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तनाव 00:09:52 तनाव Video Duration : 00:09:52 आशा की हमको बहुत जरूरत है। क्योंकि जब आशा चली जाती है तो निराशा बैठ जाती है। आशा...

Text on screen : तनाव में आकर आज बहुत से युवा आत्महत्या कर लेते हैं, इसे कैसे रोका जा सकता है ?

प्रेम रावत:

यह बहुत ही गंभीर सवाल है। क्योंकि अगर आप गुब्बारे में फूंक मारते रहेंगे, मारते रहेंगे, मारते रहेंगे, मारते रहेंगे, आपको अच्छी तरीके से मालूम है कि उस गुब्बारे के साथ क्या होगा। फफ्फ! सोसाइटी दो आँसू बहाने के लिए तो तैयार है, पर ये समस्या के बारे में कुछ करने के लिए तैयार नहीं है। सक्सेस की फूंक ऐसी मार दी है लोगों के पीछे, ऐसी — और उन बच्चों के पीछे, शुरुआत से — तुझे कुछ बनना है, तुझे कुछ बनना है, तुझे कुछ बनना है, तुझे कुछ बनना है, तुझे कुछ बनना है।

जब आप कह रहे हैं, ‘‘तुझे कुछ बनना है’’ तो उसका तो — एक बात तो स्पष्ट हो गयी उसके दिमाग में कि मैं कुछ हूं नहीं। तो जब यह बात किसी बच्चे के दिमाग में स्पष्ट हो जाती है कि ‘‘मैं कुछ हूं ही नहीं, मेरे को कुछ बनना है तो जब वो चीज, जो मेरे को बनने के लिए चाहिए, वो खतम हो गयी तो मैं भी खतम हो गया।’’

ये बीमारी बच्चों की नहीं है। ये बीमारी हमारी सोसाइटी की बनाई हुई है। और जब एक भी बच्चा अपनी जिंदगी को खतम करने के लिए मजबूर होता है तो ये तो wakeup call है सारी सोसाइटी के लिए। और न सिर्फ हिन्दुस्तान की सोसाइटी के लिए, सारे संसार की सोसाइटी के लिए! बच्चों का काम खुदकुशी करना नहीं है। बच्चों का काम है — इस जीवन को enjoy करना! उनको प्रेरित करना इस जीवन के बारे में, जो वो बचपना खो चुके हैं —बुजुर्ग लोग — ये तो उल्टी गंगा बह रही है यहां। तो सक्सेस, सक्सेस, सक्सेस, सक्सेस, सक्सेस! और मैं सबसे कहता हूं — तुम पहले से ही सक्सेसफुल हो! ये चीजें तुमको सक्सेसफुल नहीं बनाएंगी। तुम्हारा सक्सेस तुमसे शुरू होता है। और तुम्हारा सक्सेस एक फूल के माफ़िक है। एक फूल के माफ़िक है! इसको पानी दो, अपने आप खिलेगा। उसकी पत्तियों को खींचने से फूल नहीं खिलेगा और चाहे कितनी भी कोशिश कर लो! उस फूल को खिलने दो। ये सक्सेस की बीमारी बहुत ही खराब है। सक्सेस तो पहले से ही है।

जिस दिन आपने स्वांस लिया, आप सक्सेसफुल हुए। और जबतक आपके अंदर स्वांस आ रहा है, जा रहा है, आप सक्सेसफुल हैं। पर मां-बाप हैं — ‘‘तू मेरी बेटी है।’’ और मैं तो ये कहूंगा आपसे — क्योंकि ये बड़ी निजी बात है मेरी। पर मेरे साथ ये हुआ। और मैंने साफ-साफ कहा — चाहे कुछ भी हो, कुछ भी हो — बुरा समय आए, अच्छा समय आए, कुछ भी हो — बेटी! तेरा-मेरा जो संबंध है — तू भी प्रण कर, मैं भी प्रण करता हूं कि ‘‘कुछ भी हो, हम इस संबंध को बदलने नहीं देंगे। चाहे कुछ भी आए।’’ तो ये कहां गया ?

मां, बेटी! बाप है, अपने जीवन में संघर्ष कर रहा है! और वो नहीं चाहता कि मेरी बेटी भी ये संघर्ष करे। तो उसके अंदर फूंक क्या मार रहा है ? उल्टी फूंक मार रहा है। ‘‘सक्सेसफुल! मेरे जैसा मत बनना! मेरे से ज्यादा मेहनत करना!’’ मेहनत करने से नहीं — वो लोग सक्सेसफुल हैं, जो इस सारी जिंदगी को दोनों हाथों से बटोरते हैं, समेटते हैं। वो करना नहीं सिखाया।

आत्महत्या करने के लिए कितना अंधेरा चाहिए! कितना अंधेरा चाहिए! ये देखिए आप कि आदमी कोई — मैंने बहुत सोचा इस बारे में कि आदमी को जीने में और मरने में कोई अंतर नहीं आ रहा है। मतलब, बत्ती इतनी बुझ गई है, इतना अंधेरा हो गया है कि वो मोमबत्ती, जो जलनी चाहिए, वो बुझ गई है। हम सबको कोशिश करनी चाहिए कि वो मोमबत्ती कभी न बुझे। कभी न बुझे! और जबतक सभी मिलकर के उनकी मदद नहीं करेंगे — स्कूल तो बना देते हैं। स्कूल तो बना देते हैं, पर उस स्कूल में पढ़ाया क्या जा रहा है ? बच्चों की समझ में भी आ रहा है या नहीं ? इम्तिहान के पेपर तो बना देते हैं, पर वो बेचारे पास कैसे होंगे ? क्या पढ़ाया जा रहा है बच्चों को ?

