिए! जो आप हैं, उसको पहचानिए! यह आप पर निर्भर है।

पहला कदम (ऑडियो) 00:02:48 पहला कदम (ऑडियो) Audio Duration : 00:02:48 सबसे पहला कदम — इस बात को आप जानिए कि आपके अंदर शांति है।

अगर मैं आपको कहूं कि पहला कदम आपका आगे नहीं होगा।

 

ये सब सोच रहे हैं कि आगे कदम लेना है। आगे कैसे बढ़ेंगे ?

 

आगे नहीं लेना है, अंदर की तरफ लेना है। क्योंकि Peace — जो शांति आपको चाहिए, वह आपके अंदर है। अभी भी है। और जब आप गुस्सा होते हैं न, तब भी है और जब आप अपने को कोसते हैं किसी वज़ह से, तब भी है। और जब आप खुश होते हैं, तब भी है। जब आप दुःखी होते हैं, तब भी है और आपके अंदर है।

 

और पहला कदम है, सबसे पहला कदम है कि — इस बात को आप जानिए कि आपके अंदर शांति है। क्योंकि अभी तक जो कुछ सिखाया गया है आपको, वो ये है कि जो आप — जिस चीज की आपको जरूरत है, वह आपके पास नहीं है।

 

खिलौना जो आपको चाहिए था, वो कहां है ?

 

बाजार में है। वो तो जाकर लेना पड़ेगा।

 

एज़ुकेशन जो आपको चाहिए थी, वो कहां है ?

 

वो स्कूल में है। स्कूल में आपको जाना पड़ेगा।

परंतु शांति की जहां बात है, वो बाहर नहीं है, वह आपके अंदर है। और जिस दिन आप यह जान जाएंगे कि — एक, शांति आपके अंदर है और दूसरी, शांति आपकी जरूरत है, चाहत नहीं। क्योंकि चाहत आपकी बदलती रहती है। इसीलिए आपके क्लॉज़ेट में ऐसी चीजें हैं, जो एक दिन आपने खरीदी और आज आप उनको इस्तेमाल नहीं करते हैं। क्योंकि आपकी चाहत बदलती रहेंगी। परंतु जिस दिन आप पता कर लेंगे कि शांति आपकी जरूरत है, उस दिन...

 

क्योंकि आज लोग यही कर रहे हैं, "मैं खोज रहा हूं। मैं शांति को खोज रहा हूं।"

 

तो ये रूमाल मेरे जेब में है। अब ये रूमाल को कहां ढूंढ़ूं मैं ? और कितना ढूंढूं ? कहां ढूंढ़ूं ?

 

मैं चाहे सारे संसार की यात्रा कर लूं, परंतु ये नहीं मिलेगा मेरे को संसार में। क्योंकि मेरी जेब में है और जेब में ढूंढ़ूंगा तो तुरंत मिलेगा। तो यही बात है। तो लोग खोज रहे हैं। मैं कह रहा हूं, खोज रहे हो तो खोजते रहो। खोज लो! आज तक किसी को मिली नहीं खोजने से, क्योंकि वो  तुम्हारे अंदर है।

 

- प्रेम रावत

कौन हूं मैं (ऑडियो) 00:09:27 कौन हूं मैं (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:27 हम अपने बारे में भूल जाते हैं कि हम कौन हैं और क्या हासिल कर सकते हैं अपने जीवन...

मैं कौन हूं ? मैं हूं, ये मेरे को मालूम है, क्योंकि मैं स्वांस लेता हूं, मैं सोच सकता हूं, मैं देख सकता हूं। सुख और दुःख का मैं अनुभव कर सकता हूं।

 

ये सारी चीजें जो मेरी जिंदगी के अन्दर होती रहती हैं, ये क्यों ? क्योंकि मैं जीवित हूं। मुझे मालूम है कि अगर मैं जीवित नहीं रहता तो न मेरे को सुख का अनुभव होगा, न दुःख का अनुभव होगा।

 

हम अपने बारे में भूल जाते हैं कि हम कौन हैं ? मैं यहां क्यों हूं ? क्या कर रहा हूं ? क्या मैं हासिल कर सकता हूं अपने जीवन के अन्दर ?

 

ये है स्टेज। ये है स्टेज और स्टेज में — स्टेज के ऊपर आप हैं। और आप क्या करेंगे, क्या है आपका हिस्सा ? नाचने का है ? गाने का है ? एक्टिंग करने का है ? नहीं, एक्टिंग करने का है ? क्या करने का है ? audience कौन-सी है ? कौन हैं audience में बैठे लोग ? दुनिया कहेगी कि दुनिया है। संसार बैठा हुआ है। संसार नहीं बैठा है। कुछ लोग समझते हैं कि संसार बैठा है audience में और संसार को please करना है। संसार clap करेगा। अगर हम अच्छी एक्टिंग करें, अच्छा गाना गाएं तो संसार clap करेगा। संसार रूपी अगर कोई है तो वो अंधा है, वो कुछ नहीं देख सकता। और बहरा है, कुछ नहीं सुन सकता। और गूंगा है, कुछ नहीं बोल सकता। और न उसके हाथ हैं।

 

तो कौन बैठा है audience में ?

 

मैं आपको बताता हूं, कौन बैठा है audience में। audience में बैठा है आपका हृदय। आपका अपना हृदय जिसको प्यास है अपने बनाने वाले को देखने की। अपने अन्दर स्थित, अपने अंदर स्थित जो परमात्मा है उसको जानने की, उसका अनुभव करने की। और अगर वो प्रकट हो जाए इस show में तो आपका हृदय आपको applaud करेगा।

 

घट घट मोरा सांइया, सूनी सेज ना कोय।

बलिहारी उस घट की, जिस घट प्रगट होय।।

 

जब इस ड्रामे में जिसमें tragedy भी है — मैं नहीं कहता tragedy नहीं है, tragedy है, अज्ञान है, crises है, रोना है, सबकुछ है। पर एक possibility, एक संभावना और है। और वो संभावना है कि इस play में वो, जो अविनाशी हंस हमारे अन्दर बैठा है वो प्रकट हो। अगर वो हो गया, आपने जान लिया, आपने पहचान लिया तो बात ही दूसरी है।

 

एक joke है, चुटकुला है कि एक बुड्ढा आदमी रोड के पास बैठा हुआ रो रहा था। रो रहा था, रो रहा था, रो रहा था, किसी ने पूछा — क्यों रो रहा है ?

 

कहा कि मेरी अभी-अभी नई शादी हुई है और वो भी बहुत जवान लड़की से और बहुत खूबसूरत है वो।

 

तो आदमी ने कहा — भाई इसमें रोने की क्या बात है ? तेरे को तो खुश होना चाहिए।

 

कहा — भाई, यही नहीं, मेरा अभी नया-नया घर बना है और बहुत ही अच्छा घर है, बहुत ही सुन्दर घर है। सब जगह marble है, granite है, air-conditioned है। बहुत ही सुन्दर घर बना है।

 

कहा — तेरे को तो खुश होना चाहिए।

 

कहा — यही नहीं, मैंने अभी-अभी नई कार खरीदी है और बहुत ही बढ़िया कार है।

 

तो आदमी ने कहा कि भाई, ये सारी चीजें तेरे पास हैं, तो तेरे को बहुत ही खुशी होनी चाहिए। तू रो क्यों रहा है ?

 

तो बुड्ढा कहने लगा कि मेरे को मालूम नहीं कि मैं रहता कहां हूं। मैं ये भूल गया कि मैं रहता कहां हूं।

 

ये तो वो वाली बात हो गयी कि कोई आकर कहे कि मेरी याददाश्त बहुत तेज है, ये तो एक बात मेरे को मालूम है और दूसरी चीज मैं भूल गया।

 

तो क्या याद रखा ? क्या याद है कि तुम भी कुछ हो ?

 

सारी technologies हैं, जहां technology की बात है, technology से हमको बहुत प्रेम है। I love technology, latest, greatest everything, read up magazines हैं। परन्तु एक ऐसी भी तो technology होगी, जो मेरे को मेरे तक पहुंचाए। जिस technologies की मैं आज बात कर रहा हूं, जो बाहर की technologies हैं, ये तो बदलती रहेंगी। ये तो बदलती रहेंगी।

 

एक technology जो इस स्वांस तक मिला दे। एक technology जो उस चीज तक मिला दे, जो हमारी जिंदगी के अन्दर सबसे जरूरी है। जिसके बिना हमको नहीं मालूम कि हम रहते कहां हैं। सबकुछ होने के बावजूद भी हम भूल गए कि हम रहते कहां हैं। हम हैं कौन। और अगर यही होता रहेगा हमारी जिंदगी के अन्दर, तो हम अपनी जिंदगी के अन्दर दिशा कैसे पा सकेंगे ?