अब देखिए! एक मैं documentary देख रहा था, उसमें साफ है। तो एक country है। उसमें level of education इतना ऊंचा नहीं था। तो उन्होंने कहा, कुछ करना चाहिए। तो उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है! बदल देंगे!’’ बदल दिया उन्होंने। क्या बदल दिया ? गृह-कार्य खतम! मैंने कहा, ‘‘ऐऽऽऽ! ऐंऽऽऽ! ऐंऽऽ! गृह-कार्य खतम!’’ और स्कूल के जो घंटे हैं, वो बहुत ही कम कर दिए। बहुत ही limited, बहुत ही कम! और emphasis — जाओ, खेलो!

हुआ क्या ?

बच्चे दिल भर के खेलते थे। और जब स्कूल में आते थे तो उनके लिए ये नहीं है कि यहां भी खेलते रहेंगे। नहीं। खेल वहां हो गया, अब पढ़ेंगे! ध्यान देने लगे। लेवल ऑफ एजुकेशन उसका आया। और फिर उनको मालूम है अच्छी तरीके से कि ध्यान दे दिया, अब फिर जाकर के खेलेंगे। ये हम एक दूसरे से क्यों नहीं सीख पाते ? मतलब, ये तो facts हैं! affection नहीं है, ये तो facts हैं। वो चीजें, जिससे सबका भला हो — काहे के लिए हम implement नहीं कर पाते हैं ? ऐसी-ऐसी चीजें implement करने के लिए हम तैयार हैं, जिसमें सिर्फ चंद का फायदा हो। पर ऐसी चीजें नहीं, जिसमें सबका फायदा हो।

तो ये समस्या बहुत ही गंभीर समस्या है! और एक बच्चे का आत्महत्या करना, बहुत ज्यादा है! एक का भी नहीं होना चाहिए! ये उम्र नहीं है उन चीजों की। अंधेरे की उम्र नहीं है, ये उजाले की उम्र है। और अगर जिस सोसाइटी में ये हो रहा है, तो ये समझिए कि उस सोसाइटी में भी मोमबत्तियां बुझ रही हैं। किसी के पास वो मोमबत्ती जलाने के लिए जली हुई मोमबत्ती नहीं है। कितना जरूरी है कि जलती हुई मोमबत्ती हो, ताकि और लोग भी उससे जला सकें। और ये बहुत ही, बहुत ही जरूरी बात है कि — जब — देखिए! आशा एक ऐसी चीज है कि जब आशा हमारी जिंदगी से चली जाती है तो अंधेरा बहुत गंभीर हो जाता है। और आशा हमारी जिंदगी से कभी नहीं जानी चाहिए। आशा की हमको जरूरत है। क्योंकि जब आशा चली जाती है तो निराशा बैठ जाती है। जब निराशा बैठ जाती है तो अंधेरा हो जाता है। जब अंधेरा हो जाता है तो फिर दिखाई नहीं देता है, कहां जा रहे हैं ? और ऐसी ठोकर कि जब जिंदगी और अंधेरे में भी कोई अंतर नहीं दिखाई देता है तो फिर सबकुछ खतम!

क्षमा की तलवार 00:07:05 क्षमा की तलवार Video Duration : 00:07:05 क्षमा — उस कार्य से अपना सम्बन्ध तोड़ना है जो आपको पीछे खींच रहा है।

MC:  ग्रैहम रिचर्ड्स:

और ये भी सवाल पूछा गया था, “अगर आपके लिए माफ करना मुश्किल है तो बाकियों को माफ करना और भी कठिन है ? इसे उस तरफ मोड़ना, जिस व्यक्ति को आप सबसे अच्छी तरह जानते हैं, जिसे आप सबसे ज्यादा परखते हैं। आप खुद को कैसे माफ करें ?”

प्रेम रावत:

देखिये! ये एक बढ़िया सवाल है, क्योंकि ये इतना जरूरी है खुद को माफ कर पाना और मैं कहूंगा ‘आपको और किसी और को’ बात में नहीं लाते। बात करें सिर्फ माफ करने की। ‘ये क्या है ?’

और कई लोग सोचते हैं “माफी देने से, निचले स्तर को बढ़ावा मिल जाएगा। किसी की गलती को बढ़ावा मिल जाएगा।” ये माफी देना नहीं है। “माफ करना” होता है उस चीज से नाता तोड़ना, जो आपको नीचे धकेल रहा है।”

तो अब जो भी और जानते हैं किसी ने आपके साथ बहुत बुरा किया और वो काफी लम्बे समय पहले हुआ था। पर, उस व्यक्ति का आप पर अब भी असर है। उनकी आप पर पकड़ है। पूरी तरह से। क्योंकि हर रोज जब आप उठते हैं, तो शायद, एक अकेले पल में आप उसे गाली देते हैं; आप उसके बारे में सोचते हैं। वह व्यक्ति आप से अब भी जुड़ा हुआ है। और माफी कह रही है “और नहीं! आपका मुझ पर नियंत्रण नहीं है। मुझे जीवन चाहिए। मुझे मेरा जीवन दें। और मैं आपको हक़ नहीं देता, इसके बाद मुझे डराने का।” ये होता है माफ करना।

तो ऐसा नहीं, वो ऐसा कहती है कि “ओह, हां! मैं तुम्हें जानती हूं।” हां, मेरा मतलब, मेरे हिसाब से ये है। मेरा मतलब, मेरे साथ एक बार बहुत बुरी चीज हुई। और फिर हर बार मैं उसके बारे में सोचता ये होता कि, "हे भगवान, हे भगवान, हे भगवान!”

फिर मैंने कहा, “उस दुष्ट का अब भी मुझ पर नियंत्रण है। मैं तो उसके देश में भी नहीं हूँ। मैं उसे अपने ऊपर नियंत्रण नहीं होने दूंगा।” और मैंने कहा, “बस! ख़त्म!”

ये है माफ करना। माफ करना ताकतवर होता है। ये कहता है – “नहीं! मेरा जीवन मेरे पास है। बहुत धन्यवाद!”

वापिस – वापिस आ रहा है। क्योंकि अगर नहीं आये, फिर वो बेड़ियाँ रहेंगी और वो आपके साथ क्या करेंगी, ये बेड़ियाँ क्या करती हैं, ये पंजे जो आप में गड़े हैं। ये आपको गुस्सा दिलाते हैं। इससे गुस्सा आता है; डर आता है; ये आपको सोचने नहीं देता; ये आपको आगे बढ़ने से रोकता है; ये सराहना को रोकता है।

आप डर में जीते हैं। आप सिर्फ और सिर्फ डर में जीते रहते हैं और वो व्यक्ति तो जा चुका है, पर वो पंजे गड़े हुए हैं और वो कह रहे हैं, “और नहीं। धन्यवाद!”

और जब आप माफी को इस तरह देखते हैं, इसका एक बिल्कुल अलग मतलब निकलता है। क्योंकि अब तक तो ऐसा था जैसे कि — “ओह! मैंने माफ कर दिया, और जानते हैं ठीक है! अच्छा ये क्या किया तुमने।”

पर जानते हैं, ऐसी चीजें होती हैं आपके साथ जीवन में, जो अगर आप बात करें दूसरों के काम को अपनाने की, तो ऐसा नहीं होगा, बिल्कुल भी नहीं! ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि आप उनमें से कुछ चीजें नहीं मान सकते, वो इतनी बुरी होती हैं। और आप खुद को शिकार नहीं बनने दे सकते, क्योंकि कुछ चीजें ऐसी है, जो आप स्वीकार कभी नहीं कर पाएंगे कि "हां! ये ठीक है!" पर ये आप पर है कि उस व्यक्ति के पंजे और उस घटना का अब भी आप पर पकड़ रहे या नहीं। क्योंकि अगर आप नहीं करते तो इस्तेमाल करें, माफी की तलवार को और आज़ाद हो जाएं।

तो मैं माफी को ऐसे देखता हूँ। ऐसे नहीं कि — "हां! ये तुमने किया!" क्योंकि कुछ बातें बहुत बुरी होती हैं। और आप देखते हैं उन्हें होता हुआ देखें, इतनी जगह पर।

एक और तरीका समझने का है, एक दिन बुद्ध चल रहे थे और कई लोग उन्हें भला-बुरा बोल रहे थे। उनके भक्त जो उनके साथ थे, वापिस आ गए और उन्होंने कहा — “बुद्ध, वो लोग इतनी बुरी चीजें कर रहे थे, बुरी बातें कह रहे थे, आपको इससे फर्क़ नहीं पड़ता ?”

और बुद्ध ने कहा — “ओके, देखिये! ये कटोरा देखा! ये किसका है ?”

वो उनका ही था।

उन्होंने कहा — “हां! ये आपका है।”

तो उन्होंने कटोरे को अपने भक्त की तरफ सड़का दिया।

उन्होंने कहा — “अब ये किसका कटोरा है ?”

भक्त ने कहा — “अब भी ये आपका ही है।”

उन्होंने थोड़ा और सड़काया, अब ये किसका कटोरा है ? और अब किसका कटोरा है ? अब बताओ ? वो ये करते रहे और अंत में कटोरे को अपने भक्त की गोद में रख दिया।

उन्होंने कहा — “अब ये किसका कटोरा है ?”

उसने कहा — “बुद्ध! आप ही का है।”

उन्होंने कहा — “बिल्कुल, बिल्कुल! मुझे नहीं मानना। जिस दिन मैं मानूंगा, ये मेरा बन जाएगा। पर अगर मैं नहीं मानूंगा, वो तब भी उनका है।”

आप जानते हैं, मैं समझता हूँ, मेरा मतलब कभी-कभी ये कहानियां कहनी आसान होतीं हैं, बल्कि जीवन में उतारने से। पर, अंत में अगर आप अलग होने लगें, तो फिर शायद रस्सी इतनी मोटी हो जाए कि एक दिन आप काट न पाएं। पर कम से कम आप काटना शुरू तो करें। इसे समझना शुरू करें कि आपमें ताकत है रस्सी को काटने की। माफ करने का यही मतलब होता है… कि अंत में एक दिन आप रस्सी को कमजोर करेंगे और फिर ये कट जायेगी।

पर आपको शुरू करना होगा। आपको इसे समझना होगा।

सिक्के को पलटें 00:07:29 सिक्के को पलटें Video Duration : 00:07:29 अगर आपने सिर्फ अपनी बदसूरती का तज़ुर्बा किया है, फिर आपने सिक्का पलट कर नहीं देखा...

MC: ग्रैहम रिचर्ड्स

सवाल है “आप खुद से प्यार कैसे करें जब आप मानने लगें हैं कि आप बदसूरत हैं और एक विफलता ?”