 

तो इस जीवन के अन्दर — इस जीवन के अन्दर, अगर हम किसी चीज को समझ सकते हैं, तो उस चीज को समझें कि हमको उस बनाने वाले ने क्या दिया है। इस स्वांस के अन्दर क्या छिपा है। इस जीवन के अन्दर क्या छिपा है।

 

बहुत सारे जवान लोग हैं वो कहते हैं कि हमारा टाइम नहीं है अभी। हमारा टाइम है, मस्ती लेने का। जब बुड्ढे होंगे, तब इन चीजों के बारे में सोचेंगे। ये आपका प्लान है या उसका प्लान है ? ये आपका प्लान है ? आपके प्लान में — इतने समय से इतने समय तक आप ये करेंगे, इतने समय से इतने समय तक आप मस्ती करेंगे, इतने समय से इतने समय तक आप ये करेंगे। इसके बाद आप वृद्ध होंगे। इसके बाद आप retirement लेंगे। इसके बाद आप इस संसार से जाएंगे। ये आपका प्लान है, क्योंकि वहां एक department है और उसका अपना प्लान है और जो उसका प्लान है, वही होता है। जो आपका प्लान है वो नहीं होगा। अरे! मस्ती करनी है अगर इस संसार के अन्दर, तो करो पर ऐसी मस्ती करो कि जिसमें सचमुच मस्त हो जाओ। सचमुच मस्त हो जाओ। और वो मस्ती बाहर की नहीं है। वो मस्ती है तुम्हारे अन्दर! वो सुख!

 

      राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।

      जो सुख साधु संग में, वो बैंकुंठ न होय।।

 

ये है! ये है वो बात! असली सुख की बात कर रहे हैं। असली आनन्द की बात कर रहे हैं।

 

- प्रेम रावत:

पारिवारिक समस्याओं के बीच शांति कैसे मिलेगी? 00:05:29 पारिवारिक समस्याओं के बीच शांति कैसे मिलेगी? Video Duration : 00:05:29 आप क्या योगदान करते हैं, अपनी फैमिली की हैप्पीनेस के लिए ?

प्रश्नकर्ता : सर! मैं पूछना चाहता हूं कि परिवार की समस्याओं के साथ शांति कैसे लाई जा सके। चूंकि हमारी जिम्मेदारी परिवार के प्रति बहुत होती है और कोशिश भी करते हैं, फिर भी उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। तो कृपया मार्गदर्शन करें!

 

प्रेम रावत जी : देखिए! जहां तक परिवार की बात है — मैं एक चीज आपको याद दिलाऊं कि — आप जानते हैं कि चेन क्या होती है। जैसे बाइसिकिल की चेन होती है। तो उसमें छोटे-छोटे, छोटे-छोटे लिंक्स होते हैं। आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि एक — अगर उसमें सौ लिंक भी हैं और एक लिंक निकाल दिया जाए और 99 हैं तो वो चेन, चेन नहीं रहेगी। अब उसका वो लिंक टूट गया है।

 

सबसे पहले आप यह मालूम करिए अपने आप में कि आप क्या योगदान करते हैं, अपनी फैमिली की happiness के लिए ?

 

मैं खाने की बात नहीं कर रहा हूं, मैं घर की बात नहीं कर रहा हूं! देखिए! फैमिली एक ऐसी चीज है कि वो भूखे हैं, आप हैं, प्यार है तो वो भूखे भी चलेगा, फैमिली रहेगी! बारिश भी हो रही है, छत नहीं है, फैमिली है, आप सब साथ हैं, तो भी चलेगा। फैमिली चीज ही एक ऐसी है। तो आप अपनी फैमिली को क्या योगदान कर रहे हैं ? आप उनके problems solver बन गए हैं या अभी भी आप वो फैमिली के हिस्से हैं, जो कि उस फैमिली में सुकून, चैन, happiness, joy ला सकते हैं। और वो, जब आपकी फैमिली है तो वो रहेगा।

 

अब लोग क्या हैं! लोगों को फैमिली में भी — अभी ये बात मेरे से दो-तीन साल पहले किसी ने पूछी थी कि हमारे फैमिली में ये सब चुगली होती रहती है, ये सबकुछ होता रहता है और disharmony होती रहती है।

 

तो मैंने कहा कि "आपका क्या योगदान है उसमें ?"

 

तो पहले तो उनको लगा कि "ऐं ? मेरा क्या योगदान है ?" फिर उनको समझ में आया कि मैं क्या कह रहा हूं और उनका वो योगदान था।

 

देखिए! आप घर आते हैं अपनी नौकरी से। थके-मांदे आते हैं। और आपको ये है कि थोड़ा-सा चैन मिल जाए। और घर आते हैं तो कई बार ये होता है कि "मेरे को ये चाहिए, पापा! ये चाहिए, पापा! ये चाहिए, मेरे को ये कर दो! मेरे को ये कर दो, ये कर दो!" ये एक दिन में नहीं बदलेगी बात। क्योंकि ये माहौल आपने बनाया, इसमें मदद किया आपने इस माहौल को बनाने में। क्योंकि जब वो छोटे ही छोटे, छोटे, छोटे, छोटे थे — "वो! बहुत प्यारा है! हां! मैं ऑफिस से आया हूं, ये है, वो है!" पर धीरे-धीरे वो बड़े हो रहे हैं। ये तो वही वाली बात है, जैसे शेर पाल रखा है न ? जब वो छोटा है तो म्याऊं-म्याऊं करता है। और जब बड़ा हो जाता है तो वही शेर "हाऽऽऽऽऽऽ' करके आता है। इस माहौल को भी आप बदल सकते हैं। इस माहौल को भी आप बदल सकते हैं कि "आओ! बैठो! दो बात करो! दो बात! डिमांड नहीं।"