प्रेम रावत:

अब, खुशकिस्मती से यह तथ्य नहीं, यह बस हमारी मान्यता है। मान्यता बदल सकती हैं।

मान्यता ऐसी होती है — और हां मैं एक बात कहता था। अगर मैं किसी के साथ बैठा हूं, कह सकता हूं, “सोचिये कि यहाँ एक गाय है, कोई दिक्कत नहीं; बस मान लीजिये कि यहाँ एक गाय है और यह गाय बहुत दूध देती है। बस मान लीजिये, ओके ?”

कोई परेशानी, नहीं ना ? पर अगर मुझे चाहिए चाय, असली चाय और कुछ दूध चाहिए। बात है कि इस मानी हुई गाय से असली चाय के लिए दूध नहीं मिलेगा। अब अगर मैंने मानी हुई चाय ली है, तो यह सोची हुई गाय थोड़ा सा दूध दे सकती है मेरी मानी हुई चाय के लिए, पर अगर मुझे असली चाय चाहिए तो ये काम नहीं करेगी।

‘मानने’ के बाद भी एक पड़ाव है, उसे कहते हैं 'जानना।' सच्चाई में जीना, और बस — क्योंकि कई लोग मुझसे कहते हैं जब मैं अपनी बात उनसे कहता हूँ कि “बस भी करिये; सच्चाई कहिये!” और बात ये है उनके डर के साथ वो लोग असल में सच्चाई से दूर हैं। वो लोग झूठ में जी रहे हैं।

आप जो चाहे वो मान सकते हैं। पर सच्चाई है क्या ? सच्चाई क्या है ? सच्चाई है कि अंधकार रोशनी से दूर नहीं होता।

पिछली बार जब आपने स्विच जलाया और अँधेरे कमरे में रोशनी की, कितनी देर लगी अंधकार को जाने में ? आपने लाइट बल्ब जलाया और बस हो गया। जजजजजजजजजजज...., जैसे जानते हैं एक ड्रेन ? बिलकुल नहीं, एकदम से, एकदम से!

अंधकार कभी रोशनी से दूर नहीं; रोशनी कभी अंधकार से दूर नहीं। जो ख़ुशी कभी उदासी से दूर नहीं और उदासी कभी भी ख़ुशी से दूर नहीं। ये साथ में रहते हैं।

जब आप बाथरूम में जाकर, दरवाजा बंद करते हैं, प्राइवेसी के लिए, आपको लगता है ये प्राइवेट है ? नहीं! आपका गुस्सा, आपका डर, आपका शक़, आपके साथ आये हैं। हालांकि आप अपने लिए बस या एयरोप्लेन में एक ही सीट बुक करते हैं, आपका गुस्सा, आपका डर, आपका शक़ हमेशा साथ में चलते हैं। हमेशा! हमेशा!

पर रहती है करुणा भी, रहती है समझ, रहती है कृतज्ञता। ये चीजें भी हैं क्योंकि ये सिक्के का दूसरा पहलू है।

आपको यह जानना है — अगर आपने सिर्फ अपनी बदसूरती का तज़ुर्बा किया है, फिर आपने सिक्का पलट कर नहीं देखा। आपको सिक्के को पलटना है। क्योंकि सिक्के की दूसरी तरफ कमाल की सुंदरता है।

सुंदरता क्या है ? क्या है सुंदरता ? कोई ऐसा जो सामान आकर का हो ? कोई फिल्म स्टार ? सुंदरता क्या है ? क्योंकि आप जानते हैं सच्चाई को, कितने फिल्मस्टार्स बेहद सुन्दर होते हैं, वो कई-कई घंटो तक खुद को शीशे में निहारते हैं कि “हे भगवान! क्या मैं हूं ये ? ये मैं हूं ? ये मैं हूं ?”

आप हैं रखवाले, अगर महसूस करें खुद में और देखें। मैं इस पर जाता रहता हूं और ये कमाल का सवाल है, क्योंकि इससे मुझे अपनी किताब के लिए बहुत कुछ मिलेगा — इसलिए आपको खुद को जानना होता है।

सॉक्रटीज़ ने कहा — "खुद को जानें!” आपको खुद को जानना है। आपको खुद को क्यों जानना है ? क्योंकि तभी तो आप खुद की असल सुंदरता को महसूस कर पाएंगे। इसलिए आपको खुद को जानना चाहिए।

अरबों वज़ह हैं मेरे मुताबिक, इस धरती पर 7.5 अरब वज़ह हैं, खुद को जानने की, कि आपको खुद को जानना क्यों है ? क्योंकि अगर सब जानें तो मुझे लगता है दुनिया की स्थिति काफी अलग होती। अगर वो सुंदरता जो आपके मन में है, वो असल सुंदरता से भिन्न है।

आंखों को देखिये! इस कमाल को देखिये! ये बच्चे सुन्दर हैं, ये कुछ बढ़िया देखते हैं और हैरान होते हैं, बिल्कुल हैरान! और बिल्कुल, बेवकूफ माँ-बाप कहते हैं — “ये चाँद है।” उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता। वो अपने बेवकूफ पिता के कहने से पहले ही चाँद से प्यार करने लगे थे या बेवकूफ माँ ने कि “ये चाँद है।” उन्होंने चाँद देखा, उसका नाम जाने बिना और उससे प्यार कर बैठे। ये है सुंदरता! और आपमें वो सुंदरता है, चाहे और कोई कुछ भी कहे। आप उनसे कहीं बुरे हैं, क्योंकि आप खुद को लगातार बताते रहते हैं कि मैं सुन्दर नहीं, मैं सुन्दर नहीं…।

ये सुंदरता एक दिन चली जायेगी। वही लोग, जिसे लोग आकर चूमते हैं, वो कहेंगे, “आह! ये क्या हुआ ?”

तो ये नहीं है, ये सुंदरता वाला हिस्सा नहीं — सुंदरता का हिस्सा यहाँ है, आपके हृदय में! आपमें!

नन्हे कदम 00:06:10 नन्हे कदम Video Duration : 00:06:10 जब आप हार को स्वीकार नहीं करते, तो आपके पास क्या रह जाती है ? आशा!

तो मैं जीवन में उम्मीद को कैसे समझूँ ? मैं उम्मीद को कैसे पूरा करूँ ? बहुत आसान है। अब चार बिन्दु हैं और मैने इन चार बिंदुओं के बारे में सोवेटो में भी बात की थी।

खुद को जानने से शांति मिलेगी। और बाकी तीन बिंदु आपके जीवन की गुणवत्ता बढ़ाएंगे। आपको ख़ुशी देंगे।

तो दोबारा, पहला अंक है — खुद को जानना।

दूसरा अंक है — जीवन में कृतज्ञता होना।

तीसरा अंक होगा — दूसरे लोग क्या सोचते हैं, इसके बारे में मत सोचिये।

तो "हे भगवान!" जानते हैं, आपको समझना होगा, वो इंसान आपके बारे में नहीं सोच रहा। जानते हैं क्या सोच रहा है ? वो ये सोच रहा है कि बाकी लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। वो आपके बारे में नहीं सोच रहे। और बस आप इस खेल में फंसे हुए हैं कि वो इंसान आपके बारे में क्या सोच रहा है। उन्हें फर्क नहीं पड़ता। उन्हें वाकई फर्क नहीं पड़ता। पर हम ये सब बना लेते हैं। तो जो भी...

और फिर चौथी चीज़ है — हर बार आप विफल हों, विफलता को अपनाइये नहीं। ये है उम्मीद के बारे में और लोग मुझसे पूछते हैं हर बार, "जब मैं विफल होता हूँ, मुझे उसे अपनाना नहीं? पर मैं विफलता को पूरे जीवन अपनाता आया हूँ। मैं कैसे न अपनाऊं उसे ?"

बात ये है, जब आप बचपन में चलना सीख रहे थे, आप कई बार गिरे। कई बार, क्योंकि ये एक अजीब स्थिति है। आप, आप सीखना ... आप सीखना चाहते थे कि कैसे चलें। बिलकुल, आप पढ़ नहीं सकते और आपको अपनी माँ की आवाज़ पसंद है पर समझते नहीं हैं कि वो क्या कह रही है। और आप यहां हैं। आपको वो करना है जो आपने पहले कभी नहीं किया। और आपको कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। आप नहीं जा सकते अपने iPad पर या YouTube पर और लिखने की कोशिश करें "मुझे चलना सिखाइये"। क्योंकि आपको तो लिखना भी नहीं आता। और अब ये आपके ऊपर है। तो आप उठते हैं, हिलते हुए, काफी ज्यादा, क्योंकि अब तक आपकी टांगें, ये मांसपेशियाँ चलने लायक नहीं हुई हैं। आप उठते हैं और हिल रहे हैं, आप कदम लेने की कोशिश करते हैं और गिर जाते हैं।

और अगर यही आपको आज करना होता, आप कहते, "कोशिश की, मुझसे नहीं हुआ। मुझे उस बारे में बात नहीं करनी।"

है न ? बस, रुक जाते। विफलता स्वीकार लेते। ख़त्म। दरवाज़ा बंद।

"मुझे याद मत दिलाइये। ये बुरा दिन है, बहुत खराब दिन। मुझे याद नहीं करना। सफलता नहीं मिली।"

क्योंकि आपने विफलता को नहीं स्वीकारा, आपको उम्मीद नज़र आई और आप उठे और आपने फिर कोशिश की। फिर भी नहीं हुआ। आप फिर विफल रहे, पर फिर भी उसे नहीं अपनाया। आपके पास क्या बचा था ? जब आप विफलता को नहीं अपनाते, आपके पास क्या बचेगा ? बचेगी सिर्फ उम्मीद। और इस पूरे वक्त, क्योंकि आपने उम्मीद को अपनाया और विफलता को ठुकराया।

जैसे ही आप विफलता से "विफल" हटा लेते हैं, विफल खुद में इतना ताकतवर शब्द नहीं है, पर अगर विफलता और विफल को साथ रखते हैं तो वो सबकुछ है। सबकुछ है!

पर आप असफल होंगे, क्योंकि जीवन में हर काम के लिए अनुदेश नहीं है। जीवन में ऐसी बातें होंगी आपके साथ और आपके आस-पास जिनका आप सामना करेंगे, जो आपने पहले नहीं देखीं हैं। और या तो आप जल्दबाज़ी में हों, वो फैसला लेते हैं या फिर बिना जानते ही आप फैसला ले सकते हैं, जो गलत हो और आप विफल हो जाएं। और विफल हुए, और ये ठीक है दुनिया में कुछ नहीं बदला। दुनिया में किसी ने कुछ नहीं कहा। नहीं, कुछ नहीं बदला। उठिये और चलिए, ये आप पर है या वहीं रहिये, ये भी आप पर है।

— प्रेम रावत

शांति संभव है 00:05:00 शांति संभव है Video Duration : 00:05:00 संसार में अगर अशांति है तो उसका कारण कोई और नहीं — कौन है ? हम सब हैं!