 

देखिए! अब मैं यहां इसलिए नहीं आया हूं कि मैं दुनिया की सारी समस्याएं solve करूं। परंतु सबसे बड़ी चक्कर — सबसे बड़ा चक्कर क्या है इस दुनिया के अंदर आप जानते हैं ? लोग एक-दूसरे की बात नहीं सुनते हैं। लोग एक-दूसरे की बात नहीं सुनते हैं। विद्यार्थी, टीचर की बात नहीं सुनते हैं। और कई बार — विद्यार्थी तो यही कहेंगे, टीचर हमारी बात नहीं सुनते हैं। नागरिक politician की बात नहीं सुनते हैं, politician नागरिक की बात नहीं सुनते हैं। पुलिस वाले यही कहेंगे, वो हमारी बात नहीं सुनते हैं और नागरिक यही कहेंगे, वो हमारी बात नहीं सुनते हैं। दो बात सुनने के लिए क्या लगेगा ? कुछ नहीं। कुछ नहीं! कुछ नहीं! कुछ नहीं। परंतु दो बात सुन लीजिए अपनी फैमिली से। और मैं सच कहता हूं कि वो दो बात अगर आप सुनना शुरू करें तो वो एक दिन तीन शब्दों में बदल जायेगी —  I love you!

बलवान कौन (ऑडियो) 00:09:28 बलवान कौन (ऑडियो) Audio Duration : 00:09:28

प्रेम रावत:

एक आदमी था। बहुत मेहनत करता था, पत्थर का काम करता था। वो हर रोज अपने घर से चल के पहाड़ पर जाता था। एक बड़ा-सा टुकड़ा जो वह अपने घर तक ले जा सके, इतना बड़ा पत्थर का तोड़ता था, घर ले जाता था और उसको फिर छेनी से, हथौड़े से उसकी तरह-तरह की चीजें बनाता था — मूर्ति बनाता था, सिलबट्टा बनाता था — ये सारी चीजें बनाता था।

सारे दिन उसको काम करना पड़ता था। धूल उड़ती थी, पसीने का काम था, मेहनत का काम था। हर रोज, चाहे इतवार हो, चाहे शनिचर हो, चाहे शुक्र हो, कोई भी त्योहार हो, उसको तो जाना था। क्योंकि जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बनाकर के वो बाजार में बेचता था, उससे उसका पेट चलता था। अब उसको ऐसा लगता था हमेशा कि जो उसके साथ हो रहा है, वो ठीक नहीं है कि वह शक्तिशाली क्यों नहीं है ? वह इतना गरीब क्यों है ? शक्तिशाली होना चाहिए उसको ।

एक दिन वो सड़क से जा रहा था। एक बहुत बढ़िया आलीशान कोठी थी, वहां पार्टी हो रही थी। तो उसने रुककर के, दीवाल के ऊपर से देखा तो उस घर में — बहुत रईस आदमी का घर था वो। उसके नौकर-चाकर और उसमें उसके गेस्ट आ रखे थे, पार्टी हो रही थी। सब बढ़िया चल रहा था। लोग उसको बधाई दे रहे थे। उसको लगा कि ‘मेरे को तो ये चाहिए!’

तो वो भगवान की तरफ उसने चेहरा किया, ‘‘हे भगवान! मेरे को ऐसा क्यों नहीं बनाया ? ऐसा बना दे!’’

उस दिन भगवान अच्छे मूड में थे। देख रहे थे नीचे की तरफ, उसकी तरफ! चुटकी बजाई और वो रईस बन गया। अब रईस बन गया, उसके नौकर-चाकर सब ‘‘जी हुजूर! जी हुजूर! जी हुजूर!’’ और उसके दोस्त आ रहे हैं, उससे मिलना चाहते हैं। बड़ा ही वो ‘जरूरी आदमी’ बन गया। उसको अच्छा लगा कि ‘‘हां! ये है न जिंदगी! वो पत्थर वाली जिंदगी नहीं, जहां हर रोज पत्थर घसीटना पड़ता है। हर रोज काम करना पड़ता है। अब मेरी कितनी इज्जत है। मैं कितना शक्तिमान हूं।’’

ऐसे-ऐसे करके कुछ दिन निकल गए। तो एक दिन काफी आवाज आ रही थी सड़क से तो उसने जाकर देखा तो वहां सब — सारे शहर के अमीर लोग वहां खड़े हुए और जो आ रहा है, जैसे ही जैसे उसकी सवारी आए, सभी लोग उसके सामने झुक रहे हैं।

उसने पूछा किसी से कि ‘‘ये कौन है, जो मेरे से भी ज्यादा शक्तिशाली है ?’’

तो कहा ‘‘ये राजा है।’’

‘‘राजा तो मेरे से भी शक्तिशाली है! हे भगवान! मुझे राजा बना दे!’’

उस दिन भी भगवान अच्छे मूड में थे और उसकी तरफ देखा, चुटकी बजाई और वो राजा बन गया। अब राजा बन गया तो उसको लगा कि ‘‘यह तो बहुत ही बढ़िया है! अब यहां तो सभी लोग मेरे को — मेरे सामने झुकते हैं। कितनी मेरी शान है!’’

ऐसे करते-करते कुछ दिन बीते तो एक दिन वो सबेरे-सबेरे उठकर के अपने बरांडे में, बाहर खड़ा-खड़ा चाय पी रहा था और उसने देखा कि इतना बड़ा सूरज उगने लगा, उदय होने लगा। और जैसे सूरज उदय होने लगा, सारी चिड़ियां, सारे जानवर जगने लगे, लोग उठने लगे। सबकुछ होने लगा।

उसने कहा, ‘‘बाप रे बाप! ये सूरज कितना बलवान है! ये तो मेरे से भी ज्यादा बलवान है। इसके उदय होने से सारी पृथ्वी जागने लगी है। हे भगवान! मेरे को सूरज बना दो!’’

उस दिन भी भगवान कुछ अच्छे मूड में थे, सूरज बना दिया। अब वो जहां जाए, चमके और लोग उसकी तरफ देखें और सारी सृष्टि, सारी चिड़िया, सारे जानवर — जब वो उदय हो, तब वो चलने लगें। लोग उठने लगें। ‘‘यह तो बहुत ही बढ़िया है!’’

एक दिन वो आकाश में चमक रहा था। चमक रहा था। जहां देखो, चमक रहा था। देखा उसने पृथ्वी पर एक जगह थी, जहां वो चमक नहीं पा रहा था। पता नहीं क्या है ये ? मेरी चमक वहां तक क्यों नहीं पहुंच रही है ? तो उसने देखा, एक बादल! अब वो जितनी कोशिश करे उस बादल से चमकने की, वो चमका ही नहीं, उसकी रोशनी पृथ्वी तक पहुंचे ही नहीं।

‘‘ये बादल तो सूरज से भी बलवान है! ये तो सूरज को भी रोक देता है! हे भगवान! मुझे बादल बना दे!’’

अब वो बादल बन गया। और जहां सूरज चमक रहा है, वहां वो आए और सूरज की रोशनी को रोक दे। ऐसा करते-करते, करते-करते उसको लगा कि, ‘‘मैं कितना बलवान हो गया हूं!’’

एक दिन वो अपने बलवानपने पर खूब सोच रहा था, उसके बारे में खुश हो रहा था कि उसने देखा कि वो चल रहा है। एक जगह नहीं है। चल रहा है वो! ‘‘बादल को कौन चला रहा है ? बादल को कौन चला रहा है ? मैं तो सबसे शक्तिमान हूं! मैं तो सूरज से शक्तिमान हूं। जो राजा से शक्तिमान है, जो साहूकार से शक्तिमान है। कौन ऐसी चीज है, जो इस बादल को चला रही है ?’’

उसने देखा, तो हवा! हवा उस बादल को चला रही है। ‘‘हवा मेरे से भी शक्तिमान है ? हवा तो मेरे से भी ज्यादा शक्तिमान है! मैं बादल हूं। बादल सूरज से भी ज्यादा शक्तिमान है। सूरज राजा से भी ज्यादा शक्तिमान है। और राजा साहूकार से ज्यादा शक्तिमान है। और ये हवा तो मेरे से भी ज्यादा शक्तिमान है। हे भगवान! मेरे को हवा बना दे!’’

हवा बन गया वो। जहां जाए, जहां जाए, बहे। सारी टहनियां उसके आगे हिलें, धूल चले, सबकुछ हो रहा है। जा रहा है, जा रहा है, बह रहा है। कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है। बह रहा है, बह रहा है। खूब गति से बह रहा है। बादलों को इधर से उधर कर रहा है। सबकुछ कर रहा है। चल रहा है, चल रहा है। एक दिन आकर के धड़ाक — रुक गया!