प्रेम रावत:

अगर आप चाहते हैं कि इस संसार के अंदर शांति स्थापित हो तो पहले अपने छोटे-से संसार में शांति को स्थापित करो। संसार में अगर अशांति है तो उसका कारण कोई और नहीं — कौन है ? हम सब हैं! हम सब हैं! सब के सब! सारे हिन्दुस्तानी, सारे अमेरिकन, सारे कनेडियन, सारे ऑस्ट्रेलियन — सात अरब लोग इस संसार में हैं। सब के सब की जिम्मेवारी है। सबकी! ये नहीं है कि ‘‘आप खा लो या हम चुन लेते हैं! एक आदमी को चुन लेते हैं इनमें से — जो हम सबके लिए खाकर आ जाएगा। काहे के लिए हम अपना टाइम बर्बाद करें ?’’ जब भूख लगती है — तब ये सब नहीं चलता।

लोग हैं, शांति के लिए क्या करेंगे ? "अच्छा-अच्छा! दीया जला देते हैं।"

भूख लगी है तुम्हारे को, घर जाओगे, बीवी से पूछोगे, "खाना तैयार है ?" "आप दीया जला दीजिए!"

आपका अपने परिवार में क्या व्यवहार है ? आप दो मिनट अपने बच्चों के साथ बैठते हैं, उनका लेक्चर सुनते हैं या अपना ही लेक्चर देते रहते हैं?

बहुत सीरियस बात है ये!

"बेटा! बोल! आज तेरी बारी। किस चीज से तू खुश है ? किस चीज से तू खुश नहीं है ? बोल!" क्या कहना है — "खुश हो ?"

नहीं, नहीं...। कान पहले से ही पके हुए हैं। कान पहले से ही पके हुए हैं। अरे, छोटी-छोटी बातें हैं ये। समझो! क्या कर रहे हो तुम अपने जीवन में ?

सोच कोई नहीं रहा। बिना शांति के यह संसार तबाह हो जायेगा। इस पर एक्शन लो! समझो इस बात को कि तुम इसके भागीदार हो। और समय है, ये समय है कि अगर हम निश्चय करें कि शांति भी मेरे अंदर है और मैं इस अशांति का भागीदारी हूं और यह मेरे पर निर्भर है। अगर मैं कुछ करूं तो सचमुच में शांति संभव है।

Text on screen :
अगर आप चाहते हैं कि संसार के अंदर शांति स्थापित हो तो
पहले अपने छोटे-से संसार में
शांति को स्थापित करो।

सुख और शांति वाला संसार कैसा होगा ? 00:12:51 सुख और शांति वाला संसार कैसा होगा ? Video Duration : 00:12:51 शांति का वास्ता सिर्फ एक चीज से है और वह है मनुष्य। और शांति उसके अंदर है!

Text on screen : अगर इस संसार में सिर्फ सुख और शांति होगी तो वह संसार कैसा होगा ?

प्रेम रावत:

देखिए! बात यह है कि इस दुनिया के अंदर लड़ाई — अगर हम इतिहास को देखें तो इतनी ज्यादा नहीं हुई हैं। लोगों ने परिश्रम यही किया है कि शांति का वातावरण बने। जब मनुष्य खेती करने लगा, तब सारा चक्कर हुआ। क्योंकि अब खेती है। तो किसी ने हल चलाया, किसी ने पानी दिया, किसी ने बीज बोया — अब उसमें फसल तैयार है और कोई ऐसा है, जो ये सारी मेहनत नहीं करना चाहता है। और जब फसल तैयार हो गई तो उसको काट के ले गया। तब जाकर के लोगों ने ये सारा प्रबंध शुरू किया। तब से राजा बने, तब से लड़ाइयां चालू हुईं! किसकी जमीन है — उससे पहले किसी को क्या मतलब था, किसकी जमीन है ? सभी की जमीन है। जो जा रहा है, उसकी जमीन है। परंतु एक बार जब खेती होने लगी, तब लोगों के जीवन में ये हो गया कि नहीं, ये मेरी है, ये मेरी है, ये ये है, ये वो है! तो बात ये है कि ये सारी चीजें — इन पर लड़ना, इन पर झगड़ना!

अब सबसे ज्यादा लड़ाई होती है — ये मेरा है! अब ये ही बात नहीं है कि ‘‘यह मेरा है! यह मेरा विचार है और तुमको इस तरीके से होना चाहिए!’’ इस पर भी लड़ाई होती है। फिर शांत हो जाते हैं। और जब शांत हो जाते हैं, तब फिर दुबारा से निर्माण शुरू होता है, उन्नति होती है! यह तो मनुष्य को अच्छी तरीके से मालूम है कि शांति क्या लाती है और अशांति क्या लाती है ? इसमें दूरदर्शी होने की जरूरत नहीं है। जो है, अगर उसको देखा जाए! क्योंकि इस संसार में समस्या ज्यादा नहीं है। थोड़ी समस्या है। और मैं समस्याओं को छोटा नहीं बनाना चाहता। लोग भूख से मरते हैं। अब ये समस्या छोटी क्यों है मेरे हिसाब से ? क्यों है ? एक तो लोगों के हिसाब से बहुत बड़ी समस्या है! समस्या छोटी ये इसलिए है कि इस पृथ्वी पर इतना खाना उपजता है, उगाया जाता है कि वो सबको खिला सके। अगर पृथ्वी छोटी पड़ती खाना उगाने के लिए तो यह बहुत बड़ी समस्या होती। पर पृथ्वी इस चीज के लिए अनिवार्य है। और इतना खाना उगता है, परंतु वो खाना, ताकि चावल, गेहूं, इन चीजों का दाम control करने के लिए फेंका जाता है। वो ज्यादा जरूरी है लोगों के लिए पैसा, जिसको वो खा नहीं सकते हैं, जिसको वो पी नहीं सकते हैं। वो समझते हैं कि इसके होने से सबकुछ है और वो ये भूल जाते हैं कि एक ये दीवाल है, जब मैं पैदा हुआ और एक ये दीवाल है कि मेरे को जाना है, और जिस दिन मैं इस दीवाल तक पहुंचूंगा और इसके दूसरी तरफ जाऊंगा — एक कौड़ी पैसा मैं नहीं ले जा सकता हूं। और मेरे पेट में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो पैसे को हजम कर ले। एक चीज नहीं है!

ये पैसा है क्या ? मनुष्य का बनाया हुआ है। भगवान ने बनाया — प्रकृति ने बनाया सोना, मनुष्य ने लगाया उसका दाम! और जब दाम लगने लगा तो फिर वो अपने भविष्य को कोसता है कि उसके पास इतना क्यों है, मेरे पास इतना क्यों नहीं है ? ये सारी चीजें मनुष्य की बनाई हुई हैं। और मनुष्य ही इनको झेलता है, इन्हीं चीजों से दुखी होता है। अपने भविष्य को कोसता है कि ‘‘ऐसा क्यों हो रहा है मेरे साथ ? मैं क्यों नहीं अमीर हूं ? ये क्यों अमीर है ? मैं गरीब क्यों हूं ? भगवान ने ऐसा क्या बनाया ?’’ फिर धर्म की बात आ जाती है। ‘‘अरे! ये तो मेरे पिछले जन्मों का फल मिल रहा है मेरे को!’’ और ये सब चलता रहता है! परंतु सही बात तो ये है कि शांति हम सबके अंदर है। शांति कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो बाहर हो! वह हमारे अंदर है।

घट में है सूझे नहीं, लानत ऐसी जिंद।

तुलसी या संसार को, भयो मोतियाबिंद।।

Cataract — मोतियाबिंद! चीज जो है, वो दिखाई नहीं दे रही है साफ-साफ! यही होता है मोतियाबिंद से। और जब वो मोतियाबिंद निकल जाता है तो फिर साफ दिखाई देने लगता है कि जिस चीज की हमको जरूरत है, जिस शांति की हम तलाश कर रहे हैं, वह शांति हमारे अंदर है। जब मनुष्य उस शांति का अनुभव करने लगता है और वो जान लेता है कि ‘‘ये मेरी प्रकृति है, मैं ये हूं! मैं ये नहीं हूं, मैं ये हूं!’’

अब देखिए! एक समय था कि आईना नहीं था। आईना रूप जैसी कोई चीज नहीं थी। तो लोग अपने आपको उस तरीके से नहीं देख पाते थे, जिस तरीके से आज देख पाते हैं। या तो पानी में लोग अपनी परछाईं देखते थे। पर पानी की परछाईं तो आप जानते ही हैं, कभी इधर-उधर पानी हिल रहा है तो वो ठीक ढंग से दिखाई नहीं देगी। कोई चमकीली चीज! पर चमकीली चीज होने के लिए पैसा होना जरूरी था। अमीरों को ही उपलब्ध थी, गरीबों को ज्यादा उपलब्ध नहीं थी। अर्थात् लोग अपने चेहरे को नहीं जानते थे, नहीं पहचान पाते थे। और जब आईना आया तो अब तो सब लोग देखते हैं। अगर अपनी फोटो देखेंगे तो कहेंगे कि ‘‘ये तो मेरी फोटो है!’’ तो कैसे आपको मालूम ?

क्योंकि आप जानते हैं कि आपका चेहरा कैसा दिखता है! ठीक इसी प्रकार से जब मनुष्य अपनी प्रकृति को समझता है तो उसको समझ में आता है कि शांति मेरे से दूर नहीं है। मैं शांति से दूर नहीं हूं, शांति मेरे से दूर नहीं है। और मेरी प्रकृति में अशांति भी है। मेरी प्रकृति में लड़ना भी है! क्योंकि लड़ाई जो चीज है, वो बाहर से नहीं आती है, वो मनुष्य के अंदर से ही आती है। और शांति भी मनुष्य के अंदर से आती
 है। जब दोनों चीजों को वो पहचानने लगता है तो वो जानता है कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है ? और जबतक वो अपने आपको नहीं जानेगा, वो समझने की कोशिश करेगा कि अच्छा क्या है, बुरा क्या है — वो जो कुत्ता अपनी दुम को chase करता रहता है, फिरता रहता है, फिरता रहता है, उसकी हालत, वैसी मनुष्य की हो जाएगी। और होगा क्या ? शांति दूर रह जाएगी। जब मनुष्य जानता ही नहीं है कि ये अशांति का कारण भी मैं ही हूं और शांति का कारण भी मैं ही हूं तो वो दूसरों की तरफ देखेगा, लीडरों की तरफ देखेगा। और लीडर तो कर नहीं सकते। और करेंगे कैसे ? जब स्रोत उसका मनुष्य है, जब मनुष्य ही नहीं बदलने के लिए तैयार है, जब मनुष्य ही अपने आपको पहचानने के लिए तैयार नहीं है तो लीडर क्या करेगा ? चटनी किस चीज की बनाएगा ? क्या करेगा ? मतलब, क्या solution देगा किसी को ? Solution हमेशा एक ही रहा है — अपने आपको जानो! अपने आपको पहचानो! जबतक जानोगे नहीं, जबतक पहचानोगे नहीं, ये बात समझ में नहीं आएगी कि शांति आपसे दूर नहीं है। और उस दिन होगा क्या ? उस दिन होगा क्या ? उस दिन क्या बदल जाएगा ऐसा ? अगर ये भी मान के चलें कि चलिए! एक दिन ऐसा आएगा कि सब अपने आपको जानते हैं। उस दिन बदलेगा क्या ? पर बदलना किस चीज को है ? किस चीज की वजह से, बाहरी चीज की वजह
 से हमारे मन में अशांति होती है ? ये तो अंदर की ही बात है! तो इस दुनिया को बदलने की जरूरत नहीं है। इसका ये मतलब नहीं है कि सेलफोन गायब हो जाएंगे! ना। बाहर किसी चीज को बदलने की जरूरत नहीं है। किसी चीज को बदलने की जरूरत नहीं है।