‘‘हवा को किसने रोक दिया ? हवा, जो बादल से ज्यादा बलवान है। बादल, जो सूरज से ज्यादा बलवान है। सूरज, जो राजा से ज्यादा बलवान है। राजा, जो साहूकार से ज्यादा बलवान है। किस चीज ने रोक दिया ? देखा तो पहाड़! अब जितनी भी कोशिश करना चाहे हवा पहाड़ के पार नहीं हो सकती।’’

‘‘हे भगवान! मेरे को पहाड़ बना दे!’’ {चुटकी बजाई} पहाड़ बन गया।

सचमुच में सबसे बलवान! खड़ा-खड़ा वहां, ‘‘मैं अब सबसे बलवान हूं!’’

एक दिन वह अपनी शक्ति पर खूब गौर कर रहा था। नीचे से एक आवाज आयी और उसको लगा कि कोई इस पहाड़ को काटने में लगा हुआ है। उसने कहा, ‘‘इस पहाड़ से कौन बलवान हो सकता है ? ज्यादा बलवान, जो पहाड़ को काट रहा है ? क्योंकि पहाड़ हवा से ज्यादा बलवान है। हवा बादल से ज्यादा बलवान है। बादल सूरज से ज्यादा बलवान है। सूरज राजा से ज्यादा बलवान है। राजा साहूकार से ज्यादा बलवान है। पहाड़ तो सबसे बलवान है। फिर उसको कौन काट रहा है ? इससे बलवान कौन हो सकता है ?’’

नीचे देखा तो उसी की तरह एक पत्थर को काटने वाला — उसी की तरह एक पत्थर को काटने वाला उस पहाड़ को काट रहा था। तो सबसे बलवान तो वो पहले से ही था पर उसको नहीं मालूम था कि वो बलवान है। पर वो था। ठीक उसी प्रकार से, तुम्हारे जीवन में सब आशीर्वाद हैं।

तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ? 00:12:29 तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ? Video Duration : 00:12:29 परेशानियों को हटाना संभव नहीं है, परंतु उनसे परेशान न होना संभव है!

Text on screen : आज के समय में समस्याओं का समाधान करके तनावमुक्त कैसे हो सकते हैं ?

प्रेम रावत:

हर एक मनुष्य के पीछे समस्या है, परंतु समझने की बात ये है कि हम चाहते हैं कि वो समस्याएं खतम हो जाएं। वो समस्याएं कभी खतम नहीं होंगी। समस्या, ये समझिए कि एक ऐसी मक्खी है कि आपके ऊपर है, आपने ऐसे किया, आपको छोड़ करके वो किसी और के — किसी और पर बैठ जाएगी। तो समस्याएं तो ऐसी हैं कि हम ही उनके victims हैं। मनुष्य को ही वो परेशान करती हैं और वो पता नहीं, कितने रूप में आती हैं, जाती हैं और इस पृथ्वी पर वो समस्याएं बनी रहती हैं। अर्थात् समस्या वही हैं, आदमी बदलते रहते हैं।

तो समस्याओं से दूर होने का क्या हल है? दूर या नजदीक — इनसे आप नहीं हो सकते। ये तो आपके पीछे लगेंगी। बात है आदमी के दृष्टिकोण की कि "क्या ये सचमुच में मेरी समस्या है या नहीं? मैं कौन हूं और ये समस्या क्या हैं?" कौन नहीं है — अब कई लोग हैं, जो कहते हैं कि "हमको ये रहता है कि ये काम समय पर करना है। ये काम हमको निभाना है।" अब बड़े से बड़े लोग और छोटे से छोटे लोग। एक बस स्टैण्ड पर खड़ा हुआ अपनी घड़ी को देख रहा है कि "मेरी बस लेट हो गयी। मैं काम देर से पहुंचूंगा।" उसको भी चिंता है। एक ऐसा, जो कि करोड़ों का contract साइन करने के लिए जा रहा है, वो भी अपनी घड़ी को देख रहा है कि "अगर मैं टाइम पर नहीं पहुंचा तो हो सकता है, ये contract साइन न हो सके।" चिंता तो वही है और सबको सता रही है। परंतु हम कभी इस बात को इस तरीके से नहीं देखते हैं कि एक दीवाल है इधर और मैं आपको कई बार इसका reference दूंगा क्योंकि ये सारी चीज को एक context में बांधती है।

एक तरफ वो दीवाल, जिससे हम होकर के आए, जब हमारा जन्म हुआ और एक वो दीवाल, जिसमें हम प्रवेश करेंगे और कहां जाएंगे, क्या होगा? हमको कुछ नहीं मालूम। तो एक जन्म है, एक मरण है और इसके बीच में सबकुछ है। आप चाहते क्या हैं? अब किसी को कोई समस्या है, उससे पूछा जाए, "आप क्या चाहते हैं?"

"अजी! मैं इस शंका से निवारण चाहता हूं। इस दुःख से निवारण चाहता हूं।"

आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि एक न एक दिन वो दुःख तो रहेगा नहीं। फिर आप क्या चाहते हैं? फिर क्या चाहते हैं? फिर दूसरी समस्या का निवारण चाहते हैं? तो आपको यह लगता है कि आपकी जिंदगी यहां से ले के यहां तक दुःखों से बचने के लिए है या और कुछ भी इसमें संभव है ? इसकी संभावना पूरी तरीके से आपने जानी या नहीं जानी? क्योंकि दुःख तो आएंगे — सुख भी आएगा, दुःख भी आएगा। और मैं तो लोगों से कहता हूं — अगर अब दुःखी समय चल रहा है, थोड़ी देर इंतजार करो, सुखी समय आ जाएगा। जब सुख हो जाएगा, थोड़ी देर इंतजार करो, फिर दुःख आ जाएगा। और फिर दुःख आएगा तो फिर थोड़ी देर इंतजार करो, फिर सुख आ जाएगा। तो ये होता रहता है, होता रहता है, होता रहता है, होता रहता है। परंतु जाना क्या, पहचाना क्या? किस चीज को समझे कि ये जिंदगी इन चिंताओं से मुक्त होने के लिए नहीं है।

कहा है —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास।

और जो चितवे नाम बिन, सोई काल की फांस।।

अगर किसी चीज की चिंता करनी है तो वो जो तुम्हारे अंदर जो आशीर्वाद तुमको मिला है कि —

      नर तन भव बारिधि कहुं बेरो।

      सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।।

क्या मैं उस आशीर्वाद का पूरा-पूरा फायदा उठा रहा हूं या नहीं ?

देखिए! जब कोई चीज बहुमूल्य हमको मिलती है — जैसे, अगर हम कहीं गए। ये उदाहरण है मेरा। खील है! किसी ने हाथ में खील रख दी। तो आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि खील बड़ी जल्दी से गिर भी जाती है, हल्की है। उसको आपने खाया, थोड़ी गिर गई, कोई बात नहीं। कपड़ों पर गिर गई — कई लोगों को तो मैंने देखा है कि वो ऐसे कर देंगे। हटा देंगे उसको। पर अगर आपके हाथ में उतने ही हीरे हों, आप उनको खाएंगे तो नहीं! पर अगर एक गिर गया तो आप उसको ऐसे कर देंगे? नहीं। जो चीज, जिसको हम बहुमूल्य समझते हैं, जिसको मूल्यवान समझते हैं, उसकी हम क़दर करते हैं। उसको व्यर्थ नहीं खोने देते।

      सनमुख मरूत अनुग्रह मेरो।

इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है।

वो तो हीरों से भी ज्यादा मूल्यवान है! वही कृपा है। हम तो प्रार्थना करते हैं —  "हे भगवान! अपनी कृपा कर, मेरे को इस दुःख से बचा ले!"

भगवान कह रहे हैं — "नहीं, नहीं, नहीं! इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है!"

उसको हम— उसकी क़दर ही नहीं जानते हैं। उसको — खील की तरह इधर-उधर गिर रही है — कोई बात नहीं। और ऐसी चीज के पीछे पड़े हैं, जिससे मुक्त होने के लिए सबकुछ करने के लिए तैयार हैं। और वो ही समस्या तुम्हारे पास ऐसी हाथ धो के बैठी है कि तुमको परेशान करके रखेगी। क्योंकि ये उसकी प्रकृति है।

हर एक चीज की प्रकृति होती है। उस प्रकृति को समझना जरूरी है। अगर अपना ध्यान उस, जो असली चीज है, उससे निकाल दिया गया तो फिर ऐसी-ऐसी जगह जाएगा कि "ये क्यों हो रहा है? ऐसा क्यों हो रहा है? अरे बाप रे! अब ये हो गया! अरे अब मैं ...... ।" बच्चे हैं — क्या करते हैं? मेहनत करनी चाहिए पढ़ने की। और सबसे ज्यादा मेहनत करनी चाहिए बात को समझने की। क्योंकि अगर बात कोई समझ में आ गई तो आपको दोबारा-दोबारा पढ़ने की जरूरत नहीं है। वो चली गई अक्ल में। और बुद्धि एक ऐसी चीज है, उसको याद करके रखेगी। पर समझ में तो आया नहीं और उसको तोते की तरह रट रहे हैं। और जब बैठेंगे इम्तिहान में तो अगर वो तोता नहीं बोला ठीक समय पर तो वो प्रश्न तो गया।