अगर आपके पास एक मोटर साइकिल है और मोटर साइकिल का स्पार्क, प्लग खराब हो गया और आपकी मोटर साइकिल नहीं चल रही है। तो आप मेरे को बताइए कि उस मोटर साइकिल को ठीक करने के लिए क्या करना पड़ेगा ? उसका रंग बदलना पड़ेगा ? रोड बदलने पड़ेंगे ? साइन बदलने पड़ेंगे ? गैस टैंक बदलना पड़ेगा ? टायर बदलने पड़ेंगे ? नहीं। स्पार्क-प्लग बदलना पड़ेगा। वो बदल दीजिए, सब ठीक है! आपके पास एक टार्च है! फ्लैश लाइट है, टॉर्च है! उसमें एक बल्ब है। बल्ब खतम हो गया। तो क्या करना चाहिए आपको ? नई बैटरी ? बाहर उसको दूसरे रंग में रंग दें ? नहीं। बल्ब नया लाइए, लगाइए! वो जलने लगेगा! यही बात मनुष्य के साथ भी है। वो अपने आपको जाने, अपने आपको समझे तो फिर ये सारी चीजें — इनको बदलने की जरूरत नहीं है। ये तो — मनुष्य का काम है आविष्कार करना! वो चीज ही ऐसी तिकड़मी है। मतलब, आप देखिए कि रोटी बेलना। एक चीज है, जो हिन्दुस्तान में बहुत तादाद में होता है। तो रोटी बेलना — उसके लिए बेलन चाहिए, उसके लिए एक फ्लैट जगह चाहिए! उसके लिए आटा चाहिए! आटा को गूंधना है! सबका अपना—अपना तरीका है। सबका अपना-अपना — मैंने देखा है। सबका अपना-अपना तरीका है। कोई बड़ी स्टाइल से बेलता है — कोई ये करता है, कोई वो करता है। रोटी बनाने वाले भी ऐसे हैं कि कई बार तो उसको उछालते हैं और उसको पकड़ते हैं। फिर करते हैं। सबका अपना-अपना तरीका है। क्योंकि चीजों को थोड़ा-सा बदलना, थोड़ा-सा आसान बनाना, ये तो मनुष्य के दिमाग में एक कीड़ा है। ये तो वो करते आया है और करते आएगा। पर इससे न कोई खराबी है, न कोई अच्छाई है। क्योंकि स्रोत शांति का वो है। वो चीजें नहीं! मतलब, जिसको खाना बनाना नहीं आता है, उसको आप अच्छी से अच्छी चीजें दे दें, इसका मतलब नहीं है कि खाना स्वादिष्ट बनेगा। परंतु जिसको आता है, अगर उसको इधर-उधर की भी चीज मिल जाएगी, वो उसी को लेकर के — तिकड़मी क्योंकि है मनुष्य, बढ़िया चीजें बना लेगा। तो ये अंतर है।

ये जो चीज — ध्यान जो है शांति के बारे में हम दुनिया की तरफ डालते हैं, बाहर की चीजों की तरफ डालते हैं। क्योंकि हम ये समझते हैं कि जो कुछ भी बाहर हो रहा है, वही हो रहा है। परंतु वो बाहर तो बाहर है। और जड़ इसकी है मनुष्य के अंदर! और जबतक वो नहीं समझेगा, तबतक ये कुछ भी हो! कुछ भी हो! अब क्या आविष्कार होना खराब बात है ? बिल्कुल नहीं। क्या सेलफोनों को अच्छा नहीं होना चाहिए ? बिल्कुल अच्छा होना चाहिए! क्या सेलफोन इस समय बहुत बड़े हैं ? बिल्कुल बड़े हैं! आप अपने जैकेट में डालिए तो जैकैट ऐसे नीचे हो जाने लगती है। सेलफोनों को मालूम नहीं है — कब शांत होना चाहिए, कब शांत नहीं होना चाहिए! परंतु ये सारी चीजें — इनसे कोई तुक नहीं है, इससे कोई वास्ता नहीं है शांति का। शांति का वास्ता है तो सिर्फ एक चीज से है, वो मनुष्य से है। और शांति उसके अंदर है और आज है! तो ये प्रश्न कि ‘‘भविष्य में अगर ऐसा कभी हो!’’ नहीं, ये तो है! ये तो अभी है! परंतु ये प्रगट नहीं हो रहा है। और प्रगट इसलिए नहीं हो रहा है, क्योंकि ध्यान नहीं है उस तरफ। और थोड़ा-सा भी ध्यान उस तरफ जाए तो सबकुछ बदल सकता है।

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