तो यही चीज हम करते रहते हैं अपनी जिंदगी में और परेशानियां हमारे पीछे पड़ी रहती हैं। किस चीज के पीछे पड़ना चाहिए? इस दुनिया के अंदर आप अगर सुकून से रहें और सुकून वो, जो आपके हृदय से आता है, जो आपके अंदर से आता है, जो अपने आपको समझने में आता है। ये नहीं है कि बाहर सबकुछ बदल जाएगा। बाहर सबकुछ नहीं बदलेगा। समस्याएं तो फिर भी आएंगी, परंतु आपको जीने का तरीका मिल जाएगा। आपको वो रास्ता मिल जाएगा, जिससे कि वो परेशानियां आपको परेशान न करें! एक बार परेशानियां अगर परेशान करना छोड़ दें तो वो परेशानियां नहीं रहतीं। आई, गई! आई, गई!

भगवान ने आपको एक चीज दी है, वो है — सब्र! और लोग कितना सब्र करते हैं? छूट गया लोगों का। दौड़ रहे हैं, परंतु ये नहीं मालूम किसके पीछे ? फिर मैं कहता हूं — एक वो दीवाल, जब पैदा हुए। एक वो दीवाल, जब आपको जाना है! भागिए! जाएंगे कहां? जाएंगे कहां? ये एक ऐसी रेस है, ये एक ऐसी दौड़ है कि अगर आप उल्टा भी भागना चाहें तो इधर ही भागेंगे! यहां से आए, यहां जाना है! इसको कोई नहीं टाल सकता। इस तरफ भागेंगे तो इसी तरफ जाएंगे, इस तरफ भी भागेंगे तो भी इसी तरफ जाएंगे! ये एक ऐसी रेस है! ये एक ऐसी दौड़ है! तो आदमी किस चीज के पीछे दौड़ रहा है? इस चीज के पीछे दौड़ रहा है। इस चीज के पीछे दौड़ना अच्छा नहीं है। क्योंकि ये तो होगा!

कब आता है आदमियों को चैन? रिटायरमेंट के बाद, अपने आप से जीना मुश्किल हो जाता है! अपने आप से जीना मुश्किल हो जाता है! ये देखिए! एक दिन काम पर जा रहे हैं, सबकुछ है और दूसरे दिन रिटायर्ड! अब क्या करेंगे? कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है — बिज़ी रहने की कोशिश करता है! क्यों? जेलों में सबसे बड़ी सजा क्या है? Solitary confinement! जब मनुष्य को हर एक चीजों से हटा करके बंद कर देते हैं। अब उसके पास कौन है? सिर्फ वो है! और वो अपने साथ नहीं जी सकता। कभी सीखा ही नहीं! कभी सीखा ही नहीं! 

लोग ऐसी जगह हो जाते हैं कभी — खो गए, जंगल में खो गए और कोई है ही नहीं! सिर्फ वो ही हैं। बाप रे बाप! बचाओ! बचाओ! बचाओ! बचाओ! क्यों ? अपने आप से जीना कभी सीखा ही नहीं। और इस जिंदगी में जिसने जीना ही नहीं सीखा, तो उसके लिए ये जिंदगी है या नहीं है — परेशान है या नहीं है, एक ही चीज है। और हर एक चीज उसको परेशान करेगी। तो बात परेशानियों से बचने की नहीं है। क्योंकि मैं तो ये कहता हूं कि बारिश तो होगी, पर अगर छाता है तो भीगने की जरूरत नहीं है। बात है भीगने की, बारिश की नहीं। बारिश तो होगी। पर क्या आप भीगना चाहते हैं या नहीं?

हमको अच्छी तरीके से मालूम है, जब सर्दी का मौसम आता है, लोग कम्बल निकालते हैं। क्यों ? सर्दी तो होगी! वो तो मौसम है, सर्दी तो आएगी, पर यह जरूरी नहीं है कि आप ठंडे हो जाएं, आपको ठंड लग जाए। कम्बल ढूंढ़िए! जैकेट ओढ़िए, स्वेटर ओढ़िए, पहनिए। तो यह बात है! और जो समझदार लोग हैं, वो इस पर अमल करते हैं कि यह तो होगा! जबतक मैं हूं, परेशानियां तो आएंगी! परंतु मेरे को परेशान होने की जरूरत नहीं है। और चक्कर है परेशानी नहीं! परेशान होना। अगर परेशान — परेशानियों से आदमी परेशान न हो तो फिर उन परेशानियों का उस पर कोई असर नहीं। और यह संभव है! परेशानियों को हटाना संभव नहीं है, परंतु उनसे परेशान न होना संभव है।

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